
Determination and Worship of Śālagrāma (Vaiṣṇava Purifications and Fivefold Pūjā)
इस अध्याय में पार्वती वैष्णवों के उस धर्म को पूछती हैं जिससे वे संसार-सागर को पार कर जाते हैं। ईश्वर वैष्णव-शुद्धि का उपदेश देते हैं और बताते हैं कि भक्ति ही घर, शरीर, वाणी और इन्द्रियों की सच्ची शुद्धि है—प्रदक्षिणा, चरण-प्रक्षालन, पुष्प-संग्रह, नाम-कीर्तन तथा हरि की लीलाओं और उत्सवों के श्रवण-दर्शन से पवित्रता बढ़ती है। फिर पूजा को पाँच भागों में व्यवस्थित किया गया है—अभिगमन (मन्दिर-गमन, शुद्धि व मार्जन), उपादान (पूजा-सामग्री का संग्रह), योग (अन्तर्मन से ध्यान), स्वाध्याय (अर्थ सहित जप, स्तोत्र और संकीर्तन), तथा इज्या (विधिपूर्वक अर्चना)। आगे शालग्राम-पूजा का विधान आता है—आयुध-क्रम के अनुसार केशव, नारायण, माधव, गोविन्द आदि नामों का निर्धारण, नमस्कार, शिला-चिह्नों से व्यूह/अवतार-लक्षण की पहचान, सहायक देवताओं की स्थापना, और अंत में पुरुषार्थों की प्राप्ति का फल बताया गया है।
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