Adhyaya 78
Patala KhandaAdhyaya 780

Adhyaya 78

Determination and Worship of Śālagrāma (Vaiṣṇava Purifications and Fivefold Pūjā)

इस अध्याय में पार्वती वैष्णवों के उस धर्म को पूछती हैं जिससे वे संसार-सागर को पार कर जाते हैं। ईश्वर वैष्णव-शुद्धि का उपदेश देते हैं और बताते हैं कि भक्ति ही घर, शरीर, वाणी और इन्द्रियों की सच्ची शुद्धि है—प्रदक्षिणा, चरण-प्रक्षालन, पुष्प-संग्रह, नाम-कीर्तन तथा हरि की लीलाओं और उत्सवों के श्रवण-दर्शन से पवित्रता बढ़ती है। फिर पूजा को पाँच भागों में व्यवस्थित किया गया है—अभिगमन (मन्दिर-गमन, शुद्धि व मार्जन), उपादान (पूजा-सामग्री का संग्रह), योग (अन्तर्मन से ध्यान), स्वाध्याय (अर्थ सहित जप, स्तोत्र और संकीर्तन), तथा इज्या (विधिपूर्वक अर्चना)। आगे शालग्राम-पूजा का विधान आता है—आयुध-क्रम के अनुसार केशव, नारायण, माधव, गोविन्द आदि नामों का निर्धारण, नमस्कार, शिला-चिह्नों से व्यूह/अवतार-लक्षण की पहचान, सहायक देवताओं की स्थापना, और अंत में पुरुषार्थों की प्राप्ति का फल बताया गया है।

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