
Sainyajīvana — The Life/Conduct (and Revival) of the Army
शेष–वात्स्यायन संवाद के भीतर इस अध्याय में अश्वमेध-क्षेत्र का युद्ध तीव्र हो उठता है। सुरथ कुश पर आक्रमण करता है, पर कुश उसे गिरा देता है। हनुमान कुश से भिड़ते हैं; प्रचण्ड अस्त्र से आहत होकर वे मूर्छित हो जाते हैं। फिर सुग्रीव आक्रमण करते हैं, किंतु कुश के वरुण-पाश से बँध जाते हैं। लव अनेक वीरों को पराजित कर कुश के साथ आ मिलते हैं। दोनों भाई मुकुट-आभूषण समेटकर बँधे हुए हनुमान और सुग्रीव को आश्रम की ओर ले जाते हैं। सीता/जानकी बंदियों को देखकर मुस्कराती हैं और उन्हें छोड़ने को कहती हैं, साथ ही राम के यज्ञ-अश्व को पकड़ने की निन्दा करती हैं। कुश-लव क्षत्रिय-धर्म और आज्ञापालन का आधार बताकर अपने कर्म का समर्थन करते हैं, फिर बंदियों और अश्व को मुक्त कर देते हैं। अंत में राम-भक्ति पर आधारित सत्य-कर्म से राजा के प्राणों की रक्षा का विधान होता है और यह प्रतिपादित होता है कि केवल शौर्य से बढ़कर भक्ति की महिमा है।
No shlokas available for this adhyaya yet.