
Vaiśākha Māhātmya: Supremacy of Mādhava-month, Yama’s Dharma Teaching, and Ekādaśī Praise
ऋषि सूतजी की स्तुति करके उनसे आगे धर्मकथा सुनाने का अनुरोध करते हैं। सूतजी एक प्राचीन संवाद का प्रसंग उठाते हैं, जिसमें जगत्पालक भगवान् द्वारा मासों में वैशाख (माधव) की श्रेष्ठता बताई गई है—इस मास में स्नान, पूजन, दान और श्राद्ध का फल यज्ञों के फल से भी बढ़कर कहा गया है। फिर यमधर्मराज और ब्राह्मण यज्ञदत्त का उपदेशात्मक संवाद आता है। यम कर्मफल के नियम को समझाकर नरक के कारण गिनाते हैं—विशेषतः विष्णुभक्ति की उपेक्षा, अनैतिक आचरण और धर्मभंग। इसके बाद वे स्वर्गप्रद सद्गुणों का वर्णन करते हुए एकादशी-व्रत (द्वादशी-संयम सहित) की अत्यन्त प्रशंसा करते हैं, तथा तीर्थ-सेवा और पुण्य-क्षेत्र में देहत्याग के महात्म्य को भी बताते हैं।
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