Adhyaya 45
Patala KhandaAdhyaya 450

Adhyaya 45

The Meeting with Śrī Rāma

इन्द्र को भय होता है कि एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दिव्य ‘पात्र’ छीना जा सकता है। वह समझ लेता है कि हनुमान श्रीराम के कार्य में प्रवृत्त हैं, इसलिए बृहस्पति के नेतृत्व में देवगण हनुमान को प्रसन्न करने हेतु उनके चरणों में प्रणाम करते हैं। हनुमान के तीव्र प्रतिज्ञा-वचनों के बाद देवता जीवनदायिनी सञ्जीवनी औषधि प्रदान करते हैं। हनुमान रणभूमि में लौटकर पहले पुष्कल को और फिर शत्रुघ्न को जीवित करते हैं; यहाँ सत्य-वचन और ब्रह्मचर्य की शक्ति का संकेत मिलता है। पुनर्जीवित वीर पुनः युद्ध में उतरते हैं और अस्त्र-प्रतिअस्त्र का क्रम बढ़ता जाता है—आग्नेय, वारुण, वायव्य, पर्वतास्त्र तथा वज्र आदि। जब शिव के प्रहार से शत्रुघ्न संकट में पड़ते हैं, वे श्रीराम की शरण में प्रार्थना करते हैं। तब रणभूमि में श्रीराम का साक्षात् प्राकट्य होता है और अध्याय का केंद्र युद्ध-संकट से दिव्य उपस्थिति की ओर परिवर्तित हो जाता है।

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