Adhyaya 99
Patala KhandaAdhyaya 990

Adhyaya 99

Counsel to King Mahīratha: Lust, Impermanence, and the Saving Power of the Vaiśākha (Mādhava) Observance

इस अध्याय में राजा महीरथ को पूर्व-पुण्य से समृद्ध होते हुए भी कामासक्ति के कारण पतित और राज्य-धर्म से विमुख दिखाया गया है। वह शासन का भार दूसरों पर डालकर विषय-भोग में डूब जाता है। साथ ही पुरोहित/गुरु की जवाबदेही बताई गई है—जो गुरु राजा को रोकने का प्रयत्न नहीं करता, वह भी पाप का भागी होता है; पर जो राजा उपदेश सुनकर भी नहीं मानता, उसका दोष मुख्यतः उसी पर रहता है। इसके बाद नीति और वैराग्य का उपदेश आता है: धन, यौवन और सुख क्षणभंगुर हैं; इन्द्रिय-निग्रह आवश्यक है; मृत्यु के समय केवल धर्म ही साथ जाता है। देह की अशुचिता और नश्वरता का विचार कर काम-मोह को तोड़ने की शिक्षा दी जाती है। अंत में उद्धार का उपाय बताया गया है—माधव (वैशाख) मास में प्रातः उठना, स्नान करना और विष्णु-पूजन करना महान पापों का भी नाश करता है तथा भक्त को हरि-धाम तक पहुँचाता है।

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