
The Glory and Secret Theology of Vṛndāvana (in the context of Nārada’s supplication)
पार्वती शिव से पूछती हैं कि वृन्दावन का रहस्य सुनकर नारद ने अपना “सच्चा स्वरूप” कैसे पाया। शिव रहस्य-परम्परा बताते हैं—ब्रह्मा श्रीकृष्ण के पास जाकर ‘बत्तीस वनों’ वाले वृन्दारण्य के विषय में पूछते हैं, जहाँ जीव साक्षात् दिव्य भाव से रहते हैं और वहाँ देह त्याग करने से कृष्ण-सान्निध्य प्राप्त होता है। फिर कथा में नैमिषारण्य के शौनक आदि ऋषियों को नारद का उपदेश, तथा गौतम ऋषि के साथ उनका प्रसंग आता है। महाविष्णु की आज्ञा से नारद अमृत-सरोवर में स्नान करते हैं, स्त्री-रूप धारण कर धाम-सेवा के अंतरंग भाव में प्रवेश पाते हैं; ललिता-देवी कृष्ण-लीला में पुरुष-स्त्री तत्त्व की अभिन्नता/अत्यन्त एकता का रहस्य प्रकट करती हैं। साथ ही कठोर गोपनीयता का विधान है—अयोग्य को यह रहस्य बताने से अपराध और शाप का भय; और इस अध्याय के श्रवण-पठन से परम सिद्धि का फल कहा गया है।
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