
Commencement of Rāma’s Aśvamedha Sacrifice
इस अध्याय में श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का विधिपूर्वक विस्तार वर्णित है। सौमित्रि लक्ष्मण वाल्मीकि-आश्रम से सीता को लाकर अयोध्या पहुँचाते हैं; सीता मेल-मिलाप स्वीकार कर राजमाताओं के आशीर्वाद पाती हैं और राम के साथ यज्ञ-मण्डप में विराजती हैं। नगर में उत्सव छा जाता है और ऋषि तथा राजा यज्ञ में एकत्र होते हैं। वसिष्ठ बताते हैं कि ब्राह्मण-पूजन और दान से यज्ञ पूर्ण होता है। तब राम अगस्त्य, व्यास, च्यवन आदि महर्षियों का सत्कार कर स्वर्ण, वस्त्र, गौ आदि का महादान करते हैं; सब लोग यज्ञ की सिद्धि की प्रशंसा करते हैं। यज्ञ के बीच दीक्षित शस्त्र के स्पर्श से अश्व से एक तेजस्वी देव प्रकट होता है। वह अपने पूर्वजन्म के कपट, दुर्वासा के शाप से पशु-योनि, और राम-स्पर्श से मुक्ति का वृत्तान्त कहता है। अंत में यह प्रतिपादित होता है कि हरि/राम का स्मरण—even अपूर्ण भक्ति से आरम्भ होकर भी—अत्यन्त उद्धारक है; फिर वसिष्ठ कर्पूर मँगवाकर देवताओं के आवाहन सहित आहुतियाँ चलाने को कहते हैं।
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