
The Departure of the Aśvamedha Horse
इस अध्याय में शेष–वात्स्यायन संवाद के भीतर रामाश्वमेध का प्रसंग चलता है। श्रीराम के आगमन पर शत्रुघ्न उनका स्वागत करते हैं; हनुमान की उपस्थिति से भक्तों में श्रद्धा जागती है और राम को भक्तों के रक्षक रूप में स्वीकार किया जाता है। इसके बाद स्तोत्र-शैली में परम पुरुष का वर्णन है—जो प्रकृति से परे होकर भी सृष्टि, पालन और संहार करता है; साथ ही शिव-समन्वित त्रिकर्म-भाव भी संकेतित होता है। प्रायश्चित्त और कर्मकाण्ड की सीमाएँ बताकर कथा का रुख समन्वय की ओर मुड़ता है। पार्वती के माध्यम से चेतावनी दी जाती है कि शिव और विष्णु में भेद मानना नरक का कारण है; दोनों की एकता का उपदेश दिया जाता है। शिव राजा वीरमणि और उसके पुत्रों को जीवित करते हैं, उन्हें राम के चरणों में प्रणाम करने को कहते हैं; राजा राज्य त्याग देता है। अश्वमेध का घोड़ा छोड़कर उसका अनुगमन होता है; रत्नजटित रथ से राम अंतर्धान हो जाते हैं। अंत में कहा गया है कि इन लीलाओं का श्रवण संसार-शोक का नाश करता है।
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