
Sītā and the Parrot Pair: Prophecy of Rāma, Rāma’s Form, and the Curse Causing Separation
इस अध्याय में वात्स्यायन पूछते हैं कि भगवान ने जानकी के वचन-प्रकट होने और उसके पाठ का विधान कैसे किया। शेष/अनन्त उत्तर देते हुए कथा को मिथिला में जनक के राज्य में स्थापित करते हैं और सीता के भूमिजा रूप से प्राकट्य तथा नामकरण का प्रसंग बताते हैं। फिर सीता को एक दिव्य शुक-युगल मिलता है। उनके वचन में भविष्यवाणी है—राम का भावी राज्याभिषेक, सीता की पहचान, और वाल्मीकि-आश्रम में आगे चलकर रामायण का पाठ। वे राम की वंश-परंपरा और उनके भ्राताओं का परिचय देते हैं तथा राम के शुभ, तेजस्वी स्वरूप का भक्तिपूर्वक वर्णन करते हुए कहते हैं कि भाषा उनके गुणों का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकती। जब सीता शुकी को रोक लेती हैं, तब विरह, शोक और क्रोध से स्थिति तीव्र हो जाती है और एक शाप निकलता है, जो आगे राम-सीता-वियोग का पुराणोक्त कारण बनता है। अंत में वाणी और क्रोध के दुष्परिणामों से सावधान करने वाली शिक्षा दी जाती है।
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