
The Mantra-cintāmaṇi of Kṛṣṇa and the Dhyāna of Rādhā-Kṛṣṇa in Vṛndāvana (Provisional Title)
ऋषि सूतजी की स्तुति करके कृष्ण-लीला का दिन-प्रतिदिन वर्णन माँगते हैं और विशेष रूप से गुरु, शिष्य तथा मंत्र की पहचान और विधि पूछते हैं। सूतजी यमुना-तट की अंतर्कथा सुनाते हैं, जहाँ नारद जगद्गुरु सदाशिव के पास जाकर रहस्य पूछते हैं। शिव ‘मंत्र-चिन्तामणि’ नामक गोपनीय कृष्ण-मंत्र का उपदेश देते हैं—उसके पाँच-पद, दशाक्षर और षोडशाक्षर रूपों का संकेत करते हुए, एक बार जप से भी सिद्धि और फल की आश्वस्ति देते हैं। ग्रंथ भक्ति के आधार पर व्यापक अधिकार बताता है, परंतु अश्रद्धालु और अभक्त को मंत्र-दान निषिद्ध करता है। फिर ऋषि, छंद, देवता, विनियोग, बीज-शक्ति, न्यास और पूजन आदि सहायक अंगों का क्रम बताकर वृन्दावन में राधा-कृष्ण के ध्यान का विस्तृत वर्णन करता है। मंत्रार्थ को ‘युगलार्थ’ और पूर्ण शरणागति के रूप में समझाया गया है—सब कुछ दिव्य युगल के लिए ही है।
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