
Procedure for the Origin and Preparation of Sacred Ash (Bhasma)
श्रीराम ने शम्भु (शिव) से पूछा कि भस्म की उत्पत्ति क्या है, उसका माहात्म्य क्या है, और उसे धारण करने तथा दान देने से कौन-सा पुण्य मिलता है। शिव ने उत्तर में सृष्टि-तत्त्व का आधार बताकर कहा कि त्रिगुण ही जगत्-प्रवृत्ति के कारण हैं; गुण-कार्य के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर प्रकट होते हैं, पर शिव के ज्ञान-बल के बिना वे गुणों को स्थिर नहीं रख पाते—इसलिए भस्म शिवतत्त्व से सम्बद्ध परम पावन वस्तु है। फिर भस्म-निर्माण की विधि आती है—गोमय और गोमूत्र को निर्दिष्ट मंत्रों से संस्कारित कर अग्नि में होम किया जाता है, चाहें तो कई दिनों तक यह कर्म बढ़ाया जा सकता है। तत्पश्चात मंत्रों से भस्म ग्रहण कर उसे गंगाजल/दूध और सुगंधित द्रव्यों के साथ मिलाने का विकल्प बताया गया है। साधक पाँच ब्रह्म-मंत्रों (ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वाम, सद्योजात) से न्यासवत् अभिषेक कर “नमः शिवाय” के साथ त्रिपुण्ड्र धारण करता है; इससे शुद्धि होती है और यह उपदेश वक्ता-श्रोता दोनों के पापों का नाश करने वाला कहा गया है।
No shlokas available for this adhyaya yet.