
Pacification/Removal of Sin — The Preta Narrative (Vaiśākha Māhātmya)
राजा अम्बरीष नारद से ऐसा पाप-शमन स्तोत्र पूछते हैं जिसके श्रवण मात्र से पाप नष्ट हो जाए। नारद कहते हैं कि हरिकथा और वैष्णव-संवाद का पुण्य वैशाख-स्नान से भी बढ़कर है और वह पापों का क्षय करता है। फिर एक अंतर्कथा आती है—माधव/वैशाख मास में मुनिशर्मा ऋषि रेवा (नर्मदा) में स्नान करने जाते हुए पाँच घोर पापियों को मुक्ति-याचक पाते हैं। मार्ग में उन्हें विकृत, भयावह प्रेत-सम प्राणी मिलते हैं, जो बताते हैं कि अन्न का अपमान, अश्रद्धा, और विधि-भंग जैसे दोषों से उन्हें यह दुर्दशा मिली। मुनिशर्मा उन पाँचों और प्रेतों को रेवा-तट ले जाकर वैशाख-स्नान, नामोच्चारण और विष्णु के पाप-प्रशमन स्तोत्र का पाठ कराते हैं। इस साधना से प्रेत मुक्त होते हैं, पापी शुद्ध होते हैं; अध्याय का निष्कर्ष है कि इस स्तोत्र का पाठ/श्रवण पापों का नाश कर विष्णु-धाम की प्राप्ति कराता है।
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