Adhyaya 86
Patala KhandaAdhyaya 860

Adhyaya 86

Glorification of the Month of Vaiśākha (Mādhava’s Month)

नारदजी का उपदेश सुनकर राजा अम्बरीष पूछते हैं कि वैशाख—जिसे माधव का महीना कहा गया है—सब पवित्र महीनों में सर्वोत्तम क्यों है, और इसमें पूजा, दान तथा तप के क्या नियम हैं, किस देवता की विशेष आराधना करनी चाहिए। पहले धर्म-उपदेश की महिमा बताई जाती है—कर्म करने वाला, सिखाने वाला, सलाह देने वाला, अनुमोदन करने वाला और प्रेरित करने वाला, सब पुण्य के भागी होते हैं; दूसरों को स्नान-धर्म या व्रत-क्रिया में प्रवृत्त करने से भी साझा पुण्य मिलता है, और राजा/नेता समाज के लिए आचरण-मानक बनाते हैं। फिर नारदजी मनुष्य-जन्म की दुर्लभता, स्वधर्म-पालन और विशेषतः वासुदेव-भक्ति की श्रेष्ठता बताते हुए वैशाख की विष्णु को अत्यन्त प्रियता प्रकट करते हैं। गंगा, रेवा, यमुना आदि तीर्थों में मासभर स्नान, जप, दान और विष्णु-पूजा को पाप-नाशक, समृद्धि-दायक और अंततः हरि-धाम-प्रद कहा गया है। आरम्भ की विधि, तिल-दान, मधु-दान, गो-दान आदि तथा अंत में उद्यापन/समापन-कर्म का विधान भी बताया गया है।

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