
The Sage Kamu’s (Kamo’s) Journey to Viṣṇu’s World
शेष–वात्स्यायन संवाद के भीतर मुनि श्रीराम-कथा की अद्भुतता और उसे सुनने मात्र से होने वाली पवित्रता का वर्णन करते हैं। अगस्त्य की आज्ञा से श्रीराम ब्रह्महत्या-दोष के शमन हेतु एक महान यज्ञ/अनुष्ठान करते हैं; इसी प्रसंग में हनुमान और वनवासी ऋषि आराण्यक (वाडवेन्द्र) की भक्ति-लीला प्रकट होती है। शत्रुघ्न अपने साथियों सहित ऋषि के आश्रम में आते हैं। राम-दर्शन की तीव्र आकांक्षा से हर्षित ऋषि को अयोध्या ले जाया जाता है, जहाँ सरयू-तट पर दानरत राम को मुनियों के बीच देखकर वह कृतार्थ होता है। श्रीराम की अनुपम नम्रता तब दिखती है जब वे ऋषि के चरण धोकर उस चरणामृत को मस्तक पर धारण करते हैं। आराण्यक उपदेश देते हैं कि राम-नाम ही समस्त पापों का नाशक है, ब्रह्महत्या तक को हर लेता है। अंत में भक्त-ऋषि का तेज श्रीराम में लीन होकर सायुज्य को प्राप्त होता है; दिव्य वाद्य, पुष्प-वृष्टि और देव-गान से यह सिद्धि सुशोभित होती है।
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