
Description of Meditation on the Lord (Twofold Dhyāna: Nirguṇa and Saguṇa)
ऋषि सूतजी की कृष्ण-कथा की प्रशंसा करके उनसे व्रत, दान, पूजा-विधि और पूर्व-स्नान के नियमों का भी उपदेश माँगते हैं। सूतजी भक्ति की मोक्षदायिनी शक्ति बताकर एक नई पवित्र कथा आरम्भ करते हैं—मथुरा में नारदजी का राजा अम्बरीष से मिलना और अम्बरीष का यह पूछना कि परम तत्त्व निराकार होते हुए भी साकार कैसे होता है तथा कौन-सी उपासना सभी पुरुषार्थ देती है। नारदजी हरि-भक्ति को सर्वोच्च धर्म बताते हैं और केवल कर्मकाण्ड से उसकी श्रेष्ठता दिखाते हुए वैष्णव आचारों का क्रमबद्ध वर्णन करते हैं—सदाचार-व्रत, मनोनिग्रह, सत्यवचन, नाम-जप और स्मरण आदि। वे यह भी कहते हैं कि स्त्रियाँ और शूद्र भी आगमिक पूजा और भगवान के नाम के द्वारा सहज ही भक्ति प्राप्त कर सकते हैं। अंत में वे दो प्रकार के ध्यान का उपदेश देते हैं—निर्गुण ध्यान, जो दीपक की उपमा से स्थिर अंतःप्रकाश उत्पन्न कर कैवल्य देता है; और सगुण ध्यान, जिसमें शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुज विष्णु का अलंकारों सहित ध्यान करने से शुद्धि और विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
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