
The Greatness of the Purāṇas and the Rite of Sacred Listening (Śravaṇa-vidhi)
इस अध्याय में श्रीराम और शम्भु (शिव) के संवाद द्वारा पुराण-प्रवचन की महिमा और पुराण-श्रवण की विधि बताई गई है। आरम्भ में कहा गया है कि दुष्ट-संग पाप को बढ़ाता है, परन्तु सच्चे पुराण-ज्ञाता के पास जाने से दीर्घकाल से संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वसिष्ठ और एक अमर राक्षस का दृष्टान्त देकर ऋषि की रक्षण-शक्ति और विवेक का प्रभाव दिखाया गया है। फिर श्रवण-विधि का विधान आता है—तिथि, नक्षत्र, करण, लग्न आदि शुभ समय, उचित स्थान, वक्ता का सम्मान-पूजन, और प्रतिदिन निरन्तर पाठ। यह भी कहा गया है कि महापातकों तक का प्रायश्चित्त-फल पुराण-श्रवण से प्राप्त होता है। अंत में अयोग्य वक्ता/ग्रन्थ के लक्षण, उपयुक्त दान, तथा पुराण और उपपुराणों की सूची देकर कलियुग में पुराण-श्रवण को पूर्ण मोक्ष-साधन के रूप में स्थापित किया गया है।
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