Adhyaya 88
Patala KhandaAdhyaya 880

Adhyaya 88

Glory of Vaiśākha: The Debt-Bound / Enemy-Son Typology and the Turn to Detachment

इस अध्याय में सुमना ‘ऋण-सम्बद्ध पुत्र’ की धारणा बताती हैं—ऐसा संबंध जो कर्तव्य और कर्म-ऋण के बंधन से जुड़ा रहता है। आगे ‘शत्रु-पुत्र’ का कठोर चित्रण है: बाहर से पुत्र/भाई/पिता/मित्र जैसा निकट, पर भीतर से दुष्ट—भोग-लोलुप, जुए का आसक्त, चोरी करने वाला, कटुवचन बोलने वाला, माता-पिता पर क्रूर और हिंसक; और उनके देहांत के बाद श्राद्ध तथा दान भी नहीं करता। फिर धर्म का निर्देश आता है—स्नेहपूर्वक पालन-पोषण, अनुशासन व शिक्षा, माता-पिता का सम्मान, पिण्ड-दान सहित श्राद्धकर्म, तथा देव-ऋषि-पितृ—इन तीन ऋणों का निर्वाह। अंत में माया के कारण परिवार और संपत्ति पर ‘मेरा’ कहने की भ्रांति पर प्रश्न उठाकर वैराग्य, असंगता और अपरिग्रह की ओर मोड़ दिया गया है; वैशाख-माहात्म्य के प्रसंग में अध्याय-समाप्ति होती है।

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