
Arjuni’s Entreaty: The Secret Vision of the Supreme Abode and Devī-mediated Access to Kṛṣṇa-līlā
इस अध्याय में गोविन्द के परम क्रीड़ा-धाम का रहस्य बहु-स्तरीय संवाद के रूप में प्रकट होता है। प्रश्न उठता है कि वह लोक कहाँ है जहाँ गोविन्द गोपियों के साथ नित्य विहार करते हैं; पर कहा जाता है कि वह ब्रह्मा और देवताओं को भी अदृश्य है, केवल वर्णन से नहीं, अनुभव से ही जाना जाता है। अर्जुन विनम्र होकर उसी दर्शन की याचना करता है। देवी त्रिपुरसुन्दरी/परमेश्वरी यहाँ मध्यस्थ अधिकारिणी बनती हैं। अर्जुन तीर्थ-स्नान, न्यास, मुद्रा, मन्त्र-जप और पुरश्चरण-सदृश साधनाएँ करके ‘परम विद्या’ प्राप्त करता है; देवी उसे गोलोक से भी ऊपर नित्य वृन्दावन में ले जाती हैं जहाँ निरन्तर रास-लीला होती है। भगवान की माया से अर्जुन ‘अर्जुनी’ रूप में सखी-भाव धारण करता है; व्रज की सखियाँ उसे स्वीकार कर नाम-समूह बताती हैं और गोकुलनाथ-सम्बन्धी मन्त्र-व्रत-विधियाँ सिखाती हैं। अंत में वह कृष्ण-लीला में गुप्त रूप से सहभागी बनता है और गोपनीयता की प्रतिज्ञा दोहराता है; इस अध्याय के श्रवण-पाठ से हरि में रति उत्पन्न होने का फल कहा गया है।
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