
Janaka’s Liberation of Beings in Hell (within the Satyavād Narrative; Rama’s Aśvamedha Context)
इस अध्याय में राम के अश्वमेध का घोड़ा तेजःपुर नामक नगर में पहुँचता है। वह नगर धर्म-प्रकाश से दीप्त, देवालयों से समृद्ध, तपस्वियों से भरा और गृहस्थों के अग्निहोत्र-धूम से पवित्र बताया गया है। शत्रुघ्न मंत्री सुमति से वहाँ के शासक के विषय में पूछते हैं; सुमति राजा ऋतंभऱ का परिचय देता है, जिनकी वंश-परंपरा सत्य और गो-सेवा के व्रतों से जुड़ी है। फिर उपदेश आता है कि संतान-प्राप्ति के लिए विष्णु की कृपा, गोमाता का आशीर्वाद या शिव का अनुग्रह साधना चाहिए। गो-पूजा का विधान किया गया है और गायों को कष्ट देने, तिरस्कार करने या उपेक्षा करने के दोष बताए गए हैं। इसके बाद प्राचीन कथा में राजा जनक का वर्णन है। वे योगबल से देह त्यागकर नरक के निकट पहुँचते हैं; उनके शरीर से उठती वायु से वहाँ के प्राणी की यातनाएँ शान्त होने लगती हैं। करुणावश जनक धर्मराज यम से उन पापियों की मुक्ति की याचना करते हैं। धर्मराज दण्ड-व्यवस्था समझाते हैं और यह भी बताते हैं कि पुण्य—विशेषतः ‘राम, राम’ नामोच्चारण से उत्पन्न—दान करके दूसरों को दिया जा सकता है। जनक अपना संचित पुण्य दान करते हैं और वे सभी जीव तत्काल दिव्य देह पाकर मुक्त हो जाते हैं।
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