Adhyaya 110
Patala KhandaAdhyaya 1100

Adhyaya 110

The Greatness of Śiva-Worship: From Grief and Anger to Śiva’s Grace (Agniśikha/Jvālāmukha Origin)

श्रीराम शिव से पूछते हैं कि अग्निशिखा नामक ज्वलंत गण कौन है और उसकी उत्पत्ति कैसे हुई। शिव उदाहरणों के माध्यम से बताते हैं—एक क्षत्रिय राजा ऋण, राज्य-हानि और पुत्र-मृत्यु के शोक से टूट जाता है; उसे समझाया जाता है कि शोक और क्रोध को वश में कर स्थायी कल्याण का मार्ग अपनाओ। वह वाराणसी में वसिष्ठ के पास जाता है; वसिष्ठ उसे विश्वेश्वर शिवलिंग की पूजा का उपदेश देते हैं और बताते हैं कि सरल-से सरल अर्पण भी मुक्ति का कारण बन सकता है। इसी क्रम में लुब्धक (शिकारी) की अनियमित पर अत्यन्त तीव्र भक्ति और आत्म-समर्पण से शिव प्रकट होते हैं; वह अपने कुटुम्ब सहित शिवलोक को प्राप्त करता है। राजा भी मंदिर-सेवा से पुनः राज्य पाता है, पर बाद में क्रोध में आकर मंदिर-दहन कर बैठता है; तब प्रायश्चित्त और पुनः शिव-पूजा द्वारा उसका शोधन होता है—यह कर्म की निरन्तरता और भक्ति की सुधारक शक्ति दिखाता है। एक अन्य प्रसंग में वेश्या-विषयक आरोप, दण्ड और वध की कथा आती है; फिर वीरभद्र की घोषणा से ज्वालामुख/अग्निशिखा का प्रादुर्भाव होता है। अध्याय का उपसंहार क्षमा को इस लोक और परलोक के सुख का मार्ग बताकर करता है और नित्य श्रवण करने वालों को शिवलोक-प्राप्ति का फल घोषित करता है।

Shlokas

No shlokas available for this adhyaya yet.