
The Mādhava (Vaiśākha) Bath: Sādhu-saṅga, Instruction Ethics, and the Vaiśākha Observance
इस अध्याय में राजा मुक्तिदायक उपदेश के लिए कृतज्ञता प्रकट करता है और साधु-संग को परम तीर्थ बताकर उसकी महिमा कहता है—जो पाप का नाश करता है, संसार-रोग को हरता है और भक्ति को पुष्ट करता है। फिर वह माधव/वैशाख-व्रत के विषय में पूछता है—क्या दान देना चाहिए, कहाँ और कैसे स्नान करना चाहिए, किसकी पूजा करनी चाहिए और कौन-से नियम अपनाने चाहिए। यम कश्यप को करुणामय गुरु के रूप में स्थापित करते हैं और कश्यप उपदेश-नीति बताते हैं—पात्र को ही उत्तर देना, वाणी की रक्षा करना; फिर भी श्रद्धालु शिष्य/उत्तराधिकारी को बिना पूछे भी हितकारी सलाह देना। इसके बाद ‘माधव-स्नान’ की विधि आती है—प्रातःकाल स्नान, अर्घ्य, हरि-पूजन और नैवेद्य-समर्पण। इसे प्रति वर्ष करने से हरि-धाम की प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है। अंत में चेतावनी है कि पवित्र मास का त्याग होने पर काम और वासनाएँ मनुष्य को फिर विषय-भोग में खींच लेती हैं, इसलिए वैशाख-अनुष्ठान में दृढ़ रहना चाहिए।
No shlokas available for this adhyaya yet.