Adhyaya 43
Patala KhandaAdhyaya 430

Adhyaya 43

The Defeat of Śatrughna (and the fall of Puṣkala)

रामाश्वमेध के प्रसंग में हनुमान का वीरसिंह तथा उसके सहायक योद्धाओं से संघर्ष धीरे-धीरे शत्रुघ्न की सेना सहित व्यापक युद्ध में बदल जाता है। इस संग्राम में पुष्कल प्रधान वीर बनकर उभरता है; वह शिव के गणों से भिड़ता है और फिर वीरभद्र के साथ कई दिनों तक अत्यन्त घोर, हाथों-हाथ युद्ध करता रहता है। अंततः वीरभद्र त्रिशूल से पुष्कल का शिरच्छेद कर देता है, जिससे शत्रुघ्न के शिविर में भय और शोक फैल जाता है। शोकाकुल शत्रुघ्न से रुद्र स्वयं वचन कहते हैं; फिर कथा शत्रुघ्न–शिव के प्रत्यक्ष द्वन्द्व पर आ जाती है। दोनों ओर से अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा होती है और दिव्य दर्शक विस्मित होते हैं। बारहवें दिन शत्रुघ्न ब्रह्म-नामक अस्त्र छोड़ता है, जिसे शिव निष्फल कर देते हैं; इसके बाद शत्रुघ्न मूर्छित होकर गिर पड़ता है। अध्याय के अंत में हनुमान पुनः आगे बढ़कर राम-स्मरण से सैनिकों में उत्साह जगाते हैं।

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