
The Greatness of Sacred Ash (Bhasma) and Rules for Śrāddha: Śiva Instructs Rāma
इस अध्याय में मुनि सूत से पावन कथा का अनुरोध करते हैं। तब शम्भु श्रीराम को एक प्रसंग सुनाते हैं जिसमें काम‑क्रोध से उत्पन्न उथल‑पुथल और कृत्या का प्राकट्य होता है; इसके बाद राम और शम्भु लोकालोक तक जाते हैं और तेजोमय नारायणपुर में पहुँचते हैं। वहाँ विष्णु उनका सत्कार करते हैं और राम के एकपत्नी‑व्रत की परोक्ष परीक्षा होकर उसकी प्रशंसा होती है। फिर शिव धर्म‑निर्देश देते हैं—सूतक आदि अशौच, अमावस्या, अपराह्न, तिथि की वृद्धि‑क्षय तथा कुतुप‑काल जैसी स्थितियों में श्राद्ध कब स्थगित हो, कब पुनः किया जाए, और कब किसी अन्य से कराया जाए। पूजन‑काल की उपयुक्तता और फल भी बताए जाते हैं। इसके बाद भस्म‑माहात्म्य का विस्तार से वर्णन है—भस्म की व्युत्पत्ति, धारण के स्थान, पाप‑नाश और रक्षा‑शक्ति, तथा धनञ्जय‑वंश, अरुन्धती‑दधीचि और हरि‑शंकर‑समागम की कथाएँ। अंत में फलश्रुति सुनने वालों की शुद्धि और शिवधाम‑प्राप्ति का आश्वासन देती है।
No shlokas available for this adhyaya yet.