Kurma AvataraSamudra ManthanaDharma

Purva Bhaga

The First Part

लिंगपुराण का ‘पूर्व भाग’ सृष्टि-वर्णन, लिंग के उद्भव और शिव-आराधना के विधि-विधान को प्रधानता से प्रस्तुत करता है। आरंभ में परमेश्वर सदाशिव की अनादि, अव्यय सत्ता का संकेत देकर प्रकृति-पुरुष, तत्त्वों और लोक-व्यवस्था की क्रमिक उत्पत्ति का निरूपण किया जाता है, जिससे जगत् के कारण और क्रम का बोध होता है। इस भाग में लिंग की महिमा विशेष रूप से प्रकट होती है। निर्गुण परम तत्त्व भक्तों पर अनुग्रह करके लिंग-रूप में सगुण उपासना का आधार बनता है; ब्रह्मा-विष्णु के प्रसंग में प्रकट हुए अनंत स्तम्भ-रूप लिंग का तात्त्विक अर्थ—शिव की सर्वव्यापकता, अनंतता और चैतन्य-स्वरूप—भक्ति और ज्ञान दोनों के लिए मार्गदर्शक बनता है। आगे शिवपूजा के अंग—अभिषेक, मंत्र-जप, व्रत, उपवास, दान, तीर्थ-सेवन, तथा शिवालय-निर्माण—का विधान और फलश्रुति दी जाती है। शुद्ध आचरण, श्रद्धा, और गुरु-कृपा के साथ लिंगार्चन को पाप-क्षय, कल्याण और मोक्ष का साधन बताया गया है। समग्रतः ‘पूर्व भाग’ सृष्टि-रहस्य को लिंग-तत्त्व में प्रतिष्ठित करते हुए यह प्रतिपादित करता है कि शिवभक्ति ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों का परम आश्रय है। यह भाग साधक के जीवन में नित्य-नैमित्तिक कर्मों को पवित्र दिशा देता और शिव-निष्ठा को दृढ़ करता है।

Adhyayas in Purva Bhaga

Adhyaya 1

नैमिषारण्ये सूतागमनम् — लिङ्गमाहात्म्यभूमिका तथा शब्दब्रह्म-ओङ्कार-लिङ्गतत्त्वम्

इस अध्याय में नारद विविध तीर्थों में लिंग-पूजन करके नैमिषारण्य आते हैं। नैमिषेय ऋषि उनका सत्कार करते हैं और व्यास-शिष्य सूत रोमहर्षण को देखकर लिंग-माहात्म्ययुक्त पुराण-संहिता सुनाने की प्रार्थना करते हैं। सूत देवत्रय और व्यास आदि को प्रणाम कर लिंग-तत्त्व का दार्शनिक आधार बताते हैं—शब्दब्रह्म ओंकार-स्वरूप है, वेदांगों से संयुक्त है और प्रधान-पुरुष से परे है; त्रिगुण-व्यवहार में सत्त्व से विष्णु, रजस से हिरण्यगर्भ, तमस से कालरुद्र प्रकट होते हैं और निर्गुण रूप में वही महेश्वर है। यह भूमिका आगे लिंगोद्भव-कथा, सृष्टि-संहार-लीला तथा लिंग-पूजा-विधि के प्रसंगों को स्थिर करती है।

24 verses

Adhyaya 2

ईशानकल्पवृत्तान्तः तथा लैङ्गपुराणस्य संक्षेप-सूची

सूत जी लिङ्गपुराण को ‘उत्तम’ महापुराण बताते हैं—जो ब्रह्मा ने ईशानकल्प के प्रसंग में पहले कल्पित किया और बाद में व्यास ने मनुष्यों के लिए संक्षेप में व्यवस्थित किया। वे ग्रंथ का परिमाण बताकर विषय-सूची देते हैं: प्राधानिक/प्राकृत/वैक्रत सृष्टि, ब्रह्माण्ड और उसके आवरण, गुणों के अनुसार देव-कार्य, प्रजापति-सर्ग, पृथ्वी का उद्धार, ब्रह्मा के दिन-रात्रि व आयु की गणना, युग-कल्प के मान, तथा धर्म-व्यवस्थाएँ। फिर शैव तत्त्व उभरते हैं—बार-बार लिङ्गोद्भव, लिङ्गमूर्ति की विशेष महिमा, वाराणसी आदि तीर्थ, पाशुपत-योग, पंचाक्षर, और श्राद्ध-दान-प्रायश्चित्त व आहार-नियम। दक्ष, वृत्र, दधीचि, जालंधर, तथा कृष्णवंश-नाश की कथाएँ धर्म-व्यवस्था और ईश-कृपा के उदाहरण रूप में आती हैं। अंत में फलश्रुति है कि इस संक्षेप को जानना और सिखाना पवित्रता तथा उच्च लोकों की ओर उन्नति देता है, और आगे के अध्यायों के विस्तृत वर्णन हेतु भूमिका बनता है।

56 verses

Adhyaya 3

अलिङ्ग-लिङ्ग-निरूपणं तथा प्राकृत-सृष्टिवर्णनम्

सूता परम तत्त्व को शिव-अलिंग बताते हैं—अव्यक्त, निर्गुण, अविनाशी। नाम-रूप वाला जगत् शिव का लिंग है, जो माया से अव्यक्त से व्यक्त चिह्न रूप में प्रकट होता है। फिर शिव-दृष्टि से शैवी प्रकृति सक्रिय होती है; उससे महत्, अहंकार, तन्मात्राएँ और पाँच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, आप, पृथ्वी) अपने-अपने गुणों सहित उत्पन्न होते हैं। ज्ञान-इन्द्रियाँ, कर्म-इन्द्रियाँ और मन प्रकट होते हैं तथा अंत में आवरणों से घिरा ब्रह्माण्ड-अण्ड बनता है। ऐसे असंख्य अण्ड हैं; प्रत्येक में ब्रह्मा, विष्णु और भव कार्य करते हैं, पर गुणों द्वारा सृष्टि-स्थिति-प्रलय का परम कर्ता केवल महेश्वर है। यह अध्याय आगे की लिंग-भक्ति और शैव-तत्त्वमीमांसा को एकीकृत शिव-तत्त्व पर स्थापित करता है।

39 verses

Adhyaya 4

Adhyaya 4: अहोरात्र-युग-मन्वन्तर-कल्पमान तथा प्रलयान्ते सृष्ट्युपक्रमः

सूता बताते हैं कि स्रष्टा का ‘दिन’ प्रकट सृष्टि और ‘रात्रि’ प्रलय है—यह केवल परंपरागत भाषा है, साधारण दिन-रात नहीं। फिर काल-गणना का क्रम आता है: मनुष्य के निमेष से मुहूर्त तक, पितरों के दिन-रात और वर्ष, तथा देवों के लिए अयन ही दिन-रात माने गए हैं। कृत, त्रेता, द्वापर, कलि युगों की सन्ध्या सहित अवधि, चतुर्युग, मन्वन्तर और सहस्र चतुर्युगात्मक कल्प का मान बताया गया है। शिव की आज्ञा से सब विकार लीन होते हैं; गुणों के साम्य में प्रलय और वैषम्य में सृष्टि होती है—परम कारण शिव ही हैं। प्रलय के अंत में ब्रह्मा जल में शयन कर जागते हैं और पुनः सृष्टि का उपक्रम करते हैं; वराह-प्रसंग से पृथ्वी का पुनरुद्धार संकेतित होकर आगे के अध्यायों हेतु भूमिका बनती है।

63 verses

Adhyaya 5

अविद्या-पञ्चक, नवसर्ग-क्रमः, प्रजापति-प्रसवः (Vibhaga 1, Adhyaya 5)

सूता कहते हैं कि सृष्टि करने को उद्यत स्वयम्भू ब्रह्मा के सामने पाँच प्रकार की अविद्या का आवरण उठता है—तमस्, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्ध—जिससे आदि सृष्टि ‘प्राथमिक’ होकर भी आध्यात्मिक दृष्टि से निष्फल रहती है। फिर सर्ग-क्रम (प्राकृत और वैकृत) का वर्णन होता है—तत्त्वों, इन्द्रियों आदि से लेकर देव, मनुष्य और कुमार-सृष्टि तक, जिससे चेतना के देहधारण का क्रम स्पष्ट होता है। इसी आधार पर ब्रह्मा कुमारों और प्रमुख प्रजापतियों को उत्पन्न करते हैं; शतरूपा की सन्तान, आकूति व प्रसूति के विवाह, तथा दक्ष की कन्याओं का धर्म और अन्य ऋषियों को दान—वंश-परम्परा आगे बढ़ती है। सती को शिव-संबद्ध मनोजा कन्या बताया गया है और ब्रह्मा दक्ष को उसे रुद्र को देने की आज्ञा देते हैं; रुद्र के अनेक रूप तथा स्त्री-लिङ्ग/पुं-लिङ्ग का संकेत आगे की लिङ्ग-तत्त्वमीमांसा का आधार बनता है। अंत में धर्म की सन्तति और ऋषियों की आगे की प्रजा का वर्णन कर, आगामी अध्यायों के रुद्र, व्रत, उपासना और मोक्ष-केन्द्रित शैव प्रवाह की भूमिका बाँधी जाती है।

50 verses

Adhyaya 6

अग्नित्रय-पितृवंश-रुद्रसृष्टि-वैराग्योपदेशः

सूत जी अग्नि के तीन मुख्य रूप—पवमान, पावक और शुचि—उनके भेद, वंश और यज्ञकर्म में उनकी महिमा बताते हैं। फिर पितरों के वर्ग—अग्निष्वात्त और बर्हिषद—तथा उनकी प्रसिद्ध संततियाँ (मेना आदि) वर्णित होकर यज्ञ-परंपरा से लोक और मानव-वंश की निरंतरता स्थापित होती है। आगे शैव प्रसंग में सती पार्वती बनती हैं और नीललोहित रुद्र अनेक रुद्रों को प्रकट करते हैं जो चौदह लोकों में व्याप्त हैं। ब्रह्मा उन अमर, शुद्ध रुद्रों की स्तुति कर मर्त्य प्रजा की सृष्टि का निवेदन करते हैं; शिव कहते हैं कि वे ऐसी सृजन-स्थिति नहीं धारण करते, तब ब्रह्मा जरा-मरण से बंधी सृष्टि रचते हैं। अंत में उपदेश है कि शिव स्थाणु-स्वरूप हैं; योगविद्या और क्रमिक वैराग्य से मोक्ष मिलता है, और शंकर की शरण से पापी भी नरक से छूट जाता है—अगले प्रश्न की भूमिका कि कौन किस कर्म से नरक जाता है।

31 verses

Adhyaya 7

प्रसाद-ज्ञान-योग-मोक्षक्रमः तथा व्यास-रुद्रावतार-मन्वन्तर-परम्परा

सूत शंकर की आद्य महिमा का रहस्य बताता है—योगी प्राणायाम आदि अष्ट-साधन और करुणा जैसे गुणों से युक्त हों, फिर भी कर्म के फल से स्वर्ग या नरक की गति होती है। निर्णायक क्रम है—प्रसाद → ज्ञान → योग → मोक्ष—अर्थात् मुक्ति का मूल कारण शिव की कृपा है। ऋषि पूछते हैं कि चिंतारहित शिव प्रसाद कैसे देता है और योगमार्ग में वह कब प्रकट होता है। रोमहरषण वंश-परम्परा और काल-चक्र के आधार पर द्वापर-युगों में व्यासावतारों, कलि में रुद्र के योगाचार्यावतारों तथा उनके शिष्यों का वर्णन करता है। वराहकल्प के मन्वन्तरों की गणना कर अंत में सब प्राणियों को ‘पशु’ और शिव को ‘पशुपति’ बताकर रुद्र-प्रकाशित पाशुपत योग को सिद्धि और अंततः मोक्ष का साधन घोषित करता है; आगे कृपा, दीक्षा और शैव योग-विधि का विस्तार इसी से जुड़ता है।

56 verses

Adhyaya 8

Adhyaya 8: Yogasthanas, Ashtanga Yoga, Pranayama-Siddhi, and Shiva-Dhyana leading to Samadhi

इस अध्याय में सूत देह के भीतर योगस्थानों का वर्णन करते हैं—विशेषतः नाभि, कंठ और भ्रूमध्य। वे कहते हैं कि एकाग्रता से आत्मज्ञान की प्राप्ति ही योग है और यह शिव के प्रसाद पर निर्भर है; योग को महेश्वर की निर्वाण-अवस्था के समान बताया गया है। ज्ञान तथा इन्द्रिय-वृत्तियों के निग्रह से पाप दग्ध होते हैं। फिर अष्टांगयोग—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि—का उपदेश मिलता है; यम में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और नियम में शौच, तप, दान, स्वाध्याय, उपस्थ-निग्रह, व्रत, उपवास, मौन, स्नान आदि विस्तार से बताए गए हैं। प्राणायाम की मात्राएँ, भेद, लक्षण तथा वायु और बुद्धि के प्रसादन से शांति–प्रशांति–दीप्ति–प्रसाद की सिद्धि कही गई है। अंत में शैव ध्यान: ओंकार को ज्वाला-सी शुद्धि मानकर, कमल/मंडल की कल्पना करके, हृदय-नाभि-भ्रूमध्य में शिव की स्थापना और अंततः निर्गुण, अवर्णनीय, अज ब्रह्मरूप शिव का ध्यान—जिससे स्थिर शिव-साक्षात्कार की तैयारी होती है।

116 verses

Adhyaya 9

योगान्तरायाः, औपसर्गिकसिद्धयः, परवैराग्येन शैवप्रसादः

सूता योगी को मार्ग से गिराने वाले दस योग-अन्तराय बताते हैं—आलस्य से लेकर विषय-तृष्णा तक—और उनके भीतर के कारण समझाते हैं: ज्ञान में संशय, चित्त की अस्थिरता, साधना में श्रद्धा का क्षय, मोहग्रस्त बुद्धि, तथा स्वाभाविक त्रिविध दुःख (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक)। फिर विघ्न शांत होने पर उत्पन्न होने वाले औपसर्गिक अनुभव/सिद्धियाँ आती हैं—प्रतिभा, दिव्य श्रवण, दर्शन, सूक्ष्म आस्वाद/वेदना, दिव्य गन्ध—और तत्त्वों के अनुसार विभिन्न लोकों में ऐश्वर्य-विस्तार, ब्रह्मिक ज्ञान तक। ये सिद्धियाँ अंतिम नहीं; ब्रह्मलोक तक भी वैराग्य और संयम से त्याज्य हैं। जब योगी सब आकर्षण छोड़ मन को स्थिर करता है, तब महादेव का प्रसाद प्रकट होकर धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य, वैराग्य और अपवर्ग प्रदान करता है; आगे पाशुपत-योग की दृढ़ता का आधार बनता है।

67 verses

Adhyaya 10

आचार्य-धर्मलक्षण-श्रद्धाभक्तिप्राधान्यं तथा लिङ्गे ध्यान-पूजाविधानसंकेतः (Adhyaya 10)

शैव उपदेश-क्रम में सूत सिद्ध द्विजों और साधुओं के गुण—संयम, सत्य, अलोभ और श्रुति–स्मृति-ज्ञान—गिनाते हैं और कहते हैं कि जहाँ श्रौत और स्मार्त कर्तव्य परस्पर विरोधी नहीं होते, वहाँ महेश्वर प्रसन्न होते हैं। कर्म और फल के आधार पर धर्म-अधर्म की पहचान बताकर, आचार्य को ऐसा पुरुष कहते हैं जो स्वयं आचरण करता, शास्त्रार्थ निकालता और धर्म का उपदेश देता है। चारों आश्रमों में साधुत्व—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ-कर्म, वानप्रस्थ-तप और यति-योग—से प्रकट होता है; अहिंसा, दया, दान, शम, वैराग्य, संन्यास और ज्ञान को शुद्धिकारक कहा गया है। अंत में प्रतिपादित होता है कि श्रद्धा-आधारित भक्ति अनेक प्रायश्चित्तों और तपों से भी श्रेष्ठ है। वाराणसी (अविमुक्त) में देवी पूछती हैं कि महादेव कैसे प्रसन्न और पूजित होते हैं; शिव ब्रह्मा के पूर्व प्रश्न का स्मरण कर कहते हैं—मैं श्रद्धा से वश्य हूँ, लिंग में ध्यान योग्य और पंचास्य रूप से पूज्य हूँ—और आगे की लिंगोपासना-प्रधान शैव पूजा-मीमांसा का संकेत देते हैं।

53 verses

Adhyaya 11

Brahmā’s Yogic Vision of Sadyōjāta in the Śvetalohita Kalpa

ऋषि पूछते हैं कि श्वेतलोहित कल्प में ब्रह्मा ने महेश्वर को सद्योजात तथा वामदेव, अघोर और ईशान रूपों में कैसे देखा। सूत बताते हैं कि ब्रह्मा परम ध्यान में शिखाधारी, तेजस्वी श्वेतलोहित कुमार का दर्शन करते हैं और उसे ब्रह्मरूपी ईश्वर मानकर ध्यान-योग में स्थिर होकर सद्योजात की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं। ब्रह्मा के पार्श्व से श्वेतवर्ण सेवक-शिष्य—सुनन्द, नन्दन, विश्वनन्द और उपनन्दन—प्रकट होते हैं, जिससे शैव परम्परा का उदय सूचित होता है। फिर श्वेत नामक महर्षि प्रकट होते हैं और उनसे हर का प्रादुर्भाव कहा जाता है। सभी मुनि तीव्र भक्ति से समर्पित होकर नित्य ब्रह्मस्वरूप महेश्वर की स्तुति करते हैं। अंत में फलश्रुति है कि जो द्विज विश्वेश्वर की शरण लेकर प्राणायाम करें और मन को ब्रह्म में लगाएँ, वे पापरहित, तेजस्वी होकर विष्णुलोक से आगे रुद्रलोक को प्राप्त होते हैं।

11 verses

Adhyaya 12

रक्तकल्पे वामदेवदर्शनं चतुर्कुमारोत्पत्तिः

सूत ‘रक्तकल्प’ का वर्णन करते हैं। पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से ब्रह्मा गहन ध्यान करते हैं और लाल आभूषणों से दीप्त एक कुमार का दर्शन करते हैं; उच्च चिंतन से वे उसे महादेव वामदेव रूप में पहचानते हैं। ब्रह्मा शिव की स्तुति कर प्रणाम करते हैं; शिव कहते हैं कि ऐसा दर्शन भक्ति और ध्यान-बल से होता है, और कल्प-कल्प में निरंतर प्रयत्न से ब्रह्मा शिव को ही जगत् का सच्चा धारक जानेंगे। इस शैव साक्षात्कार से चार शुद्ध, ब्रह्मा-सदृश कुमार—विरज, विबाहु, विशोक और विश्वभावन—लाल वस्त्र व पवित्र लेप धारण किए, ब्रह्मभाव और वामदेव-तत्त्व में निष्ठ होकर उत्पन्न होते हैं। वे हजार वर्ष तक लोक और शिष्यों के हित हेतु पूर्ण धर्म का उपदेश देते हैं और अंत में रुद्र में लीन होकर अक्षय में प्रवेश द्वारा मोक्ष का संकेत करते हैं। अध्याय के अंत में आश्वासन है कि वामदेव में युक्त द्विज भक्तिभाव से महादेव का दर्शन कर पापरहित ब्रह्मचारी बनते हैं और रुद्रलोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ से लौटना कठिन है; आगे स्थिर शैव साधना के फल का प्रसंग आता है।

15 verses

Adhyaya 13

पीतवासा-कल्पः, माहेश्वरी-दर्शनम्, रौद्री-गायत्री, महायोगेन अपुनर्भवः

सूत बताते हैं कि यह पीतवासा नामक इकतीसवाँ कल्प है। संतान-सृष्टि की इच्छा से ब्रह्मा ध्यान करते हैं और पीताम्बर-भूषित तेजस्वी दिव्य युवक का दर्शन करते हैं। फिर वे अंतर्मुख होकर विश्वेश्वर की शरण लेते हैं और महेश्वर से प्रकट होती परम माहेश्वरी का दर्शन पाते हैं। देवी का चतुर्पाद, चतुर्मुख, चतुर्भुज, चतुस्तनी आदि बहुरूप स्वरूप सर्वव्यापक शक्ति का संकेत है। महादेव उन्हें मति, स्मृति और बुद्धि कहकर स्तुति करते हैं और योग द्वारा जगत में व्याप्त होकर धर्म-व्यवस्था स्थापित करने की आज्ञा देते हैं; ब्राह्मणों और धर्म के कल्याण हेतु वे रुद्राणी होंगी। शिव के उपदेश से ब्रह्मा वैदिक रौद्री गायत्री का जप करते हैं और समर्पण से दिव्य योग, ज्ञान, ऐश्वर्य तथा वैराग्य प्राप्त करते हैं। ब्रह्मा के पार्श्व से तेजस्वी कुमार उत्पन्न होकर ब्राह्मणहित के लिए महायोग का उपदेश देते हैं और अंत में महेश्वर में लीन हो जाते हैं। इसी प्रकार संयमी साधक पाप त्यागकर शुद्ध होकर अपुनर्भव के लिए रुद्र में प्रवेश करते हैं; आगे शैव साधना और लोक-व्यवस्था का क्रम चलता है।

21 verses

Adhyaya 14

अघोरस्य प्रादुर्भावः कुमारकचतुष्टयं च योगमार्गः

सूता बताते हैं कि एक पूर्व कल्प में पीतवर्ण स्वयम्भू के प्रस्थान के बाद नया कल्प आरम्भ हुआ। एकार्णव में सृष्टि की इच्छा से ब्रह्मा चिन्ताकुल ध्यान में लीन हुए। उनके ध्यान से काले वस्त्रों से विभूषित, स्वयंजात तेज से दीप्त, बालरूप अघोर/महेश्वर प्रकट हुए। ब्रह्मा ने प्रणाम कर प्राणायाम और मनोनिवेश से उन्हें हृदय में स्थापित कर उस दर्शन के पीछे ब्रह्मरूप सत्य जानना चाहा। अघोर ने पुनः दर्शन दिया और उनके पार्श्व से चार कृष्णवर्ण, प्रकाशमान कुमारक उत्पन्न हुए। उन्होंने सहस्र दिव्य वर्षों तक परमेश्वर की योगोपासना कर शिष्यों को महायोग का उपदेश दिया। योग से सिद्ध पुरुष मन से ही शिव में प्रवेश कर निरगुण, शुद्ध पद को प्राप्त होते हैं। जो भी विवेकी इस योग से महादेव का ध्यान करता है, वह अविनाशी रुद्र को प्राप्त होता है; आगे शिवोपासना की विधियाँ विस्तार से कही जाने वाली हैं।

13 verses

Adhyaya 15

Aghora-Mantra Japa: Graded Expiations, Pañcagavya Purification, and Homa for Mahāpātaka-Nivṛtti

सूत कहते हैं कि एक भयावह, तमस-रंजित कल्प में ब्रह्मा शिव की स्तुति करते हैं। शिव अनुग्रह करके कहते हैं कि इसी रूप में वे निःसंदेह पापों का नाश करते हैं। फिर वे महापातक, उपपातक तथा मन, वाणी और शरीर के दोष—वंशगत या आकस्मिक मल सहित—गिनाकर उनके प्रायश्चित्त के रूप में अघोर-मंत्र जप बताते हैं और संकल्प तथा जप-प्रकार (मानस, वाचिक, उपांशु) के अनुसार जप-संख्या का क्रम देते हैं। ब्रह्महत्या, वीरहत्या, भ्रूणहत्या, मातृहत्या, गोहत्या, कृतघ्नता, स्त्रीहिंसा, सुरापान, सुवर्ण-चोरी तथा संग-दोष से लगे पापों के लिए भी माप निर्धारित है। आगे रुद्र-गायत्री, पंचगव्य (गोमूत्र, गोमय, क्षीर, दधि, घृत), कुशोदक के पात्र, और घृत, चरु, समिधा, तिल, यव, व्रीहि से होम की विधि; फिर स्नान, शिव के सामने मिश्रण-पान और ब्रह्म-जप का विधान आता है। निष्कर्ष यह कि घोर अपराधी भी शुद्ध हो जाते हैं—कभी दीर्घ कर्म-भार के बावजूद तुरंत—और सर्वशुद्धि हेतु नित्य जप की प्रेरणा देकर आगे के शैव अनुशासन को नियमित मार्ग के रूप में स्थापित किया जाता है।

32 verses

Adhyaya 16

ब्रह्मकृत-ईशानस्तवः तथा विश्वरूपदेवी-प्रकृतिरहस्योपदेशः

सूत जी विश्वरूप-कल्प का वर्णन करते हैं: प्रलय के बाद ब्रह्मा संतान-सृष्टि हेतु ध्यान करते हैं और सरस्वती-सदृश एक विश्वरूप शक्ति प्रकट होती है। ब्रह्मा अंतर्मुख होकर ईशान—शिव—की ओंकारमूर्ति रूप में दीर्घ स्तुति करते हैं, जिसमें सद्योजात, वामदेव, रुद्र और काल रूपों की प्रशंसा है। फल बताया गया है कि इस स्तोत्र का एक बार पाठ भी, तथा श्राद्ध में पाठ, ब्रह्मलोक और परम गति देता है। प्रसन्न शिव ब्रह्मा को वर देते हैं; तब ब्रह्मा चार मुख, चार पाद, अनेक नेत्र-भुजाओं वाली रहस्यमयी विश्वरूप देवी का नाम, कुल, शक्ति और कार्य पूछते हैं। शिव ‘सर्व मंत्रों के रहस्य’ के रूप में बतलाते हैं कि वह देवी प्रकृति, जगद्योनि, विश्वगौ/गायत्री है; वही गौरी, माया, विद्या, हैमवती भी कहलाती है और 32 गुण/32 अक्षर-रचना से संबद्ध है। अध्याय के अंत में आगे की उत्पत्तियाँ, नियमयुक्त योग-पूजा और रुद्र में लय होने वाली साधना का संकेत देकर अगले अध्याय की सृष्टि-क्रम व शैव मोक्ष-विद्या की भूमिका बनती है।

39 verses

Adhyaya 17

Adhyaya 17: लिङ्गोद्भव—ब्रह्मविष्ण्वहङ्कार-शमनं, ओंकार-प्रादुर्भावः, मन्त्र-तत्त्वं च

सूत पूर्व में कही गई लोक-रचना की कथा का उपसंहार करते हुए उसके श्रवण-पाठ का पुण्य बताता है। फिर ऋषि शैव-रहस्य पूछते हैं—लिङ्ग क्या है, लिङ्गी कौन है और शिव की लिङ्ग-रूप में पूजा क्यों होती है। ब्रह्मा कहते हैं कि आद्य प्रधान प्रकृति ‘लिङ्ग’ कहलाती है और परमेश्वर ‘लिङ्गी’ हैं; प्रलय में सब भूत नष्ट होकर अंधकारमय जल में केवल परम तत्त्व रह जाता है। सृष्टिकर्तृत्व को लेकर ब्रह्मा-विष्णु का विवाद होता है, तभी अपार तेजस्वी लिङ्ग प्रकट होकर अहंकार शांत करता और सत्यज्ञान जगाता है। ब्रह्मा हंस बनकर शिखर और विष्णु वराह बनकर मूल खोजते हैं, पर दोनों असफल होकर विनीत लौटते हैं। उसी लिङ्ग से ओंकार का प्रादुर्भाव होता है—अ, उ, म, नाद और तुरीय—जो वेद, मन्त्र और सृष्टि-तत्त्व (बीज-योनि, हिरण्यगर्भ, लोक-उद्भव) को जोड़ता है। शिव के शब्दमय शरीर का वर्णों-मन्त्रों में विन्यास, ऋग्-यजुः-साम-अथर्व की धाराएँ और कर्म-उपचार के अर्थ बताए जाते हैं; अंत में ब्रह्मा-विष्णु महेश्वर की स्तुति करते हैं। अध्याय सिखाता है कि लिङ्ग की अनंतता अहंकार का शमन करती है और मन्त्र-ज्ञान व उपासना से मोक्ष का मार्ग खुलता है।

92 verses

Adhyaya 18

विष्णुरुवाच—एकाक्षर-प्रणव-लिङ्ग-व्याप्ति-शिवस्तोत्रम्

इस अध्याय में विष्णु रुद्र–शिव की निरन्तर स्तुति करते हैं। एकाक्षर प्रणव (अ-उ-म्) का अर्थ बताते हुए ‘अ’ को रुद्र/आत्मरूप, ‘उ’ को आदिदेव/विद्यादेह और ‘म्’ को तृतीय तत्त्व—शिव/परमात्मा, सूर्य-अग्नि-सोम के समान तेजस्वी कहा गया है। आगे शिव को रुद्रों के स्वामी, पंचब्रह्म मुख (सद्योजात, वामदेव, अघोर, ईशान) तथा ऊर्ध्व लिङ्ग और लिङ्गी रूप में व्यापक बताया गया है। अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और तन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध) में उनकी व्याप्ति, तथा अरूप होकर भी सुरूप होने का प्रतिपादन है। अंत में फलश्रुति है—इस स्तोत्र का पाठ या वेदज्ञ ब्राह्मणों को इसका उपदेश पापों का नाश कर भक्त को ब्रह्मलोक की ओर उन्नत करता है; आगे का उपदेश स्तुति से साधना और तत्त्व-निर्णय की ओर बढ़ता है।

42 verses

Adhyaya 19

Mahādeva’s Boon: Unwavering Bhakti, Tri-functional Cosmos, and the Supratiṣṭhā of Liṅga-Arcā

सूता बताते हैं कि ब्रह्मा और विष्णु के सामने महादेव करुणापूर्वक प्रकट हुए; उनके दर्शन से भय मिटा और जगत की व्यवस्था पुनः स्थिर हुई। शिव ने कहा कि ब्रह्मा-विष्णु उनके ही शरीर-पार्श्वों से उत्पन्न हैं—वे आश्रित हैं, फिर भी सृष्टि-कार्य में अनिवार्य हैं। प्रसन्न होकर शिव वर देते हैं; विष्णु राज्य नहीं, बल्कि नित्य, अव्यभिचारिणी भक्ति माँगते हैं। शिव ब्रह्मा और विष्णु दोनों को अचल भक्ति प्रदान करते हैं और पूर्व विवाद का समाधान करते हुए सर्ग, स्थिति/रक्षा और लय—तीनों कार्यों का विधान बताते हैं तथा स्वयं को गुणातीत परमेश्वर घोषित करते हैं। विष्णु को मोह त्यागकर ब्रह्मा की रक्षा करने की आज्ञा देते हैं और पद्मकल्प में भविष्य की पहचान का संकेत करते हैं। शिव के अंतर्धान के बाद लिङ्ग-पूजा त्रिलोकी में दृढ़ प्रतिष्ठित होती है; लिङ्ग-वेदी को देवी और लिङ्ग को साक्षात् शिव कहा गया है। लिङ्ग के सन्निधि में इस कथा का पाठ/श्रवण करने से भक्त शिवत्व को प्राप्त होता है—ऐसी मोक्ष-प्रतिज्ञा के साथ अध्याय समाप्त होता है।

17 verses

Adhyaya 20

एकार्णव-सृष्टिक्रमः, ब्रह्म-विष्णु-परस्परप्रवेशः, शिवस्य आगमनं च

सूत बताते हैं कि सृष्टि से पहले एकार्णव में अनन्तशय्या पर नारायण शयन करते थे। उनके नाभि से विशाल कमल प्रकट हुआ और उससे पद्मयोनि ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्मा ने विष्णु से प्रश्न किए और माया के प्रभाव से सूक्ष्म प्रतिस्पर्धा बढ़ी। विष्णु ब्रह्मा के मुख में प्रवेश कर उनके भीतर के लोकों को देखते हैं; फिर ब्रह्मा विष्णु के उदर में जाकर उसका अंत नहीं पाते और नाभि-पथ व कमल-नाल से बाहर निकल आते हैं। तभी समुद्र काँपता है और भयानक, सर्वव्यापी, कारणातीत शिव प्रकट होकर बताते हैं कि यह कम्पन उनके चरण-प्रहार और श्वास से हुआ। ब्रह्मा का अभिमान शांत होता है; विष्णु शिव को आदिकारण, बीजों के भी बीज कहकर श्रद्धा का उपदेश देते हैं। अंत में शैव तत्त्व स्पष्ट होता है—शिव निष्कल और सकल दोनों हैं; आदिलिङ्ग-बीज योनिसंयोग से हिरण्यगर्भ-अण्ड बनाता है, जिससे ब्रह्मा तथा सनकादि उत्पन्न होते हैं और कल्प-कल्प में माया का कार्य चलता है; आगे की शिक्षा स्तोत्र, प्रणव और शिव-परमत्व के सम्यक् ज्ञान के रूप में संकेतित है।

97 verses

Adhyaya 21

ब्रह्मनारायणस्तवः — शिवस्य प्रभवत्व-प्रतिपादनम्

सूत कहते हैं कि विष्णु, ब्रह्मा को आगे रखकर, वैदिक नामों और तत्त्वसूचक विशेषणों से शिव की स्तुति करते हैं। स्तोत्र का मुख्य भाव ‘प्रभवे नमः’ है—शिव को वेद-स्मृति, योग-सांख्य, सर्ग-मन्वन्तर, काल-परिमाण (क्षण-लव-ऋतु-मास) तथा प्रकृति के घटकों (द्वीप, समुद्र, पर्वत, नदियाँ, औषधियाँ) का मूल कारण बताया गया है। आगे रुद्र के उग्र-शान्त, विशेष-निर्विशेष, स्थूल-सूक्ष्म, दृश्य-अदृश्य और विविध वर्ण-रूपों का वर्णन, तथा उनके शस्त्र, गणाधिपत्य, पशुपतित्व और महाकाल-श्मशान-लीला का संकेत मिलता है। अंत में शिव-तत्त्व जानकर ध्यानक्षय से ‘अमृत्यु’ अवस्था में प्रवेश और शुद्ध कर्मों से दिव्यभोग—ये दो मार्ग बताए गए हैं। फलश्रुति में श्रवण/कीर्तन/जप को अश्वमेध-तुल्य पुण्य और ब्रह्मलोक-प्राप्ति का साधन कहकर आगे की शैव-उपासना का आधार बनाया गया है।

92 verses

Adhyaya 22

Adhyaya 22 — शिवानुग्रहः, ब्रह्मतपः, एकादशरुद्राः तथा प्राणतत्त्वम्

सूत बताते हैं कि भयानक प्रलय-जल में पद्मयोनि ब्रह्मा और विष्णु को सत्य-स्तुति व विनय से प्रसन्न उमापति त्रिलोचन शिव क्रीड़ा से प्रश्न करते हैं। उनके अंतःस्वभाव को जानकर शिव वर देते हैं; विष्णु शिव में अचल भक्ति ही मांगते हैं, जिसे शिव प्रदान कर विष्णु की मर्यादा स्वीकारते हुए भी सर्वोच्चता को अपने अनुग्रह में स्थापित करते हैं। फिर शिव ब्रह्मा को स्पर्श कर आशीर्वाद देकर अंतर्धान हो जाते हैं। ब्रह्मा सृष्टि हेतु घोर तप करते हैं; फल न दिखने पर क्रोध से आँसू गिरते हैं और उनसे सर्प-सदृश प्रबल प्राणी उत्पन्न होते हैं—क्रोध-विकृत सृष्टि का संकेत। क्रोध से मूर्छित होकर ब्रह्मा मृतवत हो जाते हैं; उनके शरीर से रोने के कारण ‘रुद्र’ कहलाने वाले एकादश रुद्र प्रकट होते हैं, और रुद्र को सर्वभूतों में स्थित प्राण-तत्त्व कहा गया है। नीललोहित त्रिशूलधारी शिव ब्रह्मा के प्राण पुनः स्थापित करते हैं; तब ब्रह्मा सर्वव्यापी प्रभु को देखकर शिव की आद्य प्रकृति का प्रश्न करते हैं, जिससे आगे की शैव तत्त्वमीमांसा का क्रम बनता है।

28 verses

Adhyaya 23

Adhyaya 23: श्वेत-लोहित-पीत-कृष्ण-विश्व-कल्पेषु रुद्रस्वरूप-गायत्री-तत्त्ववर्णनम्

सूत कहते हैं—शिव ने मुस्कराकर ब्रह्मा को उपदेश दिया कि क्रमशः कल्पों में वे श्वेत, लोहित, पीत और कृष्ण वर्ण-रूप धारण करते हैं और गायत्री भी ब्रह्म-संज्ञिता होकर उसी के अनुरूप प्रकट होती है। ब्रह्मा के तप और योग-प्रत्यभिज्ञान से शिव पहले सद्योजात, फिर ‘वाम’ तत्त्व व वर्ण-विपर्यय से वामदेव, और आगे तत्पुरुष रूप में जाने जाते हैं। शिव अपना घोर स्वरूप बताकर सच्चे ज्ञाताओं को अघोर-शान्ति का आश्वासन देते हैं और अंत में विश्वरूप प्रकट करते हैं; तब सावित्री/गायत्री विश्वरूपा व सर्वरूपा कहलाती है। अध्याय में चतुर्युग, धर्म के चार पाद, चार आश्रम, वेद-वेध्य के चार विभाग तथा भूरादि लोकों का क्रम आता है; विष्णुलोक और रुद्रलोक को दुर्लभ, पुनरावृत्ति-रहित गति कहा गया है, जो अहंकार, काम और क्रोध से रहित संयमी द्विजों को मिलती है। ब्रह्मा गायत्री द्वारा महेश्वर-ज्ञानियों के परम पद की याचना करते हैं; शिव स्वीकार करते हैं कि यह ज्ञान ब्रह्म-सायुज्य और मोक्ष का कारण है।

51 verses

Adhyaya 24

ध्यानयोगेन रुद्रदर्शनम् — रुद्रावतार-परिवर्तक्रमः, लकुली (कायावतार), पाशुपतयोगः, लिङ्गार्चन-निष्ठा

सूता बताते हैं कि ब्रह्मा ने श्रद्धापूर्वक रुद्र से पूछा—द्विज कब और किस साधना से महादेव के अनेक पूज्य शरीरों (तनवों) का साक्षात् दर्शन कर सकते हैं? शिव उत्तर देते हैं कि तप, व्रत, दान, तीर्थ-फल, दक्षिणा सहित यज्ञ, धन और वेदाध्ययन भी प्रत्यक्ष दर्शन के लिए पर्याप्त नहीं; निर्णायक उपाय ध्यान है। फिर वे युगान्त/परिवर्त-क्रम में अपने अनेक अवतरणों की भविष्यवाणी करते हुए बार-बार कहते हैं—‘मैं … रूप में जन्म लूँगा’, और साथ के शिष्यों के नाम बताते हैं; जो महेश्वर-योग और ध्यान-निष्ठा से रुद्रलोक को प्राप्त होते हैं, जिनका लौटना दुर्लभ है। अंत में प्रसिद्ध लकुली/कायावतार प्रसंग आता है—ब्राह्मण-हित हेतु योगमाया से मृत देह में प्रवेश—और पाशुपत सिद्धों के लक्षण (भस्म, लिंगार्चन, जितेन्द्रियता, ध्यान-निष्ठा) बताए जाते हैं। शिव पाशुपत योग को संसार-बन्धन-छेदन हेतु ज्ञानमार्ग-प्रकाशक कहते हैं और पंचाक्षरी की अनिवार्यता बताते हैं। उपसंहार में ब्रह्मा विष्णु-तत्त्व पूछते हैं; शिव कहते हैं कि देव-मुनि लिंग-पूजा से पद पाते हैं, लिंगार्चन के बिना निष्ठा नहीं—फिर शिव अंतर्धान होते हैं और ब्रह्मा सृष्टि-कार्य में प्रवृत्त होते हैं।

150 verses

Adhyaya 25

लिङ्गार्चनपूर्वकं स्नानाचमनविधिः (Snana–Achamana as Preparation for Linga-Archana)

ऋषि सूत रोमहार्षण से पूछते हैं कि लिङ्गमूर्ति रूप महादेव की पूजा कैसे की जाए। सूत कैलास में शिव द्वारा देवी को दिए उपदेश की परंपरा—नन्दी, सनत्कुमार और व्यास के माध्यम से—बताकर विधि की प्रामाणिकता स्थापित करते हैं। फिर शिव-पूजा से पहले पाप-नाशक स्नान को अनिवार्य बताकर उसके तीन भेद—वरुण-स्नान, आग्नेय-स्नान और मन्त्र-स्नान—का वर्णन करते हैं; पवित्र जल से अभिषेक तथा रुद्र-सम्बन्धी मन्त्रों, पंचब्रह्म/पवित्रक आदि के जप का विधान करते हैं। मुख्य सिद्धान्त यह है कि भीतर की शुद्धि और भाव ही निर्णायक हैं; भाव के बिना तीर्थ-स्नान भी निष्फल है। अंत में मन्त्रयुक्त आचमन, शुद्धि और हिंसा-पाप की शान्ति हेतु प्रदक्षिणा बताकर आगे की लिङ्गार्चना के लिए साधक को तैयार किया जाता है।

29 verses

Adhyaya 26

स्नानविधिः — गायत्र्यावाहन, सूर्यवन्दन, तर्पण, पञ्चमहायज्ञ, भस्मस्नान, मन्त्रस्नान

इस अध्याय में नन्दी शिवोपासना से पूर्व की सम्पूर्ण नित्य-शुद्धि-विधि बताते हैं। पहले वेदमाता गायत्री का आवाहन कर पाद्य, आचमनीय और अर्घ्य अर्पित किए जाते हैं; फिर प्रणव सहित प्राणायाम और क्रमबद्ध संख्या में जप, तथा सम्मानपूर्वक विसर्जन। इसके बाद वैदिक सूक्तों से सूर्यवन्दन, प्रदक्षिणा, और फिर देव-ऋषि-पितृ तर्पण—पुष्पोदक, कुशोदक और तिलोदक से—उचित उपवीत-स्थिति और अँगुली-मुद्राओं सहित। आगे पञ्चमहायज्ञ (ब्रह्म, देव, भूत, मनुष्य, पितृ) का निरूपण है; ब्रह्मयज्ञ को सर्वोच्च बताकर उपेक्षा करने पर पाप/दोष की चेतावनी दी गई है, तथा वेद-पुराण-इतिहास-कल्प आदि के सम्मान हेतु ब्रह्मयज्ञ-आचमन और स्पर्श-विधि कही गई है। अंत में बाह्य स्नान, विधिपूर्वक होम से प्राप्त भस्म का भस्म-स्नान, पञ्चब्रह्म मन्त्रों से अंग-शुद्धि/न्यास, और ‘आपो हिष्ठा’ आदि ऋक्-यजुः-साम मन्त्रों से मन्त्र-स्नान का विधान है; श्रद्धापूर्वक संक्षेप में भी करने से परम पद की ओर गति होती है।

41 verses

Adhyaya 27

लिङ्गार्चनविधिक्रमः—शुद्धि, न्यास, आसनकल्पना, अभिषेक, स्तोत्र-प्रदक्षिणा (Adhyaya 27)

इस अध्याय में शैलादि लिङ्ग-पूजन की संक्षिप्त विधि बताते हैं। स्नान करके साधक पूजास्थान में प्रवेश करता है, तीन बार प्राणायाम करता है और पञ्चवक्त्र, अलंकृत त्र्यम्बक शिव का ध्यान करता है। फिर शैव देह-भावना लेकर देह-शुद्धि और मन्त्र-न्यास करता है, जिसमें प्रणव और पञ्चाक्षरी का प्रधान स्थान है। अर्चना-स्थान तथा प्रोक्षणी, अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय आदि पात्रों का संस्कार कर शीतल जल में चन्दन, उशीरा, कपूर, पुष्प, धान्य और भस्म मिलाने का विधान है। सिद्धियों और लोक-स्थानों के विन्यास सहित पद्मासन की कल्पना कर शिव-पीठिका तक स्थापना होती है; पञ्चब्रह्म और रुद्रगायत्री आदि मन्त्रों से आवाहन व स्थिरीकरण किया जाता है। सुगन्धित जल, पञ्चगव्य, घृत, मधु और इक्षुरस से शुद्ध पात्रों (स्वर्ण/रजत/ताम्र, शंख, मृण्मय) द्वारा अभिषेक होता है; साथ ही लिङ्ग-स्नान हेतु वैदिक-शैव सूक्तों की सूची दी गई है। अंत में वस्त्र, उपवीत, गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचार, प्रदक्षिणा और नमस्कार का विधान कर अगले उपदेश में बाह्य से आभ्यन्तर लिङ्गार्चन तथा निष्कल शिव की अंतःसाक्षात्कार-यात्रा की घोषणा की जाती है।

54 verses

Adhyaya 28

आभ्यन्तरध्यान-तत्त्वगणना-चतुर्व्यूहयोगः (Adhyaya 28)

पूर्वोक्त लिङ्गार्चन-विधि के बाद शैलादि उपदेश को भीतर की ओर ले जाते हैं—बिम्ब, गुण और आत्मा की परतों का ध्यान-क्रम बताकर महादेव की निष्कल तथा सकल—दोनों रूपों में उपासना कराते हैं। फिर साङ्ख्य-सदृश तत्त्वगणना आती है: अव्यक्त से महत्, अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, मन और भूत; शिव को छब्बीसवाँ तत्त्व और जगत्-व्यवस्था का वास्तविक कर्ता कहा गया है। सनत्कुमार पूछते हैं कि निष्क्रिय, शुद्ध प्रभु कर्म कैसे करते हैं; शैलादि काल और मन के भ्रम से इसका समाधान देते हैं तथा जगत् को शिव का मूर्त्यष्टक (भूत, ज्योतियाँ और यजमान) बताते हैं। अंत में चतुर्व्यूह-चिन्तन—रुद्र/इन्द्र/सोम/नारायण दृष्टियों का समन्वय—से ‘शैवोऽहम्/सोऽहम्’ का अद्वैत भाव स्थिर होता है। अध्याय आभ्यन्तर-पूजकों की मान्यता, निन्दा-निषेध और आगे के शैव आचरण व मोक्षोपदेश की नैतिक भूमिका के साथ समाप्त होता है।

33 verses

Adhyaya 29

दारुवनलीला—नीललोहितपरीक्षा, ब्रह्मोपदेशः, अतिथिधर्मः, संन्यासक्रमः

सनत्कुमार दारुवन में हुई लीला सुनना चाहते हैं। सूत के कथन से शैलादि बताते हैं कि ऋषियों ने रुद्र के लिए कठोर तप किया, तब उनके प्रवृत्ति‑निवृत्ति के विवेक की परीक्षा हेतु शिव नीललोहित दिगम्बर और विकृत वेष में वन में आए। स्त्रियाँ मोहित हुईं, पर ऋषि कटुवचन बोलकर महादेव को न पहचान सके और उनका तप बाधित हुआ—अहंकार व अविवेक का फल दिखा। वे ब्रह्मा के पास गए; ब्रह्मा ने डाँटकर बताया कि जिसे उन्होंने निंदा की वह स्वयं परमेश्वर हैं, और अतिथि—सुन्दर हो या असुन्दर—कभी तिरस्कृत न किया जाए। फिर ब्रह्मा सुदर्शन का दृष्टान्त सुनाते हैं जहाँ अतिथि‑पूजा से मृत्यु भी जीती गई; अतिथि‑सत्कार को शिव‑पूजा कहा गया। अंत में वे संन्यास‑क्रम बताते हैं—वेदाध्ययन, गृहस्थधर्म, यज्ञ, वनवास‑नियम, विधिवत् त्याग व तप—जिससे शिव‑सायुज्य मिलता है; दृढ़ भक्ति से तत्काल मुक्ति भी संभव है।

83 verses

Adhyaya 30

श्वेतमुनिना कालस्य निग्रहः (मृत्युञ्जय-भक्ति-प्रसादः)

शैलादि ऋषियों को ब्रह्मा द्वारा कही श्वेतमुनि की पवित्र कथा सुनाते हैं। वृद्ध श्वेत लिङ्ग-पूजा और रुद्र-जप में लीन थे कि काल आकर ‘रौद्र’ कर्मों की निष्फलता बताकर उन्हें यमलोक ले जाने का अधिकार जताता है। श्वेत अडिग शैव-निष्ठा से कहता है—लिङ्ग में स्वयं रुद्र विराजमान हैं और देवताओं के मूल हैं, इसलिए काल लौट जाए। क्रुद्ध काल पाश से बाँधकर लिङ्गस्थ देवता की मानो निष्क्रियता का उपहास करता है। तभी अम्बिका, नन्दी और गणों सहित सदाशिव प्रकट होकर मात्र दृष्टि से अन्तक को दबाकर मार देते हैं और भक्त की रक्षा करते हैं। आगे उपदेश है—भुक्ति-मुक्ति हेतु मृत्युञ्जय शंकर की आराधना करो; केवल तर्क नहीं, एकान्त भक्ति से भव का शरणागमन कर शोक से मुक्त हो। ब्रह्मा बताते हैं कि दान, तप, यज्ञ, वेद या योग-नियम मात्र से शिवभक्ति नहीं मिलती; प्रधानतः शिव-प्रसाद से मिलती है। पाशुपत-भक्ति से चारों पुरुषार्थ और मृत्यु पर विजय होती है—दधीचि, ब्रह्मा और श्वेत इसके उदाहरण हैं।

37 verses

Adhyaya 31

देवदारुवनौकसां प्रति ब्रह्मोपदेशः—लिङ्गलक्षण-प्रतिष्ठा-विधिः, शिवमायारूपदर्शनं, स्तुतिः

सनत्कुमार देवदारुवन के ऋषियों के शिवकृपा से शरण पाने का रहस्य पूछते हैं। उत्तर में ब्रह्मा उपदेश देते हैं कि महादेव ही परमेश्वर हैं—देव, ऋषि और पितरों के स्वामी; प्रलय में वे कालरूप होकर सबको समेटते हैं और अपने तेज से पुनः सृष्टि करते हैं। फिर योग्य उपासकों के लिए शिवलिङ्ग के लक्षण और प्रतिष्ठा-विधि बताई जाती है—गोल, चौकोर, अष्टकोण, षोडशकोण आदि रूपों में लिङ्ग-निर्माण, अनुपातयुक्त वेदिका, गोमुखी-निष्कासन, चारों ओर पट्टिका, शुभ द्रव्यों का चयन, मध्य में कलश-स्थापन तथा शुद्ध पदार्थों से अभिषेक-प्रोक्षण। ऋषि एक वर्ष तप और पूजन करते हैं; वसन्त में शिव भस्म-लिप्त, दिगम्बर, अग्निदण्डधारी, उलटे-से आचरण वाले रूप में आकर अपनी योगमाया दिखाते हैं। ऋषि परिवार सहित पूजन कर देह-वाणी-मन के दोष स्वीकारते और रुद्र के विश्वरूप ऐश्वर्य की स्तुति करते हैं। प्रसन्न होकर शिव दिव्यदृष्टि देते हैं, जिससे वे उनका त्रिनेत्र सत्यस्वरूप देखते हैं—विनय और शुद्ध उपासना के बाद दर्शन की प्राप्ति का क्रम प्रकट होता है।

46 verses

Adhyaya 32

ऋषिकृत-रुद्रस्तुतिः तथा संहाराग्नि-प्रश्नः (Kāma–Krodha–Lobha and the Fire of Dissolution)

ऋषि तीव्र रुद्र-स्तुति से शिव को दिग्वास, त्रिशूलधारी, भयानक होते हुए भी मंगलमय प्रभु मानकर प्रणाम करते हैं—वही अरूप, सुरूप और विश्वरूप हैं। वे कहते हैं कि पर्वतों में मेरु, तारों में चन्द्र, ऋषियों में वसिष्ठ और वेदों में ओंकार के समान वही सर्वोच्च हैं; भूत और भविष्य की सभी अवस्थाएँ अंततः उन्हीं में देखी जाती हैं। फिर वे बंधनकारी अंतःशक्तियों—काम, क्रोध, लोभ, विषाद और मद—का तत्त्व जानना चाहते हैं। वे महाप्रलय का स्मरण करते हैं जब शिव अपने ललाट से संहाराग्नि उत्पन्न करते हैं; लोक ज्वालाओं से घिर जाते हैं, अनेक विकृत अग्नियाँ उठती हैं और चर-अचर प्राणी उस शिवज अग्नि से दग्ध होते हैं। इसलिए ऋषि रक्षा और मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हैं और अंत में शरणागति करते हुए कहते हैं कि असंख्य रूपों का अंत वे नहीं पा सकते; आगे का उपदेश इन्हीं विनाशकारी शक्तियों के अर्थ, नियंत्रण और शिवकृपा से उनके अतिक्रमण को स्पष्ट करेगा।

16 verses

Adhyaya 33

Adhyaya 33: Pashupata Conduct, Bhasma-Vrata, and Shiva’s Boon to the Sages

नंदी बताते हैं कि ऋषियों के स्तवन को सुनकर प्रसन्न महेश्वर उस स्तव के पाठ, श्रवण और अध्यापन का फल बताते हैं और योग्य जनों को गणपत्य-सदृश सिद्धि प्रदान करते हैं। फिर शिव अपने ही स्वरूप से उत्पन्न स्त्रीलिंग (प्रकृति) और पुंलिंग (पुरुष) के युग्म तत्त्व द्वारा सृष्टि का सिद्धान्त समझाकर, लिंग-प्रतीक के भीतर अद्वैत शैव तत्त्व को स्थापित करते हैं। वे उपदेश देते हैं कि दिग्वास/तपस्वी जो बालक या उन्मत्त-सा दिखे, पर शिवभक्त और ब्रह्मवक्ता हो, उसका उपहास या निन्दा न की जाए। भस्मधारी, संयमी, ध्याननिष्ठ ब्राह्मणों की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि वे महादेव की उपासना से रुद्रलोक को प्राप्त होकर फिर नहीं लौटते। भस्म-व्रती और मुण्ड-तपस्वियों का अपमान न हो; उनका सम्मान शंकर का सम्मान है और उनकी निन्दा महादेव की निन्दा। भय-मोह से मुक्त ऋषि शुद्ध जल, कुश और पुष्पों से अभिषेक करते हैं, गुप्त मन्त्रों और हुंकारों से, अर्धनारीश्वर सहित, स्तुति करते हैं। शिव प्रसन्न होकर वर माँगने को कहते हैं; तब ऋषि भस्म-स्नान, दिगम्बरता, वामत्व, प्रतिलोमता तथा क्या सेवनीय और क्या वर्जनीय—इन अर्थों के विषय में पूछते हैं, जिससे आगे का उपदेश आरम्भ होता है।

24 verses

Adhyaya 34

Adhyaya 34: भस्ममहात्म्यं—अग्नीषोमात्मक-शिवतत्त्वं तथा पाशुपतव्रतप्रशंसा

इस अध्याय में भगवान शिव अग्नि–सोम-स्वरूप से अपने तत्त्व का परिचय देकर भस्म की उत्पत्ति और उसकी पावन शक्ति बताते हैं। अग्नि से जगत् दग्ध होकर जो भस्म बनती है, वह परम पवित्र है; ‘भस्म’ की शुभ भावना से वह सर्वपाप-क्षयकारी कही गई है। भस्म को ‘मेरा वीर्य’ कहकर शिवशक्ति का प्रतीक बताया गया और घरों तथा सूतिकागृह में रक्षा हेतु भस्म-प्रयोग को लोकाचार माना गया। भस्मस्नान से शुद्धात्मा, क्रोध-इन्द्रियजयी साधक शिव-समीप जाकर पुनर्जन्म नहीं पाता—यह मोक्षमार्ग का संकेत है। आगे पाशुपत-व्रत/योग की प्राचीनता और श्रेष्ठता बताकर सिखाया गया कि बाह्य वस्त्र से बढ़कर क्षमा, धृति, अहिंसा, वैराग्य और मान-अपमान में समता जैसी आन्तरिक शुद्धि ही उत्तम आवरण है। त्रिकाल भस्मस्नान पापदाहक, शैवगण-संबंधक और सिद्धि/अमृतत्व की ओर ले जाने वाला कहा गया; अंत में जटाधारी, मुण्डित, नग्न या मलिन शिवभक्त तपस्वी निन्द्य नहीं, शिववत् पूज्य हैं।

31 verses

Adhyaya 35

Adhyaya 35 — दधीचि-क्षुप-युद्धम्, भार्गवोपदेशः, मृतसंजीवनी (त्र्यम्बक) मन्त्रः

सनत्कुमार के प्रश्न पर शैलादि बताता है कि ब्रह्मपुत्र-राजा क्षुप दधीचि का मित्र होते हुए भी ‘क्षत्रिय-श्रेष्ठता’ और ‘विप्र-श्रेष्ठता’ के विवाद में विरोधी बन गया। वह अपने को अष्ट-लोकपाल-स्वरूप मानकर अवमानना-निषेध का दावा करता है; दधीचि क्रोध में प्रहार करता है, पर क्षुप वज्र से उसे गिरा देता है। दुःखी दधीचि भार्गव (शुक्र) का स्मरण करता है; शुक्र योगबल से आकर शरीर-संधान कर देता है और शिव-त्र्यम्बक/उमापति की पूजा से प्राप्त ‘मृतसंजीवनी’ मन्त्र का उपदेश देता है—‘त्र्यम्बकं यजामहे… सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्…’ सत्य, स्वाध्याय, योग और ध्यान से मृत्यु-पाश-छेदन की प्रार्थना। लिङ्ग-सन्निधि में जप-होम-अभिमन्त्रण-जलपान-विधि से मृत्युभय का नाश तथा वज्र-सा स्थैर्य/अवध्यत्व मिलता है। फिर युद्ध में क्षुप का वज्र दधीचि को नष्ट नहीं कर पाता; दधीचि का प्रभाव देखकर क्षुप हरि (मुकुन्द) की शरण की ओर उन्मुख होता है, जिससे आगे देव-शक्तियों के परस्पर आश्रय और शैव-वैष्णव संबंध की कथा खुलती है।

31 verses

Adhyaya 36

क्षुपस्य विष्णुदर्शनं, वैष्णवस्तोत्रं, दधीचविवादः, स्थानेश्वरतीर्थमाहात्म्यं

नन्दीश्वर कथा कहते हैं—क्षुप राजा की पूजा से प्रसन्न गरुड़ध्वज विष्णु श्री-भूमि सहित प्रकट होकर दर्शन देते हैं। राजा विश्वमूर्ति रूप में स्तुति करता है और सृष्टि-तत्त्वों (महान्, तन्मात्रा, इन्द्रिय) तथा भगवान के विराट्-शरीर का वर्णन करता है; यह वैष्णव स्तोत्र फलश्रुति सहित ‘सर्वपापप्रणाशन’ कहा गया है। फिर क्षुप दधीच ब्रह्मर्षि की अवध्यता बताकर युद्ध-विजय की याचना करता है; विष्णु रुद्रभक्तों की अभयता कहकर उसे निरुत्साहित करते हैं, फिर भी प्रयास करने को कहते हैं। विष्णु ब्राह्मण रूप में दधीचाश्रम जाकर वर मांगते हैं; दधीच सर्वज्ञ होकर निर्भयता प्रकट करते हैं। दधीच के प्रभाव से सुदर्शन चक्र व अन्य अस्त्र निष्फल हो जाते हैं; देव-सहायता और विष्णु के बहुरूप भी काम नहीं आते। दधीच विश्वरूप-माया त्यागने का उपदेश देकर अपने देह में देव-रुद्र-कोटियों का दर्शन कराते हैं; ब्रह्मा विष्णु को रोकते हैं और विष्णु मुनि को प्रणाम कर लौट आते हैं। क्षुप क्षमा मांगता है; दधीच दक्षयज्ञ-विनाश का संकेत देते हुए शाप और ब्राह्मणबल का प्रतिपादन करते हैं। अंत में स्थानेश्वर तीर्थ का माहात्म्य—शिवसायुज्य, अपमृत्युजय और ब्रह्मलोकगमन—फलश्रुति सहित वर्णित है।

80 verses

Adhyaya 37

क्षुपदधीचिसंवादः — शिलादतपः, वरसीमा, मेघवाहनकल्पे त्रिदेवसमागमः

सनत्कुमार शैलादि से पूछते हैं कि तुम महादेव-उमापति की कथा सुनने योग्य कैसे बने। शैलादि अपने पिता शिलाद के प्रजाकामना से किए गए घोर तप का वर्णन करता है। इन्द्र प्रसन्न होकर वर देना चाहते हैं, पर शिलाद ‘अयोनिज, मृत्यु-रहित पुत्र’ माँगते हैं। शक्र बताते हैं कि देवों में भी मृत्यु-रहितता नहीं; ब्रह्मा भी काल से परे नहीं, और शिव की आयु भी परार्ध-द्वय तक नियत है—यह काल-नियम है। शिलाद अण्डयोनि, पद्मयोनि और महेश्वराङ्गयोनि की श्रुतियों का स्मरण कर कारण पूछते हैं। तब इन्द्र मेघवाहन-कल्प का वृत्तान्त सुनाते हैं—नारायण मेघ-रूप होकर महादेव को वहन करते हैं; शिव प्रसन्न होकर सृष्टि हेतु ब्रह्मा सहित सब प्रदान करते हैं। ब्रह्मा क्षीरसागर में योगनिद्रा-स्थित विष्णु को देखकर ‘मैं तुम्हें ग्रसूँ’ ऐसी प्रार्थना से पुनः सृजित होते हैं; फिर रुद्र उग्र रूप में आकर ब्रह्मा-विष्णु की स्तुति से अनुग्रह कर अंतर्धान हो जाते हैं। यह कथा आगे शिलाद के पुत्र-प्राप्ति प्रसंग और शिव-प्रसादप्रधान सृष्टि-तत्त्व को दृढ़ करती है।

40 verses

Adhyaya 38

ब्रह्मणो वरप्रदानम् — शिवस्य परत्वप्रतिपादनम् तथा वराहेण भूमेः पुनःस्थापनम्

महेश्वर के प्रस्थान के बाद जनार्दन (विष्णु) शिव की परता का स्तवन करते हैं और कहते हैं कि महादेव ही सर्वलोकनाथ हैं तथा ब्रह्मा-विष्णु सहित सबके आश्रय हैं। वे बताते हैं कि वे स्वयं शिव के वाम-अंश हैं और ब्रह्मा शिव के दक्षिण-अंश; ऋषि प्रकृति/अव्यक्त को विष्णु से और पुरुष को ब्रह्मा से संबद्ध मानते हैं, पर दोनों का सामान्य कारण महादेव ही हैं। आज्ञा पाकर ब्रह्मा रुद्र को वरदाता मानकर पूजते हैं। फिर विष्णु वराह रूप धारण कर जलमग्न पृथ्वी को उठाकर स्थिर करते हैं, नदियों-समुद्रों और भूभाग का पुनर्निर्माण कर लोकों की स्थापना करते हैं। ब्रह्मा योगबल से कुमारों (सनक आदि) और प्रमुख ऋषियों की, तथा धर्म-अधर्म की सृष्टि कर नैतिक और ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का आधार रखते हैं, जिससे आगे शैव उपासना और मोक्ष-शिक्षा का प्रसंग चलता है।

16 verses

Adhyaya 39

युगधर्मवर्णनम् — चतुर्युग, गुण, धर्मपाद, तथा वार्तोत्पत्ति

शिलाद ने शक्र से पूर्व उपदेश सुनकर फिर इन्द्र से पूछा कि ब्रह्मा ने युग-धर्म की स्थापना कैसे की। शक्र चार युगों—कृत, त्रेता, द्वापर, कलि—को गुणों से जोड़कर प्रत्येक युग का प्रधान साधन बताता है: कृत में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में शुद्ध भक्ति-युक्त भजन/पूजन, और कलि में दान। कृतयुग में सहज तृप्ति, अल्प विवाद और वर्णाश्रम की स्थिरता रहती है। त्रेता के आरम्भ में वर्षा, नदियों, वनस्पतियों और फिर कृषि से समृद्धि आती है; पर काम और ममत्व से झगड़े, भूख, सीमा-निर्धारण व रक्षा की आवश्यकता उत्पन्न होती है, इसलिए ब्रह्मा क्षत्रियों की स्थापना कर वर्णाश्रम को दृढ़ करता और यज्ञ-व्यवस्था को नियमबद्ध करता है (हिंसा-अहिंसा पर विचार सहित)। द्वापर में भ्रम बढ़ता है—वेद-शाखाएँ फैलती हैं, पुराण-परम्पराएँ (लिङ्गपुराण सहित) विविध होती हैं; दुःख से वैराग्य, जिज्ञासा और ज्ञान का उदय होता है। अंत में धर्म क्रमशः क्षीण होकर कलि में प्रायः लुप्त हो जाता है, इसलिए शिव-केन्द्रित, सुलभ भक्ति-पथ का आश्रय विशेष महत्त्व पाता है।

70 verses

Adhyaya 40

Adhyaya 40: Kali-yuga Lakshana, Yuga-sandhyamsha, and the Re-emergence of Dharma

इस अध्याय में शक्र (इन्द्र) कलियुग के लक्षण बताते हैं—रोग, दुर्भिक्ष, अनावृष्टि, श्रुति पर अविश्वास, वेदाध्ययन और यज्ञ का क्षय, वर्णाश्रम-धर्म का उलट जाना, राजाओं द्वारा प्रजा का शोषण, तथा दम्भ, चोरी और हिंसा की वृद्धि। फिर शैव समाधान आता है—कलि में महादेव शंकर नीललोहित धर्म की ‘प्रतिष्ठा’ हेतु प्रकट होते हैं; जो उनकी शरण लेते हैं वे कलिदोष से पार होकर परम पद पाते हैं। युग-संधि में अंतकालीन उथल-पुथल शोधन में परिणत होती है; प्रमिति नामक दण्डशक्ति का प्रादुर्भाव होता है और कुछ ‘कलिशिष्ट’ समुदाय बच रहते हैं। वे वन-सीमाओं में तपस्वी जीवन अपनाकर निर्वेद प्राप्त करते हैं और नये कृतयुग के बीज बनते हैं। सप्तर्षि श्रौत-स्मार्त धर्म और वर्णाश्रम आचार को पुनः स्थापित करते हैं; इस प्रकार शिव-केन्द्रित धर्म युग-परिवर्तन में भी टिककर मोक्षमार्ग का आश्वासन देता है।

100 verses

Adhyaya 41

प्रलय-तत्त्वलयः, नीललोहित-रुद्रः, अष्टमूर्तिस्तवः, एवं ब्रह्मणो वैराग्यम्

इन्द्र महाप्रलय का वर्णन करता है—अत्यन्त दीर्घ काल के बाद पृथ्वी जल में लीन होती है, जल अग्नि और वायु में समा जाता है; इन्द्रियाँ और तन्मात्राएँ अहंकार में, फिर महत् में और अन्ततः अव्यक्त में विलीन हो जाती हैं। फिर शिव-पुरुष से सृष्टि पुनः चलती है, पर ब्रह्मा की मानस-संतानें नहीं बढ़तीं; तब ब्रह्मा ईश की ओर कठोर तप करता है। शिव दिव्य रूपों से उत्तर देता है—अर्धनारीश्वर-भाव का संकेत देकर ब्रह्मा और हरि को अपनी अधीनता में प्रतिष्ठित करता है। ब्रह्मा समाधि में हृदय-कमल में शिव की स्थापना कर अक्षय का पूजन करता है; उसी अन्तर्मुख साधना से नीललोहित (काल-रूप) प्रकट होता है, और ब्रह्मा अष्टमूर्ति-स्तव से रुद्र को विश्व के आठ रूपों में स्तुत करता है। अनुग्रह से सृष्टि आगे बढ़ती है, पर ब्रह्मा फिर विघ्न, क्रोध और भूत-प्रेतों की उत्पत्ति से व्याकुल होता है; रुद्र प्रकट होकर ग्यारह रूपों में विभक्त होता है और शक्ति सहित अनेक देवियों को उत्पन्न करता है। शिव ब्रह्मा के प्राण पुनः स्थिर कर स्वयं को परमात्मा और माया का स्वामी घोषित करता है; आगे अमृत अयोनिज की दुर्लभता तथा अनुग्रह-मोक्ष की कथा की भूमिका बनती है।

64 verses

Adhyaya 42

Indra’s Account: Shilada’s Tapas and Shiva’s Manifestation as Nandi

सूत बताते हैं कि शिलाद महादेव के अनन्य भक्त थे। उन्होंने इतना कठोर और दीर्घ तप किया कि शरीर कृश हो गया और कीटों से ढक गया, फिर भी वे शिव-ध्यान में लीन रहे। प्रसन्न होकर शंकर उमा और गणों सहित प्रकट हुए, तप का प्रयोजन पूछा और वर दिया—सर्वज्ञ, शास्त्रार्थ-निपुण पुत्र। शिलाद ने अयोनिज, अमर पुत्र माँगा। शिव ने कहा कि पूर्व-पूजा और दैवी योजना से वे स्वयं शिलाद के पुत्र नन्दी रूप में जन्म लेंगे, और शिलाद जगत्पिता के भी पिता कहलाएँगे। यज्ञ-भूमि में नन्दी त्रिनेत्र, चतुर्भुज, आयुधधारी, तेजस्वी और भयानक रूप में प्रकट हुए; देव, ऋषि और दिव्य शक्तियाँ स्तुति करने लगीं। शिलाद की स्तुति में नन्दी रक्षक और जगद्गुरु हैं; वे मुनियों को अपना सौभाग्य देखने बुलाते हैं—एकाग्र भक्ति और शुद्ध यज्ञ पर शिव-कृपा का सेतु बनता है।

38 verses

Adhyaya 43

नन्दिकेश्वरोत्पत्तिः — Nandikesvara’s Origin, Shiva’s Boons, and the Rise of Sacred Rivers

नन्दिकेश्वर बताते हैं कि महेश्वर की पूजा कर वे पिता शिलाद के साथ आश्रम लौटे, पर दिव्य स्वरूप मनुष्य देह में छिप गया और स्वर्गीय स्मृति लुप्त हो गई। शिलाद ने प्रेम से संस्कार किए और अनेक वैदिक शाखाएँ तथा वेदाङ्ग-विद्याएँ सिखाईं। सात वर्ष की आयु में शिव की आज्ञा से ऋषि मित्र और वरुण आए और बोले कि शास्त्र-निपुण होने पर भी नन्दी की आयु अल्प है; इससे शिलाद शोकाकुल हो गए। मृत्यु का संकेत देखकर नन्दी ने प्रदक्षिणा की, रुद्र-जप किया और हृदय-कमल में त्र्यम्बक का ध्यान किया। शिव प्रकट हुए, भय दूर किया, पूर्व जन्म की उपासना बताई और स्पर्श से जरा-शोक रहित कर प्रिय गणाध्यक्ष व योग-समर्थ बनाया। फिर शिव ने जटा-जल से जटोदका, त्रिस्रोतस, वृषध्वनि, स्वर्णोदका/जम्बूनदी आदि तीर्थ-नदियाँ प्रकट कर नाम दिए; जप्येश्वर के पास पञ्चनद में स्नान-पूजा से शिवसायुज्य का फल कहा। अंत में उमा द्वारा नन्दी के अभिषेक और गणों में प्रतिष्ठा का संकेत मिलता है।

53 verses

Adhyaya 44

Adhyaya 44: Nandikesvara’s Manifestation and Abhisheka; The Rule of Namaskara in Shiva-Nama

शैलादि कहते हैं कि रुद्र का स्मरण करते ही असंख्य गण प्रकट हो जाते हैं—तेजस्वी, त्रिनेत्र, शस्त्रधारी—गीत‑नृत्य और दिव्य विमानों सहित, मानो कोई दिव्य आज्ञा निकट हो। वे शिव‑देवी को प्रणाम कर पूछते हैं कि कौन‑सा कार्य करें; समुद्र सुखा देना, इन्द्र को बाँधना, यम से युद्ध, दैत्यों का दमन जैसे महाकर्म भी प्रस्तुत करते हैं। शिव बताते हैं कि उन्हें लोककल्याण हेतु बुलाया गया है और शिव के पुत्रवत् स्वामी नन्दीश्वर को गणों का सेनानी बनाकर प्रतिष्ठित करना है। गण रत्नमण्डप, मेरु‑सदृश स्वर्णासन, पादपीठ, युग्म कलश, सर्वतीर्थ‑जल से भरे सहस्रों कलश, वस्त्र‑गन्ध‑आभूषण, छत्र‑चामर आदि राजचिह्न दिव्य शिल्पियों से बनवाकर अभिषेक की भव्य व्यवस्था करते हैं। ब्रह्मा पहले अभिषेक करते हैं, फिर विष्णु, इन्द्र और लोकपाल; ऋषि‑देव नवाभिषिक्त गणेश्वर की स्तुति करते हैं, और ब्रह्मा की आज्ञा से विवाह‑विधान का भी उल्लेख आता है। अंत में उपदेश है कि नमस्कार के बिना शिव‑नाम न बोला जाए; प्रणाम से आरम्भ और भक्ति में समाप्त नामोच्चार ही सुरक्षित और मोक्षदायक नियम है।

49 verses

Adhyaya 45

Adhyaya 45: Rudra as Sarvatma—Seven Lokas, Seven Talas, and the Cosmic Body of Shiva

पूर्वभाग की कथा में ऋषि सूत से शंकर के सर्वात्मभाव और रुद्र के सामान्य दृष्टि से परे स्वरूप का वर्णन पूछते हैं। सूत भूर्, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य—इन लोकों तथा पाताल और नरकादि का क्रम बताकर कहता है कि ग्रह, ध्रुव, सप्तर्षि, विमानिक आदि सभी शिव के प्रसाद से स्थित हैं। शिव समष्टिरूप सर्वात्मा होकर भी माया से मोहित जीवों को नहीं पहचाने जाते। वह सिद्ध करता है कि त्रिलोकी रुद्र का शरीर है, इसलिए जगत् के ‘निर्णय’ से पहले शिव-पूजन आवश्यक है। फिर वह सात तल—महातल, रसातल, तलातल, सुतल, वितल, अतल आदि—उनकी शोभा और नाग, दैत्य-असुर, प्राचीन राजाओं के निवास का वर्णन करता है, और अंत में अम्बा सहित परमेश्वर, स्कन्द, नन्दी तथा गणों की सर्वव्यापकता बताकर शिव-केंद्रित लोक-व्यवस्था की भूमिका बाँधता है।

23 verses

Adhyaya 46

सप्तद्वीप-सप्तसमुद्र-वर्णनम् तथा प्रियव्रतवंश-राज्यविभागः

इस अध्याय में सूत रोमहर्षण पृथ्वी के सात द्वीप—जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक, पुष्कर—और उनके चारों ओर स्थित सात समुद्र—क्षार, इक्षुरस, सुरा, घृत, दधि, क्षीर, स्वादु—का क्रम से वर्णन करते हैं। इस भूगोल-वर्णन के केंद्र में शिव हैं—‘जलरूपी भव’ के रूप में वे गणों सहित समुद्रों में क्रीड़ा करते हुए जगदाधारत्व प्रकट करते हैं। क्षीरसागर-प्रसंग में हरि शिव-ज्ञान से युक्त होकर योगनिद्रा में शयन करते हैं; उनके जागरण-निद्रा से जगत का जागरण-निद्रा तथा सृष्टि-स्थिति-लय का देवदेव की कृपा पर आश्रित होना प्रतिपादित होता है। फिर प्रियव्रत के पुत्रों (आग्नीध्र आदि) को द्वीपाधिपति बनाकर द्वीप-देश-वर्षों का नाम सहित विभाग किया जाता है और शाक, क्रौञ्च, कुश, शाल्मलि, प्लक्ष आदि में पुत्र-विभाग से जनपद बताए जाते हैं। साथ ही पंचद्वीपों में वर्णाश्रमधर्म की समानता, रुद्र-पूजा की प्रधानता और प्रजापति-रुद्र-संबंध से प्रजा-सृष्टि का संकेत देकर आगे के विस्तृत भू-वर्णन व पाताल-लोक प्रसंग की भूमिका रची जाती है।

49 verses

Adhyaya 47

जम्बूद्वीपस्य नववर्षविभागः रुद्रस्य अष्टक्षेत्रसन्निधिः नाभि-ऋषभ-भरतकथा

सूता भुवनकोश का वर्णन आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि प्रियव्रत ने जम्बूद्वीप के शासन हेतु अग्नीध्र का अभिषेक किया और उसके नौ पुत्रों का परिचय दिया। प्रत्येक पुत्र को अलग-अलग वर्ष मिला—नाभि को हेम, किम्पुरुष को हेमकूट, हरि को नैषध, इलावृत मेरु-मध्य, रम्यक नीलाश्रित, हिरण्मान श्वेत-उत्तर, कुरु शृङ्गवान, भद्राश्व माल्यवत और केतुमाल गन्धमादन। फिर इलावृत को छोड़कर आठ शुभ प्रदेशों को स्वभावतः सिद्ध कहा गया, जहाँ युग-शर्तें, सामाजिक भेद, तथा जरा-मृत्यु का भय नहीं, क्योंकि रुद्र ने ‘अष्ट-क्षेत्र’ स्थापित कर भक्तों के लिए निरंतर सन्निधि बनाए रखी है। इसके बाद वंशकथा में नाभि के पुत्र ऋषभ, ऋषभ द्वारा भरत का राज्याभिषेक, और ज्ञान-वैराग्य से प्रेरित ऋषभ का संन्यास—परमात्मा में अंतर्लय और शैव परमपद-प्राप्ति सहित—वर्णित है, जिससे भरत और मानव-लोक (भारतवर्ष) केंद्रित धर्म-इतिहास की भूमिका बनती है।

25 verses

Adhyaya 48

मेरुवर्णनम्—प्रमाण, दिग्विभाग, देवपुरी-विमान-निवासाः

सूत्रधार सूत जम्बूद्वीप के मध्य स्थित महागिरि मेरु का वर्णन उसके उत्सेध, विस्तार, परिधि आदि प्रमाणों सहित करते हैं और बताते हैं कि वह शराव के समान स्थित है। महेश्वर के शुभ अंग-स्पर्श से वह स्वर्णमय हो गया—यह भी कहा गया है। मेरु की दिशाओं में विविध रत्न-प्रभा, तथा अमरावती आदि दिव्य पुरियाँ प्रासाद, गोपुर, तोरण, दीर्घिकाएँ और तटाकों से समृद्ध वर्णित हैं। शिखर पर शुद्ध स्फटिक-सम विमान, वहाँ शर्व का सिंहासन, हरि और पद्मज आदि के निवास, तथा इन्द्र, यम, वरुण, निरृति, पावक, वायु आदि के नगर बताए गए हैं। ईशान्य दिशा के ईश्वर-क्षेत्र में नित्य-पूजा की व्यवस्था, सिद्धेश्वर, सनत्कुमार आदि, तथा शैलादि गणेश्वर और षण्मुख-गणसमूहों का उल्लेख है। आगे जम्बूनदी, जम्बूवृक्ष, इलावृतवर्ष और जम्बूद्वीप के नववर्षों की रचना का संकेत देकर आगामी विस्तृत वर्णन की भूमिका बाँधी जाती है।

35 verses

Adhyaya 49

Adhyaya 49: जम्बूद्वीप-मेर्वादि-वर्षपर्वत-वन-सरः-रुद्रक्षेत्र-वर्णनम्

सूत जम्बूद्वीप का प्रमाण, सप्तद्वीपों का संबंध और लोकालोक-आवरण बताकर मेरु को मध्यदेश के रूप में स्थापित करते हैं। फिर नील, श्वेत, शृंगी, हिमवान्, हेमकूट, निषध, माल्यवान्, गन्धमादन आदि वर्ष-पर्वतों की दिशानुसार स्थिति, विस्तार-आयाम तथा भारत, किंपुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, कुरु आदि वर्षों के नाम क्रम से कहते हैं। मेरु के पादों पर चारों दिशाओं में पर्वत-स्तम्भ और कदम्ब, जम्बू, अश्वत्थ, न्यग्रोध जैसे महावृक्षों से ‘द्वीपकेतु’ का संकेत देते हैं। दिव्य वन, ईश्वर-क्षेत्रों के संकेत तथा अरुणोद, मानस, सितोद, महाभद्र आदि सरोवरों का वर्णन कर, पर्वतों के बीच देव-ऋषि-सिद्ध-नाग-विद्याधरों के निवास और सर्वत्र रुद्रक्षेत्रों की प्रतिष्ठा बताकर शैव तीर्थ-भावना को दृढ़ करते हैं तथा आगे के तीर्थ-धर्म व उपासना प्रसंग की भूमिका बनाते हैं।

69 verses

Adhyaya 50

Adhyaya 50 — देवपुर्यः, पुराणि, आयतनानि च; श्रीकण्ठाधिपत्य-प्रतिपादनम्

सूता की ब्रह्माण्ड-वर्णना में यह अध्याय दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर, नाग आदि के लिए पवित्र पर्वतों और उनसे जुड़ी पुरियों/पुराणियों का क्रम से उल्लेख करता है तथा गरुड़, नीललोहित, कुबेर, गुह और सप्तर्षियों जैसे दिव्य निवासियों को भी बताता है। फिर कहा गया है कि मर्यादा-पर्वतों पर स्थित ये आयतन भी अंततः श्रीकण्ठ के अधिष्ठान में, उन्हीं की प्रभुता के अधीन हैं। आगे अण्ड-पालकों को चक्रवर्ती-तुल्य विश्व-प्रशासक बताकर, विद्‍येश्वरों को उच्चतर व्यवस्था-तत्त्व के रूप में संकेतित किया गया है। अंत में स्थावर-जंगम समस्त जगत, कालाग्नि-शिव तक, श्रीकण्ठ के शासन में स्थित है—और अगले प्रसंग के लिए भूमिका बनती है।

21 verses

Adhyaya 51

Bhūtavana–Kailāsa–Mandākinī–Rudrapurī: Śiva’s Jeweled Abodes and Perpetual Worship

सूत जी देवकूट का वर्णन करते हैं, जो महाकूट में स्वर्ण-रत्नों से दीप्त, दिव्य वृक्षों और पुष्पमय झरनों से भरा है। उसके मध्य भूतवन है, जहाँ असंख्य भूत-गण निवास करते हैं और महादेव का आयतन स्फटिक-द्वारों, रत्न-सिंहासनों और अलंकृत मण्डपों से शोभित है। वहाँ प्रमथ, सिद्ध, ऋषि, देव, गन्धर्व और ब्रह्मा तक वाद्य-ध्वनि और जयघोषों के साथ शिव की नित्य पूजा करते हैं। फिर कथा कैलास को कुबेर के लोक के रूप में और मन्दाकिनी को स्वर्ण कमलों व रत्न-सोपानों वाली, अप्सराओं तथा यक्ष-गन्धर्व स्त्रियों से सेवित नदी के रूप में बताती है। मन्दाकिनी तट पर रुद्रपुरी आदि शिव-धाम हैं, जहाँ शिव अनेक रूप धारण कर अम्बा के साथ क्रीड़ा करते हैं। अंत में कहा जाता है कि शिव के आयतन हर द्वीप, पर्वत, वन और नदी-तट पर असंख्य हैं—आगे के पवित्र स्थलों के विस्तृत निरूपण की भूमिका बनती है।

31 verses

Adhyaya 52

Adhyaya 52: सोमाधारः, पुण्योदानदी, मेरुप्रदक्षिणा, जम्बूद्वीपनववर्षवर्णनम्

पूर्वभाग की शिव-केंद्रित सृष्टि-वर्णना में सूत बताते हैं कि सरोवरों से असंख्य पुण्य नदियाँ उत्पन्न होकर नियत दिशाओं में बहती हैं। फिर ‘सोम’ को आकाशस्थ समुद्र और अमृत-स्रोत कहा गया है, जो देवों और प्राणियों का आधार है। उसी से दिव्य पुण्योदा नदी निकलकर नक्षत्रों के साथ गगन में चलती है और सोम की भाँति निरंतर परिक्रमा करती रहती है। वह मेरु की प्रदक्षिणा करती है, जहाँ श्रीकण्ठ/शर्व गणों सहित क्रीड़ा करते हैं; शिव की आज्ञा से उसका जल विभक्त होकर मेरु के अंतःशृंगों से उतरता और महोदधि में मिल जाता है, जिससे द्वीपों, पर्वतों और वर्षों में सैकड़ों-हज़ारों नदियाँ फैलती हैं। आगे जम्बूद्वीप के नौ वर्षों का वर्णन—निवासियों के रंग, आयु, आहार और स्वभाव—तथा भारतवर्ष में कर्माधीन मर्त्य-जीवन, वर्णाश्रम-धर्म और धर्म-अर्थ-काम की साधना जो अंततः स्वर्ग व अपवर्ग की ओर ले जाती है। अंत में प्रमुख पर्वत-प्रदेशों के नाम लेकर सर्वत्र शिव की व्यापक सत्ता स्थापित की जाती है।

51 verses

Adhyaya 53

भुवनकोशस्वभाववर्णनम् — सप्तद्वीप-पर्वत-लोकविन्यासः तथा यक्ष-उमा-प्रकाशः

सूता भुवन-कोश का वर्णन आगे बढ़ाते हुए सात द्वीपों और उनके कुल-पर्वतों का क्रम बताते हैं—प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर; मन्दर पर्वत को शिव-धाम के रूप में विशेष मान देते हैं। पुष्कर में मनसोत्तर पर्वत तथा लोकालोक-सीमा का वर्णन है, जहाँ प्रकाश समाप्त और अंधकार आरम्भ होता है। फिर ऊपर की लोक-परतों में सात वायु, सूर्य-चन्द्र, नक्षत्र-ग्रह, सप्तर्षि और ध्रुव, तथा महर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ब्रह्मलोक; और नीचे तल तथा नरक बताए गए हैं। अनन्त अण्डों में प्रत्येक में चौदह लोक हैं—सबका कारण महेश्वर हैं। अंत में यक्ष-प्रसंग से देवताओं का अभिमान टूटता है; उमा हैमवती के प्रकट होने पर वे समस्त शक्ति के पीछे छिपे प्रभु को जान लेते हैं। अध्याय भूगोल-विन्यास से शिव-तत्त्व तक सेतु बनाकर बताता है कि शिव-भक्ति और शिव-ज्ञान ही सच्चे ऐश्वर्य और मोक्ष की कुंजी हैं।

62 verses

Adhyaya 54

भुवनकोशविन्यासनिर्णयः (ज्योतिर्गति-वृष्टिचक्र-वर्णनम्)

सूत नैमिषारण्य के ऋषियों से अण्डस्थ ज्योतिर्गणों की गति का संक्षेप कहता है। दिशाओं में देव-क्षेत्रों/पुरियों का उल्लेख कर सूर्य की दक्षिणायन-गति को बाण-वेग-सी तीव्र और उत्तरायण-गति को कुलाल-चक्र की नाभि-उपमा से मन्द बताता है। दिन-रात्रि का मुहूर्त-मान, नक्षत्रों का परिभ्रमण तथा ध्रुव (औत्तानपाद) के ध्रुवत्व-प्रसाद से ग्रह-चक्र की स्थिरता प्रतिपादित होती है। आगे सूर्य द्वारा जलग्रहण, चन्द्रक्रम से जल-परिवर्तन, धूम-अग्नि-वायु-संयोग से मेघ-निर्माण और वृष्टि के भेद—हितकारी वर्षा तथा अभिचार-धूमजन्य अशुभ फल देने वाली—का विवेचन है। अध्याय शिव को ‘अपां अधिपति’ और जगत-हित हेतु गति-विधानकर्ता घोषित कर प्राकृतिक प्रक्रियाओं को शैव-तत्त्व में प्रतिष्ठित करता है, जिससे आगे सृष्टि-पालन के नियम और उपासना/धर्म के फल अधिक स्पष्ट होते हैं।

68 verses

Adhyaya 55

सूर्यरथ-रचना, ध्रुव-प्रेरणा, मास-गणाः च (Jyotish-chakra: Surya’s Motion and Monthly Retinues)

सूता संक्षेप में बतलाते हैं कि सूर्य एकचक्र रथ से आकाश में चलता है—उसके चक्र की रचना, रथ के निश्चित माप, और वेद-छन्दों से बने सात अश्व। ध्रुव को जगत् का धुरी-केन्द्र मानकर उसी के सहारे गति नियत होती है; रश्मियाँ और बन्धन-रज्जुएँ जुए को बाँधकर रथ को परिक्रमा कराती हैं, और भीतर-बाहर मार्ग का भेद ऋतु-परिवर्तन (उत्तरायण/दक्षिणायन) का संकेत देता है। फिर द्वादश मास-चक्र की पवित्र व्यवस्था आती है—आदित्य/देव, ऋषि, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, ग्रामणी/यक्ष और यातुधान मास-मास बदलकर सूर्यतत्त्व की पूजा, गान, नृत्य, किरण-संग्रह, वहन और रक्षा करते हैं, जिससे भास्कर का तेज बढ़ता है। अंत में कहा है कि ये स्थान-देवता मन्वन्तरों में पुनः आते हैं, और हरित अश्वों व एक चक्र वाले सूर्य का सप्तद्वीप-सप्तसमुद्रों के ऊपर गमन आगे के कालचक्र, लोक-शासन और ईश्वराधीन शैव-तेज के विवेचन की भूमिका बनता है।

82 verses

Adhyaya 56

सूर्यरथनिर्णयः (चन्द्रस्य पक्षवृद्धिक्षयविधानम्)

इस अध्याय में सूत चन्द्र के रथ का स्वरूप, अश्व‑चक्र आदि लक्षण और सूर्यतेज से सोम के बढ़ने‑घटने का क्रम बताते हैं। शुक्लपक्ष में सूर्यकिरणों से, विशेषतः सुषुम्ना‑नाड़ी रूप से, चन्द्रकलाएँ क्रमशः भरती हैं और पूर्णिमा को पूर्ण मण्डल दिखाई देता है। फिर कृष्णपक्ष में देव, पितर और ऋषि अम्बुमय सोम को मधु‑सुधा‑अमृत रूप में पीते हैं; कलाएँ प्रतिदिन क्षीण होती हैं और अमावस्या को शेष कलाओं से पितृगण तृप्त होते हैं। अंत में ‘पक्षवृद्धि‑क्षय षोडशी में स्मृत’ कहकर तिथि‑धर्म का आधार स्थापित किया गया है, जिससे आगे पर्व‑श्राद्ध‑व्रत आदि का शिवधर्म से सामंजस्य सूचित होता है।

18 verses

Adhyaya 57

सोमवर्णनम् (Graha–Ratha–Aśva Varṇana, Dhruva-Nibaddha Gati, Maṇḍala-Pramāṇa, Graha-Arcana)

इस अध्याय में सूत सोम, शुक्र, भौम, बृहस्पति, शनि और स्वर्भानु (राहु) आदि ग्रहों के रथों की रचना, अश्वों की संख्या तथा उनके यान-विशेषों का वर्णन करते हैं। फिर बताया गया है कि सभी ग्रह-तारे ध्रुव से बँधे हुए वायु-रश्मियों के सहारे अलातचक्र की भाँति घूमते हैं—यही ब्रह्माण्ड की गति-व्यवस्था है। सूर्य-चन्द्रमण्डल का प्रमाण, राहु का तमोमय स्थान और ग्रहों के परस्पर प्रमाण-भेद भी निर्दिष्ट हैं; उत्तरायण-दक्षिणायन, पूर्णिमा-अमावस्या और विषुवकाल में सूर्य-चन्द्र की दृश्यता तथा तमोवृत्ति का कथन है। अंत में लोक-क्रम (सूर्य से ध्रुवोर्ध्व तक), ब्रह्मा द्वारा ग्रहाधिपत्य-दीक्षा और ग्रहपीड़ा-शमन हेतु अग्नि में ग्रह-पूजन का उपसंहार कर, काल-गति का बोध देकर शैव कर्मों (लिङ्गपूजा/शान्ति) की मर्यादा दृढ़ की गई है।

39 verses

Adhyaya 58

ग्रहाद्यधिपत्याभिषेकः (Cosmic Consecrations of Lords of Planets and Domains)

ऋषि सूत से पूछते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा प्रजापति ने देवों और दैत्यों आदि को उनके-उनके अधिकार-क्षेत्रों में कैसे अभिषिक्त किया। सूत बताता है—सूर्य ग्रहों के अधिपति, चन्द्रमा नक्षत्रों व औषधियों के, वरुण जल के, यक्षश्रेष्ठ धन के, विष्णु आदित्यों के, अग्नि वसुओं के, दक्ष प्रजापतियों के, इन्द्र मरुतों के, प्रह्लाद दैत्य-दानवों के, धर्म पितरों के, निरृति पिशिताशियों के, और रुद्र पशुओं व भूतों के अधिपति बने। नन्दी गणों के नायक, वीरभद्र वीरों के, चामुण्डा मातृगण की, नीललोहित रुद्रों के, विनायक विघ्नों के, उमा स्त्रियों की, सरस्वती वाणी की, हिमवान पर्वतों के, जाह्नवी नदियों की, समुद्र जल-निधि का, अश्वत्थ-प्लक्ष वृक्षों में, चित्ररथ गन्धर्वों में, वासुकि-तक्षक नागों के, ऐरावत दिग्गजों के, गरुड पक्षियों के, उच्चैःश्रवा अश्वराज, सिंह मृगों में, वृषभ गौओं में, शरभ मृगाधिपों में, गुह सेनापति, और लकुलीश श्रुति-स्मृति के अधिपति कहे गए। अंत में पृथु को पृथ्वी पर प्रतिष्ठित कर, महेश्वर शंकर वृषभध्वज को सर्वाधिष्ठाता और चतुर्मूर्ति में सर्वज्ञ बताकर, शिव-प्रसाद पर आश्रित समस्त अभिषेक-क्रम का निष्कर्ष दिया जाता है।

17 verses

Adhyaya 59

Adhyaya 59 — सूर्याद्यभिषेककथनम् (Surya and Related Abhisheka/ Cosmological Determinations)

पूर्वकथन सुनकर ऋषि सूत रोमहार्षण से फिर पूछते हैं कि ज्योतियों—विशेषतः सूर्य और चन्द्र—की गति और कार्यों का निश्चित, विस्तृत निर्णय बताइए। सूत कर्म-विषय से आगे बढ़कर कारण-तत्त्व समझाते हैं और अग्नि के तीन भेद बताते हैं—सौर, पार्थिव और वारीगर्भ/वैद्युत—जो परस्पर प्रवेश करके एक-दूसरे का पोषण करते हैं। सूर्य किरणों द्वारा जल ‘पीकर’ दिन-रात का परिवर्तन तथा ऋतुओं के फल—उष्णता, वर्षा, शीत—उत्पन्न करता है। नाड़ी-मार्ग, किरणों के वर्ग और उनके परिणाम (वर्षा, ओस/पाला, ताप) का वर्णन कर मासानुसार सूर्य के नाम/अधिपति और किरण-संख्या गिनाई जाती है। अंत में चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रों को सूर्य-जन्य बताकर सूर्य-चन्द्र को भगवान के नेत्र कहा गया है, जिससे आगे शैव पवित्र-क्रम और अभिषेक-तत्त्व का संबंध स्पष्ट हो।

45 verses

Adhyaya 60

सूर्यरश्मिस्वरूपकथनम् (Surya-Rashmi Svarupa Kathana)

सूत जी पाँच ग्रहों के देवतात्मक स्वरूप का संक्षेप में निर्देश देकर ग्रह-नक्षत्र व्यवस्था का आधिदैविक आधार बताते हैं। वे आदित्य को समस्त काल-गणना का मूल ठहराकर क्षण से युग तक सब कुछ सूर्याधीन कहते हैं; सूर्य के बिना नियम, दीक्षा, अह्निक कर्म, ऋतु-विभाग, पुष्प-फल-धान्य की उत्पत्ति और लोक-व्यवहार भी संभव नहीं—यह तर्कपूर्वक स्थापित करते हैं। सूर्य को ‘रुद्ररूप’ तथा ‘द्वादशात्मा प्रजापति’ कहा गया है, जिससे शिव का नियन्तृत्व ज्योति-तत्त्व में प्रतिष्ठित होता है। आगे सहस्ररश्मि सूर्य की सात श्रेष्ठ रश्मियाँ—सुषुम्ना, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, संनद्ध, सर्वावसु, स्वराट्—ग्रह-योनियाँ बताई गई हैं, जिनसे बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनैश्चर आदि का पोषण-वर्धन होता है। यह अध्याय सूर्य-शिव-प्रकाश के द्वारा जगत-व्यवस्था को दृढ़ कर आगे के विस्तृत ज्योतिषीय/आधिदैविक विवेचन की भूमिका बनाता है।

26 verses

Adhyaya 61

Adhyaya 61 — ग्रह-नक्षत्र-स्थाननिर्णयः (Cosmic Abodes of Luminaries and the Shaiva Order of Time)

सूत बताते हैं कि कल्प के आरम्भ में स्वयम्भू ने सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रों को रचा, जो मन्वन्तरों में देव-उपस्थितियों के ‘गृह/स्थान’ बनकर प्रलय तक टिके रहते हैं। अध्याय में ‘सवितृ’ आदि नामों की व्युत्पत्ति, सूर्य-मण्डल की तेजोमयता और चन्द्र-मण्डल की ज्योति-जलमय प्रकृति का वर्णन है। फिर ग्रह-निवासों का क्रम—सौर, सौम्य, शौक्र, बृहस्पति, लोहित (मंगल), शनैश्चर, बौध (बुध) तथा स्वर्भानु/राहु—उनके वर्ण, किरण-लक्षण और योजनों के अनुपात सहित बताया गया है। कुछ ग्रहों के नक्षत्र-सम्बन्ध, राहु का अन्धकारमय स्थान और सूर्य-चन्द्र के सापेक्ष उसकी गति से ग्रहण-सदृश विधान भी समझाया गया है। अंत में शैव मत प्रतिपादित होता है कि यह सम्पूर्ण ज्योतिष-व्यवस्था महादेव ने लोक-व्यवहार और विवेक के लिए रची है, जिसे शास्त्र, प्रत्यक्ष, अनुमान और अनुशासित परीक्षा से प्रमाणित कर आगे धर्म-समर्थन और शिवोन्मुख मुक्ति की भूमिका बनाई जाती है।

63 verses

Adhyaya 62

ग्रहसंख्यावर्णनम् — ध्रुवस्य तपोबलात् ध्रुवस्थानप्राप्तिः

ऋषि सूत से पूछते हैं कि विष्णु की कृपा से ध्रुव ‘ग्रहों की मेढ़ी’ अर्थात ध्रुव-केन्द्र कैसे बने। सूत मार्कण्डेय की कथा सुनाते हैं—राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव को सुरुचि ने तिरस्कृत किया; शोक में ध्रुव ने माता सुनीति के उपदेश से वन गमन किया। विश्वामित्र के बताए प्रणवयुक्त ‘नमोऽस्तु वासुदेवाय’ मंत्र का जप करते हुए ध्रुव ने एक वर्ष शाक-मूल-फलाहार से तप किया; राक्षस-वेताल आदि विघ्न भी उसे डिगा न सके। तब गरुड़ारूढ़ विष्णु आए, शंख-स्पर्श से ज्ञान दिया; ध्रुव ने स्तुति कर वर माँगा, विष्णु ने ध्रुवस्थान प्रदान किया। देव-गंधर्व-सिद्धों सहित ध्रुव माता के साथ उस स्थान पर प्रतिष्ठित हुए; फलश्रुति—वासुदेव-प्रणाम से ध्रुवत्व/ध्रुवसालोक्य की प्राप्ति।

42 verses

Adhyaya 63

Adhyaya 63: Daksha’s Progeny, Kashyapa’s Offspring, and the Rishi-Vamshas that Sustain the Worlds

ऋषियों के पूछने पर सूत सृष्टि के क्रम का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि दक्ष के बाद प्रजा-विस्तार मुख्यतः मैथुनी (स्त्री-पुरुष संयोग) से होता है। नारद के उपदेश से दक्ष के पहले दो पुत्र-समूह—हऱ्यश्व और शबल—दिशाओं में फैलकर लौटते नहीं; तब दक्ष साठ कन्याएँ उत्पन्न कर उन्हें धर्म, कश्यप, सोम, अरिष्टनेमि, भृगु-पुत्र, कृशाश्व और अङ्गिरा को देता है। इन विवाहों से विश्वेदेव, साध्य, मरुत, आठ वसु (नाम सहित) और ग्यारह रुद्र (नाम सहित) प्रकट होते हैं। फिर कश्यप की पत्नियों से आदित्य, दैत्य (हिरण्यकशिपु/हिरण्याक्ष), दानव, पक्षी, पशु, गरुड़-अरुण, प्रमुख नाग, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराएँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं। आगे ऋषि-वंशों का प्रसंग आता है—पुलस्त्य से विश्रवा और राक्षस-वंश; अत्रि की परम्परा में सोम, दत्तात्रेय, दुर्वासा; वसिष्ठ से पराशर, व्यास और शुक। ये विस्तृत कुल सूर्य-किरणों की भाँति तीनों लोकों में व्याप्त हैं और आगे के धर्मोपदेश तथा शिव-प्रधान मोक्षमार्ग की भूमिका बनते हैं।

95 verses

Adhyaya 64

देवादिसृष्टिकथनम् (वसिष्ठशोकः, पराशरजन्म, एकलिङ्गपूजा, रुद्रदर्शनम्)

ऋषि सूत से पूछते हैं कि वसिष्ठ-पुत्र शक्ति को राक्षस ने कैसे खा लिया। सूत बताते हैं कि विश्वामित्र के उकसाने पर रुधिर-राक्षस कल्माषपाद रूप धारण कर वसिष्ठ-कुल को सताता है और शक्ति अपने भाइयों सहित भक्षित हो जाता है। यह सुनकर वसिष्ठ अरुंधती के साथ शोक में प्राणत्याग का निश्चय करते हैं, पर बहू अदृश्यन्ती गर्भस्थ पुत्र के लिए देह धारण रखने की प्रार्थना करती है। गर्भ में ही पराशर ऋग्वाणी प्रकट करते हैं; विष्णु प्रकट होकर वसिष्ठ को शोक त्यागने का उपदेश देते हैं कि यह रुद्रभक्त पुत्र कुल का उद्धार करेगा। दसवें मास पराशर का जन्म होता है; अदृश्यन्ती शक्ति-स्मरण कर विलाप करती है। पराशर मिट्टी से ‘एकलिङ्ग’ बनाकर रुद्रसूक्त, त्वरितरुद्र, नीलरुद्र, पंचब्रह्म, लिङ्गसूक्त, अथर्वशिर आदि से शिव-पूजा करते हैं; शिव उमा-गणों सहित दर्शन देकर पिता का भी दर्शन कराते हैं। आगे पराशर राक्षस-कुल दहन को उद्यत होते हैं, किंतु वसिष्ठ क्षमा-धर्म सिखाकर उन्हें रोक देते हैं। पुलस्त्य के आगमन से पराशर को पुराण-कर्तृत्व का वर मिलता है और आगे धर्म-पुराण परम्परा का प्रवाह स्थापित होता है।

123 verses

Adhyaya 65

वासिष्ठकथनम् (आदित्य–सोमवंशवर्णनम् तथा रुद्रसहस्रनाम-प्रशंसा)

नैमिषारण्य में ऋषि सूत रोमहर्षण से आदित्यवंश और सोमवंश का संक्षिप्त वर्णन पूछते हैं। सूत कश्यप–अदिति से सूर्यवंश का प्रसंग आरम्भ कर संज्ञा, छाया और प्रभा—इन तीन पत्नियों की कथा कहते हैं। छाया-पुत्रों के प्रति पक्षपात से क्रुद्ध यम छाया को मारता है; छाया के शाप से उसके पाँव में विकार होता है, फिर गोकर्ण में महादेव की आराधना से शापमुक्त होकर वह लोकपाल और पितृ-स्वामी बनता है—शिव-अनुग्रह से धर्म-व्यवस्था का संकेत मिलता है। संज्ञा के अश्वरूप से अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति तथा त्वष्टा द्वारा सुदर्शनचक्र-निर्माण (रुद्र-प्रसाद से सम्बद्ध) का वर्णन आता है। आगे वैवस्वत मनु की संतति, इला/सुद्युम्न का स्त्री-पुरुष रूप-परिवर्तन, बुध के साथ ऐल पुरूरवा से सोमवंश-वृद्धि, और इक्ष्वाकुवंश में मान्धाता–पुरुकुत्स आदि की परम्परा बताई जाती है। अंत में तण्डिन-प्रसंग से रुद्र-सहस्रनाम जप की महिमा—गणपत्य-प्राप्ति, सहस्र अश्वमेध के तुल्य फल और महापाप-नाश—कहकर अध्याय शैव स्तोत्र-जप साधना का सेतु बनता है।

175 verses

Adhyaya 66

अध्याय 66: इक्ष्वाकुवंश-ऐलवंशप्रवाहः (त्रिशङ्कु-राम-ययात्यादि-प्रकरणम्)

सूत त्रिधन्वा के प्रसंग से आरम्भ कर सत्यव्रत (त्रिशंकु) की पतन‑उत्थान कथा कहते हैं—पिता का त्याग, वसिष्ठ का कोप, विश्वामित्र द्वारा राज्याभिषेक और देह सहित स्वर्गारोहण। फिर इक्ष्वाकुवंश की दीर्घ परम्परा—हरिश्चन्द्र, सगर, भगीरथ, दशरथ, राम, कुश‑लव आदि—का संक्षेप वर्णन है और बताया गया है कि पाशुपत ज्ञान का अध्ययन, शिव‑समर्चन तथा विधिपूर्वक यज्ञकर्म करके वे दिव्य लोक को गए। आगे ऐलवंश में पुरूरवा, नहुष, ययाति, देवयानी‑शर्मिष्ठा की संतानों का विभाग, तथा जनमेजय के गर्गशाप से रथनाश पर प्रायश्चित्त और अश्वमेध से शुद्धि आदि कर्मफल‑राजधर्म का प्रवाह आता है। उत्तरार्ध में पुरु के राज्याभिषेक पर वर्णों का धर्मयुक्त तर्क-वितर्क देकर अध्याय समाप्त होता है, जिससे आगे राजधर्म‑न्यायनिर्णय की भूमिका बनती है।

83 verses

Adhyaya 67

ययातिना पूरौ राज्याभिषेकः, दिक्प्रदानं, तृष्णा-वैराग्योपदेशः, वनप्रवेशः च

इस अध्याय में ययाति सभा में उपस्थित वर्णों और वृद्धों से कहते हैं कि अवज्ञा और प्रतिकूल स्वभाव के कारण ज्येष्ठ यदु राज्य के योग्य नहीं, जबकि माता-पिता की आज्ञा मानने वाला पूरु प्रशंसनीय है। शुक्राचार्य के वरदान का स्मरण कराते हुए—आज्ञाकारी पुत्र ही राज्य का भार वहन करेगा—ययाति जनसम्मति से पूरु का राज्याभिषेक करते हैं। फिर पृथ्वी को जीतकर दिशानुसार राज्य-विभाग करते हैं—तुर्वसु को आग्नेय, यदु को दक्षिण, और द्रुह्यु तथा अनु को पश्चिम/उत्तर की ओर देते हैं। आगे ययाति की गाथाओं में उपदेश है कि भोग से तृष्णा शांत नहीं होती, घी से बढ़ती अग्नि की तरह बढ़ती है; ब्रह्म-प्राप्ति के लक्षण—मन, वाणी, कर्म से अहिंसा, द्वेष-रहितता और निर्भयता—बताए गए हैं; देह बूढ़ा होता है पर तृष्णा अजर रहती है। अंत में ययाति रानी सहित वन में जाकर भृगुतुंग पर तप करते हैं, स्वर्ग प्राप्त करते हैं; इस कथा के श्रवण-कीर्तन से शुद्धि और शिवलोक में उत्कर्ष का फल कहा गया है।

28 verses

Adhyaya 68

यदुवंश-प्रवचनम्: हैहय-क्रोष्टु-वंशविस्तारः (कृतवीर्यार्जुनादि, ज्यामघ-विदर्भ-शात्वत-पर्यन्तम्)

सूत ययाति-प्रसंग से आगे बढ़कर यदुवंश का संक्षिप्त किन्तु क्रमबद्ध वंश-वर्णन करते हैं। हैहय धारा सहस्रजित्→शतजित्→हैहय आदि से चलकर सहस्रबाहु और सार्वभौम्य-प्रतापी कर्तवीर्यार्जुन पर पहुँचती है। फिर वीतिहोत्र, भोज, अवन्ति, शूरसेन, तालजंघ आदि शाखाओं का उल्लेख कर यह बताया जाता है कि जनपद/गण-नाम अपने-अपने पूर्वजों से कैसे प्रसिद्ध हुए। क्रोष्टु शाखा का परिचय भी आता है, जिसमें आगे चलकर वृष्णिकुल-गौरव के रूप में विष्णु का अवतार प्रकट होता है। शशबिन्दु के अश्वमेधादि यज्ञ और महादान, फिर ज्यामघ का निर्वासन व नर्मदा-तट पर निवास, पत्नी शैब्या का देर से पुत्र-प्रसव और विदर्भ वंश की स्थापना वर्णित है। अंत में सत्त्व/सात्वत कुल से संबंध जोड़कर फलश्रुति कही गई है कि ज्यामघ-वंश का पाठ-श्रवण स्वर्ग, समृद्धि और कल्याण देता है।

51 verses

Adhyaya 69

वंशानुवर्णनम् — सात्वतवंशः, स्यमन्तक-प्रसङ्गः, कृष्णावतारः, शिवप्रसादः (पाशुपतयोगः)

सूतजी सात्वत वंश की चार पुत्र-परंपरा (भजन, भ्राजमान, देवावृध, अन्धक) का विस्तार से वर्णन करते हैं। देवावृध की कीर्ति, बभ्रु की प्रशंसा, फिर वृष्णि–शिनि–श्वफल्क–अक्रूर आदि की वंशावली तथा सत्राजित, सूर्य, स्यमन्तक मणि, प्रसेन और मृगया का प्रसंग संकेत रूप से आता है। आगे आहुक, उग्रसेन, देवक, वसुदेव, देवकी, रोहिणी तक वंश-प्रवाह, राम-कृष्ण का अवतरण, कंस का भय, योगनिद्रा-कौशिकी, वसुदेव द्वारा शिशु-परिवर्तन, कंस-वध, कृष्ण की पुत्र-परंपरा और रुक्मिणी-जाम्बवती संबंध वर्णित हैं। शैव-केन्द्र में जाम्बवती के पुत्रार्थ कृष्ण का तप, व्याघ्रपाद आश्रम गमन, पाशुपत-योग दीक्षा, रुद्र का वरदान और साम्ब की प्राप्ति कही गई है। अंत में वृष्णिकुल का उपसंहार, प्रभास में स्थिति, जराव्याध के छल से देहत्याग तथा पाठ-श्रवण से वैष्णव लोक-प्राप्ति की फलश्रुति दी गई है।

94 verses

Adhyaya 70

Adhyaya 70: आदिसर्गः—महत्-अहङ्कार-तन्मात्रा-भूतसृष्टिः, ब्रह्माण्डावरणम्, प्रजासर्गः, त्रिमूर्ति-शैवाधिष्ठानम्

ऋषियों के आग्रह पर सूत ‘अपूर्ण रूप से बताए’ गए आदिसर्ग का विस्तार करते हैं। वे महादेव को प्रकृति‑पुरुष से परे सिद्ध करके अव्यक्त से महत् (मन/मति/बुद्धि/ख्याति/संविद आदि) की उत्पत्ति, उसके कार्य और नामार्थ बताते हैं। रजोगुणयुक्त अहंकार से सृष्टि की त्रिविध धारा निकलती है—तामस से तन्मात्राएँ और फिर महाभूत क्रमशः (आकाश→वायु→तेज→आप→पृथ्वी), तथा सात्त्विक (वैकारिक) से इन्द्रियाँ और मन। भूतों के परस्पर मिश्रण, ब्रह्माण्ड की रचना और उसके आवरणों का वर्णन कर उन स्तरों में शिव के रूपों का अधिष्ठान बताया जाता है। त्रिमूर्ति को महादेव से प्रकट मानकर कल्प‑मन्वन्तर, वराह द्वारा पृथ्वी का उद्धार और ब्रह्मा का प्रजासर्ग—देव, असुर, पितृ, मनुष्य, यक्ष‑राक्षस, सर्प, गन्धर्व, पशु तथा यज्ञ‑संस्थाएँ—कहा गया है। अंत में रुद्र‑सृष्टि, शिव का स्थाणु‑स्वरूप, अर्धनारीश्वर और देवी‑नामों के रक्षात्मक‑पुण्यदायी पाठ से अध्याय शैव‑भक्ति और मोक्ष‑प्रतिज्ञा के साथ पूर्ण होता है।

348 verses

Adhyaya 71

Adhyaya 71: पुरत्रयवृत्तान्तः—ब्रह्मवरदानम्, मयकृतत्रिपुर-निर्माणम्, विष्णुमाया-धर्मविघ्नः, शिवस्तुति, त्रिपुरदाहोपक्रमः

ऋषि सूत से पूछते हैं कि त्रिपुर-दाह का रहस्य क्या है—पशुपति ने एक ही दिव्य बाण से तीनों पुर कैसे जलाए और पहले देवताओं के आक्रमण क्यों विफल हुए। सूत बताते हैं कि तारकासुर के वध के बाद उसके पुत्र विद्युनमाली, तारकाक्ष और कमलाक्ष ने घोर तप किया और ब्रह्मा से शर्तयुक्त वर पाया—तीनों नगर जब एक साथ मिलें, तभी वे केवल एक बाण से मारे जा सकेंगे। मय दानव ने स्वर्ग में स्वर्ण, अंतरिक्ष में रजत और पृथ्वी पर लौह—ऐसे तीन दुर्ग-नगर बनाए, जो मानो त्रिलोकी के प्रतिद्वन्द्वी थे। त्रिपुरवासी धर्मशील और शिवभक्त (लिंग-पूजक) थे, इसलिए देवताओं का सामान्य बल उन पर नहीं चला। तब विष्णु ‘धर्म-विघ्न’ करते हैं—मायावी आचार्य और मोहक, श्रौत-स्मार्त-विरोधी शास्त्र रचकर दैत्यों को शिव से विमुख कर देते हैं; लक्ष्मी चली जाती हैं और अधर्म फैलता है। शिव-पूजा टूटते ही विष्णु और देव महादेव को परम, सर्वव्यापी तत्त्व मानकर स्तुति करते हैं। शिव योजना स्वीकार कर नंदी से रथ, सारथि, धनुष और बाण की तैयारी कराते हैं—और त्रिपुर-दाह का उपक्रम आरम्भ होता है।

163 verses

Adhyaya 72

Adhyaya 72 — Puradāha: Rudra’s Cosmic Chariot, Pāśupata-Vrata, and Brahmā’s Shiva-Stuti

सूत बताते हैं कि त्रिपुर-वध के लिए विश्वकर्मा ने ऐसा दिव्य रथ बनाया जिसके अंग-प्रत्यंग ब्रह्माण्ड के प्रतीक हैं—सूर्य-चन्द्रमा उसके चक्र, ऋतुएँ और काल-खंड उसके अवयव, पर्वत-समुद्र उसके आधार। ऋषियों, अप्सराओं और गणों की स्तुति के बीच शिव रथ पर आरूढ़ होते हैं। गणेश पहले विघ्न उत्पन्न करते हैं, फिर पूजित होकर प्रसन्न होते हैं—इससे बड़े कर्मों से पूर्व विनायक-पूजा की अनिवार्यता स्थापित होती है। ‘पशुत्व’ की घोषणा से देव भयभीत होते हैं, पर शिव समझाते हैं कि पाशुपत-व्रत जीवों को बंधन से मुक्त करता है। सेना जुटने पर भी ग्रंथ शिव की सहज प्रभुता दिखाता है—वे केवल दृष्टि से त्रिपुर को भस्म कर सकते हैं, फिर भी लीला-वश धनुष और पाशुपत-अस्त्र से कार्य करते हैं। ब्रह्मा ओंकार, पंचब्रह्म-रूप, योग (प्रत्याहार से समाधि) तथा लिंग/अलिंग तत्त्व को जोड़कर विस्तृत शिव-स्तुति करते हैं। प्रसन्न शिव वर देते हैं—ब्रह्मा सारथी बनते हैं, विष्णु वाहन; अंत में फलश्रुति सुनने से पवित्रता, विजय और समृद्धि का वचन देकर आगे के शैव भक्ति, व्रत और मुक्तिदायक स्तुति-उपदेशों की भूमिका बाँधती है।

184 verses

Adhyaya 73

Adhyaya 73 — त्रिपुरदाहे ब्रह्मस्तवः (Brahmā’s Hymn in the Context of Tripura’s Burning)

सूत कहते हैं कि महादेव ने त्रिपुर को क्षणभर में भस्म कर दिया। तब ब्रह्मा इन्द्र और समस्त देवों से बोले कि तारकाक्ष, कमलाक्ष, विद्युन्माली आदि दैत्य लिङ्गमूर्ति शिव की भक्ति छोड़कर माया पर आश्रित हुए, इसलिए नष्ट हुए। ब्रह्मा लिङ्ग-पूजा को नित्य कर्तव्य बताते हैं; जगत् लिङ्ग से व्याप्त है और सब उसी में प्रतिष्ठित है। वे देव, असुर, यक्ष, सिद्ध, पितर, मुनि, राक्षस आदि के लिङ्गार्चन से सिद्धि पाने का वर्णन करते हैं। फिर साधना का उपदेश आता है—पशुभाव को पहचानकर पाशुपत-व्रत से उसका अतिक्रमण, प्रणवयुक्त प्राणायाम से शुद्धि, तत्त्व-शुद्धि (गुण, अहंकार, तन्मात्रा, भूत, इन्द्रियाँ) और भस्म-धारण। अंत में वे कहते हैं कि शिव का निरंतर स्मरण-पूजन पाप से रक्षा करता है और भोग तथा दिव्य पद देता है; तब शक्र सहित देव भस्म-लिप्त पाशुपत होकर शिव की आराधना करते हैं।

29 verses

Adhyaya 74

Vibhaga 1, Adhyaya 74 — ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधिः (Materials, Classes, and Fruits of Linga-Worship)

इस अध्याय में सूतसंवाद के अंतर्गत ब्रह्मा द्वारा कथित लिङ्गार्चन-विधि का विशेष अंग बताया गया है। विश्वकर्मा ने ब्रह्मा की आज्ञा से देवताओं के अधिकारानुसार भिन्न-भिन्न द्रव्यों के लिङ्ग बनाए—विष्णु के लिए इन्द्रनील, इन्द्र के लिए पद्मराग, वरुण के लिए स्फटिक, सोम के लिए मोती, दैत्यादि के लिए लोहे का, मातृगण के लिए बालुका का, रुद्रों के लिए भस्म का, मुनियों के लिए कुशाग्र का आदि। फिर ‘षड्विध लिङ्ग’ का वर्गीकरण—शैलज (४), रत्नज (७), धातुज (८), दारुज (१६), मृन्मय (२), क्षणिक (७)—और प्रत्येक के फल बताए गए। ध्यान में लिङ्ग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, ऊपर रुद्र और उसके ऊपर प्रणवस्वरूप सदाशिव का निरूपण है; वेदी में त्रिगुणात्मिका महादेवी की प्रतिष्ठा भी कही गई है। लिङ्गस्थापन के महान फल, लोक-क्रम में उन्नति और तेज की वृद्धि वर्णित है तथा अंत में सकल-निष्कल शिव-भावना का भेद—साधकों के लिए सकल रूप पूज्य, योगियों के लिए निष्कल शिव ध्येय—कहकर अध्याय पूर्ण होता है।

30 verses

Adhyaya 75

Adhyaya 75: Nishkala–Sakala Shiva, Twofold Linga, and the Supremacy of Dhyana-Yajna

ऋषियों के प्रश्न पर—निष्कल, नित्य शिव ‘सकल’ रूप में कैसे प्रतीत होते हैं—सूता ज्ञान के भिन्न किन्तु संगत मत बताता है: कोई प्रणव-केन्द्रित साक्षात्कार को ज्ञान मानता है, कोई भ्रान्तिरहित बोध को, और कोई गुरु-प्रसाद से प्रकाशित निरविकल्प, निरालम्ब शुद्ध चेतना को। मोक्ष ज्ञान से जुड़ा है, प्रसाद से परिपक्व होता है और योग से स्थिर। फिर शिव का विश्व-देह-न्यास दिया है—आकाश सिर, सूर्य-चन्द्र-अग्नि नेत्र, दिशाएँ कान आदि—जिससे भक्ति-कल्पना में अद्वैत तत्त्व प्रकट होता है। साधना-क्रम बताया: कर्म-यज्ञ < तपो-यज्ञ < जप-यज्ञ < ध्यान-यज्ञ; ध्यान से शिव की निकटता अनुभव होती है। बाह्य स्थूल लिङ्ग कर्मकाण्डियों के लिए है, सूक्ष्म अन्तर्लिङ्ग ज्ञानियों को प्रत्यक्ष; केवल बाह्य आरोपण बिना अन्तर्बोध के निष्फल कहा गया है। अंत में समाधान: जो कुछ दिखता है वह शिव ही है, भेद केवल आभास; शिव का त्रिविध शरीर—निष्कल, सकल-निष्कल, सकल—उपासक को रूप-पूजा से ध्यानमय अद्वैत की ओर ले जाता है और आगे यन्त्र-रेखाओं में पूजारूप व योग-दर्शन की भूमिका बाँधता है।

39 verses

Adhyaya 76

स्वेच्छाविग्रहसंभव-प्रतिष्ठाफलवर्णनम् (विविधशिवमूर्तिप्रतिष्ठा, लोक-फल, शिवसायुज्य)

सूता पूर्वभाग की शिव-प्रधान चर्चा को सिद्धान्त से कर्म-आचरण की ओर ले जाते हैं। वे भक्ति और विधि से शिव के स्वेच्छा-प्रकट विग्रहों की प्रतिष्ठा का फल बताते हैं—स्कन्द-उमा सहित स्थापना से दिव्य विमान, अनेक लोकों में भोग और अंततः मोक्ष। फिर ध्यान में शिव-देह को तत्त्वों और भूतों की मातृका कहा गया है—प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ और पंचभूत शिव-लीला रूप सृष्टि हैं। आगे नन्दी सहित, दिगम्बर श्वेत कपालधारी, उग्र-रक्षक, अर्धनारीश्वर, गुरु-रूप लकुलीश्वर, भस्म-लिप्त कपालधारी आदि मूर्तियों के विधान और मंत्र-प्रधान साधना, विशेषतः “ॐ नमो नीलकण्ठाय” का निर्देश है। अंत में जालन्धरान्तक और त्रिपुरान्तक रूप, तथा ब्रह्मा-विष्णु-स्थापन सहित लिङ्ग-कौस्मोग्र का वर्णन कर कहा गया है कि सम्यक् प्रतिष्ठा से शिवलोक और शिवसायुज्य प्राप्त होता है; आगे के शैव आचार-विधानों की भूमिका बनती है।

64 verses

Adhyaya 77

Shivamurti–Pratishtha Phala: Shivalaya-Nirmana, Kshetra-Mahatmya, Tirtha-Snana, and Mandala-Vidhi

ऋषि सूत से लिंग-प्रतिष्ठा का पुण्य और मिट्टी से रत्न तक शिवालय-निर्माण के फल पूछते हैं। सूत बताता है कि सामर्थ्य से बढ़कर भक्ति है—साधारण कुटी या छोटा मंदिर भी श्रद्धा से पूजने पर रुद्रलोक देता है, और कैलास/मंदर/मेरु-रूप भव्य प्रासाद दिव्य भोग देकर अंततः ज्ञान-योग से शिव-सामीप्य कराते हैं। नागर, द्राविड, केसर आदि शैलियों का वर्णन है; टूटे मंदिरों का जीर्णोद्धार और देवालय-सेवा को विशेष पुण्य कहा गया है। फिर शिव-क्षेत्र की मर्यादा और वे प्रसिद्ध क्षेत्र बताए गए हैं जहाँ मृत्यु से मुक्ति मिलती है; दर्शन, स्पर्श, प्रदक्षिणा तथा तीर्थ-स्नान/अभिषेक के क्रमशः बढ़ते फल बताए जाते हैं। अंत में कमल और षट्कोण मंडलों में प्रकृति, गुण, भूत, इंद्रियाँ, अहंकार, बुद्धि, आत्मा आदि तत्त्वों का विन्यास कर मंडल-विधि बताई जाती है और व्यक्त-अव्यक्त शिव-पूजा को परम मोक्ष-साधन कहकर आगे के ‘सर्वकामार्थ-साधन’ कर्मों की भूमिका बाँधी जाती है।

106 verses

Adhyaya 78

उपलेपनादिकथनम् (Vastraputa-jala, Ahimsa, and Conduct in Shiva Worship)

सूतजी कहते हैं—शिवक्षेत्र में उपलेपन, अभ्युक्षण और स्नान/अभिषेक आदि कर्म केवल ‘वस्त्रपूत’ (कपड़े से छना) जल से ही करने चाहिए; अशुद्ध जल में सूक्ष्म जीवों के संसर्ग से पाप का भय होता है, इसलिए देवकर्म शुद्ध जल से ही सिद्ध होते हैं। गृहस्थ के झाड़ू-बुहार, काटना, पीसना, जल-संग्रह आदि में हिंसा की संभावना बताकर ‘अहिंसा परो धर्मः’ का प्रतिपादन किया गया है; अहिंसक का फल वेदपारंगत के फल से करोड़ गुना कहा गया है और दया व भूतहित की प्रशंसा की गई है। शिवपूजा में पुष्प-हिंसा ‘शिवार्थ’ अपवाद रूप से अनुमत है, पर निषिद्ध हिंसा त्याज्य है, विशेषतः संन्यासी ब्रह्मवादियों के लिए। पाषण्डियों का सामाजिक सीमांकन कर, सत्संग मात्र से भी महेश्वर-पूजन द्वारा रुद्रलोक-प्राप्ति का भक्ति-प्रधान उपसंहार किया गया है।

26 verses

Adhyaya 79

Adhyaya 79 — Bhakti-Mahima and Linga-Archana-Vidhi (Condensed Ritual Sequence)

ऋषि पूछते हैं कि अल्पायु और सीमित सामर्थ्य वाले मनुष्य महादेव की उपासना कैसे करें, जिन्हें देवता भी दीर्घ तप से ही देख पाते हैं। सूत कहते हैं—यह शंका उचित है, पर शिव श्रद्धा से ही सुलभ हैं; श्रद्धा से उनका ‘दर्शन’ होता है और वे उपासक की अंतःस्थिति के अनुसार फल देते हैं। अशुद्ध या कुटिल भाव से की गई पूजा के नीच फल बताए गए, फिर शुद्ध मार्ग का संक्षिप्त क्रम दिया गया—लिंग और आसन की शुद्धि, आवाहन, अर्घ्यादि उपचार, पवित्र द्रव्यों से अभिषेक, चंदन-पुष्प विशेषतः बिल्व से अलंकरण, धूप और विविध नैवेद्य, प्रदक्षिणा तथा बार-बार नमस्कार। अंत में ईशान, तत्पुरुष/पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजात—पंचब्रह्म मंत्रों से शिव-पूजन का विधान है। दर्शन, श्रवण, अनुमोदन या घृतदीप-दान, विशेषकर कार्त्तिक में, उत्तम लोक और अंततः शिवसायुज्य प्रदान करता है; यह अध्याय भक्ति-तत्त्व से नित्य लिंगार्चना की व्यवहारिक विधि तक सेतु बनता है।

37 verses

Adhyaya 80

शिवार्चनविधिः — देवतानां पाशुपतव्रतप्राप्तिः तथा पशुपाशविमोक्षणम् (अध्याय ८०)

ऋषि सूत से पूछते हैं—देवता पशुपति शिव को देखकर ‘पशुत्व’ कैसे छोड़कर पाश से मुक्त हुए? सूत कहते हैं—प्राचीन काल में देवता ब्रह्मा के साथ गरुड़ारूढ़ हरि के संग मेरु–कैलास प्रदेश गए। मेरु और शिव के दिव्य नगर का वर्णन करके वे रत्नमय प्राकारों, विमानों, नृत्य-गीत, अप्सराओं, गणेशालयों तथा तड़ाग-वापियों से शोभित शिवधाम में प्रवेश करते हैं। परमेश्वर के विमान-द्वार पर शिलादतनय नंदी को प्रणाम कर वे पशुपाश-विमोचन हेतु महेश्वर-दर्शन की याचना करते हैं। नंदी पाशुपत-व्रत का रहस्य बताता है—इस व्रत से पशुत्व नहीं रहता; बारह दिन/मास/वर्ष तक करने से पाश कटता है। फिर नंदी उन्हें शंभु के समीप ले जाता है; महेश्वर उनके पशुत्व का शोधन कर स्वयं पाशुपत-व्रत का उपदेश देते हैं। अम्बा सहित भव देवताओं पर कृपा कर उन्हें पाशुपत बनाते हैं; बारह वर्ष पूर्ण होने पर वे मुक्त होकर अपने स्थान को जाते हैं। अध्याय शिवार्चन, दीक्षा और प्रसाद-क्रम स्थापित कर आगे के शैव-व्रतों को मोक्ष-साधन रूप में दृढ़ करता है।

60 verses

Adhyaya 81

Pāśupata-vrata Māhātmya: Dvādaśa-Liṅga Mahāvrata, Month-wise Dravya, and Pūjā-krama

ऋषि बंधन-मोचन करने वाले प्राचीन पाशुपत लिंग-व्रत का विस्तार पूछते हैं। सूत नंदी के संक्षिप्त उपदेश का वर्णन करते हैं, जो सनत्कुमार को पूर्व में प्रकट हुई परंपरा पर आधारित है; यह व्रत बड़े वैदिक यज्ञों से भी श्रेष्ठ, लोक-कल्याण और मोक्ष दोनों देने वाला कहा गया है। फिर पूजा-क्रम बताया जाता है—छोटा लिंग बनाकर स्नान कराना, (श्रेष्ठतः) स्वर्ण-रत्नजटित कमल-पीठ पर स्थापित करना, गायत्री सहित बिल्वपत्र, कमल व अन्य पुष्प अर्पित करना, तथा गंध, धूप, दीप, नीराजन करना। दिशाओं में शिव के पंचवक्त्र मंत्र (ईशान, तत्पुरुष/पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजात) के अनुसार अर्पण होते हैं; पायस, महाचरु आदि नैवेद्य और धर्मयुक्त उपहार बताए गए हैं। मासानुसार लिंग-द्रव्य—वज्र, मरकत, मौक्तिक, नीलम, पद्मराग, गोमेद, प्रवाल, वैदूर्य, पुष्पराग, सूर्यकांत, स्फटिक—और सरल विकल्प (चाँदी, ताँबा/लोहा, पत्थर, लकड़ी, मिट्टी) दिए गए हैं। संयम-नियम, पूर्णिमा/अमावस्या उपवास, वर्षांत में गो-दान व वृषोत्सर्ग, तथा पूजित लिंग की प्रतिष्ठा/दान से व्रत पूर्ण होता है; अंत में शिवलोक और इच्छित सिद्धियों का फल कहा गया है।

58 verses

Adhyaya 82

अध्याय ८२ — व्यपोहनस्तवः (पापव्यपोहन-स्तोत्रम्)

नैमिषारण्य में सूत ऋषियों को व्यपोहन-स्तोत्र की परम्परागत प्रामाणिकता बताते हैं—नन्दी के मुख से कुमार ने सुनकर व्यास को कहा और वही सूत ने पुनः सुनाया। स्तोत्र के आरम्भ में शिव के परमात्मस्वरूप, पञ्चवक्त्र-पञ्चब्रह्म रूप, सर्वव्यापक शान्त ज्ञानस्वरूप का ध्यान कर पाप-नाश की प्रार्थना की जाती है। फिर देवी के अनेक नाम-रूप (दाक्षायणी, उमा, गौरी, कौशिकी आदि) तथा नन्दी, भृङ्गी, स्कन्द, वीरभद्र, मातृगण सहित शिवपरिवार को लेकर व्यापक ‘शिवभक्त-मण्डल’ का उद्घोष होता है। आगे आदित्य, वायु-तत्त्व, सिद्ध-यक्ष-नाग-विद्याधर, ऋषि-पितृ-अप्सरा, ग्रह-राशि-नक्षत्र, भूत-प्रमथ आदि सबको शिवपूजा-परायण बताकर शिवभक्ति को लोक-तत्त्व और देवताओं से संयुक्त रक्षाकवच के रूप में स्थापित किया जाता है। उपसंहार में प्रतिमास पाठ/श्रवण का विधान, अभीष्टफल, रोग-भय-नाश, अकालमृत्यु-निवारण और महापापियों तक के पावन होने की फलश्रुति दी गई है।

120 verses

Adhyaya 83

व्यपोहनस्तवनिरूपण-प्रसङ्गे नक्तभोजन-शिवव्रतविधिः (वार्षिक-प्रतिमास-क्रमः)

व्यपोहन-स्तव का पुण्य श्रवण कर चुके ऋषि लिङ्ग-दान से जुड़े व्रतों का विधान पूछते हैं। सूत नन्दीश्वर-प्रोक्त और व्यास-परम्परा से प्राप्त शिवव्रतों का व्यावहारिक उपदेश देते हैं। मुख्य साधना ‘नक्तभोजन’ है—नित्य केवल रात्रि में भोजन—और दोनों पक्षों की अष्टमी व चतुर्दशी को शिवपूजन, तथा वर्ष के अंत में ब्राह्मण-भोजन। भिक्षा, अयाचित और नक्त—इन जीवन-रीतियों में नक्त को ‘उत्तम’ बताकर भू-शय्या, अग्निकार्य, स्नान, हविष्य-आहार आदि सहायक तप भी बताए गए हैं। फिर पुष्य से मार्गशीर्ष तक मासानुसार व्रत-चक्र में अन्न-प्रकार, घृत-क्षीर आदि नैवेद्य, पूर्णिमा को अभिषेक और दान—विशेषतः विभिन्न वर्णों के गो-मिथुन—का विधान है, जिनसे अग्नि, यम, चन्द्र, निरृति, वरुण, वायु, यक्ष, ईशान, सूर्य और सोम लोकों की प्राप्ति कही गई है। अंत में नैतिक व्रतों का सार देकर कहा गया है कि यह वार्षिक क्रम आगे या उलटे क्रम से करने पर शिव-सायुज्य और ज्ञान-योग की सिद्धि होती है, और आगे के व्रत-पूजा-विस्तार का प्रसंग जुड़ता है।

55 verses

Adhyaya 84

Adhyaya 84: शिवव्रतकथनम् (Uma–Maheshvara Vrata, Shula-dana, and Month-wise Ekabhakta Vrata)

सूत मुनियों से कहते हैं कि ईश्वर ने समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु शिवव्रत बताया है। पौर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी और चतुर्दशी को रात्रि-भोजन/उपवास, हविष्य-भोजन और भव (शिव) की पूजा का विधान है। वर्ष के अंत में सामर्थ्य अनुसार स्वर्ण-रजत-ताम्र की उमा–महेश्वर प्रतिमा बनाकर प्रतिष्ठा, ब्राह्मण-भोजन, दक्षिणा तथा रुद्रालय में छत्र-चामर आदि राजोपचारों सहित व्रत-समर्पण कहा गया है। स्त्रियों के लिए ब्रह्मचर्य व नियत उपवास, और फलस्वरूप भवानी-शिव के साथ सारूप्य-सायुज्य; पुरुषों को भी रुद्र-सायुज्य मिलता है। आगे शूलदान का महत्त्व—त्रिशूल बनाकर अर्पण, कमल-पूजन और ब्राह्मणों को दान—महाप्रायश्चित्त रूप में बताया गया है। मार्गशीर्ष से कार्तिक तक मासानुसार वृषभ, शूल, रथ, प्रतिमाएँ, कैलास-प्रतिरूप, ब्रह्म-विष्णु-चिह्नयुक्त लिंगमूर्ति, गृहदान, धान्य/तिल के ‘पर्वत’ और अंत में महमेरु-व्रत की विस्तृत प्रतिष्ठा का वर्णन कर शिव की मोक्ष-प्रतिज्ञा दोहराई गई है।

72 verses

Adhyaya 85

उमामहेश्वरव्रतं—पञ्चाक्षरमन्त्रस्य माहात्म्यं, न्यासः, जपविधिः, सदाचारः, विनियोगः

सूत कहते हैं कि सभी व्रतों में पंचाक्षर मंत्र से उमापति (शिव) की उपासना सर्वोत्तम है और व्रत-समाप्ति का निश्चित साधन जप है। ऋषि मंत्र की शक्ति और विधि पूछते हैं; सूत शिव द्वारा पार्वती को दिया उपदेश सुनाते हैं—प्रलय में सब लीन हो जाता है, पर वेद-शास्त्र पंचाक्षर में सुरक्षित रहते हैं। शिव मंत्र के वाचक–वाच्य तत्त्व को समझाकर उसे अल्पाक्षर-महार्थ, वेदसार और मोक्षप्रद बताते हैं। फिर ऋषि-छंद-देवता, बीज/शक्ति, स्वर-वर्ण-स्थान, तथा उत्पत्ति–स्थिति–संहार, कर/देह/अंग न्यास, दिग्बंधन और षडंग न्यास का विधान आता है। गुरु-सेवन, दक्षिणा, दीक्षा-आचार, पुरश्चरण संख्या, प्राणायाम, जप-स्थान व फल-वृद्धि, माला और वाचिक/उपांशु/मानस जप बताए गए हैं। अंत में सदाचार, आहार-शुद्धि, गुरु-भक्ति और आरोग्य, आयु, शांति, ग्रहपीड़ा-निवारण आदि विनियोग कहकर इस विधि के श्रवण-उपदेश से परम पद की प्राप्ति बताई गई है।

231 verses

Adhyaya 86

ध्यानयज्ञः, संसार-विष-निरूपणम्, पाशुपतयोगः, परा-अपरा विद्या, चतुर्वस्था-विचारः (अध्यायः ८६)

ऋषियों के अनुरोध पर सूत शिव का उपदेश सुनाते हैं कि सच्चा ‘विष’ संसार है, जो अविद्या, कामना और कर्मजन्य देह-धारण से पोषित होता है। गर्भ-जीवन से लेकर मनुष्य की अवस्थाओं, पशु-योनियों, राजकीय संघर्ष, देवलोक की प्रतिस्पर्धा और स्वर्ग की अनित्यता तक सर्वत्र दुःख दिखाकर वैराग्य स्थापित किया गया है। फिर मुक्ति का मार्ग—पाशुपत-व्रत और पञ्चार्थ-ज्ञान से समर्थ योग—बताया गया, जहाँ केवल ज्ञान ही पाप को जलाकर कर्म-बन्धन काटता है। परा-अपरा विद्या का भेद, हृदय-कमल में अन्तर्मुख ध्यान, नाड़ियाँ-प्राण, तथा जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति-तुरीय अवस्थाएँ वर्णित हैं; शिव को तुरीयातीत और अन्तर्यामी कहा गया है। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि यम और भूत-तत्त्वों में शिव-रूप ध्यान का विधान है। अंत में ज्ञान-ध्यान को ही संसार-रोग की औषधि बताकर, इस उपदेश के श्रवण/अध्ययन से ब्रह्म-सायुज्य का फल कहा गया है, जो आगे पञ्चाक्षर-केन्द्रित शैव साधना की भूमिका बनता है।

157 verses

Adhyaya 87

Adhyaya 87 — Saṃsāra-viṣa-kathana: Ājñā-śakti, Māyā-bandha, and Mokṣa by Prasāda

सूत कहते हैं कि पूर्व उपदेश सुनकर ऋषि भययुक्त किन्तु भक्तिभाव से पिनाकी शिव को प्रणाम करते हैं। हिमवती के साथ महादेव की ‘क्रीड़ा’ कैसे होती है—इस प्रश्न पर शिव सूक्ष्म सिद्धान्त बताते हैं: देहधारी जीव को माया और कर्म के कारण बंधन व मुक्ति का अनुभव होता है, पर आत्मा तत्त्वतः कभी बंधी नहीं। वे कहते हैं कि विद्या—श्रुति-स्मृति का ज्ञानतत्त्व और स्थिर शक्ति—उन्हीं में प्रतिष्ठित है। फिर ‘आज्ञा’ नामक नित्य, पञ्चवक्त्रा दिव्य शक्ति का वर्णन होता है, जो अनेक रूपों से सर्वत्र व्याप्त होकर मोक्ष की प्रवृत्ति आरम्भ कराती है। आगे भवानी माया को हटाकर दर्शकों को मुक्त करती हैं और उमा-शंकर की परम सत्य में अभिन्नता प्रतिपादित होती है। प्रभु की कृपा से मोक्ष तत्काल है, आयु या जन्म-भेद से रहित; शिव ही जगदीश्वर हैं जो बंधन और विमोचन दोनों कराते हैं। अंत में सिद्धगण रुद्र को विश्वरूप मानकर स्तुति करते हैं और अम्बिका की कृपा से सायुज्य प्राप्त करते हैं।

25 verses

Adhyaya 88

मुनिमोहशमनम् (Pāśupata-yoga, Siddhis, Puruṣa-darśana, Saṃsāra, and Prāṇa-Rudra Pañcāhutī)

ऋषि सूत से पूछते हैं कि योगी अणिमा आदि सिद्धियाँ कैसे पाते हैं। सूत दुर्लभ पाँच प्रकार के पाशुपत-योग का उपदेश देते हैं—चित्त की स्थिरता, पद्मासन का भाव, और शक्ति/रुद्र-विन्यास सहित उमापति का ध्यान; इससे अनुपम ज्ञान प्रकट होता है। वे अष्ट-सिद्धियों का वर्णन कर बताते हैं कि ये असंख्य कर्मकाण्डों से नहीं, योग से सिद्ध होती हैं। फिर विषय सिद्धियों से ऊपर उठकर परम लक्ष्य—अपवर्ग और शिव-सायुज्य—पर आता है; पुरुष सूक्ष्म, सर्वव्यापी, इन्द्रिय-गुणों से परे है, जिसे योग-दृष्टि से जाना जाता है। गर्भाधान, भ्रूण-विकास, जन्म, नरक और कर्मानुसार पुनर्जन्मों का विस्तृत नैतिक वर्णन कर संसार-भय की औषधि ध्यान को कहा गया है। अंत में प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान के लिए पाँच आहुतियों का आन्तरिक होम बताया गया है—रुद्र को प्राण और हृदयस्थ वैश्वानर अग्नि के रूप में एक माना गया है। भस्मधारण सहित शैवाचार तथा पाठ-श्रवण को परम पद तक पहुँचाने वाला साधन कहकर आगे की शैव साधना से जोड़ा गया है।

93 verses

Adhyaya 89

Adhyaya 89: शौचाचारलक्षणम् — सदाचार, भैक्ष्यचर्या, प्रायश्चित्त, द्रव्यशुद्धि, आशौच-निर्णय

सूता शौच और सदाचार को योगी तथा शैव-जीवन की आधारशिला बताता है। मान-अपमान में समता, यम-नियम, सत्य और मनःशुद्धि से आरम्भ कर वह संन्यासी की भैक्ष्यचर्या, सिद्धि व स्थैर्य देने वाले आहार, गुरु-वन्दना और गुरु के निकट वर्जित आचरण बताता है। देवाद्रोह, गुरुद्रोह आदि दोषों के लिए क्रमबद्ध प्रायश्चित्त, विशेषतः प्रणव-जप, निर्धारित हैं। फिर द्रव्य-शुद्धि का विस्तृत विधान—जल, वस्त्र, धातु, पात्र तथा गृह/यज्ञोपकरणों की शुद्धि, और भोजन, निद्रा, थूक या अशुद्ध-संपर्क के बाद पुनःशुद्धि के नियम आते हैं। आगे संबंध व वर्ण के अनुसार सूतक-प्रेताशौच की अवधि, रजस्वला के लिए निषेध, शुद्धि-उपाय और दिन-गणना से गर्भ-सम्बन्धी विचार दिए गए हैं। अंत में सदाचार के श्रवण-प्रवचन को ब्रह्मलोकदायक पुण्य कहा गया है।

122 verses

Adhyaya 90

यतिप्रायश्चित्तविधानम् (Ascetic Atonements and Discipline)

सूता यतियों के लिए शिव-प्रोक्त विशेष प्रायश्चित्त का वर्णन करते हैं। पाप को वाणी, मन और शरीर से उत्पन्न त्रिविध बताकर उसे संसार-बन्धन का कारण कहा गया है; सावधान साधक के लिए योग को परम शक्ति बताया गया है, जिससे ज्ञानी अविद्या को जीतकर परम पद पाते हैं। फिर भिक्षुओं के व्रत-उपव्रत, अपराधानुसार प्रायश्चित्त, कामवश स्त्री-संग के लिए प्राणायाम-सहित सान्तपन और फिर कृच्छ्र, तथा बार-बार शुद्ध होकर अनुशासित आश्रम-जीवन में लौटने पर बल दिया गया है। असत्य से सावधान किया गया है और चोरी को महापाप, हिंसा के तुल्य कहा है क्योंकि धन प्राण से जुड़ा है। भारी पतन में दीर्घकालिक चान्द्रायण का विधान है। कर्म-वचन-मन से अहिंसा प्रधान है; सूक्ष्म जीवों की अनजानी हिंसा पर कृच्छ्रातिकृच्छ्र या चान्द्रायण। रात्रि व दिन के स्राव के लिए अलग प्राणायाम-उपवास, निषिद्ध आहारों की सूची, और उल्लंघन पर प्राजापत्य-कृच्छ्र बताया गया है। अंत में शुद्ध यति मिट्टी और सोने में सम, सर्वभूत-हित में लीन होकर पुनर्जन्म से परे शाश्वत धाम को प्राप्त होता है।

24 verses

Adhyaya 91

अध्याय 91: अरिष्ट-लक्षण, मृत्यु-संस्कार, पाशुपत-धारणा तथा ओङ्कार-उपासना

सूत कहते हैं कि अब ‘अरिष्ट-लक्षण’ बताए जाते हैं, जिनसे योगी मृत्यु की निकटता पहचान लेते हैं। पहले आकाशीय/दृष्टि-सम्बन्धी अपशकुन (अरुन्धती-ध्रुव का न दिखना, दिन में नक्षत्र दिखना, बिना बादल बिजली), छाया-विकार, शरीर-गन्ध, इन्द्रियों का क्षय, अचानक स्थूलता या कृशता, तथा स्वप्न-चिह्न (दक्षिण दिशा की ओर ले जाना, अशुभ स्त्री-आकृति, गड्ढे में गिरना, हथियारधारी कृष्ण-पुरुष) से आयु-क्षय का समय बताया गया है। फिर उपाय बताया—काल उपस्थित हो तो शोक त्यागकर शुद्ध होकर एकान्त सम-देश में बैठकर महेश्वर को नमस्कार करे, दीपक की निर्वात लौ-सी स्थिरता से इन्द्रिय-निग्रह और शुक्ल-ध्यान करे। आगे ओङ्कार-योग की त्रिमात्रा (अ-उ-म), प्लुत-मात्रा और अमात्र ‘शिव-पद’ का तत्त्व-विवेचन है; प्रणव को धनुष, आत्मा को शर और लक्ष्य ब्रह्म/शिव-पद कहा गया। अंत में मृत्यु-क्षण में प्रणव-ध्यान, रुद्र-नमस्कार, अविमुक्त/श्रीपर्वत जैसे क्षेत्रों से जुड़ा मुक्तिमार्ग और शिवसायुज्य की प्रतिज्ञा कही गई है।

76 verses

Adhyaya 92

अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्य — काशी-वाराणसी में मोक्ष, लिङ्ग-तीर्थ-मानचित्र, और उपासना-विधि

ऋषि सूत से अविमुक्तक्षेत्र (काशी/वाराणसी) की महिमा पूछते हैं। सूत शिव-पार्वती के आगमन, अविमुक्तेश्वर के प्राकट्य और दिव्य उपवन व पवित्र वातावरण का काव्यमय वर्णन करता है। शिव पार्वती को क्षेत्र-रहस्य बताते हैं—अविमुक्त उनकी नित्यपुरी है, अन्य महातीर्थों से श्रेष्ठ; इसकी सीमा में देहत्याग करने पर, धर्म से विमुख या सांसारिक जन भी, निश्चित मोक्ष पाते हैं। फिर प्रमुख लिङ्ग-तीर्थों (गोप्रेक्षक, हिरण्यगर्भ, स्वर्लिङ्गेश्वर, संगमेश्वर, मध्यमेंश्वर, शुक्रेश्वर, व्याघ्रेश्वर, जम्बुकेश्वर, शैलेश्वर आदि) का तीर्थ-मानचित्र और उनके उद्धारक फल बताए जाते हैं। शिव अभिषेक (महास्नान सहित), बिल्व-पुष्प, नैवेद्य, जागरण, प्रदक्षिणा तथा रुद्रबीज और पंचाक्षर-जप की विधि देकर शिवसायुज्य का आश्वासन देते हैं। अंत में पार्वती का पूजन और सूत की फलश्रुति से काशी-केंद्रित शैव साधना का पुण्य प्रतिपादित होता है।

190 verses

Adhyaya 93

अन्धकानुग्रहः—शूलारोपणं, रुद्रस्मरण-फलम्, तथा गाणपत्य-प्रदानम् (अध्याय 93)

ऋषि पूछते हैं कि मन्दर के चारुकन्दर में दमित अन्धक को महेश्वर से ‘गाणपत्य’ कैसे मिला। सूत बताते हैं—ब्रह्मा के वर से अवध्य होकर अन्धक ने त्रैलोक्य जीत लिया और इन्द्र को भयभीत किया। देवगण नारायण को आगे रखकर मन्दर में शरण लेते हैं और शिव से निवेदन करते हैं। शिव गणेश्वरों सहित अन्धक के सामने जाते हैं, असुर-समूह को भस्म कर शूल से अन्धक को वेधते हैं। शूलाग्र पर अन्धक में सात्त्विक भाव जागता है; वह रुद्र-स्मरण का महत्त्व समझकर शिव की स्तुति करता है। करुणामय नीललोहित शिव वर माँगने को कहते हैं; अन्धक ‘दुर्लभ श्रद्धा’ माँगता है। शिव उसे श्रद्धा और ‘गाणपत्य’ प्रदान करते हैं; देवगण उस प्रतिष्ठा के साक्षी बनते हैं। प्रसंग बताता है कि दमन से बढ़कर शिव-अनुग्रह से शरणागत का रूपान्तरण महत्त्वपूर्ण है।

26 verses

Adhyaya 94

अन्धक-हिरण्याक्ष-प्रसङ्गः, वराहावतारः, दंष्ट्राभूषणं च

ऋषि तीन बातों का रहस्य पूछते हैं—अन्धक के पिता के रूप में हिरण्याक्ष कौन था, विष्णु के हाथों उसका वध कैसे हुआ, और वराह की दंष्ट्रा महादेव का भूषण कैसे बनी। सूत कहते हैं—हिरण्यकशिपु का भाई हिरण्याक्ष देवताओं को जीतकर पृथ्वी को बाँधकर रसातल में घसीट ले गया। देवों की प्रार्थना पर विष्णु यज्ञ-वराह रूप धारण कर दैत्य को दंष्ट्रा के अग्रभाग से मारते हैं, भूदेवी को उठाकर जगत-व्यवस्था पुनः स्थापित करते हैं। ब्रह्मा और देवगण वराह को धारणकर्ता, रक्षक और जगदाधार कहकर विस्तृत स्तुति करते हैं। विष्णु के चले जाने पर पृथ्वी दंष्ट्रा के भार से दबकर उसे वहीं छोड़ देती है; शिव (भव) उसे संयोग से देखकर ग्रहण करते हैं और वक्षस्थल पर भूषण रूप में धारण करते हैं। अध्याय संकेत देता है कि यह ‘अंग-विभाग’ और भूषण-धारण केवल कथा नहीं, प्रभु की मोक्षदायिनी लीला है, जिससे आगे शिव-चिह्नों के महत्व और भक्ति का उपदेश जुड़ता है।

32 verses

Adhyaya 95

Varaha-Pradurbhava Context: Prahlada’s Bhakti, Narasimha’s Ugra-Form, and Shiva’s Sharabha Intervention

ऋषि सूत से पूछते हैं कि नरसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध कैसे किया। सूत प्रह्लाद की आजीवन नारायण-भक्ति बताता है; उससे क्रुद्ध हिरण्यकशिपु अनेक उपायों से प्रह्लाद को मरवाना चाहता है, पर दैवी रक्षा से सब विफल होते हैं। तब विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट होकर तीक्ष्ण नखों से हिरण्यकशिपु का संहार करते हैं; किंतु नरसिंह की भयंकर गर्जना और अनंत, बहुरूपी तेज से त्रिलोकी काँप उठती है और देव-गण भयभीत हो जाते हैं। देवगण स्तुति करके उन्हें स्थूल-सूक्ष्म से परे परम तत्त्व तथा अवतारों के कारण रूप में मानते हैं, फिर भी शांति नहीं होती। तब ब्रह्मा और देव मंदराचल पर महादेव की शरण लेते हैं; ब्रह्मा विस्तृत रुद्र-स्तुति में शिव को कालकाल, सर्वरूप, अंतक और अंतर्यामी कहकर पूजता है। शिव अभय देकर शरभ रूप धारण करते हैं और नरसिंह की उग्र शक्ति को शांत करते हैं; नरसिंह सौम्य होते हैं और जगत में व्यवस्था लौट आती है। अंत में फलश्रुति है—इस शैव स्तव का पाठ/श्रवण रुद्रलोक और रुद्र-सान्निध्य का आनंद देता है, तथा आगे के शैव उपदेशों की भूमिका बनाता है।

63 verses

Adhyaya 96

अध्याय ९६: शरभ-प्रादुर्भावः, नृसिंह-दर्पशमनम्, विष्णोः शिवस्तुतिः, फलश्रुति

ऋषि सूत से पूछते हैं—महादेव ने शरभ नामक अत्यन्त घोर विकृत रूप क्यों धारण किया? सूत कहते हैं—देवों की प्रार्थना पर शिव ने नृसिंह के उग्र तेज और दर्प को शांत करने हेतु वीरभद्र को नियुक्त किया और भैरव-स्वरूप भी प्रकट किया। वीरभद्र नृसिंह को अवतार-परम्परा स्मरण कराकर समझाते हैं, पर अहंकारवश नृसिंह संहार की प्रतिज्ञा करता है। तब शिव-तेज शरभ-रूप में प्रकट होकर पक्षाघात आदि से नृसिंह का बल नष्ट करता है। विवश विष्णु शिव की अष्टोत्तर-शतनाम भाव से स्तुति कर ‘यदा यदा मम अज्ञानम् अहंकार-दूषितम्’ कहकर शमन-प्रार्थना करते हैं। देवगण सदाशिव के परतत्त्व की स्तुति करते हैं; अंत में पाठ-श्रवण के फल—विघ्ननाश, व्याधि-शमन, शांति और शिव-ज्ञान का प्रकाश—बताए गए हैं।

128 verses

Adhyaya 97

शरभप्रादुर्भावो नाम षण्णवतितमोऽध्यायः (जलन्धरविमर्दनम्)

नैमिषारण्य में ऋषि सूत से पूछते हैं—जटामौलि, भगनेत्रहर हर ने जलन्धर का वध कैसे किया? सूत बताते हैं कि जलमण्डल से उत्पन्न जलन्धर ने तपोबल से महान पराक्रम पाया; उसने देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और ब्रह्मा तक को जीतकर विष्णु से दीर्घ युद्ध किया और उन्हें भी पराजित कर शंकर को ‘अजित’ कहकर ललकारा। ब्रह्मवचन की रक्षा और जगत्-रक्षण हेतु शिव नन्दी और गणों सहित युद्ध को प्रस्तुत हुए। अहंकारी जलन्धर अपने बल की डींगें (इन्द्रादि का दमन, गङ्गा-निरोध, गरुड-बन्धन, स्त्रीहरण आदि) मारता है; शिव ने नेत्राग्नि से उसका रथ जला दिया और पादाङ्गुष्ठ से समुद्र में रथचक्र बनाकर उसे युद्ध के लिए बुलाया। जलन्धर सुदर्शन-सदृश चक्र उठाने दौड़ा, उसी से दो टुकड़े होकर गिर पड़ा; उसका रक्त रुद्र-आज्ञा से मांसवत होकर ‘रक्तकुण्ड’ सा दिखा। देवों ने जयघोष किया; फलश्रुति—‘जलन्धरविमर्दन’ का पाठ/श्रवण/श्रावण करने से शिवगण-संबन्धी सिद्धि और शिवानुग्रह मिलता है, और यह भाव दृढ़ होता है कि निर्णायक शक्ति शिवकृपा ही है।

43 verses

Adhyaya 98

देवैर्विष्णोः शरणागमनम्—शिवलिङ्गस्थापनं, शिवसहस्रनामस्तवः, सुदर्शनचक्रप्रदानं च

ऋषि सूत से पूछते हैं कि विष्णु को महेश्वर से सुदर्शन चक्र कैसे मिला। सूत बताते हैं—दैत्य प्राणियों को पीड़ित करते हैं; पराजित देवता विष्णु की शरण में जाकर उन्हें एकमात्र रक्षक मानकर स्तुति करते हैं। विष्णु कहते हैं कि जलन्धर-वध के लिए त्रिपुरारि शिव द्वारा निर्मित भयंकर रथाङ्ग (चक्र) आवश्यक है, इसलिए वे महादेव के पास जाने का निश्चय करते हैं। हिमालय के पवित्र शिखर पर वे विश्वकर्मा-निर्मित दिव्य शिवलिङ्ग की स्थापना कर सुगन्ध, पुष्प आदि से अभिषेक करते हैं, भव आदि नामों से अग्निहोत्र करते हैं और विस्तृत शिवसहस्रनाम का जप करते हैं। शिव परीक्षा हेतु एक कमल छिपा लेते हैं; विष्णु पूर्ण अर्पण का व्रत न टूटे इसलिए अपना नेत्र निकालकर कमल के स्थान पर अर्पित करते हैं और ‘पद्माक्ष’ कहलाते हैं। तब शिव तेजस्वी-भयानक रूप में प्रकट होकर देवकार्य सिद्ध करते हैं, सूर्य-प्रभ सुदर्शन चक्र प्रदान करते हैं और बताते हैं कि युद्ध में अशान्ति तथा अनुचित क्षमा धर्म को क्षीण करती है। शिव वर देते हैं, देवासुरों में विष्णु के यश की भविष्यवाणी करते हैं तथा उमा/हैमवती के द्वारा सम्बन्ध-सामञ्जस्य का संकेत देते हैं। अंत में फलश्रुति—इस सहस्रनाम के श्रवण-पाठ और पूजन से महायज्ञ-समान पुण्य और परमगति प्राप्त होती है; आगे जलन्धर-वध की कथा का आधार बनता है।

195 verses

Adhyaya 99

विष्णुचक्रलाभो नाम (अर्धनारीश्वर-तत्त्वं, सती-पार्वती-सम्भवः, दक्षयज्ञविनाशः)

ऋषि सूत से देवी की उत्पत्ति और उसके अटल पतिव्रत का वृत्तांत पूछते हैं—वह सती कैसे बनी, दक्ष का यज्ञ कैसे नष्ट हुआ और शम्भु को कैसे अर्पित हुई। सूत परम्परा (ब्रह्मा→दण्डिन्→व्यास→सूत) का स्मरण कराकर बताता है कि लिङ्ग स्वयं भगवान् है, तम से परे ज्योति है; वेदी के साथ संयुक्त होकर वही अर्धनारीश्वर रूप में शिव-शक्ति की एकता प्रकट करता है। इसी एकत्व से ब्रह्मा उत्पन्न होकर रुद्र से ज्ञान पाता है, और सृष्टि शिव की अधिष्ठान-चेतना से चलती है। फिर दक्ष का अहंकार और उमापति का तिरस्कार, सती का योगाग्नि में देहत्याग, तप से पार्वती रूप में पुनर्जन्म, तथा शिव के क्रोध से दक्षयज्ञ का आकस्मिक विध्वंस वर्णित है। अध्याय निष्फल कर्मकाण्ड की आलोचना करते हुए देवापराध के फल, धर्म-स्थापन और केवल यज्ञ से बढ़कर भक्ति-ज्ञान की प्रधानता की भूमिका बाँधता है।

20 verses

Adhyaya 100

दक्षयज्ञध्वंसः—वीरभद्रप्रेषणं, देवविष्ण्वोः पराजयः, पुनरनुग्रहः

ऋषि सूत से पूछते हैं—दधीचि के वचन के बाद महेश्वर ने विष्णु को जीतकर भी यज्ञ में कैसे व्यवहार किया? सूत दक्षयज्ञ का प्रसंग सुनाते हैं। रुद्र ने देवों और मुनिगणों को दग्ध किया; फिर ब्रह्मा ने वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र रोमजगणों सहित कनखल के यज्ञवाट में प्रवेश कर यूप आदि का विध्वंस करता है और देवताओं के अंग-भंग करता है—भग का नेत्र उखाड़ना, पूषा के दाँत तोड़ना आदि; इन्द्र, अग्नि, यम आदि को पराजित करता है। विष्णु से भीषण युद्ध होता है; विष्णु के योगबल से उत्पन्न अनेक दिव्य देह शांत हो जाते हैं और चक्र स्तम्भित हो जाता है। यज्ञ मृगरूप होकर भागता है; दक्ष का शिरच्छेद होकर अग्नि में दग्ध होता है। तब ब्रह्मा क्रोध-शमन की प्रार्थना करते हैं; शिव वृषध्वज सगण प्रकट होकर मारे गए देवों को पूर्ववत् शरीर देते हैं, दक्ष का सिर स्थापित करते हैं और वर देते हैं; दक्ष स्तुति कर गणपत्य प्राप्त करता है। अध्याय यज्ञधर्म की शुद्धि, देवों की पुनर्स्थापना और शिवानुग्रह-प्रधान शैवमार्ग का संकेत देता है।

51 verses

Adhyaya 101

अध्याय १०१: हैमवती-तपः, तारकवंश-उत्पातः, स्कन्द-प्रत्याशा, मदनदहनम्

ऋषि सतीदेवी के पुनर्जन्म की कथा पूछते हैं—हिमवत्पुत्री हैमवती (उमा/पार्वती) कैसे हुईं और शिव को पति रूप में कैसे प्राप्त किया। सूत कहते हैं कि देवी ने मेना के शरीर का आश्रय लेकर स्वेच्छा से हैमवती रूप धारण किया; गिरिराज ने संस्कार किए। बारह वर्ष की आयु में वह बहनों सहित तप करने लगीं; अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला आदि नामों से उनके विविध तपोव्रत बताए गए, और यह दिखाया गया कि अनन्य भक्ति से शिव का अनुग्रह सहज है। उसी समय दानव तारक ने ब्रह्मा के वर से बल पाकर विष्णु को भी जीत लिया; देव भयभीत होकर बृहस्पति से विलाप करते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि उमा-शिव के योग से स्कन्द उत्पन्न होंगे और वही तारक का वध करेंगे। देवकार्य हेतु इन्द्र कामदेव को शिव-उमा के संयोग के लिए भेजते हैं; मदन रति और वसन्त के साथ शिवाश्रम में प्रयास करता है, पर त्र्यम्बक अपने तृतीय नेत्र की अग्नि से उसे भस्म कर देते हैं। रति के शोक पर शिव वर देते हैं कि मदन अमूर्त होकर रहेगा और आगे चलकर वासुदेव (विष्णु) से जुड़े शाप-प्रसंग में पुत्र रूप से पुनः प्राप्त होगा। यह अध्याय पार्वती-तप, स्कन्दोत्पत्ति और तारकवध की कथा-धारा की भूमिका रचते हुए, कामदहन द्वारा शिव के वैराग्य और ऐश्वर्य को प्रतिपादित करता है।

46 verses

Adhyaya 102

मदनदाहः — पार्वतीतपः, स्वयंवरलीला, देवस्तम्भनं, दिव्यचक्षुर्दानम्

सूता बताते हैं कि पार्वती के कठोर तप से शिव प्रसन्न होते हैं। ब्रह्मा उनके आश्रम में आकर लोकतापकारी तपस्या रोकने को कहते हैं और आश्वस्त करते हैं कि स्वयं शिव ही उन्हें वरेंगे। फिर शिव द्विज-वेष में आकर पार्वती को सांत्वना देते हैं और स्वयंबर में सौम्य रूप से प्रकट होने का वचन देते हैं। हिमालय स्वयंबर की घोषणा करता है; देव, ऋषि, गंधर्व, यक्ष, नाग और तत्त्वगण एकत्र होते हैं। अलंकृत पार्वती के सामने शिव बालक बनकर उनकी गोद में लेट जाते हैं; देवगण शंका से आक्रमण करते हैं। इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, सोम, कुबेर, ईशान, रुद्र, आदित्य, वसु और चक्रधारी विष्णु तक शिव की लीला से स्तम्भित हो जाते हैं; पूषा के दाँत शिव-दृष्टि से गिर जाते हैं। ब्रह्मा सत्य जानकर शिव की स्तुति करते हैं—बुद्धि-अहंकार के मूल, ब्रह्मा-विष्णु तथा प्रकृति/देवी के आदिकारण—और मोहित देवों के लिए क्षमा माँगते हैं। शिव उन्हें मुक्त कर दिव्य अद्भुत रूप दिखाते हैं, दर्शन हेतु दिव्यचक्षु देते हैं; पुष्प, दुंदुभि, स्तोत्र और पार्वती की माला से पूजन होता है, और शिव की सर्वोच्चता स्थापित होती है।

62 verses

Adhyaya 103

उमास्वयंवरः / भवोद्वाहः, गणसमागमः, अविमुक्तक्षेत्रमाहात्म्यम्, तथा विनायक-उत्पत्तिसूचना

सूता कहते हैं कि ब्रह्मा हाथ जोड़कर महादेव से विवाह आरम्भ करने की प्रार्थना करते हैं। शिव की अनुमति मिलते ही ब्रह्मा क्षणभर में रत्नजटित दिव्य नगरी को विवाह-स्थल बना देते हैं। वहाँ देवमाताएँ और देवपत्नी, नाग-गरुड़, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, समुद्र, पर्वत, मेघ, मास-वर्ष, वेद, मन्त्र, यज्ञ और असंख्य अप्सराएँ आती हैं—यह विवाह निजी नहीं, ब्रह्माण्डीय महोत्सव है। असंख्य गणेश्वर और नामधारी गण जटा, चन्द्र, त्रिनेत्र, नीलकण्ठ आदि शैव-लक्षणों सहित एकत्र होते हैं। विष्णु अलंकृत गिरिजा को नगर में लाकर शिव से कहते हैं कि ब्रह्मा-विष्णु रुद्र के पार्श्वों से प्रकट हुए और जगत रुद्र-रूपों से ही बना है। ब्रह्मा पुरोहित बनकर अग्नि के साक्ष्य में वैदिक मन्त्रों से प्रदक्षिणा, आहुति आदि कराते हैं और दिव्य दम्पति का विधिवत् संयोग होता है। फिर शिव नन्दी और गणों सहित अविमुक्त क्षेत्र काशी जाते हैं। पार्वती उसके माहात्म्य को पूछती हैं; शिव बताते हैं कि अविमुक्त में पाप नष्ट होते हैं और वहाँ मरने वाले को अपुनरावृत्ति-मोक्ष मिलता है। आगे वे उस पवित्र उद्यान का संकेत करते हैं जहाँ गजवक्त्र विनायक दैत्यों के विघ्न रोकने और देवताओं के कार्य निर्विघ्न कराने हेतु प्रकट होते हैं—आगामी काशी-माहात्म्य और विनायक-धर्म की भूमिका।

81 verses

Adhyaya 104

Vighneshvara-Prashna and Deva-Krita Shiva-Stava (Adhyaya 104)

ऋषि सूत से पूछते हैं कि हाथी-मुख विनायक गणेश्वर का जन्म कैसे हुआ और विघ्नों पर उसका अधिकार इतना महान क्यों है। सूत एक महाकालिक संधि का वर्णन करते हैं, जहाँ इन्द्र-उपेन्द्र सहित देवता दैत्य-प्रेरित उपद्रव से धर्म की रक्षा हेतु उपाय खोजते हैं। यहाँ ‘विघ्न’ केवल दुर्भाग्य नहीं, कर्मफल का नियामक है; देवों के अविघ्न रहने, मनुष्यों को पुत्र-प्राप्ति और कर्म-सिद्धि के लिए शिव की स्तुति करनी चाहिए और गणप/विघ्नेश का प्रादुर्भाव होना चाहिए। तब देवता शिव का विस्तृत स्तव करते हैं—उन्हें काल, कालाग्निरुद्र, ओंकार, वेद, पंचाक्षर और गुणातीत तत्त्व के रूप में पहचानते हुए। अंत में फलश्रुति है कि जो भक्तिपूर्वक इस देवकृत स्तव का पाठ या उपदेश करता है, वह परम पद पाता है; आगे विघ्नेश्वर की उत्पत्ति और कार्य का विवरण आने वाला है।

29 verses

Adhyaya 105

Devas Praise Śiva; Gaṇeśa Manifests as Vighneśvara and Receives the Primacy of Worship

सूता बताते हैं कि देवगण पिनाकधारी महेश्वर शिव के पास जाकर प्रणाम करते हैं और उनकी करुणामयी दृष्टि से वर पाते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि जो देवद्रोही और यज्ञादि पवित्र कर्मों में विघ्न डालते हैं, उन्हें रोका जाए। तब शिव गणेश्वर/विनायक रूप धारण करते हैं; देव और गण पुष्पवर्षा कर गजमुख, आयुध-सम्पन्न, शुभलक्षणयुक्त प्रभु की स्तुति करते हैं। तेजस्वी बालरूप गणेश प्रकट होते हैं, शिव और अम्बिका उन्हें आदर देते हैं। शिव उन्हें यह दायित्व देते हैं कि अधर्म कर्मों—विशेषतः दूषित यज्ञ, अनुचित अध्यापन-अध्ययन और धर्मच्युत जनों—में विघ्न डालें तथा सभी आयु के भक्तों की रक्षा करें। अध्याय में विघ्नों पर गणेश की सार्वभौम सत्ता और उनकी प्रथम-पूजा स्थापित होती है: उनकी पूजा बिना श्रौत, स्मार्त और लौकिक कर्म निष्फल होते हैं; पूजा से सिद्धि और सम्मान मिलता है। इससे आगे की शैव विधि का संकेत मिलता है कि उचित पूर्वकर्मों से धर्म सुरक्षित हो तभी लिङ्ग-पूजा फल देती है।

30 verses

Adhyaya 106

विनायकोत्पत्तिः / ताण्डव-प्रसङ्गः (दारुक-वधः, काली-उत्पत्तिः, क्षेत्रपालोत्पत्तिः)

ऋषि शंभु के नृत्य-आरम्भ का कारण और स्कन्द के अग्रज से जुड़ा प्रसंग पूछते हैं। सूत दारुकासुर का वर्णन करते हैं—तप से बल पाकर वह देवों और द्विजों को पीड़ित करता है। ब्रह्मा आदि देव उमापति शिव की शरण जाकर दारुक-वध की प्रार्थना करते हैं। शिव गिरिजा से निवेदन करते हैं; देवी शिव-देह में प्रवेश कर उग्र शक्ति बनती हैं। शिव अपने तृतीय नेत्र से काली (कालकण्ठी) को प्रकट करते हैं; काली दारुक का वध कर भी क्रोधाग्नि से जगत को व्याकुल कर देती हैं। तब शिव श्मशान में बालरूप होकर रुदन करते हैं; देवी उसे स्तन्य देकर काली का क्रोध शांत करती हैं। वही बाल क्षेत्रपाल बनता है और अष्टमूर्तियों का संकेत मिलता है। अंत में संध्याकाल में शिव प्रेतगणों सहित ताण्डव करते हैं; देवी नृत्यामृत पीकर प्रसन्न होती हैं और देव काली व पार्वती को नमस्कार करते हैं।

28 verses

Adhyaya 107

Upamanyu’s Tapas, Shiva’s Indra-Form Test, and the Bestowal of Kshiroda and Gaṇapatya

ऋषि सूत से पूछते हैं कि उपमन्यु को गणपत्य और क्षीरोद (दूध-सागर) का वर कैसे मिला। सूत बताते हैं—बालक उपमन्यु को दूध की तीव्र चाह थी; माता ने कहा कि समृद्धि महादेव की पूर्व-पूजा और वर्तमान कृपा पर निर्भर है। तब वह हिमालय में कठोर तप करता है, जिससे लोक काँप उठते हैं। विष्णु कारण जानकर शिव के पास जाते हैं; शिव बालक को वर देने से पहले परीक्षा हेतु इन्द्र-रूप धारण करते हैं। इन्द्र-रूपी शिव वर देने का लोभ दिखाकर रुद्र-भक्ति छोड़ने को कहते हैं; उपमन्यु पंचाक्षरी जपते हुए छल पहचान लेता है और शिव-निन्दा को महापाप बताता है। वह अथर्वास्त्र-शक्ति से प्रतिकार को उद्यत होता है, तब शिव रोककर अपना स्वरूप प्रकट करते हैं और दूध तथा अन्नादि के विशाल सागर प्रकट करते हैं। शिव-पार्वती उसे पुत्रवत् अपनाकर अमरत्व, स्थायी गणपत्य, योगैश्वर्य और ब्रह्मविद्या देते हैं। अंत में अचल श्रद्धा और नित्य सन्निधि की प्रार्थना पूर्ण कर शिव अंतर्धान होते हैं—भक्ति से ज्ञान और मुक्ति का मार्ग दिखाते हुए।

64 verses

Adhyaya 108

उपमन्युना कृष्णाय पाशुपतज्ञान-प्रदानम् तथा दानविधि-फलश्रुतिः

ऋषि सूत से पूछते हैं कि सहज कर्म करने वाले श्रीकृष्ण को दिव्य पाशुपत-ज्ञान और पाशुपत-व्रत कैसे मिला। सूत कहते हैं—वासुदेव स्वेच्छा से अवतार लेकर भी मनुष्य की भाँति देह-शुद्धि करके धौम्य के ज्येष्ठ ऋषि उपमन्यु के पास श्रद्धा से गए, प्रणाम किया और प्रदक्षिणा की। उपमन्यु की मात्र दृष्टि से कृष्ण के देह और कर्म के मल नष्ट हो गए; भस्म-लिप्त तेजस्वी उपमन्यु तत्त्व-शक्तियों से एकात्म होकर प्रसन्न हुए और दिव्य पाशुपत-ज्ञान प्रदान किया। एक वर्ष तप के बाद कृष्ण ने गणों सहित महेश्वर का दर्शन किया और पुत्र साम्ब का वर पाया; तब पाशुपत मुनि उनके साथ आध्यात्मिक साम्य में स्थित रहे। आगे मोक्ष-प्रधान दान-विधि बताई गई—स्वर्ण-मेखला, दण्ड-आधार, पंखा, लेखन-सामग्री, उस्तरा/कैंची, पात्र और धातुएँ आदि यथाशक्ति भस्मधारी पाशुपत योगियों को दें। फल—पापक्षय, कुलोद्धार, रुद्रपद-प्राप्ति; तथा पाठ-श्रवण से विष्णुलोक की प्राप्ति, जिससे शैव साधना और पुराणोक्त मोक्षमार्ग का सेतु बनता है।

19 verses