
वासिष्ठकथनम् (आदित्य–सोमवंशवर्णनम् तथा रुद्रसहस्रनाम-प्रशंसा)
नैमिषारण्य में ऋषि सूत रोमहर्षण से आदित्यवंश और सोमवंश का संक्षिप्त वर्णन पूछते हैं। सूत कश्यप–अदिति से सूर्यवंश का प्रसंग आरम्भ कर संज्ञा, छाया और प्रभा—इन तीन पत्नियों की कथा कहते हैं। छाया-पुत्रों के प्रति पक्षपात से क्रुद्ध यम छाया को मारता है; छाया के शाप से उसके पाँव में विकार होता है, फिर गोकर्ण में महादेव की आराधना से शापमुक्त होकर वह लोकपाल और पितृ-स्वामी बनता है—शिव-अनुग्रह से धर्म-व्यवस्था का संकेत मिलता है। संज्ञा के अश्वरूप से अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति तथा त्वष्टा द्वारा सुदर्शनचक्र-निर्माण (रुद्र-प्रसाद से सम्बद्ध) का वर्णन आता है। आगे वैवस्वत मनु की संतति, इला/सुद्युम्न का स्त्री-पुरुष रूप-परिवर्तन, बुध के साथ ऐल पुरूरवा से सोमवंश-वृद्धि, और इक्ष्वाकुवंश में मान्धाता–पुरुकुत्स आदि की परम्परा बताई जाती है। अंत में तण्डिन-प्रसंग से रुद्र-सहस्रनाम जप की महिमा—गणपत्य-प्राप्ति, सहस्र अश्वमेध के तुल्य फल और महापाप-नाश—कहकर अध्याय शैव स्तोत्र-जप साधना का सेतु बनता है।
Verse 1
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वासिष्ठकथनं नाम चतुःषष्टितमो ऽध्यायः ऋषय ऊचुः आदित्यवंशं सोमस्य वंशं वंशविदां वर वक्तुमर्हसि चास्माकं संक्षेपाद् रोमहर्षण
इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के पूर्वभाग में “वासिष्ठकथन” नामक चौंसठवाँ अध्याय (समाप्त/प्रारम्भ) होता है। ऋषियों ने कहा—हे रोमहर्षण, वंश-विदों में श्रेष्ठ, कृपा करके हमें संक्षेप में सूर्यवंश और सोमवंश का वर्णन कीजिए।
Verse 2
सूत उवाच अदितिः सुषुवे पुत्रम् आदित्यं कश्यपाद्द्विजाः तस्यादित्यस्य चैवासीद् भार्या त्रयम् अथापरम्
सूत बोले—हे द्विज ऋषियों, अदिति ने कश्यप से आदित्य नामक पुत्र को जन्म दिया। और उस आदित्य की आगे चलकर तीन पत्नियाँ भी हुईं।
Verse 3
संज्ञा राज्ञी प्रभा छाया पुत्रांस्तासां वदामि वः संज्ञा त्वाष्ट्री च सुषुवे सूर्यान्मनुमनुत्तमम्
संज्ञा (रानी), प्रभा और छाया—इनके पुत्रों का वर्णन मैं तुमसे करता हूँ। त्वष्टा की पुत्री संज्ञा ने सूर्य से मनुओं में श्रेष्ठ मनु को जन्म दिया।
Verse 4
यमं च यमुनां चैव राज्ञी रेवतमेव च प्रभा प्रभातम् आदित्याच् छायां संज्ञाप्यकल्पयत्
सूर्य से उसने यम, यमुना और रानी रेवती को जन्म दिया; तथा प्रभा ने प्रभात को। फिर संज्ञा ने आदित्य के लिए अपने स्थान पर छाया नामक प्रतिरूप की रचना की।
Verse 5
छाया च तस्मात्सुषुवे सावर्णिं भास्कराद्द्विजाः ततः शनिं च तपतीं विष्टिं चैव यथाक्रमम्
हे द्विजों, छाया ने भास्कर (सूर्य) से सावर्णि को जन्म दिया। फिर क्रम से शनि, तपती और विष्टि को भी उत्पन्न किया।
Verse 6
छाया स्वपुत्राभ्यधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तदा पूर्वो मनुर्न चक्षाम यमस्तु क्रोधमूर्छितः
तब छाया ने मनु पर अपने पुत्रों से भी अधिक स्नेह किया। पूर्व मनु ने सत्य को न जाना; पर यम क्रोध से मूर्छित होकर मोहग्रस्त हो गया।
Verse 7
संताडयामास रुषा पादमुद्यम्य दक्षिणम् यमेन ताडिता सा तु छाया वै दुःखिताभवत्
क्रोध में उठकर यम ने अपना दाहिना पाँव उठाया और प्रहार किया; यम से ताड़ित वह छाया-रूपिणी निश्चय ही दुःखी हो गई।
Verse 8
छायाशापात् पदं चैकं यमस्य क्लिन्नमुत्तमम् पूयशोणितसम्पूर्णं कृमीणां निचयान्वितम्
छाया के शाप से यम का एक पाँव अत्यन्त घावयुक्त हो गया—सड़ता-गलता, पूय और रक्त से भरा, और कीड़ों के ढेर से युक्त।
Verse 9
सो ऽपि गोकर्णमाश्रित्य फलकेनानिलाशनः आराधयन्महादेवं यावद्वर्षायुतायुतम्
वह भी गोकर्ण का आश्रय लेकर, केवल तख्ते पर रहकर और वायु को ही आहार मानकर, महादेव की आराधना करता रहा—दस हज़ार गुणा दस हज़ार वर्षों तक।
Verse 10
भवप्रसादाद् आगत्य लोकपालत्वमुत्तमम् पितॄणामाधिपत्यं तु शापमोक्षं तथैव च
भव (शिव) की कृपा से उसने उत्तम लोकपाल-पद, पितरों का आधिपत्य, और उसी प्रकार शाप-बन्धन से मुक्ति—ये वर प्राप्त किए।
Verse 11
लब्धवान्देवदेवस्य प्रभावाच्छूलपाणिनः असहन्ती पुरा भानोस् तेजोमयम् अनिन्दिता
देवदेव, शूलपाणि शिव के प्रभाव से उसने वह तेजोमयी, दीप्त अवस्था प्राप्त की; पूर्वकाल में वह अनिन्दिता सूर्य के प्रचण्ड तेज को सह न पाती थी।
Verse 12
रूपं त्वाष्ट्री स्वदेहात्तु छायाख्यां सा त्वकल्पयत् वडवारूपमास्थाय तपस्तेपे तु सुव्रता
तब त्वाष्ट्री ने अपने ही शरीर से ‘छाया’ नामक रूप प्रकट किया। वह सुव्रता स्त्री वडवा (घोड़ी) का रूप धारण कर दृढ़ व्रत से तप करने लगी।
Verse 13
कालात्प्रयत्नतो ज्ञात्वा छायां छायापतिः प्रभुः वडवामगमत्संज्ञाम् अश्वरूपेण भास्करः
समय आने पर प्रयत्नपूर्वक छाया को जानकर, छाया के स्वामी प्रभु ने उसे पहचाना। तब भास्कर (सूर्य) अश्वरूप धारण कर वडवा-रूपिणी संज्ञा के पास गया।
Verse 14
वडवा च तदा त्वाष्ट्री संज्ञा तस्माद्दिवाकरात् सुषुवे चाश्विनौ देवौ देवानां तु भिषग्वरौ
तब त्वष्टृ की पुत्री संज्ञा वडवा बनी; और उस दिवाकर (सूर्य) से उसने अश्विनीकुमार—देवों के श्रेष्ठ वैद्य—दोनों देवों को जन्म दिया।
Verse 15
लिखितो भास्करः पश्चात् संज्ञापित्रा महात्मना विष्णोश्चक्रं तु यद्घोरं मण्डलाद्भास्करस्य तु
इसके बाद संज्ञा के महात्मा पिता ने भास्कर (सूर्य) को अंकित/रेखांकित किया; और भास्कर के मण्डल से विष्णु का वह घोर चक्र प्रकट हुआ।
Verse 16
निर्ममे भगवांस्त्वष्टा प्रधानं दिव्यमायुधम् रुद्रप्रसादाच्च शुभं सुदर्शनमिति स्मृतम्
भगवान् त्वष्टा ने रुद्र की प्रसन्नता से एक प्रधान दिव्य आयुध बनाया, जो परम्परा में ‘शुभ सुदर्शन’ के नाम से स्मरण किया जाता है।
Verse 17
लब्धवान् भगवांश्चक्रं कृष्णः कालाग्निसन्निभम् मनोस्तु प्रथमस्यासन् नव पुत्रास्तु तत्समाः
भगवान् कृष्ण ने प्रलयाग्नि के समान दहकता चक्र प्राप्त किया। प्रथम मनु के नौ पुत्र थे, जो उसके समान तेजस्वी थे; वे पति (शिव) की आज्ञा से धर्म-व्यवस्था को धारण करते, और उसी की इच्छा से बंधित जीव सृष्टि-चक्रों में प्रवृत्त होते हैं।
Verse 18
इक्ष्वाकुर् नभगश् चैव धृष्णुः शर्यातिरेव च नरिष्यन्तश् च वै धीमान् नाभागो ऽरिष्ट एव च
इक्ष्वाकु, नभग, धृष्णु, शर्याति, तथा बुद्धिमान् नरिष्यन्त; और नाभाग व अरिष्ट—ये उसी उज्ज्वल राजवंश के शासक कहे गए हैं। पुराण-दृष्टि में ऐसे धर्मराज पति (शिव) की भक्ति को आधार देते हैं, जिससे पशु-जीव पाश को सत्कर्म और पूजन से ढीला करता है।
Verse 19
करूषश् च पृषध्रश् च नवैते मानवाः स्मृताः इला ज्येष्ठा वरिष्ठा च पुंस्त्वं प्राप च या पुरा
करूष और पृषध्र—इस प्रकार ये नौ ‘मानव’ (मनु की संतान) स्मरण किए गए हैं। उनमें इला ज्येष्ठ और श्रेष्ठ थी; उसने भी पूर्वकाल में दैवी विधान से पुरुषत्व प्राप्त किया।
Verse 20
सुद्युम्न इति विख्याता पुंस्त्वं प्राप्ता त्विला पुरा मित्रावरुणयोस्त्वत्र प्रसादान्मुनिपुङ्गवाः
हे मुनिश्रेष्ठो, इला ने पूर्वकाल में पुरुषत्व प्राप्त कर ‘सुद्युम्न’ नाम से प्रसिद्धि पाई; यह वहाँ मित्र और वरुण की कृपा से हुआ।
Verse 21
पुनः शरवणं प्राप्य स्त्रीत्वं प्राप्तो भवाज्ञया सुद्युम्नो मानवः श्रीमान् सोमवंशप्रवृद्धये
फिर शरवण में लौटकर, श्रीमान् मानव सुद्युम्न ने भव (शिव) की आज्ञा से स्त्रीत्व धारण किया, ताकि सोमवंश की वृद्धि हो।
Verse 22
इक्ष्वाकोरश्वमेधेन इला किंपुरुषो ऽभवत् इला किंपुरुषत्वे च सुद्युम्न इति चोच्यते
इक्ष्वाकु के अश्वमेध यज्ञ से इला किंपुरुष हो गई। और जब इला किंपुरुष-भाव में थी, तब वही सुद्युम्न नाम से भी कही जाती है।
Verse 23
मासमेकं पुमान्वीरः स्त्रीत्वं मासमभूत्पुनः इला बुधस्य भवनं सोमपुत्रस्य चाश्रिता
एक मास वह वीर पुरुष रहा, और फिर एक मास स्त्री हो गया। इस प्रकार इला ने सोमपुत्र बुध के भवन का आश्रय लिया।
Verse 24
बुधेनान्तरमासाद्य मैथुनाय प्रवर्तिता सोमपुत्राद्बुधाच्चापि ऐलो जज्ञे पुरूरवाः
उचित समय पाकर इला बुध के पास गई और दाम्पत्य-संयोग की ओर प्रवृत्त हुई। सोमपुत्र बुध से ही इला का पुत्र पुरूरवा (ऐल) उत्पन्न हुआ। पुराण-प्रवाह में यह वंश-विस्तार पति शिव की अधिष्ठान-शक्ति के अधीन है; और जीव (पशु) काम व भाग्यरूप पाशों से बँधकर संसार में चलते रहते हैं।
Verse 25
सोमवंशाग्रजो धीमान् भवभक्तः प्रतापवान् इक्ष्वाकोर्वंशविस्तारं पश्चाद्वक्ष्ये तपोधनाः
सोमवंश का अग्रज वह बुद्धिमान, भव (शिव) का भक्त और प्रतापी था। हे तपोधन ऋषियो, आगे मैं इक्ष्वाकु के वंश-विस्तार का भी वर्णन करूँगा।
Verse 26
पुत्रत्रयमभूत्तस्य सुद्युम्नस्य द्विजोत्तमाः उत्कलश् च गयश्चैव विनताश्वस्तथैव च
हे द्विजोत्तमों, सुद्युम्न के तीन पुत्र हुए—उत्कल, गय और विनताश्व।
Verse 27
उत्कलस्योत्कलं राष्ट्रं विनताश्वस्य पश्चिमम् गया गयस्य चाख्याता पुरी परमशोभना
उत्कल के लिए ‘उत्कल’ नामक प्रसिद्ध राष्ट्र कहा गया है। उसके पश्चिम में विनताश्व का प्रदेश स्थित है। गया भी ‘गया’ नाम से विख्यात, परम शोभामयी पुरी है—अत्यन्त पवित्र और सर्वत्र प्रसिद्ध तीर्थ-पीठ।
Verse 28
सुराणां संस्थितिर्यस्यां पितॄणां च सदा स्थितिः इक्ष्वाकुज्येष्ठदायादो मध्यदेशम् अवाप्तवान्
जिस भूमि में देवताओं का स्थिर निवास है और जहाँ पितृगण सदा विराजते हैं—उसी में इक्ष्वाकु-वंश के ज्येष्ठ दायाद ने मध्यदेश को प्राप्त किया और वहाँ राज्य किया।
Verse 29
कन्याभावाच्च सुद्युम्नो नैव भागमवाप्तवान् वसिष्ठवचनात् त्वासीत् प्रतिष्ठाने महाद्युतिः
कन्या-भाव धारण करने के कारण सुद्युम्न को राज्य में उचित भाग नहीं मिला। परन्तु वसिष्ठ के वचन से वह महातेजस्वी प्रतिष्ठान में निवास कर वहाँ शासन करने लगा।
Verse 30
प्रतिष्ठा धर्मराजस्य सुद्युम्नस्य महात्मनः तत्पुरूरवसे प्रादाद् राज्यं प्राप्य महायशाः
धर्मराज महात्मा सुद्युम्न की यशस्विनी पुत्री ‘प्रतिष्ठा’ ने राज्य-लक्ष्मी प्राप्त कर, पुरूरवा को वह राज्य प्रदान किया—धर्मानुसार वंश-परम्परा की रक्षा करते हुए।
Verse 31
मानवेयो महाभागः स्त्रीपुंसोर्लक्षणान्वितः इक्ष्वाकोरभवद्वीरो विकुक्षिर्धर्मवित्तमः
मानव-वंश में महाभाग्यशाली, स्त्री-पुरुष दोनों के लक्षणों से युक्त, इक्ष्वाकु से उत्पन्न वीर विकुक्षि प्रकट हुआ—धर्म को जानने वालों में श्रेष्ठ।
Verse 32
ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीद् दश पञ्च च तत्सुताः अभूज्ज्येष्ठः ककुत्स्थश् च ककुत्स्थात्तु सुयोधनः
पुत्रशत के सौ पुत्रों में ज्येष्ठ नामक पुत्र सबसे बड़ा था और उसके पंद्रह पुत्र हुए। उनमें भी ककुत्स्थ ज्येष्ठ था, और ककुत्स्थ से सुयोधन उत्पन्न हुआ।
Verse 33
ततः पृथुर्मुनिश्रेष्ठा विश्वकः पार्थिवस् तथा विश्वकस्यार्द्रको धीमान् युवनाश्वस्तु तत्सुतः
इसके बाद मुनिश्रेष्ठ पृथु हुए और फिर राजा विश्वक। विश्वक से बुद्धिमान आर्द्रक उत्पन्न हुए, और आर्द्रक के पुत्र युवनाश्व थे।
Verse 34
शाबस्तिश् च महातेजा वंशकस्तु ततो ऽभवत् निर्मिता येन शाबस्ती गौडदेशे द्विजोत्तमाः
महातेजस्वी शाबस्ति के बाद वंशक हुआ। हे द्विजोत्तमो! उसी ने गौड़देश में शाबस्ती नामक नगरी की स्थापना की।
Verse 35
वंशाच्च बृहदश्वो ऽभूत् कुवलाश्वस्तु तत्सुतः धुन्धुमारत्वमापन्नो धुन्धुं हत्वा महाबलम्
उस वंश से बृहदश्व उत्पन्न हुए और उनके पुत्र कुवलाश्व थे। महाबली धुन्धु का वध करके कुवलाश्व ‘धुन्धुमार’ पद को प्राप्त हुए और धुन्धु-विनाशक के रूप में प्रसिद्ध हुए।
Verse 36
धुन्धुमारस्य तनयास् त्रयस्त्रैलोक्यविश्रुताः दृढाश्वश्चैव चण्डाश्वः कपिलाश्वश् च ते स्मृताः
धुन्धुमार के तीन पुत्र थे, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। वे दृढाश्व, चण्डाश्व और कपिलाश्व—ऐसे स्मरण किए जाते हैं।
Verse 37
दृढाश्वस्य प्रमोदस्तु हर्यश्वस्तस्य वै सुतः हर्यश्वस्य निकुम्भस्तु संहताश्वस्तु तत्सुतः
दृढ़ाश्व से प्रमोद उत्पन्न हुआ; और उसका पुत्र हर्यश्व था। हर्यश्व से निकुम्भ हुआ, तथा निकुम्भ का पुत्र संहताश्व हुआ।
Verse 38
कृशाश्वो ऽथ रणाश्वश् च संहताश्वात्मजावुभौ युवनाश्वो रणाश्वस्य मान्धाता तस्य वै सुतः
संहताश्व के दो पुत्र हुए—कृशाश्व और रणाश्व। रणाश्व से युवनाश्व उत्पन्न हुआ, और युवनाश्व का पुत्र मान्धाता हुआ।
Verse 39
मान्धातुः पुरुकुत्सो ऽभूद् अम्बरीषश् च वीर्यवान् मुचुकुन्दश् च पुण्यात्मा त्रयस्त्रैलोक्यविश्रुताः
मान्धाता से पुरुकुत्स उत्पन्न हुआ, और पराक्रमी अम्बरीष; तथा पुण्यात्मा मुचुकुन्द—ये तीनों त्रैलोक्य में प्रसिद्ध हुए।
Verse 40
अंबरीषस्य दायादो युवनाश्वो ऽपरः स्मृतः हरितो युवनाश्वस्य हरितास्तु यतः स्मृताः
अम्बरीष का उत्तराधिकारी युवनाश्व (उसी नाम का दूसरा) कहा गया है। उस युवनाश्व से हरित उत्पन्न हुआ, और हरित से ‘हरित’ वंश प्रसिद्ध हुआ।
Verse 41
एते ह्यङ्गिरसः पक्षे क्षत्रोपेता द्विजातयः पुरुकुत्सस्य दायादस् त्रसद्दस्युर् महायशाः
ये अंगिरस-पक्ष के वंशज हैं—क्षत्रिय-तेज से युक्त द्विज। ये पुरुकुत्स के उत्तराधिकारी हैं; और महायशस्वी त्रसद्दस्यु भी उनमें हैं।
Verse 42
नर्मदायां समुत्पन्नः सम्भूतिस्तस्य चात्मजः विष्णुवृद्धः सुतस्तस्य विष्णुवृद्धा यतः स्मृताः
नर्मदा-प्रदेश में सम्भूति उत्पन्न हुए; उनके पुत्र विष्णुवृद्ध थे। उसी विष्णुवृद्ध से उत्पन्न वंशज ‘विष्णुवृद्ध’ नाम से स्मरण किए जाते हैं।
Verse 43
एते ह्यङ्गिरसः पक्षे क्षत्रोपेताः समाश्रिताः सम्भूतिरपरं पुत्रम् अनरण्यमजीजनत्
ये अङ्गिरस-वंश की परम्परा से जुड़े, क्षत्रिय-धर्म में प्रतिष्ठित होकर स्थित थे। तब सम्भूति ने एक और पुत्र—अनरण्य—को जन्म दिया।
Verse 44
रावणेन हतो यो ऽसौ त्रैलोक्यविजये द्विजाः बृहदश्वो ऽनरण्यस्य हर्यश्वस्तस्य चात्मजः
हे द्विजो, त्रैलोक्य-विजय के समय रावण द्वारा जो मारा गया, वह अनरण्य का पुत्र बृहदश्व था; और उसी राजवंश में हर्यश्व उसका पुत्र था।
Verse 45
हर्यश्वात्तु दृषद्वत्यां जज्ञे वसुमना नृपः तस्य पुत्रो ऽभवद्राजा त्रिधन्वा भवभावितः
हर्यश्व से दृषद्वती के तट पर राजा वसुमना उत्पन्न हुए। उनके पुत्र राजा त्रिधन्वा हुए, जो भव (शिव) की भावना से भावित—शिव-भक्ति से संस्कारित—थे।
Verse 46
प्रसादाद् ब्रह्मसूनोर् वै तण्डिनः प्राप्य शिष्यताम् अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य तदाज्ञया
ब्रह्मा के पुत्र की कृपा से उसने तण्डिन के अधीन शिष्यत्व प्राप्त किया। और उसकी आज्ञा से उसने सहस्र अश्वमेध-यज्ञ के तुल्य फल प्राप्त किया।
Verse 47
गणैश्वर्यमनुप्राप्तो भवभक्तः प्रतापवान् कथं चैवाश्वमेधं वै करोमीति विचिन्तयन्
शिवगणों में अधिपत्य प्राप्त कर वह प्रतापी भव-भक्त मन में विचार करने लगा—“मैं वास्तव में अश्वमेध यज्ञ कैसे करूँ?”
Verse 48
धनहीनश् च धर्मात्मा दृष्टवान् ब्रह्मणः सुतम् तण्डिसंज्ञं द्विजं तस्माल् लब्धवान्द्विजसत्तमाः
धनहीन होते हुए भी वह धर्मात्मा ब्रह्मा के पुत्र कहे जाने वाले तण्डि नामक द्विज को देख सका; और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, उससे उसने धर्मजन्य अभीष्ट फल प्राप्त किया।
Verse 49
नाम्नां सहस्रं रुद्रस्य ब्रह्मणा कथितं पुरा तेन नाम्नां सहस्रेण स्तुत्वा तण्डिर्महेश्वरम्
पूर्वकाल में ब्रह्मा ने रुद्र के सहस्र नाम कहे थे। उसी नाम-सहस्र से तण्डि ने महेश्वर की स्तुति की।
Verse 50
लब्धवान्गाणपत्यं च ब्रह्मयोनिर्द्विजोत्तमः ततस्तस्मान्नृपो लब्ध्वा तण्डिना कथितं पुरा
हे श्रेष्ठ द्विजो, ब्रह्मयोनि उस मुनि ने गाणपत्य-विद्या प्राप्त की; फिर राजा ने उससे वही उपदेश पाया, जैसा तण्डि ने पूर्व में कहा था।
Verse 51
नाम्नां सहस्रं जप्त्वा वै गाणपत्यमवाप्तवान् ऋषय ऊचुः नाम्नां सहस्रं रुद्रस्य ताण्डिना ब्रह्मयोनिना
उसने सहस्र नाम का जप करके निश्चय ही गाणपत्य पद प्राप्त किया। ऋषियों ने कहा—“ब्रह्मयोनि ताण्डि द्वारा प्रकट रुद्र का सहस्र नाम (कहा जाए)।”
Verse 52
कथितं सर्ववेदार्थसंचयं सूत सुव्रत नाम्नां सहस्रं विप्राणां वक्तुम् अर्हसि शोभनम्
हे सुव्रत सूत! आपने समस्त वेदों के अर्थ-संग्रह का वर्णन किया। अब आप ब्राह्मणों के पावन सहस्र नामों का शोभन रूप से यथोचित पाठ कीजिए।
Verse 53
सहस्रनामन् ओफ़् शिव सूत उवाच सर्वभूतात्मभूतस्य हरस्यामिततेजसः अष्टोत्तरसहस्रं तु नाम्नां शृणुत सुव्रताः
सूत बोले—हे सुव्रतजनो! समस्त भूतों के आत्मस्वरूप, अमित तेजस्वी हर-शिव के अष्टोत्तर सहस्र नाम सुनो।
Verse 54
यज्जप्त्वा तु मुनिश्रेष्ठा गाणपत्यमवाप्तवान् ॐ स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भानुः प्रवरो वरदो वरः
हे मुनिश्रेष्ठ! इसका जप करके उसने गणपति-पद प्राप्त किया। ॐ—शिव स्थिर हैं, स्थाणु हैं, प्रभु हैं, भानु हैं, प्रवरेश्वर हैं, वरद हैं, और श्रेष्ठतम हैं।
Verse 55
सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः जटी दण्डी शिखण्डी च सर्वगः सर्वभावनः
वह सर्वात्मा है, सर्वत्र विख्यात है; वही सर्व है। भव रूप से वह सबका कर्ता है। वह जटाधारी, दण्डधारी संन्यासी और शिखण्ड-धारी है; सर्वव्यापी होकर सब भावों का पोषण-प्रकाश करता है।
Verse 56
हरिश् च हरिणाक्षश् च सर्वभूतहरः स्मृतः प्रवृत्तिश् च निवृत्तिश् च शान्तात्मा शाश्वतो ध्रुवः
वह हरि भी है और हरिणाक्ष भी; वह समस्त भूतों का हरने वाला स्मरण किया गया है। वही प्रवृत्ति भी है और निवृत्ति भी; उसका आत्मस्वरूप शान्त है, वह शाश्वत और ध्रुव है।
Verse 57
श्मशानवासी भगवान् खचरो गोचरो ऽर्दनः अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूतधारणः
भगवान् श्मशान में वास करने वाले हैं; वे आकाश में विचरते और पृथ्वी पर भी चलते हैं। वे बन्धन-हर, वन्दनीय, महाकर्मा, महान् तपस्वी और समस्त भूतों के धारक हैं।
Verse 58
उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नः सर्वलोकः प्रजापतिः महारूपो महाकायः सर्वरूपो महायशाः
वे उन्मत्त तपस्वी का वेष धारण करते हैं, परन्तु सामान्य दृष्टि से परे गुप्त रहते हैं। वे ही समस्त लोक हैं, प्रजापति हैं; महा-रूप, महा-काय, सर्वरूप और महायशस्वी शिव हैं।
Verse 59
महात्मा सर्वभूतश् च विरूपो वामनो नरः लोकपालो ऽन्तर्हितात्मा प्रसादो ऽभयदो विभुः
वे महात्मा हैं, समस्त भूतों में स्थित हैं; रूपातीत होकर भी वामन और नर का रूप धारण करते हैं। वे लोकपाल हैं, जिनका आत्मस्वरूप गुप्त है; वे प्रसाद-स्वरूप, अभयदाता, सर्वव्यापी विभु हैं।
Verse 60
पवित्रश् च महांश्चैव नियतो नियताश्रयः स्वयंभूः सर्वकर्मा च आदिरादिकरो निधिः
वे पवित्र और महान हैं; स्वयं संयमी हैं और संयमियों के आश्रय हैं। वे स्वयंभू हैं, सर्वकर्मा हैं; आद्य हैं, आदियों के भी कारण हैं, और अक्षय निधि हैं।
Verse 61
सहस्राक्षो विशालाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर् ग्रहो ग्रहपतिर्मतः
वे सहस्राक्ष, विशालाक्ष हैं; वे सोम हैं, नक्षत्रों के साधक-नियन्ता हैं। वे चन्द्र और सूर्य हैं; वे शनि और केतु हैं। वे समस्त ग्रह-तत्त्व हैं और ग्रहपति माने जाते हैं।
Verse 62
राजा राज्योदयः कर्ता मृगबाणार्पणो घनः महातपा दीर्घतपा अदृश्यो धनसाधकः
वह परम राजा है, सच्चे राज्य का उदय और सब कार्यों का कर्ता है। मृग-शिकारी के बाण का अर्पण जिसे समर्पित होता है, वह घन-व्यापक है। वह महातपस्वी, दीर्घतपस्वी, अदृश्य प्रभु और धन-समृद्धि का साधक है।
Verse 63
संवत्सरः कृतीमन्त्रः प्राणायामः परंतपः योगी योगो महाबीजो महारतो महाबलः
वह संवत्सर—कालचक्रों का स्वामी है; सिद्धि देने वाला पवित्र मन्त्र है; प्राणायाम-रूप अनुशासन है; और शत्रुओं को तपाने वाला परंतप है। वह योगी भी है और योग स्वयं; महाबीज—परम कारण-तत्त्व; महान रत साधक; और महाबलवान है।
Verse 64
सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो वृषवाहनः दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः
वह सुवर्ण-रेताः—स्वर्णमय, मंगलमय सृजन-शक्ति वाला; सर्वज्ञ प्रभु; सुबीज—निर्दोष प्राकट्य-कारण; वृषवाहन है। वह दशबाहु, अनिमिष साक्षी, नीलकण्ठ और उमापति शिव है—जो पशु को पाश से मुक्त करने वाला पति है।
Verse 65
विश्वरूपः स्वयंश्रेष्ठो बलवीरो बलाग्रणीः गणकर्ता गणपतिर् दिग्वासाः काम्य एव च
वह विश्वरूप—जिसका रूप ही जगत है; स्वयंश्रेष्ठ, अनुपम और सर्वोच्च है। वह बलवीर, बलाग्रणी—बलवानों में अग्रणी है। वह गणों का कर्ता, गणपति; दिग्वासा—दिशाओं को वस्त्र मानने वाला; और योग्य कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
Verse 66
मन्त्रवित्परमो मन्त्रः सर्वभावकरो हरः कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान्
वह मन्त्रों का ज्ञाता है और परम मन्त्र स्वयं है; वह हर—समस्त भावों को प्रकट करने वाला है। कमण्डलु धारण करने वाला तपस्वी भी वही है; वही धनुर्धर, बाणहस्त, और कपालवान शिव है—जो पशु के बंधन का क्षय करता है।
Verse 67
शरी शतघ्नी खड्गी च पट्टिशी चायुधी महान् अजश् च मृगरूपश् च तेजस्तेजस्करो विधिः
वह शूलधारी है, शतघ्नी से संहार करने वाला, खड्ग और पट्टिश धारण करने वाला—समस्त आयुधों से युक्त महान् प्रभु। वह अजन्मा है, मृगरूप धारण करता है, स्वयं तेज है, तेज को बढ़ाने वाला है, और धर्म-व्यवस्था का विधि-स्वरूप है।
Verse 68
उष्णीषी च सुवक्त्रश् च उदग्रो विनतस् तथा दीर्घश् च हरिकेशश् च सुतीर्थः कृष्ण एव च
वह उष्णीष धारण करने वाला, सुन्दर मुख वाला, ऊँचा और विनीत भी है। वह दीर्घ-विस्तार वाला, हरि-केश (सुवर्ण-केश) वाला, प्राणियों के लिए पवित्र तीर्थ-स्वरूप, और कृष्णवर्ण—केवल शिव है।
Verse 69
शृगालरूपः सर्वार्थो मुण्डः सर्वशुभङ्करः सिंहशार्दूलरूपश् च गन्धकारी कपर्द्यपि
वह शृगालरूप भी है और समस्त पुरुषार्थों का सार-लक्ष्य भी। वह मुण्डित तपस्वी है, सब शुभ का कर्ता। वह सिंह और शार्दूल (व्याघ्र) रूप धारण करता है; वह सुगन्ध का कर्ता है और कपर्दी—जटाओं के कुण्डलधारी प्रभु है।
Verse 70
ऊर्ध्वरेतोर्ध्वलिङ्गी च ऊर्ध्वशायी नभस्तलः त्रिजटी चीरवासाश् च रुद्रः सेनापतिर् विभुः
वह ऊर्ध्वरेता है, ऊर्ध्वलिङ्ग धारण करने वाला है; वह नभस्तल में ऊर्ध्वशायी है। वह त्रिजटी है, चीर-वस्त्र धारण करने वाला है; वह रुद्र—देवगणों का सेनापति—सर्वव्यापी विभु है।
Verse 71
अहोरात्रं च नक्तं च तिग्ममन्युः सुवर्चसः गजहा दैत्यहा कालो लोकधाता गुणाकरः
वह दिन-रात स्वयं है और रात्रि भी; वह तीक्ष्ण क्रोध वाला और दीप्तिमान तेजस्वी है। वह गजासुर-हन्ता, दैत्य-हन्ता; वह काल है, लोकों का धाता, और गुणों का आकर—सर्वशक्ति का निधि है।
Verse 72
सिंहशार्दूलरूपाणाम् आर्द्रचर्मांबरंधरः कालयोगी महानादः सर्वावासश्चतुष्पथः
जो सिंह और व्याघ्र के रूप धारण करते हैं, आर्द्र चर्म का अम्बर पहनते हैं; वे काल-योगी, महानाद-स्वरूप, सबके भीतर निवास करने वाले और चतुष्पथ—समस्त मार्गों में स्थित हैं।
Verse 73
निशाचरः प्रेतचारी सर्वदर्शी महेश्वरः बहुभूतो बहुधनः सर्वसारो ऽमृतेश्वरः
वे निशाचर हैं, प्रेतगणों के साथ विचरने वाले; सर्वदर्शी महेश्वर। वे बहुरूप होकर प्रकट होते हैं, असंख्य शक्तियों-सम्पदाओं से सम्पन्न; वे सर्वसार और अमृत के ईश्वर हैं।
Verse 74
नृत्यप्रियो नित्यनृत्यो नर्तनः सर्वसाधकः सकार्मुको महाबाहुर् महाघोरो महातपाः
वे नृत्यप्रिय हैं, नित्यनृत्य—सदा नृत्य करने वाले; नर्तन-तत्त्वस्वरूप, सब साधनों के सिद्धकर्ता। धनुषधारी, महाबाहु, महाघोर, और महातपस्वी हैं।
Verse 75
महाशरो महापाशो नित्यो गिरिचरो मतः सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यनिन्दितः
वे महाशर और महापाश हैं; नित्य, गिरिचर के नाम से प्रसिद्ध। सहस्रहस्त, वे स्वयं विजय हैं—अडिग उद्योग, और सर्वथा अनिन्द्य।
Verse 76
अमर्षणो मर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशनः दक्षहा परिचारी च प्रहसो मध्यमस् तथा
वे अमर्षण हैं, फिर भी मर्षणात्मा—क्षमा-स्वभाव; अहंकारयुक्त यज्ञ का संहारक, कामनाओं के नाशक। दक्ष के दर्प का हन्ता, सर्वत्र परिचर्या करने वाले, प्रहास-दीप्त, तथा मध्यम—समत्व में स्थित।
Verse 77
तेजो ऽपहारी बलवान् विदितो ऽभ्युदितो बहुः गंभीरघोषो योगात्मा यज्ञहा कामनाशनः
जो समस्त तेज को अपने में समेट लेने वाले हैं; बलवान, प्रसिद्ध, सदा उदित और उन्नत, बहुरूप हैं। जिनकी वाणी गम्भीर-गर्जन है, जिनका स्वरूप योग है, जो यज्ञ के अधिपति हैं और कामनाओं का नाश करते हैं—वे लिङ्गोद्भव महादेव, पति हैं।
Verse 78
गंभीररोषो गंभीरो गंभीरबलवाहनः न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो विश्वकर्मा च विश्वभुक्
जिनका रोष भी गम्भीर है; जो स्वयं अगाध-गम्भीर हैं; जिनकी शक्ति और वाहन भी गम्भीर व अजेय हैं। जो न्यग्रोध (वट) का रूप धारण करते हैं और स्वयं न्यग्रोध हैं; जो विश्वकर्मा हैं और विश्व के भोगकर्ता-पालक हैं—वे पशुओं (बद्ध जीवों) के स्वामी, पति हैं।
Verse 79
तीक्ष्णोपायश् च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित् विष्णुः प्रसादितो यज्ञः समुद्रो वडवामुखः
वे तीक्ष्ण और अचूक उपाय वाले हैं; हर्यश्व (शीघ्र अश्वों के स्वामी) हैं; सदा सहायक हैं; कर्म और क्रिया के उचित काल के ज्ञाता हैं। वे विष्णु—सर्वव्यापी हैं; प्रसन्न होकर पूजित होने वाले हैं; स्वयं यज्ञ हैं; समुद्र हैं; और वडवामुख (अग्नि) हैं जो गहराइयों को भस्म करता है।
Verse 80
हुताशनसहायश् च प्रशान्तात्मा हुताशनः उग्रतेजा महातेजा जयो विजयकालवित्
वे हुताशन (अग्नि) के सहायक हैं और जिनका अन्तःकरण पूर्णतः प्रशान्त है। वे स्वयं हुताशन हैं, जो अशुद्धि को भस्म करते हैं। उग्र तेज और महातेज से युक्त, वे जयस्वरूप हैं और विजय के उचित काल के ज्ञाता हैं।
Verse 81
ज्योतिषामयनं सिद्धिः संधिर्विग्रह एव च खड्गी शङ्खी जटी ज्वाली खचरो द्युचरो बली
वे समस्त ज्योतियों का पथ और आश्रय हैं; वे स्वयं सिद्धि हैं। वे संधि भी हैं और विग्रह (संघर्ष) भी। वे खड्गधारी और शंखधारी हैं। जटाधारी, ज्वालामय तेज से दीप्त, वे आकाश में विचरते और द्युलोक में गमन करते हैं—सदा बलवान।
Verse 82
वैणवी पणवी कालः कालकण्ठः कटंकटः नक्षत्रविग्रहो भावो निभावः सर्वतोमुखः
वह वैणवी और पणवी है—पवित्र नाद-लय की अंतःशक्ति। वही काल है और कालकण्ठ, भय-भंजन, अजेय प्रभु। उसका स्वरूप नक्षत्रों का ही विग्रह है; वह भाव है और निभाव, और सर्वतोमुख होकर सब दिशाओं में व्याप्त है।
Verse 83
विमोचनस्तु शरणो हिरण्यकवचोद्भवः मेखलाकृतिरूपश् च जलाचारः स्तुतस् तथा
वह विमोचन—मुक्तिदाता है; वह शरण—आश्रय है। वह हिरण्यकवच से उद्भूत, स्वर्ण-कवचधारी रूप में प्रकट होता है; उसका रूप मेखला-सा है। वह जलाचार—जल में विचरण करने वाला भी है; इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है।
Verse 84
वीणी च पणवी ताली नाली कलिकटुस् तथा सर्वतूर्यनिनादी च सर्वव्याप्यपरिग्रहः
वह वीणा है और पणवी, ताल है और नाली; वह कलिकटु—तीक्ष्ण, चुभती ध्वनि भी है। वह समस्त वाद्यों की निनाद-ध्वनि है, और सर्वव्यापी प्रभु है जो सबको अपने में समेट लेता है।
Verse 85
व्यालरूपी बिलावासी गुहावासी तरंगवित् वृक्षः श्रीमालकर्मा च सर्वबन्धविमोचनः
वह व्यालरूपी—महासर्प का रूप धारण करने वाला है; बिलावासी और गुहावासी—गुहाओं व विवरों में निवास करने वाला। वह तरंगवित्—तरंगों की गति जानने वाला है; वह विश्ववृक्ष के समान स्थित है। उसका कर्म श्रीमय, मंगलमय है; और वह समस्त बंधनों से विमोचन करने वाला है।
Verse 86
बन्धनस्तु सुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः सखा प्रवासो दुर्वापः सर्वसाधुनिषेवितः
वह सुरेन्द्रों का बंधन (और नियामक) है; युद्ध में शत्रु-विनाशक है। वह सखा है; प्रवास—वैराग्यपूर्ण निवास करने वाला है; दुर्वाप—दुर्लभ-प्राप्त प्रभु है। वह समस्त साधुओं द्वारा निषेवित, पूजित और आश्रित है।
Verse 87
प्रस्कन्दो ऽप्यविभावश् च तुल्यो यज्ञविभागवित् सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवो मतः
वह प्रस्कन्द है, और अविभाव भी; वह ‘तुल्य’—सबमें सम और सबके प्रति समान है। वह यज्ञ-विधियों के विभागों का ज्ञाता है। वह ‘सर्ववास’—सबमें वास करने वाला, ‘सर्वचारी’—सर्वत्र विचरण करने वाला; ‘दुर्वासा’—कठोर तपस्वी, और ‘वासव’—ऐश्वर्य-प्रदाता माना गया है।
Verse 88
हैमो हेमकरो यज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः आकाशो निर्विरूपश् च विवासा उरगः खगः
वह स्वर्णमय तेजस्वी है और स्वर्ण का कर्ता भी; वही यज्ञस्वरूप है। वह सबका धारक और सर्वोत्तम धारणकर्ता है। वह आकाशवत् व्यापक है और निराकार भी। वह सदा प्रकाशमान है; वह सर्प-रूप और पक्षी-रूप होकर, पाशों से परे पति-तत्त्व में सर्वत्र व्याप्त है।
Verse 89
भिक्षुश् च भिक्षुरूपी च रौद्ररूपः सुरूपवान् वसुरेताः सुवचस्वी वसुवेगो महाबलः
वह भिक्षु है और भिक्षु-रूप भी; वह रौद्र-रूप होकर भी परम सुन्दर है। उसका तेजस्वी वीर्य स्थिर और उज्ज्वल है; उसकी वाणी शुभ और सत्य है। उसकी गति समृद्धि-शक्ति के वेग समान है, और वह महाबली है।
Verse 90
मनोवेगो निशाचारः सर्वलोकशुभप्रदः सर्वावासी त्रयीवासी उपदेशकरो धरः
वह मन से भी वेगवान है; वह निशाचर है—सामान्य दृष्टि से परे रात्रि में विचरण करने वाला। वह समस्त लोकों को शुभता प्रदान करता है। वह सब निवासों में वास करने वाला, और वेदत्रयी में प्रतिष्ठित है। वह उपदेश देने वाला, और सबको धारण करने वाला धर है।
Verse 91
मुनिरात्मा मुनिर् लोकः सभाग्यश् च सहस्रभुक् पक्षी च पक्षरूपश् च अतिदीप्तो निशाकरः
वह मुनि-स्वरूप आत्मा है; वह लोकों में व्याप्त मुनि है। वह सौभाग्यदायक है और सहस्र अर्पणों का भोक्ता है। वह पक्षी है और पंखयुक्त रूप भी; वह अतिदीप्त, और निशाकर—रात्रि का कर्ता चन्द्रस्वरूप है।
Verse 92
समीरो दमनाकारो ह्य् अर्थो ह्यर्थकरो वशः वासुदेवश् च देवश् च वामदेवश् च वामनः
वह समीरा है—समस्त प्राणियों को चलाने वाली प्राण-वायु; वह दमनाकार है—बंधन को अनुशासित करने वाला। वही अर्थ है और अर्थकर है—सच्चे प्रयोजन का दाता; वही वश है—स्वामित्व का प्रभु। वही वासुदेव, दिव्य देव; वही वामदेव, कल्याणमय; और वही वामन—जो जगतों को अपने में नापकर धारण करता है।
Verse 93
सिद्धियोगापहारी च सिद्धः सर्वार्थसाधकः अक्षुण्णः क्षुण्णरूपश् च वृषणो मृदुर् अव्ययः
वह अयोग्य से सिद्धि-योग को भी हर लेने वाला है; वह सदा सिद्ध है, और समस्त सत्-अर्थों को सिद्ध करने वाला। वह अक्षुण्ण—अखंड है, फिर भी लीला हेतु क्षुण्णरूप—भंग-सा रूप धारण करता है; वह वृषण—महाबलवान वृषभ-स्वरूप, मृदु—करुणामय, और अव्यय—अविनाशी शिव है।
Verse 94
महासेनो विशाखश् च षष्टिभागो गवां पतिः चक्रहस्तस्तु विष्टम्भी मूलस्तम्भन एव च
वह महासेन है और विशाख है; वह षष्टिभाग—माप-विभागों का सर्वव्यापी नियामक है। वह गवां पति—गौओं का तथा समस्त प्राणियों का रक्षक-स्वामी है। वह चक्रहस्त—चक्र धारण करने वाला, विष्टम्भी—जगत् का आधार, और मूलस्तम्भन—अस्तित्व की जड़ को स्थिर करने वाला है।
Verse 95
ऋतुरृतुकरस्तालो मधुर्मधुकरो वरः वानस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजितः
वह ऋतु है और ऋतुकर—ऋतुओं का कर्ता; वह ताल—लय और माप है। वह मधु—स्वयं मधुरता है और मधुकर—मधु संचित करने वाला; वह वर—परम श्रेष्ठ है। वह वानस्पत्य—वनस्पति और वन का अधिपति; वह वाजसन—यज्ञ-आहार का दाता; और वह नित्य आश्रमों में पूजित—तपस्वियों का आराध्य पति है।
Verse 96
ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी सुचारवित् ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी ह्यनेकदृक्
वह ब्रह्मचारी है—दिव्य संयमी; वह लोकचारी—लोकों में विचरण करने वाला। वह सर्वचारी—सर्वत्र गमनशील, और सुचारवित्—सदाचार का ज्ञाता है। वह ईशान, परम ईश्वर; वह काल—समयस्वरूप है। वह निशाचारी—रात्रि में भी विचरण करता है, और अनेकदृक्—अनेक प्रकार से सबको देखने वाला है।
Verse 97
निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर् नन्दिकरो हरः नन्दीश्वरः सुनन्दी च नन्दनो विषमर्दनः
वह निमित्त में स्थित भी है और स्वयं निमित्त-कारण भी है। वह नन्दी, आनन्द-प्रदाता, हर, नन्दीश्वर, सुनन्दी, नन्दन तथा विष (विषादि) का मर्दन करने वाला है।
Verse 98
भगहारी नियन्ता च कालो लोकपितामहः चतुर्मुखो महालिङ्गश् चारुलिङ्गस्तथैव च
वह भग (ऐश्वर्य/शक्ति) का हरण करने वाला और परम नियन्ता है; वह स्वयं काल है, लोकों का पितामह है। वह चतुर्मुख है; वह महालिङ्ग और उसी प्रकार चारुलिङ्ग भी है।
Verse 99
लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षः कालाध्यक्षो युगावहः बीजाध्यक्षो बीजकर्ता अध्यात्मानुगतो बलः
वह लिङ्ग का अधिपति, देवों का अधिपति, काल का अधिपति और युगों को धारण करने वाला है। वह बीज का अधिपति और बीज का कर्ता है; वह अध्यात्म के अनुगामी अन्तर्बल है।
Verse 100
इतिहासश् च कल्पश् च दमनो जगदीश्वरः दम्भो दम्भकरो दाता वंशो वंशकरः कलिः
वह इतिहास भी है और कल्प भी; वह दमन करने वाला, जगदीश्वर है। वह दम्भ भी है और दम्भ का कर्ता भी; वह दाता है। वह वंश है और वंश-कर्ता है; और वह कलि (कलियुग) भी है।
Verse 101
लोककर्ता पशुपतिर् महाकर्ता ह्यधोक्षजः अक्षरं परमं ब्रह्म बलवाञ्छुक्त एव च
वह लोकों का कर्ता है; वह पशुपति—पाशबद्ध जीवों का स्वामी (पति) है। वह महाकर्ता, इन्द्रियों की पहुँच से परे अधोक्षज है। वह अक्षर, परम ब्रह्म है—बलवान और सत्य-वाणी (शुक्त) स्वरूप है।
Verse 102
नित्यो ह्यनीशः शुद्धात्मा शुद्धो मानो गतिर्हविः प्रासादस्तु बलो दर्पो दर्पणो हव्य इन्द्रजित्
वह नित्य, अनियंत्रित, शुद्ध आत्मा और स्वयं शुद्धता है। वही मान (माप), परम गति-आश्रय और पवित्र हवि है। वही प्रासाद-तुल्य दिव्य धाम, बल, दर्प और दर्पण है; वही हव्य-योग्य और इन्द्र-तुल्य शक्तियों का विजेता शिव है।
Verse 103
वेदकारः सूत्रकारो विद्वांश् च परमर्दनः महामेघनिवासी च महाघोरो वशीकरः
वह वेदों का कर्ता, सूत्रों का रचयिता और परम विद्वान है। वह बन्धन का मर्दन करने वाला महाविजयी है; वह महामेघ में निवास करने वाला, अज्ञान का महाघोर संहारक, और सबको वश में करने वाला प्रभु है।
Verse 104
अग्निज्वालो महाज्वालः परिधूम्रावृतो रविः धिषणः शङ्करो नित्यो वर्चस्वी धूम्रलोचनः
वह अग्नि की ज्वाला और महाज्वाला है; वह परिधि में धूम्र से आवृत सूर्य के समान है। वह धिषणा (अन्तर्बुद्धि) है; वह नित्य शंकर, तेजस्वी, और धूम्रलोचन प्रभु है, जिसकी दृष्टि बन्धन को भस्म कर देती है।
Verse 105
नीलस् तथाङ्गलुप्तश् च शोभनो नरविग्रहः स्वस्ति स्वस्तिस्वभावश् च भोगी भोगकरो लघुः
वह नीलकण्ठ-स्वरूप, और अंगों को सामान्य दृष्टि से लुप्त रखने वाला है; वह शोभन, नरविग्रह धारण करने वाला है। वह स्वस्ति स्वयं है और स्वस्ति-स्वभाव है; वह भोगी (पति) और भोग देने वाला है, फिर भी लघु—अस्पर्शित, अबद्ध रहता है।
Verse 106
उत्सङ्गश् च महाङ्गश् च महागर्भः प्रतापवान् कृष्णवर्णः सुवर्णश् च इन्द्रियः सर्ववर्णिकः
वह उत्सङ्ग—जगत् का आश्रय-आलिंगन, महाङ्ग—अपरिमित स्वरूप, महागर्भ—समस्त लोकों का महान् गर्भ, और प्रतापवान्—तेजस्वी प्रभु है। वह कृष्णवर्ण रहस्य भी है और सुवर्ण-प्रभा भी; वह इन्द्रिय—इन्द्रियों का अन्तर्यामी, और सर्ववर्णिक—सब रूप-रंग में प्रकट होकर भी गुणातीत एक पति है।
Verse 107
महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः महामूर्धा महामात्रो महामित्रो नगालयः
जिनके चरण विशाल हैं, जिनके हाथ महाबलवान हैं, जिनका स्वरूप विराट और यश परम है; जिनका मस्तक महान है, जिनकी महिमा अपरिमेय है, जिनकी मैत्री अनन्त है—वे पर्वतों में निवास करने वाले कैलासपति शिव हैं।
Verse 108
महास्कन्धो महाकर्णो महोष्ठश् च महाहनुः महानासो महाकण्ठो महाग्रीवः श्मशानवान्
जिनके कंधे विशाल हैं, जिनके कान महान हैं, जिनके ओष्ठ और हनु प्रबल हैं; जिनकी नासिका उन्नत, कंठ और ग्रीवा विराट हैं—वे श्मशानवासी प्रभु, भयातीत पति शिव हैं, जो पशुओं (बंधित जीवों) को मोक्ष प्रदान करते हैं।
Verse 109
महाबलो महातेजा ह्य् अन्तरात्मा मृगालयः लम्बितोष्ठश् च निष्ठश् च महामायः पयोनिधिः
वे महाबलवान और महातेजस्वी हैं; निश्चय ही वे अन्तरात्मा हैं। वे मृगों के बीच निवास करने वाले, समस्त प्राणियों के स्वामी हैं। लम्बित ओष्ठों वाले, अचल-निष्ठ, वे महामाया हैं और समस्त प्रवाह का समुद्र-निधि हैं।
Verse 110
महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः महानखो महारोमा महाकेशो महाजटः
वे महादन्त वाले, महादंष्ट्र (प्रबल दाढ़) वाले हैं; उनकी जिह्वा विशाल और मुख विराट है। उनके नख महान, रोम बहुल, केश घने और जटा महाप्रचण्ड है—ऐसे महादेव का भय-भास्वर रूप सब मापों से परे है।
Verse 111
असपत्नः प्रसादश् च प्रत्ययो गीतसाधकः प्रस्वेदनो ऽस्वेदनश् च आदिकश् च महामुनिः
वे असपत्न (अद्वितीय) हैं; वे ही प्रसाद-स्वरूप कृपा हैं; वे ही प्रत्यय—अटल आश्रय हैं; वे पवित्र गीत-कीर्तन के साधक-सिद्धकर्ता हैं। वे तप से स्वेद उत्पन्न करने वाले भी हैं और स्वेद से परे, निर्विकार भी; वे आदिक, और महामुनि शिव हैं।
Verse 112
वृषको वृषकेतुश् च अनलो वायुवाहनः मण्डली मेरुवासश् च देववाहन एव च
वह वृषक और वृषकेतु है; वह अनल, प्रज्वलित अग्नि है; वह वायुवाहन, पवन पर आरूढ़ है; वह मण्डली, युग-चक्रों का अधिपति है; वह मेरु पर निवास करता है; और वही देववाहन है, जो देवों को धारण करता है।
Verse 113
अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रोर्जितेक्षणः यजुः पादभुजो गुह्यः प्रकाशौजास्तथैव च
जिसका शिर अथर्ववेद है, जिसका मुख सामवेद है; जिसकी प्रबल दृष्टि सहस्र ऋचाएँ हैं; जिसके चरण यजुः हैं—वह गुह्य, अंतर्हित प्रभु है, और वही प्रकाशमय ओज वाला है।
Verse 114
अमोघार्थप्रसादश् च अन्तर्भाव्यः सुदर्शनः उपहारः प्रियः सर्वः कनकः काञ्चनस्थितः
जिसकी कृपा का प्रयोजन कभी निष्फल नहीं होता; जो भीतर ही भीतर अनुभूत होने योग्य अंतर्वासी प्रभु है; जो सुदर्शन, मनोहर-दर्शन वाला है; जो पूजन का उपहार स्वयं है; जो सर्वप्रिय है; जो कनकस्वरूप, काञ्चन-तेज में स्थित है।
Verse 115
नाभिर् नन्दिकरो हर्म्यः पुष्करः स्थपतिः स्थितः सर्वशास्त्रो धनश्चाद्यो यज्ञो यज्वा समाहितः
वह नाभि—जगत् का केंद्र है; वह नन्दिकर—मंगल-आनन्द का दाता है; वह हर्म्य—उच्च दिव्य धाम है; वह पुष्कर—पवित्र सरोवर-सम है; वह स्थपति—सृष्टि का शिल्पी है और सदा स्थित है। वह सर्वशास्त्रस्वरूप, धन और आद्य है; वही यज्ञ है और यजमान भी, योग-समाधि में समाहित।
Verse 116
नगो नीलः कविः कालो मकरः कालपूजितः सगणो गणकारश् च भूतभावनसारथिः
वह नग—पर्वत-सम दृढ़ है; वह नील—श्यामवर्ण है; वह कवि—द्रष्टा-ऋषि है; वह काल—समयस्वरूप है; वह मकर—मकर-चिह्नधारी प्रभु है; वह कालरूप से पूजित है; वह सगण—गणों सहित है; वह गणकार—गणों का स्रष्टा और नायक है; और वह भूतभावनसारथि—समस्त प्राणियों को उन्नत करने वाला सारथि है।
Verse 117
भस्मशायी भस्मगोप्ता भस्मभूततनुर्गणः आगमश् च विलोपश् च महात्मा सर्वपूजितः
वह भस्म पर शयन करने वाले, भस्म के रक्षक, जिनके गणों के तन मानो भस्ममय हैं; वही आगमस्वरूप और संहारक; महात्मा, सर्वपूजित शिव हैं।
Verse 118
शुक्लः स्त्रीरूपसम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः आश्रमस्थः कपोतस्थो विश्वकर्मा पतिर्विराट्
वह शुक्ल—दीप्तिमान और पवित्र; स्त्रीरूप-शक्ति से सम्पन्न; शुचि, निर्मल, भूतगणों द्वारा सेवित। आश्रमस्थ, कपोत-सम शान्ति में स्थित; विश्वकर्मा, पति और विराट् हैं।
Verse 119
विशालशाखस् ताम्रोष्ठो ह्य् अम्बुजालः सुनिश्चितः कपिलः कलशः स्थूल आयुधश्चैव रोमशः
वह विशालशाखा वाले, ताम्र-ओष्ठ, अम्बुजाल-स्वरूप, दृढ़निश्चयी; कपिलवर्ण, कलशस्वरूप, स्थूलकाय; आयुधधारी और रोमश—ऐसे प्रभु हैं।
Verse 120
गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यो ह्य् अविज्ञेयः सुशारदः परश्वधायुधो देवो ह्य् अर्थकारी सुबान्धवः
वह गन्धर्वस्वरूप, अदिति-तुल्य अनन्त, तार्क्ष्य-सम वेगवान; अविज्ञेय, सुशारद, परम विवेकी। परशु उनका आयुध है; वे देव, अर्थकारी और सबके सुबान्धव हैं।
Verse 121
तुम्बवीणो महाकोप ऊर्ध्वरेता जलेशयः उग्रो वंशकरो वंशो वंशवादी ह्यनिन्दितः
वह तुम्बवीणा-वादक, महाकोपस्वरूप, ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी; जल में शयन करने वाले जलेशय। उग्र, वंशकर्ता, स्वयं वंश, वंशवादी और अनिन्दित प्रभु हैं।
Verse 122
सर्वाङ्गरूपी मायावी सुहृदो ह्यनिलो बलः बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः
वे सर्वाङ्गरूप, मायाधारी, हितैषी सुहृद् हैं; वही अनिल और पराक्रम हैं। वही बन्धन और बन्धनकर्ता हैं, तथा दृढ़ बन्धनों से भी मुक्त कराने वाले विमोचक हैं।
Verse 123
राक्षसघ्नो ऽथ कामारिर् महादंष्ट्रो महायुधः लम्बितो लम्बितोष्ठश् च लम्बहस्तो वरप्रदः
वे राक्षसों के संहारक, काम के शत्रु हैं; महादंष्ट्र और महायुधधारी हैं। वे ऊँचे, दीर्घोष्ठ और दीर्घबाहु हैं—वरदान देने वाले प्रभु।
Verse 124
बाहुस्त्वनिन्दितः सर्वः शङ्करो ऽथाप्यकोपनः अमरेशो महाघोरो विश्वदेवः सुरारिहा
वे महाबाहु, सर्वथा अनिन्द्य हैं; वे शंकर हैं और फिर भी अकोप—क्रोधरहित। वे अमरों के ईश्वर, महाघोर, विश्वदेव, और देवताओं के शत्रुओं के संहारक हैं।
Verse 125
अहिर्बुध्न्यो निरृतिश् च चेकितानो हली तथा अजैकपाच्च कापाली शं कुमारो महागिरिः
अहिर्बुध्न्य, निरृति, चेकीतान, हली, अजैकपाद, कापाली, शं, कुमार और महागिरि—ये भी रुद्र के सहस्रनाम में पूज्य नाम-रूप हैं, जिनसे पति-परमेश्वर की बहुरूप शक्ति प्रकट होती है, जो पाश का दमन कर पशुओं (बद्ध जीवों) की रक्षा करती है।
Verse 126
धन्वन्तरिर्धूमकेतुः सूर्यो वैश्रवणस् तथा धाता विष्णुश् च शक्रश् च मित्रस्त्वष्टा धरो ध्रुवः
वे धन्वन्तरि, धूमकेतु, सूर्य और वैश्रवण (कुबेर) हैं। वे धाता, विष्णु और शक्र (इन्द्र) हैं; वे मित्र, त्वष्टा, धर और ध्रुव—अचल धुरी—भी हैं।
Verse 127
प्रभासः पर्वतो वायुर् अर्यमा सविता रविः धृतिश्चैव विधाता च मान्धाता भूतभावनः
वही प्रभास (दीप्त तेज) है, वही पर्वत-सा अचल आधार है; वही वायु, अर्यमा, सविता और रवि है। वही धृति और विधाता है; वही मान्धाता है, और वही भूतभावन—समस्त प्राणियों को प्रकट कर पोषित करने वाले परम पति हैं।
Verse 128
नीरस्तीर्थश् च भीमश् च सर्वकर्मा गुणोद्वहः पद्मगर्भो महागर्भश् चन्द्रवक्त्रो नभो ऽनघः
वही नीरस्तीर्थ है—जिसकी पवित्रता किसी एक तीर्थ तक सीमित नहीं; वही भीम, भय-भक्ति जगाने वाले प्रभु हैं। वही सर्वकर्मा, समस्त कर्मों के कर्ता और अंतर्यामी नियन्ता; गुणोद्वह, गुणों के धारक तथा अतीत आधार। वही पद्मगर्भ, प्रकट जगत्-व्यवस्था का स्रोत; महागर्भ, समस्त लोकों का विराट गर्भ; चन्द्रवक्त्र, चन्द्र-सम शीतल मुख; और नभ—सर्वव्यापी आकाश; अनघ, कर्म-मल से रहित परम पति।
Verse 129
बलवांश्चोपशान्तश् च पुराणः पुण्यकृत्तमः क्रूरकर्ता क्रूरवासी तनुरात्मा महौषधः
वही बलवान् और पूर्ण उपशान्त है; वही पुराण, पुण्य का परम कर्ता है। वही क्रूरकर्ता और क्रूरवासी है; सूक्ष्म-स्वरूप आत्मा है, और पाश-बन्धन को हरने वाली महौषधि है।
Verse 130
सर्वाशयः सर्वचारी प्राणेशः प्राणिनां पतिः देवदेवः सुखोत्सिक्तः सदसत्सर्वरत्नवित्
वही सर्वाशय—सबके हृदय में आश्रय है; वही सर्वचारी—सर्वत्र विचरने वाला है। वही प्राणेश, समस्त प्राणियों का पति है; वही देवदेव, आनन्द से परिपूर्ण है; वही सत्-असत् का ज्ञाता और समस्त रत्नतत्त्वों का जानने वाला है।
Verse 131
कैलासस्थो गुहावासी हिमवद्गिरिसंश्रयः कुलहारी कुलाकर्ता बहुवित्तो बहुप्रजः
वही कैलासस्थ है, वही गुहावासी है, वही हिमवत् गिरियों का आश्रय है। वही (अशुद्ध) कुल का हरण करने वाला और शुद्ध कुल का कर्ता है; वही बहुवित्त—समृद्धि के स्वामी, और बहुप्रज—अनेक संतति देने वाले हैं।
Verse 132
प्राणेशो बन्धकी वृक्षो नकुलश् चाद्रिकस् तथा ह्रस्वग्रीवो महाजानुर् अलोलश् च महौषधिः
वह प्राणेश है, प्राणों का स्वामी; वह बन्धकी-वृक्ष है, बाँधने और आश्रय देने वाला। वह नकुल और आद्रिक (पर्वतज) है; वह ह्रस्वग्रीव, महाजानु, अलोल और महौषधि—बंधन (पाश) काटने वाले पति शिव हैं।
Verse 133
सिद्धान्तकारी सिद्धार्थश् छन्दो व्याकरणोद्भवः सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहास्यः सिंहवाहनः
वह सिद्धान्त का कर्ता और समस्त प्रयोजनों का सिद्धार्थ है; उसी से छन्द और व्याकरण का उद्भव है। वह सिंहनाद, सिंहदंष्ट्र, सिंहास्य और सिंहवाहन—पाश-बंधन को भयभीत करने वाला परम पति शिव है।
Verse 134
प्रभावात्मा जगत्कालः कालः कम्पी तरुस्तनुः सारङ्गो भूतचक्राङ्कः केतुमाली सुवेधकः
वह प्रभावस्वरूप है; वह जगत् का काल है; वह स्वयं काल है; वह कम्पी, जो लोकों को कम्पित करता है। उसका तन तरु-रूप है; वह सारङ्ग (मृग) है; उसका चिह्न भूतचक्र है; वह केतुमाली है और सुवेधक—पाश-बंधन को भेदने वाला शिव है।
Verse 135
भूतालयो भूतपतिर् अहोरात्रो मलो ऽमलः वसुभृत् सर्वभूतात्मा निश्चलः सुविदुर् बुधः
वह भूतालय है, समस्त प्राणियों का आश्रय; वह भूतपति है, भूतों का स्वामी। वह अहोरात्र है; वह मल भी है और अमल भी। वह वसुभृत्, समस्त भूतों का आत्मा; वह निश्चल है—जिसे सुबुद्ध जन स्पष्ट जानते हैं।
Verse 136
असुहृत्सर्वभूतानां निश्चलश्चलविद्बुधः अमोघः संयमो हृष्टो भोजनः प्राणधारणः
वह समस्त भूतों का असुहृत्—सच्चा हितैषी है; स्वयं निश्चल होकर भी चल का ज्ञाता, बुद्ध है। वह अमोघ है; वह संयमस्वरूप है; वह हृष्ट है। वह भोजन है और प्राणधारण—सब पाशुओं के प्राणों को धारण करने वाला पति शिव है।
Verse 137
धृतिमान्मतिमांस्त्र्यक्षः सुकृतस्तु युधांपतिः गोपालो गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरः
वह धैर्यवान्, प्रखर बुद्धि से युक्त, त्रिनेत्रधारी, पुण्यस्वरूप और योद्धाओं का स्वामी है। वही गोपाल, गोपति, ग्राम-समुदाय का आधार, गोचर्म-वसनधारी और हर—बंधन व शोक का हरने वाला है।
Verse 138
हिरण्यबाहुश् च तथा गुहावासः प्रवेशनः महामना महाकामश् चित्तकामो जितेन्द्रियः
वह हिरण्यबाहु—स्वर्णभुजधारी है; हृदय-गुहा में वास करने वाला; सत्य और मोक्ष में प्रवेश कराने वाला। वह महामना, महाकाम (जिसकी इच्छा सर्वशक्तिमान), चित्तकाम—शुद्ध चैतन्य ही जिसकी कामना है, और जितेन्द्रिय है।
Verse 139
गान्धारश् च सुरापश् च तापकर्मरतो हितः महाभूतो भूतवृतो ह्य् अप्सरोगणसेवितः
वह गान्धार है; और सुराप—कृपा से अज्ञान में अर्पित वस्तु को भी स्वीकार करने वाला। वह तपःकर्म में रत और सदा हितकारी है। वह महाभूत-तत्त्व है, भूतगणों से घिरा हुआ, और अप्सराओं के गणों द्वारा सेवित है।
Verse 140
महाकेतुर् धराधाता नैकतानरतः स्वरः अवेदनीय आवेद्यः सर्वगश् च सुखावहः
वह महाकेतु—मंगल-ध्वज है; धराधाता—पृथ्वी का धारक। वह एकाग्र समाधि में रत और स्वयं आद्य स्वर है। वह सामान्य साधनों से अवेद्य है, पर वेद-प्रकाश और अंतर्बोध से आवेद्य है। सर्वव्यापी होकर वह सुख-आनंद का दाता है।
Verse 141
तारणश्चरणो धाता परिधा परिपूजितः संयोगी वर्धनो वृद्धो गणिको ऽथ गणाधिपः
वह तारण—संसार-बंधन से पार उतारने वाला; चरण—शरण्य चरणस्वरूप; धाता—धारक है। वह परिधा—रक्षा-परिधि और पावन सीमा; तथा सर्वत्र परिपूजित है। वह संयोगी—पशु को पति-पथ से जोड़ने वाला; वर्धन—पोषक; वृद्ध—प्राचीन-परिपक्व तत्त्व है। वह गणिक—गणों में स्थित, और गणाधिप—शिवगणों का अधिपति है।
Verse 142
नित्यो धाता सहायश् च देवासुरपतिः पतिः युक्तश् च युक्तबाहुश् च सुदेवो ऽपि सुपर्वणः
वह नित्य है—धाता, विधाता और सदा सहायक। वह देवों और असुरों का भी स्वामी, समस्त पशुओं (बंधित जीवों) का परम पति है। योग में पूर्णतः युक्त, संयत-बलवान भुजाओं वाला, सच्चा देव और शुभ पर्वों/विभागों का अधिपति है।
Verse 143
आषाढश् च सुषाढश् च स्कन्धदो हरितो हरः वपुरावर्तमानो ऽन्यो वपुःश्रेष्ठो महावपुः
वह आषाढ़ और सुषाढ़ है—अडिग और परम अडिग; स्कन्धद, बल-आधार देने वाला; हरितवर्ण और हर—बंधनहर। वह देहों को फेरने-रचने वाला, विविध रूप धारण कर ‘अन्य’ सा प्रतीत होने वाला; फिर भी वही श्रेष्ठ रूप, महावपु परमेश्वर है।
Verse 144
शिरोविमर्शनः सर्वलक्ष्यलक्षणभूषितः अक्षयो रथगीतश् च सर्वभोगी महाबलः
वह शिरोविमर्शन है—कृपा से मस्तक पर हाथ रखने वाला; समस्त शुभ लक्ष्यों-लक्षणों से विभूषित। वह अक्षय है; रथगीत में स्तुत है; वह सर्वभोगी (अन्तर्यामी) और महाबलवान है।
Verse 145
साम्नायो ऽथ महाम्नायस् तीर्थदेवो महायशाः निर्जीवो जीवनो मन्त्रः सुभगो बहुकर्कशः
वह साम्नाय है और महाम्नाय—परम्परा का मूल और महापरम्परा। वह तीर्थों का देवता, महायशस्वी है। जड़त्व से परे होकर भी वही जीवनदाता; वही मन्त्र; शुभ और सौभाग्यदायक, पर अत्यन्त कठोर—अतिक्रमण-असह्य है।
Verse 146
रत्नभूतो ऽथ रत्नाङ्गो महार्णवनिपातवित् मूलं विशालो ह्यमृतं व्यक्ताव्यक्तस्तपोनिधिः
वह रत्नस्वरूप है, रत्नमय अंगों वाला; महाअर्णव में अवतरण का ज्ञाता। वह मूलकारण, विशाल; वही अमृत, मृत्यु-रहित। वह व्यक्त और अव्यक्त दोनों; तप का निधि—ऐसा वह पति, भगवान शिव है।
Verse 147
आरोहणो ऽधिरोहश् च शीलधारी महातपाः महाकण्ठो महायोगी युगो युगकरो हरिः
वही आरोहण है और सबको ऊपर उठाने वाला अधिरोह है; शील-धर्म धारण करने वाला महातपस्वी। वह महाकण्ठ, परम योगी; वही युग है और युगों का कर्ता—हरि, बन्धन-दुःख हरने वाला।
Verse 148
युगरूपो महारूपो वहनो गहनो नगः न्यायो निर्वापणो ऽपादः पण्डितो ह्यचलोपमः
वह युगस्वरूप, महारूप; जगत् का वहन करने वाला, अगाध-गहन; अचल-उन्नत पर्वत-सा। वही न्याय-तत्त्व, बन्धन की ज्वाला शान्त करने वाला निर्वापण; पादरहित—गमन-सीमा से परे; सच्चा पण्डित, अचल पर्वत-सम दृढ़।
Verse 149
बहुमालो महामालः शिपिविष्टः सुलोचनः विस्तारो लवणः कूपः कुसुमाङ्गः फलोदयः
वह बहुमाल, महामालधारी; सर्वरूपों में व्याप्त शिपिविष्ट; सुन्दर नेत्रों वाला। वही अनन्त विस्तार, रस-लवण-सा सार; कूप-सा स्रोत; पुष्प-सम शुभ अंगों वाला, और फल-उदय—फलप्राप्ति का उद्गम।
Verse 150
ऋषभो वृषभो भङ्गो मणिबिम्बजटाधरः इन्दुर्विसर्गः सुमुखः शूरः सर्वायुधः सहः
वह ऋषभ, वृषभ; भङ्ग—बंधन-रूपों का भंजक; मणि-बिम्ब-सा दीप्त जटा धारण करने वाला। वह इन्दु और पवित्र विसर्ग; सुमुख, शूर; सर्वायुधधारी, और सह—सब कुछ सहने वाला।
Verse 151
निवेदनः सुधाजातः स्वर्गद्वारो महाधनुः गिरावासो विसर्गश् च सर्वलक्षणलक्षवित्
वह निवेदन—जिसे सब अर्पण समर्पित होते हैं; सुधाजात—अमृत-जन्य प्रभु। वही स्वर्गद्वार, उच्च अवस्थाओं का द्वार; महाधनुः—महाधनुषधारी। वह गिरावास—पर्वतों में वास करने वाला; विसर्ग—पवित्र स्रवण जिससे सृष्टि प्रवाहित होती है; और सर्वलक्षणलक्षवित्—हर लक्षण के चिह्न व अर्थ का ज्ञाता।
Verse 152
गन्धमाली च भगवान् अनन्तः सर्वलक्षणः संतानो बहुलो बाहुः सकलः सर्वपावनः
भगवान् शिव दिव्य सुगन्धों की माला धारण करने वाले, अनन्त और समस्त शुभ-लक्षणों से युक्त हैं। वे संतान-परम्परा के मूल, बहुल-समृद्ध, बहु-भुजाधारी, सर्वसमावेशक और सर्वपावन हैं।
Verse 153
करस्थाली कपाली च ऊर्ध्वसंहननो युवा यन्त्रतन्त्रसुविख्यातो लोकः सर्वाश्रयो मृदुः
वे कर में स्थाली धारण करते हैं और कपाल-चिह्न से विभूषित हैं। ऊर्ध्व-गठित देह वाले, सदा युवा; यन्त्र-तन्त्र के परम-प्रसिद्ध आचार्य हैं। वे ही लोक-स्वरूप, सबके आश्रय और करुणामय मृदु हैं।
Verse 154
मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी कुण्डी विकुर्वणः वार्यक्षः ककुभो वज्री दीप्ततेजाः सहस्रपात्
वे मुण्डित-शिर, विरूप तथा विकृत-रूप धारण करने वाले; दण्डधारी, कुण्डी (पात्र) वाले, और इच्छानुसार अनेक रूपों में विकुर्वण हैं। जिनकी दृष्टि जल-सी शीतल, जो दिशाओं के आधार, वज्रधारी; जिनका तेज दीप्त है, और जो सहस्रपाद हैं।
Verse 155
सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृत्
वे सहस्र-मूर्धा, देवों में देवेंद्र; ऐसे गुरु हैं जिनमें समस्त देवता समाहित हैं। सहस्र-बाहु, विश्व के प्रत्येक अंग में व्याप्त; सबके शरण्य, और समस्त लोकों के कर्ता-धर्ता हैं।
Verse 156
पवित्रं त्रिमधुर्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नः शतपाशधृक्
वे परम पवित्र, त्रिमधुर-मन्त्रस्वरूप हैं। वे ‘कनिष्ठ’ तथा कृष्ण-पिङ्गल वर्ण वाले हैं; ब्रह्मदण्ड के निर्माता, शत-शत्रुहन्ता, और शत-पाश धारण करने वाले हैं—जो पशु को पाश से बाँधते भी हैं और पति होकर मोक्ष भी देते हैं।
Verse 157
कला काष्ठा लवो मात्रा मुहूर्तो ऽहः क्षपा क्षणः विश्वक्षेत्रप्रदो बीजं लिङ्गमाद्यस्तु निर्मुखः
वही कालस्वरूप है—कला, काष्ठा, लव, मात्रा, मुहूर्त, दिन, रात्रि और क्षण। वही विश्व-क्षेत्र का दाता और बीजस्वरूप है; वही आद्य लिङ्ग, अनादि, निर्मुख—सीमित रूपों से परे॥
Verse 158
सदसद्व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः स्वर्गद्वारं मोक्षद्वारं प्रजाद्वारं त्रिविष्टपः
वही सत् और असत् है; वही व्यक्त और अव्यक्त स्वभाव है। वही पिता, माता और पितामह है। वही स्वर्ग का द्वार, मोक्ष का द्वार और प्रजा-प्राप्ति का द्वार है—वही त्रिविष्टप (देवलोक) स्वयं है॥
Verse 159
निर्वाणं हृदयश्चैव ब्रह्मलोकः परा गतिः देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः
वही निर्वाण है और वही अन्तःस्थ हृदय। वही ब्रह्मलोक और परम गति है। वही देवों और असुरों का निर्माता है, और देव-असुर दोनों का परम आश्रय है॥
Verse 160
देवासुरगुरुर् देवो देवासुरनमस्कृतः देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः
वही देव है—देवों और असुरों का गुरु; देवासुरों द्वारा नमस्कृत। वही देवासुरों पर सर्वोच्च महामात्र (प्रधान शक्ति) है, और उनके समस्त गणों का आश्रय है॥
Verse 161
देवासुरगणाध्यक्षो देवासुरगणाग्रणीः देवाधिदेवो देवर्षिर् देवासुरवरप्रदः
वही देवासुर-गणों का अध्यक्ष और उन गणों में अग्रणी है। वही देवों का भी अधिदेव, देवर्षि, और देवासुरों को वर देने वाला है॥
Verse 162
देवासुरेश्वरो विष्णुर् देवासुरमहेश्वरः सर्वदेवमयो ऽचिन्त्यो देवतात्मा स्वयम्भवः
विष्णु देवों और असुरों के अधिपति, देवासुरों के महेश्वर हैं। वे समस्त देवताओं से युक्त, अचिन्त्य, देवताओं के अन्तरात्मा और स्वयम्भू हैं।
Verse 163
उद्गतस्त्रिक्रमो वैद्यो वरदो ऽवरजो ऽम्बरः इज्यो हस्ती तथा व्याघ्रो देवसिंहो महर्षभः
वे उद्गत, त्रिविक्रम, वैद्य, वरदाता, अवरज (नित्य नव), अम्बर-सम सर्वव्यापी हैं। वे यज्ञार्ह, हस्ती, व्याघ्र, देवसिंह और महर्षभ हैं।
Verse 164
विबुधाग्र्यः सुरः श्रेष्ठः स्वर्गदेवस्तथोत्तमः संयुक्तः शोभनो वक्ता आशानां प्रभवो ऽव्ययः
वे विद्वानों में अग्र्य, देवों में श्रेष्ठ, स्वर्ग के देव और परम उत्तम हैं। वे स्वयंसिद्ध समन्वित, शोभन, सत्य-वक्ता, दिशाओं व आशाओं के उद्गम और अव्यय हैं।
Verse 165
गुरुः कान्तो निजः सर्गः पवित्रः सर्ववाहनः शृङ्गी शृङ्गप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः
वे गुरु और प्रियतम हैं; वही अपना निज सर्ग—अन्तःस्रोत—हैं। वे पवित्रकर्ता, समस्त वाहनों के धारक; शृङ्गी, शृङ्गप्रिय, बभ्रु, राजराज और निरामय हैं।
Verse 166
अभिरामः सुशरणो निरामः सर्वसाधनः ललाटाक्षो विश्वदेहो हरिणो ब्रह्मवर्चसः
वे अभिराम, सुशरण, निराम और सर्वसाधन हैं। उनके ललाट पर नेत्र है; उनका देह ही विश्व है; वे हरिणवर्ण तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस से दीप्त हैं।
Verse 167
स्थावराणां पतिश्चैव नियतेन्द्रियवर्तनः सिद्धार्थः सर्वभूतार्थो ऽचिन्त्यः सत्यः शुचिव्रतः
वे समस्त स्थावर प्राणियों के पति हैं; जिनका आचरण पूर्ण संयमित इन्द्रियों से नियत है। वे सिद्धार्थ, समस्त भूतों के परम अर्थ, अचिन्त्य, सत्यस्वरूप और शुद्ध व्रतों में दृढ़ हैं।
Verse 168
व्रताधिपः परं ब्रह्म मुक्तानां परमा गतिः विमुक्तो मुक्तकेशश् च श्रीमाञ्छ्रीवर्धनो जगत्
वे व्रतों के अधिपति, परम ब्रह्म और मुक्तों की परम गति हैं। वे सदा विमुक्त, मुक्तकेश, श्रीमान्—श्रीवर्धन, और जगत् के धारक हैं।
Verse 169
यथाप्रधानं भगवान् इति भक्त्या स्तुतो मया भक्तिमेवं पुरस्कृत्य मया यज्ञपतिर्विभुः
जो प्रधान है, उसी के अनुसार मैंने भक्तिभाव से उन्हें “भगवान्” कहकर स्तुति की। इस प्रकार भक्ति को अग्र में रखकर मैंने सर्वव्यापी यज्ञपति—शिव की प्रशंसा की।
Verse 170
ततो ह्यनुज्ञां प्राप्यैवं स्तुतो भक्तिमतां गतिः तस्माल्लब्ध्वा स्तवं शंभोर् नृपस्त्रैलोक्यविश्रुतः
तदनन्तर, अनुमति प्राप्त करके—जो इस प्रकार स्तुत होने पर भक्तों की गति और आश्रय बनते हैं—त्रैलोक्य में प्रसिद्ध उस नृप ने शम्भु का वह स्तव प्राप्त किया।
Verse 171
अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य महायशाः गणाधिपत्यं सम्प्राप्तस् तण्डिनस्तेजसा प्रभोः
हजार अश्वमेध यज्ञों के तुल्य फल पाकर, महायशस्वी तण्डिन ने प्रभु (शिव) के तेजस्वी अनुग्रह से गणाधिपत्य प्राप्त किया।
Verse 172
यः पठेच्छृणुयाद् वापि श्रावयेद्ब्राह्मणानपि अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति वै द्विजाः
हे द्विजो! जो इसे पढ़े, सुने, या ब्राह्मणों को सुनाए, वह निश्चय ही सहस्र अश्वमेध का फल पाता है।
Verse 173
ब्रह्मघ्नश् च सुरापश् च स्तेयी च गुरुतल्पगः शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः
ब्राह्मण-हंता, सुरापान करने वाला, चोर, गुरु-शय्या का अपमान करने वाला, शरणागत का वध करने वाला और मित्र-विश्वासघाती—ये महापातकी हैं।
Verse 174
मातृहा पितृहा चैव वीरहा भ्रूणहा तथा संवत्सरं क्रमाज्जप्त्वा त्रिसंध्यं शङ्कराश्रमे
माता-हंता, पिता-हंता, वीर-हंता या भ्रूण-हंता भी—यदि शंकर के आश्रम में रहकर क्रम से एक वर्ष तक त्रिसंध्या जप करे, तो शुद्ध हो जाता है।
Verse 175
देवम् इष्ट्वा त्रिसंध्यं च सर्वपापैः प्रमुच्यते
त्रिसंध्या में देव का पूजन करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
That even a cosmic judge (Dharma/Yama) becomes purified and empowered through Shiva-upasana: penance at a Shaiva kshetra (Gokarna) and devotion to Mahadeva lead to śāpa-mokṣa, lokapālatva, and rightful authority—showing Shiva as the ultimate refuge and purifier.
The vamsha narrative establishes dharmic continuity, while the Rudra/Shiva Sahasranama demonstrates the practical soteriology of Shaivism: nāma-japa and stuti function as accessible means that can equal great sacrifices (Ashvamedha) and remove even mahāpātakas when performed with discipline (tri-sandhyā, āśrama context).
The chapter states that one who reads, hears, or causes Brahmanas to hear it attains the merit equivalent to a thousand Ashvamedha sacrifices, and with sustained tri-sandhyā japa and worship, even grave sins are cleansed.