
यदुवंश-प्रवचनम्: हैहय-क्रोष्टु-वंशविस्तारः (कृतवीर्यार्जुनादि, ज्यामघ-विदर्भ-शात्वत-पर्यन्तम्)
सूत ययाति-प्रसंग से आगे बढ़कर यदुवंश का संक्षिप्त किन्तु क्रमबद्ध वंश-वर्णन करते हैं। हैहय धारा सहस्रजित्→शतजित्→हैहय आदि से चलकर सहस्रबाहु और सार्वभौम्य-प्रतापी कर्तवीर्यार्जुन पर पहुँचती है। फिर वीतिहोत्र, भोज, अवन्ति, शूरसेन, तालजंघ आदि शाखाओं का उल्लेख कर यह बताया जाता है कि जनपद/गण-नाम अपने-अपने पूर्वजों से कैसे प्रसिद्ध हुए। क्रोष्टु शाखा का परिचय भी आता है, जिसमें आगे चलकर वृष्णिकुल-गौरव के रूप में विष्णु का अवतार प्रकट होता है। शशबिन्दु के अश्वमेधादि यज्ञ और महादान, फिर ज्यामघ का निर्वासन व नर्मदा-तट पर निवास, पत्नी शैब्या का देर से पुत्र-प्रसव और विदर्भ वंश की स्थापना वर्णित है। अंत में सत्त्व/सात्वत कुल से संबंध जोड़कर फलश्रुति कही गई है कि ज्यामघ-वंश का पाठ-श्रवण स्वर्ग, समृद्धि और कल्याण देता है।
Verse 1
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवंशे ययातिचरितं नाम सप्तषष्टितमो ऽध्यायः सूत उवाच यदोर्वंशं प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योत्तमतेजसः संक्षेपेणानुपूर्व्याच्च गदतो मे निबोधत
इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराण के पूर्वभाग में, सोमवंश के अंतर्गत ‘ययातिचरित’ नामक सड़सठवाँ अध्याय (आरम्भ होता है)। सूतजी बोले—अब मैं ज्येष्ठ, उत्तम तेज से युक्त यदु के वंश का वर्णन करूँगा। मेरे द्वारा संक्षेप में और क्रम से कही जा रही बात को सुनो।
Verse 2
यदोः पुत्रा बभूवुर् हि पञ्च देवसुतोपमाः सहस्रजित्सुतो ज्येष्ठः क्रोष्टुर् नीलो ऽजको लघुः
यदु के पाँच पुत्र हुए, जो देवपुत्रों के समान थे। उनमें ज्येष्ठ सहस्रजित था; फिर क्रोष्टु, नील, अजक और लघु (हुए)।
Verse 3
सहस्रजित्सुतस्तद्वच् छतजिन्नाम पार्थिवः सुताः शतजितः ख्यातास् त्रयः परमकीर्तयः
उसी प्रकार सहस्रजित का पुत्र छतजित नामक राजा हुआ। शतजित के तीन पुत्र उत्पन्न हुए, जो सर्वत्र परम कीर्ति से प्रसिद्ध थे।
Verse 4
हैहयश् च हयश्चैव राजा वेणुहयश् च यः हैहयस्य तु दायादो धर्म इत्यभिविश्रुतः
हैहय, हय तथा राजा वेणुहय—ये (प्रसिद्ध) हुए। और हैहय का उत्तराधिकारी ‘धर्म’ नाम से विख्यात था, जो धर्म का धारक माना गया।
Verse 5
तस्य पुत्रो ऽभवद्विप्रा धर्मनेत्र इति श्रुतः धर्मनेत्रस्य कीर्तिस् तु संजयस् तस्य चात्मजः
हे विप्रों, उसका पुत्र ‘धर्मनेत्र’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। धर्मनेत्र का पुत्र कीर्ति था, और कीर्ति का अपना पुत्र संजय था।
Verse 6
संजयस्य तु दायादो महिष्मान्नाम धार्मिकः आसीन् महिष्मतः पुत्रो भद्रश्रेण्यः प्रतापवान्
संजय का उत्तराधिकारी महिष्मान नामक धर्मपरायण था। महिष्मान से प्रतापी भद्रश्रेण्य पुत्र उत्पन्न हुआ।
Verse 7
भद्रश्रेण्यस्य दायादो दुर्दमो नाम पार्थिवः दुर्दमस्य सुतो धीमान् धनको नाम विश्रुतः
भद्रश्रेण्य का उत्तराधिकारी दुर्दम नामक राजा हुआ। दुर्दम का पुत्र बुद्धिमान और विख्यात धनक कहलाया।
Verse 8
धनकस्य तु दायादाश् चत्वारो लोकसंमताः कृतवीर्यः कृताग्निश् च कृतवर्मा तथैव च
धनक के चार उत्तराधिकारी थे, जो लोक में सम्मानित थे—कृतवीर्य, कृताग्नि और उसी प्रकार कृतवर्मा (आदि)।
Verse 9
कृतौजाश् च चतुर्थो ऽभूत् कार्तवीर्यस्ततो ऽर्जुनः जज्ञे बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरोत्तमः
कृतौजस चौथा हुआ। उससे कार्तवीर्य अर्जुन उत्पन्न हुआ—सहस्र भुजाओं वाला, सात द्वीपों का श्रेष्ठ अधिपति।
Verse 10
तस्य रामस् तदा त्वासीन् मृत्युर्नारायणात्मकः तस्य पुत्रशतान्यासन् पञ्च तत्र महारथाः
उसके लिए उस समय राम, नारायण-स्वरूप होकर, मृत्यु के समान उपस्थित हुआ। उसके सैकड़ों पुत्र हुए; उनमें पाँच महारथी थे।
Verse 11
कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो मनस्विनः शूरश् च शूरसेनश् च धृष्टः कृष्णस्तथैव च
वे दिव्यास्त्रों में निपुण, बलवान और पराक्रमी थे—धर्मात्मा तथा दृढ़-मन वाले: शूर, शूरसेन, धृष्ट और उसी प्रकार कृष्ण।
Verse 12
जयध्वजश् च राजासीद् आवन्तीनां विशां पतिः जयध्वजस्य पुत्रो ऽभूत् तालजङ्घो महाबलः
जयध्वज अवन्ति-जन का राजा, प्रजाओं का स्वामी था। जयध्वज से उसका पुत्र तालजङ्घ उत्पन्न हुआ, जो महाबली शासक था।
Verse 13
शतं पुत्रास्तु तस्येह तालजङ्घाः प्रकीर्तिताः तेषां ज्येष्ठो महावीर्यो वीतिहोत्रो ऽभवन्नृपः
यहाँ उसके सौ पुत्र कहे गए, जो ‘तालजङ्घ’ नाम से प्रसिद्ध हुए। उनमें ज्येष्ठ, महावीर्यवान राजा वीतिहोत्र था।
Verse 14
वृषप्रभृतयश्चान्ये तत्सुताः पुण्यकर्मणः वृषो वंशकरस्तेषां तस्य पुत्रो ऽभवन्मधुः
वृष से आरम्भ अन्य पुत्र भी उसके हुए, जो पुण्यकर्मा थे। उनमें वृष वंश-प्रवर्तक बना; और उसके पुत्र मधु उत्पन्न हुआ।
Verse 15
मधोः पुत्रशतं चासीद् वृष्णिस्तस्य तु वंशभाक् वृष्णेस्तु वृष्णयः सर्वे मधोर्वै माधवाः स्मृताः यादवा यदुवंशेन निरुच्यन्ते तु हैहयाः
मधु के सौ पुत्र थे; उनमें वृष्णि उसके वंश का धारक हुआ। वृष्णि से उत्पन्न सब ‘वृष्णि’ कहलाए, और मधु से उत्पन्न ‘माधव’ स्मृत हुए। ‘यादव’ यदुवंश से कहे जाते हैं, और हैहय भी उसी यदुवंश में गिने जाते हैं।
Verse 16
तेषां पञ्च गणा ह्येते हैहयानां महात्मनाम्
उन महात्मा हैहयों के ये ही पाँच गण (कुल-समूह) प्रसिद्ध हैं।
Verse 17
वीतिहोत्राश् च हर्याता भोजाश्चावन्तयस् तथा शूरसेनास्तु विख्यातास् तालजङ्घास्तथैव च
वीतिहोत्र, हर्याता, भोज और अवन्ति; तथा विख्यात शूरसेन और वैसे ही तालजंघ—ये सब जनपद गिने गए।
Verse 18
शूरश् च शूरसेनश् च वृषः कृष्णस्तथैव च जयध्वजः पञ्चमस्तु विख्याता हैहयोत्तमाः
शूर, शूरसेन, वृष, कृष्ण और पाँचवें विख्यात जयध्वज—ये हैहयों में श्रेष्ठ माने गए।
Verse 19
शूरश् च शूरवीरश् च शूरसेनस्य चानघाः शूरसेना इति ख्याता देशास्तेषां महात्मनाम्
शूर और शूरवीर, तथा शूरसेन के निष्पाप वंशज—उन महात्माओं के देश ‘शूरसेना’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
Verse 20
वीतिहोत्रसुतश्चापि विश्रुतो नर्त इत्युत दुर्जयः कृष्णपुत्रस्तु बभूवामित्रकर्शनः
वीतिहोत्र का पुत्र भी ‘नर्त’ नाम से विख्यात हुआ; और कृष्ण से ‘दुर्जय’ पुत्र उत्पन्न हुआ, जो शत्रुओं का दमन करने वाला था।
Verse 21
क्रोष्टुश् च शृणु राजर्षेर् वंशमुत्तमपौरुषम् यस्यान्वये तु सम्भूतो विष्णुर् वृष्णिकुलोद्वहः
अब क्रोष्टु का भी श्रवण करो—उस राजर्षि का उत्तम, श्रेष्ठ वंश। उसी वंश में विष्णु उत्पन्न हुए, जो वृष्णिकुल के परम भूषण थे।
Verse 22
क्रोष्टोरेको ऽभवत्पुत्रो वृजिनीवान्महायशाः तस्य पुत्रो ऽभवत् स्वाती कुशङ्कुस् तत्सुतो ऽभवत्
क्रोष्टु का एक ही पुत्र हुआ—महायशस्वी वृजिनीवान। उसके पुत्र स्वाती हुए और स्वाती के पुत्र कुशङ्कु हुए।
Verse 23
अथ प्रसूतिमिच्छन्वै कुशङ्कुः सुमहाबलः महाक्रतुभिर् ईजे ऽसौ विविधैराप्तदक्षिणैः
तत्पश्चात् सुमहाबली कुशङ्कु ने संतान की इच्छा से विविध महाक्रतुओं द्वारा यज्ञ किए, जो यथाविधि दक्षिणा से सम्पन्न थे।
Verse 24
जज्ञे चित्ररथस्तस्य पुत्रः कर्मभिर् अन्वितः अथ चैत्ररथो वीरो यज्वा विपुलदक्षिणः
उसके यहाँ चित्ररथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सत्कर्मों से युक्त था। फिर चैत्ररथ नामक वीर यजमान हुआ, जो विपुल दक्षिणा देने वाला था।
Verse 25
शशबिन्दुस् तु वै राजा अन्वयाद् व्रतम् उत्तमम् चक्रवर्ती महासत्त्वो महावीर्यो बहुप्रजाः
निश्चय ही राजा शशबिन्दु ने परम्परा से उत्तम व्रत का पालन किया। वह चक्रवर्ती, महासत्त्व, महावीर्य और बहुप्रजावान था।
Verse 26
शशबिन्दोस्तु पुत्राणां सहस्राणामभूच्छतम् शंसन्ति तस्य पुत्राणाम् अनन्तकम् अनुत्तमम्
शशबिन्दु के पुत्रों की संख्या हजारों में थी, जिनमें सैकड़ों प्रमुख थे। उन पुत्रों में अनन्तक को अनुत्तम, सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।
Verse 27
अनन्तकात् सुतो यज्ञो यज्ञस्य तनयो धृतिः उशनास्तस्य तनयः सम्प्राप्य तु महीमिमाम्
अनन्तक से यज्ञ उत्पन्न हुए; यज्ञ के पुत्र धृति हुए। और धृति के पुत्र उशना (शुक्राचार्य) हुए, जिन्होंने इस पृथ्वी पर आकर लोक-धर्म की प्रतिष्ठा की।
Verse 28
आजहाराश्वमेधानां शतमुत्तमधार्मिकः स्मृतश्चोशनसः पुत्रः सितेषुर् नाम पार्थिवः
उत्तम धर्मपरायण उस राजा—उशना (शुक्राचार्य) के पुत्र—का नाम सितेषु था। उसने सौ अश्वमेध यज्ञ किए।
Verse 29
मरुतस्तस्य तनयो राजर्षिर्वंशवर्धनः वीरः कम्बलबर्हिस्तु मरुस्तस्यात्मजः स्मृतः
उसके पुत्र मरुत से राजर्षि वंशवर्धन उत्पन्न हुए, जो वंश को बढ़ाने वाले वीर थे। और उसी मरु के पुत्र के रूप में वीर कम्बल-बर्हि स्मरण किए जाते हैं।
Verse 30
पुत्रस्तु रुक्मकवचो विद्वान् कम्बलबर्हिषः निहत्य रुक्मकवचो वीरान् कवचिनो रणे
कम्बल-बर्हि के विद्वान पुत्र रुक्मकवच ने रणभूमि में कवचधारी वीर योद्धाओं का संहार किया।
Verse 31
धन्विनो निशितैर् बाणैर् अवाप श्रियमुत्तमाम् अश्वमेधे तु धर्मात्मा ऋत्विग्भ्यः पृथिवीं ददौ
धर्मात्मा धनुर्धर ने तीक्ष्ण बाणों से उत्तम श्री प्राप्त की; और अश्वमेध यज्ञ में ऋत्विजों को पृथ्वी तक दान कर दी।
Verse 32
जज्ञे तु रुक्मकवचात् परावृत्परवीरहा जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महासत्त्वाः परावृतः
रुक्मकवच से परावृत उत्पन्न हुआ, जो शत्रु-वीरों का संहारक था; और परावृत के पाँच पुत्र हुए, सब महाबली और महान्-सत्त्व।
Verse 33
रुक्मेषुः पृथुरुक्मश् च ज्यामघः परिघो हरिः परिघं च हरिं चैव विदेहेषु पिता न्यसत्
रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, परिघ और हरि—ये उत्पन्न हुए। पिता ने परिघ और हरि को विदेह देश में प्रतिष्ठित किया।
Verse 34
रुक्मेषुरभवद्राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रयात् तैस्तु प्रव्राजितो राजा ज्यामघो ऽवसदाश्रमे
रुक्मेषुओं में राजा पृथुरुक्म उनके आश्रय से प्रतिष्ठित हुआ; और उन्हीं द्वारा निर्वासित राजा ज्यामघ आश्रम में जाकर रहने लगा।
Verse 35
प्रशान्तः स वनस्थो ऽपि ब्राह्मणैरेव बोधितः जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी
वह शांत होकर वनवासी था, फिर भी ब्राह्मणों ने उसे उपदेश दिया; धनुष उठाकर वह ध्वजधारी रथी दूसरे देश को चला गया।
Verse 36
नर्मदातीरमेकाकी केवलं भार्यया युतः ऋक्षवन्तं गिरिं गत्वा त्यक्तमन्यैरुवास सः
वह अकेला, केवल अपनी पत्नी के साथ, नर्मदा के तट पर गया। ऋक्षवत् पर्वत पर पहुँचकर, दूसरों द्वारा त्यागा हुआ, वहीं निवास करने लगा।
Verse 37
ज्यामघस्याभवद्भार्या शैब्या शीलवती सती सा चैव तपसोग्रेण शैब्या वै सम्प्रसूयत
ज्यामघ की पत्नी शैब्या थी—शीलवती और पतिव्रता। अपने तीव्र तप के प्रभाव से उस शैब्या ने गर्भ धारण कर संतान को जन्म दिया।
Verse 38
सुतं विदर्भं सुभगा वयःपरिणता सती राजा पुत्रसुतायां तु विद्वांसौ क्रथकैशिकौ
सौभाग्यवती और पतिव्रता रानी—आयु में परिपक्व होकर—राजा के लिए विदर्भ नामक पुत्र को जन्म देती है। उसी पुत्र की वंश-परंपरा में क्रथ और कैशिक नामक दो विद्वान राजकुमार उत्पन्न हुए।
Verse 39
पुत्रौ विदर्भराजस्य शूरौ रणविशारदौ रोमपादस्तृतीयश् च बभ्रुस्तस्यात्मजः स्मृतः
विदर्भ के राजा के दो पुत्र थे—वीर और रणकौशल में निपुण। तीसरा रोमपाद था; और उसका पुत्र बभ्रु स्मरण किया जाता है।
Verse 40
सुधृतिस्तनयस्तस्य विद्वान्परमधार्मिकः कौशिकस्तनयस्तस्मात् तस्माच्चैद्यान्वयः स्मृतः
उससे सुधृति नामक पुत्र उत्पन्न हुआ—विद्वान और परम धर्मात्मा। सुधृति से कौशिक हुआ; और कौशिक से ‘चैद्य’ नामक वंश प्रसिद्ध हुआ।
Verse 41
क्रथो विदर्भस्य सुतः कुन्तिस्तस्यात्मजो ऽभवत् कुन्तेर् वृतस्ततो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान्
विदर्भ का पुत्र क्रथ था; उसका पुत्र कुन्ति हुआ। कुन्ति से वृत उत्पन्न हुआ और वृत से प्रतापी रणधृष्ट जन्मा।
Verse 42
रणधृष्टस्य च सुतो निधृतिः परवीरहा दशार्हो नैधृतो नाम्ना महारिगणसूदनः
रणधृष्ट का पुत्र निधृति था, जो शत्रु-वीरों का संहारक था। वह दशार्ह वंश का था, नैधृत नाम से प्रसिद्ध, और विरोधी सेनाओं का महान् विनाशक था।
Verse 43
दशार्हस्य सुतो व्याप्तो जीमूत इति तत्सुतः जीमूतपुत्रो विकृतिस् तस्य भीमरथः सुतः
दशार्ह से व्याप्त उत्पन्न हुआ; उसका पुत्र जीमूत नाम से प्रसिद्ध हुआ। जीमूत का पुत्र विकृति था और विकृति का पुत्र भीमरथ हुआ।
Verse 44
अथ भीमरथस्यासीत् पुत्रो नवरथः किल दानधर्मरतो नित्यं सत्यशीलपरायणः
फिर भीमरथ का पुत्र नवरथ हुआ। वह सदा दान-धर्म में रत और सत्य तथा सदाचार में दृढ़तापूर्वक स्थित था।
Verse 45
तस्य चासीद्दृढरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः तस्मात् करम्भः सम्भूतो देवरातो ऽभवत्ततः
उससे दृढ़रथ उत्पन्न हुआ और दृढ़रथ का पुत्र शकुनि था। शकुनि से करम्भ उत्पन्न हुआ और उसके बाद देवरात जन्मा।
Verse 46
देवरातादभूद्राजा देवरातिर् महायशाः देवगर्भोपमो जज्ञे यो देवक्षत्रनामकः
देवरात से महान् यशस्वी राजा देवराति उत्पन्न हुआ। उससे देवगर्भ के समान तेजस्वी, देवक्षत्र नामक पुत्र जन्मा।
Verse 47
देवक्षत्रसुतः श्रीमान् मधुर्नाम महायशाः मधूनां वंशकृद्राजा मधोस्तु कुरुवंशकः
देवक्षत्र के पुत्र, श्रीमान् और महायशस्वी ‘मधु’ नामक राजा हुए। वे मधुओं के वंश-प्रवर्तक बने; और मधु से आगे कुरुवंश के प्रवर्तक उत्पन्न हुए।
Verse 48
कुरुवंशाद् अनुस् तस्मात् पुरुत्वान् पुरुषोत्तमः अंशुर्जज्ञे च वैदर्भ्यां भद्रवत्यां पुरुत्वतः
कुरुवंश में उससे (अनु से) पुरुषोत्तम पुरुत्वान उत्पन्न हुआ। और पुरुत्वान से विदर्भी भद्रवती के गर्भ से अंशु जन्मा।
Verse 49
ऐक्ष्वाकीम् अवहच्चांशुः सत्त्वस्तस्मादजायत सत्त्वात् सर्वगुणोपेतः सात्वतः कुलवर्धनः
अंशु ने इक्ष्वाकुवंश की राजकुमारी से विवाह किया। उससे सत्त्व उत्पन्न हुआ; और सत्त्व से सर्वगुणसम्पन्न सात्वत जन्मा, जो कुल का वर्धन करने वाला हुआ।
Verse 50
ज्यामघस्य मया प्रोक्ता सृष्टिर्वै विस्तरेण वः यः पठेच्छृणुयाद्वापि निसृष्टिं ज्यामघस्य तु
ज्यामघ की सृष्टि (वंश-विस्तार) मैंने तुमसे विस्तारपूर्वक कही है। जो ज्यामघ की इस निसृष्टि को पढ़े या सुने, वह पुण्य पाता है और पशु को पाश से मुक्त करने वाले पति-परमेश्वर की ओर उन्मुख होता है।
Verse 51
प्रजीवत्येति वै स्वर्गं राज्यं सौख्यं च विन्दति
वह निश्चय ही जीवित रहता है और स्वर्ग, राज्य-ऐश्वर्य तथा सुख प्राप्त करता है। धर्म में स्थित होकर शिव-पुण्य से युक्त पशु (बद्ध जीव) पाश को ढीला करता है—पति भगवान् शिव की कृपा से।
He is presented as a paramount Haihaya ruler, “bāhu-sahasreṇa” (thousand-armed), a cakravartin-like sovereign over the seven dvīpas. His prominence anchors later itihāsa conflicts (notably with Paraśurāma traditions in broader Purāṇic literature) and illustrates how power remains subject to divine kāla and dharma.
The text enumerates major Haihaya-associated groupings/clans as Vītihotra, Haryāta, Bhoja, Avanti, Śūrasena, and Tāla-jaṅgha (with overlapping naming in verses), functioning as an etymological map of how regions and peoples derive identity from progenitor-kings.
It states that in Kroṣṭu’s lineage arises Viṣṇu as the ornament of the Vṛṣṇi-kula, using genealogy as a cross-sectarian bridge. Śaiva Purāṇas commonly integrate Vaiṣṇava avatāra markers while maintaining Śiva as the overarching regulator of cosmic order and liberation.