
अयोध्याकाण्ड
अयोध्याकाण्ड रामायण का वह निर्णायक मोड़ है जहाँ नीति, राजधर्म और वचन-पालन की कसौटी पर समूचा राजकुल खड़ा होता है। आरम्भिक सर्गों में अयोध्या का आदर्श नागरिक-जीवन, सभाएँ, अभिषेक की तैयारियाँ, शुभ-लक्षण और नगर की उत्सव-शोभा चित्रित होती है; साथ ही राम का क्षमा, संयम, कृतज्ञता और विनय—उनका आदर्श स्वभाव—उभरकर आता है। पर यही यौवराज्य-प्रतिज्ञा राजधर्म, निजी इच्छा और वाणी की बाध्यता के टकराव से वनवास में बदल जाती है। मन्थरा के उकसावे से कैकेयी दशरथ से पूर्व में मिले दो वर माँगती है—भरत का राज्याभिषेक और राम का चौदह वर्ष का वनवास। दशरथ शोक और मोह में नैतिक रूप से जड़ हो जाते हैं, फिर भी वचन-बंधन उन्हें विवश करता है। राम बिना प्रतिरोध पिता की आज्ञा को धर्म मानकर स्वीकार करते हैं; सीता पतिव्रता-धर्म और सहचर्य की मर्यादा का प्रतिपादन करते हुए साथ चलने का आग्रह करती हैं; लक्ष्मण का तीव्र रोष भी राम की अहिंसा और सामाजिक मर्यादा-निष्ठा से संयमित होता है। काण्ड का मध्य भाग जन-विलाप, अशुभ संकेतों और भारी विषाद से चिह्नित है। सुमंत्र के रथ पर अयोध्या से प्रस्थान, तमसा और गंगा के तटों पर विश्राम, निषादराज गुह का आतिथ्य और गंगा-पार कराने में सहायता, भरद्वाज के आश्रम का मार्गदर्शन, तथा अंततः चित्रकूट में वन-निवास की स्थापना—ये प्रसंग राजमहल से वन-जीवन की निर्णायक यात्रा बनते हैं। इसी के समानांतर अयोध्या के भीतर पतन चलता है—दशरथ का पश्चात्ताप, ‘शब्दवेधी’ प्रसंग का स्वीकार, और अंततः उनका देहावसान। वसिष्ठ के नेतृत्व में राज्य में अंतराल की चिंता उठती है और केकय से भरत को बुलाया जाता है। भरत लौटकर कैकेयी की निंदा करते हैं, पिता का अन्त्येष्टि-कर्म करते हैं, राज्य लेने से इनकार करते हैं और राम के अधिकार को स्थापित करने हेतु उन्हें लौटाने के लिए अभिषेक-सामग्री सहित वन की ओर प्रस्थान करते हैं—यह वैधता और त्याग पर गहन विचार को तीव्र करता है। अयोध्याकाण्ड वचन-धर्म की सत्ता, राजधर्म की कीमत, और त्याग की महिमा का प्रधान ग्रंथ-स्वरूप है। यहाँ पिता का वचन, पुत्र की आज्ञाकारिता, पत्नी का सहधर्म, भ्राता की निष्ठा और प्रजा का शोक—सब मिलकर धर्म के अधिकार और उसके दुःखद मूल्य को उजागर करते हैं। दक्षिणी पाठ-परम्परा में कई स्थलों पर विधि-विधान, विलाप और नैतिक मनन के अतिरिक्त पद्य भी मिलते हैं, जो इस काण्ड को रामायण की धर्म-मीमांसा का केन्द्रीय आधार बनाते हैं।
गुणप्रशंसा–युवराजनिर्णयः (Praise of Rama’s Virtues and the Decision on the Heir-Apparent)
अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग में भरत शत्रुघ्न के साथ अपने मामा के घर जाते हैं। वहाँ दोनों भाइयों का स्नेहपूर्वक सत्कार होता है और वे वहीं निवास करते हुए वृद्ध पिता दशरथ का स्मरण करते रहते हैं। इसके बाद कथा राम के धर्ममय गुणों का विस्तृत चित्र प्रस्तुत करती है—उकसावे में भी शान्ति, कृतज्ञता, सत्यनिष्ठा, बड़ों और ब्राह्मणों का आदर, करुणा, संयम, विवेक, तथा शास्त्र, वाद-विवाद और युद्धविद्या में प्रवीणता। पृथ्वी-सी सहनशीलता, बृहस्पति-सी बुद्धि और इन्द्र-सा पराक्रम जैसे उपमानों से राम को प्रजाप्रिय, लोकहितकारी और शासन के योग्य आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित किया गया है। इन गुणों को देखकर, अपने बढ़ते बुढ़ापे और कुछ अशुभ संकेतों का अनुभव कर, राजा दशरथ मंत्रियों से परामर्श करके राम को युवराज बनाने का निश्चय करते हैं। फिर वे प्रान्तीय नरेशों और नगर के प्रमुख नागरिकों को सभा में बुलाते हैं; देवताओं से घिरे इन्द्र की भाँति राजा की यह सभा रामाभिषेक की पहल को औपचारिक रूप देती है।
यौवराज्य-प्रस्तावः (Proposal for Rāma’s Installation as Heir-Apparent)
राजसभा में महाराज दशरथ समस्त मंत्रिपरिषद् को बुलाकर तथा मित्र-राजाओं को भी संबोधित करते हैं। गंभीर, धीर और तेजस्वी वाणी में वे कहते हैं कि उन्होंने पितृपरंपरा के अनुसार सावधानी से राज्य चलाया है, पर अब वृद्धावस्था का श्रम और धर्म का भार अनुभव कर रहे हैं; इसलिए लोक-कल्याण के लिए वे शासन-भार अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को सौंपकर विश्राम चाहते हैं। वे राम के कुलानुगत गुणों की प्रशंसा करते हुए पुष्य नक्षत्र में यौवराज्याभिषेक का शुभ प्रस्ताव रखते हैं और राज्यहित में सबकी सम्मति तथा यदि कोई अन्य उत्तम सलाह हो तो उसे भी मांगते हैं। सभा में उपस्थित राजा और प्रजा जय-जयकार करते हैं; महल आनंद-ध्वनि से गूंज उठता है। ब्राह्मण, प्रमुख नागरिक तथा नगर-ग्राम के निवासी विचार-विमर्श कर एकमत से तत्काल अभिषेक का आग्रह करते हैं। वे राम की सत्यनिष्ठा, इंद्रिय-निग्रह, करुणा, वाणी-संयम, युद्ध-कौशल, प्रजा-हितचिंतन और सार्वभौम शासन-योग्यता का विस्तार से वर्णन करते हैं। अंत में सब मिलकर दशरथ से प्रार्थना करते हैं कि राज्य और जगत के कल्याण हेतु श्रीराम को शीघ्र ही युवराज पद पर स्थापित करें।
यौवराज्याभिषेक-उपकल्पनम् (Preparations for Rama’s Installation as Yuvaraja)
इस सर्ग में अयोध्या के पौरजन अञ्जलि-बद्ध होकर महाराज दशरथ से श्रीराम के यौवराज्याभिषेक का आग्रह करते हैं; राजा भी मधुर और हितकारी वचनों से उनका सत्कार करते हैं। तत्पश्चात् दशरथ वसिष्ठ और वामदेव को विधि-व्यवस्था के लिए नियुक्त कर, चैत्रमास की पवित्रता बताकर राजाज्ञा देते हैं—“राम के यौवराज्य के लिए सब तैयारी की जाए।” वसिष्ठ अमात्यों को आदेश देते हैं कि अग्न्यागार में सुवर्ण-रत्न, औषधियाँ, श्वेत मालाएँ, लाजा, मधु-घृत, वस्त्र, रथ-आयुध, चतुरंगिणी सेना, शुभलक्षण गज, चामर-ध्वज-छत्र, शातकुम्भ के अनेक कलश, स्वर्णशृंग वृषभ, व्याघ्रचर्म आदि सब प्रस्तुत हों। नगरद्वारों का चन्दन-मालाओं और धूप से अलंकरण, ब्राह्मण-भोजन, दान-दक्षिणा, स्वस्तिवाचन, निमन्त्रण-आसन, राजमार्ग का सिञ्चन, पताकाओं का बंधन, नाट्य-ताल तथा सेवक-गणिकाओं की व्यवस्था, देवालयों-चैत्यस्थलों में पृथक् उपस्थापन, और सन्नद्ध योद्धाओं का प्रवेश—इस प्रकार अभिषेक का सार्वजनिक, धार्मिक और प्रशासनिक समन्वय प्रकट होता है। कार्य पूर्ण होने पर वसिष्ठ-वामदेव “सब हो गया” कहकर राजा को निवेदन करते हैं। तब सुमन्त्र श्रीराम को बुलाते हैं; विविध देशों के भूमिपाल दशरथ की उपासना इन्द्र के समान करते हैं। राम के आगमन का रूप-गुण-वर्णन विस्तार से होता है; दशरथ पुत्र को आलिंगन कर आसन देते हैं और पुष्ययोग में यौवराज्य-प्राप्ति बताकर राजधर्म का उपदेश देते हैं—इन्द्रियनिग्रह, काम-क्रोध का त्याग, अमात्यों व प्रजा का रंजन, कोष-आयुधागार का संचय, मित्रों का संतोष आदि। अंत में राम के मित्र कौसल्या को समाचार देते हैं; वह दूतों का दान से सत्कार करती हैं; राम राजा को प्रणाम कर अपने भवन लौटते हैं और पौरजन देवपूजा में प्रवृत्त होते हैं।
अयोध्याकाण्डे चतुर्थः सर्गः — Rāma Summoned; Pushya Coronation Decision
नागरिकों के चले जाने पर दशरथ ने मंत्रियों के साथ फिर सभा की और निश्चय किया कि शुभ पुष्य नक्षत्र में तुरंत राम का युवराजाभिषेक किया जाए। राम को बुलाने के लिए सुमंत्र भेजे गए; बार-बार बुलावा आने से राम के मन में आशंका हुई, जिससे राजमहल के गंभीर वातावरण और भीतर की अस्थिरता का संकेत मिलता है। एकांत में दशरथ ने स्नेहपूर्वक राम का स्वागत कर अपना कारण बताया—जीवन के धर्मार्थकाम और यज्ञादि कर्तव्य पूर्ण कर अब मेरा शेष धर्म केवल तुम्हारा अभिषेक है। उन्होंने कहा कि प्रजा और प्रकृतियाँ राम के राज्य की अभिलाषा रखती हैं; साथ ही उन्होंने अपने अशुभ स्वप्नों और जन्मनक्षत्र पर सूर्य, मंगल और राहु के प्रबल प्रभाव का उल्लेख कर निकट संकट की आशंका जताई। इसलिए उन्होंने नीति ठहराई कि मन डगमगाने और अनिष्ट परिस्थितियाँ उठने से पहले शीघ्र अभिषेक हो। दशरथ ने तैयारी के लिए व्रत-विधान बताया—उपवास, दर्भ पर शयन, मित्रों का जागरण—और भरत की अनुपस्थिति को अनुकूल अवसर मानते हुए भी मनुष्यों के चंचल मन की चेतावनी दी। अनुमति पाकर राम ने तुरंत कौशल्या को समाचार दिया; वे जनार्दन-विष्णु के ध्यान में प्राणायाम करती दिखीं। हर्षित होकर उन्होंने शुभाशीष दिए; राम ने लक्ष्मण के साथ भावी राज्य-समृद्धि साझा कर भ्रातृ-सहशासन का संकल्प दृढ़ किया और फिर सीता सहित लौट आए।
अभिषेकोपवास-आदेशः (Coronation Preparations and the Fast Enjoined)
इस सर्ग में श्रीराम के यौवराज्य-अभिषेक से पूर्व की विधि-व्यवस्था का वर्णन है। महाराज दशरथ राम को शीघ्र होने वाले राज्याभिषेक का संकेत देकर पुरोहित वसिष्ठ को बुलाते हैं और उन्हें आदेश देते हैं कि राम और सीता मंत्रोच्चार सहित उपवास-व्रत करें, जिससे मंगल, समृद्धि और राज्याधिकार की धर्मसम्मत पुष्टि हो। वसिष्ठ ब्राह्मणोचित रथ पर राम के भवन जाते हैं, आदरपूर्वक सत्कार पाते हैं और राजा की स्नेहपूर्ण इच्छा बताते हैं कि प्रातःकाल राम का अभिषेक होगा—जैसे नहुष ने ययाति का अभिषेक किया था। राम विनम्रता से आज्ञा स्वीकार करते हैं; वसिष्ठ विधिपूर्वक उपवास का संकल्प कराकर लौटते हैं। इसके बाद अयोध्या की सड़कों का प्रक्षालन होता है, ध्वज-पताकाएँ उठती हैं, राजमार्ग जिज्ञासु नागरिकों से भर जाते हैं और जनसमूह का कोलाहल समुद्र-गर्जना के समान प्रतीत होता है। वसिष्ठ भीड़ के बीच से राजमहल लौटकर दशरथ को कार्य-सम्पन्न होने का समाचार देते हैं; सभा श्रद्धा से उठ खड़ी होती है। गुरु की अनुमति पाकर राजा सभा विसर्जित कर अंतःपुर में प्रवेश करते हैं—रात्रि की उस अभिषेक-पूर्व तीव्रता को चंद्रमा-तारागण जैसी उज्ज्वल उपमाओं से सूचित किया गया है।
रामाभिषेकपूर्वसज्जा — Preparations for Rama’s Coronation
इस सर्ग में दो दृश्य साथ-साथ उभरते हैं—(1) श्रीराम का अंतःशुद्धि-युक्त धार्मिक अनुशासन और (2) अयोध्या का युवराजाभिषेक के लिए सार्वजनिक उत्साह। वसिष्ठ के चले जाने पर राम स्नान करके नारायण के समीप जाते हैं और विधिपूर्वक आज्य-होम करते हैं। शेष हवि का प्रसाद ग्रहण कर वे मौन धारण करते हैं और विष्णु के पवित्र मंदिर में कुशा पर सीता सहित विश्राम करते हुए शुभ ध्यान में स्थित रहते हैं। रात्रि के अंतिम प्रहर में उठकर वे अपने भवन को पूर्ण रूप से सजाने की आज्ञा देते हैं। प्रातःकर्मों के बाद ब्राह्मणों के शुद्धि-मंत्रों का पाठ सुनते हैं; ‘पुण्याह’ के मंगल घोष और नगाड़ों-तुरहियों की ध्वनि नगर में गूँज उठती है। फिर कथा नगर-जीवन में फैलती है। प्रभात होते ही नागरिक मंदिरों, चौराहों, गलियों, अट्टालिकाओं, बाजारों, घरों और सभागृहों पर ध्वज-पताकाएँ लगाकर सजावट करते हैं। नट-गायक वातावरण को स्वर से भर देते हैं; बड़े-बूढ़े और बालक सभी अभिषेक की चर्चा करते हैं। राजपथ पुष्पों से बिछाए जाते हैं, धूप से सुवासित किए जाते हैं और रात्रि पड़ने पर प्रकाश के लिए दीप-वृक्ष सजाए जाते हैं। चारों दिशाओं से ग्रामवासी दर्शन हेतु आते हैं और अयोध्या समुद्र-गर्जना-सी भर जाती है। चौकों और सभाओं में लोग दशरथ के निर्णय की प्रशंसा करते हैं कि वे गुणवान, विद्वान और अहंकार-रहित राम को रक्षक-राजा के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
मन्थराप्रवेशः — Manthara Observes Ayodhya and Incites Kaikeyi
अयोध्याकाण्ड के सातवें सर्ग में जन-उत्सव से गुप्त षड्यंत्र की ओर कथा का निर्णायक मोड़ आता है। कैकेयी की पुरानी दासी मन्थरा चाँदनी से उज्ज्वल महल की छत पर चढ़कर अयोध्या को देखती है—मार्गों पर जल छिड़का गया है, पुष्प बिखरे हैं, ध्वज फहर रहे हैं; मंदिरों में वेद-घोष और वाद्यों का निनाद है, और प्रजा आनंदित है। वह पास की धात्री से कारण पूछती है; धात्री हर्ष से बताती है कि राजा दशरथ कल पुष्य नक्षत्र में निष्कलंक राम का युवराज के रूप में अभिषेक करेंगे। यह सुनते ही मन्थरा क्रोध से भर उठती है। वह कैलास-सदृश प्रासाद से उतरकर विश्राम में पड़ी कैकेयी के पास जाती है और भय-आधारित वाणी से उसे विचलित करने लगती है—आसन्न संकट, भाग्य की चंचलता और राज-नीति के छल का आरोप लगाकर रामाभिषेक को कैकेयी तथा भरत के विनाश के रूप में प्रस्तुत करती है। कैकेयी पहले चिंतित होती है, फिर राम के अभिषेक की बात सुनकर प्रसन्न हो उठती है और “शुभ समाचार” के लिए मन्थरा को आभूषण भी देती है—जिससे स्पष्ट होता है कि आरंभ में उसके मन में राम और भरत के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी। सर्ग का संदेश यह है कि वाणी (वाक्) राजनीति का तीक्ष्ण उपकरण है; सार्वजनिक धर्म-उत्सव भी निजी प्रेरणा और भय-रचित कथा से पलटे जा सकते हैं।
मन्थराकैकेयीसंवादः — Mantharā’s Counsel to Kaikeyī (Ayodhyā’s Succession Alarm)
इस सर्ग में मन्थरा तर्कपूर्ण ढंग से कैकेयी को समझाती है कि श्रीराम का युवराज्याभिषेक कैकेयी और भरत—दोनों के लिए अस्तित्व का संकट बन सकता है। वह दरबार की सौहार्द-परंपरा तोड़ते हुए उपहार में मिला आभूषण फेंक देती है, मानो मनुहार को अस्वीकार कर चेतावनी का आरम्भ करती हो। वह कैकेयी के आनंद को बार-बार ‘शोक-सागर’ के रूपक से उलटकर उत्सव को आने वाले नुकसान का संकेत बताती है। मन्थरा राजनीतिक निष्कर्ष रखती है कि राज्याधिकार राम में स्थिर होकर आगे राम-पुत्र में चला जाएगा और भरत का स्थान समाप्त हो जाएगा; साझा शासन को वह व्यवहारतः असंभव बताती है। वह भय बढ़ाने के लिए कैकेयी के कौसल्या की दासी बन जाने और भरत के वंचित, निर्वासित या नष्ट होने तक की आशंका दिखाती है। साथ ही वह पक्ष-सम्बन्धों का संकेत देती है—लक्ष्मण राम के साथ हैं, शत्रुघ्न भरत के; निकटता सुरक्षा और अलगाव संकट बन सकता है। कैकेयी आरम्भ में राम के गुण—धर्मज्ञता, संयम, कृतज्ञता, सत्यनिष्ठा—की प्रशंसा कर मन्थरा की बात नहीं मानती। तब मन्थरा और तीखे शब्दों में अपमान व दुर्दशा की भविष्यवाणियाँ कर उसे उकसाती है। यह सर्ग दिखाता है कि कैसे भावनाओं को नीति में बदलकर वरदानों की मांग और अभिषेक-योजना के उलटफेर की भूमि तैयार की जाती है।
मन्थराप्रेरणा—वरद्वय-स्मरणं च (Manthara’s Provocation and the Recalling of Two Boons)
अयोध्याकाण्ड के नवम सर्ग में मन्थरा की कुटिल प्रेरणा से कैकेयी का मन निर्णायक रूप से पलट जाता है। जो कैकेयी पहले उसकी बातों को सुनकर केवल शंका में थी, वही अब क्रोध और दृढ़ निश्चय के साथ तत्काल योजना बनाती है कि राम को वन भेजा जाए और भरत को राज्य दिलाया जाए। मन्थरा पुराने प्रसंग को साधन बनाकर सामने रखती है—दैवासुर युद्ध में इन्द्र की सहायता करते हुए दशरथ संकट में पड़े थे, तब कैकेयी ने उन्हें दो बार बचाया था। प्रसन्न होकर राजा ने उसे दो वर दिए थे, जिन्हें उसने बाद के लिए रख छोड़ा था। मन्थरा उन्हीं दो वरों को स्मरण कराकर कहती है कि कैकेयी क्रोधागार में जाए, आभूषण उतारकर नंगी भूमि पर लेट जाए, राजा से न देखे न बोले, और वरदान के रूप में (1) भरत का अभिषेक तथा (2) राम का चौदह वर्ष का वनवास माँगे। इस सर्ग में कैकेयी द्वारा मन्थरा की अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा, उसके रूप-वर्णन और ‘माया’ जैसी छल-युक्ति के रूपक भी आते हैं। वाणी की चतुराई से अनर्थ को भी अर्थ-रूप दिखाकर राजदरबार में प्रभाव जमाने की रीति—स्मृति, प्रतिज्ञा, भाव-प्रदर्शन और राजवचन की बंधन-शक्ति—स्पष्ट रूप से उभरती है।
क्रोधागारप्रवेशः — Entry into the Chamber of Wrath (Kaikeyī’s Protest)
अयोध्याकाण्ड के दशवें सर्ग में राम के निकटवर्ती अभिषेक-उत्सव के बीच मनोवैज्ञानिक और औपचारिक टूटन प्रकट होती है। मन्थरा की कुटिल उकसाहट से कैकेयी कठोर निश्चय कर लेती है, आभूषण और मालाएँ उतार देती है और क्रोधागार में जाकर भूमि पर लेट जाती है। उसका वर्णन किन्नरी, कटी हुई लता और गिरी हुई अप्सरा जैसी उपमाओं से होता है—जिसमें करुणा भी है और धर्म-विरुद्ध भाव का संकेत भी। दशरथ अभिषेक की आज्ञा देकर, उसके लोक में प्रसिद्ध हो जाने का समाचार सुनकर, कैकेयी के सुसज्जित अंतःपुर में प्रवेश करते हैं। वहाँ पक्षियों के कलरव, वाद्यों के मधुर निनाद, उपवनों की शोभा, हाथीदाँत-स्वर्ण-रजत के आसन-सामान और विविध भोग-उपहारों का विस्तृत चित्रण है; पर शय्या पर रानी नहीं मिलती। द्वारपाल बताता है कि देवी क्रोधागार चली गई हैं। राजा स्नेह और आश्वासन देने की इच्छा से व्याकुल होते जाते हैं। क्रोधागार में कैकेयी को अनुचित मुद्रा में भूमि पर पड़ा देखकर वे उसे सहलाते हैं और पूछते हैं—क्या किसी ने शाप दिया, अपमान किया, या कोई भय है? वे वैद्य बुलाने, दोषी को दंड देने, प्रिय को पुरस्कार देने, यहाँ तक कि व्यापक राजसत्ता सौंपने तक का वचन देते हैं। अंत में दशरथ की इस नम्रता को देखकर कैकेयी अप्रिय वर-याचना कहने को तैयार होती है और उत्सव को धर्म-संकट में बदलने हेतु अपना दबाव बढ़ाने लगती है।
कैकेयीवरप्रार्थना — Kaikeyi Demands the Two Boons
अयोध्याकाण्ड के 11वें सर्ग में कैकेयी, दशरथ को कामवश और विवश देखकर, उन्हें क्रमशः कठोर प्रतिज्ञा में बाँध देती है। राजा बार-बार राम के प्राण और उनके मूल्य की दुहाई देकर शपथ खाता है कि कैकेयी की इच्छा अवश्य पूरी होगी। तब कैकेयी सूर्य, चन्द्र, दिशाएँ, ग्रह, गन्धर्व, राक्षस, गृहदेवता और समस्त प्राणियों को साक्षी बनाकर उस निजी वचन को धर्म-संविदा के समान दृढ़ और लगभग सार्वजनिक कर देती है। वह दैवासुर संग्राम में राजा की रक्षा का प्रसंग स्मरण कराती है और कहती है कि तब मिले दो वर ‘निक्षेप’ की भाँति रखे थे—आज उन्हें लेना उसका अधिकार है। फिर वह दोनों वर विधिपूर्वक स्पष्ट करती है: (1) राम के अभिषेक हेतु जो सामग्री तैयार है, उसी से भरत का राज्याभिषेक किया जाए; (2) राम को चौदह वर्ष के लिए दण्डकारण्य भेजा जाए, जहाँ वे वल्कल, अजिन धारण कर जटाधारी तपस्वी की भाँति रहें। कैकेयी इसे दशरथ के सत्य और कुल-रक्षा की परीक्षा बताती है; और राजा अपने ही वचनों के फंदे में फँसा हुआ, स्वकृत जाल में पड़ा प्रतीत होता है।
द्वादशः सर्गः — Kaikeyi’s Boons and Dasaratha’s Moral Collapse (Ayodhya Kanda 12)
इस सर्ग में कैकेयी के उन “भयानक वचनों” को सुनकर—राम के वनवास और भरत के राज्याभिषेक की माँग—दशरथ के मन और धर्मबुद्धि में तत्काल टूटन दिखती है। वे कभी इसे स्वप्न-भ्रम मानते हैं, कभी शोक और क्रोध में डगमगाते हैं; मृग के व्याघ्री के सामने ठिठकने और मंत्र से बँधे सर्प जैसे उपमानों से उनकी विवशता चित्रित है। वे राम के सत्य, दान, मृदुभाषिता और वृद्ध-सेवा जैसे लोकप्रसिद्ध गुणों का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि यह माँग इक्ष्वाकु-वंश की धर्ममर्यादा का उल्लंघन है। कैकेयी राजधर्म का कठोर तर्क रखती है—एक बार दिए गए वर अवश्य पूरे होने चाहिए; अन्यथा राजा की धर्म-कीर्ति और विश्वसनीयता नष्ट हो जाएगी। वह व्रतपालक राजाओं के उदाहरण देती है और आत्महानि की धमकी देकर दबाव बढ़ाती है। इसके बाद दशरथ लोकनिंदा, राज्य की वैधता पर संकट, और परिवार के विनाश—कौसल्या, सुमित्रा, सीता—की आशंका व्यक्त करते हैं। अंततः वे कैकेयी के चरणों में गिरकर दीन भाव से विनती करते हैं, और सर्ग का अंत उनके शोक से शारीरिक पतन पर होता है—जहाँ विचार-विमर्श से अपरिवर्तनीय त्रासदी की ओर गति स्पष्ट हो जाती है।
अयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः | Kaikeyi Presses the Boons; Dasaratha’s Lament and Collapse
अयोध्याकाण्ड के तेरहवें सर्ग में सभा का संकट निजी कक्ष में और भी तीव्र हो उठता है। दशरथ शोक से व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़े हैं, अपमान के अभ्यस्त नहीं; उन्हें पुण्य क्षीण होने पर स्वर्ग से गिरे राजा ययाति के समान बताया गया है—यह उपमा उनके नैतिक और मानसिक पतन को रेखांकित करती है। कैकेयी अपना उद्देश्य साधकर भी भय का अभिनय करती हुई, भीतर से दृढ़ रहकर बार-बार वरदानों की माँग दोहराती है। दशरथ पीड़ा और रोष में राम के गुणों—रूप, बल, विद्या, संयम, क्षमा—की रक्षा करते हैं और पूछते हैं कि जो सुख के योग्य है, उसे दण्डकारण्य का वनवास कैसे दिया जा सकता है। वे कैकेयी के संकल्प को क्रूर बताते हैं और अपकीर्ति व कलंक की आशंका करते हैं। समय भी कथा का उपकरण बनता है—सूर्यास्त के बाद रात्रि आती है, पर शोकग्रस्त राजा को वह और भी अँधेरी लगती है; वे रात्रि से विनती करते हैं कि प्रभात न लाए, या शीघ्र बीत जाए ताकि कैकेयी का मुख न देखना पड़े। फिर वे हाथ जोड़कर कैकेयी को मनाने का प्रयास करते हैं—“तुम्हारे द्वारा ही राम को राज्य मिले; तुम्हारी कीर्ति होगी।” पर वह अडिग रहती है। बार-बार के आघात और शोक से दशरथ मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं; उनकी भारी-भारी साँसों के बीच वह भयावह रात्रि कटती है। वे भाटों द्वारा होने वाली प्रातः-स्तुति से जगाने की परंपरा तक रोक देते हैं—राज-व्यवस्था और मर्यादा के टूटने का संकेत देते हुए।
सत्यपाशः — Kaikeyi’s Demand and the Noose of the King’s Promise
अयोध्याकाण्ड के चौदहवें सर्ग में राज्याभिषेक का संकट कैकेयी और दशरथ के बीच धर्म-बद्ध प्रतिज्ञा के रूप में रचे गए संवाद से और तीव्र हो जाता है। मूर्छित-से, शोक में तड़पते राजा को देखकर कैकेयी वरदान की प्रतिज्ञा पूरी करने पर अड़ जाती है और कहती है कि यदि राजा मुकरेंगे तो वह प्राण त्याग देगी। दशरथ को इन्द्र के सत्यपाश में बँधे बलि की भाँति प्रतिज्ञा-बन्धन ने जकड़ लिया है; शोक और धर्म-संकट से उनका तन-मन डगमगा उठता है। दशरथ कठोर वचन कहकर कैकेयी को धिक्कारते हैं और अपने अंत्येष्टि-विचार तक करने लगते हैं। वे कैकेयी और उसके पुत्र को चेताते हैं कि यदि राम के अभिषेक में बाधा डालोगे तो मेरी सलिल-क्रिया मत करना। इसी बीच प्रभात होता है और अभिषेक की विधि-व्यवस्था आगे बढ़ती है—गुरु वसिष्ठ समस्त मांगलिक सामग्री सहित महल में प्रवेश करते हैं; अयोध्या की गलियाँ धुली हुई, पुष्पमालाओं से सजी, चन्दन और धूप की सुगन्ध से सुवासित दिखाई देती हैं। सुमन्त्र भीतर की विपत्ति से अनजान होकर प्रातःकालीन स्तुति-वाक्यों से राजा को जगाने आता है, पर उससे दशरथ का शोक फिर उमड़ पड़ता है। तब कैकेयी सुमन्त्र को राम को बुलाने भेज देती है और राजा को केवल हर्ष-उत्सुकता से नींद से थका हुआ बताती है—इस प्रकार कथा राम के सामने वरदान-आदेश के प्रत्यक्ष सामना की ओर बढ़ती है।
अभिषेकसज्जा तथा सुमन्त्रस्य प्रेषणम् (Coronation Preparations and Sumantra’s Commission)
इस सर्ग में श्रीराम के युवराजाभिषेक हेतु अयोध्या की समस्त सामग्री और नागरिक व्यवस्था का वर्णन है। वेदवेत्ता ब्राह्मण और राजपुरोहित अभिषेक-मण्डप में रात्रि-जागरण करके एकत्र होते हैं; मंत्री, सेनानायक और श्रेणियों के प्रमुख हर्षपूर्वक उपस्थित होते हैं। शुभ मुहूर्त—पुष्य नक्षत्र, कर्कट लग्न, तथा राम के जन्म-नक्षत्र के अनुरूप—निश्चित किया जाता है। गंगा–यमुना संगम सहित नदियों, सरोवरों, कुओं और समुद्रों से पवित्र जल लाया जाता है; कमल-शोभित स्वर्ण-रजत पात्र, मधु, दधि, घृत, दूध, दर्भ, पुष्प; चामर, चन्द्र-सा श्वेत छत्र, श्वेत वृषभ और अश्व, तथा राजारोहण हेतु महागज; अलंकृत आठ कन्याएँ, वादक और स्तुतिगायक—सब तैयार रहते हैं। पर सूर्योदय के बाद भी सभासदों को राजा दशरथ के दर्शन नहीं होते। सुमंत्र अन्तःपुर में जाकर वंश की प्रशंसा करता है, विजयार्थ देवताओं का आवाहन करता है और राजा से जागकर सभा को दर्शन देने का निवेदन करता है। जाग्रत किंतु व्याकुल दशरथ पूछते हैं कि कैकेयी की आज्ञा के अनुसार राम को बुलाया क्यों नहीं गया, और सुमंत्र को फिर से राम को लाने का आदेश देते हैं। सुमंत्र ध्वज-पताकाओं से सजी गलियों से निकलता है, नागरिकों की अभिषेक-चर्चा सुनता हुआ राम के प्रासाद तक पहुँचता है, जिसका वर्णन रत्नमय वैभव से किया गया है। वहाँ उपहार लिए नगरवासी और ग्रामवासी उमड़े रहते हैं; सुमंत्र अंततः राम के निजी कक्ष में प्रवेश करता है।
सुमन्त्रदर्शनम् तथा रामस्य राजदर्शनाय प्रस्थानम् (Sumantra Meets Rama; Rama Departs to See the King)
इस सर्ग में सुमंत्र जनसमूह से भरे अंतःपुर-द्वार को पार कर एकांत कक्ष की ओर जाते हैं। वहाँ युवकों द्वारा—भाले और धनुष धारण किए, सतर्क प्रहरी-भाव से—अंतःपुर-परिसर की रक्षा का वर्णन है। द्वार पर खड़े काषाय-वस्त्रधारी वृद्ध स्त्री-अध्यक्षों को देखकर सुमंत्र विनयपूर्वक अपना आगमन निवेदित करते हैं; वे तुरंत राम को सूचना देते हैं। सुमंत्र राम को देखते हैं—स्वर्ण-पर्यंक पर विराजमान, उत्तम चंदन से अनुलिप्त, कुबेर-तुल्य तेजस्वी; और पास ही सीता हाथ में चँवर लिए खड़ी होकर उन्हें ‘चित्रित चंद्रमा’ की भाँति शोभित कर रही हैं। सुमंत्र प्रणाम कर दशरथ का संदेश सुनाते हैं—कैकेयी सहित राजा राम को तुरंत देखना चाहते हैं, विलंब न हो। राम प्रसन्न होकर अभिषेक-संबंधी विचार मन में उठते हुए सीता से कहते हैं; सीता मंगलकामना करती हुई दिशाओं के देवताओं से रक्षा की प्रार्थना करती हैं और दीक्षा-व्रत के चिह्न—अजिन और मृग-शृंग—का संकेत भी करती हैं। फिर राम सुमंत्र के साथ निकलते हैं; द्वार पर हाथ जोड़कर खड़े लक्ष्मण को देखकर उन्हें साथ ले चलते हैं। रथ-प्रस्थान नगर-उत्सव जैसा हो उठता है—वाद्यों और स्तुतियों का निनाद, जनसमूह का कोलाहल, पुष्प-वर्षा, नागरिकों की प्रशंसा-वाणी, घोड़े-हाथी-रथों से भरा राजपथ, रथ का मेघ-गर्जन-सा घोष और मणि-स्वर्ण की शोभा। इस प्रकार यह सर्ग राज्याभिषेक की आशा-उत्साह की सार्वजनिक प्रतिध्वनि और राम के शील-प्रभाव को स्थापित करता है।
रामस्य राजमार्गगमनम् (Rama’s Progress along the Royal Highway)
अयोध्याकाण्ड के सत्रहवें सर्ग में राम रथ पर आरूढ़ होकर राजमार्ग से निकलते हैं। उनके साथ हर्षित साथी हैं और उन्हें देखने के लिए नगर-जन घनी भीड़ में उमड़ पड़ते हैं। अयोध्या और राजपथ का भव्य माङ्गलिक शृंगार किया गया है—ध्वज-पताकाएँ, धूप-अगरु की सुगंध, चंदन और इत्र के ढेर, रेशमी वस्त्र, मोती और स्फटिक की वस्तुएँ, पुष्प तथा नैवेद्य—मानो नगर स्वयं देवपथ बन गया हो। नागरिक कहते हैं कि सिंहासनारूढ़ राम का सार्वजनिक दर्शन ही देह की आवश्यकताओं से बढ़कर तृप्ति देता है; उनके लिए राजधर्म एक नैतिक और सौंदर्यपूर्ण आदर्श बन उठता है। राम आशीर्वाद और स्तुति सुनते हुए भी संयत, शांत और भीतर से विरक्त रहते हैं। वे लोगों का यथोचित सम्मान करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। ग्रंथ राम के धर्म और करुणा की ऐसी आकर्षक प्रभा दिखाता है कि दर्शक न आँख हटा पाते हैं, न मन; और उनकी दया सभी वर्णों तथा सभी आयु के लोगों पर समान रूप से बरसती है। वे प्रदक्षिणा-शिष्टाचार का पालन करते हुए—तीर्थ-संधियों, देवालय-मार्गों, स्मारकों और चैत्य-स्थानों को दाहिनी ओर रखते—राजनिवास पहुँचते हैं, जिसके शिखर मेघों, कैलास-शृंगों और धवल विमानों के समान कहे गए हैं। पहरेदार प्रांगणों को पार कर वे अनुचरों को विदा करते हैं और पिता के निकट स्थित अंतःपुर में प्रवेश करते हैं; बाहर प्रतीक्षारत जनसमूह उनके पुनर्दर्शन की आशा में समुद्र की भाँति चंद्र-उदय की प्रतीक्षा करता है।
अष्टादशः सर्गः — Kaikeyī Discloses the Boons: Exile to Daṇḍaka and Bharata’s Consecration
राम अंतःपुर में प्रवेश कर शुभ शय्या पर पड़े हुए दीन‑पाण्डुर दशरथ को कैकेयी के पास बैठा देखता है। पहले पिता को, फिर कैकेयी को प्रणाम करके वह देखता है कि राजा आँसुओं से भरे नेत्रों और भारी श्वासों के साथ केवल “राम” कह पा रहे हैं; न वे दृष्टि उठा पाते हैं, न स्पष्ट वचन बोल पाते हैं। राम क्रमबद्ध ढंग से कारण पूछता है—क्या उससे अनजाने में कोई अपराध हुआ, क्या राजा को शारीरिक या मानसिक पीड़ा है, क्या भरत‑शत्रुघ्न या रानियों पर कोई विपत्ति आई है, अथवा कैकेयी ने कठोर वचन कहकर राजा का मन विचलित कर दिया है। तब कैकेयी कहती है कि प्रिय पुत्र को अप्रिय सत्य कहने का भय ही राजा की चुप्पी है, और वह राम से पूर्व में दिए गए दो वरों को सत्य रूप से पूरा करने की मांग करती है। राम अपनी अटल आज्ञाकारिता प्रकट करता है—पिता‑गुरु और हितैषी की आज्ञा हो तो वह अग्नि में प्रवेश, विषपान या जल में डूबना भी स्वीकार करेगा—और राजा की आज्ञा सुनने को कहता है। तब कैकेयी वरदानों का कथन करती है: भरत का राज्याभिषेक और राम का चौदह वर्ष के लिए दण्डकारण्य में वनवास, अभिषेक त्यागकर जटा‑अजिन धारण कर तपस्वी‑जीवन। सर्ग का अंत राम की स्थिरता और कैकेयी के कठोर वचनों के बीच उसके धैर्य के साथ होता है, जबकि दशरथ पुत्र पर आई आपदा से अत्यन्त व्याकुल हो उठते हैं। सत्य, व्रत और उत्तराधिकार के प्रश्न पर आधारित धर्म‑संकट यहाँ स्पष्ट रूप से उभर आता है।
एकोनविंशः सर्गः (Sarga 19): Rāma’s Unshaken Acceptance of Exile and Kaikeyī’s Urgency
इस सर्ग में अंतःपुर के भीतर राम और कैकेयी का तीव्र संवाद होता है। कैकेयी के “मृत्यु-तुल्य” वचन सुनकर भी राम के मुख पर विकार नहीं आता। वे दशरथ के मौन का कारण पूछते हैं और फिर पिता की प्रतिज्ञा की रक्षा हेतु वल्कल-वस्त्र और जटाधारण करके वनवास स्वीकार करते हैं। राम कहते हैं कि पिता के वचन का पालन ही परम धर्म है; उन्हें राज्य-वैभव में आसक्ति नहीं, वे धर्मनिष्ठ मुनियों के समान केवल धर्म में स्थित हैं। तुरंत ही राजकार्य की व्यवस्था चल पड़ती है—दूतों को मातुल-गृह से भरत को बुलाने का आदेश दिया जाता है। कैकेयी राम के प्रस्थान को निश्चित मानकर उन्हें शीघ्र जाने को उकसाती है और दशरथ के उपवास को दबाव बनाती है—जब तक राम नहीं निकलेंगे, राजा न स्नान करेंगे न भोजन। शोक से दशरथ मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं; राम उन्हें उठाते हैं, पिता और कैकेयी की प्रदक्षिणा करके बाहर निकलते हैं। कथा राम की अडिग शांति को रेखांकित करती है—उनका तेज चंद्रमा की भाँति अविचल रहता है। वे मित्रों से अशुभ समाचार छिपाते हैं, छत्र-चामर-रथ जैसे राजचिह्न त्यागते हैं, इंद्रियों को संयमित कर माता के भवन में जाकर यह उलटफेर बताने हेतु प्रवेश करते हैं; लक्ष्मण आँसुओं और क्रोध से भरे हुए उनके पीछे चलते हैं।
अयोध्याकाण्डे विंशः सर्गः — Rama Enters Kauśalyā’s Antaḥpura; Ritual Preparations and the Shock of Exile
इस सर्ग में राम का सार्वजनिक मार्ग से अंतःपुर के निजी लोक में प्रवेश दिखाया गया है। राम हाथ जोड़कर निकलते हैं तो अंतःपुर में व्याकुलता फैल जाती है; रानियाँ विलाप करती हुई राजा को दोष देती हैं। उनका क्रंदन सुनकर शोक से जर्जर दशरथ भीतर ही भीतर टूट जाते हैं। संयमी किंतु भाराक्रांत राम लक्ष्मण के साथ एक-एक प्रांगण पार करते हैं—‘जय’ के घोष से उनका स्वागत होता है, वे राजा द्वारा सत्कृत वृद्ध वेदवेत्ता ब्राह्मणों को देखते हैं और स्त्री-वृद्ध-बाल सहित सतर्क द्वारपालों के बीच से आगे बढ़ते हैं। स्त्रियाँ दौड़कर कौसल्या को उनके आगमन का समाचार देती हैं। कौसल्या प्रातःकालीन व्रत-नियम में स्थित हैं—श्वेत रेशमी वस्त्र, अग्निहोत्र, तर्पण और पुत्र-कल्याण की प्रार्थना। दही, अक्षत, घी, मिष्टान्न, हवि, मालाएँ, पायस, कृसरा, समिधा और पूर्ण कलश आदि सामग्री का उल्लेख घर के पवित्र अनुष्ठान-परिवेश को दृढ़ करता है। माता-पुत्र का आलिंगन होता है; कौसल्या आशीर्वाद देती हैं और निकट अभिषेक की आशा करती हैं। तभी राम विनयपूर्वक उलटा समाचार कहते हैं—भरत को युवराज्य मिलेगा और राम को चौदह वर्ष दण्डकारण्य में वनवास, फल-मूल पर निर्वाह और तपस्वी जीवन। यह सुनते ही कौसल्या का हृदय टूट जाता है; वे मूर्छित होकर दीर्घ विलाप करती हैं—सौतों के अपमान का भय, पुत्र के बिना जीवन की निराशा और अपने व्रत-तप को निष्फल मानना। राम उन्हें उठाकर ढाढ़स बँधाते हैं; इस प्रकार सर्ग में अनुष्ठान की आशा और धर्मजन्य विपत्ति का तीव्र तनाव उभरता है।
अयोध्याकाण्डे एकविंशः सर्गः — Lakṣmaṇa’s militant counsel and Rāma’s dharma-based persuasion of Kausalyā
अयोध्या कांड के २१वें सर्ग में राम के वनवास को लेकर एक गहन नैतिक संवाद प्रस्तुत किया गया है। माता कौशल्या के विलाप से व्यथित होकर लक्ष्मण उग्र हो उठते हैं। वे राम को बलपूर्वक सत्ता हथियाने की सलाह देते हैं और यहाँ तक कहते हैं कि यदि राजा दशरथ कैकेयी के प्रभाव में शत्रु जैसा व्यवहार करें, तो उन्हें बंदी बना लेना चाहिए या मार देना चाहिए। कौशल्या भी राम से आग्रह करती हैं कि वे अधार्मिक आदेश को अस्वीकार कर माता की सेवा में ही रहें। इसके उत्तर में, राम धर्म और सत्य के मार्ग पर अडिग रहते हैं। वे पिता की आज्ञा के उल्लंघन को असंभव बताते हैं। अपने पक्ष को सिद्ध करने के लिए वे कंडु ऋषि, सगर के पुत्रों और परशुराम (जामदग्न्य) के उदाहरण देते हैं जिन्होंने पिता की आज्ञा का पालन किया था। राम लक्ष्मण के क्षत्रिय-सुलभ क्रोध को शांत करते हैं और माता कौशल्या से वन जाने की अनुमति और आशीर्वाद मांगते हैं, यह वचन देते हुए कि वे वनवास पूर्ण कर अवश्य लौटेंगे।
अभिषेक-निवृत्ति-उपदेशः (Withdrawal of the Coronation: Rama’s Counsel to Lakshmana)
इस सर्ग में राज्याभिषेक रुक जाने पर लक्ष्मण के प्रचण्ड क्रोध को देखकर श्रीराम शांत भाव से उसके पास जाते हैं। ‘राजनाग की तरह फुफकारते’ और क्रोध से फैली आँखों वाले लक्ष्मण को वे धैर्य का उपदेश देते हैं और तुरंत व्यवस्था करने को कहते हैं—अभिषेक की सारी तैयारी बिना किसी विघ्न के वापस कर दो; नहीं तो सत्य-भंग के भय से महाराज दशरथ का मानसिक दुःख और बढ़ेगा। राम कैकेयी के कठोर वचन और दृढ़ निश्चय को दैव/कृतान्त की प्रेरणा मानते हैं; इसलिए दोषारोपण और प्रतिशोध से लक्ष्मण को रोकते हैं। वे स्मरण कराते हैं कि भाग्य के दबाव से मुनि भी विचलित हो सकते हैं—अतः कुल की अहिंसा, मर्यादा और लोक-व्यवस्था की रक्षा ही उचित है। अभिषेक के कलश आदि राजकीय सामग्री को वे वनगमन की तैयारी में रूपांतरित करने की बात कहते हैं और बताते हैं कि धर्म के अनुरूप वनवास राज्य से भी अधिक शोभनीय हो सकता है। इस प्रकार यह अध्याय राजधर्म से तपोधर्म की ओर संक्रमण दिखाते हुए परिवार-शांति और सार्वजनिक व्यवस्था को सुरक्षित रखता है।
लक्ष्मणक्रोधः—दैवपुरुषकारविवादः (Lakshmana’s Wrath and the Debate on Destiny vs Human Effort)
अयोध्याकाण्ड के 23वें सर्ग में राम और लक्ष्मण के बीच धर्म-नीति पर तीखा, परन्तु सारगर्भित संवाद होता है। राम के बोलते समय लक्ष्मण के मन में शोक और हर्ष का द्वन्द्व उठता है, फिर वह सर्प-सा फुफकारता और सिंह-सा तेजस्वी होकर क्रोध प्रकट करता है। वह राम के अतिरिक्त किसी और के अभिषेक को अनुचित मानता है और राज्य-परिवर्तन को लोक-लज्जा तथा कुल-धर्म के विरुद्ध बताता है। लक्ष्मण ‘दैव’ के सहारे दी जाने वाली बात को अस्वीकार करता है—उसके अनुसार दैव निर्बल है, पुरुषार्थ ही समर्थ है; वीर्य और प्रयत्न से भाग्य को भी पलटा जा सकता है। वह प्रतिज्ञा करता है कि राम के राज्याभिषेक में जो भी बाधा बनेगा, उसे वह परास्त करेगा; यहाँ तक कहता है कि लोकपाल और तीनों लोक भी विरोध करें तो भी वे पर्याप्त नहीं। उसके वचन शस्त्रों, रण-परिणामों और कठोर प्रतिशोध की धमकियों तक बढ़ते हैं, और अंत में वह पूर्ण दास्य-भाव से कहता है—राम केवल शत्रु का नाम लें और आज्ञा दें। राम उसे स्नेहपूर्वक शांत करते हैं, आँसू पोंछते हैं और पिता के वचन का पालन ही ‘सत्पथ’ है—यह सिद्धान्त दृढ़ करते हैं। इस प्रकार प्रसंग आज्ञापालन, संयम और धर्म-निष्ठा को पुनः केन्द्र में स्थापित करता है।
कौशल्यारामसंवादः — Kausalya–Rama Dialogue on Exile-Dharma
अयोध्याकाण्ड के 24वें सर्ग में कौशल्या, दशरथ की आज्ञा का पालन करने में राम का अडिग निश्चय देखकर, उनसे धर्म-विषयक अंतरंग संवाद करती हैं। वे विलाप करती हैं कि राजसुख में पले राम वन के कंद-मूल-फल पर कैसे जीवेंगे; और विरह को ‘शोकाग्नि’ के रूप में चित्रित करती हैं—विलाप ईंधन है, आहें पवन हैं, और आँसू आहुति। वे वत्स के पीछे चलने वाली गौ की तरह राम के साथ जाने का आग्रह करती हैं, और फिर कहती हैं कि सौतों के बीच रहकर तड़पने से अच्छा है कि मुझे मृगी की भाँति वन में ले चलो। राम नीति-युक्त उत्तर देते हैं—कैकेयी ने पहले ही राजा को छल लिया है; यदि आप भी दशरथ को छोड़ देंगी तो वृद्ध राजा शोक से जीवित न रहेंगे, और पत्नी का पति-त्याग धर्म में निंदित है। इसलिए आप धैर्य रखकर राजा की सेवा करें, शोक को संयमित कर उनके प्राणों की रक्षा करें; गृह-धर्म, यज्ञ-कार्य, अग्नि-पूजन और ब्राह्मण-सत्कार का पालन करें, और चौदह वर्ष तक नियमपूर्वक मेरे लौटने की प्रतीक्षा करें। कौशल्या राम के निर्णय को बदल न सकने पर अनुमति देती हैं, उनके सुरक्षित लौटने का आशीर्वाद देती हैं, और उनके कल्याण-रक्षण हेतु मंगल एवं शांति-रूप विधियाँ करने को उद्यत होती हैं। इस प्रकार उनका विरोध धीरे-धीरे धर्ममय, अनुष्ठान-समर्थन में परिवर्तित हो जाता है।
कौशल्याया मङ्गलविधानम् — Kausalya’s Benedictions and Protective Rites for Rama
अयोध्याकाण्ड के 25वें सर्ग में कौशल्या शोक को संयमित कर राम के वन-प्रस्थान हेतु आचमन करके मङ्गल-कर्म आरम्भ करती हैं। वे स्मृति, धृति, धर्म जैसे अमूर्त रक्षकों का, स्कन्द, सोम, बृहस्पति, वरुण, सूर्य, कुबेर, यम आदि देवताओं का, सप्तर्षियों और नारद का, दिक्पालों तथा पर्वत-समुद्र-नदियों, नक्षत्र-ग्रहों, दिन-रात, उषा-सन्ध्या, ऋतु-मास-वर्ष और मुहूर्त-विभागों का आवाहन कर राम की सर्वतो रक्षा की प्रार्थना करती हैं। वन के भय—राक्षस, पिशाच, मांसभक्षी, कीट, सर्प और वन्य पशु—गिनाकर वे चाहती हैं कि इनमें से कोई भी राम को कष्ट न दे। कौशल्या देवताओं की पुष्पमालाओं और सुगन्धों से पूजा करती हैं, ब्राह्मण से अग्नि स्थापित कराकर हवन करती हैं, श्वेत मालाएँ और श्वेत सरसों मँगवाती हैं तथा स्वस्त्ययन/मङ्गल-पाठ कराती हैं। वे दक्षिणा देकर इन्द्र के वृत्र-वध, गरुड़ के अमृत-आहरण और विष्णु के त्रिविक्रम-चरित को मङ्गल-उपमान के रूप में उच्चारित करती हैं। वे राम को चन्दन लगाती हैं, हवन-शेष उनके मस्तक पर रखती हैं और विशल्यकरणी औषधि को रक्षासूत्र की भाँति बाँध देती हैं। भीतर से व्याकुल होकर भी प्रसन्न-सी वाणी में वे बार-बार आलिंगन करती हैं, प्रदक्षिणा करती हैं; और राम उनके चरण पकड़कर सीता के भवन की ओर प्रस्थान करते हैं।
अयोध्याकाण्डे षड्विंशः सर्गः — Rama’s Departure and Sita’s Questions; Disclosure of Exile and Counsel on Courtly Conduct
इस सर्ग में मंगल-निश्चय से अचानक धर्म-संकट और शोक की ओर कथा मुड़ती है। कौसल्या स्वस्त्ययन आदि शुभकर्म करके राम को आशीर्वाद देती हैं। राम माता को प्रणाम कर ‘धर्मिष्ठ मार्ग’ पर स्थित रहते हुए, अपने गुणों से व्याकुल हुए जनसमूह के बीच राजपथ से वनवास के लिए प्रस्थान करते हैं। उधर सीता गृहदेवता-पूजन और व्रत-तप करके अभिषेक की तैयारी में थीं। वे राम के बदले हुए वर्ण और विषाद को देखकर प्रश्नों की शृंखला रखती हैं—छत्र-चामर, स्तुतिगान, जयघोष, मधुपर्क/दधि-मधु से अभिषेक, मंत्री, श्रेणी-प्रमुख, शोभायात्रा का रथ, अग्रगामी गज और स्वर्ण-सिंहासन—ये सब क्यों नहीं दिखते? अर्थात राज्याभिषेक के सार्वजनिक चिह्न क्यों लुप्त हो गए? तब राम वनवास का कारण बताते हैं—दशरथ ने पूर्व में कैकेयी को दो वर दिए थे; उसी का स्मरण कर उसने अभिषेक-समय प्रतिज्ञा पूरी कराई; दण्डक वन में चौदह वर्ष का आदेश हुआ और भरत को युवराज नियुक्त किया गया। फिर राम सीता को नीति-उपदेश देते हैं—भरत के सामने मेरी प्रशंसा न करना, विशेष अनुग्रह न माँगना, सबके प्रति अनुकूल आचरण रखना; दशरथ और सभी माताओं, विशेषकर शोकाकुल कौसल्या का सम्मान करना; भरत-शत्रुघ्न को अपने बंधु मानकर स्नेह देना; राजा को अप्रसन्न न करना, क्योंकि नरेश सेवा से प्रसन्न होते हैं और अहित करने वाले को अपना होकर भी त्याग देते हैं। अंत में राम सीता से अयोध्या में ही रहकर वाणी और कर्म से निरपराध, स्थिर रहने का अनुरोध करते हैं और स्वयं वन के लिए निकल पड़ते हैं।
सीताया वनगमननिश्चयः (Sita’s Resolve to Accompany Rama to the Forest)
अयोध्याकाण्ड के सर्ग 27 में सीता, राम के उस कथन के उत्तर में विस्तार से बोलती हैं जिसे वह अपने साथ वनगमन के अधिकार की उपेक्षा मानती हैं। वह कहती हैं कि पत्नी ही पति के भाग्य (भर्तृ-भाग्य) की सहभागी होती है और पति इस लोक तथा परलोक में स्त्री का स्थायी आश्रय है। माता-पिता से धर्म की शिक्षा पाई हुई होने के कारण वह स्पष्ट करती हैं कि अपने आचरण के लिए उन्हें और उपदेश की आवश्यकता नहीं। सीता दृढ़ संकल्प करती हैं कि वह निर्जन और कठिन वन में राम से पहले चलेंगी, उनके मार्ग के लिए काँटों तक को कुचल देंगी। वह फल-मूल पर संयमित जीवन जीने और कभी भार न बनने का वचन देती हैं। यहाँ तर्क से आगे बढ़कर भावनात्मक निष्ठा प्रबल हो उठती है—राम-वियोग असह्य है; उनके बिना स्वर्ग भी स्वीकार्य नहीं। वह नदियों, पर्वतों, कमल-सरोंवरों और वन्य जीवों के बीच राम के साथ वन-जीवन को आनंदमय संगति के रूप में देखती हैं। अंत में, सीता के आग्रह के बावजूद राम अभी भी अनिच्छुक रहते हैं और उन्हें रोकने के लिए वनवास की कठिनाइयों का वर्णन आरंभ करते हैं, जिससे आगे का संवाद बनता है।
सीतानिवर्तनप्रयत्नः — Rama’s Attempt to Dissuade Sita from Forest Exile
अयोध्याकाण्ड के इस 28वें सर्ग में सीता के वनगमन-आग्रह पर श्रीराम पहले उन्हें साथ ले जाने से इनकार करते हैं। धर्मज्ञ और धर्मवत्सल राम अपने निषेध को अस्वीकार नहीं, बल्कि रक्षण-भाव से की गई सावधानी बताते हैं। वे सीता को अयोध्या में रहकर अपने स्वधर्म का पालन करने की सीख देते हैं और कहते हैं कि तुम्हारा आज्ञापालन ही मुझे अंतःशांति देगा। इसके बाद राम प्रमाण-रूप में वनवास की कठिनाइयों का विस्तार से वर्णन करते हैं—झरनों और सिंहों की भयावह ध्वनियाँ, हिंसक वन्य पशु, मगरमच्छों से भरी कीचड़युक्त नदियाँ, काँटों और जलहीन मार्ग, पत्तों की शय्या पर शयन, गिरे हुए फलों पर निर्वाह, उपवास, वल्कल-वस्त्र और जटाधारण। साथ ही देव-पितृ-अतिथि-पूजन, त्रिकाल स्नान, स्वयं जुटाए पुष्पों से वैदिक हवन, अल्पाहार, अंधकार, वायु, भूख, सर्प-सरीसृप तथा डंक मारने वाले कीटों का भी उल्लेख करते हैं। अंत में वे निर्णय देते हैं कि वन “बहुदोषतर” है और सीता के लिए उपयुक्त नहीं। पर सीता उनकी बात नहीं मानतीं; शोक से व्याकुल होकर उत्तर देती हैं, जिससे आगे उनके प्रतिवचन का प्रसंग आरम्भ होता है।
सीताया वनगमननिश्चयः — Sita’s Resolve to Accompany Rama to the Forest
अयोध्याकाण्ड के सर्ग 29 में राम के वनगमन का समाचार सुनकर सीता शोक-विह्वल होकर आँसुओं के साथ राम से दीर्घ, तर्कपूर्ण और भावपूर्ण निवेदन करती हैं। वे वनवास के बताए गए “दोषों” को पति-संग के कारण गुण के रूप में देखती हैं और कहती हैं कि पति से वियोग उनके लिए मृत्यु के समान है; पत्नी का धर्म और दाम्पत्य-अविच्छेद्यत्व ही उनका आधार है। राम की उपस्थिति में वे स्वयं को पूर्णतः सुरक्षित मानती हैं—देवताओं जैसी शक्तियों से भी भय नहीं रहता। सीता श्रुति-परम्परा का प्रमाण भी देती हैं कि जल-पूर्वक विधि से दी गई पत्नी मृत्यु के बाद भी पति की ही होती है; इसलिए उनका साथ जीवन-पर्यन्त ही नहीं, परलोक तक है। वे यह भी स्मरण कराती हैं कि पहले एक ब्राह्मण और एक भिक्षुकी स्त्री ने उनके वन में रहने की भविष्यवाणी की थी, जिसे वे नियति मानकर स्वीकार करती हैं। अंत में वे कठोर प्रतिज्ञा करती हैं कि यदि उन्हें साथ न ले जाया गया तो वे विष, अग्नि या जल से प्राण त्याग देंगी। राम आत्मसंयमी होकर निर्जन वन में उन्हें ले जाने की अनुमति नहीं देते और बार-बार सांत्वना देकर रोकने का प्रयास करते हैं। सीता का दुःख अश्रुधारा के चित्रण से तीव्रता से उभरता है; दक्षिणी पाठ में कुछ स्थलों पर पद्य-खंडों की पुनरावृत्ति भी मिलती है, जिससे मुख्य दावों का बल बढ़ता है।
सीताया वनानुगमननिश्चयः — Sita’s Resolve to Accompany Rama to the Forest
अयोध्याकाण्ड के 30वें सर्ग में पति-पत्नी के बीच धर्म और कर्तव्य का संवाद सान्त्वना तथा प्रत्युत्तर के रूप में प्रकट होता है। राम पहले सीता को वनवास में साथ चलने से रोकना चाहते हैं, पर सीता दृढ़ता से कहती हैं कि उनका पतिव्रत एकमात्र आश्रय है; राम से वियोग उन्हें असह्य है। वे वन की कठिनाइयों को भी राम के साथ होने पर सुख मानती हैं—धूल चन्दन-सी, कुश-तृण शय्या-सा, और संचित फल अमृत-से। अंत में वे स्पष्ट कह देती हैं कि परित्याग या अयोध्या में शत्रु-शक्ति के अधीन रहने से अच्छा मृत्यु है। इसके बाद राम उन्हें आलिंगन कर आश्वस्त करते हैं और बताते हैं कि उनका वनगमन पिता की आज्ञा-पालन और माता-पिता के वचन की पवित्रता के कारण है। वे माता-पिता और गुरु को प्रत्यक्ष देवता मानकर उनकी सेवा को परम फलदायी बताते हैं। सीता को सहधर्मचारिणी स्वीकार कर राम उन्हें तैयारी का आदेश देते हैं—आभूषण, वस्त्र, शय्या, रथ आदि सेवकों और ब्राह्मणों को दान करें तथा याचकों/संन्यासियों को अन्न दें। सीता प्रसन्न होकर आज्ञा का पालन करती हैं और भावनात्मक विवाद त्याग तथा धर्मसज्जा में परिणत हो जाता है।
लक्ष्मणस्य वनानुगमन-प्रतिज्ञा तथा आयुध-संग्रहः (Lakshmana’s Vow to Follow Rama and the Retrieval of Divine Weapons)
इस सर्ग में राम के वनगमन के प्रसंग पर धर्म-प्राथमिकताओं का सघन संवाद है। लक्ष्मण पहले ही आकर राम–सीता की बात सुनते हैं, शोक से व्याकुल होकर राम के चरण पकड़ लेते हैं और दृढ़ प्रतिज्ञा करते हैं कि वे किसी भी स्थिति में राम के साथ ही वन जाएंगे। तब राम व्यावहारिक धर्म की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं—यदि लक्ष्मण भी चले गए तो कौसल्या और सुमित्रा की सेवा-रक्षा कौन करेगा? दशरथ का कामवश होना और कैकेयी का प्रभाव बढ़ना राज्य को असुरक्षित बना रहा है; ऐसे में वृद्ध-सेवा/गुरु-पूजा सर्वोच्च पुण्य है, इसलिए लक्ष्मण को माताओं का रक्षक बनकर अयोध्या में रहना चाहिए। लक्ष्मण तर्कपूर्वक उत्तर देते हैं—भरत राम के तेज को पहचानते हैं, वे कौसल्या और सुमित्रा का यथोचित सम्मान करेंगे; कौसल्या के पास सहस्र ग्रामों की आय है, इसलिए वे भौतिक रूप से सुरक्षित हैं; और लक्ष्मण का अपना धर्म राम का अनुगमन है, इसमें अधर्म नहीं। वे वन में भी सेवा का उपाय बताते हैं—शस्त्र सहित आगे चलकर मार्ग बनाना, मूल-फल जुटाना, और दिन-रात सावधानी से पहरा देना। राम प्रसन्न होकर वाद से कार्य-व्यवस्था पर आते हैं। वे लक्ष्मण से कहते हैं कि मित्रों से विदा लेकर वसिष्ठ के घर में सुरक्षित रखे वरुण-प्रदत्त दिव्य आयुध (धनुष, कवच, अक्षय बाणों वाले तूणीर, स्वर्ण-मढ़ित खड्ग आदि) की पूजा कर उन्हें शीघ्र ले आएँ। लक्ष्मण यह कार्य पूरा करते हैं। अंत में राम आदेश देते हैं कि प्रस्थान से पूर्व वसिष्ठ-पुत्र सुयज्ञ तथा अन्य ब्राह्मणों को बुलाकर विधि-विधान, दान और वितरण किया जाए—ताकि वनयात्रा धर्म (दान, आचार) से संयुक्त होकर आरंभ हो।
द्वात्रिंशस्सर्गः — Gifts to Suyajna and the Brahmins; Trijata’s Petition and Rama’s Charity
अयोध्याकाण्ड के बत्तीसवें सर्ग में श्रीराम वनगमन से पूर्व अपने धन का धर्मानुष्ठान की भाँति वितरण करते हैं। लक्ष्मण राम की शुभ आज्ञा पाकर वेदवेत्ता ब्राह्मण सुयज्ञ के घर जाते हैं और उन्हें राम-भवन में आमंत्रित करते हैं। राम और सीता सुयज्ञ का अग्नि के समान आदर करते हुए प्रदक्षिणा करके उनका सत्कार करते हैं। सीता अपने आभूषण और गृह-सम्पत्ति विधिपूर्वक सुयज्ञ के परिवार को अर्पित करती हैं और राम हाथियों सहित बड़े-बड़े दान जोड़ते हैं। फिर राम लक्ष्मण को आदेश देते हैं कि वे श्रेष्ठ ब्राह्मणों—अगस्त्य और कौशिक—कौसल्या के पास रहने वाले तैत्तिरीय आचार्यों, दीर्घकाल से सेवा करने वाले जनों (जैसे सारथि चित्ररथ) तथा वेदाध्यायी विद्यार्थियों (काठ–कलाप, मेखलिन ब्रह्मचारी) का यथोचित सम्मान करें। वे गायें, रत्नों से भरी गाड़ियाँ, बैल, वस्त्र, रथ और सेवक आदि देने का विधान बताते हैं; लक्ष्मण कुबेर की तरह धन बाँटते हैं। राम यह भी कहते हैं कि उनके लौटने तक महलों की रक्षा बनी रहे और कोष निकालकर आश्रितों, निर्धनों और दीनों को भी तृप्त किया जाए। अंत में दरिद्र ब्राह्मण त्रिजट (गार्ग्य) पत्नी की प्रेरणा से सहायता माँगने आता है। राम हँसी-हँसी में उसकी शक्ति परखते हुए कहते हैं कि अपना दण्ड फेंककर दान की सीमा बताओ; फिर उसे सांत्वना देकर स्पष्ट करते हैं कि उनका धन ब्राह्मणों के हित के लिए ही है। इस प्रकार दान पूर्ण होता है और कोई ब्राह्मण, सेवक, गरीब या भिक्षुक असंतुष्ट नहीं रहता।
त्रयस्त्रिंशः सर्गः — Civic Lament and Rama’s Dutiful Approach to Daśaratha
इस सर्ग में राम, लक्ष्मण और सीता के साथ ब्राह्मणों को दान देकर, निर्वासन को धर्मसम्मत आचरण और सामाजिक कर्तव्य के रूप में स्वीकार करते हुए, दशरथ से मिलने चल पड़ते हैं। सीता दोनों भाइयों के शस्त्रों पर पुष्पमालाएँ चढ़ाती हैं—यह गृह्य-पूज्य भाव का संकेत है, जिससे हथियार विजय के नहीं, कर्तव्य-पालन के साधन के रूप में अर्थवान हो उठते हैं। नगर की गलियाँ जनसमूह से भरकर अवरुद्ध हो जाती हैं; लोग छतों पर चढ़कर देखते हैं कि राम पैदल हैं और छत्र के बिना—राज-प्रोटोकॉल का यह उलटाव सबको व्याकुल करता है। प्रजा कहती है कि दशरथ मानो किसी आवेश में आकर वनवास की बात कर रहे हैं; राजा अपने प्रिय पुत्र को, जिसके सदाचार ने मानो जगत् को जीत लिया है, कैसे निर्वासित कर सकता है। वे राम के षड्गुणों का स्मरण करते हैं—अहिंसा, करुणा, विद्या, सदाचार, दम और आत्मसंयम—और उन्हें धर्म का सार तथा मानवता की जड़ बताते हैं, जिसके शाखा-फल समाज है। उनका शोक सूखे में जलचरों की तड़प और जड़ से कटे वृक्ष के गिरने जैसा हो उठता है; अंततः वे घर-बार छोड़कर राम के साथ वन जाने को तत्पर हो जाते हैं, मानो नगर और वन का नैतिक मानचित्र ही बदल रहा हो। राम इन करुण पुकारों को सुनकर भी अडिग रहते हैं, महल में प्रवेश करते हैं, उदास सुमंत्र को देखते हैं और उसे आदेश देते हैं कि राजा को उनके आगमन की सूचना दे। इस प्रकार वे संयम और कर्तव्यनिष्ठा के साथ दशरथ के सम्मुख जाने का निश्चय बनाए रखते हैं।
रामदर्शनार्थं दारानयनम् — The Queens Summoned; Rama’s Leave-Taking and Dasaratha’s Collapse
इस सर्ग में राजमहल का सुव्यवस्थित क्रम धीरे-धीरे चेतना के संकट में बदल जाता है। राम सुमंत्र से कहते हैं कि वे उनके आगमन का समाचार दशरथ को दें। भीतर जाकर सुमंत्र शोक से क्षीण राजा को देखते हैं—ग्रहणग्रस्त सूर्य, राख से ढकी अग्नि और सूखे सरोवर जैसी उपमाओं से उनकी अवस्था प्रकट होती है। राजा की आज्ञा से सुमंत्र रानियों को बुलाते हैं; कौसल्या बड़े परिजन-समूह के साथ आती हैं, जिससे समूचे अंतःपुर का शोक स्पष्ट होता है। फिर दशरथ राम को बुलाने का आदेश देते हैं। हाथ जोड़कर आते राम को देखकर दशरथ उठकर उनकी ओर दौड़ते हैं, पर पहुँचने से पहले ही मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं। महल में स्त्रियों का करुण विलाप और आभूषणों की झंकार गूँज उठती है। राम, लक्ष्मण और सीता उन्हें उठाकर शय्या पर लिटाते हैं; चेतना लौटने पर राम दण्डकारण्य जाने की अनुमति माँगते हैं और लक्ष्मण तथा सीता के साथ चलने की भी प्रार्थना करते हैं। सत्य के बंधन और कैकेयी के दबाव से विवश दशरथ उलटा उपाय सुझाते हैं—राम ही राज्य ले लें, ताकि वचन से बचा जा सके। राम इसे अस्वीकार कर सत्य की प्रतिष्ठा करते हैं, राज्य और भोगों का त्याग घोषित करते हैं, वरदान पूर्ण करने पर आग्रह करते हैं और भरत को राज्य देने की बात कहते हैं। दशरथ कभी आशीर्वाद देते हैं, कभी विलाप कर विलंब माँगते हैं—कम से कम एक रात रुकने की याचना करते हैं। राम कहते हैं कि पिता देवताओं के लिए भी देवतुल्य हैं; उनका निश्चय अटल है और चौदह वर्ष बाद वे लौट आएँगे। अंत में दशरथ फिर राम को आलिंगन कर मूर्छित हो जाते हैं; कैकेयी को छोड़कर रानियाँ और सुमंत्र भी शोक में बेहोश हो जाते हैं—सर्वत्र रुदन से धर्म-संकट की सामूहिक त्रासदी प्रकट होती है।
सुमन्त्रस्य कैकेयी-निन्दा (Sumantra’s Reproof of Kaikeyi in the Royal Assembly)
अयोध्याकाण्ड के 35वें सर्ग में सुमन्त्र राजसभा में अत्यन्त व्यथित और क्रुद्ध होकर हस्तक्षेप करते हैं। वे दशरथ के मनोभाव को समझकर कैकेयी के राम-वनवास के आग्रह का सामना करते हैं। सिर हिलाना, बार-बार लंबी साँसें लेना, मुट्ठियाँ भींचना और दाँत पीसना—इन देह-चिह्नों के बाद वे “वचन-बाण” और “वज्र-वाणी” के समान कठोर शब्दों में कैकेयी की निन्दा करते हैं। वे कहते हैं कि यदि वह भरत को राज्य दिलाना चाहती है तो भी प्रजा, ब्राह्मण और साधु उसे त्याग देंगे; राम को वन भेजने से सर्वत्र परिवाद फैल जाएगा। सुमन्त्र नीति-दृष्टान्तों से समझाते हैं—आम का वृक्ष काटकर नीम लगाने से मिठास नहीं आती; दूध डालने पर भी नीम मीठा नहीं होता; नीम से मधु नहीं टपकता। वे स्वभाव-दोष और मर्यादा-भंग के दुष्परिणाम का संकेत देते हैं। कैकेयी के पिता को पशुओं की बोली समझने का वर मिला था—इस प्रसंग को संक्षेप में स्मरण कराकर वे कैकेयी के हठ और उसके फल की ओर संकेत करते हैं। फिर वे उपदेश देते हैं—राजा की बात मानो, पति की इच्छा का पालन करो, और राम को—जो ज्येष्ठ, उदार, कुशल, धर्मनिष्ठ तथा प्रजा-रक्षक हैं—युवराज बनाओ, ताकि दशरथ प्राचीन परम्परा के अनुसार आगे चलकर निवृत्त हो सकें। सर्ग के अंत में कैकेयी बाह्य रूप से अविचल रहती है, जिससे धर्म-संकट में समझाने की सीमा प्रकट होती है।
अयोध्याकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः — Daśaratha’s orders for Rama’s escort; Kaikeyi’s fear; the Asamañjasa precedent
अयोध्याकाण्ड के 36वें सर्ग में राज्याभिषेक का संकट अब व्यवस्था और धर्म के तीखे संघर्ष में बदल जाता है। वरदान के बंधन से पीड़ित दशरथ आँसू बहाते हुए बार-बार सुमंत्र को पुकारते हैं और राम की वन-यात्रा के लिए विस्तृत प्रबंध करने का आदेश देते हैं—चतुरंगिणी सेना, बहुमूल्य धन-सामग्री, सेवक, रथ-गाड़ियाँ, शस्त्र, वन-मार्गदर्शक और शिकारी, यहाँ तक कि कोष और धान्यागार की सामग्री भी साथ भेजने की बात कहते हैं। इसी बीच कैकेयी की प्रतिक्रिया सामने आती है। दशरथ के बोलते-बोलते उसे भय घेर लेता है, कंठ रुद्ध हो जाता है; वह तर्क देती है कि प्रजा और समृद्धि से रिक्त राज्य को भरत स्वीकार नहीं करेंगे। दशरथ उसके क्रूर भाव की निंदा करते हैं, पर कैकेयी वंश-परंपरा का उदाहरण देकर बात बढ़ाती है—सगर द्वारा ज्येष्ठ पुत्र असमंजस का त्याग। तब वृद्ध मंत्री सिद्धार्थ असमंजस के अपराधों का वर्णन करते हैं कि उसने प्रजा के बालकों पर अत्याचार किए थे, और कैकेयी को चुनौती देते हैं कि राम में कोई वास्तविक दोष बताओ; अन्यथा निर्वासन अधर्म है, जो इन्द्र की शोभा तक को जला दे। अंत में शोकाकुल दशरथ कैकेयी के ‘कुपथ’ को धिक्कारते हुए कहते हैं कि वे राज्य और धन छोड़कर राम के साथ ही चलेंगे, और व्यंग्य-भरी निराशा के साथ कैकेयी से कहते हैं कि भरत के साथ राज्य का ‘भोग’ कर लो।
अयोध्याकाण्डे सर्गः ३७ — चीरधारणं, सीतासंकल्पः, वसिष्ठोपदेशः (Bark-Robe Episode and Vasistha’s Admonition)
अयोध्याकाण्ड के सैंतीसवें सर्ग में राजसी जीवन से तपस्वी अनुशासन की ओर निर्वासन का प्रत्यक्ष रूपान्तरण ‘चीर’ धारण के विधिवत् प्रसंग से दिखाया गया है। मंत्रियों की बात सुनकर श्रीराम दशरथ से विनयपूर्वक कहते हैं कि उन्होंने भोग और आसक्ति का त्याग कर दिया है; उन्हें न अनुचर चाहिए, न सैन्य-प्रदर्शन—वनवास के लिए केवल न्यूनतम आवश्यक वस्तुएँ ही पर्याप्त हैं। कैकेयी निर्लज्ज होकर सभा में चीर-वस्त्र निकालती है और उन्हें पहनने की आज्ञा देती है; राम और लक्ष्मण अपने उत्तम वस्त्र उतारकर मुनिवेष धारण कर लेते हैं। सीता रेशमी वस्त्रों में ही रहती हैं; चीर देखकर संकोच करती हैं। कैकेयी उन्हें कुश-तंतु के वस्त्र देती है; सीता आँसू और लज्जा के साथ पहनने का प्रयास करती हैं, पर अनभ्यस्त होने से पूछती हैं कि वनवासी ऋषि ऐसे वस्त्र कैसे धारण करते हैं। तब श्रीराम स्वयं उनके रेशम के ऊपर चीर बाँध देते हैं; यह देखकर अन्तःपुर की स्त्रियाँ विलाप करती हैं और प्रार्थना करती हैं कि सीता को वन-कष्ट के लिए बाध्य न किया जाए। इसी बीच वसिष्ठ आकर कैकेयी को मर्यादा-भंग और छल के लिए फटकारते हैं। वे कहते हैं कि सीता का जाना आवश्यक नहीं; वे तो राम के सिंहासन पर बैठने योग्य हैं। वे चेतावनी देते हैं कि यदि सीता को बलपूर्वक भेजा गया, तो नगर और राज्य राम के साथ चल देंगे और कैकेयी को रिक्त भूमि पर शासन करना पड़ेगा। गुरु के इस उपदेश के बाद भी सीता अडिग रहती हैं—प्रिय पति की सेवा और सहधर्म-पालन के लिए स्वेच्छा से तपस्विनी जीवन स्वीकार करती हैं; यही सर्ग का धर्म-संदेश है।
अयोध्याकाण्डे अष्टत्रिंशः सर्गः — Sita in Bark Garments; Public Outcry and Dasaratha’s Lament
इस सर्ग में वनवास का क्षण जन-साक्षी और पिता के पतन के साथ उभरता है। अयोध्यावासी जब देखते हैं कि पति द्वारा ‘रक्षित’ सीता भी वल्कल धारण कर रही हैं, तो वे दाशरथ के विरुद्ध करुण-क्रोध से पुकार उठते हैं; राजमहल का निजी निर्णय लोक-धर्म की कसौटी पर सार्वजनिक निन्दा बन जाता है। इस कोलाहल से दशरथ का मन डगमगा जाता है और जीवन तथा धर्म में उनका भरोसा टूटने लगता है। तब दशरथ कैकेयी से धर्मयुक्त तर्क करते हैं—जनकनन्दिनी सीता निरपराध हैं, उन्होंने किसी का अपकार नहीं किया; उन्हें तपस्विनी का वेष देना अनुचित है। यदि वे राम के साथ जाना चाहें तो आभूषणों और आवश्यक वस्तुओं सहित जाएँ—यह उनकी मूल प्रतिज्ञा से भिन्न, वर्तमान क्रूरता है। वे पूछते हैं कि सीता का अपराध क्या है, और राम के वनवास के आगे और ‘घोर पाप’ न बढ़ाने की भर्त्सना करते हैं; शोक का अंत न पाकर वे भूमि पर गिर पड़ते हैं। राम प्रस्थान के लिए उद्यत होकर लौटकर पिता को उपदेश देते हैं—वृद्धा, यशस्विनी कौसल्या, जो राजा को दोष नहीं देतीं, उनका सम्मान और संरक्षण करें, ताकि वे वियोग सहकर जीवित रह सकें और पुत्र-शोक से न जलें। इस प्रकार अध्याय में लोक-नीति, राजधर्म (प्रतिज्ञा बनाम करुणा) और पुत्रधर्म (परित्यक्ता की देखभाल) का संगम दिखता है।
एकोनचत्वारिंशः सर्गः — Dasaratha’s Lament, Sumantra’s Commission, and Sita’s Vow of Marital Dharma
राम के तपस्वी-वेष धारण करते ही महल और राज्य-व्यवस्था में जो तात्कालिक परिवर्तन हुआ, उसका वर्णन है। दशरथ और रानियाँ शोक से मूर्छित हो गिर पड़ते हैं; राजा दुःख से अभिभूत होकर न राम की ओर देख पाते हैं, न उत्तर दे पाते हैं। कुछ संभलकर वे कर्म-फल की कठोरता का विलाप करते हैं और कैकेयी की युक्ति से उत्पन्न पीड़ा को धिक्कारते हैं। फिर सुमंत्र को आज्ञा देते हैं कि उत्तम घोड़ों से युक्त रथ तैयार कर राम को नगर-सीमा के बाहर तक पहुँचा दे। इसके बाद राज-प्रक्रिया चलती है। राजा कोषाध्यक्ष को बुलाकर सीता के वनवास-काल के लिए आवश्यक धन-सामग्री देने का आदेश देते हैं; आभूषण और वस्त्र लाए जाते हैं। सीता दिव्य अलंकारों से दीप्त होकर प्रातःकाल की प्रभा की भाँति महल को प्रकाशमान करती हैं। कौसल्या और सीता के बीच धर्म-संवाद होता है। कौसल्या पतिव्रता-धर्म का उपदेश देकर कहती हैं कि विपत्ति में पति का त्याग नहीं करना चाहिए; सीता हाथ जोड़कर चंचल-आचरण से अपनी तुलना अस्वीकार करती हैं और दृढ़ता से कहती हैं कि पति ही स्त्री का दैवत है। तब राम कौसल्या को सांत्वना देते हुए चौदह वर्ष की निश्चित अवधि स्मरण कराते हैं और अनजाने में कठोर वचन हो गए हों तो सभी रानियों से क्षमा माँगते हैं। जहाँ पहले वाद्यों का मंगल-नाद था, वहाँ अब सामूहिक करुण-क्रंदन भर जाता है; अयोध्या अभिषेक-आशा से शोक-समारोह की अवस्था में प्रवेश करती है।
प्रयाणवर्णनम् (Departure from Ayodhya; Civic Lament and the Chariot’s Urgency)
इस सर्ग में राम, सीता और लक्ष्मण के अयोध्या-प्रस्थान की विधिपूर्वक और करुण प्रक्रिया वर्णित है। तीनों हाथ जोड़कर राजा दशरथ के चरण स्पर्श करते हैं, उनकी प्रदक्षिणा कर शोकाकुल पिता से विदा लेते हैं। फिर राम कौसल्या को प्रणाम करते हैं; लक्ष्मण भी कौसल्या तथा अपनी माता सुमित्रा को वंदन करते हैं। सुमित्रा लक्ष्मण को धर्मोपदेश देती हैं—वनवास को राजधर्म की निरंतरता मानो; राम को पिता (दशरथ) के समान, सीता को माता के समान और वन को अयोध्या के समान समझकर सेवा करना। सुमंत्र विनयपूर्वक राम से रथ पर आरूढ़ होने का निवेदन करते हैं और चौदह वर्षों की अवधि का गणना-क्रम आरंभ हो चुका है, यह स्मरण कराते हैं। दशरथ वस्त्र, आभूषण तथा शस्त्र-कवच आदि रथ में रखवाते हैं। रथ चल पड़ते ही अयोध्या की प्रजा उमड़कर पीछे दौड़ती है, रथ के किनारों से लिपटकर धीरे चलने की प्रार्थना करती है ताकि राम-मुख का दर्शन बना रहे। घंटियों, घोड़ों और हाथियों का कोलाहल नगर के सामूहिक शोक का स्वर बन जाता है। दशरथ राहु से ग्रस्त पूर्णचंद्र के समान मन से ढँक जाते हैं और मूर्छित-से गिर पड़ते हैं; लोग विलाप करते हैं और कौसल्या भी रथ के पीछे दौड़ती हैं। माता-पिता का दुःख न सह पाने से राम बार-बार पीछे देखते हैं, फिर भी सारथी को शीघ्र चलने की आज्ञा देते हैं। ‘ठहरो’—राजा की पुकार और ‘चलो’—राम की आज्ञा के बीच सुमंत्र राम की बात मानते हैं; बाद में उलाहना मिलने पर कहते हैं कि उन्होंने नहीं सुना, क्योंकि पीड़ा को बढ़ाना अधर्म-सा माना गया है। अंत में मंत्री राजा को समझाते हैं कि जिन्हें लौटाना चाहते हों, उनके पीछे बहुत दूर तक न जाएँ; दशरथ पसीने और शोक से व्याकुल होकर पुत्र की ओर टकटकी लगाए खड़े रह जाते हैं।
अयोध्यायाः शोकप्रकम्पः (Ayodhya’s Tremor of Grief and Omens)
इस सर्ग में राम के प्रस्थान का तत्काल प्रभाव अयोध्या और समस्त जगत् पर पड़ता दिखाया गया है। राम हाथ जोड़कर निकलते हैं; अंतःपुर से करुण क्रंदन उठता है। उसे सुनकर विरह से दग्ध दशरथ और भी गहरे शोक में डूब जाते हैं। शोक महल की सीमा से बाहर फैलकर नगर-जीवन को ठप कर देता है—अग्निहोत्र नहीं जलते, रसोई का काम रुक जाता है, नित्य कर्म और राजकीय-गृहस्थी के कार्य शिथिल पड़ जाते हैं। पशु-पक्षी भी व्याकुल हैं—हाथी आहार छोड़ देते हैं, गायें दूध नहीं देतीं; परिवारों के बंधन ढीले पड़ते हैं और सबका मन केवल राम में अटक जाता है। फिर घोर अपशकुनों का वर्णन आता है—नक्षत्रों की कान्ति क्षीण होती है, ग्रह म्लान पड़ते हैं, विशाखा धूम से ढकी-सी दिखती है, चन्द्रमा के पास उग्र ग्रह एकत्र होते हैं और दिशाएँ अंधकार से घिर जाती हैं। राम जैसे धर्मरक्षक के अभाव में अयोध्या इन्द्र-विहीन पृथ्वी की भाँति ‘काँपती’ प्रतीत होती है—व्यक्तिगत शोक से उठकर यह सर्ग धर्म-व्यवस्था के विघटन का ब्रह्माण्डीय संकेत बन जाता है।
द्विचत्वारिंशः सर्गः — दशरथस्य शोक-विलापः तथा कौशल्यागृह-प्रवेशः (Dasaratha’s Lament and Return to Kausalya’s Apartments)
राम के प्रस्थान के तुरंत बाद दशरथ रथ की ओर टकटकी लगाए रहते हैं। जब तक उड़ती धूल दिखाई देती है, उनकी दृष्टि हटती नहीं; धूल भी ओझल होते ही वे शोक से व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़ते हैं। कौसल्या धूल से ढँके राजा को उठाकर महल की ओर ले जाती हैं। पश्चात्ताप से उनका हृदय और जल उठता है—मानो ब्राह्मण-हत्या का दोष लगा हो या अग्नि का स्पर्श हो गया हो; उनका मुख ग्रहण लगे सूर्य की भाँति निस्तेज हो जाता है। वे विलाप करते हैं कि अब केवल घोड़ों के खुरों के चिन्ह रह गए हैं, राम दिखाई नहीं देते। जो राम चंदन, शय्या और गद्दों के अभ्यस्त थे, उन्हें वे वृक्ष-मूल में लकड़ी या पत्थर को तकिया बनाकर सोते हुए कल्पित करते हैं; सीता के वन-अपरिचय और वन्य पशुओं के गर्जन से उनके भय का भी स्मरण करते हैं। इसी बीच वे कैकेयी का तीव्र तिरस्कार करते हैं—उसका स्पर्श अस्वीकार कर विवाह-बंधन तक तोड़ देने की बात कहते हैं और भरत के पिण्डदान के विषय में कटु वचन बोलते हैं। नागरिकों से घिरे वे अशुभ-सी निस्तब्ध अयोध्या में प्रवेश करते हैं और राम-सीता-लक्ष्मण से रिक्त राजभवन को देखते हैं। गला भर आने पर सेवकों से कहते हैं कि मुझे कौसल्या के पास ले चलो—वही अब एकमात्र आश्रय हैं। आधी रात की मृत्यु-सी नीरवता में वे स्वीकार करते हैं कि उनकी दृष्टि अब भी राम के पीछे ही जाती है, कौसल्या भी स्पष्ट नहीं दिखतीं; कौसल्या पास बैठी आहें भरती और विलाप करती हैं।
कौशल्याविलापः — Kausalya’s Lament and the Vision of Rama’s Return
अयोध्याकाण्ड के 43वें सर्ग में शोकाकुल कौशल्या शारीरिक‑मानसिक रूप से थके हुए दशरथ के पास विलाप करती हैं। वे कैकेयी के आचरण को सर्प के रूपक से देखती हैं—कुटिल चाल, छोड़ा हुआ विष और घर के भीतर ही शत्रु की उपस्थिति का भय—और इस प्रकार राजकीय अन्याय को नैतिक‑प्रतीकात्मक संकट के रूप में प्रकट करती हैं। फिर वे आरोप से आगे बढ़कर भविष्य की चिंता करती हैं—सुख‑सुविधा के अभ्यस्त राम, सीता और लक्ष्मण वन में प्रवेश करेंगे, राजसी भोगों से वंचित होकर फल‑मूल पर जीवित रहेंगे और कठिनाइयाँ सहेंगे। इसके बाद “कब…?” की आवृत्ति के साथ वे राम के लौटने का दृश्य रचती हैं—ध्वजों से सजी, हर्षित अयोध्या; राजपथ पर जनता द्वारा लाजाएँ बरसाना; और भाइयों का शस्त्रों व शुभ आभूषणों सहित नगर में प्रवेश। मातृहृदय की चरम आकांक्षा यह है कि राम बालक की तरह क्रीड़ा करते हुए लौटें—जो वर्तमान निराशा के विपरीत एक मधुर आशा है। अंत में वे कर्म के कारण स्वयं को दोष देती हैं—पूर्वजन्म में गाय‑बछड़ों के प्रति किए अपराध का स्मरण करती हैं—और कहती हैं कि अपने एकमात्र पुत्र के दर्शन बिना जीवन असह्य है। उनका शोक दावानल के समान है, जैसे ग्रीष्म का सूर्य पृथ्वी को झुलसा देता है।
सुमित्रोपदेशः — Sumitra’s Consolation to Kausalya
अयोध्याकाण्ड के 44वें सर्ग में, वनवास के लिए श्रीराम के प्रस्थान के बाद शोकाकुल कौसल्या को रानी सुमित्रा सांत्वना देती हैं। वे कहती हैं कि विलाप व्यर्थ है—राम धर्म में अडिग हैं, वे दशरथ की सत्यप्रतिज्ञा का पालन कर रहे हैं, और विवेकियों का सदाचार परलोक में भी फल देने वाला होता है। लक्ष्मण का श्रेष्ठ साथ और युद्ध-तत्परता, सीता का स्वेच्छा से कष्ट-सहभागी होना, तथा वायु, चन्द्र और सूर्य जैसे प्रकृति-तत्त्वों का भी राम की सेवा करना—इन आश्वासनों से वे कौसल्या का धैर्य बढ़ाती हैं। फिर सुमित्रा राम की अजेयता और उनके अधिकार को दृढ़ करती हैं—विश्वामित्र से प्राप्त दिव्यास्त्र, बाण-सीमा में शत्रुओं का विनाश, और निश्चित रूप से भविष्य में लौटकर राज्याभिषेक होना। वे बार-बार पुनर्मिलन का चित्र खींचती हैं—राम आकर माता के चरणों में प्रणाम करेंगे और शोक के आँसू आनंद में बदल जाएंगे। यह सुनकर कौसल्या का दुःख तुरंत शांत हो जाता है, जैसे पतला शरद्-मेघ छँट जाता है।
अयोध्यावासिजनानुरागः — The People and Brahmins Follow Rama toward Exile
अयोध्याकाण्ड के 45वें सर्ग में राम के वन-प्रस्थान पर नगर-जन और यज्ञ-समाज की प्रतिक्रिया वर्णित है। अयोध्यावासी अपार भक्ति से उनके रथ के पीछे-पीछे चलते रहते हैं; राजा-पक्ष और मित्र उन्हें बलपूर्वक लौटाने का प्रयत्न करते हैं, पर जन नहीं मानते। तब राम पिता-सदृश स्नेह से उन्हें समझाते हैं कि भरत में निष्ठा रखें, राजाज्ञा का पालन करें और धर्म के लिए नगर की स्थिरता बनाए रखें; किंतु राम की अडिग धर्मनिष्ठा ही प्रजा के हृदय में उनके राज्याभिषेक की आकांक्षा को और तीव्र कर देती है। दूर से वृद्ध ब्राह्मण—ज्ञान, आयु और तप-तेज में वरिष्ठ—विलाप करते हैं और घोड़ों से भी विनती करते हैं कि वे लौट चलें; उनका तर्क है कि शुद्ध संकल्प वाले स्वामी को नगर की ओर ले जाना चाहिए, वन की ओर नहीं। करुणा से द्रवित होकर राम रथ से उतरते हैं और सीता-लक्ष्मण सहित पैदल चलने लगते हैं, ताकि ब्राह्मण पीछे न रह जाएँ। ब्राह्मण कहते हैं कि समस्त ब्राह्मण-वर्ग कंधों पर अग्नि धारण किए उनके साथ चला आ रहा है; वाजपेय से प्राप्त छत्रों से वे छाया देते हैं और अपना निश्चय अटल बताते हैं—यदि राम ही धर्म से हटें तो धर्ममार्ग का क्या शेष रहेगा? वे अपूर्ण यज्ञों, समस्त प्राणियों की भक्ति, यहाँ तक कि वृक्ष-पक्षियों के अनुराग का स्मरण कराकर राम से लौट आने की प्रार्थना करते हैं। तामसा नदी मानो प्रतीक रूप से उन्हें रोकती दिखाई देती है; उसके तट पर सुमंत्र घोड़ों की सेवा करता है, और नगर तथा वन के बीच एक सीमांत-सा विराम अंकित होता है।
तमसातीरवासः — Night on the Bank of the Tamasa and the Stratagem to Elude the Citizens
अयोध्याकाण्ड के 46वें सर्ग में वनवास की पहली रात्रि का चित्रण अनुशासन और सूझ-बूझ से भरे संक्रमण के रूप में होता है। श्रीराम तमसा नदी के रमणीय तट पर ठहरते हैं, लक्ष्मण को शांत भाव से निर्देश देते हैं और वन में उपलब्ध फल-मूल होते हुए भी केवल जलाहार स्वीकार कर स्वेच्छा से तपोवृत्ति का संकेत करते हैं। सुमंत्र घोड़ों की सेवा करता है, संध्योपासना करता है और नदी-तट पर पत्तों की शय्या बनाता है; राम सीता और लक्ष्मण के साथ विश्राम करते हैं, जबकि लक्ष्मण प्रभात तक जागरण कर सुमंत्र से राम के गुणों का वर्णन करता रहता है। प्रातःकाल राम वृक्षों के नीचे सोए हुए नागरिकों को देखकर उनकी भक्ति को आत्म-पीड़ाकारी संकल्प मानते हैं और राजधर्म का सिद्धान्त कहते हैं—प्रजा को दुःख से मुक्त करना चाहिए, राजकुमार की विपत्ति से उन्हें बोझिल नहीं करना चाहिए। इसलिए वे सबके सोते रहते गुप्त प्रस्थान का उपाय बताते हैं। पीछा रोकने हेतु राम सुमंत्र को युक्ति देते हैं कि रथ को पहले कुछ दूर उत्तर दिशा में ले जाकर फिर घुमाकर मार्ग बदल दे, जिससे पौर भ्रमित हो जाएँ। तत्पश्चात वे युक्त रथ पर आरूढ़ होकर तीव्र प्रवाह और भँवरों वाली तमसा को पार करते हैं और ‘काँटों से रहित’ शुभ राजपथ पकड़कर तपोवन की ओर बढ़ते हैं—वनवास को धर्म-निश्चय और सुव्यवस्थित कर्म दोनों रूपों में प्रकट करते हुए।
अयोध्यायाः पौरविलापः (Lament of the Citizens of Ayodhya on Rama’s Absence)
भोर होते ही अयोध्या के नागरिकों को ज्ञात होता है कि श्रीराम अब दिखाई नहीं दे रहे। वे मानसिक रूप से स्तब्ध हो जाते हैं; शोक ऐसा छा जाता है मानो उनकी कर्मशक्ति और पहचान-बोध ही लुप्त हो गया हो। वे इधर-उधर राम के किसी चिह्न की खोज करते हैं, चेतना को मंद कर देने वाली निद्रा की निंदा करते हैं और सामूहिक विलाप करते हैं—राम पिता-तुल्य रक्षक हैं; उनके बिना जीवन निरर्थक है। विलाप बढ़ते-बढ़ते अत्यन्त सीमा तक पहुँचता है—वे मृत्यु या आत्मदाह तक का विचार करते हैं, क्योंकि नगर के धर्म-केन्द्र से वियोग उन्हें अस्तित्व का संकट लगता है। रथ के चिह्नों का अनुसरण करते हुए वे कुछ दूर जाते हैं, पर मार्ग खो बैठते हैं; रथमार्ग का लुप्त हो जाना मानो भाग्य के अवरोध का ठोस प्रतीक बन जाता है। थककर वे लौटते हैं और अयोध्या में प्रवेश करते हैं; सम्पन्न घरों में भी कठिनाई से कदम रखते हैं और शोक के कारण अपने ही स्वजनों को पहचान नहीं पाते। अंत में उपमाओं की परतें आती हैं—रामविहीन अयोध्या गरुड़ द्वारा सर्परहित की गई नदी, चन्द्रहीन आकाश और जलहीन समुद्र के समान प्रतीत होती है; राजनीतिक रिक्तता को मानो ब्रह्माण्डीय अभाव के रूप में दिखाया गया है।
अयोध्यायाः शोकवर्णनम् (Ayodhya’s Lament and Civic Desolation)
इस सर्ग में राम के पीछे-पीछे जाकर लौटे अयोध्यावासियों का सामूहिक शोक चित्रित है। वे आँसुओं से अंधे, मानो प्राण निकल रहे हों, मृत्यु की कामना करते से प्रतीत होते हैं। घर-घर रुदन है; स्त्रियाँ तीखे वचनों से अपने पतियों को धिक्कारती हैं; व्यापार, भोजन-प्रसंग, उत्सव और यहाँ तक कि संतान-जन्म का हर्ष भी अर्थहीन हो जाता है। इसी बीच राम के साथ जाने वालों—सीता सहित लक्ष्मण—की महिमा उभरती है और प्रकृति को भी आतिथ्यशील राज्य के रूप में देखा गया है: वन, नदियाँ, पर्वत, पुष्पित वृक्ष और झरने राम का प्रिय अतिथि की भाँति सत्कार करेंगे, अकाल में भी पुष्प और निर्मल जल अर्पित करेंगे। स्त्रियाँ सीता की सेवा और पुरुष राम की सेवा का विभाजन सुझाकर वनवास को भी चलती-फिरती सेवा-समुदाय की तरह मानती हैं। फिर स्वर राजनीतिक हो उठता है—नागरिक कैकेयी के अधर्मपूर्ण निर्णय की निंदा करते हैं, नेतृत्वहीन राज्य के विनाश की आशंका जताते हैं और दशरथ के निधन तथा उसके बाद के विलाप का अनुमान करते हैं। राम के गुणों का संक्षिप्त स्तवन किया गया है। संध्या होते ही यज्ञाग्नि और वेद-पाठ रुक जाते हैं, बाजार बंद हो जाते हैं; अयोध्या नक्षत्रहीन, अंधकारमय और क्षीण जल वाले समुद्र-सी लगती है—मानो धर्म का तेज घट गया हो।
एकोनपञ्चाशः सर्गः (Sarga 49): Rāma’s Night Journey Beyond Kosala and the Charioteer Address
इस सर्ग में रात्रि के अंतिम प्रहर में राम का तीव्र गमन वर्णित है। वे दशरथ की आज्ञा का स्मरण करते हुए वनवास को केवल निर्वासन नहीं, बल्कि स्वयं धारण किया हुआ धर्म-व्रत मानते हैं। प्रभात में शुभ प्रातः-संध्या का पूजन कर वे कोसल की सीमा तक पहुँचते और उसे पार करते हैं; मार्ग में वे ग्रामवासियों की बातें सुनते हैं, जो दशरथ के कामवश निर्णय और कैकेयी के मर्यादा-भंग की निंदा करते हैं—यह जनवाणी राजकुल के आचरण का बाह्य नैतिक लेखा-जोखा बन जाती है। इसके बाद यात्रा का क्रम आता है। राम पवित्र वेदाश्रुति नदी को पार कर दक्षिण दिशा में, अगस्त्य-सम्बद्ध पथ की ओर बढ़ते हैं; दीर्घ यात्रा के बाद शीतल जल वाली गोमती (दलदली तटों पर चरते गौ-धन सहित) को, फिर मयूरों और हंसों के निनाद से गूँजती स्यन्दिका को भी पार करते हैं। राम सीता को वे विस्तृत प्रदेश दिखाते हैं जिन्हें परम्परा में मनु द्वारा इक्ष्वाकु को प्रदत्त कहा गया है, जिससे राज-भूगोल वंश-स्मृति से जुड़ जाता है। वे बार-बार सारथी को “सूत” कहकर हंस-मत्त स्वर में मधुर वचन बोलते हैं, सरयू के पुष्पित उपवनों में लौटने की अभिलाषा प्रकट करते हैं और राजर्षियों के लिए मृगया-विहार को सुखद मानते हुए भी उसे अपनी प्रधान इच्छा नहीं बताते—क्षात्र-परम्परा और आत्मसंयम का संतुलन दिखाते हैं।
गङ्गादर्शनम् तथा गुहसमागमः (Vision of the Gaṅgā and Meeting with Guha)
अयोध्याकाण्ड के पचासवें सर्ग में राम समृद्ध कोसल-प्रदेश को पार कर अयोध्या की ओर मुख करके नगर और उसकी रक्षक देवताओं से विधिवत् विदा लेते हैं। जनता उन्हें जाते देख शोकाकुल होकर दूर तक साथ चलती है; जब राम दृष्टि से ओझल हो जाते हैं, तब नगरवासी विलाप करते हैं। इसके बाद कोसल की शुभता का अलंकारिक वर्णन आता है—यूप, चैत्य आदि धर्मचिह्न, खेतों की भरपूर उपज, निर्भय नागरिक जीवन और वेदपाठ की ध्वनि; इससे सुशासन को संस्कृति-समृद्धि की आधारभूमि के रूप में दिखाया गया है। फिर राम गङ्गा का दर्शन करते हैं—फेन को मुस्कान, जलधारा को केश-लटाओं के समान बताने वाले उपमानों के साथ, विष्णुपाद से उद्गम, शिव की जटाओं में धारण और भागीरथ के तप का स्मरण कर उसकी पवित्रता और सीमा-रेखा (लिमिनैलिटी) का भाव उभरता है। शृङ्गिबेरपुर पहुँचकर राम इङ्गुदी वृक्ष के पास रात्रि-विश्राम का निश्चय करते हैं। निषादराज गुह स्नेहपूर्वक आकर आतिथ्य करता है और अपना राज्य तक अर्पित करता है; राम तपस्वी-धर्म के अनुरूप उपहार स्वीकार नहीं करते, केवल दशरथ के घोड़ों के लिए चारा और पानी माँगते हैं। रात भर गुह पहरा देता रहता है—मैत्री, संयम और वन-सीमा पर रक्षक-कर्तव्य का आदर्श प्रकट होता है।
अयोध्याकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः — Guha’s Vigil and Lakṣmaṇa’s Lament (Night on the riverbank)
अयोध्याकाण्ड के इक्यावनवें सर्ग में वनवास-शिविर की रात्रि का चित्र है, जहाँ सुरक्षा और शोक साथ-साथ चलते हैं। राम की रक्षा में जागते लक्ष्मण को देखकर निषादराज गुह द्रवित होता है; वह सुसज्जित शय्या देने और अपने बंधुओं सहित शस्त्रधारी होकर रात भर पहरा देने का व्रत करता है, और मित्रता (सौहृद) को धर्म-कर्तव्य मानता है। पर लक्ष्मण किसी आराम को स्वीकार नहीं करते—वे कहते हैं कि राम से बढ़कर उन्हें कोई प्रिय नहीं; जब राम सीता के साथ कुश पर शयन कर रहे हों, तब उनके लिए नींद और सांसारिक सुख असंभव हैं। फिर लक्ष्मण का विलाप राजधर्म और नीति की चिंता में बदल जाता है। वे आशंका करते हैं कि अभिषेक की अभिलाषा अधूरी रह जाने से दशरथ प्राण त्याग देंगे, कौसल्या टूट जाएँगी, और शोक व थकान से अयोध्या का नगर-नाद भी मौन हो जाएगा। बीच-बीच में वे अयोध्या की पूर्ववर्ती समृद्धि और उत्सव-भरी व्यवस्था का स्मरण करते हैं, जिससे आने वाले वियोग का दुःख और तीव्र हो उठता है। रात्रि लक्ष्मण के शोक में ही बीतती है; जनहित के लिए कही गई उनकी सत्य बात सुनकर गुह भी साझा पीड़ा से रो पड़ता है—मित्रता यहाँ सामूहिक करुणा और धर्म-संहति का माध्यम बन जाती है।
गङ्गातरणम्, सुमन्त्र-प्रतिनिवर्तनम्, जटाधारणम् (Crossing the Gaṅgā; Sumantra’s Return; Adoption of Ascetic Signs)
प्रातःकाल श्रीराम गंगा-तट की ओर प्रस्थान करते हैं और लक्ष्मण, सीता तथा सेवकों को विधिवत् निर्देश देकर यात्रा-क्रम स्पष्ट करते हैं। वे सुमंत्र को करुणा के साथ दृढ़ता से विदा करते हुए कहते हैं कि दशरथ की सेवा में कोई प्रमाद न हो, भरत को शीघ्र बुलाया जाए, सभी रानियों के प्रति समभाव रखा जाए और विशेषतः कौसल्या का आदर-सत्कार किया जाए। सुमंत्र शोक से व्याकुल होकर खाली रथ के साथ अयोध्या के दुःख की कल्पना करता है और वनवासियों के साथ चलने की अनुमति माँगता है; वह आत्मदाह तक की बात कह बैठता है। राम राजधर्मयुक्त तर्क से उसे रोकते हैं और बताते हैं कि कैकेयी को निर्वासन का सत्य विश्वास हो—इसलिए सुमंत्र का लौटना आवश्यक है। गुह नाव उपलब्ध कराता है। राम वन-आश्रम के अनुरूप जीवन की कामना करते हुए वट-वृक्ष के दूध से जटा धारण करते हैं; लक्ष्मण भी वैसा ही करते हैं। वे वेगवती गंगा पार करते हैं; सीता नदी से व्रत-प्रार्थना करती हैं कि कुशल लौटने पर मैं तुम्हारा पूजन करूँगी। दक्षिण तट पर पहुँचकर राम सुरक्षा-क्रम स्थापित करते हैं—आगे लक्ष्मण, बीच में सीता, पीछे राम—जिससे वन-यात्रा की अनुशासित नीति और परस्पर रक्षण का धर्म प्रकट होता है।
पञ्चाशत्तमः सर्गः (Sarga 53) — Rāma’s Lament, Vigil for Sītā, and Lakṣmaṇa’s Consolation
इस सर्ग में निर्वासित जीवन की पहली रात्रि का चित्रण है। निवास-स्थान से दूर एक वृक्ष के पास पहुँचकर श्रीराम पश्चिम संध्या-वन्दन करते हैं और सीता के योगक्षेम को ध्यान में रखकर लक्ष्मण को रात्रि-जागरण का आदेश देते हैं। राजसुख के योग्य होते हुए भी वे भूमि पर शयन करते हैं और अयोध्या का स्मरण कर दशरथ के दुःख, कैकेयी की कामना तथा भविष्य में भरत के एकाधिपत्य की सम्भावना पर विचार करते हैं। राम राजधर्म का उपदेश देते हैं कि जब काम अर्थ और धर्म पर हावी हो जाता है, तब राजा शीघ्र पतन को प्राप्त होता है; धर्म छोड़कर भोग में आसक्त नरेश दशरथ की भाँति विनाश देखता है। फिर वे कौसल्या और सुमित्रा की चिंता से व्याकुल होकर लक्ष्मण से माताओं की रक्षा हेतु लौटने का प्रस्ताव रखते हैं और कौसल्या के लिए फल-प्राप्ति के समय शोक का कारण बनने पर आत्मग्लानि करते हैं। अन्त में संयम-नीति प्रकट करते हुए वे कहते हैं कि वे बाणों से अयोध्या और पृथ्वी को भी वश में कर सकते हैं, पर निरर्थक बल-प्रदर्शन नहीं करेंगे; अधर्म के भय और परलोक-चिन्ता से वे राज्याभिषेक भी नहीं चाहते। आँसुओं के साथ राम मौन हो जाते हैं; तब लक्ष्मण भक्ति और धैर्य से कहता है कि राम के बिना अयोध्या चन्द्रहीन रात्रि के समान है और वह तथा सीता राम से अलग नहीं रह सकते। फिर तीनों वटवृक्ष (न्यग्रोध) के नीचे बिछी शय्या पर विश्राम करते हैं; लक्ष्मण वन-धर्म के अनुसार पूर्ण वनवास में साथ रहने का निश्चय करता है, और दोनों भाई निर्जन वन में सिंहों की भाँति निर्भय रहते हैं।
भरद्वाजाश्रमप्राप्तिः — Arrival at Bharadvāja’s Hermitage and Counsel toward Citrakūṭa
सर्ग 54 में प्रयाग के गङ्गा-यमुना संगम-प्रदेश में यात्रा से आश्रम-संवाद की ओर कथा का प्रवाह आता है। एक विशाल वृक्ष के नीचे शुभ रात्रि बिताकर राम, सीता और लक्ष्मण घने वन को पार करते हुए संगम की ओर बढ़ते हैं और अनजाने, मनोहर प्रदेशों को देखते हैं। यज्ञधूम देखकर वे निकट किसी तपोवन का अनुमान करते हैं और संध्या तक भरद्वाज मुनि के आश्रम पहुँचते हैं। वे पहले दूर से विनयपूर्वक ठहरते हैं, फिर भीतर जाकर अग्निहोत्र-निष्ठ, संयमी और दिव्यदर्शी ऋषि को प्रणाम करते हैं। राम अपना परिचय देकर सीता-लक्ष्मण का भी परिचय कराते हैं और पिता की आज्ञा से प्राप्त वनवास का कारण बताते हैं। वे धर्मानुसार मूल-फल पर निर्वाह करते हुए वन में रहने की इच्छा प्रकट करते हैं। भरद्वाज अतिथि-धर्म निभाते हुए अर्घ्य, पाद्य, जल, अन्न-प्रबंध और निवास की व्यवस्था कर स्वागत करते हैं; शिष्यों, तपस्वियों और वन्य प्राणियों के बीच आश्रम का पवित्र वातावरण चित्रित होता है। संवाद में भरद्वाज संगम के निकट ही सुखपूर्वक निवास का सुझाव देते हैं, पर राम निकटवर्ती बस्तियों से लोगों के आने-जाने की आशंका और सीता के एकांत-सुख के लिए अधिक निर्जन स्थान माँगते हैं। तब ऋषि दस कोस दूर स्थित प्रसिद्ध चित्रकूट पर्वत का निर्देश करते हैं—उसकी पवित्रता, प्राकृतिक समृद्धि और मन को उन्नत करने वाले दर्शन की प्रशंसा करते हुए। वे प्रभात में प्रस्थान की अनुमति देते हैं और चित्रकूट को ही उनके लिए उपयुक्त वन-आवास बताते हैं।
चित्रकूटमार्गोपदेशः — Instructions for the Chitrakuta Route and the Yamuna Crossing
भरद्वाज के आश्रम में रात्रि बिताकर प्रातः राम-लक्ष्मण और सीता ने मुनि को प्रणाम किया। भरद्वाज ने चित्रकूट जाने का स्पष्ट मार्ग बताया—गंगा-यमुना के संगम तक पहुँचना, पश्चिम की ओर बहती कालिंदी (यमुना) के किनारे-किनारे चलना, एक प्राचीन घाट/तीर्थ पर पहुँचकर लकड़ियों का बेड़ा बनाना और उसे पार करना। उन्होंने सिद्धों से संबद्ध एक विशाल वटवृक्ष भी दिखाया और वहाँ सीता को मंगल-प्रार्थना करने का विधान बताया। इसके बाद दोनों भाइयों ने लकड़ियों को बाँधकर, बाँस बिछाकर और उशीर से ढँककर बड़ा बेड़ा बनाया; लक्ष्मण ने सीता के लिए आरामदायक आसन सजाया। राम ने लज्जित सीता को सहारा देकर बेड़े पर बैठाया और वस्त्र, आभूषण, उपकरण तथा शस्त्र भी रखे। धारा के बीच सीता ने नदी को नमस्कार कर सुरक्षित लौटने पर पूजन का संकल्प किया; फिर वे दक्षिण तट पर उतर आए। तट पर सीता ने वटवृक्ष की प्रदक्षिणा कर राम के व्रत की सिद्धि तथा कौशल्या-सुमित्रा से पुनर्मिलन की प्रार्थना की। आगे राम ने लक्ष्मण से कहा कि सीता को आगे लेकर चलो, मैं शस्त्र सहित पीछे रहूँगा, और उसके वनस्पति-संबंधी कौतूहल को भी संतुष्ट करना। यमुना की शोभा देखकर सीता आनंदित हुई; दोनों भाइयों ने वन्य फल-मूल जुटाए और नदी के पास रहने योग्य स्थान चुन लिया।
चित्रकूटगमनम् तथा पर्णशालाप्रवेशः (Arrival at Chitrakuta and Establishing the Leaf-Hut)
रात्रि बीतने पर श्रीराम कोमलता से लक्ष्मण को जगाकर वन के शुभ नादों के बीच प्रस्थान का संकेत देते हैं। फिर वे मुनि (भारद्वाज) द्वारा बताए मार्ग से चित्रकूट की ओर चलते हैं। मार्ग में राम सीता को ऋतु की शोभा और वन की समृद्धि दिखाते हैं—फूलों से लदे वृक्ष, मधुमक्खियों के छत्ते, पक्षी और हाथी—और बताते हैं कि यह वन आश्रय भी है और संयमित तपोभूमि भी। चित्रकूट पहुँचकर राम उसे निवास के योग्य मानते हैं, क्योंकि वहाँ जल, मूल-फल की प्रचुरता है और महर्षियों का निवास भी। वे वाल्मीकि के आश्रम में जाकर प्रणाम करते हैं; ऋषि उनका सत्कार कर आसन देते हैं। इसके बाद राम लक्ष्मण को दृढ़ पर्णशाला बनाने की आज्ञा देते हैं। पर्णशाला बन जाने पर वे वास्तु-शमन की विधि करते हैं—मृगमांस का नैवेद्य, मंत्र-जप, स्नान, तथा विश्वदेव, रुद्र और विष्णु आदि को बलि-समर्पण। वेदी और अग्निस्थान स्थापित कर वन्य उपहारों से वन-देवताओं व भूतगणों का तर्पण करते हैं। अंत में तीनों साथ पर्णशाला में प्रवेश करते हैं, मानो देवगण सुधर्मा सभा में प्रवेश करें, और समृद्ध वन में शांत भाव से निवास करते हैं।
सप्तपञ्चाशः सर्गः — Sumantra’s Return to Ayodhya and the Palace’s Lament
इस सर्ग में गंगा-तट पर श्रीराम से विदा पाकर सुमंत्र की दृष्टि से कथा फिर अयोध्या में प्रवेश करती है। राम के दक्षिण तट पर पहुँच जाने तक गुह सुमंत्र के साथ चलता और बातें करता है, फिर शोकाकुल होकर अपने घर लौट जाता है। सुमंत्र वन, नदियाँ, सरोवर, गाँव और नगर देखते हुए वेग से चलता है और तीसरे दिन संध्या समय अयोध्या पहुँचकर उसे निस्तब्ध और उदास पाता है। नगरवासी उमड़कर पूछते हैं—“राम कहाँ हैं?” वे विलाप करते हैं कि अब धर्मात्मा राजकुमार को यज्ञों, विवाहों, सभाओं और दान-समारोहों में नहीं देख पाएँगे, और उसके पिता-समान प्रजापालन को स्मरण करते हैं। राजमहल में प्रवेश करते ही आँगनों की भीड़ और भवनों में स्त्रियों का अश्रुपूरित नेत्रों से क्रंदन सुनाई देता है; दशरथ की रानियाँ आपस में कौसल्या से यह समाचार कहने की कठिनता की चर्चा करती हैं। अंततः सुमंत्र राजा से मिलता है और श्रीराम का संदेश शब्दशः सुनाता है। शोक से अभिभूत दशरथ मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं; अंतःपुर में हाहाकार मच जाता है। सुमित्रा के सहारे कौसल्या राजा को उठाती है, कैकेयी के अनुपस्थित होने पर उन्हें निर्भय होकर दूत से पूछने को कहती है, और स्वयं भी शोक से गिर पड़ती है—जिससे समूची अयोध्या में फिर से शोक का ज्वार उठता है।
अष्टपञ्चाशः सर्गः (Sarga 58) — Daśaratha Questions Sumantra; Messages from the Forest Threshold
होश में आते ही राजा दशरथ सुमंत्र को बुलाकर राम का यथार्थ समाचार पूछते हैं। वे बार‑बार यह जानना चाहते हैं कि राम कहाँ बैठे, कहाँ सोए और क्या खाया—वियोग के शोक में ठोस विवरण ही मानो पुत्र‑सन्निधि का स्थान ले लेता है। सुमंत्र हाथ जोड़कर आता है और दशरथ को वृद्ध, धूलि‑धूसर, बार‑बार आह भरते हुए—नवगृहीत हाथी के समान—वर्णित करता है, जिससे राज्य की भी टूटन का दृश्य बनता है। सुमंत्र बताता है कि वन की सीमा पर राम ने धर्मपूर्वक संदेश दिए—अंतःपुर में सबको प्रणाम और कुशल‑प्रश्न पहुँचाए जाएँ, विशेषतः कौसल्या को। वे नित्यकर्म की नियमितता, दशरथ की देवतुल्य सेवा, सौतों के बीच विनय, और कैकेयी के साथ संबंधों की सावधानी से रक्षा करने की सीख देते हैं। भरत के विषय में भी राम राजधर्म बताते हैं—उन्हें राजा मानकर सम्मान देना, उनका कुशल बताना, सब माताओं का समान आदर करना और वृद्ध राजा की आज्ञा का पालन करना। इसके बाद लक्ष्मण का क्रोध और वनवास के प्रति नैतिक प्रतिवाद उभरता है; सीता पहले स्तब्ध रहती हैं, फिर सुमंत्र के विदा होते ही रो पड़ती हैं। सर्ग का अंत राम के हाथ जोड़े रोते हुए, लक्ष्मण के सहारे खड़े रहने और सीता के राजरथ को निहारने के करुण दृश्य से होता है—जहाँ व्यक्तिगत विरह और कर्तव्य‑धर्म एक साथ गुँथ जाते हैं।
एकोनषष्ठितमः सर्गः (Sarga 59): सुमन्त्रवाक्यं, अयोध्याविषादः, दाशरथिशोकसागरः
इस सर्ग में सुमंत्र राजा दशरथ को आगे का वृत्तांत सुनाते हैं। राम और लक्ष्मण तपस्वी-वेष में गंगा पार कर प्रयाग की ओर बढ़ गए; लक्ष्मण सदा राम की रक्षा में तत्पर रहे। सुमंत्र विवश होकर लौटे—घोड़े भी मानो मार्ग से मुंह मोड़ते, ‘गरम आँसू’ बहाते चले; वे गुह के साथ कुछ देर इस आशा में ठहरे कि शायद राम बुला लें, पर अंततः अयोध्या लौटना पड़ा। फिर शोक का व्यापक चित्र उभरता है—वृक्ष, नदियाँ, सरोवर, वन और उपवन तक सूखे-तप्त से लगते हैं, मानो राम-वियोग से राज्य और प्रकृति दोनों व्याकुल हों। राम के बिना अयोध्या में प्रवेश करते ही सुमंत्र देखते हैं कि कहीं अभिवादन नहीं, चारों ओर लंबी-लंबी आहें; महलों से स्त्रियों का रुदन, और मित्र-शत्रु-उदासीन सभी नागरिकों में एक-सा दुःख छाया है। दशरथ आँसुओं से भरे कंठ से स्वयं को धिक्कारते हैं—‘स्त्री के लिए’ बिना विचार और बिना मंत्रणा के मैंने उतावली में काम किया; वे कैकेयी की प्रेरणा और विधि की विनाशक गति को दोष देते हैं। वे सुमंत्र से विनती करते हैं कि मुझे राम (और सीता) के पास ले चलो, उनके दर्शन बिना मैं क्षण भर भी नहीं जी सकता। अंत में ‘शोक-सागर’ की उपमा आती है—कैकेयी वडवामुख, मंथरा के वचन मगरमच्छ, और आँसू फेन के समान; और दशरथ मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं, कौसल्या फिर भय से घिर जाती हैं।
षष्टितमः सर्गः — Kausalyā’s Lament and Sumantra’s Consolation (Sītā’s Fearless Forest-Life)
इस सर्ग में शोक से व्याकुल और काँपती हुई महारानी कौसल्या सारथि सुमंत्र से कहती हैं कि उन्हें तुरंत राम, सीता और लक्ष्मण के पास ले चलें; वे वियोग सह नहीं सकतीं और उनके बिना जीवित रहना असंभव है। सुमंत्र हाथ जोड़कर उन्हें धैर्य बँधाते हैं, निराशा त्यागने को कहते हैं और समझाते हैं कि राम का वनवास धर्मनिष्ठ धैर्य का व्रत है तथा लक्ष्मण की सेवा संयमित धर्म है जो पुण्य और कल्याण देने वाली है। फिर सुमंत्र सीता के आचरण का वर्णन कर कौसल्या को सांत्वना देते हैं। वे बताते हैं कि सीता तनिक भी उदास नहीं दिखीं; निर्जन वन में भी अपने घर-सी निश्चिंत, गाँवों, नदियों और वृक्षों के विषय में खेल-खेल में पूछती हुईं, और मन से केवल राम में स्थित—राम के बिना अयोध्या भी उन्हें वन के समान लगती। सुमंत्र सीता की अक्षय प्रभा की प्रशंसा करते हैं—यात्रा की कठिनाइयों में भी कमल और चंद्रमा-सी कान्ति, बिना आभूषण के भी उज्ज्वल चरण, और राम के संरक्षण में वन्य पशुओं के बीच भी निर्भय गमन। अंत में वे कहते हैं कि इस आचरण की कीर्ति चिरस्थायी होगी; पर उचित उपदेश के बाद भी कौसल्या का मातृशोक नहीं थमता और वे बार-बार अपने प्रिय पुत्र को पुकारती रहती हैं।
कौसल्याविलापः — Kausalya’s Lament and Ethical Analogies on Kingship
राम के वन जाने पर कौसल्या तीव्र शोक से व्याकुल होकर दशरथ से करुण वचन कहती हैं। वे राम-सीता-लक्ष्मण के वनवास की कठिनाइयों पर प्रश्न उठाती हैं—सीता की कोमलता और राजभोग की आदत, वन्य आहार, शीत-उष्ण, भयावह सिंहनाद आदि कष्ट, तथा लक्ष्मण की सेवा-निष्ठा। फिर वे दशरथ के निर्णय को ‘अकरुण कर्म’ कहकर धिक्कारती हैं और बताती हैं कि राम जैसे स्वजन सुख के अधिकारी हैं; साथ ही संकेत करती हैं कि भरत का राज्य त्यागना असंभव है। कौसल्या अनेक उपमान-न्यायों से समझाती हैं कि राम परभुक्त राज्य स्वीकार नहीं करेंगे—जैसे श्राद्ध में पहले अपने लोगों को खिलाकर बाद में श्रेष्ठ ब्राह्मण ढूँढ़ना, उत्तम ब्राह्मणों का ‘पश्चात्-भोजन’ न मानना, व्याघ्र का पराहृत भक्ष्य न लेना, यज्ञ-द्रव्य का पुनः उपयोग न होना, और ‘हृतसार-सुरा’ या ‘नष्टसोम-अध्वर’ की भाँति परभुक्त राज्य का त्याज्य होना। इससे वे राम के स्वाभिमान और धर्मनिष्ठा को प्रकट करती हैं—वे अपमान सह नहीं सकते, क्रुद्ध हों तो पर्वत भी विदीर्ण कर दें, पर पिता के गौरव से दशरथ पर हाथ उठाने का साहस नहीं करेंगे। अंत में स्त्रीधर्म का आश्रय-न्याय कहा जाता है—पति, पुत्र और ज्ञाति ही स्त्री के सहारे हैं; और कौसल्या अपने को परित्यक्त मानकर आत्मविनाश की भावना भी व्यक्त करती हैं।
अयोध्याकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः — Kausalyā consoles Daśaratha; grief, remorse, and nightfall
कौसल्या के क्रोध और शोक से भरे कठोर वचनों को सुनकर महाराज दशरथ अत्यन्त व्याकुल हो उठे। वे मूर्छित हो गए, फिर कुछ समय बाद गरम-गरम दीर्घ निश्वास लेते हुए होश में आए। राम-वियोग का दुःख उनके मन में और भी तीव्र हो गया और साथ ही उन्हें अपना पुराना पाप स्मरण हो आया—शब्द-वेधी बाण से अनजाने में एक तपस्वी के पुत्र का वध। इस प्रकार शोक और अपराध-बोध का दोहरा भार उन्हें दबाने लगा। काँपते हुए, दीन मुख से, हाथ जोड़कर उन्होंने कौसल्या से प्रार्थना की कि धर्मनिष्ठ स्त्रियों के लिए पति प्रत्यक्ष देवता के समान होता है; अतः जो पहले ही शोक से दबा है, उससे कटु वचन न कहो। यह सुनकर कौसल्या का क्रोध करुणा में बदल गया। वे फूट-फूटकर रोईं, सिर पर अंजलि रखकर क्षमा माँगी और बोलीं कि पुत्र-शोक ने मुझे अनुचित कठोरता कहला दी। फिर उन्होंने शोक का उपदेश किया—शोक धैर्य, विद्या और स्थिरता सब नष्ट कर देता है; वही सबसे बड़ा शत्रु है, शत्रु के प्रहार से भी अधिक असह्य। शोक में डूबे मन को तपस्वी और विद्वान भी मोहग्रस्त हो जाते हैं। उन्हें पाँच रातें पाँच वर्षों जैसी लगती हैं, और उनका दुःख नदियों के वेग से बढ़ते समुद्र की तरह उमड़ रहा है। इन हृदयस्पर्शी वचनों के बीच सूर्य की किरणें मन्द पड़ गईं और रात्रि आ पहुँची। दशरथ क्षणभर सांत्वना पाकर भी शोक से अभिभूत रहे और निद्रा के वश में चले गए।
दशरथस्य शोकानुचिन्तनं शब्धवेधि-दोषस्मरणं च (Daśaratha’s grief, karmic reflection, and the remembered ‘śabdavedhī’ misdeed)
अयोध्याकाण्ड के 63वें सर्ग में राम के वनवास के बाद जागे दशरथ शोक से व्याकुल होकर कौसल्या से कर्म-फल का नियम कहते हैं—कर्ता को अपने कर्म का फल अवश्य मिलता है; जो लाभ-हानि का विचार किए बिना काम करता है, वह बालक-सा है। वे दृष्टान्त देते हैं कि जो आम के वृक्ष काटकर पलाश (किंशुक) को सींचता है, वह फल के समय पछताता है; उसी प्रकार वे कहते हैं कि फल-काल में राम को दूर करके आज वे स्वयं शोक-फल भोग रहे हैं। फिर वे अपना पुराना अपराध सुनाते हैं। वर्षा-ऋतु में सरयू तट पर शिकार करते हुए वे अँधेरे में जल-स्थान पर बैठे; केवल शब्द सुनकर भ्रमवश हाथी समझकर उन्होंने बाण चला दिया। करुण पुकार सुनकर ज्ञात हुआ कि वह तपस्वी-स्वभाव का वनवासी युवक था, जो अपने अंधे वृद्ध माता-पिता के लिए जल भर रहा था। मरणासन्न युवक संन्यासी पर हुए अन्यायपूर्ण हिंसा का विलाप करता है और सबसे अधिक अपने माता-पिता के आने वाले दुःख के लिए शोक करता है। वह दशरथ से कहता है कि शाप से बचने के लिए उनके पास जाकर क्षमा माँगें, और बाण निकालने की प्रार्थना करता है। दशरथ दुविधा में पड़ते हैं—बाण रहने से पीड़ा, निकालने से प्राणांत; अंततः बाण निकालते ही युवक प्राण त्याग देता है। यह प्रसंग दशरथ के वर्तमान पतन का कारण बताकर ऋतु-वर्णन, नैतिक कारणता और पश्चात्ताप की मनोवृत्ति को एक कर्म-कथा में जोड़ देता है।
शब्दवेध्य-अनर्थः, ऋषिशापः, दशरथस्य प्राणत्यागः (The Sound-Target Tragedy, the Sage’s Curse, and Dasaratha’s Death)
इस सर्ग में दशरथ करुणा से विलाप करते हुए कौसल्या को अपने पूर्वकृत पाप का वृत्तान्त सुनाते हैं। सरयू तट पर शिकार के समय उन्होंने जल में घड़ा भरने की ध्वनि को हाथी की ध्वनि समझकर ‘शब्दवेधी’ अभ्यास के वश में बाण छोड़ दिया; पर वह बाण एक तपस्वी मुनि के पुत्र को लगा। राजा ने उसे भूमि पर तड़पता देखकर बाण निकालकर क्षमा माँगी; मुनिपुत्र ने अपने अन्ध-वृद्ध माता-पिता का स्मरण कर उनके लिए संदेश दिया और प्राण त्याग दिए। दशरथ उन मुनिदम्पती को वहाँ लाते हैं; वे पुत्रवियोग में विलाप करते हुए अन्तिम दर्शन करते हैं। मुनि धर्म-न्याययुक्त वचन कहकर बताते हैं कि अज्ञानवश हुए कर्म से तत्काल ब्रह्महत्या का दोष नहीं लगता, किन्तु वे शाप देते हैं कि जैसे हम पुत्रशोक से मर रहे हैं, वैसे ही राजा भी पुत्रशोक से मरेगा। दम्पती पुत्र को चिता पर रखकर स्वर्गगमन करते हैं और मुनिपुत्र भी दिव्य रूप धारण कर इन्द्र के साथ स्वर्गारोहण करता है। यह शाप कर्मविपाक की भाँति फलित होता है—रामवियोग के असह्य शोक से दशरथ की इन्द्रियाँ क्षीण होती हैं, चित्त टूटता है, और रामदर्शन के अभाव को परम दुःख मानकर वे कौसल्या और सुमित्रा के समीप अर्धरात्रि के बाद प्राण त्याग देते हैं।
अयोध्याकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः — Daśaratha’s Death Discovered in the Palace (Morning Rites Turn to Lament)
प्रातःकाल राजमहल में नियत राजाचार के अनुसार सूत, वन्दीजन, गायक-वादक और सेवक उपस्थित होकर मंगल-आशीर्वचन और स्तुतियाँ गाते हैं। पीले चन्दन से सुवासित जल, कलश, पात्र, उबटन आदि स्नान-सामग्री भी विधिपूर्वक उत्तम रीति से सजाई जाती है; सब कुछ सुव्यवस्थित और शुभ प्रतीत होता है। परन्तु राजा दशरथ बाहर नहीं आते। सूर्योदय तक प्रतीक्षा करते-करते सेवकों की चिंता शंका में बदल जाती है। शय्या-परिचारिकाएँ संयम से भीतर जाकर शय्या को स्पर्श करती हैं और जीवन-चिह्न न पाकर काँप उठती हैं; आशंका अब निश्चित हो जाती है। अन्तःपुर में सहसा करुण क्रन्दन फैल जाता है। कौसल्या और सुमित्रा उस आर्तनाद से जागकर राजा को छूती हैं और शोक से मूर्छित होकर गिर पड़ती हैं। कैकेयी के नेतृत्व में अन्य रानियाँ भी अचेत हो जाती हैं; जो महल अभी स्तुति और संगीत से गूँज रहा था, वही अब विलाप से प्रतिध्वनित होता है—आनन्द का पतन और सामूहिक शोक का आरम्भ प्रकट हो जाता है।
अयोध्यायां शोकविलापः — Lamentation in Ayodhya after Daśaratha’s death
दशरथ के स्वर्गारोहण के बाद अयोध्या में शोक का घना दृश्य उपस्थित होता है। कौसल्या दुःख से व्याकुल होकर राजा का सिर अपनी गोद में रखती हैं और कैकेयी को दोष देती हुई करुण विलाप करती हैं। वे विपत्ति को तीखे उपमानों से व्यक्त करती हैं—बुझी हुई अग्नि, जलहीन समुद्र, तेजहीन सूर्य के समान अयोध्या हो गई है। उनके वचनों में पीड़ा का विस्तार होता है—वन में सीता की असुरक्षा और जनक के भी शोक से टूट जाने की आशंका। कौसल्या विधवा-वेदना की पराकाष्ठा में पति के शरीर के साथ अग्नि में प्रवेश करने का संकल्प प्रकट करती हैं। सेविकाएँ उन्हें रोककर वहाँ से ले जाती हैं। वरिष्ठों के निर्देश से मंत्रीगण राजा के शरीर को तेल की द्रोणी में सुरक्षित रखते हैं और पुत्र के आने तक अन्त्येष्टि स्थगित करते हैं—वंश-धर्म और श्राद्ध-विधि की मर्यादा का पालन करते हुए। अन्तःपुर की स्त्रियाँ सामूहिक रूप से विलाप करती हैं और अयोध्या चन्द्रहीन रात्रि या सूर्यहीन दिन की तरह म्लान और अव्यवस्थित दिखती है। नगर-जन कैकेयी की निन्दा करने लगते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि राजमहल का निजी निर्णय पूरे नगर के लिए आघात और नैतिक निर्णय बन जाता है।
अयोध्यायां शोक-रात्रिः तथा अराजक-राष्ट्रस्य नीतिविचारः (The Night of Lamentation in Ayodhya and the Political Ethics of a Kingless Realm)
इस सर्ग में अयोध्या की रात्रि को ‘आक्रन्दित-निरानन्दा’ कहा गया है। दशरथ के निधन और राम के वनवास के कारण नगर शोक से भर जाता है; घर-घर विलाप है और जन-जीवन सूना-सा हो जाता है। प्रातःकाल राजाभिषेक कराने वाले द्विज सभा में प्रवेश करते हैं। वसिष्ठ पुरोहित के सामने मार्कण्डेय आदि ब्राह्मण तथा मंत्रीगण अपने-अपने मत रखते हैं और ‘अराजक’ अवस्था के घोर अनर्थ का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि राजा के बिना वर्षा-व्यवस्था, कृषि, धन-सुरक्षा, न्याय-व्यवहार, यज्ञ-प्रवृत्ति, उत्सव-संस्कृति, व्यापार-मार्गों की रक्षा और शत्रु-प्रतिरोध—सब क्षीण हो जाते हैं। उपमानों से यह बात स्पष्ट की जाती है कि जैसे जलहीन नदियाँ, तृणहीन वन और गोपालक-विहीन गौएँ निष्फल हो जाती हैं, वैसे ही पालक के बिना राज्य टूटने लगता है। अंत में राजा को सत्य-धर्म का आधार, माता-पिता के समान हितकारी बताया जाता है। इसलिए इक्ष्वाकु कुल के किसी कुमार का शीघ्र अभिषेक कर राज्य को संभालने की प्रार्थना वसिष्ठ से की जाती है।
दूतप्रेषणम् — Dispatch of Messengers to Kekaya (Bharata’s Recall)
इस सर्ग में मंत्रियों और ब्राह्मणों की बात सुनकर वसिष्ठ तत्काल कार्यवाही करते हैं। वे केकय देश में मामा के यहाँ ठहरे भरत और शत्रुघ्न को शीघ्र बुलाने के लिए सिद्धार्थ, विजय, जयंत, अशोक और नंदन नामक दूतों को बुलाकर स्पष्ट आदेश देते हैं—राजगृह (केकय की राजधानी) तुरंत पहुँचो, शोक के चिह्न छिपाए रखो, पुरोहित और मंत्रियों की कुशल-क्षेम कहो और “अत्यावश्यक कार्य” बताकर बिना विलंब लौट आने पर जोर दो। संचार का कठोर नियम भी रखा जाता है—भरत को न तो राम के वनवास का, न दशरथ के निधन का, और न रघुवंश पर आई विपत्ति का समाचार देना है। यह नियंत्रित सूचना-नीति भरत को आघात से बचाने और राज्य की स्थिरता बनाए रखने के लिए है। दूतों को यात्रा-सामग्री दी जाती है और केकय-राजा तथा भरत के लिए रेशमी वस्त्र और आभूषण आदि उपहार भी दिए जाते हैं। इसके बाद उनके मार्ग का वर्णन आता है—हस्तिनापुर में गंगा पार कर वे कुरु-जांगल से पाञ्चाल की ओर बढ़ते हैं; मालिनी, शरदण्डा, इक्षुमती, विपाशा और शाल्मली नदियाँ पार करते हैं तथा सुदामा पर्वत पर विष्णु के पदचिह्न देखते हैं। कर्तव्यनिष्ठ दूत रात में गिरिव्रज पहुँचते हैं, जिससे उनकी तत्परता और यात्रा-मार्ग की विशिष्टता दोनों प्रकट होती हैं।
भरतस्य दुःस्वप्नदर्शनम् — Bharata’s Ominous Dream
इस सर्ग में दूतों के नगर में पहुँचने के समय भोर में भरत का मन एक भयानक दुःस्वप्न से टूट जाता है। स्वप्न में वे पिता दशरथ को अपवित्र और अशुभ स्थितियों में देखते हैं—पर्वत से गिरकर गोबर के कीचड़ में पड़ना, तेल में तैरते हुए तेल पीना, तिल-भात खाना, और बार-बार सिर के बल तेल में डूबना तथा शरीर का लेपित होना। फिर प्रकृति और राज्य-चिह्नों के उलट-पुलट दृश्य आते हैं—समुद्र सूख जाना, चन्द्रमा का गिरना, पृथ्वी का अँधेरा होना, राजहाथी का दाँत टूटना, अग्नि का अचानक बुझ जाना, धरती का फटना, वृक्षों का सूखना और धुएँ से ढके उजड़े पर्वत—जो लोक और राजधर्म दोनों में विक्षोभ का संकेत देते हैं। आगे राजा काले वस्त्र पहनकर लोहे के आसन पर बैठा दिखता है और श्यामवर्ण स्त्रियाँ उसका उपहास करती हैं। फिर वह लाल माला और लाल अनुलेपन से सजा हुआ गधे-जुते रथ पर दक्षिण दिशा की ओर शीघ्र जाता है और अंत में लाल वस्त्रधारी विकराल राक्षसी उसे घसीट ले जाती है। भरत इसे मृत्यु का अपशकुन मानते हैं; उन्हें अपने, राम, राजा या लक्ष्मण के लिए भय होता है और वे स्वप्न-नियम स्मरण करते हैं कि गधे-जुते वाहन पर किसी को देखना शीघ्र चिता-धूम का सूचक है। मित्र गीत, नृत्य, नाटक और हास्य से उन्हें बहलाना चाहते हैं, पर भरत का कंठ सूखता है, स्वर टूटता है, मुख मुरझाया रहता है और बिना कारण आत्मग्लानि होती है। स्वप्न में राजा का “असमझ” रूप से उपस्थित होना उनके भय को और दृढ़ कर देता है।
भरतस्य दूतसमागमः तथा केकयराजनः अनुज्ञा (Bharata Meets the Messengers; Kekaya King Grants Leave)
अयोध्याकाण्ड के सत्तरवें सर्ग में केकय से अयोध्या की ओर भरत के प्रस्थान का भावपूर्ण प्रसंग आता है। भरत एक अशुभ स्वप्न का वर्णन करते हैं। उसी समय अयोध्या के अश्वारोही दूत परिखा से घिरे राजगृह नगर में पहुँचते हैं; केकयराज और युवराज युधाजित उनका सत्कार करते हैं और वे विनयपूर्वक भरत से निवेदन करते हैं। भरत कुटुम्ब-धर्म के अनुसार कुशल-क्षेम पूछते हैं—राजा दशरथ, श्रीराम, लक्ष्मण तथा रानियाँ कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी की स्थिति, धर्म-पालन और गृहस्थ-व्यवस्था के विषय में। दूत बताते हैं कि राज्यकार्य अत्यन्त तात्कालिक है, इसलिए तुरंत लौटना आवश्यक है; वे केकयराज और युधाजित के लिए भेजे गए बहुमूल्य उपहार भी सौंपते हैं। भरत उन्हें स्वीकार कर दूतों का यथोचित सम्मान करते हैं। तत्पश्चात भरत अपने नाना केकयराज से प्रस्थान की अनुमति माँगते हैं। राजा अनुमति देते हुए भरत को कैकेयी का योग्य पुत्र कहकर प्रशंसा करते हैं और वसिष्ठ तथा राजकुमारों को प्रणाम-संदेश भेजते हैं। हाथी, घोड़े, स्वर्ण, वस्त्र, चर्म आदि तथा राजमहल में पाले गए कुत्तों तक का दान-विनिमय होता है, पर भरत को हर्ष नहीं होता; स्वप्न और दूतों की उतावली से उनकी चिंता बढ़ती जाती है। अंत में भरत शत्रुघ्न के साथ मंत्रियों और सेना-रक्षा सहित विशाल काफिले के साथ प्रस्थान करते हैं—बाह्यतः शुभ यात्रा, भीतर से अनिष्ट की आशंका से आच्छादित।
भरतस्य अयोध्याप्रत्यागमनम् — Bharata’s Return Journey and the Distant Sight of Ayodhya
इस सर्ग में भरत राजगृह से प्रस्थान कर पूर्व दिशा की ओर बढ़ते हुए अयोध्या के निकट पहुँचते हैं। मार्ग में वे सुदामा और ह्लादिनी नदियों को पार करते हैं तथा तरंगों से युक्त, विस्तृत और पश्चिमाभिमुख बहने वाली शतद्रू को देखते हैं। आगे एलाधान, सर्वतीर्थ और लौहित्य आदि नामित स्थानों पर अनेक तीर्थों और नदियों—उत्तानिका, कुटिका, कपीवती आदि—का क्रमशः अतिक्रमण होता है; पर्वतीय घोड़ों और हाथी-यान का उल्लेख यात्रा-वृत्तांत को मानचित्र-सा सघन बना देता है। दूर से अयोध्या दिखाई देती है—श्वेत भूमि से सुशोभित, उद्यानों से युक्त, वेदपाठी ऋत्विजों और ब्राह्मणों से परिपूर्ण, कीर्तिमती नगरी। परंतु समीप आने पर भरत गृहों और देवालयों में अमंगल के संकेत देखते हैं—घर असाफ़ और उपेक्षित हैं, द्वार खुले पड़े हैं, धूप-दीप और नैवेद्य का अभाव है, परिवार भूख से पीड़ित हैं। प्रजा आँसू भरी, कृश और शोक में डूबी दिखती है; इस प्रकार सर्ग पूर्व की धर्ममय, अनुष्ठान-समृद्ध राजधानी और वर्तमान में ठहरी हुई गृह-धार्मिक लय के बीच तीव्र विरोध दिखाकर राज-धर्म के विच्छेद का संकेत करता है।
भरतस्य मातृसदनगमनं कैकेय्या दारुणवृत्तान्तकथनं च (Bharata in Kaikeyi’s apartments: revelation of Daśaratha’s death and Rāma’s exile)
अयोध्याकाण्ड के 72वें सर्ग में भरत राजभवन में पिता दशरथ को खोजते हैं, पर वे कहीं नहीं मिलते। पितृस्नेहपूर्ण स्वागत की आशा से वे कैकेयी के अंतःपुर में जाते हैं। वहाँ सूना शयन, उदास सेवक और राजकार्य की निस्तब्धता देखकर भरत का मन आशंकित हो उठता है और वे कैकेयी से स्पष्ट पूछते हैं कि उन्हें क्यों बुलाया गया और राजा कहाँ हैं। कैकेयी राजनीतिक अभिलाषा से प्रेरित होकर भयावह समाचार देती है—राम, सीता और लक्ष्मण के वियोग में विलाप करते हुए दशरथ का देहान्त हो गया। यह सुनकर भरत शोक से गिर पड़ते हैं, रोते हैं और पिता के स्नेहस्पर्श के अभाव को विलाप करते हैं। फिर वे राजा का अंतिम संदेश पूछते हैं और राम के चरित्र पर कोई कलंक न लगे, इस भय से स्पष्ट प्रश्न करते हैं—क्या राम ने किसी को हानि पहुँचाई, चोरी की, या परस्त्री की इच्छा की? कैकेयी राम में कोई दोष नहीं बताती और स्वयं स्वीकार करती है कि उसने भरत के लिए राज्य और राम के लिए वनवास माँगा था; उसी शोक से दशरथ की मृत्यु हुई। वह भरत को अंत्येष्टि-कर्म करने और राज्याभिषेक स्वीकार करने को उकसाती है, यह कहकर कि नगर और राज्य अब उन्हीं पर आश्रित हैं—यही आगे चलकर भरत के धर्मपूर्ण अस्वीकार और राम के अधिकार-स्थापन की भूमिका बनता है।
भरतस्य कैकेय्याः प्रति धिक्कारः — Bharata’s Rebuke of Kaikeyi and Affirmation of Ikshvaku Royal Dharma
अयोध्याकाण्ड के 73वें सर्ग में भरत पिता दशरथ के निधन और राम-लक्ष्मण के वनवास का समाचार सुनकर शोक से व्याकुल होते हुए भी धर्मयुक्त तर्क के साथ कैकेयी की कठोर भर्त्सना करते हैं। वे कहते हैं कि पिता और ज्येष्ठ भ्राताओं के बिना राज्य निरर्थक है; कैकेयी ने कुल का विनाश किया और कौसल्या तथा सुमित्रा के दुःख को बढ़ाया। भरत यह भी स्मरण कराते हैं कि राम ने कैकेयी को सदा अपनी माता के समान मान दिया और आदर्श आचरण रखा। फिर भरत इक्ष्वाकु-वंश की मर्यादा का प्रतिपादन करते हैं—परम्परा से ज्येष्ठ पुत्र का ही राज्याभिषेक होता है और कनिष्ठ भाई विनयपूर्वक उसकी सेवा करते हैं; कैकेयी का कर्म राजधर्म और पूर्वजों की कीर्ति का भंग है। वे स्पष्ट कहते हैं कि वे कैकेयी की पुत्र-राज्य की अभिलाषा पूरी नहीं करेंगे, बल्कि निर्दोष और जनप्रिय राम को वन से लौटा लाकर उन्हीं की सेवा दृढ़ निष्ठा से करेंगे। सर्ग के अंत में भरत का शोक सिंह के समान पर्वत-गुफा में गर्जना करता हुआ प्रकट होता है, जिसमें करुणा और धर्म-निन्दा दोनों की तीव्रता समाहित है।
भरतस्य कैकेयी-गर्हा तथा सुरभि-दृष्टान्तः (Bharata’s Reproach of Kaikeyi and the Surabhi Exemplum)
इस सर्ग में दशरथ के निधन और राम के वनवास के बाद भरत का कैकेयी के प्रति तिरस्कार और भी तीव्र हो जाता है। क्रोध से व्याकुल भरत उसके आचरण को अधर्म बताकर धिक्कारते हैं और कहते हैं कि उसके कारण पिता का नाश, भाइयों में दूरी और प्रजा का घोर रोष उत्पन्न हुआ है; यह पाप इक्ष्वाकु कुल की मर्यादा को तोड़ने वाला है। वे दण्डफल के रूप में राज्य-नाश, नरक-गमन और समाज-बहिष्कार की बात कहते हैं तथा अपनी वैधता का संकट प्रकट करते हैं—प्रजा के शोक के बीच वे उस पाप-भार को नहीं उठा सकते जो संबंध के कारण उनके सिर मढ़ा जा रहा है। फिर वे सुरभि/कामधेनु का दृष्टान्त सुनाते हैं—असंख्य संतानों वाली सुरभि भी अपने दो बैलों को अत्यधिक बोझ से पीड़ित देखकर रो पड़ी; इसे देखकर इन्द्र ने जाना कि पुत्र का प्रेम अतुलनीय होता है। इसी से भरत कौसल्या के एकमात्र पुत्र-राम से वियोगजन्य दुःख को सामने रखकर कैकेयी के अपराध को और तीखा करते हैं। अंत में वे प्रतिज्ञा करते हैं कि राम को लौटा कर कुल की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करेंगे; यदि यह न हो सका तो वे सुख-त्याग कर तपस्वी बनकर वन में चले जाएंगे। शोक की पराकाष्ठा में भरत भूमि पर ऐसे गिर पड़ते हैं जैसे इन्द्रध्वज का पतन—थकी हुई सत्ता और गहन विषाद का चित्र।
अयोध्याकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः (Sarga 75: Bharata and Kausalya—Reproach, Oaths, and Reconciliation)
इस सर्ग में घर के भीतर ही धर्म-न्याय जैसा गंभीर नैतिक सामना होता है। भरत मूर्छा से उठकर शोकाकुल माता को देखते हैं और मंत्रियों के सामने कैकेयी के कृत्य की निंदा करते हैं, यह संकेत देते हुए कि राज्याधिकार नैतिक वैधता से अलग नहीं। कौसल्या पुत्र-शोक और संदेह से व्याकुल होकर कटु व्यंग्य में भरत पर आरोप लगाती हैं कि कैकेयी की कुटिलता से ‘बिना बाधा’ राज्य पाने की इच्छा तुम्हारी ही है। भरत औपचारिक रूप से इनकार करते हैं—न उन्होंने राज्य चाहा, न अभिषेक की योजना जानी; वे शत्रुघ्न के साथ दूर थे। फिर वे अपनी निष्कलुषता सिद्ध करने हेतु दीर्घ शपथ-रूप प्रतिज्ञाएँ करते हैं—राम के वनवास को जिसने भी स्वीकार किया हो, उन पापों का फल उसी पर पड़े; यदि मैं दोषी हूँ तो वही दंड मुझे मिले—इस प्रकार निजी बचाव को विधिवत् शपथ-प्रदर्शन बना देते हैं। अंत में भरत करुणा से टूटकर कौसल्या के चरणों में गिरते हैं, विलाप करते हैं, फिर मूर्छित होते हैं और सांत्वना पाते हैं। कौसल्या उनकी धर्म और सत्यनिष्ठा पहचानकर उन्हें आलिंगन करती हैं; शोक और थकान में रात बीत जाती है।
दशरथस्य अन्त्येष्टि-विधानम् — Dasaratha’s Funeral Rites and Ayodhya’s Mourning
अयोध्याकाण्ड के 76वें सर्ग में भरत के तीव्र विलाप के बाद राजधर्म के अनुसार आवश्यक कर्मकाण्ड का क्रम आता है। वाणी में श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठ भरत को शोक संयमित करने और उचित समय पर महाराज दशरथ की अन्त्येष्टि करने की प्रेरणा देते हैं। भरत धैर्य धारण कर ऋत्विजों, पुरोहितों और आचार्यों को बुलाकर शास्त्रोक्त विधि आरम्भ कराते हैं। राजकीय अग्नियों का यथाविधि संस्कार होता है। तेल में सुरक्षित रखे गए पार्थिव शरीर को बाहर निकालकर अलंकृत शय्या पर रखा जाता है और सेवक शिबिका में उसे लेकर चलते हैं। मार्ग में दान, स्वर्ण-वस्त्रादि का वितरण और अर्पण होते हैं। चन्दन, अगरु, गुग्गुल आदि सुगन्धित काष्ठों से चिता रची जाती है; पुरोहित आहुतियाँ देते हैं, मंत्रोच्चार करते हैं और सामगान शास्त्रानुसार स्तुतियाँ गाते हैं। कौसल्या के नेतृत्व में रानियाँ आती हैं और जलती चिता की प्रसव्य परिक्रमा करती हैं। नगर में करुण क्रन्दन गूँज उठता है, जो क्रौंची पक्षियों के विलाप के समान कहा गया है। भरत सहित तर्पण-जलदान के बाद अयोध्या दस दिनों के शोकाचार में प्रवेश करती है—सब भूमि पर शयन करते हुए शोक, विधि और नगर-व्यवस्था को एक साथ निभाते हैं।
और्ध्वदैहिकक्रिया-शोकविलापः (Obsequies for Daśaratha and the Brothers’ Lament)
इस सर्ग में दशरथ के निधन के बाद के कर्मकाण्ड और मनोव्यथा का चित्रण है। दस दिन के शोक-काल के पश्चात् भरत शुद्धि करके बारहवें दिन पिता के श्राद्ध का आयोजन करते हैं। वे ब्राह्मणों को अत्यन्त उदार दान देते हैं—धन, अन्न-धान्य, वस्त्र, रत्न, पशुधन, दास-सेवक, वाहन और निवास-स्थान—जिससे राजधर्म और और्ध्वदैहिक कर्तव्य की महत्ता प्रकट होती है। तेरहवें दिन प्रातः भरत पुनः शुद्धि हेतु श्मशान जाते हैं। भस्म और अस्थियों के चिह्नों से युक्त चिता-स्थल देखकर वे मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं और पिता के चले जाने, कौसल्या के एकाकी रह जाने तथा राम के वनवास को स्मरण कर विलाप करते हैं। भरत के शोक को देखकर और राजा की स्मृति से शत्रुघ्न भी मूर्छित होते हैं; फिर वे विलाप में कहते हैं कि यह ‘शोक-सागर’ मन्थरा से उत्पन्न हुआ और कैकेयी ने उसे दुर्गम बनाया, तथा वरदान अचल बन्धन बन गए। सेवक और मंत्री दोनों भाइयों को संभालते हैं। वसिष्ठ भरत को समझाते हैं कि तेरहवीं आ गई है और शेष संस्कार पूर्ण करने हैं; साथ ही भूख-प्यास, सुख-दुःख, जन्म-मरण जैसे द्वन्द्वों की अनिवार्यता बताते हैं। सुमंत्र शत्रुघ्न को भी जगत् के उत्पत्ति-लय के नियम का उपदेश देकर सांत्वना देते हैं। अश्रुपूर्ण और थके हुए दोनों भाई उठकर धर्मविधि के अनुसार शेष और्ध्वदैहिक कर्म पूर्ण करने के लिए प्रवृत्त होते हैं, और शोक को कर्तव्य के साथ जोड़ते हैं।
अष्टसप्ततितमः सर्गः — Śatrughna’s Fury and Bharata’s Restraint (Mantharā Episode)
अयोध्या में राम-वियोग से व्याकुल भरत राम के पास जाने की तैयारी करते हैं। उसी समय शत्रुघ्न क्रोध और शोक से भरकर प्रश्न उठाते हैं—जो राम समस्त प्राणियों के आश्रय हैं, उन्हें एक स्त्री के कहने से वन क्यों भेजा गया? लक्ष्मण ने उस आदेश का प्रतिकार क्यों न किया? और राजा ने धर्म-अधर्म का विचार करके अपने को क्यों न रोका? तभी मंथरा राजवस्त्र-आभूषणों से सजी द्वार पर दिखाई देती है। द्वारपाल उसे पकड़कर सभा में लाते हैं और राम-वनवास तथा दशरथ-मृत्यु का दोषी बताते हैं। यह सुनकर प्रतिज्ञा-निष्ठ शत्रुघ्न शोक से उन्मत्त होकर प्रतिशोध की धमकी देते हुए मंथरा को घसीटते हैं; उसके गहने बिखर जाते हैं और राजमहल शरद्-आकाश की भाँति चमकता हुआ वर्णित होता है। भयभीत दासियाँ करुणामयी कौसल्या की शरण में भागती हैं। शत्रुघ्न का रोष कैकेयी पर भी कठोर निन्दा के रूप में टूट पड़ता है; कैकेयी भरत से रक्षा माँगती है। भरत धर्मोपदेश देते हैं—स्त्रियों का वध नहीं करना चाहिए, क्षमा करनी चाहिए। शत्रुघ्न स्वीकार करते हैं कि राम की ‘मातृ-हन्ता’ कहकर निन्दा होने के भय से वे रुकते हैं और मंथरा को छोड़ देते हैं। मंथरा कैकेयी के चरणों में गिरकर विलाप करती है; कैकेयी उसे कोमल वाणी से ढाढ़स बँधाती है—और सर्ग प्रतिशोध, संयम तथा राजकीय करुणा के विरोधाभास के साथ समाप्त होता है।
भरतस्य राज्यत्यागः तथा रामानयनप्रतिज्ञा (Bharata Rejects Kingship and Vows to Bring Rama Back)
चौदहवें दिन भोर में राजाभिषेक कराने वाले अधिकारी एकत्र होकर भरत से तुरंत राज्य ग्रहण करने का आग्रह करते हैं। वे कहते हैं कि दशरथ के निधन के बाद राज्य का निराधार होना भयावह है और अभिषेक की सारी सामग्री भी तैयार है। परंतु भरत अपने व्रत में अडिग रहकर अभिषेक-सामग्री की प्रदक्षिणा करते हैं और कुल-धर्म के अनुसार प्रस्ताव ठुकरा देते हैं—राज्य का अधिकार ज्येष्ठ राम का ही है। भरत भूमिका-परिवर्तन का प्रस्ताव रखते हैं—वे स्वयं चौदह वर्ष वनवास सहेंगे और राम को अयोध्या में राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया जाए। फिर वे व्यावहारिक तैयारी का आदेश देते हैं: चतुर्विध सेना जुटाई जाए, अभिषेक के उपकरण आगे ले जाएँ, शिल्पी मार्गों को समतल व सीधा करें, और कठिन भूभाग पहचानने में निपुण रक्षकों के साथ मार्ग की जाँच हो। सभा और प्रजा भरत की धर्मनिष्ठा सुनकर मंगल-ध्वनि करती है और आशीर्वाद देती है कि जो भरत राज्य को योग्य उत्तराधिकारी को सौंपना चाहते हैं, उन पर लक्ष्मी स्थिर रहे। हर्ष के आँसू बहते हैं; इस सर्ग में वैध अधिकार, अभिषेक की तत्परता और राज्य-प्रबंधन—तीनों एक नैतिक घोषणा में मिलते हैं कि सत्ता अवसर से नहीं, त्याग और धर्म-पालन से प्रमाणित होती है।
मर्गनिर्माणम् (Roadworks and the Royal Route Prepared for Bharata)
इस सर्ग में भरत के आगमन हेतु राजमार्ग और पड़ावों की पूर्व-व्यवस्था का वर्णन है। राजाज्ञा से अधिकारी विविध शिल्प-समूहों को भेजते हैं—सर्वेक्षक, मापक, खुदाई करने वाले, अभियंता, वास्तुकार, बढ़ई, सड़क-निर्माता, लकड़हारे, कुआँ खोदने वाले, पलस्तर/चूना करने वाले, बाँस-कारीगर और निरीक्षक। वे झाड़-झंखाड़ और शिलाखंड हटाते हैं, दुर्गम भूमि समतल करते हैं, गड्ढे-खाइयाँ भरते हैं, आवश्यक स्थानों पर पुल बाँधते हैं, जल-निकास के लिए पत्थर तोड़ते-पीसते हैं और शीघ्र जल-मार्ग तथा जलाशय बनाते हैं। निर्जल प्रदेशों में गोल मेड़ वाले सुशोभित पेय-कूप भी खोदे जाते हैं। फिर मार्ग को राजकीय शोभा दी जाती है—चित्रित/जड़ित पथ, पुष्पित वृक्ष-पंक्तियाँ, पक्षियों का कलरव, पताकाएँ, चन्दन-जल का छिड़काव और पुष्प-वर्षा; वह देवपथ के समान तथा चन्द्र-ताराओं से विभूषित रात्रि-आकाश के सदृश प्रतीत होता है। रमणीय, उपजाऊ स्थानों में निवास-स्थल चुने जाते हैं और शुभ नक्षत्र-मुहूर्त में शिविर स्थापित होते हैं; बालू के टीले, खाइयाँ, प्राचीर, भवन और ध्वज-शिखर उन्हें इन्द्रपुरी जैसा बनाते हैं। अंत में दल जाह्नवी गंगा के तट पर पहुँचता है—शीतल, स्वच्छ जल वाली, मत्स्य-समृद्ध और वनाच्छादित किनारों वाली पवित्र नदी।
एकाशीति तमः सर्गः — Bharata’s Grief, Courtly Summons, and the Assembly Hall
नान्दीमुखी नामक शुभारम्भ वाली रात्रि के अंतिम प्रहर में सूतमागध और प्रहरी सुवर्ण-दण्डों से बजाई गई दुन्दुभियों तथा अनेक शंखों से भरत के सत्कार हेतु मंगलध्वनि करते हैं। पर यह जनघोष भरत के शोक को और बढ़ा देता है। वे राजत्व का संकेत मानकर संगीत रुकवा देते हैं और शत्रुघ्न से कहते हैं कि वे राजा नहीं हैं। कैकेयी के कर्म से जनपद को पहुँची हानि का स्मरण कर वे विलाप करते हैं कि सर्वरक्षक राम के वनवास से राज्य की लक्ष्मी बिना नाविक की नाव की भाँति डगमगा रही है। विलाप करते-करते भरत मूर्छित होकर गिर पड़ते हैं और अन्तःपुर की स्त्रियाँ एक साथ करुण क्रन्दन करती हैं। इसी बीच राजधर्मवित् वसिष्ठ दशरथ की सभा में प्रवेश करते हैं—रत्नजटित, स्वर्णमयी, इन्द्र की सुधर्मा-सभा के समान। वे स्वर्णासन पर सुखोपधान सहित बैठकर दूतों को आज्ञा देते हैं कि वर्ण-समूहों, मन्त्रियों, सेनानायकों, राजपरिचारकों तथा भरत, शत्रुघ्न, युधाजित, सुमन्त्र और अन्य हितैषियों को शीघ्र बुलाया जाए। रथ, घोड़े और हाथियों पर आए जनों से बड़ा कोलाहल उठता है। भरत के निकट आते ही प्रजा उन्हें वैसे ही प्रणाम-स्वागत करती है जैसे पहले दशरथ को करती थी; सभा भी ऐसी दीप्त हो उठती है मानो दशरथ फिर उपस्थित हों—यह दृश्य स्मृति, लोकसम्मति और राज्य-वैधता को एक सूत्र में बाँध देता है।
भरतस्य धर्मप्रतिज्ञा तथा रामनिवर्तनयात्रा (Bharata’s Vow of Dharma and the Expedition to Recall Rama)
अयोध्या की राजसभा का दृश्य चन्द्रमा-सी उपमाओं और श्रेष्ठ जनों की दीप्ति से वर्णित है। वसिष्ठ राजधर्म का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि राज्य का अधिकार विधिवत् तुम्हें सौंपा जा चुका है; अतः तुम अभिषेक स्वीकार कर काँटों से रहित, कर-समृद्ध राज्य का उपभोग करो। भरत शोक और धर्मविषाद से व्याकुल होकर सभा में स्पष्ट कहते हैं कि वे राम के अधिकार का अतिक्रमण नहीं करेंगे। वे घोषित करते हैं—“मैं और यह राज्य, दोनों राम के हैं”; माता के कृत्य से जुड़े पाप की निन्दा करते हैं और इसे इक्ष्वाकु वंश के लिए कलंक मानते हैं। वे प्रतिज्ञा करते हैं कि या तो राम को लौटा लाएँगे, नहीं तो लक्ष्मण की भाँति वन में निवास करेंगे। भरत के धर्मयुक्त वचन सुनकर सभा हर्षाश्रुओं से भर उठती है। तत्पश्चात् भरत सुमंत्र को आदेश देते हैं कि नायकों और सेना को जुटाया जाए; गुप्तचर और मार्ग-रक्षक पहले ही भेजे जा चुके हैं। घर-घर और सैन्य-दल रथों व पशुओं को जोतते हैं; राम को प्रसन्न कर लोक-कल्याण हेतु उन्हें वापस लाने की यात्रा की तैयारी आरम्भ होती है।
अयोध्याकाण्डे त्र्यशीति तमः सर्गः — Bharata’s Departure and Encampment on the Gaṅgā (Śṛṅgīberapura)
इस सर्ग में भरत प्रातःकाल उत्तम रथ पर आरूढ़ होकर, राम-दर्शन की तीव्र लालसा से प्रेरित, अयोध्या से प्रस्थान करते हैं। आगे-आगे मंत्री और पुरोहित सूर्य-सम तेजस्वी रथों पर चलते हैं। सेना का विधिवत् लेखा-जोखा भी दिया गया है—हाथी, रथ और अश्वारोही—जिससे राज्य-शक्ति का यह संचलन विजय के लिए नहीं, बल्कि राम से मेल-मिलाप और धर्म-स्थापन के लिए है, यह भाव प्रकट होता है। कैकेयी, सुमित्रा और कौसल्या भव्य वाहन में चलती हैं; नगरवासी भी उत्साहपूर्वक साथ चलते हुए राम के गुणों का स्मरण करते हैं, मानो सामूहिक शोक का उपचार वही हो। अध्याय में शिल्पी, व्यापारी, सेवक-वर्ग, नट-गायक, मछुए आदि अनेक पेशों का उल्लेख आता है, जिससे अयोध्या के समाज का व्यापक स्वरूप दिखता है। रथों, गाड़ियों, घोड़ों और हाथियों सहित लंबी यात्रा के बाद दल गंगा तट पर, शृंगीबेरपुर के निकट, गुह के प्रदेश में पहुँचता है—गुह को सतर्क, सुशासित और राम का मित्र बताया गया है। पक्षियों से शोभित नदी-तट पर सेना ठहरती है; भरत मंत्रियों को सुविधानुसार शिविर लगाने का आदेश देते हैं, अगले दिन पार उतरने का निश्चय करते हैं और दिवंगत राजा के लिए जलांजलि देने का संकल्प करते हैं। सर्ग का अंत भरत के इस विचार से होता है कि राम को कैसे वापस लाया जाए—यह राजनीतिक प्रयत्न भी उनके लिए नैतिक और धर्ममय पुनर्स्थापन का मार्ग बन जाता है।
गुहस्य सन्देहः, गङ्गातीर-रक्षा, भरतस्य सत्कारः (Guha’s Suspicion, Securing the Ganga Bank, and Hospitality to Bharata)
अयोध्याकाण्ड के 84वें सर्ग में गंगा-तट पर एक तनावपूर्ण प्रसंग आता है। निषादराज गुह जब नदी किनारे भरत की ध्वजायुक्त सेना को डेरा डाले देखता है, तो पहले उसे शंका होती है कि कहीं यह बल वनवासी राम के लिए संकट तो नहीं। वह रणनीतिक चिंता प्रकट करता है—क्या भरत राम को बाँधने या मारने आया है, या नदी-प्रदेश के लोगों को दबाने? इसी आशंका में गुह रक्षा-व्यवस्था करता है—मछुआरों और नदी-रक्षकों को अपने-अपने स्थानों पर तैनात करता है और पाँच सौ नावें सुसज्जित दल के साथ तैयार रखने का आदेश देता है। उसका निर्णय स्पष्ट है: यदि यह सिद्ध हो जाए कि भरत राम के प्रति दुर्भावना नहीं रखते, तो सेना उसी दिन सुरक्षित रूप से पार उतर सकती है। बात स्पष्ट होने पर गुह भरत के पास भेंट लेकर जाता है—मछली, मांस और मदिरा—और विनयपूर्वक अपने सेवक-गृह में ठहरने का अनुरोध करता है, अपने प्रदेश को अधीन मानकर स्वागत करता है। सुमंत्र मध्यस्थ बनकर गुह को राम का वृद्ध मित्र और दण्डकारण्य-परिचित बताता है तथा भरत को उससे मिलने की सलाह देता है। इस प्रकार शंका मित्रता में बदलती है और गंगा-पार का मार्ग धर्मसम्मत समझौते से सुरक्षित होता है।
भरत-गुहसंवादः (Bharata and Guha: Trust, Hospitality, and the Burden of Grief)
अयोध्याकाण्ड के 85वें सर्ग में भरत और निषादराज गुह के बीच ऐसा संवाद होता है जो शंका को दूर कर सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करता है। गंगा-तट के दुर्गम प्रदेश में भरत की विशाल सेना देखकर गुह पूछता है कि कहीं यह राम के प्रति वैर-भाव तो नहीं। भरत अत्यन्त मृदु वाणी से कहता है कि राम उसके पूज्य ज्येष्ठ हैं—पिता के समान—और उसका उद्देश्य केवल राम को वापस लाना है; अतः गुह संदेह छोड़कर भरद्वाज के आश्रम तक मार्ग-रक्षा करे। फिर अतिथि-सत्कार और मैत्री-धर्म का प्रसंग आता है। भरत गुह की उदारता की प्रशंसा करता है कि वह पूरी सेना का भी आतिथ्य करने को तत्पर है; गुह प्रसन्न होकर भरत की त्याग-भावना का गुणगान करता है और कहता है कि उसकी कीर्ति चिरस्थायी होगी। दिन ढलने पर रात्रि आती है; भरत सेना का पड़ाव डालकर शत्रुघ्न के साथ विश्राम करता है। सर्ग का अंत भरत के भीतर के शोक-चित्र से होता है—पर्वत और वन-दावानल की उपमा से—जहाँ दुःख अंतर्दाह बनकर पसीना, हृदय-ज्वर और मन की व्याकुलता उत्पन्न करता है; गुह राम का स्मरण कराते हुए उसे सांत्वना देने का प्रयास करता है।
लक्ष्मणगुणवर्णनम् — Lakshmana’s Vigil and Guha’s Testimony
अयोध्याकाण्ड के 86वें सर्ग में नदी-तट पर पूरी रात जागरण और करुण विलाप का चित्र है। वननायक गुह भरत से लक्ष्मण के गुण कहता है—लक्ष्मण केवल राम की रक्षा के लिए शस्त्र धारण किए, सावधान रहकर जागते रहे; उन्होंने नींद का त्याग कर दिया। गुह अपने द्वारा तैयार शय्या अर्पित करता है और मित्रधर्म तथा रक्षक-आतिथ्य का निर्वाह दिखाता है; वह बताता है कि लक्ष्मण राम-सेवा में ही यश और धर्म मानते हैं। इसके बाद शोक गहरा होता है—भरत को स्वयं नींद नहीं आती, क्योंकि राम सीता के साथ कुश-शय्या पर पड़े हैं। युद्ध में अजेय राम का वनवास में स्वेच्छा से तपस्वी-जीवन अपनाना, दशरथ के शीघ्र निधन की आशंका और राजमहल में थके हुए शोक का दृश्य भरत के मन में उभरता है; राजा के बिना पृथ्वी को वह विधवा-सी मानता है। प्रभात होने पर भगीरथी के तट पर राम और लक्ष्मण जटा धारण करते हैं। गुह उन्हें नाव से पार उतारता है और वे सीता सहित वल्कल-वस्त्र धारण किए, शस्त्रधारी और सतर्क होकर वनमार्ग में आगे बढ़ते हैं—क्षात्र-शक्ति का तपस्वी वनवास में रूपान्तरित पवित्र दृश्य।
गुहसंवादः—रामस्य रात्रिवासवर्णनम् (Dialogue with Guha: Account of Rama’s Night Halt)
इस सर्ग में गुह के वचन सुनकर भरत अत्यन्त दुःख से ध्यानमग्न हो जाते हैं। क्षणभर सँभलकर फिर शोकवेग से गिर पड़ते हैं; शत्रुघ्न उन्हें आलिंगन कर शोक से मूर्छित हो जाते हैं। तब उपवास से कृश और दीन भरत की माताएँ आकर गिरे हुए भरत को घेर लेती हैं। कौसल्या विशेष वात्सल्य से उन्हें हृदय से लगाकर कुशल-क्षेम और कुल-जीवन की आश्रयता पूछती हैं तथा राम-लक्ष्मण के विषय में ‘कुछ भी अप्रिय’ न सुना हो—ऐसा आश्वासन चाहती हैं। भरत कुछ संभलकर कौसल्या को सांत्वना देते हैं और गुह से पूछते हैं—राम, सीता और लक्ष्मण ने रात कहाँ बिताई, क्या खाया, किस शय्या पर सोए। गुह प्रसन्न होकर आतिथ्य का वृत्तांत कहता है—बहुत-सा अन्न, फल और भक्ष्य अर्पित किए गए, पर राम ने क्षात्रधर्म स्मरण कर प्रतिग्रह स्वीकार नहीं किया और मित्र-भाव से समझाया कि ‘सदा देना चाहिए, लेना नहीं’। राम ने सीता सहित लक्ष्मण लाए जल को पीकर उपवास ही रखा; लक्ष्मण शेष जल से तृप्त हुए। तीनों ने मौन धारण कर संध्या-उपासना की। फिर लक्ष्मण ने दर्भ बिछाकर शुभ शय्या बनाई, राम-सीता के चरण धोकर दूर खड़े रहकर रात्रि-भर पहरा दिया; गुह भी अपने शस्त्रधारी जनों सहित लक्ष्मण के पास रहकर इन्द्र-तुल्य राम की रक्षा करता रहा। यह सर्ग भ्रातृभक्ति, आतिथ्यधर्म, क्षात्र-नीति और तपोमय वन-जीवन के अनुशासन का सुंदर समन्वय करता है।
रामशय्यादर्शनम् — Bharata Beholds Rama’s Forest Bed
इस सर्ग में गुह का वृत्तान्त सुनकर भरत मंत्रियों सहित इँगुदी वृक्ष के पास पहुँचते हैं और उस कुचली हुई घास की शय्या को देखते हैं जहाँ राम ने भूमि पर शयन किया था। वे माताओं से कहते हुए उस दृश्य को स्वप्न-सा अविश्वसनीय मानते हैं और निष्कर्ष निकालते हैं कि काल (समय/विधि) सब लौकिक आश्रयों को परास्त कर देता है। शय्या पर स्वर्ण-रज के कण और रेशमी तन्तुओं के चिह्न देखकर वे सीता की उपस्थिति का अनुमान करते हैं; राजसी आभूषण-वस्त्रों के स्पर्श से वनवास की करुणा और तीव्र हो उठती है। भरत राम के पूर्व वैभव—स्वर्ण-रजत जटित प्रासाद-भूमि, सुगन्ध, संगीत और स्तुतिगान—को स्मरण कर वर्तमान कठोरता से तुलना करते हैं और स्वयं को इस विस्थापन का कारण मानकर आत्मग्लानि करते हैं। वे लक्ष्मण की निष्ठा की प्रशंसा करते हैं और सीता के पति-परायण धर्म को सिद्ध मानते हैं। राजनीतिक दृष्टि से वे दशरथ के निधन और राम के वनगमन के बाद अयोध्या को बिना नाविक की नाव के समान बताते हैं—असुरक्षित, निरुत्साहित और डगमगाती हुई। अंत में भरत प्रतिज्ञा करते हैं कि वे तपस्वी-सा जीवन अपनाएँगे, आवश्यकता पड़े तो वन में भी रहेंगे, राम के व्रत की रक्षा करेंगे और तब तक विनय-याचना करते रहेंगे जब तक राम लौटकर राज्य-स्थापना स्वीकार न कर लें।
गङ्गातरणम् — Bharata’s Ferrying of the Army across the Ganga
राम द्वारा पहले ठहरे हुए उसी गंगा-तट पर रात बिताकर भरत भोर में उठे और शत्रुघ्न से बोले कि निषादराज गुह को बुलाकर चलती हुई सेना के पार उतरने की व्यवस्था कराई जाए। शत्रुघ्न ने कहा—गुह तो राम-चिन्ता में जागते हुए ही हैं; तभी गुह हाथ जोड़कर आया और सेना के कुशल-क्षेम का समाचार पूछा। राम की आज्ञा के प्रति निष्ठावान भरत ने गुह से निवेदन किया कि उसके मछुआरे नावों से समस्त सेना को पार करा दें। गुह ने तुरंत अपने बंधुओं को आदेश दिया। चारों ओर से नावें खींचकर लाई गईं और राजाज्ञा से पाँच सौ नौकाएँ एकत्र हुईं—घंटियों, पालों, ध्वज-पताकाओं से सजी, दृढ़ बनी हुई ‘स्वस्तिक’ नावें भी थीं। गुह स्वयं शुभ्र छत्र से शोभित एक मंगल नौका लेकर आया। चढ़ने का क्रम भी मर्यादा से हुआ—पहले पुरोहित और ब्राह्मण, फिर भरत-शत्रुघ्न, उसके बाद कौशल्या, सुमित्रा तथा अन्य राजमहिलाएँ, फिर रथ-गाड़ियाँ और सामग्री। डेरा उखड़ने और सामान लादने के कोलाहल के बीच नौकादल शीघ्र चल पड़ा—कहीं स्त्रियाँ, कहीं घोड़े, कहीं बोझा ढोने वाले पशु और धन-रत्न। जिन्हें नाव न मिली वे बेड़ों, घड़ों के सहारे या तैरकर पार गए। ध्वजों से युक्त हाथी महावतों के अंकुश से प्रेरित होकर ध्वज-शिखर पर्वतों की भाँति जल को चीरते हुए उतर गए। शुभ मैत्र मुहूर्त में पार होकर सेना प्रयाग के वन में पहुँची; भरत ने वहाँ पड़ाव डाला और फिर पुरोहितों सहित महर्षि भारद्वाज के दर्शन को गए, जहाँ आश्रम की रम्य कुटियाँ और उपवन देखे।
भरद्वाजाश्रमगमनम् (Bharata at Bharadvāja’s Hermitage)
भरद्वाज के आश्रम को एक क्रोश दूर से देखकर भरत ने पूरी सेना को वहीं रोक दिया। उन्होंने राजचिह्न और शस्त्र अलग रखे, मंत्रियों के साथ पैदल आगे बढ़े और कुलपुरोहित वसिष्ठ को सबसे आगे रखा—यह संकेत था कि वे धर्माधिकार के आगे विनम्र हैं और बल-प्रयोग का कोई अभिप्राय नहीं रखते। मुनि भरद्वाज ने तपस्वी-रीति से उनका स्वागत किया—अर्घ्य, पाद्य, फल आदि देकर—और अयोध्या का कुशल पूछा; पर दशरथ का नाम जान-बूझकर नहीं लिया, मानो उनके देहावसान का उन्हें ज्ञान हो। राम-स्नेह से प्रेरित होकर उन्होंने भरत के आने का कारण पूछा और शंका भी प्रकट की कि कहीं भरत निर्वासन में गए राम-लक्ष्मण को हानि पहुँचाकर निष्कंटक राज्य तो नहीं चाहता। भरत शोक से भर उठे; उन्होंने कहा कि उनके अनुपस्थित रहते उनकी माता ने जो किया, उसे वे स्वीकार नहीं करते। उनका उद्देश्य राम के चरणों की वंदना कर उन्हें अयोध्या लौटने के लिए मनाना है। भरत की अंतःप्रवृत्ति की परीक्षा कर मुनि ने उनके संयम और गुरु-भक्ति की प्रशंसा की, राम के चित्रकूट में सीता और लक्ष्मण सहित निवास का समाचार दिया और उन्हें उस रात्रि आश्रम में ठहरकर अगले दिन प्रस्थान करने को कहा।
भरद्वाजाश्रमे भरतसैन्यस्य दिव्यात्मिथ्यम् / Divine Hospitality to Bharata’s Army at Bharadvaja’s Hermitage
अयोध्याकाण्ड के 91वें सर्ग में राजसत्ता और तपोवन-धर्म का मर्यादित संगम दिखाया गया है। भरत भरद्वाज के आश्रम में रात्रि-विश्राम का निश्चय करते हैं और मुनि उन्हें दिव्य आतिथ्य देने को उद्यत होते हैं। मुनि के पूछने पर कि सेना को दूर क्यों रखा, भरत कहते हैं कि आश्रम के वृक्ष, जल, भूमि और कुटियों को कष्ट न पहुँचे तथा तपस्वियों के निकट राजसैन्य का संयम ही धर्म है—इसी कारण वे अकेले आए। तब मुनि की आज्ञा से सेना को बुलाया जाता है। भरद्वाज अग्निशाला में जाकर शुद्धि करते हैं और विश्वकर्मा तथा त्वष्टा का आवाहन कर आवश्यक सृष्टि-व्यवस्था रचवाते हैं; दिक्पालों, नदियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, कुबेर के दिव्य वन और सोम से अन्न-पान की प्रचुरता की प्रार्थना करते हैं। तत्पश्चात शीतल पवन, पुष्प-वृष्टि, दिव्य संगीत और मधुर निनाद प्रकट होते हैं। सेना विश्वकर्मा-निर्मित समतल भूमि, फल-लदे वृक्ष, दिव्य नदी, अस्तबल, तोरण और रत्नजटित राजभवन को देखकर विस्मित हो जाती है। फिर पायस की धाराओं, निवास-गृहों, सहस्रों स्त्रियों व अप्सराओं, गन्धर्वराजों के गायन, स्नान-अभ्यंग, पशुओं के तृप्तिकर आहार तथा अन्न, पात्र, वस्त्र और उपकरणों के विशाल भंडार का विस्तार से वर्णन आता है। सैनिक स्वप्नवत् आश्चर्य में रात भर आनंद करते हैं; प्रातः बुलाए गए दिव्य जन अनुमति लेकर लौट जाते हैं और सुगंध व मालाओं के चिह्न रह जाते हैं। सर्ग का संदेश है कि आतिथ्य धर्म की ऐसी शक्ति है जो बल को अनुशासन से बाँधती है, और राजा का कर्तव्य है कि तपोवन की पवित्रता को कभी आघात न पहुँचे।
भरद्वाजाश्रमात् चित्रकूटमार्गनिर्देशः — Directions from Bharadvaja’s Hermitage to Chitrakuta
भरद्वाज के आश्रम में सत्कार पाकर भरत समस्त सेना सहित विधिवत् विदा माँगते हैं और श्रीराम तक पहुँचने के लिए मार्ग का सूक्ष्म निर्देश चाहते हैं। मुनि बताते हैं कि चित्रकूट लगभग साढ़े तीन योजन दूर एकान्त वन में है; उसके उत्तर में पुष्पित वृक्षों से शोभित मन्दाकिनी बहती है, और नदी के पार वह पर्वत है जहाँ राम-सीता पर्णकुटी में निवास करते हैं। वे भरत की सेना को दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम मार्ग से जाने की आज्ञा देते हैं, जिससे राघव का दर्शन हो। प्रस्थान का समाचार सुनकर दशरथ की रानियाँ अपने वाहनों से उतरकर मुनि के पास आती हैं—कौसल्या और सुमित्रा शोक से व्याकुल, और कैकेयी लज्जित। भरत एक-एक कर माताओं की पहचान करते हैं—कौसल्या को राम की जननी कहकर आदर देते हैं, सुमित्रा को लक्ष्मण और शत्रुघ्न की माता बताते हैं, और कैकेयी को विपत्ति का कारण मानकर कठोर वचन कहते हैं। भरद्वाज भरत को समझाते हैं कि कैकेयी पर दोषारोपण न करें; राम का वनवास अंततः देवताओं, दानवों और ऋषियों के कल्याण का हेतु बनेगा। तब भरत मुनि की प्रदक्षिणा कर सेना को रथ-वाहन जोतने का आदेश देते हैं और हाथी, रथ, पैदल सैनिक तथा राजस्त्रियों सहित दल गंगा पार कर वन-नदी प्रदेशों से दक्षिण की ओर ऐसे चलता है मानो वन में उठता हुआ मेघ हो।
चित्रकूटमार्गवर्णनम् — Bharata’s Army Reaches Chitrakuta and Searches for Rama
इस सर्ग में भरत धर्मपूर्वक विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ वन में आगे बढ़ते हैं। सेना के चलने से वन का स्वर-परिवेश बदल जाता है—हाथी और मृग तितर-बितर हो जाते हैं, पक्षी मौन हो जाते हैं, धूल उठती है और फिर वायु उसे उड़ा ले जाती है। इसके बाद भरत चित्रकूट पर्वत और मन्दाकिनी नदी को पहचानते हैं। वे शिखरों, पुष्पित वृक्षों और पशुओं से भरी ढलानों का वर्णन करते हुए बादलों, समुद्र-तरंगों और शरद्-आकाश जैसी उपमाएँ देते हैं। शत्रुघ्न से कहते हैं कि यह प्रदेश स्वभाव से दुर्गम होते हुए भी तपस्वियों के निवास से अतिथि-सत्कार-सा सौम्य प्रतीत होता है—मानो स्वर्ग का पथ। तत्पश्चात् भरत सेना को नियंत्रित कर वहीं ठहराते हैं और स्वयं सुमंत्र तथा वसिष्ठ के साथ आगे बढ़कर खोज का आदेश देते हैं। गुप्तचर धुएँ का स्तम्भ देखते हैं और विचार करते हैं कि निर्जन स्थान में अग्नि नहीं हो सकती; अतः यहाँ कोई निवास है—संभवतः श्रीराम और लक्ष्मण, या उनके समान तपस्वी। सर्ग का अंत संयमित उत्सुकता और निकट मिलन के आनंद से होता है, जहाँ प्रकृति-वर्णन नीति, संयम और उद्देश्यपूर्ण शासन से जुड़ जाता है।
चित्रकूटवर्णनम् (Description of Chitrakūṭa) / Rama Shows Sita Chitrakuta
अयोध्याकाण्ड के 94वें सर्ग में चित्रकूट पर दीर्घकाल से निवास करने वाले श्रीराम वनजीवन के प्रति अनुरक्त होकर सीता को प्रसन्न करने और अपने मन को स्थिर करने के लिए ‘अद्भुत’ चित्रकूट की शोभा दिखाते हैं। जैसे इन्द्र शची को आश्चर्यजनक दृश्य दिखाए, वैसे ही राम वनवास को पर्वत-सौन्दर्य के सामने मनोवैज्ञानिक रूप से दुःखरहित बताकर देखते हैं। वे चित्रकूट के गुणों का वर्णन करते हैं—धातुओं-सा चमकते शिखर, अहिंसक वन्यजीव, पुष्पित-फलित वृक्षों के घने उपवन। शाखाओं पर टंगे वस्त्र और खड्ग आदि से किन्नरों और विद्याधरियों के विहार-चिह्न सूचित होते हैं; झरने, स्रोत, सरोवर और गुफाओं से आती सुगन्धित वायु मन को हर लेती है। राम कहते हैं कि सीता और लक्ष्मण के साथ यहाँ रहना शोक का क्षय कर सकता है। वे वनवास का ‘द्विविध फल’ बताते हैं—धर्मपूर्वक पिता की आज्ञा का पालन और भरत को प्रसन्नता देना। अंत में वे वनजीवन को राजा के परलोक-कल्याण के लिए अमृततुल्य मानते हैं और चित्रकूट को मूल-फल-जल की प्रचुरता में स्वर्गीय उपमानों से भी श्रेष्ठ बताते हैं।
मन्दाकिनीनदीदर्शनम् (The Vision of the Mandākinī at Citrakūṭa)
चित्रकूट पर्वत से उतरकर श्रीराम सीता को मन्दाकिनी नदी का दिव्य सौन्दर्य दिखाते हैं। वे रंग-बिरंगे रेतीले तट, कमलों से भरा जल और फूल-फल से लदे वृक्षों से घिरे किनारे बताते हुए उसकी शोभा की तुलना कुबेर के नलिनी सरोवर से करते हैं। यहाँ प्रकृति-दर्शन तपोवन के अनुशासित धर्मजीवन से जुड़ जाता है—ऋषि नियत समय पर स्नान करते हैं, अन्य तपस्वी ऊँचे उठे हाथों से सूर्य की उपासना करते हैं। वायु से हिलती शिखर-शाखाएँ पर्वत को नृत्य करता-सा दिखाती हैं; गिरे हुए पुष्प जल पर तैरते ढेर बन जाते हैं, जिन पर मधुरस्वर चक्रवाक पक्षी आ बैठते हैं। राम का कथन वनवास को श्रेष्ठ जीवन के रूप में प्रतिष्ठित करता है—सीता के साथ चित्रकूट और मन्दाकिनी का दर्शन उन्हें अयोध्या-निवास से भी अधिक प्रिय लगता है। वे सीता से कहते हैं कि इस नदी में मित्र की तरह प्रवेश करो; मन्दाकिनी को सरयू और पर्वत को अयोध्या मानकर मन को तृप्त करो। अंत में सरल आहार, दिन में तीन बार स्नान और परस्पर संग—इसी में संतोष है; धर्ममय शांति से राज्य और नगर की चाह थम जाती है।
चित्रकूटे सैन्यधूलिशब्ददर्शनम् (Alarm at Chitrakūṭa: Lakṣmaṇa sights the approaching army)
चित्रकूट में श्रीराम सीता को मन्दाकिनी पर्वत-नदी का सौन्दर्य दिखाते हैं। गृह्य-धर्म के भाव से वे सीता के साथ बैठकर भुना हुआ मांस अर्पित करते हैं; वनवास का शांत, घरेलू जीवन क्षण भर के लिए स्थिर प्रतीत होता है। तभी आकाश तक उठती धूल और भारी कोलाहल दिखाई देता है। हाथियों के यूथपति और अन्य वन्य प्राणी घबरा उठते हैं। श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं कि यह राजकीय शिकार-दल भी हो सकता है या कोई भयंकर पशु; पर्वत दुर्गम है, फिर भी शीघ्र और ठीक-ठीक पता लगाना आवश्यक है। लक्ष्मण पुष्पित शाल-वृक्ष पर चढ़कर चारों दिशाएँ देखते हैं और रथ, घोड़े, हाथी, पैदल सेना तथा ध्वज-पताकाओं से युक्त विशाल, सुसज्जित सेना पहचान लेते हैं। वे तुरंत सावधानी का आदेश देते हैं—यज्ञाग्नि बुझाई जाए, सीता को गुफा में सुरक्षित रखा जाए, धनुष पर प्रत्यंचा चढ़े, बाण तैयार हों और कवच धारण किया जाए। राम के पूछने पर कि यह किसकी सेना है, लक्ष्मण क्रोधाग्नि-सा भड़क उठते हैं। रथ-ध्वज पर कोविदार-वृक्ष का चिह्न देखकर वे इसे भरत का शत्रुतापूर्ण आगमन मान लेते हैं—मानो निर्विघ्न राज्य पाने हेतु वे उन्हें हटाने आए हों। यह सर्ग वन-शांति और अचानक उठी राजनीतिक-सैन्य आशंका को साथ रखकर, टोही, संयम बनाम क्रोध और अपूर्ण जानकारी पर कर्म करने के धर्म-संकट को उजागर करता है।
भरतागमनशङ्कानिवारणम् / Dispelling Suspicion about Bharata’s Arrival (Chitrakuta Encampment)
इस सर्ग में चित्रकूट के निकट आती हुई सेना को देखकर लक्ष्मण क्रोध और शंका से भर उठते हैं। तब श्रीराम उन्हें शांत करते हुए नीति-युक्त अनुमान से समझाते हैं कि भरत स्वभाव से भ्रातृवत्सल हैं, प्राणों से भी अधिक प्रिय; वे वनवास का समाचार सुनकर कुलधर्म और शोक से प्रेरित होकर आए हैं, वैरभाव से नहीं। राम कहते हैं कि स्वजनों पर हिंसा करके पाया हुआ राज्य धर्म से दूषित होता है, विष मिले अन्न के समान—अतः वह स्वीकार्य नहीं। वे लक्ष्मण को भरत के प्रति कठोर वचन बोलने से रोकते हैं, क्योंकि ऐसे शब्द मानो स्वयं राम पर ही प्रहार होंगे। भ्रातृहत्या और पितृहत्या आपत्ति में भी अचिंत्य हैं—यह दृढ़ करके राम एक परीक्षा-रूप वचन देते हैं: यदि राज्य की चिंता है तो वे भरत से कहेंगे कि राज्य लक्ष्मण को दे दें; और उन्हें विश्वास है कि भरत सहर्ष मान लेंगे। लज्जित लक्ष्मण अपना अनुमान बदलते हैं और क्षणभर दशरथ के आगमन का भी विचार करते हैं। घोड़ों और शत्रुञ्जय नामक हाथी का दिखना तथा राज-श्वेत-छत्र का न दिखना कथा में क्षणिक अस्पष्टता रचता है। अंत में भरत भीड़ न बढ़ाने की आज्ञा देते हैं और सेना अनुशासन से पर्वत के चारों ओर पड़ाव डालती है—राजधर्म में विनय और धर्मनिष्ठा को उभारते हुए।
चित्रकूटप्रवेशः — Bharata Enters the Forest Toward Chitrakuta
सेना को नियत स्थानों पर ठहराकर भरत राज-वैभव का प्रदर्शन छोड़, विनय और पुत्रधर्म की भावना से पैदल ही श्रीराम के पास जाने का निश्चय करते हैं। वे शत्रुघ्न को पुरुषों और निषादों के दलों सहित वन का शीघ्र निरीक्षण करने की आज्ञा देते हैं; और गुह, शस्त्रधारी होकर अपने हजार कुटुम्बियों के साथ, वन-प्रदेश में राम की खोज करता है। भरत क्रमशः प्रतिज्ञा करते हैं—जब तक राम, लक्ष्मण और सीता के दर्शन न हों, मुझे शान्ति नहीं; जब तक चन्द्र-प्रभ, कमल-नयन राम-मुख न देख लूँ; जब तक राज-लक्षणों से अंकित उनके चरणों को मस्तक पर न धारण करूँ; और जब तक पितृ-पैतामह राज्य के योग्य उत्तराधिकारी राम का अभिषेक कर उन्हें स्थापित न कर दूँ। इसके बाद चित्रकूट का वर्णन पुण्य पर्वतराज के समान किया गया है; तेजस्वी, शस्त्रधारी राम के निवास से वह वन ‘सिद्ध’ सा कहा गया है। भरत पुष्पित वृक्षों से शोभित पर्वत-ढालों के उपवनों से होकर चलते हैं, आश्रम-अग्नि के धुएँ का ऊँचा ध्वज दूर से देखते हैं और परतीर पहुँचने वाले की भाँति स्वजनों सहित हर्षित होते हैं। सेना को दूर रखकर वे गुह के साथ शीघ्र ही चित्रकूट के धर्ममय आश्रम की ओर बढ़ते हैं।
चित्रकूटप्राप्तिः — Bharata Reaches Chitrakuta and Beholds Rama
अयोध्याकाण्ड के 99वें सर्ग में भरत चित्रकूट के निकट राम के वन-आश्रम की ओर अंतिम चरण में पहुँचते हैं। सेना को ठहराकर वे स्वयं शीघ्र आगे बढ़ते हैं और वसिष्ठ से रानियों को साथ लाने का आग्रह करते हैं। मार्ग में वे आश्रम की पहचान अनेक चिह्नों से करते हैं—टूटी हुई लकड़ियाँ, कुटिया के पास संचित पुष्प, ठंड से बचने हेतु रखे गोबर के उपले, वृक्षों पर कुश और वल्कल की पट्टियाँ, तथा ऊँचाई पर बाँधे गए वल्कल-वस्त्र जो असमय आवागमन के संकेत हैं। मन्दाकिनी की निकटता और तपस्वियों के नित्य अग्नि-धूम से भी वे आश्रम का अनुमान करते हैं। पश्चाताप से व्याकुल भरत ‘महर्षि-सदृश’ राम से मिलने की कल्पना करते हुए राज-वैभव के उलट दृश्य पर शोक करते हैं—एकांत वन में भूमि पर वीरासन में बैठे राम। तब वे पर्णशाला देखते हैं—यज्ञवेदी-सी पत्तों से ढकी, धनुष, तूणीर, सूर्य-प्रभ तीर, रजत म्यानों में तलवारें, ढालें और गोधा-चर्म के अंगुलित्रों से सुसज्जित, सिंह-गुफा-सी दुर्गम। ईशान कोण की ओर ढलती वेदी पर प्रज्वलित अग्नि भी दिखती है। अंत में वे राम को देखते हैं—अजिन और वल्कल धारण किए, अग्नि-सा तेजस्वी, दर्भ बिछी भूमि पर सीता और लक्ष्मण के साथ बैठे, मानो सनातन ब्रह्मा। भरत आँसुओं से भरकर दौड़ते हुए बार-बार “आर्य” पुकारते हैं और चरणों तक पहुँचने से पहले ही गिर पड़ते हैं; राम शत्रुघ्न सहित उन्हें आलिंगन करते हैं। सुमंत्र और गुह भी मिलते हैं; वनवासी साक्षी बनकर हर्ष से नहीं, करुणा से अश्रु बहाते हैं।
शततमः सर्गः — Rāma Questions Bharata on Rājadharma (Governance, Counsel, and Public Welfare)
अयोध्याकाण्ड के शततम सर्ग में राम भरत को तपस्वी-वेष में—जटाधारी, वल्कलधारी, अत्यन्त कृश—भूमि पर गिरे हुए, हाथ जोड़े देखते हैं; उनका तेज प्रलयकाल के असह्य सूर्य के समान वर्णित है। राम स्नेहपूर्वक भरत को आलिंगन कर उठाते हैं और फिर ‘कच्चित्’ कहकर बार-बार पूछते हुए दीर्घ प्रश्नोत्तर-रूप उपदेश आरम्भ करते हैं। वे पहले पिता दशरथ की स्थिति, माताओं का कुशल, तथा वसिष्ठ और अन्य पुरोहितों-ब्राह्मणों के सम्मान के विषय में पूछते हैं। इसके बाद राम राज्यधर्म की विस्तृत जाँच करते हैं—योग्य मंत्रियों का चयन, मंत्र-गोपन, सेनापति आदि की उचित नियुक्ति, गुप्तचरों द्वारा समाचार-संग्रह, दण्ड का सम्यक् और अनुपातिक प्रयोग, कोष-व्यय में संयम, दुर्गों की तैयारी, सैनिकों को समय पर वेतन, कृषि और गौ-धन की रक्षा, राजा की प्रजा के लिए सुलभता, तथा निष्पक्ष न्याय। राम नास्तिक कुतर्क से सावधान करते हैं और राजदोषों से बचने की शिक्षा देते हैं, यह बताते हुए कि शास्त्रसम्मत और गोपनीय परामर्श ही विजय का मूल है। इस प्रकार यह सर्ग भ्रातृ-करुणा में निहित एक संक्षिप्त राजधर्म-प्रकरण बनकर अंत में प्रतिपादित करता है कि धर्मयुक्त शासन स्वर्ग-प्राप्ति का कारण होता है।
भरतस्य धर्मनिश्चयः — Bharata Affirms Lineage-Dharma and Urges Rama’s Coronation
इस सर्ग में भरत, राम के वचनों का उत्तर देते हुए स्वयं को दोषी ठहराते हैं कि जब तक ज्येष्ठ भ्राता जीवित हैं, तब तक राज्य स्वीकार करना धर्म से पतन होगा। वे इक्ष्वाकु वंश की सनातन मर्यादा स्मरण कराते हैं—ज्येष्ठ पुत्र के रहते कनिष्ठ का राजा बनना उचित नहीं। इसलिए वे राम से आग्रह करते हैं कि वे उनके साथ समृद्ध अयोध्या लौटें और कुल-कल्याण के लिए राज्याभिषेक स्वीकार करें। भरत राजधर्म का तत्त्व भी बताते हैं—कुछ लोग राजा को केवल मनुष्य मानते हैं, पर जो राजा धर्मानुसार आचरण और नीति से प्रजा का पालन करता है, वह सामान्य सामर्थ्य से ऊपर उठकर ‘दैवत-तुल्य’ माना जाता है। फिर शोक का प्रसंग आता है। भरत कहते हैं कि जब वे केकय में थे और राम सीता-लक्ष्मण सहित वन चले गए, तब यज्ञशील, धर्मात्माओं द्वारा पूजित महाराज दशरथ राम-वियोग के शोक से व्याकुल होकर शीघ्र ही स्वर्ग सिधार गए। वे राम से उठकर पिता को जलांजलि देने का निवेदन करते हैं, क्योंकि प्रिय पुत्र द्वारा किए गए पिण्ड-उदक पितृलोक में अक्षय फल देते हैं। सर्ग का अंत इस बात पर होता है कि दशरथ का अंतिम चित्त राम में ही लगा रहा—विरह और आकांक्षा की पराकाष्ठा ही उनकी मृत्यु बनी।
पितृमरणश्रवणं जलक्रिया च (Hearing of Daśaratha’s death and the libation rites at Mandākinī)
इस सर्ग में शोक का तीव्र आघात और वाणी से कर्म की ओर तत्काल संक्रमण दिखाया गया है। भरत राम को दशरथ के निधन का समाचार देता है; सुनते ही राम मूर्छित हो जाते हैं—मानो कुल्हाड़ी से कटा पुष्पित वृक्ष या वज्राघात से गिरा हुआ। चेतना लौटने पर राम धर्मचिन्तन के साथ अपना दुःख व्यक्त करते हैं—वे सोचते हैं कि बिना राजा के अयोध्या में लौटना कैसे उचित होगा, पिता की अन्त्येष्टि स्वयं न कर पाने का शोक करते हैं, और पूछते हैं कि पिता परलोक चले गए तो अब उन्हें मार्ग कौन दिखाएगा। राम भरत और शत्रुघ्न द्वारा राजा के सम्यक् और्ध्वदेहिक कर्म सम्पन्न करने की सराहना करते हैं। फिर वे सीता और लक्ष्मण को भी यह समाचार बताते हैं; भाइयों में एक साथ करुण विलाप और आँसू बहते हैं। सुमंत्र के मार्गदर्शन में वे पुण्य मन्दाकिनी-तीर्थ जाते हैं, दक्षिण दिशा (यम-दिशा) की ओर मुख करके जलांजलि देते हैं, और दर्भ पर इङ्गुदी के गूदे में बदरीफल मिलाकर पिण्ड-निवाप अर्पित करते हैं। आश्रम के पास रुदन-ध्वनि सुनकर जनसमूह और भरत की सेना दौड़ पड़ती है; पशु-पक्षी भी चौंक उठते हैं—जिससे शोक का सामूहिक और प्रकृति तक फैलता प्रभाव उभरता है। इस प्रकार अध्याय बताता है कि भाव-विह्वलता के बीच भी मर्यादा और धर्मकर्म निभाए जाते हैं।
पिण्डदानदर्शनम् — The Queens Behold Rama’s Śrāddha Offering
वसिष्ठ पैदल ही मन्दाकिनी-तट के तीर्थ की ओर चले और दशरथ की रानियों को, जो राम-दर्शन के लिए व्याकुल थीं, साथ ले गए। वे उस स्नान-स्थान पर पहुँचे जहाँ राम और लक्ष्मण प्रायः आते थे। शोक से क्षीण, आँसुओं से भरी कौसल्या ने वन-किनारे का वह पवित्र स्थान दिखाया जहाँ निर्वासित तीनों को कष्टपूर्वक रहना पड़ा; और राम के लिए जल लाने आदि में लक्ष्मण की निरन्तर सेवा देखकर चाहा कि उसे ऐसे कठोर श्रम से मुक्ति मिले। फिर कौसल्या ने दक्षिणाभिमुख कुश पर रखे इँगुदी-फल के गूदे से बने पिण्ड देखे—राम द्वारा पिता के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध-दान। कभी राजवैभव में रहने वाले दशरथ के लिए यह वन्य अर्पण देखकर वह विलाप करने लगी—देव-तुल्य राजा के लिए ऐसा भोजन कैसे उचित हो, और राम की यह दीन अवस्था से बढ़कर कोई पीड़ा नहीं। “जैसा मनुष्य का अन्न, वैसा ही देवताओं का अन्न” वाली लोकोक्ति उसे यहाँ शोकपूर्ण सत्य-सी लगी। अन्य रानियों ने कौसल्या को ढाढ़स बँधाया और आश्रम में राम को देखा—तेजस्वी, पर मानो स्वर्ग से गिरे देवता-सा। माताएँ रो पड़ीं; राम उठे, उनके चरण छुए, और उन्होंने उसके पीठ की धूल झाड़ी। लक्ष्मण ने भी प्रणाम किया; रानियों ने उसे भी वही मातृस्नेह दिया। सीता दुःखाकुल होकर सासों के चरणों से लिपट गई; कौसल्या ने उसे बेटी की तरह गले लगाकर उसके कष्ट पर शोक किया, उसके मुरझाए मुख का वर्णन उपमाओं से किया और शोक को अरणि से उत्पन्न अग्नि की तरह बताया जो अपने ही आधार को भस्म कर देती है। इसके बाद राम ने वसिष्ठ के चरण पकड़कर उनके पास बैठा; भरत भी हाथ जोड़कर निकट बैठ गया और सभा सोचने लगी कि वह क्या कहेगा। मित्रों से घिरे राम, लक्ष्मण और भरत तीन यज्ञाग्नियों की भाँति, ऋत्विजों से घिरे हुए, शोभायमान थे।
भरतस्य प्रार्थना—रामस्य धर्मोपदेशः (Bharata’s Petition and Rama’s Dharma-Reasoning)
इस सर्ग में उत्तराधिकार, दोष-निर्णय और आज्ञापालन पर एक सुसंगठित संवाद है। लक्ष्मण की उपस्थिति में राम भरत को सांत्वना देकर पूछते हैं कि वे तपस्वी-वेष में क्यों आए हैं। भरत बताते हैं कि राम के वनवास जैसे ‘असंभव कर्म’ के बाद शोक से दशरथ का देहांत हो गया; वे कैकेयी की प्रेरणा की निंदा करते हैं और विधवा रानियों तथा प्रजा को संतुष्ट करने हेतु राम के तत्काल राज्याभिषेक का आग्रह करते हैं। भरत ज्येष्ठाधिकार, जन-समर्थन और मंत्रियों की सहमति का आधार लेकर विनयपूर्वक प्रणाम करते हैं, राम के चरण पकड़कर औपचारिक निवेदन करते हैं। राम भरत की उदात्तता की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि भरत का कोई दोष नहीं; माता के प्रति बालसुलभ दोषारोपण उचित नहीं। वे शास्त्रानुसार बड़ों को पत्नी-पुत्र आदि के विषय में जो अधिकार-स्वातंत्र्य है, उसका स्मरण कराते हैं और पिता की आज्ञा को बाध्यकारी मानते हैं। दशरथ द्वारा सार्वजनिक रूप से किया गया ‘विभाजन’—भरत अयोध्या का शासन करें और राम चौदह वर्ष दंडक वन में रहें—इसे वे प्रमाण मानकर स्वीकारते हैं और व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर धर्म की सर्वोच्चता स्थापित करते हैं।
भरतस्य प्रार्थना—रामस्य कालधर्मोपदेशः (Bharata’s Petition and Rama’s Instruction on Time and Mortality)
सर्ग 105 में चारों भाइयों के चारों ओर सुहृद् जनों के बीच रात भर सामूहिक विलाप होता है। भोर में वे मन्दाकिनी के तट पर जल-क्रिया आदि संस्कार पूर्ण करके फिर एकत्र होते हैं और कुछ क्षण मौन छा जाता है। तब भरत राम से विनय करते हैं—राज्य आपको लौटाने आया हूँ; आपके बिना यह राज्य टिक नहीं सकता; मैं स्वयं इसके योग्य नहीं हूँ। वे अनेक उपमानों से अपनी असमर्थता बताते हैं, विशेषतः उस वृक्ष की उपमा देते हैं जिसे वर्षों सँवारकर पुष्पित तो किया गया, पर फल न लगे—अर्थात् यदि राम राज्य न लें तो दशरथ की दीर्घ आशा निष्फल रह जाएगी। वे अयोध्या की जनभावना भी सामने रखते हैं—श्रेणियाँ और प्रजा राम को सूर्य-सम तेजस्वी रूप में सिंहासन पर देखना चाहती हैं; राजहाथी नाद करेंगे और अन्तःपुर की स्त्रियाँ हर्षित होंगी। राम भरत को सांत्वना देते हुए काल-धर्म का उपदेश करते हैं—मनुष्य का पुरुषार्थ सीमित है, दैव प्राणियों को विपरीत दिशाओं में खींच ले जाता है; संसार के सभी संयोगों का अंत वियोग है—धन क्षय में, ऊँचाई पतन में, मिलन बिछोह में और जीवन मृत्यु में परिणत होता है। पका फल अवश्य गिरता है, दृढ़ भवन भी जीर्ण होते हैं, बीती रातें लौटती नहीं, नदियाँ आगे ही बहती हैं; दिन-रात ग्रीष्म-सूर्य की तरह आयु को सुखा देते हैं। मृत्यु को अविच्छिन्न सहचर बताकर वे कहते हैं कि शोक तत्त्वतः निष्फल है। अंत में राम दृढ़ता से कहते हैं कि वे पिता की आज्ञा के अनुसार वनवास ही करेंगे; भरत अयोध्या लौटकर राजधर्म निभाएँ—ज्ञानी जन किसी भी अवस्था में शोक में नहीं डूबते।
भरतवाक्यं—रामस्य पुनरायोध्यागमननिषेधः (Bharata’s Plea and Rama’s Refusal to Return)
मंदाकिनी तट पर राम के गंभीर वचन के बाद भरत धर्मयुक्त, तर्कपूर्ण और दीर्घ निवेदन करते हैं। वे राम की समता और परामर्शप्रियता की प्रशंसा करते हुए स्वीकार करते हैं कि कैकेयी ने “मेरे लिए” महापाप किया; फिर भी मातृ-धर्म और संबंधों के कारण वे उसे दंड नहीं दे सके। भरत यह भी कहते हैं कि दाशरथ जैसे कुल में जन्मा कोई जान-बूझकर अधर्म कैसे करे; पर “मरणासन्न व्यक्ति मोहग्रस्त हो जाता है” इस लोकोक्ति से वे संकेत करते हैं कि दशरथ का विचलन क्रोध, मोह या प्रमाद से हुआ। भरत राम से आग्रह करते हैं कि पिता की भूल को सुधारना ही सच्चा पुत्रधर्म है, न कि उस भूल का समर्थन। वे माता, बंधु, मित्र, नगर-जनपद की समस्त प्रजा का हित सामने रखकर कहते हैं कि राज्याभिषेक और शासन क्षत्रिय का प्रधान कर्तव्य है, जिससे प्रजा की रक्षा होती है। वे जटा-धारण और वनवास की तपस्या को राजधर्म के विपरीत बताते हुए अनिश्चित भविष्य-धर्म की अपेक्षा तत्काल राज-कर्तव्य को श्रेष्ठ ठहराते हैं और वहीं पुरोहितों व वृद्धों से राम का अभिषेक कराने की प्रार्थना करते हैं। सब लोग भरत के वचन का समर्थन करते हैं, पर राम पिता की आज्ञा में अडिग रहकर अयोध्या लौटने से इंकार कर देते हैं; उपस्थित जन उनके व्रत-स्थैर्य पर शोक और आदर—दोनों से भर उठते हैं।
पितृवाक्यपालनम्, गयाश्रुति-उपदेशः, भरतस्य राज्यग्रहण-निर्देशः (Rama’s Counsel on Vows, the Gaya Śruti, and Bharata’s Return to Rule)
अयोध्याकाण्ड के 107वें सर्ग में स्वजनों द्वारा सम्मानित श्रीराम भरत के पुनः कहे हुए वचनों का उत्तर देते हैं और कैकेयी के पुत्र होने के नाते भरत की धर्मयुक्त स्थिति की सराहना करते हैं। फिर वे कर्तव्य-श्रृंखला स्पष्ट करते हैं—कैकेयी के विवाह के समय दशरथ का पूर्व वचन, देव–असुर संग्राम में सेवा के बाद दिए गए दो वर, और उन्हीं के आधार पर कैकेयी की मांग: भरत के लिए राज्य और राम के लिए वनवास। राम अपने वनवास को प्रतिज्ञा-पालन मानते हैं और भरत से कहते हैं कि शीघ्र राज्याभिषेक स्वीकार कर पिता की सत्यप्रतिष्ठा की रक्षा करो। राम भरत को उपदेश देते हैं—“राजा को ऋण से मुक्त करो”, अर्थात अधूरी प्रतिज्ञा का भार उतारो, और पिता-माता का यथोचित सम्मान करो। पुत्रधर्म को दृढ़ करने हेतु वे गया-सम्बन्धी श्रुति सुनाते हैं—‘पुत्र’ वह है जो ‘पुत्’ नामक नरक से पिता का उद्धार करता है और पितरों की रक्षा करता है; इसलिए अनेक पुत्रों की कामना की जाती है कि कम से कम एक गया में श्राद्धादि करके कुल का उद्धार करे। अंत में शासन-व्यवहार और सान्त्वना देते हुए राम भरत को शत्रुघ्न और द्विजों सहित अयोध्या लौटकर प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश देते हैं। स्वयं वे सीता और लक्ष्मण के साथ दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं—भरत मनुष्यों पर राज्य करें, राम वन में रहें; एक को छत्र की छाया, दूसरे को वृक्षों की छाया, और दोनों सत्य के बंधन से जुड़े रहें।
जाबाल्युपदेशः — Jabali’s Pragmatic Counsel to Rama
इस सर्ग में भरत को सांत्वना देते हुए श्रीराम के पास प्रतिष्ठित ब्राह्मण जाबालि आकर उपदेश देते हैं। वे अत्यन्त व्यावहारिक और लौकिक तर्कों से कहते हैं कि संबंध स्थायी नहीं—मनुष्य अकेला जन्मता है और अकेला ही मरता है; माता-पिता और गृहस्थ-जीवन को वे क्षणिक आश्रय के समान बताते हैं। इसलिए वे राम से आग्रह करते हैं कि पिता के राज्य को छोड़कर कष्टमय, काँटों भरे मार्ग पर टिके न रहें, बल्कि समृद्ध अयोध्या लौटकर अभिषेक स्वीकार करें और राजधर्म तथा राजभोग का पालन करें; अयोध्या अपने स्वामी की प्रतीक्षा कर रही है—ऐसा वे चित्रित करते हैं। आगे जाबालि का तर्क और तीखा हो जाता है। वे अष्टका, श्राद्ध आदि पितृ-तर्पण को निष्फल बताकर उन पर संदेह प्रकट करते हैं और कुछ धर्म-नियमों को समाज में दान और आज्ञापालन उत्पन्न करने के लिए रचे गए उपाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अंत में वे प्रत्यक्ष को ही प्रधान और परोक्ष को गौण मानते हुए, भरत द्वारा अर्पित राज्य को स्वीकार करने के लिए राम पर दबाव डालते हैं—यह बुद्धिमान जनों की सम्मति के अनुरूप और लोक के लिए आदर्श होगा, ऐसा वे कहते हैं।
सत्यधर्मप्रतिपादनम् (Rama’s Defense of Truth and Dharma in Reply to Jabali)
अयोध्याकाण्ड के सर्ग 109 में जाबालि के उस व्यवहारिक परामर्श का, जो राम को लौट आने के लिए प्रेरित करता था, श्रीराम द्वारा दीर्घ नैतिक प्रत्युत्तर वर्णित है। राम पहले जाबालि की सद्भावना स्वीकार करते हैं, पर धर्म और मर्यादा की कसौटी पर उसे अहितकर बताते हैं। वे कहते हैं कि राजधर्म का शाश्वत आधार सत्य और अहिंसा हैं; जगत की स्थिरता सत्य पर टिकी है और ऋषि तथा देव सत्य को सर्वोच्च गुण मानते हैं। राम असत्य को लोक-विरुद्ध और आत्मघातक बताते हुए प्रतिपादित करते हैं कि दान, यज्ञ, तप और यहाँ तक कि वेद भी सत्य-प्रतिष्ठित हैं। फिर वे इसे अपने प्रसंग पर लागू करते हैं—पिता के सामने वनवास की प्रतिज्ञा कर चुके हैं, इसलिए “सत्य-सेतु” को तोड़ना उन्हें स्वीकार नहीं; लोभ, मोह या अज्ञान से प्रेरित होकर वे वचनभंग नहीं करेंगे। वे चेताते हैं कि असत्य-प्रवृत्त चंचल जनों के अर्पण देवता और पितर स्वीकार नहीं करते, और वे सत्पुरुषों के आचरण के अनुरूप वनवास को पुण्य-भार मानकर धारण करते हैं। अंत में (जिसे कुछ परंपराएँ प्रक्षिप्त मानती हैं) नास्तिक तर्क की निंदा का प्रसंग आता है। तब जाबालि स्पष्ट करते हैं कि उनका पूर्व कथन केवल परिस्थिति में समझाने हेतु था; वे आस्तिक भाव की पुनः पुष्टि कर राम को शांत करते हुए हितकारी सलाह की ओर ले जाना चाहते हैं।
लोकसमुत्पत्ति-वर्णनम् तथा इक्ष्वाकुवंश-प्रशंसा (Cosmogony and Ikshvaku Genealogy as Counsel to Rama)
इस सर्ग में क्रोधित श्रीराम को शांत करने हेतु महर्षि वसिष्ठ उपदेश देते हैं। वे जाबालि के पूर्व कथन को नास्तिकता का प्रतिपादन नहीं मानते, बल्कि राम को वन से लौटाने के लिए किया गया व्यावहारिक, प्रेरक तर्क बताते हैं; इसके बाद वे प्रमाणिक धर्मशिक्षा की ओर प्रवृत्त होते हैं। वसिष्ठ संक्षेप में सृष्टि-उत्पत्ति का वर्णन करते हैं—आदि में केवल जल, फिर स्वयम्भू ब्रह्मा का प्रादुर्भाव, और वराहावतार द्वारा पृथ्वी का उद्धार। तत्पश्चात मनु और इक्ष्वाकु से आरम्भ कर अयोध्या के विख्यात राजाओं की वंशपरम्परा का निरूपण करते हैं। यह वंशावली नीति-धर्म का प्रमाण बनती है—इक्ष्वाकु-कुल की मर्यादा में ज्येष्ठ पुत्र का राज्याभिषेक होता है; अतः दशरथ के ज्येष्ठ उत्तराधिकारी राम को राज्य स्वीकार कर प्रजा की रक्षा करनी चाहिए और पूर्वजों के राजधर्म की निरन्तरता बनाए रखनी चाहिए। इस प्रकार सर्ग सृष्टि-स्मृति, वंश-स्मरण और उत्तराधिकार-नियम को जोड़कर बताता है कि राम का राज्यग्रहण कुलधर्म तथा लोककल्याण की रक्षा है।
अयोध्याकाण्डे एकादशोत्तरशततमः सर्गः (Sarga 111: Counsel on Gurus, Parental Debt, and Bharata’s Protest)
इस सर्ग में अधिकार, आज्ञापालन और ऋण-परिशोधन को लेकर सुव्यवस्थित धर्म-विचार होता है। राजपुरोहित एवं गुरु वसिष्ठ राम को स्मरण कराते हैं कि मनुष्य के तीन ‘गुरु’—आचार्य, पिता और माता—हैं; बड़ों तथा सभा की आज्ञा मानना ही सज्जनों के मार्ग की रक्षा करता है। राम उत्तर देते हैं कि पालन-पोषण और स्नेह के लिए माता-पिता का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता, और दशरथ को दिया हुआ वचन असत्य नहीं हो सकता। फिर भरत अत्यन्त व्याकुल होकर कुश बिछवाकर राम की कुटिया के सामने ‘प्रत्युपवेशन’ (धरना देकर लेट जाना) करने को उद्यत होते हैं, ताकि राम लौट आएँ। राम अभिषिक्त राजा के लिए ऐसे विरोध का अनुचित होना बताते हैं, भरत को उठाकर अयोध्या लौटने को कहते हैं; नगरवासी और ग्रामवासी भी स्वीकार करते हैं कि वे पिता की आज्ञा से राम को नहीं रोक सकते। भरत सभा के सामने औपचारिक रूप से कहते हैं कि राज्य-प्रार्थना में उनकी कोई सहभागिता नहीं, और वे स्वयं चौदह वर्ष का वनवास करने को तैयार हैं। भरत की निष्कपटता देखकर राम आश्चर्य करते हैं, दशरथ की पूर्व प्रतिज्ञा की बाध्यता पुनः स्थापित करते हैं और बताते हैं कि वनवास का स्थानापन्न करना धर्म-विरुद्ध और सत्य के प्रतिकूल है; अतः उनका निर्णय धर्म और सत्य के अनुरूप अटल है।
पादुकाप्रदानम् (The Gift of the Sandals and Delegated Kingship)
अयोध्याकाण्ड के इस सर्ग में चित्रकूट पर भाइयों के मिलन के बाद का धर्ममय निश्चय वर्णित है। अदृश्य ऋषिगण इस पवित्र संवाद को देखकर प्रशंसा करते हैं और इसे शुभ तथा भविष्य-सिद्धि का सूचक मानते हैं—यहाँ तक कि रावण-वध की कामना भी संकेतित होती है। काँपते हुए भी दृढ़ भरत, राजधर्म और कुलधर्म का स्मरण कराते हुए राम से राज्य स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। वे अपनी असमर्थता बताते हैं और कहते हैं कि बंधु, वीर और प्रजा सबकी दृष्टि केवल राम पर है। राम स्नेहपूर्वक समझाते हैं कि भरत में स्वाभाविक और शिक्षित बुद्धि है; वे मंत्रियों और हितैषी सलाहकारों से परामर्श करके राज्य चलाएँ और कैकेयी के प्रति क्रोध न रखें। साथ ही राम पिता की प्रतिज्ञा को अटल बताते हैं और असंभव-उदाहरणों से अपने व्रत की दृढ़ता प्रकट करते हैं। तब भरत स्वर्ण-विभूषित पादुकाएँ अर्पित करते हैं। राम उनमें चरण रखकर उन्हें लौटा देते हैं और उन्हें अधिकार का प्रतीक बना देते हैं। भरत प्रतिज्ञा करते हैं कि वे चौदह वर्ष नगर के बाहर तपस्वी-सा रहेंगे और राज्य-प्रशासन पादुकाओं के अधीन रखेंगे; समय पर राम न लौटे तो वे आत्मदाह करेंगे। राम सहमति देकर भरत और शत्रुघ्न को आलिंगन करते हैं, कैकेयी की रक्षा और अनराग का आदेश देते हैं, बड़ों को प्रणाम कर प्रस्थान करते हैं। माताएँ शोक से गला भर आने के कारण विदा नहीं कर पातीं और राम आँसुओं सहित अपनी कुटिया में प्रवेश करते हैं।
पादुकाप्रदानं भरतस्य निवृत्तिश्च (The Sandals Bestowed; Bharata’s Return Toward Ayodhya)
इस सर्ग में संवाद से प्रतीकात्मक शासन की ओर संक्रमण पूर्ण होता है। भरत शत्रुघ्न और मंत्रियों सहित श्रीराम की पादुकाएँ लेकर अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। वसिष्ठ राम से कहते हैं कि अयोध्या के “योगक्षेम” (सुरक्षा और कल्याण) के लिए स्वर्णभूषित पादुकाएँ प्रदान की जाएँ; तब राम पूर्वाभिमुख होकर विधिपूर्वक “राज्य-पालन के हेतु” उन्हें भरत को सौंप देते हैं। भरत दशरथ की चौदह-वर्षीय प्रतिज्ञा को दृढ़ता से दोहराते हुए वनवास की शर्तों को अटल धर्म-वचन मानते हैं। भरद्वाज भरत की सहज कुलीनता की प्रशंसा करते हैं और कहते हैं कि धर्म-गुण उनमें स्वभावतः निवास करता है; ऐसे धर्मात्मा पुत्र के कारण दशरथ मानो आज भी जीवित हैं। इसके बाद सेना रथों, घोड़ों और हाथियों सहित लौटती है; यमुना और गंगा के पार होने तथा शृंगिबेरपुर में प्रवेश का वर्णन आता है। अंत में अयोध्या दिखाई देती है—निस्तब्ध, उदास और शोभाहीन—जिसे देखकर भरत शोक से भरकर सारथी से करुण वचन कहते हैं।
अयोध्याप्रवेशः — Bharata Enters Ayodhya and Perceives the City’s Desolation
इस सर्ग में भरत शीघ्र रथ से अयोध्या में प्रवेश करते हैं। रथ का गम्भीर, शान्तिदायक नाद नगर की गहरी निस्तब्धता के विपरीत सुनाई देता है। फिर उपमाओं की शृंखला से अयोध्या की वीरानी और शोक का चित्र खिंचता है—वह दीपहीन रात्रि-सी, जिसमें बिल्ली और उल्लू विचरते हों; चन्द्र-वियोगिनी रोहिणी-सी; सूखे पर्वतीय नाले, बुझी यज्ञाग्नि और पराजित सेना-सी प्रतीत होती है। आगे नगर को तरंगहीन समुद्र, सोमयाग के बाद सूनी वेदी और वृषभ-विहीन गौ-समूह के समान कहा गया है; साथ ही मणि-टूटे नये मोतीहार, गिरी हुई तारा, दावाग्नि से झुलसी लता, मेघाच्छन्न आकाश और दूषित पान-स्थान जैसी उपमाएँ नगर की शोभा-भंग, तेजो-क्षय और उत्सव-भंग को प्रकट करती हैं। भरत सारथि से पूछते हैं कि अब गीत-वाद्य क्यों नहीं सुनाई देते, पुष्पमालाओं की सुगन्ध, मद्य, चन्दन और अगरु की सुवास क्यों नहीं फैलती, मार्गों की चहल-पहल और उत्सव-गति क्यों थम गई—क्या यह सब राम के वनवास के कारण है। वे निष्कर्ष करते हैं कि अयोध्या की श्री राम के साथ ही चली गई; राम के लौटने पर ही जन-हर्ष पुनः जागेगा। शोकाकुल भरत दशरथ के भवन में प्रवेश करते हैं, जो सिंह-रहित-सा सूना है; और अन्तःपुर को सूर्य-विहीन दिन की भाँति तेजहीन देखकर वे रो पड़ते हैं।
पादुकाभिषेकः — The Consecration of Rama’s Sandals and Bharata’s Trusteeship at Nandigrama
अयोध्या में माताओं को सुरक्षित रखकर भरत शोकाकुल होते हुए भी दृढ़ व्रत के साथ सभाजनों और गुरु वसिष्ठ से नन्दिग्राम जाने की अनुमति माँगते हैं। वे कहते हैं कि राम के बिना राज्य-सुख उन्हें स्वीकार नहीं; राम-वियोग में वे शासन का उपभोग नहीं, बल्कि दुःख के साथ ही निवास करेंगे। मंत्रीगण और वसिष्ठ उनकी भ्रातृभक्ति तथा धर्ममार्ग-निष्ठा की प्रशंसा करते हैं; तब भरत रथ तैयार कराने की आज्ञा देकर शत्रुघ्न सहित, ब्राह्मण आचार्यों के अग्रगमन में प्रस्थान करते हैं। सेना और नगरवासी भी बिना बुलाए उनके पीछे चल पड़ते हैं, जिससे उनके निर्णय के प्रति लोक-समर्थन प्रकट होता है। नन्दिग्राम पहुँचकर भरत राम की स्वर्ण-विभूषित पादुकाएँ सिर पर धारण करते हैं और घोषणा करते हैं कि यह राज्य राम द्वारा उन्हें न्यासरूप में सौंपा गया है—सन्न्यासी-भाव से इसकी रक्षा ही उनका धर्म है। वे पादुकाओं को धर्म के प्रतीक आसन पर प्रतिष्ठित कराते हैं और उनके ऊपर छत्र-चामर आदि राजचिह्न धारण कराने का विधान करते हैं। वे संकल्प लेते हैं कि राम के लौटने तक वे केवल संरक्षक-प्रतिनिधि रहेंगे; राम के आगमन पर अयोध्या और राज्य उन्हें समर्पित कर पुनः सेवक-भाव से रहेंगे। अंत में भरत वल्कलधारी, जटाधारी तपस्वी की भाँति रहते हुए पादुकाओं के अधीन शासन करते हैं और समस्त कार्य-विवरण तथा अर्पण पहले उन्हीं को निवेदित कर शासन को उत्तरदायी न्यास-पालन बना देते हैं।
तपस्विनाम् औत्सुक्यं राक्षसत्रासश्च (Ascetics’ Anxiety and the Fear of Rakshasas)
चित्रकूट के तपोवन में भरत के चले जाने पर श्रीराम ने देखा कि वहाँ रहने वाले तपस्वियों के मन में असामान्य व्याकुलता आ गई है—वे भयभीत हैं, इधर‑उधर चुपके से देखते हैं और धीमे स्वर में परामर्श करते हैं। राम को शंका हुई कि कहीं उनके, लक्ष्मण के या सीता के कारण आश्रम की शांति भंग तो नहीं हुई; अतः उन्होंने विनयपूर्वक कुलपति से कारण पूछा। वृद्ध ऋषि ने सीता के आचरण पर किसी भी प्रकार का दोष न मानते हुए कहा कि राम के आगमन से राक्षसों का वैर और अधिक भड़क उठा है। तपस्वियों ने बताया कि राक्षस विकृत रूप धारण कर आश्रमों पर धावा बोलते हैं, तपस्वियों को मारते‑पीटते हैं, यज्ञ की तैयारी में रखे स्रुव‑पात्र आदि बिखेर देते हैं, अग्नि पर जल डालकर उसे बुझा देते हैं और कलश‑घट तोड़ देते हैं। उन्होंने जनस्थान के निकट रहने वाले रावण के भाई खर का नाम लिया, जो तपस्वियों को उखाड़ फेंकने में कुख्यात है और राम को सहन नहीं करेगा। इसलिए मुनिगण ने निश्चय किया कि यहाँ रहना उनके और राजदम्पति—दोनों के लिए संकटकारी है; वे पास ही के फलसमृद्ध वन में स्थित अपने पुराने आश्रय को चले जाएँगे और राम से भी साथ चलने का अनुरोध किया। राम केवल वचनों से उन्हें रोक न सके; वे कुछ दूर तक साथ गए, प्रणाम कर उनकी अनुमति और उपदेश ग्रहण किया और फिर अपने पवित्र आश्रम लौट आए—तपस्वियों के चले जाने पर भी अडिग भाव से स्थित रहे।
अत्र्याश्रमगमनम् तथा अनसूयोपदेशः (Arrival at Atri’s Hermitage and Anasuya’s Counsel)
तपस्वियों के चले जाने पर श्रीराम उस स्थान पर आगे ठहरना उचित नहीं समझते। भरत, रानियों और अयोध्यावासियों की स्मृतियाँ मन को व्याकुल करती हैं, और भरत की सेना के पड़ाव से घोड़ों-हाथियों आदि के कारण भूमि भी दूषित हो गई थी। इसलिए राम सीता और लक्ष्मण के साथ वहाँ से प्रस्थान कर भगवान् अत्रि के आश्रम पहुँचते हैं। राम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं। अत्रि उन्हें पुत्रवत् स्नेह से ग्रहण कर आदर्श आतिथ्य करते हैं और लक्ष्मण तथा सीता को भी सांत्वना देते हैं। फिर वे अपनी वृद्धा पत्नी, कठोर तप से प्रसिद्ध तपस्विनी अनसूया को बुलाते हैं—जिनके लोकहितकारी तपोबल की महिमा (अन्न-समृद्धि कराना, गंगा-प्रवाह का कारण बनना, विघ्नों का निवारण, तथा देवकार्य हेतु काल-परिवर्तन-सम तप) प्रसिद्ध है—और सीता को उनके पास जाने को कहते हैं। सीता अनसूया की प्रदक्षिणा कर प्रणाम करती हैं, उनके अत्यन्त वृद्ध और काँपते शरीर को देखकर कुशल-क्षेम पूछती हैं। सीता के धर्माचरण से प्रसन्न अनसूया, राम के साथ वनकष्ट सहकर चलने के निर्णय की प्रशंसा करती हैं और पतिव्रता-धर्म का उपदेश देती हैं—सज्जन स्त्री के लिए पति ही परम आश्रय और देवतुल्य है; निष्ठा से कीर्ति और पुण्य मिलता है, जबकि असंयमित कामना पतन और अपकीर्ति का कारण बनती है। इस प्रकार सर्ग में यात्रा-वृत्त, सत्कार-विधि, तपोमहिमा और सीता के लिए नीति-उपदेश का समन्वय है।
अनसूयोपदेशः तथा सीताया स्वयंवरकथा (Anasuya’s Counsel and Sita’s Swayamvara Narrative)
वन-आश्रम में अतिथि-सत्कार और पूजन के बीच अनसूया देवी वैदेही सीता को धर्म का उपदेश देती हैं। सीता विनयपूर्वक कहती हैं कि पति ही स्त्री के गुरु हैं और पतिशुश्रूषा स्त्रियों का प्रधान तप है। सावित्री के पतिव्रत से स्वर्गीय गौरव और रोहिणी का चन्द्रमा से अवियोग—ऐसे दृष्टान्तों द्वारा अटल दाम्पत्य-व्रत की महिमा प्रतिपादित होती है। अनसूया प्रसन्न होकर सीता को दिव्य अलंकार देती हैं—माला, वस्त्र, आभूषण, सुगन्धित अनुलेपन और श्रेष्ठ लेप—जो न मुरझाते हैं, सदा नवीन और सर्वकाल उपयुक्त रहते हैं। वे सीता के सौन्दर्य को श्रीलक्ष्मी द्वारा विष्णु की शोभा-वृद्धि के समान मानकर दाम्पत्य-सामंजस्य को पावन ठहराती हैं। फिर अनसूया सीता से उनके जन्म और विवाह का वृत्तान्त पूछती हैं। सीता बताती हैं कि जनक के यज्ञ-क्षेत्र में हल चलाते समय वे पृथ्वी से अयोनिजा प्रकट हुईं, रानी ने उन्हें अपनाकर पाला। योग्य वर की चिंता से जनक ने वरुण के भारी दिव्य धनुष को केन्द्र बनाकर स्वयंवर रचा; अनेक राजा उसे उठा भी न सके। बाद में विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण आए; राम ने क्षणभर में धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे तोड़ दिया। सत्यप्रतिज्ञ जनक ने सीता को राम को देने का निश्चय किया, पर राम ने दशरथ की अनुमति तक ठहरना उचित समझा। पिता की सम्मति से विधिपूर्वक विवाह सम्पन्न हुआ और सीता ने राम के प्रति अपनी धर्ममयी पतिव्रता भक्ति प्रकट की।
अनसूयाप्रीतिदानम् — Anasūyā’s Blessing and the Forest Path
इस सर्ग में अनसूया-प्रसंग का समापन होकर दल का वन में आगे बढ़ना वर्णित है। सीता के मधुर, विस्तारपूर्ण वचन—विशेषतः स्वयंवर का वृत्तान्त—सुनकर अनसूया मातृवत्सल होकर सीता के ललाट का चुम्बन करती हैं और आलिंगन देती हैं। फिर प्रस्थान की अनुमति देकर वे चाहती हैं कि सीता उनके सामने ही सुसज्जित हों; प्रीति-दान के रूप में वे दिव्य वस्त्र और आभूषण प्रदान करती हैं। दिव्य कन्या-सी दीप्तिमती सीता प्रणाम कर राम के पास जाती हैं; उस दुर्लभ सम्मान को देखकर राम और लक्ष्मण हर्षित होते हैं। इसके बाद संध्या से रात्रि तक का काव्यमय दृश्य आता है—सूर्यास्त, पक्षियों का नीड़ों में लौटना, कलश लिए मुनियों का स्नान से लौटना, अग्निहोत्र का धुआँ, वन का गाढ़ा होता अंधकार, रात्रिचरों की चेष्टाएँ और ताराओं के बीच चन्द्रमा का उदय। सिद्ध तपस्वियों के आतिथ्य में पवित्र रात्रि बिताकर प्रभात में राम-लक्ष्मण विदा लेते हैं। वनवासी ब्राह्मण-तपस्वी उन्हें नरभक्षी, रूप बदलने वाले राक्षसों और रक्तपायी हिंसक प्राणियों से सावधान करते हैं तथा फल-संग्रह हेतु ऋषियों द्वारा प्रयुक्त सुरक्षित मार्ग बताते हैं। तपस्वियों के आशीर्वाद से युक्त राम, सीता और लक्ष्मण सहित, घने वन में ऐसे प्रवेश करते हैं जैसे मेघसमूह में सूर्य।
Ayodhya Kanda centers on vacana-dharma (the ethics of keeping one’s word) and rājadhrama (kingship as moral constraint). Daśaratha’s earlier boons bind him to a course he abhors, demonstrating that royal authority is not merely power but accountability to truth and public trust. Rāma’s response elevates obedience from passive submission to an active ethical choice: he treats the father’s command as a dharmic imperative that prevents social fracture, even at personal cost. The book also explores companionate duty (Sītā’s insistence on shared exile) and political integrity (Bharata’s refusal to benefit from wrongdoing), framing legitimacy as rooted in self-restraint rather than possession of the throne.
Key episodes include: (1) announcement and preparations for Rāma’s consecration; (2) Mantharā’s incitement of Kaikeyī; (3) Kaikeyī’s demand for Bharata’s kingship and Rāma’s exile; (4) Daśaratha’s grief and compelled consent; (5) Rāma’s acceptance, Sītā’s decision to accompany him, and Lakṣmaṇa’s resolve to follow; (6) public lament and ominous portents; (7) departure from Ayodhyā and travel via Tamasā and Gaṅgā with Guha’s help; (8) visit to Bharadvāja and settlement at Citrakūṭa; (9) Daśaratha’s remorse, confession of past sin, and death; (10) Bharata’s return, denunciation of Kaikeyī, funeral rites, refusal of the throne, and journey to bring Rāma back with coronation materials.
The principal figures are Rāma (ideal heir who chooses exile as duty), Sītā (insists on accompanying her husband), Lakṣmaṇa (protective brother whose anger is disciplined by Rāma’s dharma), Daśaratha (tragic king bound by boons), Kaikeyī (queen who activates the boons), and Mantharā (catalyst of the crisis). Supporting but pivotal roles are played by Sumantra (escort and moral witness), Vasiṣṭha (ritual-political stabilizer after the king’s death), Bharata (refuses usurpation and seeks Rāma), Śatrughna (Bharata’s ally), Guha (Niṣāda host and guide), and Bharadvāja (sage who legitimizes the forest route).
Ayodhya Kanda provides the causal bridge between the youthful heroics of Bālakāṇḍa and the wilderness-centered conflict of Araṇyakāṇḍa. It relocates the epic from courtly promise to ascetic trial, converting Rāma’s princely excellence into a sustained ethical experiment under deprivation. Politically, it explains the succession crisis that later motivates Bharata’s regency and shapes Ayodhyā’s stance during Rāma’s absence. Thematically, it establishes the Ramayana’s central claim that dharma is tested most severely when it conflicts with personal happiness and immediate justice.
The kanda teaches: (1) integrity of speech and promise-keeping as social foundations; (2) leadership through forbearance—refusing retaliatory violence even under provocation; (3) ethical companionship—Sītā’s model of shared duty and courage; (4) legitimacy through renunciation—Bharata’s refusal to profit from injustice; and (5) the inevitability of moral consequence—Daśaratha’s remorse and death underscore that unrighteous outcomes, even when legally compelled, exact psychological and karmic cost.
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