Ramayana Ayodhya Kanda Sarga 37
Ayodhya KandaSarga 3737 Verses

Sarga 37

अयोध्याकाण्डे सर्गः ३७ — चीरधारणं, सीतासंकल्पः, वसिष्ठोपदेशः (Bark-Robe Episode and Vasistha’s Admonition)

अयोध्याकाण्ड

अयोध्याकाण्ड के सैंतीसवें सर्ग में राजसी जीवन से तपस्वी अनुशासन की ओर निर्वासन का प्रत्यक्ष रूपान्तरण ‘चीर’ धारण के विधिवत् प्रसंग से दिखाया गया है। मंत्रियों की बात सुनकर श्रीराम दशरथ से विनयपूर्वक कहते हैं कि उन्होंने भोग और आसक्ति का त्याग कर दिया है; उन्हें न अनुचर चाहिए, न सैन्य-प्रदर्शन—वनवास के लिए केवल न्यूनतम आवश्यक वस्तुएँ ही पर्याप्त हैं। कैकेयी निर्लज्ज होकर सभा में चीर-वस्त्र निकालती है और उन्हें पहनने की आज्ञा देती है; राम और लक्ष्मण अपने उत्तम वस्त्र उतारकर मुनिवेष धारण कर लेते हैं। सीता रेशमी वस्त्रों में ही रहती हैं; चीर देखकर संकोच करती हैं। कैकेयी उन्हें कुश-तंतु के वस्त्र देती है; सीता आँसू और लज्जा के साथ पहनने का प्रयास करती हैं, पर अनभ्यस्त होने से पूछती हैं कि वनवासी ऋषि ऐसे वस्त्र कैसे धारण करते हैं। तब श्रीराम स्वयं उनके रेशम के ऊपर चीर बाँध देते हैं; यह देखकर अन्तःपुर की स्त्रियाँ विलाप करती हैं और प्रार्थना करती हैं कि सीता को वन-कष्ट के लिए बाध्य न किया जाए। इसी बीच वसिष्ठ आकर कैकेयी को मर्यादा-भंग और छल के लिए फटकारते हैं। वे कहते हैं कि सीता का जाना आवश्यक नहीं; वे तो राम के सिंहासन पर बैठने योग्य हैं। वे चेतावनी देते हैं कि यदि सीता को बलपूर्वक भेजा गया, तो नगर और राज्य राम के साथ चल देंगे और कैकेयी को रिक्त भूमि पर शासन करना पड़ेगा। गुरु के इस उपदेश के बाद भी सीता अडिग रहती हैं—प्रिय पति की सेवा और सहधर्म-पालन के लिए स्वेच्छा से तपस्विनी जीवन स्वीकार करती हैं; यही सर्ग का धर्म-संदेश है।

Shlokas

Verse 1

महामात्रवचः श्रुत्वा रामो दशरथं तदा।अभ्यभाषत वाक्यं तु विनयज्ञो विनीतवत्।।2.37.1।।

मंत्री के वचन सुनकर, मर्यादा-निपुण राम ने तब दशरथ से विनीत भाव से नम्र वाणी में कहा।

Verse 2

त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवतः।किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वतः।।2.37.2।।

हे राजन्! जब मैंने भोगों का त्याग कर दिया है, वन में वन्य आहार से जीवन बिताना है, और सर्वथा आसक्ति छोड़ दी है—तो मेरे पीछे किसी दल के चलने की क्या आवश्यकता है?

Verse 3

यो हि दत्त्वा द्विपश्रेष्ठं कक्ष्यायां कुरुते मनः।रज्जुस्नेहेन किं तस्य त्यजतः कुञ्जरोत्तमम्।।2.37.3।।

जो पुरुष श्रेष्ठ हाथी को दान देकर भी उसकी कक्ष्या में बँधी रस्सी पर मन लगाए रखता है, उसने जब उत्तम गजराज को ही त्याग दिया, तो उस रस्सी के मोह से उसे क्या लाभ?

Verse 4

तथा मम सतां श्रेष्ठ किं ध्वजिन्या जगत्पते।सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवाऽनयन्तु मे।।2.37.4।।

हे सत्पुरुषों में श्रेष्ठ, हे जगत्पते! मुझे सेना का क्या प्रयोजन? मैं सब कुछ (भरत के लिए) छोड़ता हूँ; मेरे लिए केवल वल्कल-वस्त्र ही लाए जाएँ।

Verse 5

खनित्रपिटके चोभे समानयत गच्छतः।चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वसतो मम।।2.37.5।।

मैं चौदह वर्ष वन में निवास करने को जा रहा हूँ; जाते समय वे दोनों वस्तुएँ भी लाओ—एक खनित्र (खोदने का औज़ार) और एक पिटक (टोकरी)।

Verse 6

अथ चीराणि कैकेयी स्वयमाहृत्य राघवम्।उवाच परिधत्स्वेति जनौघे निरपत्रपा।।2.37.6।।

तब कैकेयी ने स्वयं वल्कल-वस्त्र लाकर, जनसमूह के सामने निर्लज्ज होकर राघव से कहा—“इन्हें धारण करो।”

Verse 7

स चीरे पुरुषव्याघ्रः कैकेय्या प्रतिगृह्य ते।सूक्ष्मवस्त्रमवक्षिप्य मुनिवस्त्राण्यवस्त ह।।2.37.7।।

पुरुषसिंह राम ने कैकेयी से वे चीर-वस्त्र ग्रहण किए; अपने सूक्ष्म (मृदु) वस्त्र उतारकर उन्होंने मुनि-परिधान धारण किया।

Verse 8

लक्ष्मणश्चापि तत्रैव विहाय वसने शुभे।तापसाच्छादने चैव जग्राह पितुरग्रतः।।2.37.8।।

लक्ष्मण ने भी वहीं अपने शुभ वस्त्र त्याग दिए और पिता के सामने तपस्वी का आच्छादन (चीर) ग्रहण किया।

Verse 9

अथाऽत्मपरिधानार्थं सीता कौशेयवासिनी।समीक्ष्य चीरं सन्त्रस्ता पृषती वागुरामिव।।2.37.9।।

तब रेशमी वस्त्र पहने हुई सीता ने अपने परिधान हेतु रखे चीर को देखा और भय से सिमट गई—जैसे शिकारी के फंदे को देखकर हरिणी चौंक उठती है।

Verse 10

सा व्यपत्रपमाणेव प्रगृह्य च सुदुर्मनाः।कैकेयी कुशचीरे ते जानकी शुभलक्षणा।।2.37.10।।अश्रुसम्पूर्ण नेत्रा च धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी।गन्धर्वराजप्रतिमं भर्तारमिदमब्रवीत्।।2.37.11।।

शुभ-लक्षणा जानकी अत्यन्त दुःखी और मानो लज्जित होकर कैकेयी से वे कुश-छाल के वस्त्र लेकर, आँसुओं से भरी आँखों वाली, धर्म को जानने और धर्म का दर्शन करने वाली, गन्धर्वराज के समान तेजस्वी अपने पति से यह बोली।

Verse 11

सा व्यपत्रपमाणेव प्रगृह्य च सुदुर्मनाः।कैकेयी कुशचीरे ते जानकी शुभलक्षणा।।2.37.10।।अश्रुसम्पूर्ण नेत्रा च धर्मज्ञा धर्मदर्शिनी।गन्धर्वराजप्रतिमं भर्तारमिदमब्रवीत्।।2.37.11।।

शुभ-लक्षणा जानकी अत्यन्त दुःखी और मानो लज्जित होकर कैकेयी से वे कुश-छाल के वस्त्र लेकर, आँसुओं से भरी आँखों वाली, धर्म को जानने और धर्म का दर्शन करने वाली, गन्धर्वराज के समान तेजस्वी अपने पति से यह बोली।

Verse 12

कथं नु चीरं बध्नन्ति मुनयो वनवासिनः।इति ह्यकुशला सीता सा मुमोह मुहुर्मुहुः।।2.37.12।।

“वन में रहने वाले मुनि छाल-वस्त्र को कैसे बाँधते हैं?”—ऐसा कहकर, उस वेश में अकुशल सीता बार-बार मोह में पड़ गई।

Verse 13

कृत्वा कण्ठे च सा चीरमेकमादाय पाणिना।तस्थौ ह्यकुशला तत्र व्रीडिता जनकात्मजा।।2.37.13।।

जनकनन्दिनी सीता, उस वेश में अकुशल और लज्जित होकर, छाल-वस्त्र का एक छोर कण्ठ पर रखकर दूसरा हाथ में पकड़े वहीं खड़ी रह गई।

Verse 14

तस्यास्तत्क्षिप्रमागम्य रामो धर्मभृतां वरः।चीरं बबन्ध सीतायाः कौशेयस्योपरि स्वयम्।।2.37.14।।

धर्मधारियों में श्रेष्ठ राम तुरंत उसके पास आए और स्वयं सीता के रेशमी वस्त्र के ऊपर छाल-वस्त्र बाँध दिया।

Verse 15

रामं प्रेक्ष्य तु सीताया बध्नन्तं चीरमुत्तमम्।अन्तःपुरगता नार्यो मुमुचुर्वारि नेत्रजम्।।2.37.15।।

अन्तःपुर की स्त्रियों ने जब राम को सीता पर उत्तम वल्कल-वस्त्र बाँधते देखा, तो उनके नेत्रों से आँसुओं की धारा बह निकली।

Verse 16

ऊचुश्च परमायस्ता रामं ज्वलिततेजसम्।वत्स नैवं नियुक्तेयं वनवासे मनस्विनी।।2.37.16।।

अत्यन्त व्याकुल होकर वे ज्वलन्त तेजस्वी राम से बोलीं— “वत्स! यह उच्च-मन वाली सीता इस प्रकार वनवास के लिए नियुक्त नहीं है।”

Verse 17

पितुर्वाक्यानुरोधेन गतस्य विजनं वनम्।तावद्दर्शनमस्या नः सफलं भवतु प्रभो।।2.37.17।।

हे प्रभो! पिता की आज्ञा का पालन कर आप निर्जन वन को जा रहे हैं; तब तक हमें इसका दर्शन सफल हो—अर्थात् तब तक हमें सीता का सान्निध्य प्राप्त हो।

Verse 18

लक्ष्मणेन सहायेन वनं गच्छस्व पुत्रक।नेयमर्हति कल्याणी वस्तुं तापसवद्वने।।2.37.18।।

पुत्रक! लक्ष्मण को सहायक बनाकर आप वन को जाइए; पर यह कल्याणी सीता तपस्विनी की भाँति वन में रहने योग्य नहीं है।

Verse 19

कुरु नो याचनां पुत्र सीता तिष्ठतु भामिनी।धर्मनित्यस्स्वयं स्थातुं न हीदानीं त्वमिच्छसि।।2.37.19।।

पुत्र! हमारी याचना स्वीकार करो—यह सुन्दरी सीता यहीं ठहर जाए। तुम तो धर्म में नित्य स्थित हो; अपने लिए अब यहाँ रुकना नहीं चाहते।

Verse 20

तासामेवंविधा वाच शृण्वन् दशरथात्मजः।बबन्धैव तदा चीरं सीतया तुल्यशीलया।।2.37.20।।

उनकी ऐसी वाणी सुनते हुए भी दशरथनन्दन राम ने तब सीता—जो स्वभाव में उनके समान थीं—को मुनियों का चीर-वस्त्र बाँध दिया।

Verse 21

चीरे गृहीते तु तया समीक्ष्य नृपतेर्गुरुः।निवार्य सीतां कैकेयीं वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्।।2.37.21।।

सीता के चीर-वस्त्र ग्रहण कर लेने को देखकर राजा के गुरु वसिष्ठ ने सीता को रोककर कैकेयी से ये वचन कहे।

Verse 22

अतिप्रवृत्ते दुर्मेधे कैकेयि कुलपांसनि।वञ्चयित्वा च राजानं न प्रमाणेऽवतिष्ठसे।।2.37.22।।

अति सीमा लाँघ चुकी, दुष्टबुद्धि कैकेयी! कुल-कलंक! राजा को छलकर तू धर्म-प्रमाण में स्थिर नहीं रहती।

Verse 23

न गन्तव्यं वनं देव्या सीतया शीलवर्जिते।अनुष्ठास्यति रामस्य सीता प्रकृतमासनम्।।2.37.23।।

शीलहीन कैकेयी! देवी सीता को वन जाना नहीं चाहिए। राम के लिए जो मूल सिंहासन नियत था, उसी पर सीता विराजेगी।

Verse 24

आत्मा हि दारास्सर्वेषां दारसङ्ग्रहवर्तिनाम्।आत्मेयमिति रामस्य पालयिष्यति मेदिनीम्।।2.37.24।।

गृहस्थ-धर्म में स्थित सबके लिए पत्नी ही आत्मा है। ‘यह राम की आत्मा है’—ऐसी सीता पृथ्वी का पालन करेगी।

Verse 25

अथ यास्यति वैदेही वनं रामेण सङ्गता।वयमप्यनुयास्यामः पुरं चेदं गमिष्यति।।2.37.25।।

यदि वैदेही सीता राम के साथ वन को जाएगी, तो हम भी उसके पीछे चलेंगे; और यह पूरा नगर भी साथ ही चल पड़ेगा।

Verse 26

अन्तपालाश्च यास्यन्ति सदारो यत्र राघवः।सहोपजीव्यं राष्ट्रं च पुरं च सपरिच्छदम्।।2.37.26।।

जहाँ पत्नी सहित राघव जाएंगे, वहाँ अन्तःपुर के रक्षक भी जाएंगे; और जिनका जीवन-निर्वाह उन्हीं पर है वह राज्य तथा साज-सामान और सेवक-समेत यह नगर भी उनके पीछे चलेगा।

Verse 27

भरतश्च सशत्रुघ्नश्चीरवासा वनेचरः।वने वसन्तं काकुत्स्थ मनुवत्स्यति पूर्वजम्।।2.37.27।।

और भरत भी शत्रुघ्न के साथ, वल्कल-वस्त्र धारण कर वनचारी बनकर, वन में निवास करने वाले काकुत्स्थ-वंशी अपने अग्रज राम का अनुसरण करेगा।

Verse 28

तत श्शून्यां गतजनां वसुधां पादपै स्सह।त्वमेका शाधि दुर्वृत्ता प्रजानामहिते स्थिता।।2.37.28।।

तब प्रजाजन-रहित, केवल वृक्षों से भरी इस सूनी धरती पर—प्रजाओं के अहित में लगी अपनी दुष्ट वृत्ति के कारण—तू अकेली ही शासन कर।

Verse 29

न हि तद्भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः।तद्वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति।।2.37.29।।

जहाँ राम राजा नहीं हैं, वह देश वास्तव में राज्य नहीं; और जहाँ राम निवास करेंगे, वही वन भी राज्य बन जाएगा।

Verse 30

न ह्यदत्तां महीं पित्रा भरतः शास्तुमर्हति।त्वयि वा पुत्रवद्वस्तुं यदि जातो महीपतेः।।2.37.30।।

पिता द्वारा न दी गई पृथ्वी पर भरत को शासन करने का अधिकार नहीं; और यदि वह सचमुच महाराज का पुत्र है, तो उसे तुम्हारे साथ पुत्रवत् रहना भी उचित नहीं।

Verse 31

यद्यपि त्वं क्षितितलाद्गगनं चोत्पतिष्यसि।पितृर्वंशचरित्रज्ञः सोऽन्यथा न करिष्यति।।2.37.31।।

यदि तुम पृथ्वी से उछलकर आकाश में भी जा सको, तब भी पितृवंश की मर्यादा और आचरण को जानने वाले भरत अन्यथा आचरण नहीं करेंगे।

Verse 32

तत्त्वया पुत्रगर्धिन्या पुत्रस्य कृतमप्रियम्।लोके हि स न विद्येत यो न राममनुव्रतः।।2.37.32।।

पुत्र-लोभ से अंधी होकर तुमने अपने ही पुत्र के लिए अप्रिय कार्य किया है; क्योंकि इस लोक में ऐसा कोई नहीं जो श्रीराम का अनुगामी न हो।

Verse 33

द्रक्ष्यस्यद्यैव कैकेयी पशुव्यालमृगद्विजान्।गच्छतस्सह रामेण पादपांश्च तदुन्मुखान्।।2.37.33।।

हे कैकेयी! आज ही तुम देखोगी कि राम के साथ जाते हुए पशु, सर्प, मृग, पक्षी—यहाँ तक कि वृक्ष भी—उनकी ओर मुख करके उनके पीछे-पीछे चल पड़ेंगे।

Verse 34

अथोत्तमान्याभरणानि देविदेहि स्नुषायै व्यपनीय चीरम्।न चीरमस्याः प्रविधीयतेतिन्यवारयत्तद्वसनं वसिष्टः।।2.37.34।।

तब वसिष्ठ ने कहा—“देवि! चीर हटाकर अपनी स्नुषा को उत्तम आभूषण दो; उसके लिए चीर का विधान नहीं है।” ऐसा कहकर वसिष्ठ ने उसे वह वस्त्र धारण करने से रोक दिया।

Verse 35

एकस्य रामस्य वने निवासस्त्वया वृतःकेकयराजपुत्री।विभूषितेयं प्रतिकर्मनित्या वसत्वरण्ये सह राघवेण।।2.37.35।।

हे केकयराजकुमारी! तुमने केवल राम के लिए वनवास माँगा था; इसलिए यह सदा श्रृंगार में रहने वाली, अलंकृत सीता भी राघव के साथ वन में रहे—और सुशोभित ही रहे।

Verse 36

यानैश्च मुख्यैः परिचारकैश्चसुसंवृता गच्छतु राजपुत्री।वस्त्रैश्च सर्वैस्सहितैर्विधानैर्नेयं वृता ते वरसम्प्रदाने।।2.37.36।।

श्रेष्ठ वाहनों और सेवकों से घिरी हुई राजकुमारी जाए; वस्त्रों और समस्त आवश्यक सामग्री सहित उसे ले जाया जाए। पर वर माँगते समय तुमने अपने वरदान-याचन में उसे (सीता को) सम्मिलित नहीं किया था।

Verse 37

तस्मिंस्तथा जल्पति विप्रमुख्येगुरौ नृपस्याप्रतिमप्रभावे।नैव स्म सीता विनिवृत्तभावाप्रियस्य भर्तुः प्रतिकारकामा।।2.37.37।।

राजा के गुरु, अप्रतिम प्रभाव वाले उस श्रेष्ठ ब्राह्मण (वसिष्ठ) के ऐसा कहने पर भी सीता अपने निश्चय से नहीं डिगी; वह अपने प्रिय पति के साथ जाने और उसकी सेवा करने की ही अभिलाषी थी।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether exile’s austerity applies only to Rāma or must also encompass Sītā; it is dramatized through cīra-dhāraṇa, where Kaikeyī attempts to impose bark garments on Sītā, while others argue she is not bound by the boon-terms.

Dharma is shown as lived discipline: Rāma’s renunciation is practical (minimal needs, no retinue), and Sītā’s resolve expresses sāhacaraya-dharma (chosen companionship in hardship). Vasiṣṭha’s protest frames a counter-dharma of justice and social order, revealing how competing righteous claims are negotiated through counsel and conscience.

The cultural landmark is the Ayodhyā court and inner apartments as a public-ethical stage; materially, ascetic culture is signaled by bark/kuśa garments and simple tools (basket, crowbar), mapping the transition from palace luxury (silk, ornaments) to forest subsistence.

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