Ramayana Ayodhya Kanda Sarga 7
Ayodhya KandaSarga 736 Verses

Sarga 7

मन्थराप्रवेशः — Manthara Observes Ayodhya and Incites Kaikeyi

अयोध्याकाण्ड

अयोध्याकाण्ड के सातवें सर्ग में जन-उत्सव से गुप्त षड्यंत्र की ओर कथा का निर्णायक मोड़ आता है। कैकेयी की पुरानी दासी मन्थरा चाँदनी से उज्ज्वल महल की छत पर चढ़कर अयोध्या को देखती है—मार्गों पर जल छिड़का गया है, पुष्प बिखरे हैं, ध्वज फहर रहे हैं; मंदिरों में वेद-घोष और वाद्यों का निनाद है, और प्रजा आनंदित है। वह पास की धात्री से कारण पूछती है; धात्री हर्ष से बताती है कि राजा दशरथ कल पुष्य नक्षत्र में निष्कलंक राम का युवराज के रूप में अभिषेक करेंगे। यह सुनते ही मन्थरा क्रोध से भर उठती है। वह कैलास-सदृश प्रासाद से उतरकर विश्राम में पड़ी कैकेयी के पास जाती है और भय-आधारित वाणी से उसे विचलित करने लगती है—आसन्न संकट, भाग्य की चंचलता और राज-नीति के छल का आरोप लगाकर रामाभिषेक को कैकेयी तथा भरत के विनाश के रूप में प्रस्तुत करती है। कैकेयी पहले चिंतित होती है, फिर राम के अभिषेक की बात सुनकर प्रसन्न हो उठती है और “शुभ समाचार” के लिए मन्थरा को आभूषण भी देती है—जिससे स्पष्ट होता है कि आरंभ में उसके मन में राम और भरत के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी। सर्ग का संदेश यह है कि वाणी (वाक्) राजनीति का तीक्ष्ण उपकरण है; सार्वजनिक धर्म-उत्सव भी निजी प्रेरणा और भय-रचित कथा से पलटे जा सकते हैं।

Shlokas

Verse 1

ज्ञातिदासी यतो जाता कैकेय्यास्तु सहोषिता।प्रासादं चन्द्रसङ्काशमारुरोह यदृच्छया।।।।

मन्थरा, जो कैकेयी की कुल-दासी थी और उसके जन्म से ही उसके साथ रहती आई थी, संयोगवश चन्द्रमा-सा दीप्तिमान प्रासाद पर चढ़ गई।

Verse 2

सिक्तराजपथां कृत्स्नां प्रकीर्णकुसुमोत्कराम्।अयोध्यां मन्थरा तस्मात्प्रासादादन्ववैक्षत।।।।

तब उस प्रासाद से मन्थरा ने बाहर दृष्टि डाली और समूची अयोध्या को देखा—राजमार्ग जल से सिंचे हुए थे, पुष्प-राशियाँ बिखरी थीं, और नगर उत्सव-वैभव से सुसज्जित था।

Verse 3

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृताम्।वृतां छन्दपथैश्चापि शिरस्स्नातजनैर्वृताम्।।।।माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम्।शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनिस्वनाम्।।।।सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषाभिनादिताम्।प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम्।।।।प्रहृष्टमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम्।अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता।।।।

मन्थरा ने अयोध्या को देखा—बहुमूल्य पताकाओं और ध्वजों से सुसज्जित, घुमावदार मार्गों से घिरी हुई, स्नान करके शुद्ध हुए जनसमूह से भरी हुई। माला और मोदक हाथों में लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों के वेदघोष से वह गूँज रही थी; श्वेत देवालयों के द्वार दमक रहे थे और सब प्रकार के वाद्यों का निनाद फैल रहा था। हर्षित जनसमुदाय से नगर भर गया था; उत्तम हाथी-घोड़े उत्साह से उछल रहे थे; गौएँ और वृषभ रंभा-नाद कर रहे थे। ऐसे उल्लसित पौरों से शोभित अयोध्या को देखकर मन्थरा अत्यन्त विस्मित हो उठी।

Verse 4

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृताम्।वृतां छन्दपथैश्चापि शिरस्स्नातजनैर्वृताम्।।2.7.3।।माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम्।शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनिस्वनाम्।।2.7.4।।सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषाभिनादिताम्।प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम्।।2.7.5।।प्रहृष्टमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम्।अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता।।2.7.6।।

मन्थरा ने अयोध्या को देखा—बहुमूल्य पताकाओं और ध्वजों से सुसज्जित, घुमावदार मार्गों से घिरी हुई, स्नान करके शुद्ध हुए जनसमूह से भरी हुई। माला और मोदक हाथों में लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों के वेदघोष से वह गूँज रही थी; श्वेत देवालयों के द्वार दमक रहे थे और सब प्रकार के वाद्यों का निनाद फैल रहा था। हर्षित जनसमुदाय से नगर भर गया था; उत्तम हाथी-घोड़े उत्साह से उछल रहे थे; गौएँ और वृषभ रंभा-नाद कर रहे थे। ऐसे उल्लसित पौरों से शोभित अयोध्या को देखकर मन्थरा अत्यन्त विस्मित हो उठी।

Verse 5

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृताम्।वृतां छन्दपथैश्चापि शिरस्स्नातजनैर्वृताम्।।2.7.3।।माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम्।शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनिस्वनाम्।।2.7.4।।सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषाभिनादिताम्।प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम्।।2.7.5।।प्रहृष्टमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम्।अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता।।2.7.6।।

मन्थरा ने अयोध्या को देखा—बहुमूल्य पताकाओं और ध्वजों से सुसज्जित, घुमावदार मार्गों से घिरी हुई, स्नान करके शुद्ध हुए जनसमूह से भरी हुई। माला और मोदक हाथों में लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों के वेदघोष से वह गूँज रही थी; श्वेत देवालयों के द्वार दमक रहे थे और सब प्रकार के वाद्यों का निनाद फैल रहा था। हर्षित जनसमुदाय से नगर भर गया था; उत्तम हाथी-घोड़े उत्साह से उछल रहे थे; गौएँ और वृषभ रंभा-नाद कर रहे थे। ऐसे उल्लसित पौरों से शोभित अयोध्या को देखकर मन्थरा अत्यन्त विस्मित हो उठी।

Verse 6

पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृताम्।वृतां छन्दपथैश्चापि शिरस्स्नातजनैर्वृताम्।।2.7.3।।माल्यमोदकहस्तैश्च द्विजेन्द्रैरभिनादिताम्।शुक्लदेवगृहद्वारां सर्ववादित्रनिस्वनाम्।।2.7.4।।सम्प्रहृष्टजनाकीर्णां ब्रह्मघोषाभिनादिताम्।प्रहृष्टवरहस्त्यश्वां सम्प्रणर्दितगोवृषाम्।।2.7.5।।प्रहृष्टमुदितैः पौरैरुच्छ्रितध्वजमालिनीम्।अयोध्यां मन्थरा दृष्ट्वा परं विस्मयमागता।।2.7.6।।

मन्थरा ने अयोध्या को देखा—बहुमूल्य पताकाओं और ध्वजों से सुसज्जित, घुमावदार मार्गों से घिरी हुई, स्नान करके शुद्ध हुए जनसमूह से भरी हुई। माला और मोदक हाथों में लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों के वेदघोष से वह गूँज रही थी; श्वेत देवालयों के द्वार दमक रहे थे और सब प्रकार के वाद्यों का निनाद फैल रहा था। हर्षित जनसमुदाय से नगर भर गया था; उत्तम हाथी-घोड़े उत्साह से उछल रहे थे; गौएँ और वृषभ रंभा-नाद कर रहे थे। ऐसे उल्लसित पौरों से शोभित अयोध्या को देखकर मन्थरा अत्यन्त विस्मित हो उठी।

Verse 7

प्रहर्षोत्फुल्लनयनां पाण्डुरक्षौमवासिनीम्।अविदूरे स्थितां दृष्ट्वा धात्रीं पप्रच्छ मन्थरा।।।।

आनन्द से खिले नेत्रों वाली, धवल रेशमी वस्त्र धारण किए, निकट खड़ी धात्री को देखकर मन्थरा ने उससे पूछा।

Verse 8

उत्तमेनाभिसंयुक्ता हर्षेणार्थपरा सती।राममाता धनं किन्नु जनेभ्यस्सम्प्रयच्छति।।।।

अत्युत्तम हर्ष से परिपूर्ण, धन-लाभ में प्रवृत्त कही जाने वाली राममाता आज लोगों को धन क्यों बाँट रही हैं?

Verse 9

अतिमात्रप्रहर्षोऽयं किं जनस्य च शंस मे।कारयिष्यति किं वापि सम्प्रहृष्टो महीपतिः।।।।

यह जनता में अत्यधिक हर्ष क्यों है? मुझे बताओ—प्रसन्न राजा क्या करवाने का विचार कर रहे हैं?

Verse 10

विदीर्यमाणा हर्षेण धात्री तु परया मुदा।आचचक्षेऽथ कुब्जायै भूयसीं राघव श्रियम्।।।।

अत्यन्त हर्ष से फूली हुई धात्री ने, महान् आनन्द में, कुब्जा को राघव के लिए आने वाली अपार श्री-समृद्धि का समाचार सुनाया।

Verse 11

श्वः पुष्येण जितक्रोधं यौवराज्येन राघवम्।राजा दशरथो राममभिषेचयिताऽनघम्।।।।

कल पुष्य नक्षत्र में राजा दशरथ क्रोध-विजयी, रघुकुल-तिलक, निष्पाप राम का युवराज्य के लिए अभिषेक करेंगे।

Verse 12

धात्र्यास्तु वचनं शृत्वा कुब्जा क्षिप्रममर्षिता।कैलासशिखराकारा त्प्रासादादवरोहत।।।।

धाय के वचन सुनकर कुब्जा क्रोध से तिलमिला उठी और कैलास-शिखर-से ऊँचे उस प्रासाद से शीघ्र उतर आई।

Verse 13

सा दह्यमाना कोपेन मन्थरा पापदर्शिनी।शयानामेत्य कैकेयीमिदं वचनमब्रवीत्।।।।

दुष्ट-दृष्टि वाली मन्थरा क्रोध से जलती हुई, विश्राम करती कैकेयी के पास जाकर यह वचन बोली।

Verse 14

उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते।उपप्लुतामौघेन किमात्मानं न बुध्यसे।।।।

उठो, मूढ़े! क्यों सोई पड़ी हो? भय तुम्हारी ओर बढ़ रहा है। संकटों की बाढ़ में बहती हुई अपनी दशा को क्यों नहीं समझती?

Verse 15

अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे।चलं हि तव सौभाग्यं नद्यास्स्रोत इवोष्णगे।।।।

अप्रिय होते हुए भी प्रिय-रानी-सा रूप धारण कर तू अपने सौभाग्य का घमंड करती है। पर तेरा यह सौभाग्य चंचल है—जैसे ग्रीष्म की तपन में नदी की धारा।

Verse 16

एवमुक्ता तु कैकेयी रुष्टया परुषं वचः।कुब्जया पापदर्शिन्या विषादमगमत्परम्।।।।

क्रुद्ध, पापबुद्धि कुब्जा के कठोर वचन सुनकर कैकेयी अत्यन्त विषाद में डूब गई।

Verse 17

कैकेयी त्वब्रवीत्कुब्जां कच्चित्क्षेमं नु मन्थरे।विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृशदुःखिताम्।।।।

कैकेयी ने कुब्जा से कहा—“मन्थरा, सब कुशल तो है? मैं तुम्हें उदास मुख वाली, अत्यन्त दुःखी देख रही हूँ।”

Verse 18

मन्थरा तु वच श्श्रुत्वा कैकेय्या मधुराक्षरम्।उवाच क्रोधसंयुक्ता वाक्यं वाक्यविशारदा।।।।

कैकेयी के मधुर वचन सुनकर, वाणी में निपुण पर क्रोध से युक्त मन्थरा उत्तर देने लगी।

Verse 19

सा विषण्णतरा भूत्वा कुब्जा तस्या हितैषिणी।विषादयन्ती प्रोवाच भेदयन्ती च राघवम्।।।।

और अधिक उदास होकर, अपने को कैकेयी की हितैषिणी बताने वाली वह कुब्जा ऐसे बोली कि उसका विषाद बढ़े और राघव (राम) से उसका मन फूट जाए।

Verse 20

अक्षय्यं सुमहद्देवि प्रवृत्तं त्वद्विनाशनम्।रामं दशरथो राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति।।।।

हे देवि! तुम्हारे विनाश का अत्यन्त महान् और अक्षय कारण चल पड़ा है—राजा दशरथ श्रीराम का युवराज्य में अभिषेक करने वाले हैं।

Verse 21

साऽस्म्यगाधे भये मग्ना दुःखशोकसमन्विता।दह्यमानाऽनलेनेव त्वद्धितार्थमिहागता।।।।

मैं अथाह भय में डूबी हुई, दुःख और शोक से युक्त, अग्नि से दग्ध-सी होकर तुम्हारे हित के लिए यहाँ आई हूँ।

Verse 22

तव दुःखेन कैकेयि मम दुःखं महद्भवेत्।त्वद्वृद्धौ मम वृद्धिश्च भवेदत्र न संशयः।।।।

हे कैकेयी! तुम्हारे दुःख से मेरा दुःख भी महान् हो जाएगा; और तुम्हारी वृद्धि से मेरी वृद्धि भी होगी—इसमें कोई संशय नहीं।

Verse 23

नराधिपकुले जाता महिषी त्वं महीपतेः।उग्रत्वं राजधर्माणां कथं देवि न बुध्यसे।।।।

हे देवि! तुम नराधिपों के कुल में जन्मी और राजा की महिषी हो; फिर राजधर्मों की उग्रता को तुम कैसे नहीं समझतीं?

Verse 24

धर्मावादी शठो भर्ता श्लक्ष्णवादी च दारुणः।शुद्धभावे न जानीषे तेनैव मतिसन्धिता।।।।

तुम्हारे पति धर्म की बातें करते हैं, पर छलपूर्ण हैं; मधुर वचन बोलते हैं, पर कठोर हैं। तुम सरल-स्वभाव होने से उसे नहीं पहचानतीं; उसी ने तुम्हारी बुद्धि को बाँध रखा है।

Verse 25

उपस्थितः प्रयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम्।अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति।।।।

वह तुम्हारे पास आकर भी केवल निरर्थक ढाढ़स बँधाता है; पर आज तुम्हारे पति का वास्तविक लाभ तो केवल कौसल्या को ही मिलेगा।

Verse 26

उपवाह्य स दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु।काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके।।।।

वह दुष्टात्मा भरत को तुम्हारे बंधुओं के पास भेजकर, भोर होते ही बाधारहित राज्य में राम को स्थापित कर देगा।

Verse 27

शत्रुः पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया।आशीविष इवाङ्केन बाले परिधृतस्त्वया।।।।

हे बालिके! माँ की तरह उसका हित चाहकर, पति समझने के भ्रम में, तुमने शत्रु को अपनी गोद में विषधर सर्प की भाँति पाल रखा है।

Verse 28

यथा हि कुर्यात्सर्पो वा शत्रुर्वा प्रत्युपेक्षितः।राज्ञा दशरथेनाद्य सपुत्रा त्वं तथा कृता।।।।

जैसे उपेक्षित सर्प या उपेक्षित शत्रु जैसा व्यवहार करता है, वैसे ही आज राजा दशरथ ने तुम्हारे साथ—तुम्हारे पुत्र सहित—किया है।

Verse 29

पापेनानृतसान्त्वेन बाले नित्यसुखोचिते।रामं स्थापयता राज्ये सानुबन्धा हता ह्यसि।।।।

हे बालिके, सदा सुख की अभ्यस्त! उस पापी के झूठे सांत्वन से—जब वह राम को राज्य में स्थापित कर रहा है—तुम अपने पुत्र सहित, अपने सब संबंधियों समेत, निश्चय ही नष्ट हो गई हो।

Verse 30

सा प्राप्तकालं कैकेयि क्षिप्रं कुरु हितं तव।त्रायस्व पुत्रमात्मानं मां च विस्मयदर्शने।।।।

हे कैकेयी, समय आ पहुँचा है—शीघ्र अपने हित का उपाय करो। हे भ्रमित दृष्टि वाली, अपने पुत्र की, अपनी और मेरी भी रक्षा करो।

Verse 31

मन्थाराया वचश्श्रुत्वा शयाना सा शुभानना।उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी।।।।

मन्थरा के वचन सुनकर, शय्या पर लेटी हुई वह शुभमुखी कैकेयी हर्ष से भर उठी और शरद्-ऋतु की चन्द्रकला के समान उठ बैठी।

Verse 32

अतीव सा तु संहृष्टा कैकेयी विस्मयान्विता।एकमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम्।।।।

अत्यन्त हर्षित और विस्मय से युक्त कैकेयी ने उस कुब्जा को एक शुभ, मनोहर आभूषण दे दिया।

Verse 33

दत्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा।कैकेयी मन्थरां दृष्ट्वा पुनरेवाब्रवीदिदम्।।।।

उस कुब्जा को आभूषण देकर, स्त्रियों में श्रेष्ठ कैकेयी ने मन्थरा की ओर देखकर फिर से यह कहा।

Verse 34

इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यासि परमं प्रियम्।एतन्मे प्रियमाख्यातुः किं वा भूयः करोमि ते।।।।

हे मन्थरा! तूने मुझे अत्यन्त प्रिय समाचार सुनाया है। जो मुझे ऐसा हर्षदायक वृत्तान्त सुनाए, उसके लिए मैं और क्या करूँ?

Verse 35

रामे वा भरते वाऽहं विशेषं नोपलक्षये।तस्मात्तुष्टाऽस्मि यद्राजा रामं राज्येऽभिषेक्ष्यति।।।।

राम हों या भरत—मैं उनमें कोई भेद नहीं देखती। इसलिए मैं प्रसन्न हूँ कि राजा राम का राज्याभिषेक करेंगे।

Verse 36

न मे परं किञ्चिदितस्त्वया पुनःप्रियं प्रियार्हे सुवचं वचःपरम्।तथा ह्यवोचस्त्वमतः प्रियोत्तरंवरं परं ते प्रददामि तं वृणु।।।।

हे प्रियपात्रे! इससे बढ़कर प्रिय मुझे तुमसे और कुछ नहीं; तुम्हारे वचन प्रशंसा से भी परे हैं। इसलिए तुमने जैसा कहा है, मैं तुम्हें इससे भी श्रेष्ठ परम वर देती हूँ—उसे चुन लो।

Frequently Asked Questions

The pivotal action is Manthara’s strategic reframing of Rama’s legitimate consecration into a perceived threat to Kaikeyi and Bharata, illustrating how political outcomes can be redirected by persuasion rather than by formal dharma-ritual alone.

The sarga highlights vāk-śakti (the force of speech): fear-based narratives can destabilize judgment and convert joy into despondency, warning that ethical discernment must guard against manipulative counsel in matters of power and succession.

Ayodhya’s ritualized civic landscape is foregrounded—sprinkled royal roads, flower-strewn routes, flag-lined streets, white-doored temples resonant with Vedic chanting and instruments—along with the calendrical marker of Puṣya nakṣatra for the planned abhiṣeka.

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