
अयोध्यायाः शोकप्रकम्पः (Ayodhya’s Tremor of Grief and Omens)
अयोध्याकाण्ड
इस सर्ग में राम के प्रस्थान का तत्काल प्रभाव अयोध्या और समस्त जगत् पर पड़ता दिखाया गया है। राम हाथ जोड़कर निकलते हैं; अंतःपुर से करुण क्रंदन उठता है। उसे सुनकर विरह से दग्ध दशरथ और भी गहरे शोक में डूब जाते हैं। शोक महल की सीमा से बाहर फैलकर नगर-जीवन को ठप कर देता है—अग्निहोत्र नहीं जलते, रसोई का काम रुक जाता है, नित्य कर्म और राजकीय-गृहस्थी के कार्य शिथिल पड़ जाते हैं। पशु-पक्षी भी व्याकुल हैं—हाथी आहार छोड़ देते हैं, गायें दूध नहीं देतीं; परिवारों के बंधन ढीले पड़ते हैं और सबका मन केवल राम में अटक जाता है। फिर घोर अपशकुनों का वर्णन आता है—नक्षत्रों की कान्ति क्षीण होती है, ग्रह म्लान पड़ते हैं, विशाखा धूम से ढकी-सी दिखती है, चन्द्रमा के पास उग्र ग्रह एकत्र होते हैं और दिशाएँ अंधकार से घिर जाती हैं। राम जैसे धर्मरक्षक के अभाव में अयोध्या इन्द्र-विहीन पृथ्वी की भाँति ‘काँपती’ प्रतीत होती है—व्यक्तिगत शोक से उठकर यह सर्ग धर्म-व्यवस्था के विघटन का ब्रह्माण्डीय संकेत बन जाता है।
Verse 1
तस्मिन्स्तु पुरुषव्याघ्रे विनिर्याति कृताञ्जलौ।आर्तशब्दोऽहि सञ्जज्ञे स्त्रीणामन्त:पुरे महान्।।2.41.1।।
जब वह पुरुषसिंह हाथ जोड़कर प्रणाम करता हुआ निकल पड़ा, तब अंतःपुर की स्त्रियों में महान् आर्त-क्रन्दन उठ खड़ा हुआ।
Verse 2
अनाथस्य जनस्यास्य दुर्बलस्य तपस्विनः।यो गतिश्शरणं चासीत्स नाथः क्व नु गच्छति।।2.41.2।।
इस अनाथ, दुर्बल और पीड़ित जनसमुदाय के लिए जो गति और शरण था, वही नाथ अब कहाँ जा रहा है?
Verse 3
न क्रुध्यत्यभिशप्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन्।क्रुद्धान्प्रसादयन्सर्वान् समदुःखः क्व गज्छति।।2.41.3।।
जो गाली दिए जाने पर भी क्रोध नहीं करता, क्रोध उत्पन्न करने वाले कर्मों से बचता है, क्रुद्ध जनों को भी प्रसन्न कर देता है, और दूसरों के दुःख में समान भागी होता है—वह अब कहाँ चला गया?
Verse 4
कौशल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते।तथा यो वर्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति।।2.41.4।।
जो महातेजस्वी महात्मा कौशल्या माता के प्रति जैसा व्यवहार करता था, वैसा ही हम सबके प्रति भी करता था—वह अब कहाँ चला गया?
Verse 5
कैकेय्या क्लिश्यमानेन राज्ञा सञ्चोदितो वनम्।परित्राता जनस्यास्य जगतः क्व नु गच्छति।।2.41.5।।
कैकेयी के दबाव से क्लेशित राजा ने उसे वन को भेजने की आज्ञा दी है। जो इस प्रजा का, इस समस्त जगत् का परित्राता था—वह अब कहाँ जा रहा है?
Verse 6
अहो निश्चेतनो राजा जीवलोकस्य सम्प्रियम्।धर्म्यं सत्यव्रतं रामं वनवासे प्रवत्स्यति।।2.41.6।।
हाय! राजा निश्चेष्ट-सा हो गया है; जो समस्त प्राणियों का प्रिय, धर्मपरायण और सत्यव्रती राम है, उसे वनवास के लिए भेज रहा है।
Verse 7
इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः।रुरुदुश्चैव दुःखार्ताः सस्वरं च विचुक्रुशुः।।2.41.7।।
इस प्रकार वे सब रानियाँ, बछड़े से वंचित गायों की भाँति, दुःख से व्याकुल होकर ऊँचे स्वर में रोईं और विलाप करने लगीं।
Verse 8
स तमन्तः पुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः।पुत्रशोकाभिसन्तप्तः श्रुत्वा चासीत्सुदुःखितः।।2.41.8।।
अन्तःपुर में उठती उस भयानक करुण-ध्वनि को सुनकर, पुत्र-शोक से दग्ध राजा और भी अधिक दुःखी हो गया।
Verse 9
नाग्निहोत्राण्यहूयन्त नापचन् गृहमेधिनःअकुर्वन्न प्रजाः कार्यं सूर्यश्चान्तरधीयत।।2.41.9।।
अग्निहोत्र का आह्वान न हुआ; गृहस्थों ने भोजन न पकाया; प्रजाजनों ने अपने नित्य कर्म न किए—और सूर्य भी अस्त हो गया।
Verse 10
व्यसृजन् कबलान्नागा गावो वत्सान्न पाययन्।पुत्रं प्रथमजं लब्ध्वा जननी नाभ्यनन्दत।।2.41.10।।
हाथियों ने कौर छोड़ दिए, गायों ने बछड़ों को दूध न पिलाया; यहाँ तक कि प्रथम पुत्र को पाकर भी माताएँ हर्षित न हुईं—ऐसा भारी शोक छा गया था।
Verse 11
त्रिशङ्कुर्लोहिताङ्गश्च बृहस्पतिबुधावपि।दारुणा स्सोममभ्येत्य ग्रहास्सर्वे व्यवस्थिताः।।2.41.11।।
त्रिशंकु, लोहिताङ्ग (मंगल) तथा बृहस्पति और बुध भी—समस्त ग्रह—चन्द्रमा के समीप आकर अत्यन्त दारुण स्थिति में स्थित हो गए।
Verse 12
नक्षत्राणि गतार्चींषि ग्रहाश्च गततेजसः।विशाखास्तु सधूमाश्च नभसि प्रचकाशिरे।।2.41.12।।
नक्षत्रों की ज्योति क्षीण हो गई और ग्रहों का तेज भी लुप्त-सा हो गया; आकाश में विशाखा नक्षत्र मानो धुएँ से घिरा हुआ प्रकट हुआ।
Verse 13
कालिकानिलवेगेन महोदधिरिवोत्थितः।रामे वनं प्रव्रजिते नगरं प्रचचाल तत्।।2.41.13।।
राम के वन-प्रस्थान करते ही वह नगर (अयोध्या) ऐसा काँप उठा, मानो काले आँधी-वेग से प्रेरित महोदधि उठ खड़ा हुआ हो।
Verse 14
दिशः पर्याकुलास्सर्वा स्तिमिरेणेव संवृताः।न ग्रहो नापि नक्षत्रं प्रचकाशे नकिञ्चन।।2.41.14।।
सभी दिशाएँ मानो अन्धकार से आच्छादित होकर व्याकुल हो उठीं; न कोई ग्रह, न कोई नक्षत्र—कुछ भी प्रकाशमान न दिखा।
Verse 15
अकस्मान्नागरस्सर्वो जनो दैन्यमुपागमत्।आहारे वा विहारे वा न कश्चिदकरोन्मनः।।2.41.15।।
अकस्मात् समस्त नगरवासी दीनता में डूब गए; भोजन में या विहार-आनन्द में किसी का भी मन न लगा।
Verse 16
शोकपर्यायसन्तप्त स्सततं दीर्घमुच्छवसन्।अयोध्यायां जनस्सर्व श्शुशोच जगतीपतिम्।।2.41.16।।
अयोध्या में समस्त जन शोक की लहरों से दग्ध होकर निरन्तर दीर्घ-दीर्घ आहें भरते हुए जगत्पति अपने नरेश के लिए विलाप करने लगे।
Verse 17
बाष्पपर्याकुलमुखो राजमार्गगतो जनः।न हृष्टो लक्ष्यते कश्चित्सर्व श्शोकपरायणः।।2.41.17।।
राजमार्ग पर चलने वाले लोगों के मुख आँसुओं से व्याकुल थे; कोई भी प्रसन्न दिखाई न देता था—सब शोक में ही निमग्न थे।
Verse 18
न वाति पवन श्शीतो न शशी सौम्यदर्शनः।न सूर्यस्तपते लोकं सर्वं पर्याकुलं जगत्।।2.41.18।।
शीतल पवन नहीं बहती थी, चन्द्रमा भी सौम्य नहीं लगता था; सूर्य भी लोक को ताप नहीं देता था—समस्त जगत् व्याकुल-सा हो गया था।
Verse 19
अनर्थिनस्सुताः स्त्रीणां भर्तारो भ्रातरस्तथा।सर्वे सर्वं परित्यज्य राममेवान्वचिन्तयन्।।2.41.19।।
स्त्रियों के पुत्र माताओं की सुध न लेते थे, पति पत्नियों की, और भाई भी परस्पर की; सब कुछ त्यागकर सभी केवल राम का ही चिन्तन करते थे।
Verse 20
ये तु रामस्य सुहृद स्सर्वे ते मूढचेतसः।शोकभारेण चाक्रान्ता श्शयनं न जहुस्तदा।।2.41.20।।
जो-जो राम के सुहृद् थे, वे सब शोक के भार से दबे हुए, चित्त से मोहित होकर, उस समय शय्या से उठ न सके।
Verse 21
ततस्त्वयोध्या रहिता महात्मनापुरन्दरेणेव मही सपर्वता।चचाल घोरं भयशोकपीडितासनागयोधाश्वगणा ननाद च।।2.41.21।।
तब महात्मा राम से रहित अयोध्या, जैसे पुरन्दर इन्द्र से रहित पर्वतों सहित पृथ्वी हो, वैसी हो गई। भय और शोक से पीड़ित वह भयंकर रूप से काँप उठी और हाथियों, घोड़ों तथा योद्धाओं के समूहों के शब्द से गूँज उठी।
The pivotal action is Rāma’s formal departure—marked by folded palms—signaling disciplined acceptance of exile; the ethical tension is the city’s recognition that its protector is leaving due to royal compulsion and vow-bound duty.
The chapter illustrates that dharma is not merely private virtue but a stabilizing public force: when the dharmic center withdraws, rituals, livelihoods, and even social attachments disintegrate, revealing the interdependence of ethics and civic order.
Key markers include Ayodhyā itself, the antaḥpura (women’s quarters) as the first locus of lament, the rājamārga (public thoroughfare) as the civic stage of grief, and agnihotra as the ritual baseline whose cessation signifies societal paralysis.
Read Valmiki Ramayana in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.