
सत्यधर्मप्रतिपादनम् (Rama’s Defense of Truth and Dharma in Reply to Jabali)
अयोध्याकाण्ड
अयोध्याकाण्ड के सर्ग 109 में जाबालि के उस व्यवहारिक परामर्श का, जो राम को लौट आने के लिए प्रेरित करता था, श्रीराम द्वारा दीर्घ नैतिक प्रत्युत्तर वर्णित है। राम पहले जाबालि की सद्भावना स्वीकार करते हैं, पर धर्म और मर्यादा की कसौटी पर उसे अहितकर बताते हैं। वे कहते हैं कि राजधर्म का शाश्वत आधार सत्य और अहिंसा हैं; जगत की स्थिरता सत्य पर टिकी है और ऋषि तथा देव सत्य को सर्वोच्च गुण मानते हैं। राम असत्य को लोक-विरुद्ध और आत्मघातक बताते हुए प्रतिपादित करते हैं कि दान, यज्ञ, तप और यहाँ तक कि वेद भी सत्य-प्रतिष्ठित हैं। फिर वे इसे अपने प्रसंग पर लागू करते हैं—पिता के सामने वनवास की प्रतिज्ञा कर चुके हैं, इसलिए “सत्य-सेतु” को तोड़ना उन्हें स्वीकार नहीं; लोभ, मोह या अज्ञान से प्रेरित होकर वे वचनभंग नहीं करेंगे। वे चेताते हैं कि असत्य-प्रवृत्त चंचल जनों के अर्पण देवता और पितर स्वीकार नहीं करते, और वे सत्पुरुषों के आचरण के अनुरूप वनवास को पुण्य-भार मानकर धारण करते हैं। अंत में (जिसे कुछ परंपराएँ प्रक्षिप्त मानती हैं) नास्तिक तर्क की निंदा का प्रसंग आता है। तब जाबालि स्पष्ट करते हैं कि उनका पूर्व कथन केवल परिस्थिति में समझाने हेतु था; वे आस्तिक भाव की पुनः पुष्टि कर राम को शांत करते हुए हितकारी सलाह की ओर ले जाना चाहते हैं।
Verse 1
जाबालेस्तु वचश्श्रुत्वा राम स्सत्यात्मनां वरः।उवाच परया भक्त्या स्वबुद्ध्या चाविपन्नया।।2.109.1।।
जाबालि के वचन सुनकर सत्यस्वरूपों में श्रेष्ठ श्रीराम ने गहन आदर-भक्ति से, अपनी अविचल बुद्धि के अनुसार उत्तर दिया॥
Verse 2
भवान्मे प्रियकामार्थं वचनं यदिहोक्तवान्।अकार्यं कार्यसङ्काशमपथ्यं पथ्यसम्मतम्।।2.109.2।।
मुझे प्रसन्न करने के लिए आपने जो वचन यहाँ कहा है, वह देखने में तो उचित कर्म-सा लगता है; पर वास्तव में वह अकार्य है—हित के रूप में कहा गया भी अहितकर ही है।
Verse 3
निर्मर्यादस्तु पुरुषः पापाचारसमन्वितः।मानं न लभते सत्सु भिन्नचारित्रदर्शनः।।2.109.3।।
जो पुरुष मर्यादा-भंग करने वाला, पापाचार से युक्त, और सत्पुरुषों के विपरीत चरित्र-दृष्टि रखने वाला है—वह सज्जनों में मान नहीं पाता।
Verse 4
कुलीनमकुलीनं वा वीरं पुरुषमानिनम्।चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाऽशुचिम्।।2.109.4।।
मनुष्य कुलीन हो या अकुलीन, सचमुच वीर हो या केवल पुरुषत्व का अभिमानी, शुद्ध हो या अशुद्ध—इन सबका भेद केवल चरित्र ही प्रकट करता है।
Verse 5
अनार्यस्त्वार्यसङ्काश श्शौचाद्दीनस्ताथाऽशुचिः।लक्षण्यवदलक्षण्यो दुश्शीलश्शीलवानिव।।2.109.5।।अधर्मं धर्मवेशेण यदीमं लोकसङ्कुरम्।अभिपत्स्ये शुभं हित्वा क्रियाविधिविवर्जितम्।।2.109.6।।कश्चेतयानः पुरुषः कार्याकार्यविचक्षणः।बहुमंस्यति मां लोके दुर्वृत्तं लोकदूषणम्।।2.109.7।।
यदि मैं अनार्य होकर भी आर्य-सा दिखूँ; शौच से रहित होकर भी शुद्ध-सा प्रतीत होऊँ; गुणहीन होकर भी गुणवान-सा लगूँ; दुश्चरित्र होकर भी शीलवान-सा बनूँ—
Verse 6
अनार्यस्त्वार्यसङ्काश श्शौचाद्दीनस्ताथाऽशुचिः।लक्षण्यवदलक्षण्यो दुश्शीलश्शीलवानिव।।2.109.5।।अधर्मं धर्मवेशेण यदीमं लोकसङ्कुरम्।अभिपत्स्ये शुभं हित्वा क्रियाविधिविवर्जितम्।।2.109.6।।कश्चेतयानः पुरुषः कार्याकार्यविचक्षणः।बहुमंस्यति मां लोके दुर्वृत्तं लोकदूषणम्।।2.109.7।।
और यदि मैं शुभ को त्यागकर, धर्म के वेश में छिपे अधर्म को अपनाऊँ—जो लोक में संकर फैलाने वाला है और विधि-नियत कर्मों से रहित है—
Verse 7
अनार्यस्त्वार्यसङ्काश श्शौचाद्दीनस्ताथाऽशुचिः।लक्षण्यवदलक्षण्यो दुश्शीलश्शीलवानिव।।2.109.5।।अधर्मं धर्मवेशेण यदीमं लोकसङ्कुरम्।अभिपत्स्ये शुभं हित्वा क्रियाविधिविवर्जितम्।।2.109.6।।कश्चेतयानः पुरुषः कार्याकार्यविचक्षणः।बहुमंस्यति मां लोके दुर्वृत्तं लोकदूषणम्।।2.109.7।।
तो फिर कार्य-अकार्य का विवेक रखने वाला कौन-सा समझदार पुरुष, यदि मैं दुर्वृत्त और लोक का दूषण बन जाऊँ, इस जगत में मेरा सम्मान करेगा?
Verse 8
कस्य दास्याम्यहं वृत्तं केन वा स्वर्गमाप्नुयाम्।आनया वर्तमानो हि वृत्त्या हीनप्रतिज्ञया।।2.109.8।।
यदि मैं इस आचरण में रहते हुए अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दूँ, तो मैं किसे सद्वृत्त का उपदेश दूँगा—और किस उपाय से स्वर्ग को प्राप्त करूँगा?
Verse 9
कामवृत्तस्त्वयं लोकः कृत्स्न स्समुपवर्तते।यद्वृत्ता स्सन्ति राजानस्तद्वृत्ता स्सन्ति हि प्रजाः।।2.109.9।।
यह समस्त लोक अपनी-अपनी कामना के अनुसार ही चलता है। जैसे आचरण राजा करते हैं, वैसा ही आचरण प्रजा भी करती है॥
Verse 10
सत्यमेवानृशंसं च राजवृत्तं सनातनम्।तस्मात्सत्यात्मकं राज्यं सत्ये लोकः प्रतिष्ठितः।।2.109.10।।
सत्य और अनृशंसता (करुणा, निर्दयता-रहितता) ही राजधर्म की सनातन रीति है। इसलिए राज्य सत्य-आधारित होना चाहिए; सत्य पर ही लोक प्रतिष्ठित है॥
Verse 11
ऋषयश्चैव देवाश्च सत्यमेव हि मेनिरे।सत्यवादी हि लोकेऽस्मिन्परमं गच्छति क्षयम्।।2.109.11।।
ऋषि और देवता—सबने सत्य को ही परम माना है। इस लोक में सत्य बोलने वाला परम पद को प्राप्त होता है॥
Verse 12
उद्विजन्ते यथा सर्पान्नरादनृतवादिनः।धर्म स्सत्यं परो लोके मूलं स्वर्गस्य चोच्यते।।2.109.12।।
जैसे लोग सर्प से डरकर दूर हटते हैं, वैसे ही असत्य बोलने वाले मनुष्य से भी कतराते हैं। इस लोक में सत्य ही परम धर्म है, और वही स्वर्ग का मूल कहा गया है॥
Verse 13
सत्यमेवेश्वरो लोके सत्यं पद्माश्रिता सदा।सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्।।2.109.13।।
इस लोक में सत्य ही ईश्वर है, और पद्मा (लक्ष्मी) सदा सत्य में ही आश्रित रहती हैं। सब कुछ सत्य-मूल है; सत्य से बढ़कर कोई परम पद नहीं है॥
Verse 14
दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च।वेदा स्सत्यप्रतिष्ठाना स्तस्मात्सत्यपरो भवेत्।।2.109.14।।
दान, यज्ञ, हवन, तप और तपस्याएँ—और वेद भी—सत्य पर ही प्रतिष्ठित हैं। इसलिए मनुष्य को सत्य-परायण होना चाहिए॥
Verse 15
एकः पालयते लोकमेकः पालयते कुलम्।मज्जत्येको हि निरय एक स्स्वर्गे महीयते।।2.109.15।।
एक पुरुष लोक का पालन करता है, और एक केवल अपने कुल का निर्वाह करता है। एक नरक में डूबता है, और एक स्वर्ग में सम्मानित होता है—यही सत्य-असत्य के फल हैं॥
Verse 16
सोऽहं पितुर्नियोगं तु किमर्थं नानुपालये।सत्यप्रतिश्रव स्सत्यं सत्येन समयीकृतः।।2.109.16।।
मैं—जो सत्य-प्रतिज्ञ हूँ—सत्य से ही बँधा हुआ हूँ, सत्य में ही स्थित हूँ। फिर मैं अपने पिता की आज्ञा का पालन क्यों न करूँ?॥
Verse 17
नैव लोभान्न मोहाद्वा न ह्यज्ञानात्तमोऽन्वितः।सेतुं सत्यस्य भेत्स्यामि गुरो स्सत्यप्रतिश्रवः।।2.109.17।।
न तो लोभ से, न मोह से, न अज्ञानरूपी तम से—पिता के सत्य-प्रतिज्ञ वचन का पालन करते हुए मैं सत्य के सेतु को कभी नहीं तोड़ूँगा।
Verse 18
असत्यसन्धस्य सतश्चलस्यास्थिरचेतसः।नैव देवा न पितरः प्रतीच्छन्तीति नः श्रुतम्।।2.109.18।।
जो असत्य से बँधा हो, चंचल हो और जिसका चित्त अस्थिर हो—ऐसे जन की आहुति को न देव स्वीकारते हैं, न पितर; ऐसा हमने सुना है।
Verse 19
प्रत्यगात्ममिमं धर्मं सत्यं पश्याम्यहं स्वयम्।भार स्सत्पुरुषाचीर्णस्तदर्थमभिमन्यते।।2.109.19।।
मैं स्वयं इस धर्म—सत्य—को अपने अंतरात्मा के रूप में देखता हूँ। सत्पुरुषों द्वारा आचरित होने से यह वनवास का भार भी मुझे सार्थक प्रतीत होता है।
Verse 20
क्षात्रं धर्ममहंत्यक्ष्ये ह्यधर्मं धर्मसंहितम्।क्षुद्रैर्नृशंसैर्लुब्धैश्च सेवितं पापकर्मभिः।।2.109.20।।
जो ‘क्षात्र-धर्म’ कहलाकर भी वास्तव में धर्म के आवरण में अधर्म है—जिसे क्षुद्र, नृशंस, लोभी और पापकर्मी लोग अपनाते हैं—ऐसे धर्म को मैं त्याग दूँगा।
Verse 21
कायेन कुरुते पापं मनसा सम्प्रधार्य तत्। अनृतं जिह्वया चाह त्रिविधं कर्मपातकम्।।2.109.21।।
मन में पाप का संकल्प करके मनुष्य देह से उसे करता है, और जीभ से असत्य बोलता है—इस प्रकार पाप कर्म तीन प्रकार का हो जाता है: मानसिक, कायिक और वाचिक।
Verse 22
भूमिः कीर्तिर्यशो लक्ष्मीः पुरुषं प्रार्थयन्ति हि। सत्यं समनुवर्तने सत्यमेव भजेत तत:।।2.109.22।।
भूमि, कीर्ति, यश और लक्ष्मी—ये सब पुरुष को ही चाहती हैं; इसलिए आचरण में सत्य का अनुसरण करके केवल सत्य का ही आश्रय लेना चाहिए।
Verse 23
श्रेष्ठं ह्यनार्यमेव स्याद्यद्भवानवधार्य माम्।आह युक्ति करैर्वाक्यैरिदं भद्रं कुरुष्व ह।।2.109.23।।
आपने जिसे ‘श्रेष्ठ’ समझकर, युक्तिपूर्ण वचनों से ‘यह शुभ करो’ कहकर मुझे प्रेरित किया है—वह वास्तव में अनार्य, अर्थात् नीच आचरण ही होगा।
Verse 24
कथं ह्यहं प्रतिज्ञाय वनवासमिमं गुरॊ:। भरतस्य करिष्यामि वचो हित्वा गुरोर्वचः।।2.109.24।।
पिता-गुरु के सामने वनवास की प्रतिज्ञा करके, मैं पिता के वचन को छोड़कर भरत की बात कैसे मान सकता हूँ?
Verse 25
स्थिरा मया प्रतिज्ञाता प्रतिज्ञा गुरुसन्निधौ।प्रहृष्यमाणा सा देवी कैकेयी चाभवत्तदा।।2.109.25।।
गुरु-स्वरूप पिता के सामने मैंने दृढ़ प्रतिज्ञा की; और उसी समय वह देवी कैकेयी अत्यन्त हर्षित हो उठी।
Verse 26
वनवासं वसन्नेव शुचिर्नियतभोजनः। मूलपुष्पफलैः पुण्यैः पित्रून् देवांश्च तर्पयन्।।2.109.26।। सन्तुष्टपञ्चवर्गोऽहं लोकयात्रां प्रवर्तये। अकुह श्श्रद्धधानस्सन्कार्याकार्यविचक्षणः।।2.109.27।।
इस प्रकार वनवास में रहते हुए, शुद्ध आचरण वाला और संयमित भोजन करने वाला मैं, पवित्र मूल‑पुष्प‑फलों से पितरों और देवताओं को तृप्त करूँगा।
Verse 27
वनवासं वसन्नेवं शुचिर्नियतभोजनः।मूलैः पुष्पैः फलैः पुण्यैः पित्रून् देवांश्च तर्पयन्।।2.109.26।।सन्तुष्टपञ्चवर्गोऽहं लोकयात्रां प्रवर्तये।अकुह श्श्रद्धधानस्सन्कार्याकार्यविचक्षणः।।2.109.27।।
पाँचों इन्द्रियों को संतुष्ट रखकर मैं जीवन-यात्रा का निर्वाह करूँगा—कपट-रहित, श्रद्धावान, और कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक रखने वाला।
Verse 28
कर्मभूमिमां प्राप्य कर्तव्यं कर्म यच्छुभम्।अग्निर्वायुश्च सोमश्च कर्मणां फलभागिनः।।2.109.28।।
इस ‘कर्मभूमि’ को पाकर जो शुभ कर्तव्य करना चाहिए, वही करना चाहिए; क्योंकि अग्नि, वायु और सोम भी कर्मों के फल के भागी होते हैं।
Verse 29
शतं क्रतूनामाहृत्य देवराट् त्रिदिवं गतः।तपांस्युग्राणि चास्थाय दिवं याता महर्षयः।।2.109.29।।
सौ यज्ञों को संपन्न करके देवराज स्वर्ग को प्राप्त हुए; और महर्षि भी उग्र तपस्याएँ धारण करके दिव्य लोक को पहुँचे।
Verse 30
अमृष्यमाणः पुनरुग्रतेजाः निशम्य तं नास्तिकवाक्यहेतुम्।अथाब्रवीत्तं नृपतेस्तनूजो विगर्हमाणो वचनानि तस्य।।2.109.30।।
उग्र तेजस्वी राजकुमार ने नास्तिक वचनों में लिपटे उस तर्क को सुनकर उसे सहन न किया। तब राजा के पुत्र ने उन कथनों की निन्दा करते हुए उससे कहा।
Verse 31
सत्यं च धर्मं च पराक्रमं च भूतानुकम्पां प्रियवादितां च।द्विजातिदेवातिधिपूजनं च पन्थानमाहुस्त्रिदिवस्य सन्तः।।2.109.31।।
सज्जन कहते हैं—सत्य, धर्म, पराक्रम, प्राणियों पर करुणा, प्रिय वचन, तथा द्विजों, देवताओं और अतिथियों का पूजन—यही स्वर्ग का मार्ग है।
Verse 32
तेनैवमाज्ञाय यथावदर्थमेकोदयं सम्प्रतिपद्य विप्राः।धर्मं चरन्त स्सकलं यथावत्काङ्क्षन्ति लोकागममप्रमत्ताः।।2.109.32।।
इसलिए ब्राह्मण यथार्थ अर्थ को भलीभाँति जानकर, एकमात्र परम लक्ष्य को स्वीकार कर, विधिपूर्वक सम्पूर्ण धर्म का आचरण करते हैं; वे सावधान रहकर उच्च लोकों की प्राप्ति चाहते हैं।
Verse 33
निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद्यस्त्वामगृह्णाद्विषमस्थबुद्धिम्। बुद्ध्याऽनयैवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम्।।2.109.33।।
मैं अपने पिता के उस कर्म की निन्दा करता हूँ, जिसने तुझे—विषम और कुटिल बुद्धि वाले को—स्वीकार किया; जो ऐसी ही बुद्धि से विचरता हुआ घोर नास्तिक है और धर्मपथ से गिर चुका है।
Verse 34
यथा हि चोर: स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि। तस्माद्धि य: शङ्क्यतमः प्रजानाम् न नास्तिकेनाभिमुखो बुध: स्यात्।।2.109.34।।
जैसे चोर (संदेहास्पद) होता है, वैसे ही यह ‘बुद्ध’ है; यहाँ तथागत को नास्तिक जानो। इसलिए जो प्रजाओं में सबसे अधिक शंकनीय है, उस नास्तिक की ओर कोई विद्वान मुख न करे।
Verse 35
त्वत्तो जनाः पूर्वतरे द्विजाच्श्र शुभानि कर्माणि बहूनि चक्रुः। जित्वा सदेमं च परं च लोकं तस्माव्दिजा स्वस्ति हुतं कृतं च।।2.109.35।।
हे द्विजश्रेष्ठ! तुमसे भी पूर्वकाल के महान जनों ने अनेक शुभ कर्म किए और उनसे इस लोक तथा परलोक—दोनों को जीत लिया। इसलिए द्विजजन सर्वकल्याण के लिए हवन-आहुति देते और मंगलकर्म करते हैं।
Verse 36
धर्मे रता: सत्पुरुषै: समेतास्तेजस्विनो दानगुणप्रधानाः। अहिंसका वीतमलाश्च लोके भवन्ति पूज्या मुनयः प्रधानाः।।2.109.36।।
धर्म में रत, सत्पुरुषों के संग रहने वाले, तेजस्वी, दानगुण में प्रधान, अहिंसक और मलरहित—ऐसे श्रेष्ठ मुनि इस लोक में पूज्य होते हैं।
Verse 37
इति ब्रुवन्तं वचनं सरोषं रामं महात्मानमदीनसत्त्वम्। उवाच पथ्यं पुनरास्तिकं च सत्यं वच: सानुनयं च विप्रः।।2.109.37।।
जब महात्मा, अदीनसत्त्व राम ने क्रोधयुक्त वचन कहा, तब उस ब्राह्मण ने फिर विनय सहित हितकर, आस्तिक्य-समर्थक और सत्य के अनुरूप वाणी कही।
Verse 38
न नास्तिकानां वचनं ब्रवीम्यहं न नास्तिकोऽहं न च नास्ति किञ्चन।समीक्ष्य कालं पुनरास्तिकोऽभवं भवेय काले पुनरेव नास्तिकः।।2.109.38।।
मैं नास्तिकों का सिद्धान्त वास्तव में नहीं कहता; न मैं नास्तिक हूँ, न किसी वस्तु का निषेध करता हूँ। अवसर को देखकर मैं फिर आस्तिक हुआ; और समय-परिस्थिति से कभी अन्यथा भी बोल सकता हूँ।
Verse 39
न चापि कालोऽय मुपागतश्शनैर्यथा मया नास्तिकवागुदीरिता।निवर्तनार्थं तव राम कारणात् प्रसादनार्थं च मयैतदीरितम्।।2.109.39।।
और अब वही उचित समय धीरे-धीरे आ पहुँचा है कि मैं वैसी बात कहूँ जैसा मैंने कहा था। हे राम! वे नास्तिक-सी वाणी तुम्हारे ही हेतु—तुम्हें लौटाने और तुम्हें प्रसन्न करने के लिए—मेरे द्वारा कही गई थी।
Rāma faces the dilemma of whether to accept persuasive counsel to return (a pragmatic, outcome-driven option) or to uphold his sworn commitment to forest exile made before his father; he chooses vow-keeping as the decisive dharmic action.
The chapter teaches that satya is not merely personal honesty but the metaphysical and civic foundation of rājadharma: truth sustains social trust, religious efficacy, and moral authority, and therefore cannot be compromised even under pressure or seemingly beneficial arguments.
The principal cultural landmark is the institution of वनवास (forest-exile) as a dharmic discipline, along with Vedic-ritual culture (yajña/kratu, dāna, tapas, Vedas) and the cosmological destinations of स्वर्ग and नरक used to frame consequences of truth and untruth.
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