
चित्रकूटमार्गवर्णनम् — Bharata’s Army Reaches Chitrakuta and Searches for Rama
अयोध्याकाण्ड
इस सर्ग में भरत धर्मपूर्वक विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ वन में आगे बढ़ते हैं। सेना के चलने से वन का स्वर-परिवेश बदल जाता है—हाथी और मृग तितर-बितर हो जाते हैं, पक्षी मौन हो जाते हैं, धूल उठती है और फिर वायु उसे उड़ा ले जाती है। इसके बाद भरत चित्रकूट पर्वत और मन्दाकिनी नदी को पहचानते हैं। वे शिखरों, पुष्पित वृक्षों और पशुओं से भरी ढलानों का वर्णन करते हुए बादलों, समुद्र-तरंगों और शरद्-आकाश जैसी उपमाएँ देते हैं। शत्रुघ्न से कहते हैं कि यह प्रदेश स्वभाव से दुर्गम होते हुए भी तपस्वियों के निवास से अतिथि-सत्कार-सा सौम्य प्रतीत होता है—मानो स्वर्ग का पथ। तत्पश्चात् भरत सेना को नियंत्रित कर वहीं ठहराते हैं और स्वयं सुमंत्र तथा वसिष्ठ के साथ आगे बढ़कर खोज का आदेश देते हैं। गुप्तचर धुएँ का स्तम्भ देखते हैं और विचार करते हैं कि निर्जन स्थान में अग्नि नहीं हो सकती; अतः यहाँ कोई निवास है—संभवतः श्रीराम और लक्ष्मण, या उनके समान तपस्वी। सर्ग का अंत संयमित उत्सुकता और निकट मिलन के आनंद से होता है, जहाँ प्रकृति-वर्णन नीति, संयम और उद्देश्यपूर्ण शासन से जुड़ जाता है।
Verse 1
तया महत्या यायिन्या ध्वजिन्या वनवासिनः। अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथास्सम्प्रदुद्रुवुः।।2.93.1।।
उस विशाल ध्वजधारी चलती हुई सेना से व्याकुल होकर वनवासी यूथपति भय से उन्मत्त हो, अपने-अपने झुंडों सहित भाग खड़े हुए।
Verse 2
ऋक्षाः पृषतसङ्घाश्च रुरवश्च समन्ततः। दृश्यन्ते वनराजीषु गिरिष्वपि नदीषु च।।2.93.2।।
भालू, चित्तीदार मृगों के झुंड और रुरु (हरिण) चारों ओर दिखाई देते हैं—वन-प्रदेशों में, पर्वतों पर और नदियों के किनारों पर भी॥
Verse 3
स सम्प्रतस्थे धर्मात्मा प्रीतो दशरथात्मजः। वृतो महत्या नादिन्या सेनया चतुरङ्गया।।2.93.3।।
तब धर्मात्मा दशरथ-पुत्र भरत प्रसन्न मन से प्रस्थान कर गया, और वह महान् गर्जन करती चतुरङ्गिणी सेना से घिरा हुआ था।
Verse 4
सागरौघनिभा सेना भरतस्य महात्मनः। महीं सञ्छादयामास प्रावृषि द्यामिवाम्बुदः।।2.93.4।।
महात्मा भरत की सेना समुद्र की उमड़ती तरंगों के समान पृथ्वी को ढकने लगी, जैसे वर्षा-ऋतु में मेघ आकाश को ढक लेते हैं।
Verse 5
तुरङ्गौघैरवतता वारणैश्च महाजवैः।अनालक्ष्या चिरं कालं तस्मिन्काले बभूव भूः।।2.93.5।।
घोड़ों की भीड़ और अत्यन्त वेगवान हाथियों से आच्छादित होकर उस समय बहुत देर तक पृथ्वी मानो दिखाई ही नहीं देती थी।
Verse 6
स यात्वा दूरमध्वानं सुपरिश्रान्तवाहनः। उवाच भरत श्श्रीमान् वसिष्ठं मन्त्रिणां वरम्।।2.93.6।।
दीर्घ मार्ग तय करके, जिनके वाहनों के पशु अत्यन्त थक गए थे, वे श्रीमान् भरत मन्त्रियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ से बोले।
Verse 7
यादृशं लक्ष्यते रूपं यथा चैव श्रुतं मया।व्यक्तं प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत्।।2.93.7।।
यहाँ जैसा रूप दिखाई दे रहा है और जैसा मैंने सुना था, उससे स्पष्ट है कि हम उसी प्रदेश में आ पहुँचे हैं, जिसका वर्णन भरद्वाज ने किया था।
Verse 8
अयं गिरिश्चित्रकूट इयं मन्दाकिनी नदी। एतत्प्रकाशते दूरान्नीलमेघनिभं वनम्।।2.93.8।।
यह चित्रकूट पर्वत है, यह मन्दाकिनी नदी है; और दूर से वह वन नील मेघ के समान दीप्तिमान् दिखाई देता है।
Verse 9
गिरे स्सानूनि रम्याणि चित्रकूटस्य सम्प्रति। वारणैरवमृद्यन्ते मामकै पर्वतोपमैः।।2.93.9।।
अब चित्रकूट पर्वत की रमणीय ढलानें मेरे पर्वत-सम हाथियों द्वारा रौंदी जा रही हैं॥
Verse 10
मुञ्चन्ति कुसुमान्येते नगाः पर्वतसानुषु।नीला इवातपापाये तोयं तोयधरा घनाः।।2.93.10।।
पर्वत की ढलानों पर ये वृक्ष पुष्प बरसा रहे हैं; मानो ग्रीष्म के अंत में नील घनघटा जलधारा उँडेल रही हो।
Verse 11
किन्नराचरितं देशं पश्य शत्रुघ्न पर्वतम्। मृगैस्समन्तादाकीर्णं मकरैरिव सागरम्।।2.93.11।।
हे शत्रुघ्न, किन्नरों के विचरण से पवित्र इस पर्वतीय प्रदेश को देखो; यह चारों ओर मृगों से ऐसा भरा है जैसे सागर महान् मकरों से।
Verse 12
एते मृगगणा भान्ति शीघ्रवेगाः प्रचोदिताः। वायुप्रविद्धा श्शरदि मेघराजिरिवाम्बरे।।2.93.12।।
हांक दिए जाने पर ये शीघ्रगामी मृग-समूह ऐसे दीखते हैं, जैसे शरद्-आकाश में वायु से बिखरी हुई मेघ-रेखाएँ।
Verse 13
कुर्वन्ति कुसुमापीडान् शिरस्सु सुरभीनमी। मेघप्रकाशैः फलकैर्दाक्षिणात्या यथा नराः।।2.93.13।।
ये वृक्ष मानो अपने शिर पर सुगंधित पुष्प-मुकुट धारण किए हैं; जैसे दक्षिण देश के पुरुष मेघ-सी उज्ज्वल ढालों को शिरोभूषण की भाँति पहनते हैं।
Verse 14
निष्कूजमिव भूत्वेदं वनं घोरप्रदर्शनम्। अयोध्येव जनाकीर्णा सम्प्रति प्रतिभाति मा।।2.93.14।।
जो वन पहले पक्षियों के कूजन से रहित और देखने में भयानक था, वही अब मुझे अयोध्या की भाँति जनसमूह से परिपूर्ण प्रतीत होता है।
Verse 15
खुरैरुदीरितो रेणुर्दावं प्रच्छाद्य तिष्ठति। तं वहत्यनिल श्श्रीघ्रं कुर्वन्निव मम प्रियम्।।2.93.15।।
घोड़ों के खुरों से उड़ी धूल वन को ढँककर ठहर जाती है; पर वायु उसे शीघ्र ही उड़ा ले जाती है, मानो मेरे लिए उपकार कर रही हो।
Verse 16
स्यन्दनांस्तुरगोपेतान्सूतमुख्यै रधिष्ठितान्। एतान्सम्पततश्श्रीघ्रं पश्य शत्रुघ्न कानने।।2.93.16।।
हे शत्रुघ्न, देखो—श्रेष्ठ सारथियों द्वारा संचालित ये घोड़े-जुते रथ वन में शीघ्रता से मानो उड़ते हुए आ रहे हैं।
Verse 17
एतान्वित्रासितान्पश्यबर्हिणः प्रियदर्शनान्। एतमाविशत श्श्रीघ्रमधिवासं पतत्रिणः।।2.93.17।।
देखो, ये मनोहर मोर भयभीत होकर—और अन्य पक्षियों सहित—शीघ्र ही अपने निवास-स्थानों में जा घुसते हैं।
Verse 18
अतिमात्रमयं देशो मनोज्ञः प्रतिभाति मे। तापसानां निवासोऽयं व्यक्तं स्वर्गपथो यथा।।2.93.18।।
यह प्रदेश मुझे अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता है। तपस्वियों का निवास होने से यह मानो स्पष्ट ही स्वर्ग-मार्ग के समान जान पड़ता है॥
Verse 19
मृगा मृगीभिः सहिता बहवः पृषता वने। मनोज्ञरूपा दृश्यन्ते कुसुमैरिव चित्रिताः।।2.93.19।।
इस वन में अनेक चित्तीदार मृग अपनी मृगियों के साथ दिखाई देते हैं। वे मनोहर रूप वाले, मानो पुष्पों से चित्रित किए हुए से लगते हैं॥
Verse 20
साधु सैन्याः प्रतिष्ठन्तां विचिन्वन्तु च कानने। यथा तौ पुरुषव्याघ्रौ दृश्येते रामलक्ष्मणौ।।2.93.20।।
सेनाएँ विधिवत् आगे बढ़ें और वन में खोज करें, जब तक वे दोनों पुरुष-व्याघ्र—राम और लक्ष्मण—दृष्टिगोचर न हो जाएँ॥
Verse 21
भरतस्य वचश्श्रुत्वा पुरुषाश्शस्त्रपाणयः। विविशु स्तद्वनं शूरा धूमं च ददृशु स्ततः।।2.93.21।।
भरत की आज्ञा सुनकर शस्त्र-धारी वीर पुरुष उस वन में प्रविष्ट हुए; और तब उन्होंने वहाँ धुआँ उठता हुआ देखा॥
Verse 22
ते समालोक्य धूमाग्रमूचुर्भरतमागताः। नामनुष्ये भवत्यग्नि र्व्यक्तमत्रैव राघवौ।।2.93.22।।
धुएँ का स्तम्भ देखकर वे भरत के पास लौट आए और बोले—“निर्जन स्थान में अग्नि अपने-आप नहीं उठती; स्पष्ट है कि दोनों राघव यहीं हैं।”
Verse 23
अथ नाऽत्र नरव्याघ्रौ राजपुत्रौ परन्तपौ। अन्ये रामोपमा स्सन्ति व्यक्तमत्र तपस्विनः।।2.93.23।।
और यदि यहाँ वे शत्रु-दमन करने वाले, व्याघ्र-सदृश दोनों राजकुमार न हों, तो निश्चय ही यहाँ राम के समान अन्य तपस्वी निवास करते हैं।
Verse 24
तच्छ्रुत्वा भरतस्तेषां वचनं साधुसम्मतम्। सैन्यानुवाच सर्वांस्तानमित्रबलमर्दनः।।2.93.24।।
उनके धर्मसम्मत वचनों को सुनकर, शत्रुबल का मर्दन करने वाले भरत ने उन समस्त सेनाओं से कहा।
Verse 25
यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु नेतो गन्तव्यमग्रतः। अहमेव गमिष्यामि सुमन्त्रो गुरुरेव च।।2.93.25।।
आप सब सावधान होकर यहीं ठहरें; यहाँ से आगे नहीं जाना है। मैं ही आगे जाऊँगा—सुमन्त्र और पूज्य गुरु के साथ।
Verse 26
एवमुक्ता स्ततस्सर्वे तत्र तस्थुः समन्तः। भरतो यत्र धूमाग्रं तत्र दृष्टिं समादधात्।।2.93.26।।
ऐसा कहे जाने पर वे सब चारों ओर वहीं ठहर गए। तब भरत ने जहाँ धुएँ की धारा उठ रही थी, उसी ओर अपनी दृष्टि स्थिर कर दी॥
Verse 27
व्यवस्थिता या भरतेन सा चमूर्निरीक्षमाणाऽपि च भूमिमग्रतः। बभूव हृष्टा न चिरेण जानती प्रियस्य रामस्य समागमं तदा।।2.93.27।।
भरत द्वारा रोकी गई वह सेना—यद्यपि आगे की भूमि को देखती हुई—फिर भी यह जानकर कि शीघ्र ही प्रिय राम से मिलन होगा, आनंदित हो उठी॥
The key action is Bharata’s disciplined leadership: he halts the massive army to avoid disorder in the forest and proceeds forward only with trusted elders (Sumantra and Vasiṣṭha), balancing urgency to find Rama with restraint and responsibility.
The sarga models dharma as practical discernment: signs in the world (the smoke column) are interpreted through reason and moral context, showing how right action combines observation, inference, and controlled conduct rather than impulse.
Citrakūṭa mountain and the Mandākinī river are explicitly identified; the chapter also highlights ascetic habitation as a cultural marker that redefines the forest from “dreadful” to spiritually hospitable, “like a pathway to heaven.”
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