Ramayana Ayodhya Kanda Sarga 117
Ayodhya KandaSarga 11728 Verses

Sarga 117

अत्र्याश्रमगमनम् तथा अनसूयोपदेशः (Arrival at Atri’s Hermitage and Anasuya’s Counsel)

अयोध्याकाण्ड

तपस्वियों के चले जाने पर श्रीराम उस स्थान पर आगे ठहरना उचित नहीं समझते। भरत, रानियों और अयोध्यावासियों की स्मृतियाँ मन को व्याकुल करती हैं, और भरत की सेना के पड़ाव से घोड़ों-हाथियों आदि के कारण भूमि भी दूषित हो गई थी। इसलिए राम सीता और लक्ष्मण के साथ वहाँ से प्रस्थान कर भगवान् अत्रि के आश्रम पहुँचते हैं। राम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं। अत्रि उन्हें पुत्रवत् स्नेह से ग्रहण कर आदर्श आतिथ्य करते हैं और लक्ष्मण तथा सीता को भी सांत्वना देते हैं। फिर वे अपनी वृद्धा पत्नी, कठोर तप से प्रसिद्ध तपस्विनी अनसूया को बुलाते हैं—जिनके लोकहितकारी तपोबल की महिमा (अन्न-समृद्धि कराना, गंगा-प्रवाह का कारण बनना, विघ्नों का निवारण, तथा देवकार्य हेतु काल-परिवर्तन-सम तप) प्रसिद्ध है—और सीता को उनके पास जाने को कहते हैं। सीता अनसूया की प्रदक्षिणा कर प्रणाम करती हैं, उनके अत्यन्त वृद्ध और काँपते शरीर को देखकर कुशल-क्षेम पूछती हैं। सीता के धर्माचरण से प्रसन्न अनसूया, राम के साथ वनकष्ट सहकर चलने के निर्णय की प्रशंसा करती हैं और पतिव्रता-धर्म का उपदेश देती हैं—सज्जन स्त्री के लिए पति ही परम आश्रय और देवतुल्य है; निष्ठा से कीर्ति और पुण्य मिलता है, जबकि असंयमित कामना पतन और अपकीर्ति का कारण बनती है। इस प्रकार सर्ग में यात्रा-वृत्त, सत्कार-विधि, तपोमहिमा और सीता के लिए नीति-उपदेश का समन्वय है।

Shlokas

Verse 1

राघव स्त्वथ यातेषु तपस्विषु विचिन्तयन्।न तत्रारोचयद्वासं कारणैर्बहुभिस्तदा।।।।

तपस्वियों के चले जाने पर राघव ने विचार किया और अनेक कारणों से तब वहाँ निवास करना उचित न समझा।

Verse 2

इह मे भरतो दृष्टो मातरश्च सनागराः।सा च मे स्मृतिरन्वेति तान्नित्यमनुशोचतः।।।।

यहाँ मैंने भरत को, अपनी माताओं को और नगरवासियों को भी देखा। उनके लिए निरन्तर शोक करते हुए वही स्मृति मुझे बार-बार आ घेरती है।

Verse 3

स्कन्धावारनिवेशेन तेन तस्य महात्मनः।हयहस्तिकरीषैश्च उपमर्दः कृतो भृशम्।।।।

उस महात्मा भरत की सेना के वहाँ पड़ाव डालने से वह स्थान घोड़ों और हाथियों के गोबर से तथा रौंदे जाने के कारण अत्यन्त मलिन और बिगड़ गया।

Verse 4

तस्मादन्यत्र गच्छाम इति सञ्चिन्त्य राघवः।प्रातिष्ठत स वैदेह्या लक्ष्मणेन च सङ्गतः।।।।

“अतः अब हम अन्यत्र चलें,” ऐसा निश्चय कर राघव वैदेही और लक्ष्मण के साथ प्रस्थान कर गए।

Verse 5

सोऽत्रेराश्रममासाद्य तं ववन्दे महायशाः।तं चापि भगवानत्रिः पुत्रवत्प्रत्यपद्यत।।।।

अत्रि के आश्रम में पहुँचकर महायशस्वी राम ने मुनि को प्रणाम किया; और भगवान् अत्रि ने भी उन्हें पुत्रवत् स्नेह से ग्रहण किया।

Verse 6

स्वयमातिथ्यमादिश्य सर्वमन्यत्सुसत्कृतम्।सौमित्रिं च महाभागां सीतां च समसान्त्वयत्।।।।

अत्रि ने स्वयं यथोचित अतिथि-सत्कार की व्यवस्था की; और सौमित्रि तथा महाभागा सीता को भी मधुर वचनों से ढाढ़स बँधाया।

Verse 7

पत्नीं च समनुप्राप्तां वृद्धामामन्त्र्य सत्कृताम्।सान्त्वयामास धर्मज्ञः सर्वभूतहिते रतः।।।।

धर्मज्ञ और सर्वभूतहित-रत अत्रि ने अभी-अभी आई हुई, सबके द्वारा पूजिता अपनी वृद्धा पत्नी को बुलाकर सान्त्वना दी।

Verse 8

आनसूयां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम्प्रतिगृह्णीष्व वैदेहीमब्रवीदृषिसत्तमः।रामाय चाऽचचक्षे तां तापसीं धर्मचारिणीम्।।।।

ऋषिश्रेष्ठ ने धर्मचारिणी महाभागा तपस्विनी अनसूया से कहा—“वैदेही को स्वीकार करो।” और राम से भी उस धर्मनिष्ठा तपस्विनी का परिचय कराया।

Verse 9

दश वर्षाण्यनावृष्ट्या दग्धे लोके निरन्तरम्।।।।यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी च प्रवर्तिता।उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलङ्कृता।।।।दश वर्ष सहास्राणि तया तप्तं महत्तपः।अनसूया व्रतै स्स्नाता प्रत्यूहाश्च निवर्तिताः।।।।देवकार्यनिमित्तं च यया सन्त्वरमाणया।दशरात्रं कृता रात्रि स्सेयं मातेव तेऽनघ।।।।

हे अनघ राम! जब दस वर्षों तक अनावृष्टि से संसार निरन्तर दग्ध हो रहा था, तब इसी ने मूल‑फल उत्पन्न कराए और जाह्नवी (गङ्गा) को प्रवाहित किया। उग्र तप से युक्त और नियमों से विभूषित होकर इसने दस सहस्र वर्षों तक महान् तप किया; व्रतों में स्नात होकर इसने विघ्नों को निवृत्त किया। देवकार्य के निमित्त शीघ्रता करती हुई इसने दस रात्रियों को एक ही रात्रि के समान कर दिया। ऐसी यह अनसूया तुम्हारे लिए माता के समान है।

Verse 10

दश वर्षाण्यनावृष्ट्या दग्धे लोके निरन्तरम्।।2.117.9।।यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी च प्रवर्तिता।उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलङ्कृता।।2.117.10।।दश वर्ष सहास्राणि तया तप्तं महत्तपः।अनसूया व्रतै स्स्नाता प्रत्यूहाश्च निवर्तिताः।।2.117.11।।देवकार्यनिमित्तं च यया सन्त्वरमाणया।दशरात्रं कृता रात्रि स्सेयं मातेव तेऽनघ।।2.117.12।।

जिसने मूल-फल उत्पन्न किए और जाह्नवी (गंगा) को प्रवाहित किया; जो उग्र तपस्या में युक्त और नियमों से अलंकृत थी।

Verse 11

दश वर्षाण्यनावृष्ट्या दग्धे लोके निरन्तरम्।।2.117.9।।यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी च प्रवर्तिता।उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलङ्कृता।।2.117.10।।दश वर्षसहास्राणि यया तप्तं महत् तपः।अनसूया व्रतै स्स्नाता प्रत्यूहाश्च निवर्तिताः।।2.117.11।।देवकार्यनिमित्तं च यया सन्त्वरमाणया।दशरात्रं कृता रात्रि स्सेयं मातेव तेऽनघ।।2.117.12।।

उसने दस हज़ार वर्षों तक महान् और कठोर तप किया। व्रतों से पवित्र अनसूया ने उत्पन्न होने वाले विघ्नों को भी दूर कर दिया।

Verse 12

दश वर्षाण्यनावृष्ट्या दग्धे लोके निरन्तरम्।।2.117.9।।यया मूलफले सृष्टे जाह्नवी च प्रवर्तिता।उग्रेण तपसा युक्ता नियमैश्चाप्यलङ्कृता।।2.117.10।।दश वर्ष सहास्राणि तया तप्तं महत्तपः।अनसूया व्रतै स्स्नाता प्रत्यूहाश्च निवर्तिताः।।2.117.11।।देवकार्यनिमित्तं च यया सन्त्वरमाणया।दशरात्रं कृता रात्रि स्सेयं मातेव तेऽनघ।।2.117.12।।

देवकार्य के निमित्त, शीघ्र संकल्प से युक्त उस देवी ने दस रात्रियों को एक ही रात्रि कर दिया। हे निष्पाप, वह तुम्हारे लिए माता के समान है।

Verse 13

तामिमां सर्वभूतानां नमस्कार्यां यशस्विनीम्अभिगच्छतु वैदेही वृद्धामक्रोधनां सदा।अनसूयेति या लोके कर्मभिः ख्यातिमागता।।।।

सब प्राणियों के लिए वन्दनीय, यशस्विनी, वृद्धा और सदा अक्रोधिनी—कर्मों से ‘अनसूया’ नाम से जगत् में प्रसिद्ध उस देवी के पास वैदेही जाए।

Verse 14

एवं ब्रुवाणं तमृषिं तथेत्युक्त्वा स राघवः।सीतामुवाच धर्मज्ञामिदं वचनमुत्तमम्।।।।

इस प्रकार कहने वाले उस ऋषि से ‘तथास्तु’ कहकर राघव ने धर्मज्ञा सीता से ये उत्तम वचन कहे।

Verse 15

राजपुत्रि श्रुतमिदं मुनेरस्य समीरितम्।श्रेयोऽर्थमात्मनश्शीघ्रमभिगच्छ तपस्विनीम्।।।।

राजकुमारी, तुमने इस मुनि का कहा हुआ वचन सुन लिया है। अपने कल्याण के लिए शीघ्र ही उस तपस्विनी के पास जाकर उनसे भेंट करो॥

Verse 16

सीता त्वेतद वचः श्रुत्वा राघवस्य हितैषिणः।तामत्रिपन्तीं धर्मज्ञामभिचक्राम मैथिली।।।।

राघव के हितकारी वचन सुनकर मिथिला की सीता, धर्मज्ञ अत्रि-पत्नी अनसूया के पास चली गई॥

Verse 17

शिथिलां वलितां वृद्धां जरापाण्डुरमूर्धजाम्।सततं वेपमानाङ्गीं प्रवाते कदलीं यथा।। ।।तां तु सीता महाभागामनसूयां पतिव्रताम्।अभ्यवादयदव्यग्रा स्वं नाम समुदाहरत्।।।।

वह दुर्बल, झुर्रियों से युक्त, वृद्धा थी; जरा से उसके केश श्वेत हो गए थे। उसके अंग निरंतर काँपते थे, जैसे तेज़ हवा में केला का वृक्ष॥

Verse 18

शिथिलां वलितां वृद्धां जरापाण्डुरमूर्धजाम्।सततं वेपमानाङ्गीं प्रवाते कदलीं यथा।। 2.117.17।।तां तु सीता महाभागामनसूयां पतिव्रताम्।अभ्यवादयदव्यग्रा स्वंनाम समुदाहरत्।।2.117.18।।

तब सीता ने अव्यग्र होकर महाभागा पतिव्रता अनसूया को प्रणाम किया और अपना नाम निवेदित किया॥

Verse 19

अभिवाद्य च वैदेही तापसीं तामनिन्दिताम्।बद्धाञ्जलिपुटा हृष्टा पर्यपृच्छदनामयम्।।।।

वैदेही ने उस अनिन्दिता तापसी को प्रणाम किया; फिर हर्षित होकर, हाथ जोड़कर, उनके कुशल-क्षेम के विषय में पूछा॥

Verse 20

ततस्सीतां महाभागां दृष्ट्वा तां धर्मचारिणीम्।सान्त्वयन्त्यब्रवीद्धृष्टा दिष्ट्या धर्ममवेक्षसे।।।।

तब धर्मपरायणा महाभागा सीता को देखकर अनसूया हर्षित हुईं और उसे सान्त्वना देती हुई बोलीं—“धन्य हो, तुम धर्म का ही अनुसरण कर रही हो।”

Verse 21

त्यक्त्वा ज्ञातिजनं सीते मानमृद्धं च भामिनि।अवरुद्धं वने रामं दिष्ट्या त्वमनुगच्छसि।।।।

“हे सीते, हे कुलवती! अपने स्वजनों को और समृद्ध मान-सुख को त्यागकर, वनवास में बँधे हुए राम के पीछे तुम सौभाग्य से चल रही हो।”

Verse 22

नगरस्थो वनस्थो वा पापो वा यदि वा शुभः।यासां स्त्रीणां प्रियो भर्ता तासां लोका महोदयाः।।।।

“पति नगर में रहे या वन में, पापी हो या पुण्यवान—जिन स्त्रियों के लिए पति प्रिय रहता है, वे महान फल देने वाले लोकों को प्राप्त करती हैं।”

Verse 23

दुश्शीलः कामवृत्तो वा धनैर्वा परिवर्जितः।स्त्रीणामार्यस्वभावानां परमं दैवतं पतिः।।।।

“स्त्रियों में जो आर्य-स्वभाव वाली हैं, उनके लिए पति ही परम दैवत है—चाहे वह दुश्चरित्र हो, कामवृत्ति वाला हो, या धन से रहित ही क्यों न हो।”

Verse 24

नातो विशिष्टं पश्यामि बान्धवं विमृशन्त्यहम्।सर्वत्र योग्यं वैदेहि तपः कृतमिवाव्ययम्।।।।

“हे वैदेही! विचार करने पर मुझे पति से बढ़कर कोई बन्धु नहीं दिखता; वह सर्वत्र आश्रय-योग्य है, जैसे किया हुआ तप अविनाशी होता है।”

Verse 25

न त्वेवमवगच्छन्ति गुणदोषमसत्त्स्रियः।कामवक्तव्यहृदया भर्तृनाथाश्चरन्ति याः।।।।

पर दुष्टा स्त्रियाँ इस प्रकार गुण-दोष का विवेक नहीं करतीं। जिनका हृदय कामना और स्वेच्छा से चलायमान है, जो पति को मानो अपने अधीन समझकर इधर-उधर विचरती हैं।

Verse 26

प्राप्नुवन्त्य यशश्चैव धर्मभ्रंशं च मैथिलि।अकार्यवशमापन्नाः स्त्रियो याः खलु तद्विधाः।।।।

हे मैथिली! जो स्त्रियाँ अकार्य के वश में पड़ जाती हैं, वे निश्चय ही अपयश और धर्म-भ्रंश को प्राप्त होती हैं।

Verse 27

त्वद्विधास्तु गुणैर्युक्ता दृष्ट लोक परावराः।स्त्रिय स्स्वर्गे चरिष्यन्ति यथा धर्मकृतस्तथा।।।।

परंतु तुम्हारे जैसी गुणसम्पन्न, लोक में उच्च-नीच का भेद जानने वाली स्त्रियाँ, धर्मकर्म करने वालों की भाँति स्वर्ग में निर्भय विचरेंगी।

Verse 28

तदेवमेनं त्वमनुव्रता सती पतिव्रतानां समयानुवर्तिनी।भव स्वभर्तु स्सहधर्मचारिणी यशश्च धर्मं च तत स्समाप्स्यसि।।।।

अतः तुम सती होकर, राम का अनुगमन करने वाली, पतिव्रताओं की मर्यादा का पालन करने वाली बनो। अपने पति की सहधर्मचारिणी रहो; तब तुम यश और धर्म—दोनों को प्राप्त करोगी।

Frequently Asked Questions

Rāma must decide whether to remain at a place burdened by grief-laden memories and ritual/physical impurity from an army camp; he chooses relocation, prioritizing mental steadiness, appropriate residence, and dharmic propriety during exile.

Anasūyā frames fidelity and disciplined conduct as a woman’s stabilizing dharma: the husband is treated as the highest relational refuge, discernment guards against desire-driven wrongdoing, and steadfast virtue yields lasting renown and merit.

The key landmark is Atri’s forest āśrama, a cultural node of ascetic hospitality and instruction; associated motifs include the skandhāvāra (army encampment) and the sacred Gaṅgā (Jāhnavī) invoked in Anasūyā’s hagiography.

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