
भरतस्य दुःस्वप्नदर्शनम् — Bharata’s Ominous Dream
अयोध्याकाण्ड
इस सर्ग में दूतों के नगर में पहुँचने के समय भोर में भरत का मन एक भयानक दुःस्वप्न से टूट जाता है। स्वप्न में वे पिता दशरथ को अपवित्र और अशुभ स्थितियों में देखते हैं—पर्वत से गिरकर गोबर के कीचड़ में पड़ना, तेल में तैरते हुए तेल पीना, तिल-भात खाना, और बार-बार सिर के बल तेल में डूबना तथा शरीर का लेपित होना। फिर प्रकृति और राज्य-चिह्नों के उलट-पुलट दृश्य आते हैं—समुद्र सूख जाना, चन्द्रमा का गिरना, पृथ्वी का अँधेरा होना, राजहाथी का दाँत टूटना, अग्नि का अचानक बुझ जाना, धरती का फटना, वृक्षों का सूखना और धुएँ से ढके उजड़े पर्वत—जो लोक और राजधर्म दोनों में विक्षोभ का संकेत देते हैं। आगे राजा काले वस्त्र पहनकर लोहे के आसन पर बैठा दिखता है और श्यामवर्ण स्त्रियाँ उसका उपहास करती हैं। फिर वह लाल माला और लाल अनुलेपन से सजा हुआ गधे-जुते रथ पर दक्षिण दिशा की ओर शीघ्र जाता है और अंत में लाल वस्त्रधारी विकराल राक्षसी उसे घसीट ले जाती है। भरत इसे मृत्यु का अपशकुन मानते हैं; उन्हें अपने, राम, राजा या लक्ष्मण के लिए भय होता है और वे स्वप्न-नियम स्मरण करते हैं कि गधे-जुते वाहन पर किसी को देखना शीघ्र चिता-धूम का सूचक है। मित्र गीत, नृत्य, नाटक और हास्य से उन्हें बहलाना चाहते हैं, पर भरत का कंठ सूखता है, स्वर टूटता है, मुख मुरझाया रहता है और बिना कारण आत्मग्लानि होती है। स्वप्न में राजा का “असमझ” रूप से उपस्थित होना उनके भय को और दृढ़ कर देता है।
Verse 1
यामेव रात्रिं ते दूताः प्रविशन्ति स्म तां पुरीम्।भरतेनापि तां रात्रिं स्वप्नो दृष्टोऽयमप्रियः।।।।
जिस रात वे दूत नगर में प्रविष्ट हुए, उसी रात भरत ने भी यह अप्रिय स्वप्न देखा।
Verse 2
व्युष्टामेव तु तां रात्रिं दृष्ट्वा तं स्वप्नमप्रियम्।पुत्रो राजाधिराजस्य सुभृशं पर्यतप्यत।।।।
रात्रि के उषा होते ही, उस अप्रिय स्वप्न को देखकर महाराजाधिराज का पुत्र अत्यन्त संतप्त हो उठा।
Verse 3
तप्यमानं समाज्ञाय वयस्याः प्रियवादिनः।आयासं हि विनेष्यन्त स्सभायां चक्रिरे कथाः।।।।
उसे शोक से संतप्त जानकर, मधुर वचन बोलने वाले उसके सहचर सभा में उसका क्लेश दूर करने के लिए अनेक प्रकार की बातें करने लगे।
Verse 4
वादयन्ति तथा शान्तिं लास यन्त्यपि चापरे।नाटकान्यपरे प्राहुर्हास्यानि विविधानि च।।।।
उसे शान्त करने के लिए कुछ लोग वाद्य बजाने लगे, कुछ नृत्य करने लगे; कुछ ने नाटक रचे और कुछ ने अनेक प्रकार की हास्य-कथाएँ सुनाईं।
Verse 5
स तैर्महात्मा भरतस्सखिभिः प्रियवादिभिः।गोष्ठीहास्यानि कुर्वद्भिर्न प्राहृष्यत राघवः।।।।
परन्तु महात्मा भरत—रघुवंशी—मधुरभाषी सखाओं द्वारा की गई गोष्ठी, हँसी-ठिठोली और विनोद से भी प्रसन्न न हुआ।
Verse 6
तमब्रवीत्प्रियसखो भरतं सखिभिर्वृतम्।सुहृद्भिः पर्युपासीनः किं सखे नानुमोदसे।।।।
तब सुहृदों के बीच निकट बैठा एक प्रिय सखा, सखाओं से घिरे भरत से बोला—“हे सखे, तुम प्रसन्न क्यों नहीं होते?”
Verse 7
एवं ब्रुवाणं सुहृदं भरतः प्रत्युवाच ह।श्रुणु त्वं यन्निमित्तं मे दैन्यमेतदुपागतम्।।।।
मित्र के ऐसा कहने पर भरत ने उत्तर दिया—“सुनो, जिस कारण से मुझ पर यह दैन्य और विषाद आ पड़ा है, वह मैं कहता हूँ।”
Verse 8
स्वप्ने पितरमद्राक्षं मलिनं मुक्त मूर्धजम्।पतन्तमद्रिशिखरात्कलुषे गोमयह्रदे।।।।
स्वप्न में मैंने अपने पिता को देखा—मलिन, बिखरे केशों वाले—जो पर्वत-शिखर से गिरकर गोबर से भरे उस कलुषित ह्रद में जा पड़े।
Verse 9
प्लवमानश्च मे दृष्टस्स तस्मिन्गोमयह्रदे।पिबन्नञ्जलिना तैलं हसन्नपि मुहुर्मुहुः।।।।
उस गोबर-ह्रद में वह तैरता हुआ मुझे दिखा; वह अंजलि में तेल लेकर पी रहा था और बार-बार हँस भी रहा था।
Verse 10
ततस्तिलौदनं भुक्त्वा पुनः पुनरधश्शिराः।तैलेनाभ्यक्तसर्वाङ्गः तैलमेवान्वगाहत।।।।
फिर मैंने उसे तिल मिले हुए भात को खाते देखा; उसका सारा शरीर तेल से लिपटा था और वह बार-बार सिर के बल तेल में ही डूबता जाता था।
Verse 11
स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भवि।उपरुद्धां च जगतीं तमसेव समावृताम्।।।।औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम्।सहसाचापि संशान्तं ज्वलितं जातवेदसम्।।।।अवतीर्णां च पृथिवीं शुष्कां श्च विविधान् द्रुमान्।अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चापि पर्वतान्।।।।
स्वप्न में भी मैंने समुद्र को सूखा और चन्द्रमा को पृथ्वी पर गिरा हुआ देखा; सारी धरती मानो घुटी हुई और अन्धकार से ढकी थी। मैंने राजसवारी हाथी का दाँत टूटकर चूर-चूर होते देखा, और धधकती अग्नि को सहसा शांत होते देखा। पृथ्वी को धँसी हुई, अनेक प्रकार के वृक्षों को सूखा हुआ, और पर्वतों को ध्वस्त तथा धुएँ से घिरे हुए भी मैंने देखा।
Verse 12
स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भवि।उपरुद्धां च जगतीं तमसेव समावृताम्।।2.69.11।।औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम्।सहसाचापि संशान्तं ज्वलितं जातवेदसम्।।2.69.12।।अवतीर्णां च पृथिवीं शुष्कां श्च विविधान् द्रुमान्।अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चापि पर्वतान्।।2.69.13।।
स्वप्न में मैंने देखा—राजोपयोगी, सवारी-योग्य हाथी का दाँत टुकड़े-टुकड़े हो गया और धधकती अग्नि भी सहसा शांत हो गई; ये बल और श्री-व्यवस्था के पतन के सूचक अपशकुन थे।
Verse 13
स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भवि।उपरुद्धां च जगतीं तमसेव समावृताम्।।2.69.11।।औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम्।सहसाचापि संशान्तं ज्वलितं जातवेदसम्।।2.69.12।।अवतीर्णां च पृथिवीं शुष्कां श्च विविधान् द्रुमान्।अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चापि पर्वतान्।।2.69.13।।
मैंने पृथ्वी को मानो धँसी और फटी हुई देखा; अनेक प्रकार के वृक्ष सूख गए थे, और पर्वत भी ध्वस्त होकर धुएँ से युक्त दिखे।
Verse 14
पीठे कार्ष्णायसे चैनं निषण्णं कृष्णवाससम्।प्रहसन्ति स्म राजानं प्रमदाः कृष्णपिङ्गलाः।।।।
मैंने राजा को लोहे की पीठ पर बैठा, काले वस्त्र धारण किए देखा; और काली-पीली (श्याम-पिंगल) स्त्रियाँ उस पर हँस रही थीं।
Verse 15
त्वरमाणश्च धर्मात्मा रक्तमाल्यानुलेपनः।रथेन खरयुक्तेन प्रयातो दक्षिणामुखः।।।।
मैंने उस धर्मात्मा राजा को शीघ्रता करते हुए देखा—लाल माला और लाल अनुलेपन से अलंकृत—गधों से जुते रथ पर दक्षिणाभिमुख प्रस्थान करता हुआ।
Verse 16
प्रहसन्तीव राजानं प्रमदा रक्तवासिनी।प्रकर्षन्ती मया दृष्टा राक्षसी विकृतानना।।।।
मैंने लाल वस्त्र धारण किए, विकृत मुख वाली राक्षसी-स्त्री को देखा—जो मानो राजा का उपहास करती हुई उसे घसीटकर ले जा रही थी।
Verse 17
एवमेतन्मया दृष्टमिमां रात्रिं भयावहम्।अहं रामोऽथवा राजा लक्ष्मणो वा मरिष्यति।।।।
ऐसा ही भयावह स्वप्न मैंने बीती रात देखा—या तो मैं, या श्रीराम, या महाराज, अथवा लक्ष्मण का देहान्त होगा।
Verse 18
नरो यानेन य स्स्वप्ने स्वरयुक्तेन याति हि।अचिरात्तस्य धूमाग्रं चितायां सम्प्रदृश्यते।।।।
स्वप्न में यदि कोई पुरुष गधों से जुते रथ पर जाता दिखे, तो शीघ्र ही उसकी चिता से उठता धुएँ का शिखर दिखाई देता है—ऐसा अपशकुन माना गया है।
Verse 19
एतन्निमित्तं दीनोऽहं तन्नवः प्रतिपूजये।शुष्यतीव च मे कण्ठः न स्वस्थमिव मे मनः।।।।
इसी निमित्त से मैं अत्यन्त दीन हो गया हूँ; आपके वचनों का यथोचित प्रत्युत्तर भी नहीं दे पा रहा। मेरा कण्ठ मानो सूख रहा है और मन भी स्वस्थ नहीं लगता।
Verse 20
न पश्यामि भयस्थानं भयं चैवोपधारयेभ्रष्टश्च स्वरयोगो मे छाया चोपहता मम।जुगुप्सन्निव चाऽत्मानं न पश्यमि च कारणम्।।।।
भय का कोई निश्चित कारण मुझे दिखाई नहीं देता, फिर भी भय ही भय मन में उठ रहा है। मेरा स्वर डगमगा गया है, मुखकान्ति भी म्लान हो गई है; मैं मानो अपने ही से घृणा करता हूँ, और इसका कारण भी नहीं समझ पाता।
Verse 21
इमां च दुस्स्वप्नगतिं निशाम्यतामनेकरूपामवितर्कितां पुरा।भयं महत्तद्धृदयान्नयाति मे विचिन्त्य राजानमचिन्तदर्शनम्।।।।
इस भयानक स्वप्न-गति को—अनेक रूपों वाली, पहले कभी न सोची गई—देखकर, और उस राजा की अचिन्त्य दशा पर विचार करके, मेरे हृदय से महान भय दूर नहीं होता।
The dilemma is interpretive and moral: Bharata must process foreboding signs without clear evidence, while remaining responsible in speech and conduct; he fears imminent death within the royal family and struggles to respond appropriately to companions and circumstance.
The chapter emphasizes the epic’s moral psychology: fear can arise without visible cause, and omens function as narrative instruments linking inner apprehension to public catastrophe; companionship may console, yet dharma requires steadiness when signs suggest impermanence and loss.
Ayodhyā and the sabhā (assembly) frame the social setting, while dream-landmarks—adriśikhara (mountain peak), gomaya-hrada (cow-dung pool), citā (funeral pyre), and the southward direction—encode cultural notions of impurity, death-portents, and inauspicious transit.
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