Ramayana - Yuddha Kanda
JusticeResponsibilityConsequence of actions

Yuddha Kanda - (Book of War/Battle)

युद्धकाण्ड

युद्धकाण्ड वाल्मीकि-रचित आदिकाव्य का वीर-रस और तत्त्व-चिन्तन से परिपूर्ण चरम शिखर है। इसमें लंका-अभियान का विस्तृत वर्णन है, जिसका फल सीता की पुनर्प्राप्ति और रावण का पतन है। आरम्भ में हनुमान सीता-संदेश का सफल प्रतिवेदन करते हैं; फिर राम और सुग्रीव के नेतृत्व में वानर-सेना का संगठन, रणनीति और संकल्प दृढ़ होता है। समुद्र-तट पर राम का सागरदेव से विधिपूर्वक निवेदन, तीन रात्रियों का अनुष्ठान, उसके बाद उत्पन्न दैवी-क्षोभ और अंततः नल-नील आदि द्वारा सेतु-निर्माण—इन प्रसंगों से कथा लंका के दुर्गम, वैभवशाली और भयावह नगर-परिदृश्य में प्रवेश करती है। इस काण्ड की विशेषता ‘मंत्र’ और ‘युद्ध’ का निरन्तर आवर्तन है। रावण की सभा में विचार-विमर्श, विभीषण के धर्मसम्मत उपदेश, हितवचन का तिरस्कार और फिर विभीषण का राम की शरण में आना—ये सब युद्ध-प्रसंगों के साथ समानान्तर चलते हैं। सेनाओं के व्यूह, नायकों की सूची और रण-ध्वनियों के बीच राक्षस-वीरों की क्रमिक “लहरें” आती हैं—धूम्राक्ष, वज्रदंष्ट्र, प्रहस्त, कुम्भकर्ण और इन्द्रजित—और प्रत्येक पराजय यह स्पष्ट करती है कि अधर्म अंततः रणनीतिक अंधता, अलगाव और विनाश को जन्म देता है। काव्य-भाषा बार-बार ब्रह्माण्डीय विस्तार लेती है—अपशकुन, प्रचण्ड आँधियाँ, रक्त-नदियों की उपमा, प्रलय-सदृश दृश्य—पर साथ ही शोक का अंतरंग स्वर बना रहता है। अशोक-वाटिका में सीता के विलाप, राम की मानवीय असुरक्षा, लक्ष्मण का पराक्रम और हनुमान की बुद्धि-धैर्य—ये युद्ध के नैतिक दाँव को तीव्र करते हैं। इन्द्रजित का मायायुद्ध, राम-लक्ष्मण का स्तम्भन, सीता को दिखाया गया उनका प्रतीत-पराजय, और फिर निकुम्भिला-प्रसंग में उसकी यज्ञ-शक्ति का प्रतिकार—इनसे धर्म-युद्ध की सूक्ष्म नीति उजागर होती है। समग्र महाकाव्य की संरचना में युद्धकाण्ड राजधर्म की निर्णायक परीक्षा-भूमि है। यहाँ बल का प्रयोग तभी धर्म्य माना गया है जब वह सत्य, संयम, मित्र-धर्म, शरणागत-रक्षा और निर्दोषों के संरक्षण से नियंत्रित हो। विभीषण का शरणागत-धर्म, वानर-समुदाय की एकता, सेतु-निर्माण का लोकहितकारी पुरुषार्थ, तथा कुम्भकर्ण-वध के बाद लंका का मनोबल-भंग—ये सब रावण के विरुद्ध अंतिम चरण की भूमिका बनाते हैं। यह संक्षेप IIT कानपुर की दक्षिणी पाठ-परम्परा के अनुरूप है, जिसमें कुछ अतिरिक्त परम्परागत पद्य सुरक्षित हैं और कुछ युद्ध-वर्णन व सभाई विमर्श अधिक विस्तार पाते हैं।

Sargas in Yuddha Kanda

Sarga 1

प्रथमः सर्गः — Rama Praises Hanuman; Anxiety over Crossing the Ocean

इस सर्ग में श्रीराम हनुमान की दी हुई सूचना सुनकर स्नेहपूर्वक उन्हें विधिवत् प्रशंसा देते हैं। वे हनुमान के कार्य को लगभग अनुपम बताते हैं—महासागर को लाँघकर कड़ी सुरक्षा वाली लंका में प्रवेश करना और वैदेही का पता लगाना—और इसे आदर्श भृत्य-धर्म का उदाहरण ठहराते हैं। साथ ही सेवकों का क्रमिक भेद बताते हैं: जो भक्तिभाव से कठिन कार्य सिद्ध करे वह उत्तम; जो राजा के प्रिय को पहले से न समझे वह मध्यम; और जो सौंपे हुए काम को भी न निभाए वह अधम। राम स्वीकार करते हैं कि हनुमान की सफलता से रघुवंश की रक्षा हुई, क्योंकि सीता का स्थान निश्चित हो गया। फिर भी वे करुण भाव से कहते हैं कि ऐसे प्रिय वचन और सेवा का प्रतिदान वे अभी पर्याप्त रूप से नहीं दे सकते; उस समय उनके पास देने को केवल आलिंगन ही है। इसके बाद प्रसंग उत्सव से नीति और रणनीति की ओर मुड़ता है। सूचना मिल जाने पर भी राम का मन विशाल, दुस्तर समुद्र को समस्त वानर-सेना सहित पार करने की कठिनता से व्याकुल हो उठता है। शोक से स्पर्शित होकर भी दृढ़ निश्चयी राम हनुमान को केंद्र में रखकर विचार और परामर्श करते हुए समुद्र-लङ्घन की समस्या पर मनन करने लगते हैं।

19 verses | Rama

Sarga 2

युद्धकाण्डे द्वितीयः सर्गः — Sugriva’s Counsel: From Grief to Strategy (Bridge to Lanka)

इस सर्ग में सुग्रीव शोकाकुल राम को निरन्तर उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि क्षत्रिय-नायक के लिए ऐसा शोक शोभा नहीं देता; शोक शौर्य को क्षीण करता है और कार्य-सिद्धि का नाश करता है। इसलिए वे राम से निराशा त्यागकर धैर्य, तेज और आवश्यकता पड़ने पर संयत क्रोध धारण करने का आग्रह करते हैं। फिर सुग्रीव तर्कपूर्वक बताते हैं कि सीता का स्थान ज्ञात है और त्रिकूट पर्वत पर स्थित लंका भी निश्चित है; अतः निष्क्रियता का कोई कारण नहीं। वे वानर-नायकों की सामर्थ्य और उत्साह का स्मरण कराते हैं—वे राम के कार्य के लिए अग्नि में भी प्रवेश करने को तत्पर हैं। सुग्रीव का मुख्य निष्कर्ष यह है कि वरुण के धाम समान भयंकर समुद्र को पार किए बिना लंका पर विजय नहीं हो सकती; इसलिए पहले समुद्र पर सेतु-निर्माण आवश्यक है। सेतु बनते ही और सेना के पार उतरते ही विजय को लगभग सुनिश्चित मानना चाहिए—वे यही विजय-मानदण्ड बार-बार रखते हैं। अंत में शुभ निमित्तों का संकेत देकर वे आश्वस्त करते हैं कि राम के धनुष उठाते ही तीनों लोकों में कोई शत्रु उनका सामना नहीं कर सकता।

25 verses

Sarga 3

लङ्कादुर्गवर्णनम् (Description of Lanka’s Fortifications and Forces)

सुग्रीव की युक्तियुक्त सलाह सुनकर श्रीराम ने हनुमान से स्पष्ट विवरण माँगा—शत्रु-सेना का परिमाण, दुर्ग में प्रवेश के कठिन द्वारों की संख्या और स्वरूप, सुरक्षा-व्यवस्थाएँ तथा राक्षसों के निवास। वाणी-कौशल में श्रेष्ठ हनुमान ने क्रमबद्ध रूप से लंका की दुर्ग-रचना बताने की प्रतिज्ञा की। हनुमान ने लंका को समृद्ध और सदा सतर्क नगर के रूप में वर्णित किया—रथों, मदोन्मत्त हाथियों और असंख्य राक्षसों से भरी हुई; ऊँचे-चौड़े द्वार, धातु-जड़े कपाट और लोहे की सलाखें; बाण और पत्थर बरसाने वाले यंत्र, तथा शतघ्नी जैसे नुकीले अस्त्रों से सुसज्जित प्रहरी। नगर के चारों ओर रत्नजटित स्वर्ण-प्राकार और शीतल जल से भरी गहरी खाइयाँ हैं, जिनमें मछलियाँ और मगर रहते हैं; चल-सेतु यंत्रों से उठाकर प्रवेश रोक दिया जाता है। उन्होंने रावण की निरंतर चौकसी और प्रत्येक द्वार पर तैनात बल-वितरण का भी उल्लेख किया, और नीति-निष्कर्ष दिया कि यदि समुद्र-लांघना हो जाए तो लंका का पतन निश्चित है। अंत में हनुमान ने शुभ समय देखकर शीघ्र सेना-संचालन का आग्रह किया।

34 verses

Sarga 4

समुद्रतट-प्रयाणम् तथा वेलावन-निवेशः (March to the Seacoast and Encampment at the Shore)

हनुमान से लंका का वृत्तांत सुनकर श्रीराम ने क्षणभर भी विलंब न करते हुए निश्चय किया कि राक्षसों के दुर्ग का विनाश कर सीता को शीघ्र वापस लाया जाएगा। उन्होंने प्रस्थान को शुभ बताया—नक्षत्रों की अनुकूलता और मंगल-निमित्तों का उल्लेख करते हुए—और सुव्यवस्थित युद्ध-व्यवस्था के आदेश दिए। नील को अग्रदल का नायक नियुक्त कर जल, फल और मूल से समृद्ध मार्ग सुरक्षित करने तथा राक्षसों द्वारा रसद-नाश रोकने का दायित्व सौंपा; वानरों को दलदली भूमि, वन-दुर्ग और छिपे ठिकानों सहित कठिन प्रदेशों की टोह लेने का निर्देश दिया। इसके बाद विशाल वानर-सेना अनुशासित व्यूहों में आगे बढ़ी; नामी सेनानायक पार्श्वों और पृष्ठभाग की रक्षा करते चले। लक्ष्मण ने आकाशीय संकेतों को विजय के शुभ लक्षण बताकर उत्साह बढ़ाया। सेना सह्य और मलय पर्वत-श्रेणियों को पार कर महेन्द्र पर्वत पहुँची और अंततः वरुणालय—महासागर—के तट पर आ लगी। समुद्र को अत्यंत विस्तृत, दुस्तर और आकाश-सा अगाध बताया गया है, जिसमें मकर, सर्प और तिमिंगिल आदि भयानक जलचर विचरते हैं। उसे देखकर श्रीराम ने तट पर वेलावन में शिविर स्थापित करने की आज्ञा दी और समुद्र पार करने के उपाय पर मंत्रणा के लिए सबको बुलाया—यहीं से आगे समुद्र-बाधा के समाधान हेतु रणनीतिक विराम आरंभ होता है।

124 verses

Sarga 5

सेनानिवेशः रामविलापश्च (Encampment on the Northern Shore; Rama’s Lament and Sandhyā)

सर्ग के आरम्भ में नील परम्परा के अनुसार समुद्र के उत्तरी तट पर वानर-सेना का सुव्यवस्थित शिविर स्थापित करता है। मैन्द और द्विविद चारों दिशाओं में गश्त करके छावनी की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। सेना के ठहर जाने पर श्रीराम लक्ष्मण से सीता-वियोग का दीर्घ विलाप करते हैं। वे कहते हैं कि सामान्य शोक समय के साथ घटता है, पर सीता के दर्शन न होने से उनका दुःख दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है; सीता की युवावस्था बीत जाने की चिंता, और राक्षसों के बीच उनकी असहाय स्थिति का भय उन्हें व्याकुल करता है। वे उपमाओं से अपना भाव प्रकट करते हैं—सीता के जीवित होने का समाचार ही उनके प्राणों का आधार है, जैसे सूखा खेत पास के सिंचित खेत की नमी से कुछ जीवित रहता है; और सीता राक्षसों के बीच से वैसे ही प्रकट होंगी जैसे शरद्-ऋतु के बादलों से चन्द्रकला। विलाप के साथ-साथ राम का कर्तव्यबोध और संकल्प भी दृढ़ होता है—रावण का वध कर सीता को वापस लाना ही लक्ष्य है। दिन ढलने पर लक्ष्मण उन्हें सांत्वना देते हैं; श्रीराम शोकग्रस्त होते हुए भी संयम रखकर संध्या-उपासना करते हैं और सीता का स्मरण करते रहते हैं।

58 verses | Rama, Lakshmana

Sarga 6

रावणस्य मन्त्रविचारः — Ravana’s Council on Strategy

इस सर्ग के आरम्भ में रावण लंका में हनुमान के भयावह कृत्यों के परिणामों पर विचार करता है—नगर में प्रवेश, विनाश, प्रमुख राक्षसों का वध और सीता का सफल दर्शन। दुर्लभ लज्जा/ह्री से वह सिर झुकाकर सामूहिक मन्त्रणा की ओर मुड़ता है और स्पष्ट कहता है कि विजय मन्त्र-मूल है। फिर वह पुरुषार्थ और सलाह की गुणवत्ता को तीन भागों में बाँटता है—उत्तम, मध्यम, अधम। उत्तम पुरुष समर्थ मंत्रियों और मित्रों के साथ विचार करके, दैव (धर्म-न्याय की उच्च व्यवस्था) पर विश्वास रखते हुए कार्य करता है; मध्यम अकेले ही निर्णय लेता है; अधम गुण-दोष का विचार किए बिना ‘मैं ही करूँगा’ कहकर अहंकार से, दैव-विश्वास रहित होकर चलता है। राजनीति-नीति में वह मन्त्र के भी तीन स्तर बताता है—शास्त्रसम्मत सर्वसम्मति सर्वोत्तम है; भिन्न मतों के बाद जो एकमत बने वह मध्यम है; और जो हठी गुटबन्दी में एकता के बिना बोला जाए वह निन्दनीय है। अंत में तत्काल संकट प्रकट होता है—हजारों वीर वानरों से घिरे श्रीराम लंका को घेरने आ रहे हैं; इसलिए रावण नगर और सेना—दोनों के हित का उपाय पूछता है।

17 verses

Sarga 7

राक्षसपरिषद्वाक्यम् — Counsel of the Rakshasa Court to Ravana

इस सर्ग में राक्षसों के वृद्ध और वीर सभासद हाथ जोड़कर रावण से कहते हैं। वे राजसभा की प्रशंसा और युद्ध-गर्व से उसके संकल्प को स्थिर करना चाहते हैं—उनका कहना है कि सामने ‘साधारण’ शत्रु हैं, इसलिए राजा को चिंता नहीं करनी चाहिए; पर उनके आकलन में शत्रु-नीति की सूक्ष्म समझ का अभाव भी प्रकट होता है। वे रावण की पूर्व-विजयों का स्मरण कराते हैं—रसातल में नागों का दमन, वासुकि और तक्षक तक का वशीकरण; कैलास पर कुबेर का अपमान और पुष्पक-विमान का हरण; तथा दानव मय की पुत्री मन्दोदरी का भयजनित मैत्री-रूप विवाह। मधु आदि दानवों पर विजय और ‘यमलोक-सागर’ जैसे मृत्यु-सदृश संकटों में उतरकर भी उबर आने की युद्धोपमा से वे रावण की कीर्ति बढ़ाते हैं। अंत में वे नीति बताते हैं—महेश्वर की आराधना और यज्ञ से दुर्लभ वर पाने वाले, तथा पहले इन्द्र को बाँधकर उसके साथ लंका में प्रवेश करने वाले इन्द्रजित को भेजा जाए; वही वानर-सेना का संहार कर सकता है और राम को भी नष्ट करने में समर्थ है।

27 verses | Ravana (addressee)

Sarga 8

युद्धकाण्डे अष्टमः सर्गः — राक्षससभा-युद्धपरामर्शः (War-Council Boasts and Stratagems)

युद्धकाण्ड के इस अष्टम सर्ग में लङ्का की राक्षससभा में हनुमान् द्वारा किए गए पूर्व विघ्नों के बाद युद्ध-परामर्श होता है। अनेक राक्षस-नायक अपनी-अपनी बात रखते हैं—कोई संकट का वर्णन करता है, कोई उपाय बताता है। मेघ-श्याम प्रहस्त हाथ जोड़कर बोलते हुए हनुमान् को तुच्छ ठहराता है और कहता है कि केवल दर्प-शौर्य से नहीं, बल्कि उपाय (कपट-युक्ति) और सतर्कता से विजय मिलेगी। वह प्रस्ताव रखता है कि सहस्रों कामरूप राक्षस मनुष्य-वेष धारण कर राम के पास जाएँ और छलपूर्ण वचनों से राम-लक्ष्मण के मन में भ्रम और अस्थिरता उत्पन्न करें। इसके बाद सभा का स्वर उग्र प्रतिज्ञाओं में बदल जाता है। दुर्मुख अपमान को अक्षम्य बताकर क्रोध प्रकट करता है; वज्रदंष्ट्र रक्त-लिप्त लोहे की गदा उठाता है; वज्रहनु आदि सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान् तथा राम-लक्ष्मण तक को मारने या भक्षण करने की डींगें हाँकते हैं। एक और छल भी कहा जाता है—यह प्रचार करना कि भरत सेना सहित आ रहे हैं, जिससे वानर-सेना में भ्रम फैले। इस प्रकार सर्ग में नीति-युक्ति का संकेत तो मिलता है, पर वह बार-बार अहंकारपूर्ण युद्ध-गर्जना से दब जाता है; धर्ममय संकल्प और अधर्ममय छल के नैतिक विरोध को यह सभा उजागर करती है।

24 verses

Sarga 9

विभीषणोपदेशः — Vibhishana’s Counsel to Ravana

इस सर्ग के आरम्भ में राक्षसों की उग्र तैयारी का वर्णन सूची-सा होता है। इन्द्रजित् आदि प्रमुख राक्षस-नायक क्रोध से भरकर परिघ, पट्टिश, प्रास, शक्ति, शूल, परशु, धनुष-बाण और तीक्ष्ण खड्गों से सुसज्जित होकर उठ खड़े होते हैं और राम, लक्ष्मण, सुग्रीव तथा हनुमान को मार डालने का संकल्प करते हैं। तभी विभीषण बीच में आकर उस सशस्त्र सभा को रोक देते हैं और नीति-युक्त, क्रमबद्ध उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि जो कार्य साम, दान और भेद—इन तीन उपायों से न सधे, उसे भी विचार करके ही पराक्रम से करना चाहिए; तिरस्कार और उतावलेपन से नहीं, बल्कि विधिवत् मूल्यांकन से सफलता मिलती है। वे शत्रु को तुच्छ न मानने की चेतावनी देते हैं—हनुमान का समुद्र-लाँघना उनकी असाधारण सामर्थ्य का प्रमाण है—और रावण के मूल अपराध, सीता-हरण, की धर्मदृष्टि से न्याय्यता पर प्रश्न उठाते हैं। विभीषण शमन का मार्ग बताते हैं—क्रोध त्यागो, धर्मनिष्ठ और दृढ़व्रती राम से व्यर्थ वैर न करो, और मैथिली सीता को लौटा दो; अन्यथा लंका और राक्षसों का विनाश निश्चित है। रावण यह सुनकर सभा को विसर्जित कर महल में चला जाता है; उपदेश औपचारिक रूप से समाप्त होता है, पर चेतावनी का सार उसके हृदय में नहीं उतरता।

23 verses | Vibhishana, Ravana (silent recipient; later action)

Sarga 10

विभीषणोपदेशः — Vibhishana’s Counsel to Ravana and the Catalogue of Omens

प्रातःकाल विभीषण रावण के दुर्गम प्रासाद में पहुँचते हैं। वहाँ स्वर्णमंडित आसन, वेदपाठ, और यज्ञ-तैयारियों का भव्य दृश्य है। शिष्टाचारपूर्वक प्रवेश कर वे मंत्रियों की उपस्थिति में राजवैभव से विराजमान रावण को प्रणाम करते हैं और उचित देश-काल को देखकर उसे ‘हित’—राजनीति और व्यवहार-नीति से युक्त कल्याणकारी परामर्श—देने लगते हैं। विभीषण वैदेही के लंका-आगमन के बाद से दिखे अशुभ-निमित्त बताते हैं—यज्ञाग्नि का धुआँ और चिंगारियाँ देना, अग्नि का ठीक से न जलना; यज्ञस्थलों और हवि में सर्पों व चींटियों का प्रकट होना; पशुओं और युद्ध-वाहनों का व्याकुल व विकृत होना; काकों की कठोर कर्कश ध्वनि, नगर के ऊपर गिद्धों का जमाव, और द्वारों पर मांसभक्षी पशुओं की गर्जना-सी ध्वनियाँ। इन संकेतों से वे निष्कर्ष निकालते हैं कि उचित प्रायश्चित्त यही है—वैदेही को राघव को लौटा देना। वे स्पष्ट करते हैं कि यह बात न मोह से है न लोभ से; मंत्री भय के कारण मौन हैं। पर क्रोध से भरकर रावण अपने अवध्यत्व का दर्प दिखाता है, उपदेश को ठुकराता है और विभीषण को अपमानित कर विदा कर देता है—यहीं से विवेकपूर्ण सलाह का तिरस्कार होकर युद्ध का अनिवार्य होना निश्चित हो जाता है।

30 verses | Vibhishana, Ravana

Sarga 11

रावणस्य सभाप्रवेशः (Ravana Enters the Royal Assembly and Summons Counsel)

युद्धकाण्ड के 11वें सर्ग में रावण, मैथिली के प्रति आसक्ति से क्षीण होकर और पापकर्म के सामाजिक परिणामों को स्मरण कर, बीते हुए समय की तात्कालिकता समझता है और युद्ध-विषयक मंत्रणा को अनिवार्य मानता है। वह अत्यन्त अलंकृत रथ पर आरूढ़ होकर, भेरी-मृदंग और शंखनाद के कोलाहल के बीच, विविध वेश-भूषा और शस्त्रों से सुसज्जित राक्षसों की सुरक्षा में सभा की ओर प्रस्थान करता है। राजमार्ग पर छत्र-चामर, वंदना और स्तुति के साथ राजसी वैभव का दृश्य उपस्थित होता है। फिर वह विश्वकर्मा-निर्मित सदा-प्रकाशमान सभाभवन में प्रवेश करता है, जहाँ स्वर्ण-रजत स्तम्भ, स्फटिक-सा अंतःभाग, स्वर्ण-वस्त्रों की आच्छादन-व्यवस्था और कड़ा पहरा है। रत्नजटित सिंहासन पर बैठकर रावण शीघ्र दूतों को आज्ञा देता है कि लंका भर से राक्षसों को एक महान कार्य—शत्रुओं के विरुद्ध—के लिए तुरंत एकत्र किया जाए। आह्वान से लंका भर जाती है; सेनानायक रथ, घोड़े, हाथी और पैदल आते हैं, वाहन ठहराकर पर्वत-गुहा में सिंहों की भाँति सभा में प्रवेश करते हैं। वे मर्यादा के अनुसार बैठते और मौन रहते हैं। मंत्री, योद्धा और अंत में विभीषण भी आते हैं; चंदन और धूप की सुगंध से सभा भर जाती है। शस्त्रधारी वीरों के बीच रावण वसुओं के मध्य इन्द्र की भाँति दीप्तिमान दिखता है—राजकीय तेज तो उज्ज्वल, पर नैतिक बल भीतर से डगमगाता हुआ।

31 verses | Ravana

Sarga 12

युद्धकाण्डे द्वादशः सर्गः — रावणस्य परिषद्-सम्बोधनं कुम्भकर्णस्य नीत्युपदेशश्च (Ravana’s Council Address and Kumbhakarna’s Counsel)

इस द्वादश सर्ग में लंका की राक्षस-सभा में युद्धनीति का विचार होता है। रावण समस्त राक्षस-समूह का निरीक्षण कर सेनापति प्रहस्त को आदेश देता है कि दुर्ग के भीतर और बाहर चतुरंगिणी सेना को तैनात करके नगर-रक्षा और भी कठोर की जाए। प्रहस्त के तैयार होने की सूचना देने पर रावण अपने निकटस्थों से कहता है कि उसके कार्य मंत्र-परामर्श से ही होते हैं और कभी विफल नहीं होते; कुम्भकर्ण दीर्घ निद्रा में होने से अब तक इस प्रसंग से अनभिज्ञ रहा। फिर रावण दण्डकारण्य से सीता-हरण का औचित्य बताने का प्रयत्न करता है और स्वीकार करता है कि कामवश होकर वह सीता की इच्छा करता रहा, पर उसके अस्वीकार से वह व्याकुल है—यहाँ काम के कारण विवेक डगमगाने से शासन-व्यवस्था में संकट झलकता है। वह समुद्र-लांघने की चिंता भी प्रकट करता है, फिर भी मनुष्यों के प्रति अपने को अजेय बताता है; साथ ही यह भी कहता है कि सुग्रीव सहित वानर-सेना के साथ राम और लक्ष्मण तट पर पहुँचकर सीता को लेने आ गए हैं। रावण की इस काम-आविष्ट वाणी को सुनकर कुम्भकर्ण पहले बिना मंत्र किए निर्णय लेने की भर्त्सना करता है और नीति समझाता है कि उचित उपाय और क्रम के बिना किया गया कार्य निष्फल होता है तथा उतावला निर्णय शत्रु-बल का विचार नहीं करता। फिर भी वह बल से स्थिति सुधारने का वचन देता है—राम-लक्ष्मण का वध और वानर-नायकों का संहार करने की प्रतिज्ञा करता है, और रावण से कहता है कि वह निश्चिन्त होकर धैर्य और भोग में स्थित रहे, युद्ध का भार वह स्वयं उठाएगा।

40 verses

Sarga 13

महापार्श्वस्य परामर्शः — Mahāpārśva’s Counsel and Rāvaṇa’s Confession of Brahmā’s Curse

इस सर्ग में महापार्श्व रावण को सलाह देता है कि वह कूटनीति और शांति के प्रयासों को त्यागकर 'दंड' (बल) का प्रयोग करे और सीता का बलपूर्वक उपभोग करे। रावण इस सलाह से प्रसन्न होता है और अपनी विवशता का रहस्य प्रकट करता है। वह बताता है कि अतीत में जब वह ब्रह्मा के लोक जा रहा था, उसने पुंजिकस्थला नामक अप्सरा के साथ दुर्व्यवहार किया था। इससे क्रोधित होकर ब्रह्मा ने उसे श्राप दिया था कि यदि वह भविष्य में किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करेगा, तो उसका सिर सौ टुकड़ों में फट जाएगा। इसी भय से वह सीता के साथ बलप्रयोग नहीं कर रहा है। अंत में, रावण अपने पराक्रम का बखान करते हुए कहता है कि वह राम की सेना को वैसे ही नष्ट कर देगा जैसे सूर्य तारों की चमक को फीका कर देता है।

21 verses

Sarga 14

विभीषणोपदेशः (Vibhīṣaṇa’s Counsel to Rāvaṇa and the Rākṣasa Court)

इस सर्ग में लंका की सभा में साध्य-असाध्य, धर्म-अधर्म और राज्यनीति पर गंभीर वाद-विवाद होता है। रावण का मत और कुम्भकर्ण की गर्जना सुनकर विभीषण नीति-युक्त उपदेश देते हैं कि राम-विरोध का उद्देश्य असंभव है और अधर्मपूर्ण संकल्प से स्वर्ग-सदृश सफलता नहीं मिल सकती। वे दृष्टांत देते हैं कि जो तैरना नहीं जानता वह समुद्र पार नहीं कर सकता, और बल-तुलना करके धर्मनिष्ठ श्रीराम की रण-श्रेष्ठता और पराक्रम को स्थापित करते हैं। विभीषण बार-बार आग्रह करते हैं कि लंका पर विपत्ति आने से पहले सीता को तुरंत श्रीराम को लौटा दिया जाए, नहीं तो वज्र के समान बाणों से लंका के नायकों के सिर कट जाएंगे। प्रहस्त दर्प से कहता है कि वह देवताओं या किसी से नहीं डरता; तब विभीषण और कठोर चेतावनी देते हुए बताते हैं कि राघव के सामने राक्षस-वीर भी टिक नहीं सकते। फिर चर्चा राजकीय रोग पर आती है—रावण को व्यसन-ग्रस्त, आवेगी और अपने ही कर्मों से बने बंधन में फँसा हुआ, मानो सहस्र-फण वाले सर्प से जकड़ा हुआ कहा गया है। अंत में मंत्री-नीति का सूत्र आता है कि शत्रु-बल, अपनी क्षमता और राज्य की वृद्धि-हानि की स्थिति को तौलकर, केवल राजा के कल्याण हेतु ही विवेकपूर्ण सलाह देनी चाहिए।

22 verses

Sarga 15

विभीषण–इन्द्रजित् संवादः (Vibhishana and Indrajit: Counsel, Boast, and Rebuttal)

इस पंद्रहवें सर्ग में राक्षस-सेनापति मेघनाद (इन्द्रजित) और विभीषण के बीच तीखा वाक्-संघर्ष होता है। बृहस्पति-सदृश बुद्धि वाले विभीषण की चेतावनियों को इन्द्रजित भयजन्य और अनुचित बताकर तिरस्कार करता है। वह विभीषण को कुल में पराक्रमहीन कहकर अपमानित करता है और दर्पपूर्वक कहता है कि राम-लक्ष्मण तो साधारण मनुष्य हैं, जिन्हें कोई भी सामान्य राक्षस युद्ध में मार सकता है; साथ ही वह अपने शौर्य का बखान करता है कि उसने इन्द्र को गिराया और ऐरावत को वश में किया। विभीषण नीति-प्रधान उत्तर देते हैं—इन्द्रजित निर्णय में अपरिपक्व है, वाणी में आत्मघाती है और विनाश निकट होने पर भी रावण के मार्ग को स्वीकार कर मोह में पड़ा है। वे मिथ्या मित्रता और अहितकारी सलाह का दोष दिखाते हुए व्यावहारिक उपाय बताते हैं: सीता को धन-रत्न और आभूषणों सहित राम को सौंप दिया जाए, जिससे शोक का अंत हो और लंका का सर्वनाश टल सके। इस प्रकार सर्ग में अहंकारी सैन्य-गर्व के सामने धर्मयुक्त राज्यनीति और यथार्थ जोखिम-आकलन का स्पष्ट प्रतिपादन होता है।

14 verses

Sarga 16

विभीषणोपदेशे रावणस्य परुषवाक्यम् (Ravana’s Harsh Reply to Vibhishana’s Counsel)

इस सोलहवें सर्ग में सभा के भीतर ‘हितोपदेश’ के प्रसंग से बड़ा विघटन होता है। विभीषण रावण के कल्याण हेतु हित वचन कहते हैं, पर कालचोदित रावण कठोर वाणी से उत्तर देता है। वह अनार्य के साथ मैत्री की निष्फलता को उपमाओं से बताता है—कमलपत्र पर जल का न ठहरना, मधु चखकर भी कृतघ्न भौंरे, स्नान के बाद भी मलिन हाथी, और शरद्-मेघों का गरजकर भी न बरसना—इनसे वह दिखाता है कि जहाँ धर्म नहीं, वहाँ सद्गुण फल नहीं देते। वह विभीषण को धमकाता भी है कि ऐसा वचन कोई और कहता तो तत्काल दंड मिलता। न्यायवादी विभीषण गदा लेकर चार राक्षसों सहित उठते हैं और आकाश में जाकर रावण को फटकारते हैं—ज्येष्ठ भ्राता पूज्य है, पर तुम धर्म से भटक गए हो। वे नीति का सार कहते हैं: मीठा बोलने वाले बहुत हैं, पर अप्रिय होते हुए भी हितकारी सत्य कहने और सुनने वाले दुर्लभ हैं। वे चेताते हैं कि रावण मृत्यु-पाश से बँधा है और राम के ज्वलंत बाणों से आहत होगा; काल के वश में पड़े महाबली भी गिर जाते हैं। अंत में वे ज्येष्ठ के हितैषी होकर बोले वचनों के लिए क्षमा माँगते, रावण को स्वयं और लंका की रक्षा करने को कहते, और विदा होकर चले जाते हैं; कथाकार निष्कर्ष देता है कि मृत्यु के निकट पहुँचे लोग मित्रों की शुभ सलाह नहीं मानते।

28 verses

Sarga 17

विभीषणागमनम् (Vibhīṣaṇa’s Arrival and the Debate on Refuge)

इस सर्ग में शरणागत-धर्म और राजनिति की सावधानी का विचार प्रमुख है। रावण को कठोर वचन कहकर और सीता को लौटाने की सलाह देकर विभीषण चार साथियों सहित लंका छोड़ते हैं और राम के निकट पहुँचते हैं। वे उत्तर तट के पास आकाश में ठहरकर अपना परिचय रावण के छोटे भाई के रूप में देते हैं, सीता-हरण और अशोक-वाटिका में उनके बंधन का वर्णन करते हैं तथा राघव से संरक्षण की याचना करते हुए अपना संदेश पहुँचाने का निवेदन करते हैं। सुग्रीव राज्य-नीति की दृष्टि से इसे संदेह से देखते हैं—रूप बदलने वाले राक्षस गुप्तचर हो सकते हैं; इसलिए कठोर उपाय, सतर्कता, व्यूह-रक्षा, मंत्रणा की गोपनीयता और गुप्तचर-व्यवस्था पर वे बल देते हैं। राम सुग्रीव की युक्ति को मानकर वानर-मंत्रियों से मत पूछते हैं; अंगद, शरभ, जाम्बवान और मैन्द निगरानी, परीक्षा और सावधानीपूर्ण पूछताछ का सुझाव देते हैं। हनुमान व्यवहार-लक्षणों के आधार पर कहते हैं कि विभीषण की वाणी, विनय, धैर्य और स्थिरता में दुर्भाव का संकेत नहीं है; छिपा उद्देश्य प्रायः स्वर और आचरण से प्रकट हो जाता है। इस प्रकार यह अध्याय नीति-सावधानी के साथ शरण देने की धर्म-मीमांसा को जोड़ता है।

157 verses | Vibhīṣaṇa, Sugrīva, Rāma, Aṅgada, Śarabha, Jāmbavān, Mainda, Hanumān

Sarga 18

शरणागति-धर्मनिर्णयः (Decision on Refuge and Dharma) / Rama’s Vow of Protection and the Acceptance of Vibhishana

अठारहवें सर्ग में निर्णायक घड़ी पर विभीषण के शरणागत होने से वानर-शिविर में संशय उठता है। हनुमान की बात सुनकर श्रीराम प्रसन्न होते हैं और कहते हैं कि वे विभीषण के विषय में अपना निर्णय बताएँगे; वे अपने हितैषियों को सुनने के लिए बुलाते हैं। सुग्रीव शंका प्रकट करते हैं कि विभीषण रावण का भेजा हुआ गुप्तचर हो सकता है, इसलिए उसे रोकने या बाँध लेने की सलाह देते हैं। श्रीराम पहले अपने अजेय पराक्रम का स्मरण कराते हैं और फिर धर्म-नीति का आधार रखते हैं। वे उदाहरण देते हैं कि हाथ जोड़कर शरण माँगने वाले को—चाहे वह शत्रु ही क्यों न हो—हानि नहीं पहुँचानी चाहिए; कपोती के आतिथ्य-धर्म का दृष्टांत और कन्दु मुनि के स्मृत धर्म-वचनों का उल्लेख करके वे शरणागत-धर्म को स्थापित करते हैं। अंत में श्रीराम एक दृढ़ प्रतिज्ञा करते हैं—जो कोई भी एक बार “मैं शरण में आया” कहे, वह विभीषण हो, सुग्रीव हो या स्वयं रावण, उसे वे अभय देंगे। इस धर्म-वचन से सुग्रीव का मन बदलता है; वे विभीषण की निर्मलता को पहचानकर उसे स्वीकार करने और तुरंत मित्रता करने का आग्रह करते हैं। फिर श्रीराम विभीषण से मिलने आगे बढ़ते हैं और यह प्रसंग राजधर्म में शरणागति के सिद्धांत का आधार बन जाता है।

38 verses

Sarga 19

विभीषणाभिषेकः — The Consecration of Vibhishana and Counsel on Crossing the Ocean

इस सर्ग में राम द्वारा विभीषण को दिया गया अभय एक सार्वजनिक और विधिपूर्वक स्थापित होने वाला संधि-क्षण बनता है। विभीषण नीचे उतरकर साष्टांग प्रणाम करता है, लंका से अपने पूर्व संबंधों का त्याग कर राम की शरण ग्रहण करता है और अपना जीवन तथा राज्य-भाग्य राम के अधीन समर्पित कर देता है। राम उसे संयत वाणी से आश्वस्त करते हैं और राक्षसों की शक्ति-दुर्बलता का गुप्त विवरण पूछते हैं। विभीषण रावण की वर-प्राप्त प्रायः-अजेयता, कुम्भकर्ण का महाबल, प्रहस्त की पूर्व विजय-कीर्ति, इन्द्रजित की अग्निकर्म से प्राप्त अदृश्यता तथा अन्य सेनापतियों और लंका-सेना की विशालता व क्रूरता का वर्णन करता है। तब राम सत्यप्रतिज्ञा करते हैं कि रावण-वध के बाद विभीषण को लंका का राजा स्थापित करेंगे, और उसी प्रतिज्ञा को तत्काल कर्म में परिणत करते हैं। लक्ष्मण समुद्र-जल लाकर वानर-नायकों के बीच विभीषण का अभिषेक करते हैं; वह राक्षसराज के रूप में प्रतिष्ठित होता है और जय-जयकार होती है। अंत में हनुमान और सुग्रीव समुद्र पार करने का उपाय पूछते हैं; विभीषण सागर की शरण लेने की सलाह देता है और सगर-वंश से राम का संबंध स्मरण कराता है। सुग्रीव यह परामर्श राम तक पहुँचाता है; राम सहमत होकर तट पर कुश बिछाकर बैठते हैं, लंका-गमन हेतु अगले धर्मयुक्त उपाय के लिए तत्पर होते हैं।

42 verses | Vibhīṣaṇa, Rāma, Hanūmān, Sugrīva, Lakṣmaṇa

Sarga 20

दूत-नीति, शुक-प्रसङ्गः (Envoy-Ethics and the Episode of Śuka)

इस बीसवें सर्ग में गुप्तचर-निरीक्षण, कूटनीतिक संदेश और युद्ध-धर्म की सार्वजनिक परीक्षा एक साथ आती है। राक्षस-गुप्तचर शार्दूल सुग्रीव के शिविर में प्रवेश कर ध्वजों से शोभित वानर-ऋक्ष सेना को देखता है और रावण से कहता है कि यह बल लंका की ओर दूसरे, अपरिमेय समुद्र की भाँति बढ़ रहा है; वह समुद्र-तट पर स्थित राम-लक्ष्मण और सेना के विशाल फैलाव का भी वर्णन करता है। इसके बाद रावण शुक को दूत बनाकर सुग्रीव के पास भेजता है। शुक के संदेश में सुग्रीव के वंश-बल की प्रशंसा करते हुए रावण अपने अपराध को हल्का दिखाता है और लंका की अजेयता का दावा करता है—उद्देश्य वानरों का मनोबल तोड़ना और मैत्री में फूट डालना। शुक पक्षी-रूप धारण कर आकाश से बोलता है, पर क्रुद्ध वानर उस पर आक्रमण करते हैं; तब वह दूत-वध निषिद्ध है—यह नियम स्मरण कराता है और बताता है कि सच्चा दूत केवल स्वामी का संदेश कहता है, अपनी ओर से अनधिकृत वचन नहीं जोड़ता। राम दूत-धर्म की रक्षा हेतु हस्तक्षेप कर शुक को छोड़ देने की आज्ञा देते हैं। सुरक्षित होकर शुक फिर बोलता है और सुग्रीव का कठोर प्रत्युत्तर सुनता है, जिसे रावण तक पहुँचाने को कहा जाता है—रावण की पराजय निश्चित है; छिपकर या किसी दिव्य शरण में जाकर भी बचना असंभव है; और सीता-हरण तथा जटायु-वध के पाप का नैतिक अभियोग उस पर है। अङ्गद शुक को गुप्तचर मानकर पकड़ने की बात उठाता है, क्योंकि उसने सेना का आकलन कर लिया है; इस प्रकार सुरक्षा-चिंता और दूत-संरक्षण की मर्यादा—दोनों का संतुलन दिखाया गया है।

36 verses | Śārdūla, Rāvaṇa, Śuka, Rāma, Sugrīva, Aṅgada

Sarga 21

सागरप्रतीक्षा-क्रोधप्रादुर्भावः (Rama’s Vigil at the Ocean and the Rise of Wrath)

समुद्र-तट पर श्रीराम ने कुश बिछाकर पूर्वाभिमुख होकर सागर को अंजलि दी और नियम-व्रत में शयन करके प्रतीक्षा की। तीन रात्रियाँ बीत गईं, पर ‘नदीपति’ सागर यथोचित सम्मान पाने पर भी कोई प्रत्युत्तर-रूप लेकर प्रकट नहीं हुआ। तब संयम से धर्मयुक्त क्रोध प्रकट हुआ। राम ने लक्ष्मण से नीति-वचन कहा कि शांति, क्षमा, सरलता और मधुर वाणी को कभी-कभी निर्गुण या अहंकारी लोग दुर्बलता समझ लेते हैं; केवल साम-दाम से ही कीर्ति और विजय नहीं मिलती। वानर-सेना के पार जाने हेतु उन्होंने सागर को सुखा देने या सर्प-सदृश बाणों से उसे पीड़ित करने का निश्चय किया और भयंकर धनुष चढ़ाया। बाण जल में ज्वलित होकर गिरने लगे, तरंगें पर्वत-सी उठीं, शंख-शुक्तियाँ मथने लगीं, धुआँ उठ चला, और पाताल के नाग-दानव व्याकुल हो उठे। तभी सौमित्रि ने आगे बढ़कर धनुष पकड़ लिया और विनय से कहा—“बस, पर्याप्त।”

33 verses | Rama, Lakshmana (Saumitrī)

Sarga 22

सागरप्रशमनम् / The Pacification of the Ocean and the Building of Nala’s Bridge

इस बाईसवें सर्ग में रुकावट से उपाय की ओर कथा मुड़ती है। समुद्र के अवरोध से क्रुद्ध श्रीराम ब्रह्मास्त्र-तेज से सागर को पाताल तक सुखा देने की प्रतिज्ञा करते हैं; तभी प्रचण्ड वायु, घनघोर मेघ, बिजली, अन्धकार आदि से लोक व्याकुल हो उठता है और दृश्य-अदृश्य प्राणी भयभीत हो जाते हैं। तब सागराधिपति (वरुणालय) दिव्य राज-वैभव सहित प्रकट होकर पंचमहाभूतों के स्वभाव की अवध्यता बताता है और धर्मसम्मत उपाय देता है—सेतु बाँधकर स्थिर मार्ग बनाया जाए। सागर यह भी निवेदन करता है कि श्रीराम का अमोघ बाण द्रुमकूल्य में पापी उपद्रवियों को दण्ड देने हेतु मोड़ा जाए। श्रीराम वैसा ही करते हैं; उससे मरुकान्तार नामक प्रसिद्ध मरुभूमि-प्रदेश, खारे जल का उफान देने वाला ‘व्रण’ कूप, तथा वरदान से एक नया शुभ मार्ग प्रकट होता है। फिर सागर विश्वकर्मा-पुत्र नल को दिव्य समर्थ शिल्पी बताकर सेतु-निर्माण का दायित्व देता है; नल उसे स्वीकार करता है। वानर-सेनाएँ वृक्ष, शिलाएँ और पर्वत-खंड जुटाकर क्रमशः दिनों में शीघ्र सेतु बना देती हैं; देव और ऋषि उस अद्भुत कार्य की प्रशंसा कर श्रीराम को आशीर्वाद देते हैं। यह सर्ग धर्म के लिए क्रोध-नियमन, स्वभाव-सिद्धान्त और लोकहितकारी निर्माण-नीति—तीनों को एक साथ पिरोता है।

87 verses | Rama, Sagara (Lord of the Ocean / Varunalaya), Nala, Sugriva

Sarga 23

निमित्तदर्शनम् (Portents Before the March to Laṅkā)

इस तेईसवें सर्ग में राम निमित्तों को देखकर लक्ष्मण (सौमित्रि) को आलिंगन करते हैं और युद्ध-यात्रा की व्यवस्था बताते हैं। वे आदेश देते हैं कि शीतल जल और फल वाले सुरक्षित वन-विश्राम-स्थान की रचना हो, सेना को दलों में बाँटा जाए और सब व्यूह में सजग होकर स्थित रहें। इसके बाद राम भयानक अपशकुनों का अर्थ बताते हैं—धूल से भरी आँधियाँ, पृथ्वी और पर्वतों का काँपना, वृक्षों का गिरना, मांस-वर्ण बादलों से रक्त-सदृश बूँदों की वर्षा, डरावनी संध्या, सूर्य से अग्नि-पिंडों के गिरने जैसा दृश्य, सूर्य की ओर विलाप करते पशु, तथा चन्द्र-सूर्य के असामान्य रंग और प्रभामंडल। राम कहते हैं कि ये निमित्त भय से रुकने के लिए नहीं, बल्कि वानरों, भालुओं और राक्षसों में भारी क्षति तथा निर्णायक संग्राम के निकट होने की सूचना हैं। अंत में तुरंत प्रस्थान होता है—वानर-सेना रावण की नगरी की ओर मुड़ती है, राम धनुष हाथ में लेकर अग्रभाग में बढ़ते हैं, और सुग्रीव तथा विभीषण गर्जना करते हुए आगे चलते हैं। वानर-वीर राम का उत्साह बढ़ाने हेतु हर्षपूर्ण क्रीड़ा-पराक्रम दिखाते हैं, जिससे धर्मयुद्ध में मनोबल और संकल्प दृढ़ होता है।

16 verses | Rama

Sarga 24

लङ्कानिरीक्षणं व्यूहविन्यासश्च (Survey of Lanka and Deployment of the Battle Formation)

इस सर्ग में युद्ध से ठीक पहले का निर्णायक क्षण आता है। श्रीराम की आज्ञा से स्थिर हुआ वानर-सेना-समुदाय शुभ नक्षत्रों के बीच शरद्-पूर्णिमा के चन्द्रमा-सा शोभित होता है, फिर समुद्र-वेग से आगे बढ़कर पृथ्वी को कंपा देता है। लंका से भयानक भेरियों का निनाद उठता है; वानर उससे भी ऊँचे गर्जन से उत्तर देते हैं और राक्षसों में भय फैल जाता है। सीता-वियोग से व्याकुल राम लंका के गगनचुम्बी प्रासादों, श्वेत मेघ-से विमानों और चैत्ररथ-उपवन के समान रमणीय उद्यानों को दिखाते हैं; पक्षियों, कोकिलों और मधुमक्खियों से गुंजित वृक्षों का वैभव भी बताते हैं। फिर वे शास्त्रानुसार व्यूह-विन्यास कराते हैं—मध्य में अंगद नील सहित, दक्षिण पार्श्व में ऋषभ, दाहिने पार्श्व में गन्धमादन; अग्रभाग में राम-लक्ष्मण। जाम्बवान और सुषेण भालुओं के नायकों सहित ‘मध्यभाग’ की रक्षा करते हैं और पीछे सुग्रीव रहता है। व्यूहबद्ध सेना आकाश के मेघसमूह-सी दमकती है; वानर पर्वत-शिखरों और वृक्षों को शस्त्र बनाकर लंका को चूर्ण करने को तत्पर होते हैं। व्यूह पूर्ण होने पर शुक दूत को छोड़ दिया जाता है; वह भयभीत होकर रावण के पास लौटता है और वानरों के क्रोध, सेतु-निर्माण के बाद राम के आगमन का समाचार देकर कहता है—या तो सीता लौटा दो, या युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। रावण रक्त-नेत्रों से क्रोधपूर्वक गर्जता है, देवताओं के सामने भी सीता न देने का दर्प करता है और अपने बाणों की ‘अग्नि’ को अजेय बताकर संघर्ष को अवश्यंभावी बना देता है।

45 verses | Rama, Lakshmana, Sugriva, Suka, Ravana

Sarga 25

शुकसारण-चारप्रवेशः (Suka and Sāraṇa’s Espionage and Release)

दशरथनन्दन श्रीराम के वानर-सेना सहित समुद्र पार कर सेतु बाँध लेने का समाचार सुनकर रावण उत्साहित हुआ और अपने मंत्री-गुप्तचर शुक तथा सारण को शत्रु-शिविर में गुप्त रूप से प्रवेश करने का आदेश देता है। उन्हें सेना की संख्या, प्रमुख वानर-वीरों और समर्थ सेनापतियों की पहचान, सेतु-निर्माण की स्थिति, पर्वत-गुहाओं, तटों, वनों और उद्यानों में पड़े पड़ावों का पता, तथा श्रीराम-लक्ष्मण के संकल्प, पराक्रम और आयुध-बल का आकलन करना था। वानर-वेष धारण कर वे सेना में घुसते हैं, पर उसकी अपारता और गर्जन से स्तब्ध रह जाते हैं। विभीषण उनके छिपे हुए भेद को पहचानकर उन्हें पकड़कर श्रीराम के सामने प्रस्तुत करता है। मृत्यु-भय से काँपते गुप्तचरों को देखकर श्रीराम संयत हास्य और धर्मयुक्त मर्यादा से कहते हैं—दूत और निःशस्त्र जन वध के योग्य नहीं; तुमने जो देखना था देख लिया, और यदि कुछ शेष हो तो विभीषण तुम्हें सब दिखा देगा—और उन्हें छोड़ देने की आज्ञा देते हैं। श्रीराम उन्हें रावण के लिए संदेश देते हैं—जिस बल से तुमने सीता का हरण किया था, वही बल दिखाओ; प्रभात होते ही देखोगे कि लंका की रक्षा-व्यवस्था और राक्षस-शक्ति कैसे चूर-चूर होगी। लंका लौटकर शुक-सारण श्रीराम की धर्मनिष्ठा और चारों नायकों—राम, लक्ष्मण, विभीषण और सुग्रीव—की भयानक सामर्थ्य का वर्णन करते हुए संधि करने और मैथिली को लौटा देने को ही हितकर उपाय बताते हैं।

34 verses

Sarga 26

वानरमुख्य-परिचयः (Catalogue of Principal Vānara Leaders)

इस सर्ग में लङ्का के भीतर गुप्तचर-आधारित सूचना-विनिमय का प्रसंग आता है। सारण रावण को स्पष्ट और हितकारी परामर्श देता है, पर रावण दर्पपूर्वक उसे ठुकराकर यह निश्चय प्रकट करता है कि वह सीता को, चाहे समस्त लोक भी विरोध करें, नहीं लौटाएगा। तत्पश्चात् प्रत्यक्ष स्थिति जानने के लिए रावण शुक और सारण के साथ एक ऊँचे, हिम-श्वेत प्रासाद पर चढ़कर समुद्र-तट पर फैली विशाल वानर-सेना को देखता है। असंख्य बल देखकर वह सारण से पूछता है—वानरों में कौन प्रमुख हैं, सुग्रीव के मुख्य सलाहकार कौन हैं, और किन-किन नायकों से विशेष भय करना चाहिए। सारण तब क्रमबद्ध “शत्रु-सेना-विन्यास” के रूप में प्रमुख सेनापतियों का परिचय देता है—सुग्रीव की सेना के अग्रभाग में नील; वानर-युवराज, वालि-पुत्र अङ्गद, जो सीधे युद्ध-आह्वान करता है; सेतु-निर्माण से संबद्ध नल; तथा अन्य दल-नायक—श्वेत, कुमुद, रम्भ, शरभ, पनस, विनत, क्रोधन, गवय। वह उनके रूप-लक्षण, निवास-गिरि/प्रदेश, दल-बल की संख्या और लङ्का पर आक्रमण की तीव्र अभिलाषा का वर्णन करता है। यह अध्याय काव्य-रस के साथ नीति-प्रधान रणनीतिक आकलन बनकर शत्रु-पक्ष की “ऑर्डर ऑफ बैटल” जैसी सूची प्रस्तुत करता है।

48 verses

Sarga 27

वानर-ऋक्ष-सेना-प्रशंसा (Cataloguing the Vanara and Bear Forces)

इस सर्ग में युद्ध-पूर्व “दृश्य-परिचय” के रूप में वानर-ऋक्ष की संयुक्त सेना का वर्णन है। वक्ता राक्षसराज को “राजन्” कहकर संबोधित करता है और बताता है कि ये सब राघव के कार्य हेतु एकत्र हुए हैं—“राघव के लिए पराक्रम करने वाले”, प्राणों की बाज़ी लगाने को भी तत्पर। इसके बाद प्रमुख नायकों और दलों का क्रमशः परिचय मिलता है—हर, जिसकी पूँछ बहुरंगी और दीप्तिमान है; भयंकर भालू जो काले मेघों के समान दिखते हैं; उनके स्वामी धूम्र, जो ऋक्षवान में रहते और नर्मदा का जल पीते कहे गए हैं। जाम्बवान पर्वत-तुल्य, नायक-श्रेष्ठ, देवासुर-संग्राम में इन्द्र के सहायक और वर-प्राप्त; धम्ब, भयावह हरिश्वर, इन्द्र की भाँति परिकर से घिरा; सन्नदन, वानरों के ‘पितामह’ समान विशाल, जिसने कभी इन्द्र से युद्ध कर भी पराजय न मानी। क्रोधन/क्रथन कैलास पर कुबेर के जम्बू-वृक्ष के निकट रहता; प्रमथि धूल उड़ाती तीव्र सेना का नेतृत्व करता; गवाक्ष सेतु-दर्शन के बाद गोलांगूलों से घिरा है; केसरी स्वर्ण-पर्वत पर नित्य फल और मधु के बीच क्रीड़ा करता; और शतबली सूर्य-उपासक होकर लंका को कुचलने का संकल्प रखता है। अंत में मित्र-सेना की संख्या और शक्ति को अगणित बताया गया है—वे पर्वतों तक को हिला-डुला देने में समर्थ हैं। यह वर्णन शत्रु-निवारण और अपने पक्ष के उत्साह-वर्धन हेतु महाकाव्य-शैली में किया गया है।

48 verses | Rāvaṇa (addressee)

Sarga 28

शुकवाक्यं (Śuka’s Report on the Vānara Host) / Śuka Describes the Allied Forces to Rāvaṇa

सारण के निवेदन के बाद शुक रावण को क्रमबद्ध गुप्तचर-वृत्तान्त सुनाता है। वह निकट आती वानर-सेना को दुरासद बताता है—रूप बदलने में निपुण, देवतुल्य पराक्रमी और रोकना कठिन। फिर वह प्रमुख वीरों का परिचय देता है: मैन्द और द्विविद को प्रायः अमर-तुल्य रणधुरंधर, और हनुमान को पवनपुत्र—समुद्र लाँघने वाले, रूप-विकार करने वाले, तथा लंका में पूर्व दूतकार्य (पूँछ-दहन सहित) से प्रमाणित पराक्रम वाले। इसके बाद शुक मानव नायकों की ओर मुड़ता है। वह श्रीराम को इक्ष्वाकुवंशी अतिरथ, अडिग धर्मनिष्ठ, ब्रह्मास्त्रादि दिव्यास्त्रों और लोक-भेदिनी धनुर्विद्या से युक्त बताता है; लक्ष्मण को राम का अनिवार्य “दाहिना हाथ”, नीति और युद्ध में कुशल सहायक कहता है। राम के बाएँ विभीषण को अभिषिक्त राजा के रूप में, रावण-विरोध में स्थित बताता है। सेना की विशालता दिखाने हेतु वह शंखु, महाशंखु, बृन्द, पद्म, खर्व, समुद्र, ओघ, महौघ आदि संख्याशब्दों से विस्तार करता है और अंत में चेतावनी देता है कि इस ज्वलंत ग्रह-सी सेना को देखकर रावण को पराजय से बचने के लिए परम प्रयत्न करना चाहिए।

44 verses

Sarga 29

शुकसारणनिग्रहः / Ravana Rebukes Suka and Sārana; Spies Reconnoiter Rama’s Camp

इस सर्ग में चर-नीति का महत्त्वपूर्ण क्रम—राजसभा से शत्रु-शिविर तक सूचना-चक्र—स्पष्ट होता है। शुक की रिपोर्ट सुनकर रावण वानर-सेना के महासमागम और राम के प्रमुख सहायकों—राम के ‘दाहिने हाथ’ समान लक्ष्मण, सुग्रीव, अंगद, हनुमान, जाम्बवान तथा अन्य नायकों—का वर्णन पाता है। भीतर से वह विचलित होता है, पर बाहर से क्रोध प्रकट करता है। वह शुक और सारण को युद्ध से पहले शत्रु-प्रशंसा करने पर फटकारता है, इसे राज-नीति में मंत्री-धर्म की चूक और निष्ठा-भंग मानता है; दंड की धमकी देता है, किंतु उनकी पूर्व सेवाएँ स्मरण कर संयम रखता है और वध न करके उन्हें छोड़ देता है। फिर रावण महोदर को आदेश देता है कि कुशल गुप्तचर बुलाए जाएँ और वे राम के अभिप्राय, दिनचर्या तथा निकटस्थ परामर्श-परिषद का भेद जानें। शार्दूल के नेतृत्व में वे छद्म-वेश से सुवेल प्रदेश पहुँचते हैं, जहाँ धर्मात्मा विभीषण उन्हें पहचान लेता है और शार्दूल पकड़ा जाता है। वानर उन्हें मारने को उद्यत होते हैं, पर राम की करुणा बीच में आती है और शार्दूल सहित सबको मुक्त कर दिया जाता है। भयभीत और अपमानित होकर वे लंका लौटते हैं और सुवेल के निकट स्थित राम की प्रबल वानर-सेना का विवरण दशग्रीव को सुनाते हैं; इसी रणनीतिक आकलन के साथ सर्ग समाप्त होता है।

30 verses

Sarga 30

शार्दूलचरवृत्तान्तः (Saardula’s Spy-Report on Rama’s Camp and the Vanara Host)

इस सर्ग में लंका के गुप्तचर बताते हैं कि राघव सुवेल पर्वत पर अचल-सा दृढ़ सैन्य लेकर डेरा डाले हुए हैं। यह सुनकर रावण क्षणभर विचलित होता है और अपने दूत शार्दूल से पूछताछ करता है; शार्दूल का भय-चिह्नित रूप ही वानरों की कड़ी चौकसी का प्रमाण बन जाता है। शार्दूल अपने पकड़े जाने का वृत्तांत कहता है—तुरंत पहचान लिया गया, पीटा गया, लोगों के बीच घुमाया गया और अंत में छोड़ दिया गया—जिससे राम-शिविर की अनुशासनपूर्ण सुरक्षा प्रकट होती है। वह आगे बताता है कि समुद्र में शिला-पाषाण भरकर सेतु-कार्य पूर्ण हो चुका है और राम लंका-द्वार के निकट मोर्चा बाँधे हैं; वानरों की युद्ध-रचना को वह गरुड़-व्यूह के समान वर्णित करता है। शार्दूल रावण को दो टूक नीति सुझाता है—सीता लौटा दे या युद्ध स्वीकार करे, इससे पहले कि राम प्राचीर तक पहुँचें। रावण स्पष्ट इंकार करता है कि देवताओं के संघ के विरुद्ध भी वह सीता नहीं देगा, और वानर-बल की संख्या, वंश और पराक्रम का विस्तृत विवरण माँगता है। शार्दूल सुग्रीव, जाम्बवान, हनुमान, नील, अंगद, मैंद, द्विविद आदि प्रमुख वीरों का नाम लेकर अनेक की दिव्य वंश-परंपरा बताता है और सेना की विशालता पर बल देता है—दस करोड़ वानर। अंत में वह कहता है कि शेष विवरण विस्तार के कारण कह पाना कठिन है। इस प्रकार यह अध्याय एक ओर रण-तैयारी का सूचीपत्र है, तो दूसरी ओर अनुशासित धर्म-पक्ष और हठी राज-आसक्ति का मनोवैज्ञानिक चित्र।

35 verses | Ravana, Spies (collective report)

Sarga 31

मायाशिरोप्रदर्शनम् (The Display of the Illusory Head of Rāma)

इस सर्ग में लंका के गुप्तचर रावण को बताते हैं कि राम की “अडिग” वानर-सेना सुवेल पर्वत पर डटी है और आक्रमण के लिए तत्पर है। रावण चिंतित होकर सभा बुलाता है, पर खुला युद्ध करने के बजाय मनोवैज्ञानिक चाल चुनता है। वह मायाविद्या में निपुण राक्षस विद्युज्जिह्व को बुलाकर राघव का नकली सिर और धनुष माया से बनवाने की आज्ञा देता है। फिर सीता का धैर्य तोड़ने के उद्देश्य से रावण अशोकवाटिका जाता है। वहाँ सीता भूमि पर बैठी, सिर झुकाए, पति-चिंतन में लीन और राक्षसियों से घिरी दिखाई देती है। रावण उसे भय और दबाव भरे वचनों से कहता है कि प्रहस्त के नेतृत्व में रात के आक्रमण में राम और प्रमुख वानर मारे गए; और अपनी बात को “प्रमाण” देने के लिए नकली सिर उसके सामने रखवाता है, फिर राम का प्रसिद्ध धनुष भी दिखवाता है। यह अध्याय युद्ध में प्रचार-युद्ध की तकनीक दिखाता है—धमकी, झूठी सूचना और मंचित साक्ष्य द्वारा समर्पण कराने का प्रयास; इसके विपरीत सीता की एकनिष्ठता और स्थैर्य उसकी मुद्रा से ही संकेतित है।

46 verses | Rāvaṇa, Vidyujjihva

Sarga 32

सीताविलापः (Sītā’s Lament over the Illusory Head and Bow)

इस सर्ग में दो धाराएँ साथ चलती हैं—(1) अशोक-वाटिका में सीता का तीव्र शोक-विलाप, और (2) रावण का युद्ध-परामर्श हेतु मंत्रणा की ओर मुड़ना। रावण सीता को माया से रचा हुआ दृश्य दिखाता है—मानो श्रीराम का कटा हुआ सिर और उनका प्रसिद्ध धनुष। सीता नेत्रों, वर्ण, केश-कुंचलों आदि चिह्नों से पहचानती-सी लगती है, चूड़ामणि का शुभ-संबंध स्मरण करती है, मूर्छित होकर गिर पड़ती है और फिर दीर्घ विलाप करती है। उसका वचन कभी दोषारोपण (विशेषतः कैकेयी पर), कभी आत्मग्लानि, और कभी ‘काल’ के विषय में तत्त्वचिन्तन बन जाता है—कि समय बुद्धि को हर लेता है और रक्षाओं को भी ढहा देता है। वह धर्म-संकट रखती है कि नीति और आपद्-निवारण जानने वाले राम भी मृत्यु के वश हो गए; लक्ष्मण के अकेले लौटने पर कौसल्या के विनाश-तुल्य दुःख की कल्पना करती है; और यह भी कहती है कि वीर-देह का संस्कार न होकर श्वापदों का आहार बनना सामाजिक-धार्मिक विघटन है। अंत में वह रावण से प्रार्थना करती है कि उसे पति के साथ मृत्यु में मिला दे। रावण के मंत्रियों से मिलने निकलते ही वह सिर और धनुष लुप्त हो जाते हैं—यह दृश्य माया और दबाव की योजना सिद्ध होता है। फिर कथा शासन-व्यवस्था की ओर मुड़ती है: प्रहरी प्रहस्त के आगमन का समाचार देता है; रावण मंत्रियों को बुलाकर कारण बताए बिना नगाड़ों से सेना-संग्रह का आदेश देता है और श्रीराम के विरुद्ध क्या करना है—इस पर औपचारिक विचार आरम्भ करता है।

44 verses | Sītā, Rāvaṇa

Sarga 33

सरमा-सीता संवादः (Saramā Consoles Sītā; Preparations in Laṅkā)

इस सर्ग में अशोकवनिका-सदृश बंधन-स्थल में शोक से व्याकुल, मूर्च्छित-सी वैदेही को देखकर करुणामयी राक्षसी सरमा उसके पास आती है और उसे सांत्वना देती है। वह बताती है कि उसने सीता और रावण का संवाद सुन लिया था; इसी कारण रावण घबराया हुआ है, क्योंकि राम को नींद में छल से मारना संभव नहीं और उनका वध असंभव-सा माना जाता है। सरमा यह भी कहती है कि वृक्षों को हथियार की तरह उठाने वाले वानर-योद्धा राम के संरक्षण में हैं, इसलिए उन्हें मारना कठिन है—जैसे इन्द्र के रक्षित देव। फिर वह राम के गुणों का बार-बार स्मरण कराती है—धर्मात्मा, यशस्वी, धनुर्धर, विशाल-वक्ष और अजेय; तथा लक्ष्मण भी उनके साथ रक्षक हैं। सरमा समाचार देती है कि राम समुद्र पार कर दक्षिण तट पर सेना सहित ठहरे हैं; गुप्तचरों ने लंका में यह सूचना पहुँचा दी है; रावण मंत्रियों के साथ परामर्श कर रहा है। इसके बाद लंका में युद्ध-तैयारी का कोलाहल सुनाई देता है—नगाड़े, घंटियाँ, रथों-घोड़ों-हाथियों की गड़गड़ाहट, शस्त्र-कवच की सज्जा—जो निकट आते संग्राम का संकेत है। अंत में सरमा सीता को धर्मयुक्त उपदेश देती है कि वह दिवाकर (सूर्य) की शरण लें, जो प्राणियों के भाग्य का नियामक है।

39 verses

Sarga 34

सरमायाḥ सीतासान्त्वनम् तथा रावणनिश्चयश्रवणम् (Saarana Consoles Sita and Reports Ravana’s Resolve)

इस सर्ग में युद्धकाण्ड के बीच एक शान्त, नीति-प्रधान संवाद आता है। कालज्ञ और मृदु-हास्यपूर्वक बोलने वाली सरमा सीता को ढाढ़स बँधाती है; सीता का शोक मानो वर्षा से शुष्क धरती की तरह शान्त होने लगता है। सीता रावण की माया, बार-बार की धमकियों और अशोक-वाटिका में राक्षसियों की कठोर निगरानी से व्याकुल होकर सत्यापित समाचार चाहती है और सरमा से रावण के पक्के निश्चय का पता लगाने को कहती है। सरमा रावण के पास जाकर मंत्रियों के साथ उसकी सलाह सुनती है और शीघ्र लौट आती है। सीता उसे आलिंगन कर आसन देती है और रावण की मंशा का सत्य बताने का आग्रह करती है। सरमा बताती है कि रावण की माता कैकसी और वृद्ध मंत्री अविद्ध मैथिली को सम्मान सहित छोड़ देने की सलाह देते हैं। वे राम की सामर्थ्य के प्रमाण भी रखते हैं—जनस्थान का विनाश, हनुमान का समुद्र-लाँघना और राक्षसों का संहार। पर रावण कंजूस की तरह अपने ‘धन’ को पकड़े रहता है और कहता है कि वह तभी छोड़ेगा जब युद्ध में मृत्यु उसे विवश करेगी। अंत में भेरियों, शंखों और वानरों के कोलाहल से धरती काँप उठती है; राक्षस-सेवक उदास हो जाते हैं और राजा के दोषों से निकट आती रणनीतिक पराजय का संकेत मिलता है।

28 verses

Sarga 35

माल्यवानुपदेशः — Malyavan’s Counsel, Portents in Laṅkā, and the Proposal of Alliance

सर्ग 35 में राम की सेना शंख-नगाड़ों के घोर निनाद के साथ युद्ध के लिए आगे बढ़ती है। उस अशुभ ध्वनि को सुनकर लंका में रावण सभा में आकर मंत्रियों से पूछता है और उनके कथित पराक्रम के होते हुए भी मौन रहने पर उन्हें कठोरता से धिक्कारता है। तभी अनेक अनिष्ट-निमित्त प्रकट होते हैं—अस्वाभाविक मेल-जोल, गृह-यज्ञादि कर्मों में अव्यवस्था, भयावह स्वप्न, पक्षियों-पशुओं की प्रतिकूल चीत्कार, और रक्त-वृष्टि—जो लंका के पतन का संकेत देते हैं। ऐसे वातावरण में वृद्ध मंत्री माल्यवान (रावण का नाना) नीति-युक्त उपदेश देता है। वह कहता है कि विद्या और न्याय पर स्थित राजा ही राज्य को स्थिर रखता है; बल क्षीण होने पर बुद्धिमान राजा विग्रह नहीं, संधि का आश्रय लेते हैं। माल्यवान सीता को लौटा देने की सलाह देता है, क्योंकि वही युद्ध का मूल कारण है; साथ ही वह बताता है कि दैवी शक्तियाँ राम के पक्ष में हैं—समुद्र पर सेतु-निर्माण जैसे अद्भुत कार्य से वह राम को मनुष्य-रूप में स्थित विष्णु के समान मानता है। अंत में रावण की अनिच्छा देखकर माल्यवान मौन हो जाता है; इस प्रकार अस्वीकार किए गए हितोपदेश की करुण परिणति का संकेत मिलता है।

38 verses | Rāvaṇa, Mālyavān

Sarga 36

माल्यवानुपदेशः—रावणक्रोधः तथा लङ्काद्वाररक्षा-व्यवस्था (Malyavan’s Counsel, Ravana’s Anger, and the Fortification of Lanka)

इस सर्ग में नीति और धर्म का संक्षिप्त नाट्य-प्रसंग आता है। काल के वश में पड़ा रावण माल्यवान की हितकारी सलाह सहन नहीं करता। भौंहें चढ़ाकर और नेत्र घुमाकर वह क्रोध प्रकट करता है तथा मंत्री पर यह आरोप लगाता है कि वह शत्रु-पक्षपात या किसी की उकसाहट से कठोर वचन बोल रहा है। रावण अपने अभिमान को अडिग बताता है—वह झुकने की अपेक्षा टूट जाना स्वीकार करेगा; हठ को वह अपना जन्मजात स्वभाव कहकर अजेय मानता है। सेतु-निर्माण को वह केवल संयोग बताकर कहता है कि वानरों के साथ पार उतरने पर भी राम जीवित लौट नहीं पाएँगे। रावण के रोष को देखकर माल्यवान बिना उत्तर दिए शिष्ट आशीर्वाद देकर लौट जाता है। इसके बाद रावण मंत्रियों से परामर्श कर लंका की ‘अतुल’ सुरक्षा-व्यवस्था करता है—पूर्व द्वार पर प्रहस्त, दक्षिण द्वार पर महापार्श्व और महोदर, पश्चिम द्वार पर इन्द्रजित (और महामाया), उत्तर द्वार पर शुक और सारण; तथा नगर के मध्य में बलवान विरूपाक्ष को दृढ़ आरक्षित शक्ति के रूप में नियुक्त करता है। यह व्यवस्था करके, भाग्य से प्रेरित रावण स्वयं को कृतकृत्य मानता है; मंत्रियों को विदा कर उनके आशीर्वाद के साथ अंतःपुर में प्रवेश करता है।

22 verses

Sarga 37

लङ्काद्वारव्यूहवर्णनम् / Disposition at the Gates of Lanka

इस सर्ग में लंका पर आक्रमण से ठीक पहले का युद्ध-विन्यास बताया गया है। सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान, अंगद, नल आदि वानर-नायक लंका के निकट पहुँचकर विजय-उपाय पर विचार करते हैं। विभीषण मंत्री-स्तरीय गुप्तचर-समाचार सुनाते हैं—उनके दूत पक्षी-रूप में लंका में घुसकर रावण की दुर्ग-व्यवस्था, द्वारों की रक्षा और सेना की तैनाती देखकर लौटे हैं। रक्षा-व्यवस्था स्थानानुसार बँटी है—पूर्व-द्वार पर प्रहस्त, दक्षिण-द्वार पर महापार्श्व और महोदर, पश्चिम-द्वार पर विविध आयुधधारियों सहित इन्द्रजीत, उत्तर-द्वार पर स्वयं रावण (क्रुद्ध, परन्तु कड़ी सुरक्षा में), और नगर-मध्य में विरूपाक्ष। हाथी, रथ, घोड़े और विशाल पैदल-सेना का वर्णन युद्ध की व्यापकता को प्रकट करता है। तदनन्तर श्रीराम कार्य-विभाजन करते हैं—पूर्व में प्रहस्त का प्रतिकार करने हेतु नील, दक्षिण में दक्षिण-द्वार के नायकों से भिड़ने हेतु अंगद, पश्चिम में इन्द्रजीत पर दबाव बनाने हेतु हनुमान, और उत्तर-द्वार से प्रवेश हेतु स्वयं श्रीराम लक्ष्मण सहित अग्रसर होते हैं; मध्य भाग की रक्षा के लिए सुग्रीव, जाम्बवान और विभीषण को नियुक्त करते हैं। फिर पहचान-नियम घोषित होता है—वानर मानव-रूप न धारण करें; केवल सात योद्धा (राम, लक्ष्मण और विभीषण सहित कुछ चुने हुए) मानव-रूप में युद्ध करें। अंत में श्रीराम सुवेल पर्वत पर चढ़कर सेना सहित लंका की ओर बढ़ने का निश्चय करते हैं।

38 verses | Vibhīṣaṇa, Rāma

Sarga 38

सुवेलारोहणम् (The Ascent of Suvela and the First Full View of Laṅkā)

इस सर्ग में श्रीराम सुवेल पर्वत पर चढ़ने का निश्चय करते हैं और वहीं रात्रि-विश्राम कर राक्षसों की दुर्ग-नगरी लंका का निरीक्षण करने की योजना सुग्रीव को बताते हैं। वे विभीषण को धर्मज्ञ, मंत्रज्ञ और विधिज्ञ मानकर उसे साथ रखते हैं तथा सीता-हरण के प्रतिकार और रावण के अधर्म-उलटाव को रोकने को धर्मसम्मत अभियान के रूप में स्थापित करते हैं। “राक्षसाधम” का नाम सुनकर उठने वाला उनका क्रोध भी न्यायोचित बताया गया है; साथ ही वे चेतावनी देते हैं कि एक व्यक्ति का दुष्कर्म पूरे कुल को संकट में डाल सकता है। फिर संगठित रूप से आरोहण होता है—लक्ष्मण धनुष-बाण सहित पीछे-पीछे चलते हैं; सुग्रीव अपने मंत्रियों और विभीषण के साथ आगे बढ़ते हैं। हनुमान, अंगद, नील, मैन्द, द्विविद, जाम्बवान, सुषेण, ऋषभ आदि वानर-यूथपति सैकड़ों की संख्या में पवन-वेग से पर्वत पर चढ़ते हैं। सुवेल-शिखर से उन्हें लंका आकाश में टँगी-सी दिखती है—भव्य द्वारों, प्राचीरों और काली राक्षस-पंक्तियों से घिरी, मानो दूसरी जीवित दीवार हो। युद्ध-उत्सुक वानर-सेना श्रीराम के सामने विविध नाद करती है; सूर्यास्त के बाद चन्द्रप्रकाशित रात्रि में श्रीराम सुवेल की धार पर विश्राम करते हैं, विभीषण द्वारा विधिपूर्वक सम्मानित, लक्ष्मण और समस्त यूथपतियों के साथ—युद्ध से पहले की शांत घड़ी को निरीक्षण, मैत्री और धर्म-निश्चय के साथ पूर्ण करते हुए।

19 verses | Rama

Sarga 39

लङ्कादर्शनम् (Viewing Laṅkā and its Forest-Gardens)

सुवेल पर्वत पर रात्रि-जागरण किए हुए वानर-प्रधानों ने लंका के वन और उद्यान देखे। वहाँ कोयल, सारस, मयूर और भौंरों के मधुर निनाद से दिशाएँ गूँज रही थीं; पुष्प-सुगंधित पवन से वे उपवन और भी रमणीय लगते थे। रूप बदल सकने वाले कुछ वानर हर्ष में उन कुंजों में प्रवेश कर गए; और अन्य सेनानायक सुग्रीव की अनुमति पाकर ध्वज-पताकाओं से सजी नगरी की ओर वेग से दौड़े, गर्जना से पक्षियों और बड़े पशुओं को चौंकाते तथा धूल उड़ाते हुए। फिर दृष्टि त्रिकूट शिखर पर उठती है—पुष्पों से आच्छादित, तेजस्वी और प्रायः दुर्गम—जिस पर लंका बसी है; उसके विस्तार और दीर्घता का भी संकेत मिलता है। नगर-रेखा में ऊँचे गोपुर, स्वर्ण-रजत प्राकार और मेघ-समूह जैसे प्रासाद दिखाई देते हैं; मध्य का एक भवन वैष्णव-धाम के समान कहा गया है। सहस्र-स्तंभों वाला एक प्रासाद, जिसे सौ राक्षस रक्षित करते हैं, लंका का विशेष भूषण बतलाया गया है। अंत में श्रीराम लक्ष्मण और वानर-सेना सहित रत्नों से विभूषित, समृद्ध और युक्ति-रचित द्वारों वाली उस महानगरी को देखकर विस्मित होते हैं। इसी दर्शन के साथ कथा घेराबंदी और युद्ध की तैयारी की ओर बढ़ती है।

29 verses | Rama (observational presence), Sugriva (as authorizing figure, referenced)

Sarga 40

सुवेलारोहणं रावण-सुग्रीव-नियुद्धम् (Ascent of Suvela and the Ravana–Sugriva Duel)

इस सर्ग में श्रीराम सुग्रीव और वानर-सेना के साथ सुवेला पर्वत पर चढ़कर त्रिकूट-शिखर पर स्थित लंका का निरीक्षण करते हैं, जिसे विश्वकर्मा की रचना कहा गया है। वहाँ वे रावण को ऊँचे गोपुर पर स्थित देखते हैं—श्वेत चामरों से सेवित, विजय-छत्र से सुशोभित, रक्तचन्दन से लिप्त, आभूषणों से विभूषित और ऐरावत-संबंधी घाव-चिह्नों से युक्त—जो उसे राजचिह्नों से सम्पन्न और भयंकर लक्ष्य के रूप में प्रकट करता है। रावण को देखकर सुग्रीव संयमित क्रोध में उठते हैं। वे रावण से कहते हैं कि वे ‘लोकनाथ’ श्रीराम के निष्ठावान सेवक हैं, और सीधे आक्रमण कर देते हैं। सुग्रीव रावण का मुकुट पकड़कर नीचे गिरा देते हैं—यह राज-प्रतिष्ठा के अपमान का प्रतीक बनता है। इसके बाद निकट से मल्लयुद्ध होता है—पछाड़, प्रतिपछाड़, पकड़-धकड़, घूमकर पग-चाल, छल-प्रहार और विविध ‘युद्ध-मार्ग’ का वर्णन आता है, जिससे वीर-रस तीव्र हो उठता है। रावण वध की धमकी देता है और माया से पलड़ा बदलना चाहता है; पर सुग्रीव उसकी युक्ति भाँपकर उसे थकाकर अलग हो जाते हैं और वानरों के बीच से लौटकर श्रीराम के पास आते हैं। इससे श्रीराम का रण-उत्साह और वानर-सेना का मनोबल बढ़ता है; साथ ही भूगोल (सुवेला-लंका), धर्म (सेवा व संयम) और राजचिह्न (गिरा हुआ मुकुट) एक ही कथा-रेखा में बँध जाते हैं।

30 verses | Sugriva, Ravana

Sarga 41

युद्धलक्षण-निमित्तदर्शनं तथा लङ्काद्वारव्यूहः (War Omens and the Encirclement of Lanka’s Gates)

इस सर्ग में युद्ध के अशुभ निमित्त देखकर श्रीराम सुग्रीव को आलिंगन करते हैं और लक्ष्मण को आदेश देते हैं कि शीतल जल, फल-वन और संसाधनों से युक्त स्थान लेकर सेना को विभाजित कर सुव्यवस्थित व्यूहों में खड़ा किया जाए। फिर प्रलय-सदृश संकेतों का वर्णन आता है—प्रचण्ड वायु, पृथ्वी और पर्वतों का कम्पन, रक्त-मिश्रित वर्षा, अशुभ पशु-पक्षियों की ध्वनियाँ, तथा ग्रह-नक्षत्रों का मलिन होना—जिससे युद्ध को धर्म-अधर्म का व्यापक, दैवी-सांकेतिक संकट बताया गया है। वानर-सेना वेग से बढ़ती है और लंका के सौन्दर्य तथा दुर्ग-रचना का वर्णन उसके लगभग अजेय होने को प्रकट करता है। श्रीराम उत्तर-द्वार रोकते हैं; पूर्व में नील, दक्षिण में अंगद, पश्चिम में हनुमान, और मध्य में सुग्रीव स्थित होते हैं; लक्ष्मण विभीषण के साथ अपार सेना को तैनात करते हैं। इसके बाद नीति के रूप में दूत-कार्य होता है—श्रीराम अंगद को रावण के पास धर्माधारित कठोर संदेश देकर भेजते हैं: वैदेही को लौटा दे, अन्यथा धर्मपूर्वक विनाश होगा और विभीषण को उचित राज्य मिलेगा। अंगद संदेश सुनाकर बल-परीक्षा हेतु पकड़े जाते हैं, पाँव से राजप्रासाद का एक भाग तोड़ देते हैं और लौट आते हैं; इससे रावण का क्रोध भड़कता है और घेराबंदी की अपरिवर्तनीय गति निश्चित हो जाती है।

100 verses | Rama, Sugriva, Angada, Ravana

Sarga 42

लङ्काप्राकारारोहणम् / Assault on Lanka’s Ramparts and the Opening Clash

इस सर्ग में घेराबंदी की स्थिति से खुले युद्ध की ओर संक्रमण दिखाया गया है। राक्षस गुप्तचर रावण को बताते हैं कि राम वानर-सेना सहित लंका के सभी मार्गों और उपनगरों पर अधिकार कर चुके हैं; यह सुनकर रावण क्रोध से भर उठता है और तत्काल युद्ध-सज्जा का आदेश देता है। उधर सीता के कष्ट का स्मरण कर व्याकुल श्रीराम शत्रु-बल पर शीघ्र आक्रमण का निर्देश देते हैं; वानर सिंह-नाद करते हुए वृक्ष, शिला और पर्वत-शिखरों को ही अस्त्र बनाकर आगे बढ़ते हैं। वानर प्राकारों और द्वारों पर चढ़ते हैं, जल-भरी परिखाओं को मिट्टी, लकड़ी और मलबे से पाटते हैं, और कैलास-सदृश ऊँचे गोपुरों तथा स्वर्ण-तोरणों को तोड़ते हुए नगर-द्वारों तक पहुँचते हैं। फिर द्वारों पर सुव्यवस्थित छावनी बनती है—पूर्व में कुमुद, दक्षिण में शतबली, पश्चिम में सुषेण, और उत्तर में राम लक्ष्मण व सुग्रीव सहित; गवाक्ष, धूम्र तथा विभीषण अपने मंत्रियों के साथ सहायता और रक्षा हेतु नियोजित होते हैं। रावण समस्त राक्षसों को बाहर निकलकर युद्ध करने का आदेश देता है; भेरी-नगाड़े और शंख गूँज उठते हैं, जिनका नाद पर्वत, पृथ्वी, आकाश और समुद्र तक फैल जाता है। अंत में भयंकर संग्राम छिड़ता है—राक्षस गदा, शक्ति, त्रिशूल, खड्ग और भिंदिपाल से प्रहार करते हैं, वानर वृक्षों, शिलाओं, नखों और दाँतों से प्रतिघात करते हैं; रणभूमि रक्त-मांस के कीचड़ से भरकर विस्मयकारी विशालता का दृश्य बन जाती है।

47 verses | Ravana, Rama

Sarga 43

द्वन्द्वयुद्धप्रवृत्तिः (Dvandva-Yuddha: The Onset of Single Combats)

युद्धकाण्ड के इस सर्ग में वानरों और राक्षसों के बीच भीषण द्वन्द्व युद्ध का वर्णन है। रावण की सेना विजय की कामना से भयानक गर्जना करती हुई आगे बढ़ी। सुग्रीव का प्रघस से और लक्ष्मण का विरूपाक्ष से सामना हुआ। भगवान श्रीराम ने अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप नामक चार राक्षसों पर बाणों की वर्षा कर उनके सिर धड़ से अलग कर दिए। हनुमान जी ने जम्बुमाली द्वारा शक्ति अस्त्र से घायल होने के बाद भी उसके रथ पर चढ़कर एक ही थप्पड़ से उसका वध कर दिया। अन्य द्वन्द्वों में, नल ने प्रतपन की आँखें फोड़ दीं, मैन्द ने वज्रमुष्टि को मुक्के से मार गिराया, और द्विविद ने अशनिप्रभ को साल के वृक्ष से यमलोक भेज दिया। नील ने निकुम्भ के बाणों को सहते हुए उसके रथ का पहिया उखाड़ लिया और उसी से निकुम्भ का वध कर दिया। सुषेण ने विद्युन्माली को एक विशाल शिला से कुचल दिया। सर्ग के अंत में युद्धभूमि टूटे हुए रथों, मृत शरीरों और रक्त की नदियों से पट गई, जो देवासुर संग्राम जैसी प्रतीत हो रही थी।

45 verses

Sarga 44

चतुश्चत्वारिंशः सर्गः (Sarga 44): निशायुद्धम्, धूलिरुधिरप्रवाहः, इन्द्रजितो मायायुद्धम्

वानरों और राक्षसों के घोर संग्राम में सूर्यास्त होते ही रात का प्राणघातक चरण आरम्भ हुआ और युद्ध अँधेरे में उलझा हुआ, भ्रमपूर्ण हो गया। घोड़ों और रथचक्रों से उठी धूल ने दृष्टि‑श्रवण ढँक दिए; रणभूमि रक्त‑कीचड़ सी दिखने लगी। भेरियों, शंखों, बाँसुरियों, गर्जनाओं और त्रिकूट की गुफाओं में गूँजते प्रतिध्वनियों से भयावह शब्द‑दृश्य बन गया। अँधेरे में पहचान बिगड़ने से कई योद्धा मित्र को शत्रु समझकर अपने ही पक्ष पर प्रहार करने लगे। राम के तेजस्वी बाण दिशाओं को प्रकाशित करते हुए उन राक्षसों का संहार करते हैं जो उन पर टूट पड़ते हैं; कुछ नामी राक्षस बाणों से घायल होकर प्राणशेष लिए पीछे हटते हैं। इसी बीच अंगद ने निर्णायक प्रहार कर इन्द्रजित के रथ के घोड़े और सारथी को मारकर रथ को निष्प्रभ कर दिया, जिससे देवताओं और वानर‑सेना में प्रशंसा हुई। क्रोध से भरकर इन्द्रजित ने छिपकर युद्ध करने की नीति अपनाई—अदृश्य होकर सर्प‑सदृश बाण चलाए, राम और लक्ष्मण को घायल किया और अंत में बाणों के जाल से दोनों भ्राताओं को बाँध दिया। इस प्रकार खुली मुठभेड़ से बढ़कर माया‑प्रेरित, मनोबल को डगमगाने वाला युद्ध छा गया।

39 verses | Rāma, Lakṣmaṇa

Sarga 45

इन्द्रजितः अन्तर्धानयुद्धं — Indrajit’s Concealed Assault and the Fall of Rama and Lakshmana

इस सर्ग में इन्द्रजित अपने अन्तर्धान (अदृश्य) कौशल और घनी शर-वृष्टि से युद्ध की दिशा पलट देता है। राम इन्द्रजित का पता लगाने के लिए दस वानर-नायकों को अलग-अलग दिशाओं में खोज हेतु भेजते हैं। वानर आकाश में उछलकर उखड़े हुए वृक्षों को हथियार बनाते हैं, पर इन्द्रजित के तीव्र, कुशलतापूर्वक छोड़े गए बाण उन्हें रोक देते हैं; अन्धकार और छिपाव के कारण आक्रमणकारी दिखाई नहीं देता—जैसे बादलों से सूर्य ढक जाए। अदृश्य रहकर इन्द्रजित राम-लक्ष्मण से बोलता है कि युद्ध में उसे इन्द्र भी नहीं पहचान सकता, और वह दोनों भाइयों को यमलोक भेजने का संकल्प करता है। फिर वह विविध प्रकार के अग्रों वाले बाणों और सर्प-सदृश नागपाशों की निरन्तर वर्षा करता है, मर्मस्थलों में बाण धँसाकर दोनों को बाँधता और क्षीण कर देता है; वे इतनी शीघ्रता से आच्छादित हो जाते हैं कि प्रत्युत्तर नहीं दे पाते। पहले राम गिरते हैं; राम को गिरा देखकर लक्ष्मण शोक से टूटकर ढह जाते हैं। चारों ओर वानर-सेना शोकाकुल होकर दोनों राजकुमारों के पास इकट्ठी हो जाती है। ग्रन्थ में देह पर घावों की पूर्णता का मार्मिक चित्र है—एक अंगुल-भर भी स्थान बिना बिंधे नहीं बचता—और छल से किए गए युद्ध के नैतिक भार तथा वीरों की नश्वरता पर गंभीर संकेत मिलता है।

28 verses | Indrajit (Ravaṇi), Rama, Lakshmana

Sarga 46

शरबन्धनम् (The Binding by Arrows) / Indrajit’s Illusory Assault and the Vanaras’ Consolation

इस सर्ग में लंका-युद्ध का एक गंभीर उलटफेर दिखाया गया है। वानर-वीर आकाश और भूमि में खोज करते हुए राम और लक्ष्मण को शर-बन्ध (तीरों के जाल) से जकड़े, निश्चेष्ट पड़े पाते हैं। यह दृश्य देखकर वानर-सेना में सामूहिक शोक और रण-नीति में भारी स्तब्धता छा जाती है। माया से छिपा इन्द्रजित् सामान्यतः किसी को नहीं दिखता, पर वर-प्रसाद से विभीषण उसे पहचान लेते हैं। इन्द्रजित् गर्वोक्ति करता है कि खर-दूषण के संहारक दोनों भ्राता अब बाणों से विद्ध होकर मानो देव-ऋषियों की सभा से भी छुड़ाए नहीं जा सकते। वह आतंक बढ़ाने के लिए नील, मैन्द, द्विविद, जाम्बवान, हनुमान, गवाक्ष, शरभ और अंगद जैसे प्रमुख वानरों को भी घायल करता है और राक्षसों को बुलाकर बँधे हुए राजकुमारों को दिखाता है; राम के मारे जाने का भ्रम फैलते ही लंका में जय-जयकार गूँज उठती है। इन्द्रजित् के लौट जाने पर सुग्रीव भयग्रस्त हो उठते हैं। तब विभीषण पवित्र जल से शान्ति-सदृश कर्म कर सेना को धैर्य बँधाते हैं—वे कहते हैं कि राम का निधन नियत नहीं, अतः हृदय-हीनता छोड़कर सेना का मनोबल सँभालो। अंत में इन्द्रजित् रावण के पास ‘विजय’ का समाचार देता है; रावण उसे आलिंगन कर शर-जाल से दोनों राजकुमारों के तेज-हरण का वृत्तांत सुनता है।

50 verses

Sarga 47

पुष्पकविमानेन सीताया युद्धभूमिदर्शनम् (Sita Shown the Battlefield in the Pushpaka)

इस सर्ग में इन्द्रजीत अपने कार्य की सिद्धि मानो करके लंका लौटता है। उसके प्रतीयमान विजय से वानर-वीर राघव की रक्षा हेतु चारों ओर सतर्क घेरा बना लेते हैं और छोटी-सी हलचल को भी राक्षस-प्रवेश की आशंका से देखते हैं। रावण हर्षित होकर त्रिजटा सहित राक्षसी परिचारिकाओं को आज्ञा देता है कि वे अशोकवनिका से सीता को पुष्पक विमान में लाएँ और उसे राम-लक्ष्मण को मरे हुए-से दिखाकर उसका धैर्य तोड़ें। लंका सजाई जाती है और घोषणाएँ होती हैं कि दोनों भाई युद्ध में मारे गए हैं। सीता त्रिजटा के साथ रणभूमि में गिरे वानरों को और राक्षसों के उत्सव-भाव को देखती है। फिर वह शर-शय्या पर अचेत पड़े राम-लक्ष्मण को, टूटे कवच और धनुषों सहित देखकर उन्हें मृत मान लेती है और तीव्र शोक में मूर्छित होकर विलाप करती है। यह अध्याय कपटपूर्ण विजय-घोष के विपरीत सीता की अडिग निष्ठा तथा बंदिनी की आशा से खिलवाड़ करने के नैतिक मूल्य को उजागर करता है।

24 verses | Rāvaṇa, Rākṣasīs (Sītā’s attendants), Sītā

Sarga 48

सीताविलापः—त्रिजटासान्त्वनं च (Sita’s Lament and Trijata’s Consolation)

इस सर्ग में इन्द्रजित अपनी माया से राम-लक्ष्मण के गिरने का दृश्य दिखाकर सीता को साक्षी बनाता है। उसे देखकर सीता मूर्छित-सी होकर विलाप करती है और स्वयं को दोष देती हुई विधवा-भाव से भर जाती है। वह कहती है कि ब्राह्मणों, ज्योतिषियों और कर्मकाण्ड-निपुणों ने जो सौभाग्य, पुत्र-प्राप्ति और पति सहित राज्याभिषेक की भविष्यवाणी की थी, वह सब असत्य सिद्ध हुई। फिर वह स्त्री-लक्षणों का विशिष्ट वर्णन करती है—पद्म-चिह्नित चरण, मणि-सी कांति, समप्रमाण अंग-प्रत्यंग आदि—और तर्क देती है कि ऐसे शुभ-लक्षणों के साथ ऐसी विपत्ति कैसे संगत हो सकती है; इस प्रकार शास्त्रीय निमित्त-ज्ञान और अनुभूत दुःख के बीच का तनाव उभर आता है। इसके बाद उसका शोक अपने से बढ़कर कौशल्या की चिंता में बदलता है—जो तपस्विनी-सी जीवन बिताकर पुत्र-दर्शन की आशा रखती हैं; उनके दुःख की कल्पना से सीता का धर्म-संकट और बढ़ जाता है। तब सीता पर स्नेह रखने वाली राक्षसी त्रिजटा उसे समझाती है कि राम-लक्ष्मण के मुख और देह-शोभा में मृत्यु के लक्षण नहीं हैं, सेना का आचरण भी नायक-पतन के बाद जैसा टूटता है वैसा नहीं दिखता, और शुभ पुष्पक-विमान भी यदि वे सचमुच मृत होते तो सीता को न ले जाता। वह सत्य का आश्वासन देकर सीता से मोह और शोक त्यागने को कहती है। अंत में सीता पुष्पक से लौटकर लंका की अशोक-वाटिका में प्रवेश करती है; वहाँ राम-लक्ष्मण का पुनः स्मरण होते ही, सांत्वना के बीच भी उसका गहन शोक फिर जाग उठता है।

37 verses | Sita, Trijata

Sarga 49

शरबन्धनविलापः (The Lament under the Net of Arrows)

इस सर्ग में भयानक अस्त्र-प्रहार के बाद का दृश्य है। रणभूमि में श्रीराम और लक्ष्मण ‘शरबन्ध’—बाणों के जाल—से जकड़े हुए, रक्तस्राव करते और सर्पों की भाँति कराहते पड़े हैं। सुग्रीव और वानर-सेना उन्हें घेरकर शोक में विलाप करती है। धैर्य और संयम के बल से श्रीराम चेतना में आते हैं और लक्ष्मण की दारुण अवस्था देखकर दीर्घ शोक-प्रलाप करते हैं। वे कहते हैं कि भाई के बिना जीवन का क्या मूल्य, और लक्ष्मण के बिना सीता की प्राप्ति भी उन्हें निष्फल प्रतीत होती है। कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा को यह समाचार कैसे सुनाऊँ—इस विचार से वे व्याकुल हो उठते हैं। वे स्वयं को हीन और पापी कहकर धिक्कारते हैं, लक्ष्मण की अडिग सौम्यता और उत्तेजित किए जाने पर भी न कठोर होने वाले स्वभाव की प्रशंसा करते हैं, तथा उसके पराक्रम को कार्तवीर्य और इन्द्र के आयुधों तक से अतिशयोक्ति-पूर्वक तुलना करते हुए स्मरण करते हैं। फिर श्रीराम सुग्रीव को आदेश देते हैं कि सेना सहित समुद्र पार लौट जाओ; अग्रभाग में अङ्गद, नील और नल को रखो। वे इस विपत्ति को दैवजन्य बताते हैं जिसे मनुष्य नहीं टाल सकता, और कहते हैं कि मित्रों ने अपना कर्तव्य पूर्ण कर दिया है। यह सुनकर वानर और अधिक रोते हैं। तभी गदा हाथ में लिए विभीषण आते हैं; युद्ध की उलझन में वानर क्षणभर उन्हें इन्द्रजित समझकर घबरा जाते हैं—जिससे उस समय का भ्रम और मनोबल की नाजुकता प्रकट होती है।

32 verses

Sarga 50

सुपर्णागमनम् (Garuda’s Arrival and the Release from the Serpent-Arrow Bond)

इस पचासवें सर्ग में रणभूमि का घोर संकट और उसका समाधान मंत्रणा, औषधि-विद्या तथा दैवी हस्तक्षेप से दिखाया गया है। सुग्रीव वानरों को घबराया देखकर भय का कारण पूछते हैं। अङ्गद बताता है कि इन्द्रजित ने माया से सर्परूप बाणों द्वारा राम-लक्ष्मण को बाँधकर उन्हें शरशय्या पर गिरा दिया है। तभी विभीषण आते हैं; पहले उन पर संदेह होता है, फिर दोनों राजकुमारों को घायल देखकर वे शोक में डूबकर रावण-पक्ष की कपट-नीति की निन्दा करते और अपनी व्यथा प्रकट करते हैं। सुग्रीव उन्हें ढाढ़स बँधाते, रावण-वध का निश्चय बताते और सुसेण से उपाय पूछते हैं। सुसेण देवासुर-युद्धों की चिकित्सा-स्मृति से कहता है कि क्षीरोद-प्रदेश के चन्द्र और द्रोण पर्वतों से संजीवकरणी और विशल्यकरणी जैसी दुर्लभ औषधियाँ मँगाई जाएँ, और इसके लिए हनुमान उपयुक्त हैं। पर योजना पूरी होने से पहले ही आकाश में उथल-पुथल और द्वीप के वृक्षों का गिरना गरुड़ के आगमन का संकेत देता है। सर्प भाग जाते हैं; गरुड़ राम-लक्ष्मण को स्पर्श कर बाणों के घाव हर लेते हैं और क्षण भर में उनका तेज, बल, स्मृति और धैर्य लौटा देते हैं। वे स्वयं को राम का मित्र बताते, युद्ध में राक्षसों पर विश्वास न करने की चेतावनी देते, विजय और सीता-प्राप्ति का शुभ संकेत करते और प्रदक्षिणा करके चले जाते हैं। तब वानर-सेना सिंहनाद, भेरी और शंखध्वनि के साथ हर्षित होकर फिर लंका-द्वारों की ओर बढ़ चलती है।

66 verses

Sarga 51

धूम्राक्षप्रेषणम् (The Dispatch of Dhūmrākṣa)

इस 51वें सर्ग में लंका की रणनीति और मनोबल में बड़ा मोड़ आता है। वानरों के उल्लासपूर्ण, गगनभेदी जयघोष को सुनकर रावण किसी अनपेक्षित उलटफेर का अनुमान करता है और तुरंत टोह लेने का आदेश देता है। भयभीत राक्षस प्राचीरों पर चढ़कर सुग्रीव की सुरक्षित सेना को देखते हैं और निर्णायक समाचार पाते हैं—इन्द्रजित के भयंकर शर-बन्धन से बँधे राम और लक्ष्मण अब मुक्त हैं, मानो हाथी रस्सियाँ तोड़कर छूट गए हों। दूत भय को दबाकर संयत वाणी में यह वृत्तांत सुनाते हैं। इससे रावण के मन में चिंता और क्रोध बढ़ता है; वह अपनी सेना की सुरक्षा और अपने अस्त्रों की प्रभावशीलता पर संदेह करने लगता है। तब वह धूम्राक्ष को बुलाकर तुरंत धावा बोलने और राम तथा वानरों पर प्रहार करने की आज्ञा देता है। सेना विविध शस्त्रों, रथों, घोड़ों और हाथियों सहित जुटती है। धूम्राक्ष स्वर्ण-भूषित, गदहे-जुते रथ पर चढ़कर पश्चिमी द्वार की ओर बढ़ता है, जहाँ हनुमान स्थित हैं। मार्ग में गिद्ध, रक्त-सूचक दृश्य, प्रतिकूल वायु, अंधकार और भूमि-कम्प जैसे अपशकुन विनाश का संकेत देते हैं; फिर भी वह आगे बढ़कर राघव द्वारा संरक्षित विशाल वानर-सेना को देखता है।

36 verses

Sarga 52

धूम्राक्षवधः (The Slaying of Dhumrākṣa)

इस 52वें सर्ग में राक्षस-सेनापति धूम्राक्ष पुनः रणभूमि में लौटकर वानरों के युद्ध-नाद को उकसाता है और घोर संग्राम छिड़ जाता है। राक्षस बाण, शूल, गदा, लोहे के दण्ड आदि से प्रहार करते हैं, जबकि वानर वृक्ष, शिला, पर्वत-खण्ड तथा हाथ-पाँव, दाँत-नखों से प्रतिकार करते हैं। धनुषों की टंकार, घोड़ों की हिनहिनाहट और हाथियों की गर्जना को कवि “रण-गान्धर्व” के समान मधुर-भयानक ध्वनि-समूह के रूप में चित्रित करता है। धूम्राक्ष बाण-वर्षा से वानर-सेना को तितर-बितर कर कुछ समय के लिए बढ़त पा लेता है। तब पीड़ित सेना को देखकर हनुमान निर्णायक रूप से आगे बढ़ते हैं; वे एक विशाल शिला धूम्राक्ष के रथ पर फेंकते हैं, रथ चूर हो जाता है और धूम्राक्ष को कूदकर उतरना पड़ता है। इसके बाद द्वंद्व तीव्र होता है—धूम्राक्ष काँटेदार गदा से हनुमान पर प्रहार करता है, पर हनुमान अडिग रहते हैं और पर्वत-शिखर उसके मस्तक पर गिराकर धूम्राक्ष का वध कर देते हैं। शेष राक्षस भयभीत होकर लंका में भाग जाते हैं और वानर हनुमान का जय-जयकार करते हैं; इससे युद्ध में वानर-सेना का उत्साह और नेतृत्व-बल और दृढ़ हो जाता है।

38 verses

Sarga 53

युद्धकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः — धूम्राक्षवधश्रवणं, वज्रदंष्ट्रप्रेषणं, अङ्गद-राक्षसयुद्धम् (Ravana Dispatches Vajradamshtra; Portents and Angada’s Assault)

धूम्राक्ष के वध का समाचार सुनकर रावण क्रोध से उबल उठा। वह सर्प की भाँति फुफकारने लगा और गरम, दीर्घ श्वास छोड़ता हुआ वज्रदंष्ट्र नामक राक्षस-वीर को बुलाकर कठोर आज्ञा देता है—राम, सुग्रीव और समस्त वानर-सेना का संहार करो। इसके बाद युद्ध-तैयारी का दृश्य आता है। राक्षस-नायक अलंकृत वस्त्राभूषण धारण कर, हाथियों और अन्य वाहनों पर चढ़कर सुसज्जित दल के साथ दक्षिण द्वार से निकलते हैं, जहाँ अङ्गद तैनात है। प्रस्थान के साथ ही अपशकुन प्रकट होते हैं—उल्कापात, सियारों का रोना और क्रूर पशुओं की चेष्टाएँ—जो राक्षस-विनाश का संकेत देती हैं; फिर भी वज्रदंष्ट्र साहस बटोरकर रण में उतरता है। वानर दसों दिशाओं को भर देने वाले जयघोष करते हैं और युद्ध निकट-समर में बदल जाता है—वृक्ष, शिला, मुट्ठी और घुटने ही शस्त्र बन जाते हैं। वज्रदंष्ट्र के बाण-वर्ष से वानर दल क्षुब्ध होता है, तब क्रुद्ध अङ्गद एक वृक्ष उखाड़कर राक्षस-पंक्तियों को रौंद देता है। रणभूमि शवों, गिरे हुए आभूषणों और शस्त्रों से भर जाती है, और राक्षस-सेना वायु से धकेले गए मेघ-समूह की तरह डगमगा उठती है।

33 verses

Sarga 54

वज्रदंष्ट्रवधः — The Slaying of Vajradaṃṣṭra (Angada’s Duel)

सर्ग ५४ में वज्रदंष्ट्र और अंगद के बीच हुए भीषण युद्ध का वर्णन है। अपनी सेना का विनाश और अंगद के पराक्रम को देखकर क्रुद्ध राक्षस वज्रदंष्ट्र ने वानरों पर अचूक बाणों की वर्षा कर दी। युद्धभूमि कटे हुए अंगों, सिरविहीन धड़ों और रक्त से पट गई थी, जिससे वानर सेना का मनोबल टूटने लगा। भयभीत वानर अंगद की शरण में गए, तब वालिपुत्र ने साहसपूर्वक नेतृत्व संभाला और वज्रदंष्ट्र को ललकारा। दोनों योद्धाओं के बीच का द्वंद्व बाणों की वर्षा से शुरू होकर वृक्षों, विशाल शिलाओं और गदा युद्ध तक जा पहुँचा। अंत में, जब हाथापाई की नौबत आई, तो अंगद ने अद्भुत स्फूर्ति दिखाते हुए एक तीक्ष्ण तलवार से वज्रदंष्ट्र का सिर धड़ से अलग कर दिया। अपने सेनापति को गिरता देख राक्षस लंका की ओर भाग खड़े हुए और वानर सेना ने अंगद का जयघोष किया।

38 verses

Sarga 55

अकम्पन-प्रेषणम् तथा कपि-राक्षस-रणवर्णनम् (Akampana Dispatched; The Vanara–Rakshasa Battle and Omens)

वज्रदंष्ट्र के वध का समाचार—जो वालि-पुत्र अंगद ने किया था—सुनकर रावण सेनापति को संबोधित करता है और तत्काल अकम्पन को युद्ध के लिए भेजने की आज्ञा देता है। वह अकम्पन की प्रशंसा करता है कि वह अनुशासित सेनानायक, रक्षक, रणप्रिय और समस्त शस्त्रों में निपुण नीति-ज्ञ योद्धा है। राक्षस-सेना आदेश पाते ही निकल पड़ती है और अकम्पन स्वर्ण-विभूषित रथ पर, मेघ-गर्जना और वज्र-ध्वनि-सी गूँज के साथ रणभूमि की ओर बढ़ता है। प्रस्थान के समय शुभ मौसम होते हुए भी दिन अचानक मेघाच्छन्न हो जाता है, तीव्र पवन चलने लगती है, पक्षी और पशु भयावह स्वर में चीत्कार करते हैं—अशुभ उत्पात प्रकट होते हैं। पर अकम्पन उन्हें अनदेखा कर युद्धभूमि में प्रवेश करता है। फिर वानर और राक्षसों का घोर संग्राम छिड़ता है। धूलि उठकर रक्तवर्ण हो आकाश को ढक लेती है; ध्वज, शस्त्र, घोड़े और योद्धाओं के रूप तक छिप जाते हैं, और उस भ्रम में मित्र-शत्रु का भेद न रहकर सब एक-दूसरे पर प्रहार करने लगते हैं। रक्त से धूल बैठती है और भूमि शवों व कटे अंगों से भर जाती है। वृक्ष, शिला, गदा, शक्ति और बाहु-दंडों से निकट युद्ध चलता है; अकम्पन राक्षसों को उकसाकर पंक्तियाँ सँभालता है, और वानर-नायक कुमुद, नल तथा मैनद प्रत्याक्रमण कर शत्रु-दल को रौंद डालते हैं।

31 verses | Ravana

Sarga 56

अकम्पनवधः — The Slaying of Akampana (Hanuman’s rout of the Rakshasa host)

इस सर्ग में अकम्पन के वध और हनुमान जी के अद्भुत शौर्य का वर्णन किया गया है। वानरों के पराक्रम को देखकर क्रोधित अकम्पन ने अपनी सेना को भीषण आक्रमण का आदेश दिया और बाणों की वर्षा से वानर सेना में भगदड़ मचा दी। अपने साथियों को संकट में और भागते हुए देख, हनुमान जी एक रक्षक के रूप में आगे आए। उनके नेतृत्व में वानर यूथपतियों ने पुनः संगठित होकर और उनका आश्रय लेकर युद्ध में वापसी की। इसके पश्चात हनुमान और अकम्पन के बीच द्वंद्व युद्ध हुआ। जब अकम्पन ने अपने बाणों से हनुमान जी पर प्रहार किया, तो हनुमान जी ने एक पर्वत शिखर उखाड़कर फेंका, जिसे अकम्पन ने हवा में ही काट दिया। अंततः, हनुमान जी ने क्रोधित होकर एक विशाल अश्वकर्ण वृक्ष उखाड़ा और उससे अकम्पन के सिर पर प्रहार कर उसका वध कर दिया। सेनापति के मारे जाने पर राक्षस सेना लंका की ओर भाग गई और श्री राम, लक्ष्मण तथा सुग्रीव ने हनुमान जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

39 verses | Akampana

Sarga 57

प्रहस्तनिर्याणम् — Prahasta’s Departure and the Muster of the Rakshasa Host

अकम्पन के वध से उत्पन्न स्तब्धता के बाद रावण क्रोध से दहकता हुआ, पर मुख से पीला पड़कर, मंत्रियों के साथ विचार करता है और लंका के रक्षा-स्थानों का निरीक्षण करता है। नगर को संकटग्रस्त देखकर वह युद्ध-विशारद प्रहस्त को बुलाकर कहता है कि इस विपत्ति का समाधान निर्णायक युद्ध-नेतृत्व से ही होगा; भार उठाने वाले तो वह स्वयं, कुम्भकर्ण, इन्द्रजित और निकुम्भ भी हैं, पर तत्काल सेना जुटाने का दायित्व प्रहस्त को सौंपता है। प्रहस्त पूर्व-विचारों की स्मृति दिलाते हुए हितवचन कहता है कि सीता को लौटा देना ही कल्याणकारी है, अन्यथा युद्ध अनिवार्य है; फिर भी वह स्वामी-भक्ति की प्रतिज्ञा करता है, मिले मान-सम्मान को स्वीकारता है और रण में प्राण देने तक को प्रस्तुत होता है। प्रहस्त सेनापतियों को आज्ञा देता है कि महती राक्षस-सेना एकत्र की जाए। शीघ्र ही लंका भारी शस्त्रों से सुसज्जित, गज-सम योद्धाओं से भर जाती है; अग्निहोत्र होते हैं, ब्राह्मणों का सत्कार होता है, अभिषिक्त मालाओं आदि से मंगल-कर्म किए जाते हैं। वह सर्प-ध्वज, स्वर्ण-जाल से विभूषित, गर्जन-सम ध्वनि वाले रथ पर चढ़कर सहायकों सहित निकल पड़ता है; भेरियों, शंखों और भयानक घोषों से दिशाएँ गूँज उठती हैं। तभी अपशकुनों का घना समूह प्रकट होता है—वामावर्त उड़ते मांसभक्षी पक्षी, उल्कापात, प्रचण्ड आँधियाँ, सियारों की ध्वनि, रक्त-वृष्टि, ध्वज पर गिद्ध का बैठना और सारथी के चाबुक का फिसल जाना—जो बाह्य वैभव के बीच भी विनाश का संकेत देते हैं। उधर वानर-सेना वृक्षों और शिलाओं से सज्ज हो जाती है; दोनों ओर से ललकारें बढ़ती हैं। प्रहस्त पतंगे की भाँति ज्वाला में प्रवेश करता हुआ विजय-लालसा से वानर-बल में घुस पड़ता है—अहंकार, अपशकुनयुक्त आक्रमण और युद्ध की करुण गति का पाठ रचते हुए।

46 verses

Sarga 58

प्रहस्तवधः (The Slaying of Prahasta)

इस सर्ग में श्रीराम रणभूमि में विशाल सेना सहित आगे बढ़ते हुए भयंकर राक्षस-सेनापति प्रहस्त को देखकर शांत आत्मविश्वास के साथ विभीषण से पूछते हैं—यह कौन है? विभीषण बताते हैं कि यह रावण का सेनापति प्रहस्त है, पराक्रम और अस्त्र-शस्त्र-निपुणता में प्रसिद्ध, जो लंका की सेना के बड़े भाग का नेतृत्व करता है। इसके बाद दोनों पक्षों में घोर संग्राम छिड़ जाता है; शिलाओं और बाणों की वर्षा होती है, तलवार, भाला, तोमर, मुद्गर, लोहे की छड़ आदि असंख्य शस्त्रों से रणभूमि भर जाती है और भारी हानि होती है। वर्णन रक्त, शवों और टूटे अंगों से भरी ‘रक्त-नदी’ जैसी उपमा के साथ युद्ध की कठोर कीमत को उभारता है। प्रहस्त स्वयं आगे बढ़कर बाण-वृष्टि से वानर-सेना में हाहाकार मचा देता है। तब नील उसका सामना करते हैं; बाणों से घायल होकर भी वे उखाड़े हुए वृक्षों से प्रहार करते हैं, प्रहस्त का धनुष तोड़ देते हैं और उसे निकट-युद्ध में भारी मुद्गर लेकर उतरना पड़ता है। अंत में नील एक विशाल शिला प्रहस्त के सिर पर दे मारते हैं, उसका मस्तक चूर हो जाता है और वह मारा जाता है। सेनापति के गिरते ही राक्षस-सेना शोक से स्तब्ध होकर लंका की ओर हट जाती है; श्रीराम और लक्ष्मण नील की प्रशंसा करते हैं और वानर विजय से हर्षित होते हैं।

61 verses

Sarga 59

युद्धकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः — Rāvaṇa’s Assault on Nīla and Lakṣmaṇa; Hanumān Bears Rāma

प्रहस्त के वध के पश्चात, रावण क्रोधित होकर स्वयं युद्धभूमि में उतरा और वानर सेना पर भीषण आक्रमण किया। उसने सुग्रीव और अन्य वानर वीरों को पीछे धकेल दिया। नील ने रावण के रथ पर चढ़कर अद्भुत चपलता दिखाई, परंतु रावण ने आग्नेयास्त्र से उन्हें गिरा दिया। इसके बाद रावण और लक्ष्मण के बीच भयंकर द्वंद्व हुआ। रावण ने ब्रह्मा द्वारा दी गई अमोघ 'शक्ति' से लक्ष्मण की छाती पर प्रहार किया, जिससे वे मूर्च्छित हो गए। रावण ने लक्ष्मण को उठाने का प्रयास किया, किंतु हनुमान जी ने रावण को वज्र समान मुक्के से मारकर पीछे हटा दिया और लक्ष्मण को श्रीराम के पास ले आए। अंत में, श्रीराम ने हनुमान के कंधों पर आरूढ़ होकर रावण के रथ, घोड़ों और मुकुट को नष्ट कर दिया। रावण को थका हुआ और निशस्त्र देखकर, श्रीराम ने उसे नहीं मारा और कहा, 'तुम थक गए हो, लंका जाकर विश्राम करो और फिर युद्ध के लिए आना।' यह सर्ग श्रीराम की दया और युद्ध-नीति का उत्कृष्ट उदाहरण है।

146 verses | Rāma, Rāvaṇa, Lakṣmaṇa (Saumitri), Hanumān, Vibhīṣaṇa

Sarga 60

कुम्भकर्णविबोधनम् (The Awakening of Kumbhakarna)

इस सर्ग में रावण राम के बाणों से अपमानित होकर लंका लौटता है और अपने संकट को पुराने शापों व भविष्यवाणियों से जोड़कर देखता है। वेदवती के अपमान का पाप, उमा, नन्दीश्वर, रम्भा, वरुण की कन्या आदि के शाप तथा ब्रह्मा की यह चेतावनी कि विनाश मनुष्यों से होगा—इन सबको स्मरण कर वह द्वारों पर रक्षा कड़ी करने की आज्ञा देता है और अंतिम उपाय के रूप में कुम्भकर्ण को तुरंत जगाने का आदेश करता है, जिसकी दीर्घ निद्रा ब्रह्मा के शाप से मानी गई है। राक्षसों का बड़ा दल उसे जगाने के लिए क्रमशः अनेक उपाय करता है—भोजन-पान और सुगंध, शंख-भेरी-मृदंग का कोलाहल, गदा और वृक्षों से प्रहार, जल डालना, बाँधकर ताड़ना, यहाँ तक कि हाथियों को उसके शरीर पर चलाना। अंततः भूख और आघात से उसकी तंद्रा टूटती है। वह प्रलय-सा रूप धारण किए जागता है—मुख पाताल-सा, नेत्र दहकते ग्रहों जैसे—और मांस, रक्त, वसा तथा मदिरा का अपार सेवन करता है, फिर पूछता है कि यह आपात्काल क्यों है। मंत्री यूपाक्ष बताता है कि संकट देवों से नहीं, मनुष्यों से है—राम और लक्ष्मण वानर-सेना सहित लंका को रौंद रहे हैं; पहले हुए विनाश और रावण के कठिन बचाव का भी उल्लेख करता है। कुम्भकर्ण तत्काल विजय का संकल्प लेकर निकल पड़ता है; उसके चलने से धरती काँप उठती है। उसे देखकर वानर-वीर भयभीत हो उठते हैं—कई भागते हैं, कई राम की शरण लेते हैं—और युद्ध के अगले चरण से पहले मनोवैज्ञानिक मोड़ स्पष्ट हो जाता है।

97 verses

Sarga 61

कुम्भकर्णदर्शनम् — The Appearance of Kumbhakarna and the Account of His Might

तब श्रीराम ने धनुष उठाकर मुकुटधारी, पर्वत-सा विशाल कुम्भकर्ण को देखा। उसके अतिविशाल रूप से वानर-सेना में घबराहट फैल गई। राम ने विभीषण से पूछा कि यह अद्भुत पुरुष कौन है; विभीषण ने बताया—यह विश्रवा का पुत्र कुम्भकर्ण है, जिसने पूर्वकाल में इन्द्र और यम की सेनाओं तक को पराजित किया था, और जिसका स्वाभाविक बल वरदानों पर निर्भर अन्य राक्षस-नायकों से भी बढ़कर है। फिर कुम्भकर्ण का पूर्ववृत्त कहा गया—जन्म से ही उसकी भयंकर भूख थी; वह प्राणियों को निगलता, जनों को आतंकित करता रहा। इन्द्र ने वज्र से उस पर प्रहार किया, पर कुम्भकर्ण ने ऐरावत के दाँत से इन्द्र को चोट पहुँचाई। देवता और समस्त प्राणी ब्रह्मा की शरण में गए और उसके अत्याचार बताए—भक्षण, देवताओं पर आक्रमण, आश्रमों का विध्वंस, और परस्त्रियों का अपहरण। ब्रह्मा ने उसे मृतवत् निद्रा का शाप दिया; रावण ने कुल-गरिमा और न्याय की दुहाई दी, तब ब्रह्मा ने व्यवस्था की—छह महीने निद्रा और एक दिन जागरण; पर उस एक दिन की क्षुधा भी जगत् के लिए भयावह बताई गई। युद्धभूमि में लौटकर विभीषण ने वानरों का धैर्य सँभालने को कहा। श्रीराम ने नील को आज्ञा दी कि सेना को सजाकर लंका के द्वारों, मार्गों और घाटों की रक्षा करे; वानर वृक्ष, शिला और पर्वत-शिखर लेकर सन्नद्ध हुए और मेघ-समूह-सी घनी युद्ध-व्यवस्था बनाकर डट गए।

40 verses

Sarga 62

कुम्भकर्णस्य प्रबोधनम् — The Awakening and Commissioning of Kumbhakarna

इस सर्ग में लंका के भीतर कुम्भकर्ण के जगाए जाने का प्रसंग राजनीतिक-मानसिक रूप में उभरता है। निद्रा और मद से भारी होते हुए भी वह ‘राक्षस-व्याघ्र’ समान प्रचण्ड दिखाई देता है। हजारों सेवकों की संगति में, पुष्प-वर्षा से सम्मानित होकर, वह भव्य राजपथ से चलता हुआ स्वर्ण-जालों से सुसज्जित, सूर्य-सा दीप्तिमान राक्षस-राज के भवन में प्रवेश करता है; उसके विशाल डगों से मानो पृथ्वी काँप उठती है। पुष्पक के आसन पर बैठा रावण भीतर से व्याकुल है, पर भाई को देखकर प्रसन्न होकर उठता है, आलिंगन करता है और आदर से बैठाता है। तब कुम्भकर्ण क्रोध से रक्त-नेत्र होकर पूछता है—“मुझे क्यों जगाया गया? तुम किससे भयभीत हो?” रावण राम का भय स्वीकार करता है—राम और सुग्रीव समुद्र पार कर सेना सहित आ पहुँचे हैं; लंका के उपवन उजड़ गए, बहुत-से राक्षस मारे गए, जबकि वानर युद्ध में भी अटूट प्रतीत होते हैं। वह थकी हुई नगरी की रक्षा की याचना करता है, जहाँ अब बालक और वृद्ध ही अधिक रह गए हैं; देवों और असुरों पर कुम्भकर्ण की पूर्व-विजयों की प्रशंसा कर उसे आदेश देता है कि वह शत्रु-सेना को ऐसे तितर-बितर कर दे जैसे वायु वर्षा-मेघों को छिन्न-भिन्न कर देती है।

23 verses | Kumbhakarna, Ravana

Sarga 63

कुम्भकर्णोपदेशः — Kumbhakarna’s Counsel and War-Boast to Ravana

लंका में रावण के शोक-विलाप को सुनकर कुम्भकर्ण पहले उपहासपूर्वक हँसता है, फिर गंभीर नीति-उपदेश देता है। वह कहता है कि राजा को नीति-विकल्पों में जो श्रेयस्कर हो उसे पहचानकर, मंत्रियों के साथ, समय-परिस्थिति और परिणाम को देखकर निर्णय करना चाहिए। सान्त्व (समाधान), दान, भेद और विक्रम (पराक्रम-बल)—इन उपायों को काल के अनुसार अकेले या मिलाकर अपनाना चाहिए, और धर्म-अर्थ-काम का क्रमबद्ध संतुलन ही राजधर्म है। वह चेतावनी देता है कि अज्ञानी, धृष्ट सलाहकारों से तथा शत्रु से मिलीभगत करने वाले मंत्रियों से बचना चाहिए; विचार-विमर्श में उनके आचरण की सूक्ष्म परीक्षा आवश्यक है। इस फटकार से रावण तिलमिला उठता है और बीते हुए पर विचार छोड़कर तत्काल कार्यकारी सलाह माँगता है। तब कुम्भकर्ण स्वर को नरम कर रावण को आश्वस्त करता है कि वह उसकी रक्षा करेगा और स्वयं युद्ध का निर्णायक साधन बनेगा। वह अतिशयोक्तिपूर्ण वीर-प्रतिज्ञाएँ करता है—राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और हनुमान का संहार करूँगा, और देवताओं तक को रण में ललकारूँगा। इस प्रकार यह सर्ग गंभीर राज्यनीति और प्रदर्शनात्मक रण-गर्जना को साथ रखकर दिखाता है कि युद्ध की पूर्वसंध्या में उपदेश कैसे प्रेरक युद्ध-भाषण बन जाता है।

58 verses

Sarga 64

महोदर-वाक्यं कुम्भकर्ण-प्रतिषेधः (Mahodara’s Counsel and the Critique of Kumbhakarna’s Solo Assault)

लंकापुरी की सभा में यह सर्ग मंत्र-विवाद के रूप में चलता है। कुम्भकर्ण के अकेले युद्ध करने के मत को सुनकर महोदर कठोर शब्दों में उसकी भर्त्सना करता है और कहता है कि एकाकी समर का तर्क अविवेकपूर्ण और नीति-विरुद्ध है। वह जनस्थान में श्रीराम द्वारा राक्षसों के पूर्व-वध का उदाहरण देकर राम की सिद्ध सामर्थ्य और उससे उपजे भय को स्मरण कराता है। उपमाओं द्वारा वह समझाता है कि राम क्रुद्ध सिंह के समान हैं और सुप्त सर्प के समान—जिन्हें जगाना हितकर नहीं; अतः उन्हें सीधे उकसाना रणनीति की दृष्टि से अनुचित है। फिर महोदर आलोचना से आगे बढ़कर एक ठोस, किंतु नैतिक रूप से संदिग्ध, योजना रखता है। महोदर, द्विजिह्व, सम्ह्रादि, कुम्भकर्ण और वितर्दन—इन पाँच योद्धाओं को साथ निकलकर राम से भिड़ना चाहिए; परिणाम चाहे जो हो, नगर में यह प्रचार फैलाया जाए कि ‘राम और लक्ष्मण निगल लिए गए’, जिससे जनमानस पर आघात पड़े। उसी अफ़वाह का लाभ उठाकर रावण को सलाह दी जाती है कि वह सीता के पास एकांत में जाकर उसे ढाढ़स दे, धन-धान्य और रत्नों का लोभ दिखाए, और भय, शोक तथा एकाकीपन के दबाव से उसे वश में करने का प्रयास करे। इस प्रकार अध्याय में जोखिम, संसाधन और समय पर आधारित नीति-चिंतन के साथ कपटपूर्ण सूचना-रणनीति का भी चित्रण है, जो तकनीकी रूप से चतुर होते हुए भी धर्म की दृष्टि से कलुषित है।

36 verses | Mahodara, Kumbhakarna, Ravana

Sarga 65

कुम्भकर्णप्रस्थानम् — Kumbhakarna’s Departure for Battle

इस सर्ग में कुम्भकर्ण का सभामंत्र-प्रसंग क्रमशः विधिवत् शस्त्र-सज्जा और युद्ध-प्रस्थान में परिणत होता है। वह महोदर के निरुत्साहपूर्ण वचनों को डाँटकर क्षात्रधर्म बताता है—वीरता का प्रमाण आत्म-प्रशंसा नहीं, कर्म हैं; और वह कहता है कि समस्त रणनीतिक त्रुटियों का प्रायश्चित्त करने हेतु वह रणभूमि में जाएगा। रावण महोदर के भय को ‘राम-भय’ बताकर कुम्भकर्ण को आश्वस्त करता है, उसकी अतुल शक्ति और हितैषिता की प्रशंसा करता है तथा वानर-सेना और दोनों राजकुमारों के विनाश के लिए उसे प्रेरित करता है। कुम्भकर्ण प्रतिज्ञा करता है कि राम का वध कर रावण का भय दूर करेगा; वह अकेले आगे बढ़ने का प्रस्ताव रखता है, पर रावण एकाकी दर्प से सावधान कर रक्षित दल के साथ प्रस्थान का आदेश देता है। तत्पश्चात् अलंकरण-समारोह होता है—मालाएँ, बाजूबंद, अंगूठियाँ, आभूषण, मुकुट, कुण्डल, मेखला और कवच उसे पहनाए जाते हैं; अग्नि, चन्द्र और नारायण/त्रिविक्रम के समान उपमानों से उसका वर्णन किया जाता है। नगाड़ों-शंखों के शब्द, रथ-हाथी-घोड़े और विविध वाहनों के साथ वह निकलता है; तभी घनघोर मेघ-विद्युत, सियारों का रुदन, चक्कर लगाते पक्षी, उसके आयुध पर गिद्ध का बैठना, उल्कापात, सूर्य का म्लान होना और वायु का स्तब्ध हो जाना—अशुभ शकुन प्रकट होते हैं। फिर भी दैववश वह आगे बढ़ता है; प्राकार लाँघकर वह वानर-पंक्तियों में आतंक भर देता है, और उसके गर्जन से वे तितर-बितर होकर गिरने लगते हैं—राजसी वैभव और वाणी के आत्मविश्वास के सामने अशुभ निमित्तों की छाया इस सर्ग का मुख्य संकेत बनती है।

57 verses

Sarga 66

कुम्भकर्णप्रस्थानम् तथा अङ्गदप्रेरणा (Kumbhakarna’s sortie and Angada’s rallying of the Vanaras)

इस 66वें सर्ग में कुम्भकर्ण के प्रस्थान से उत्पन्न वानर-सेना का मनोभंग और फिर उसका समाधान वर्णित है। पर्वत-शिखर के समान विशाल कुम्भकर्ण लंका की सीमा लाँघकर वेग से आगे बढ़ता है और ऐसा गर्जता है कि समुद्र तक गूँज उठता है। उसे ‘देवताओं से भी अजेय’ मानकर वानर भयभीत होकर तितर-बितर हो जाते हैं—कोई पीछे देखे बिना भागता है, कोई समुद्र में गिर पड़ता है, कोई गुफाओं, पर्वतों और वृक्षों की शरण लेता है, और कोई मृत-सा होकर धरती पर ढह जाता है। तब वानर-नायक, वालि-पुत्र अङ्गद उन्हें रोककर लौटने का आदेश देता है। वह समझाता है कि शस्त्र छोड़कर भागना लोक-लज्जा का कारण है; धर्मयुद्ध में मृत्यु भी कल्याणकारी है—जीत से कीर्ति मिलती है और यदि वीरगति हो तो ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। वह उनके पूर्व के आत्म-शौर्य-प्रशंसन को स्मरण कराकर कहता है कि अब यह घबराहट शोभा नहीं देती। वानर कहते हैं कि कुम्भकर्ण ने भयंकर संहार मचाया है और प्राण प्रिय हैं; फिर भी अङ्गद की दृढ़ वाणी और हनुमान के सहायक उपदेश से उनका साहस लौट आता है। ऋषभ, शरभ, मैन्द, धूम्र, नील, कुमुद, सुषेण, गवाक्ष, रम्भा, तारा, द्विविद, पनस और हनुमान सहित सेनापति पुनः शीघ्र रणभूमि की ओर बढ़ते हैं। वे कुम्भकर्ण पर शिलाएँ और पुष्पित वृक्ष फेंकते हैं, पर वे उसके अंगों से टकराकर चूर हो जाते हैं—उसकी भयानक दृढ़ता प्रकट होती है और युद्ध फिर से प्रचण्ड हो उठता है।

34 verses

Sarga 67

कुम्भकर्णवधः — The Slaying of Kumbhakarna

इस सर्ग में कुम्भकर्ण के विनाशकारी युद्ध और वानर सेना के संघर्ष का वर्णन है। अंगद के प्रोत्साहन से वानरों का मनोबल पुनः स्थापित होता है। हनुमान, सुग्रीव और अन्य वीर कुम्भकर्ण पर वृक्षों और चट्टानों से प्रहार करते हैं, किंतु वह उन्हें विफल कर वानरों को खाने लगता है। तब श्रीराम स्वयं युद्ध में उतरते हैं। वे अपने दिव्य बाणों से कुम्भकर्ण की भुजाओं और पैरों को काट देते हैं। कटी हुई भुजाओं के गिरने से वानर सेना में भी क्षति होती है। अंततः, श्रीराम ऐन्द्र-अस्त्र से कुम्भकर्ण का सिर धड़ से अलग कर देते हैं, जिससे देवताओं में हर्ष और वानरों में उत्साह की लहर दौड़ जाती है।

180 verses

Sarga 68

कुम्भकर्णवधश्रवणेन रावणविलापः (Ravana’s Lament on Hearing of Kumbhakarna’s Slaying)

इस सर्ग में रणभूमि के परिणाम से कथा राक्षस-सभा के मानसिक प्रभाव की ओर मुड़ती है। दूत रावण को बताते हैं कि कुम्भकर्ण ने थोड़े समय में वानरों को तितर-बितर कर अनेक को निगल लिया, पर अंततः तेजस्वी राघव श्रीराम ने उसे मार गिराया। उसके शव का भयानक, विराट चित्र खींचा जाता है—पर्वत-सा शरीर राम के बाणों से कटकर विकृत धड़ बन गया, रक्त की धाराएँ बह रही हैं और वह लंका के एक द्वार को रोककर पड़ा है; इस प्रकार पराजय नगर के लिए भी अपशकुन बन जाती है। समाचार सुनते ही रावण मूर्छित हो जाता है, फिर चेत में आकर दीर्घ विलाप करता है। वह कुम्भकर्ण को अपना “दाहिना हाथ” कहकर पुकारता है और पूछता है कि देव-दानवों के गर्व को चूर करने वाला वीर राम के हाथों कैसे गिर गया। वह इसे काल/दैव की प्रबलता मानता है; आकाश में देव-ऋषियों के हर्ष और उपहास की कल्पना करता है तथा वानरों के और अधिक साहसी होकर लंका की प्राचीरें चढ़ आने के संकट को देखता है। विलाप आत्म-आरोप में बदल जाता है—रावण समझता है कि यह पूर्व अधर्म का विपाक है, विशेषकर धर्मात्मा विभीषण को निकाल देना और उसकी हितकारी सलाह की अवहेलना। अंत में वह निश्चय करता है कि राघव का वध किए बिना जीवन व्यर्थ है; फिर शोक से टूटकर गिर पड़ता है, और कथा वीर-प्रतिरोध से हटकर दैव-छाया वाली हताश दृढ़ता की ओर बढ़ती है।

24 verses | Rāvaṇa

Sarga 69

त्रिशिरा-प्रबोधनम् तथा नरान्तक-वधः (Trisira’s Counsel and the Slaying of Naranthaka)

इस सर्ग में कुम्भकर्ण-वध के बाद रावण का शोक और विलाप दिखाया गया है। त्रिशिरा उसे डाँटकर राजधर्म का स्मरण कराता है—राजा को संयम और धैर्य रखना चाहिए, अपने वरदानों और दिव्य आयुधों पर भरोसा कर शत्रु के प्रति उत्साह से खड़ा होना चाहिए। इस उपदेश से रावण का मन स्थिर होता है और वह त्रिशिरा, अतिकाय, देवान्तक, नरान्तक, महोदर और महापार्श्व—इन छह श्रेष्ठ राक्षस-नायकों को अभिषेक कर, हाथी-रथ-अश्व तथा भारी शस्त्रों से सुसज्जित करके युद्ध के लिए भेजता है। रणभूमि में उनका अग्रगमन घनघोर मेघों के समान प्रतीत होता है; उधर वानर-वीर गर्जना करते हुए वृक्ष उखाड़ते और पर्वत उठाकर प्रत्युत्तर देते हैं। घोर संग्राम में नरान्तक दीप्त भाले (शक्ति) से वानर-पंक्तियों को चीरता हुआ भय फैलाता है। सुग्रीव यह देखकर अङ्गद को आदेश देता है कि वह उस अश्वारूढ़ आक्रमणकारी को रोक दे। अङ्गद निरायुध होकर नख-दन्त को ही अपना शस्त्र बताकर नरान्तक को ललकारता है और कहता है—वज्र-तुल्य शक्ति फेंक। वह प्रहार सह लेता है; फिर कर-प्रहार से नरान्तक के घोड़े को गिरा देता है। नरान्तक के घूँसे को सहकर अङ्गद प्रत्याघात में ऐसा प्रचण्ड मुष्टि-प्रहार करता है कि उसका वक्ष विदीर्ण हो जाता है और नरान्तक मारा जाता है। देव और वानर जयघोष करते हैं; अङ्गद का यह कठिन, मनोबल बढ़ाने वाला विजय-कार्य युद्ध में विशेष रूप से प्रशंसित होता है।

96 verses | Trisira, Ravana, Sugriva, Angada

Sarga 70

त्रिशिरा–देवान्तक–महोदर–मत्त (महापार्श्व) वधः | Slaying of Trisira, Devantaka, Mahodara, and Matta (Mahaparsva)

इस सर्ग में रावण के प्रमुख सेनानायकों—त्रिशिरा, देवान्तक, महोदर और महापार्श्व (मत्त)—के वध का ओजस्वी वर्णन है। युद्ध के आरंभ में महोदर, देवान्तक और त्रिशिरा ने एक साथ मिलकर अंगद पर भीषण आक्रमण किया। अंगद ने पराक्रम दिखाते हुए महोदर के हाथी को मार गिराया और उसके दांत से देवान्तक पर प्रहार किया। अंगद की सहायता के लिए हनुमान और नील रणभूमि में आ डटे। हनुमान जी ने एक वज्रतुल्य मुष्टि प्रहार से देवान्तक का वध कर दिया, और नील ने एक विशाल शिला के प्रहार से महोदर को यमलोक भेज दिया। इसके पश्चात हनुमान जी और त्रिशिरा के बीच घोर संग्राम हुआ। हनुमान जी ने त्रिशिरा के बाणों और शक्ति को नष्ट कर दिया और अंततः उसी की तलवार छीनकर उसके तीनों सिर काट दिए। अंत में, क्रोधित होकर महापार्श्व (मत्त) ने अपनी गदा से वानर सेना पर आक्रमण किया। वानर वीर ऋषभ ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए महापार्श्व की गदा छीन ली और उसी से उसका वध कर दिया। अपने प्रमुख वीरों को मृत देखकर राक्षस सेना भयभीत होकर भाग खड़ी हुई।

67 verses

Sarga 71

अतिकायवधः (The Slaying of Atikāya)

इस सर्ग में रावण का पुत्र अतिकाय—पर्वत-सा विशाल, ब्रह्मा के वर से सुरक्षित कवचधारी—राक्षस-सेना और अपने स्वजनों को घायल व निहत देखकर क्रोध से रणभूमि में उतरता है। दूर से उसके महा रथस्थ रूप को देखकर श्रीराम विभीषण से पूछते हैं; विभीषण बताता है कि वह धान्यमालिनी का पुत्र है, अस्त्रविद्या में निपुण है, और वर-प्राप्त कवच के कारण सामान्य शस्त्रों से लगभग अवध्य है। अतिकाय वानर-दलों में आतंक फैलाकर योग्य प्रतिद्वन्द्वी को ललकारता है। लक्ष्मण आगे बढ़ते हैं; दोनों के बीच गर्वोक्ति और धर्मयुक्त वचन-विनिमय होता है, जहाँ पराक्रम को वाणी नहीं, कर्म से सिद्ध माना जाता है। फिर अग्नि, सूर्य, इन्द्र, वायु, यम, त्वष्टृ/इषीक आदि अस्त्रों का क्रमशः प्रयोग होता है; आकाश में बाण टकराते हैं, पर अतिकाय का अभेद्य कवच नहीं टूटता। एक सर्प-सदृश बाण से लक्ष्मण क्षणभर स्तब्ध होते हैं, फिर संभलकर अतिकाय के रथ के घोड़े, सारथी और धुरा आदि को नष्ट कर देते हैं। तब वायु देव रहस्य बताते हैं कि उस वर-रक्षित कवच को केवल ब्राह्म (ब्रह्मा का) अस्त्र ही भेद सकता है। लक्ष्मण ब्राह्मास्त्र का आवाहन करते हैं; उसके तेज से जगत् कम्पित होता है, और वह दिव्य शर अतिकाय के प्रतिरोध को लाँघकर उसके मुकुटधारी मस्तक को काट गिराता है। शेष राक्षस भयभीत होकर लंका की ओर भागते हैं, वानर-सेना लक्ष्मण का जयगान करती है, और वे शीघ्र श्रीराम के पास लौट आते हैं।

116 verses

Sarga 72

अतिकायवधश्रवणं रावणस्य लङ्कारक्षाविधानम् (Ravana’s Reaction to Atikaya’s Death and the Fortification Orders for Lanka)

इस सर्ग में रावण को यह समाचार मिलता है कि अत्यन्त पराक्रमी लक्ष्मण ने अतिकाय का वध कर दिया। यह सुनते ही वह शोक और क्रोध से व्याकुल हो उठता है और लंका के श्रेष्ठ योद्धाओं का क्रमशः नाश स्मरण कर, राम और वानरों के सामने राक्षसों की अजेयता का अभिमान टूटता हुआ देखता है। वह इन्द्रजित द्वारा दिव्यास्त्रों से राम-लक्ष्मण को बाँधने की घटना याद कर आश्चर्य करता है कि जिसे देव-गन्धर्व भी अटूट मानते थे, वह बन्धन भी कैसे छूट गया—यह विरोधी पक्ष की अद्भुत शक्ति का संकेत है। शोक-विलाप से हटकर रावण शासन-आदेश देता है कि नगर में सर्वत्र कठोर चौकसी रखी जाए। द्वारों, प्रवेश-निर्गम मार्गों और सैन्य-चौकियों की बार-बार जाँच हो; विशेषतः अशोक-वाटिका में, जहाँ सीता की रक्षा हो रही है, सुरक्षा और भी दृढ़ की जाए। वह रात्रिचरों को संध्या, मध्यरात्रि और प्रभात—हर समय वानरों की गतिविधि पर दृष्टि रखने को कहता है, और सेना को स्थिर हो या अग्रसर—सदा तत्पर रहने का आदेश देता है। आदेश पाकर राक्षस-बल उठ खड़ा होता है और रक्षा-व्यवस्था में लग जाता है। रावण स्वयं पुत्र-वध के निजी विपत्ति-शोक से भीतर ही भीतर जलता हुआ, क्रोध की काँटेदार पीड़ा लिए, बार-बार दीर्घ निःश्वास भरता अपने भवन में लौट जाता है।

25 verses | Rāvaṇa

Sarga 73

इन्द्रजितः ब्रह्मास्त्र-यागः तथा वानरसेनाविध्वंसः (Indrajit’s Brahmastra Rite and the Crushing of the Vanara Host)

सर्ग 73 में बचे हुए राक्षस रावण के पास जाकर देवन्तक, त्रिशिरा और अतिकाय जैसे प्रमुख वीरों के मारे जाने का समाचार देते हैं। इस सुनकर रावण शोक और युद्ध-चिन्ता से व्याकुल हो उठता है, तब इन्द्रजित उसे धैर्य बँधाता है और प्रतिज्ञा करता है कि वह राम और लक्ष्मण को परास्त करेगा। शंख-भेरी, नगाड़ों, छत्र-चामरों और राजसी सैन्य-वैभव के साथ वह प्रस्थान करता है। रणभूमि में पहुँचकर इन्द्रजित सुरक्षा-व्यवस्था कर अग्निहोत्र करता है, जिसमें युद्धोपयोगी शस्त्रों को ही यज्ञ-सामग्री के रूप में अर्पित किया जाता है। धूमरहित प्रज्वलित अग्नि से विजय के शुभ लक्षण प्रकट होते हैं; अग्निदेव आहुति स्वीकार करते हैं। तब इन्द्रजित ब्रह्मास्त्र का आवाहन कर रथ और धनुष को अभिमंत्रित करता है, जिससे ग्रह-नक्षत्र तक कम्पित हो उठते हैं। माया से छिपकर वह बाणों और शस्त्रों की जाल-वृष्टि करता है, जिससे वानरसेना का भारी विनाश होता है और हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जाम्बवान, नल आदि प्रमुख योद्धा घायल होते हैं। राम ब्रह्मास्त्र की दिव्य उत्पत्ति पहचानकर लक्ष्मण को धैर्यपूर्वक सहने की सलाह देते हैं। राम-लक्ष्मण को आहत और सेना को विषादग्रस्त देखकर इन्द्रजित गर्जना करता हुआ विजय का गर्व लिए लंका लौटता है और रावण को अपनी सफलता का समाचार देता है।

75 verses | Ravana, Indrajit (Meghanada/Ravani), Rama, Lakshmana

Sarga 74

औषधिपर्वताहरणम् / The Retrieval of the Herb-Bearing Mountain

इस सर्ग में इन्द्रजित के ब्रह्मास्त्र-जाल से राम और लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं और वानर-सेना में भारी संहार होता है। नेतृत्व-क्षेत्र में घोर भ्रम फैलता है; तब बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण यह कहकर सबको धैर्य देता है कि सृष्टिकर्ता-प्रदत्त अस्त्र का सम्मान करने पर यह विपत्ति अनिवार्य थी। वह हनुमान के साथ घायल और गिरे हुए वीरों को देखता है और बाणों से बेधा हुआ वृद्ध जाम्बवान मिलता है; जाम्बवान दृष्टिहीन होकर भी वाणी से विभीषण को पहचानता है और कहता है कि सबके प्राण-रक्षण की आशा हनुमान के जीवित रहने और कर्म करने पर ही टिकी है। हनुमान विनयपूर्वक समीप जाकर जाम्बवान का उत्साह बढ़ाता है। तब जाम्बवान स्पष्ट आदेश देता है—समुद्र लाँघकर हिमवत् पर्वत पर जाओ, ऋषभ और कैलास के बीच स्थित औषधि-पर्वत को खोजो और चार औषधियाँ—मृतसंजिवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और सन्धानकरणी—ले आओ। हनुमान के उड़ते ही पृथ्वी और समुद्र काँप उठते हैं, पर्वत दबते और टूटते हैं; हिमालय में औषधियाँ छिप जाती हैं, तब हनुमान पूरा शिखर ही उखाड़कर लौट आता है। औषधियों की सुगंध से ही राम-लक्ष्मण तथा वानर-योद्धा तत्काल चेतन हो उठते हैं, घाव शांत हो जाते हैं और सेना फिर से युद्ध-समर्थ होकर संगठित हो जाती है।

77 verses | Vibhīṣaṇa, Jāmbavān, Hanumān

Sarga 75

लङ्कादाह-प्रचोदनं तथा वानर-राक्षस-समरारम्भः (The Burning of Lanka and the Outbreak of Battle)

इस सर्ग में सुग्रीव हनुमान और वानरवीरों को कार्य-सिद्धि का उपाय बताते हैं—कुम्भकर्ण के वध और कुमारों के नाश से रावण की रक्षा-व्यवस्था अब दुर्बल हो गई है। सूर्यास्त होते ही वानर जलती मशालें लेकर लंका की ओर बढ़ते हैं और गोपुर, प्रतोली तथा प्रासादों में अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं। अगुरु-हरिचन्दन, क्षौम-कौशेय वस्त्र, मोती-मणि-वज्र-प्रवाल, अश्व-गज-रथ के सामान, चर्म-कवच और शस्त्र-समूह—सब आग में जल उठते हैं। भवन वज्र-आहत पर्वत-शिखरों की भाँति ढहते हैं, तोरण बिजली-से चमकते हैं; रात्रि में लंका किंशुक-पुष्पों से ढकी-सी प्रतीत होती है। स्त्रियों का आर्त-क्रन्दन धुएँ के साथ दूर तक सुनाई देता है और छूटे हुए हाथी-घोड़ों से नगर क्षुब्ध सागर-सा हो जाता है। इसी बीच राम-लक्ष्मण शल्य-रहित होकर धनुष धारण करते हैं; राम की प्रत्यंचा का शब्द वानर-राक्षसों के कोलाहल से भी ऊपर गूँजता है और उनके बाणों से लंका-द्वार का गोपुर टूटकर गिर पड़ता है। राक्षस सरदार शस्त्र-सज्जा करते हैं; क्रुद्ध रावण कुम्भकर्ण के पुत्र कुम्भ-निकुम्भ तथा यूपाक्ष, शोणिताक्ष, प्रजङ्घ, कम्पन आदि को भेजता है। दोनों सेनाओं के आभूषणों की दीप्ति से आकाश चन्द्र-ताराओं-सा प्रकाशित होता है और फिर वृक्ष-शैल-मुष्टियों तथा तलवार-शूल-गदा-प्रास-तोमर के साथ घोर वानर-राक्षस युद्ध छिड़ जाता है; दोनों पक्षों की हानि-लाभ का वर्णन ‘दश-सप्त’ के अनुपात से किया गया है।

71 verses

Sarga 76

युद्धे अङ्गद-मैन्द-द्विविद-राक्षसयुद्धम्; कुम्भस्य प्रादुर्भावः तथा सुग्रीवेण पराभवः (Sarga 76: Angada and the Vanara chiefs battle Kampana, Prajaṅgha, Yūpākṣa, Śoṇitākṣa; Kumbha enters and is checked by Sugrīva)

युद्ध काण्ड के इस सर्ग में वानर वीरों और राक्षसों के बीच भीषण संग्राम का वर्णन है। अंगद ने अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए कम्पन नामक राक्षस पर पर्वत शिखर से प्रहार कर उसका वध कर दिया। इसके पश्चात शोणिताक्ष, प्रजंघ और यूपाक्ष ने अंगद को घेर लिया, किन्तु अंगद के मामा मैन्द और द्विविद उनकी सहायता के लिए आ गए। इस त्रिपक्षीय युद्ध में अंगद ने प्रजंघ को, द्विविद ने शोणिताक्ष को और मैन्द ने यूपाक्ष को मार गिराया। इन वीरों की मृत्यु के बाद कुम्भकर्ण का पुत्र कुम्भ युद्धभूमि में आया और उसने अपनी धनुर्विद्या से वानर सेना को त्रस्त कर दिया। उसके बाणों से अंगद आदि भी घायल हो गए। अंत में सुग्रीव ने कुम्भ का सामना किया। सुग्रीव ने पहले उसका धनुष तोड़ा और फिर मल्ल-युद्ध में उसे जकड़ लिया। अंततः सुग्रीव ने एक भीषण मुष्टि-प्रहार से कुम्भ का वध कर दिया, जिससे पृथ्वी कांप उठी और राक्षस सेना में हाहाकार मच गया।

94 verses | Sugriva

Sarga 77

निकुम्भवधः — The Slaying of Nikumbha (Hanuman’s Duel)

युद्धकाण्ड के 77वें सर्ग में सुग्रीव द्वारा अपने भाई के वध को देखकर निकुम्भ क्रोध से उन्मत्त होकर वानर-नेताओं के सामने आ खड़ा होता है। वह महेन्द्र पर्वत-शिखर के समान मङ्गलमय परिघ (लोहे का गदा) धारण कर गर्जना करता हुआ उसे इतनी तीव्रता से घुमाता है कि आकाश के घूमने-सा वर्णन किया गया है। इस भयानक प्रदर्शन से दोनों सेनाएँ क्षणभर भय से स्तब्ध हो जाती हैं—युद्ध में मनोबल का प्रभाव स्पष्ट होता है। उस समय केवल हनुमान अडिग रहते हैं और वक्षस्थल प्रस्तुत करते हैं। निकुम्भ का परिघ उनके वक्ष पर पड़ते ही चूर-चूर हो जाता है, जिससे हनुमान की अतिमानवी स्थिरता और केवल बल-प्रयोग की निष्फलता प्रकट होती है। हनुमान प्रत्युत्तर में प्रचण्ड मुष्टि-प्रहार करते हैं; निकुम्भ द्वारा पकड़े जाकर उठाए जाने पर भी वे बँधे हुए ही पुनः प्रहार कर देते हैं। फिर मुक्त होकर हनुमान निकुम्भ को भूमि पर पटकते हैं, उसके वक्ष पर चढ़कर बलपूर्वक गर्दन मरोड़कर तोड़ देते हैं और द्वन्द्व का अंत कर देते हैं। वानर हर्षित होते हैं, राक्षसों में भय फैलता है; इसके बाद कथा राम और राक्षस-वीर (मकर) के साथ बढ़ते हुए संघर्ष की ओर अग्रसर होती है।

24 verses | Valmiki (narrator)

Sarga 78

मकराक्षस्य निर्गमनम् — The Deployment of Makaraksha and Ravana’s Fury

निकुम्भ और कुम्भ के वध का समाचार सुनकर रावण शोक और क्रोध से दहक उठा। उसने खर-पुत्र, विशाल नेत्रों वाले मकराक्ष को बुलाकर स्पष्ट आज्ञा दी कि वह श्रीराम, लक्ष्मण और वानर-सेना का संहार करे। मकराक्ष ने युद्ध-गर्व के साथ आज्ञा स्वीकार की, रावण को प्रणाम कर प्रदक्षिणा की और रथ तथा सेना की तैयारी कराई। रथ पर आरूढ़ होकर उसने राक्षसों को आगे बढ़कर युद्ध करने का आदेश दिया। तब रूप बदलने वाले, भयानक, गज-समूह के समान भारी राक्षस अपने नायक को घेरकर पृथ्वी को कंपाते हुए चले; भेरी, शंख और कर-ताल की ध्वनियों से रण-कोलाहल छा गया। प्रस्थान के समय अशुभ निमित्त प्रकट हुए—सारथी का चाबुक गिर पड़ा, ध्वज ढह गया, घोड़े निर्बल होकर रोने लगे और धूल से भरी कठोर हवा चली; फिर भी वे संकेतों की उपेक्षा कर राम-लक्ष्मण की ओर बढ़ते रहे।

21 verses

Sarga 79

मकराक्षवधः (The Slaying of Makarākṣa)

इस सर्ग में लंका-युद्ध के बीच मकराक्ष (खर का पुत्र) का प्रादुर्भाव होता है। वानर-नायक उत्साहित होकर युद्ध के लिए जुटते हैं और वृक्षों, शिलाओं तथा शस्त्र-वर्षा से वानर–राक्षसों का घोर संग्राम छिड़ जाता है। मकराक्ष दण्डकारण्य की पुरानी शत्रुता का स्मरण कराते हुए श्रीराम को द्वन्द्व के लिए ललकारता है और यमलोक भेजने की धमकी देता है; श्रीराम वाणी से नहीं, कर्म से विजय सिद्ध करने की बात कहकर खर की सेना-विनाश की घटना स्मरण कराते हैं। फिर दोनों ओर से तीव्र बाण-वर्षा होती है; रण-नाद से दिशाएँ गूँज उठती हैं और आकाशस्थ देवगण भी उस युद्ध को देखते हैं। श्रीराम मकराक्ष का रथ तोड़कर उसे पैदल युद्ध के लिए विवश कर देते हैं। तब वह रुद्र-प्रदत्त ज्वलन्त, भयानक शूल उठाकर फेंकता है, जिसे देखकर देवता भी घबरा उठते हैं; श्रीराम तीन बाणों से उस शूल को आकाश में ही काट देते हैं। तत्पश्चात पावकास्त्र का संधान कर वे मकराक्ष का वध करते हैं; हृदय विदीर्ण होकर वह गिर पड़ता है। अपने नायक के गिरते ही राक्षस श्रीराम के बाणों के भय से लंका की ओर भाग जाते हैं।

41 verses

Sarga 80

इन्द्रजितो यज्ञानुष्ठानं अन्तर्धानं च (Indrajit’s Rite and the Invisible Assault)

मकराक्ष के वध का समाचार पाकर रावण क्रोध से दहक उठा। दाँत पीसते हुए उसने तत्काल प्रतिकार का विचार किया और अपने पुत्र इन्द्रजित (रावणि) को युद्ध में उतरने की आज्ञा दी। इन्द्रजित ने पहले राक्षसों के विधानानुसार अग्निहोम किया—शस्त्रों को यज्ञोपकरण के रूप में रखा गया, लाल वस्त्र धारण किए गए, लोहे के स्रुव आदि प्रयुक्त हुए और काले बकरे को आहुति हेतु पकड़ा गया। धूमरहित, स्वर्ण-दीप्त अग्नि में आहुतियाँ पड़ते ही विजय के शुभ लक्षण प्रकट हुए; देव, दानव और राक्षसों को तृप्त कर वह अलंकृत रथ पर चढ़ा और अन्तर्धान हो गया। अदृश्य होकर उसने आकाश से बाण-वर्षा की और धुएँ-कोहरे का अन्धकार रचकर दिशाओं को मिटा दिया; शब्द, रूप सब छिप गए। राम और लक्ष्मण ने दिव्यास्त्रों से प्रत्युत्तर दिया, परन्तु अदृश्य मायावी शत्रु को छू न सके; वानर सैकड़ों की संख्या में गिरने लगे। लक्ष्मण ने व्यापक रूप से ब्रह्मास्त्र चलाने का प्रस्ताव रखा, किन्तु राम ने धर्म-नियम के आधार पर रोका—एक के लिए बहुतों का संहार नहीं करना चाहिए, न ही छिपे हुए, शरणागत, भागते, युद्ध न करने वाले या असावधान जनों का वध। तब राम ने निश्चय किया कि इन्द्रजित पर लक्ष्य साधकर ही अस्त्र चलाएंगे और उसके शीघ्र वध का उपाय सोचने लगे; वानर सेना भी तत्पर खड़ी रही।

43 verses

Sarga 81

इन्द्रजितो मायासीतावधः — Indrajit’s Illusory Sita Episode and Hanuman’s Rebuke

इस सर्ग में इन्द्रजित् राम के अभिप्राय को समझकर लंका के भीतर जाता है और राक्षसों के वध का स्मरण कर क्रोध से भर उठता है। वह पश्चिमी द्वार से निकलकर युद्ध के लिए तत्पर राम-लक्ष्मण को देखकर माया का प्रयोग करता है—राक्षसों की रक्षा में रथ पर एक मायामयी सीता को बैठाकर वानर-सेना को भ्रमित करने के लिए आगे बढ़ता है। वानर दल उमड़ पड़ता है; हनुमान अग्रणी होकर पर्वत-शिखर को शस्त्र की भाँति उठाए रथ के पास पहुँचता है। एक वेणी, धूल से मलिन अंग, तपस्विनी-सी दिखती स्त्री को देखकर वह उसे मैथिली मानकर व्याकुल हो उठता है। इन्द्रजित् नाटक की तरह उसके केश पकड़कर उसे मारता है और कहता है कि शत्रु को पीड़ा देने हेतु स्त्री-हिंसा भी उचित है। हनुमान इस कृत्य को नीच और अधर्म कहकर धिक्कारते हैं तथा इन्द्रजित् की शीघ्र मृत्यु और अपकीर्ति का पूर्वकथन करते हैं। तब इन्द्रजित् सबके सामने तलवार से उस मायासीता का ‘वध’ कर वानरों के प्रयत्न को व्यर्थ घोषित करता है। क्षणभर वानर शोक से टूटकर भागने लगते हैं, और इन्द्रजित् गर्जना कर हर्ष मनाता है—यह माया रण-आवश्यकता नहीं, बल्कि मनोबल तोड़ने का शस्त्र बनती है।

35 verses | Hanuman, Indrajit (Ravaṇi)

Sarga 82

इन्द्रजित्-हनूमद्-युद्धं तथा निकुम्भिलायां होमः (Indrajit vs Hanuman; Indrajit’s Nikumbhila rite)

युद्धकाण्ड के 82वें सर्ग में मेघनाद (इन्द्रजित) की गर्जना-सी ध्वनि सुनकर वानर-वीर घबरा कर तितर-बितर हो जाते हैं। तब मारुतात्मज हनुमान उन्हें धिक्कारते हुए उनके युद्धोत्साह को जगाते हैं, पंक्ति फिर से बनवाते हैं और अग्रिम मोर्चे पर लौटने का आदेश देते हैं। उत्साहित वानर वृक्षों और पर्वत-शिखरों को उखाड़कर गर्जना करते हुए टूट पड़ते हैं; हनुमान अग्नि के समान शत्रु-सेना को रौंदते हुए अनेक राक्षसों का संहार करते हैं। हनुमान एक विशाल शिला रावणि के रथ पर फेंकते हैं; सारथी रथ को बचा लेता है, शिला इन्द्रजित को नहीं लगती, बल्कि धरती को चीरती हुई जहाँ गिरती है वहाँ की सेना को कुचल देती है। वानरों की ओर से वृक्ष-शिला-वर्षा होती है, तो इन्द्रजित और उसके अनुचर बाणों की वर्षा तथा त्रिशूल, खड्ग, शक्ति, गदा आदि से निकट युद्ध करते हैं। शत्रु-पंक्ति को रोककर हनुमान वानर-सेना को रणनीति से पीछे हटने को कहते हैं—प्रधान धर्म रामकार्य है; ‘सीता मारी गई’ यह गंभीर बात राम को बताकर सुग्रीव सहित निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। हनुमान को राम की ओर जाते देख इन्द्रजित निकुम्भिला में रक्त-होम करने चला जाता है; वहाँ विधि-ज्ञ राक्षसों के साक्षी रहते हुए यज्ञाग्नि सूर्य के समान प्रज्वलित होती है—और सर्ग युद्ध तथा अनुष्ठान-शक्ति के संगम पर समाप्त होता है।

28 verses | Hanumān, Indrajit (Rāvaṇi)

Sarga 83

त्र्यशीतितमः सर्गः (Sarga 83) — Hanumān Reports Sītā’s ‘Slaying’; Rāma Collapses; Lakṣmaṇa’s Counter-Discourse on Dharma and Artha

इस सर्ग में राक्षसों और वानरों के घोर संग्राम-निर्घोष को सुनकर श्रीराम जाम्बवान् ऋक्षराज को आदेश देते हैं कि वह पश्चिम-द्वार पर हनुमान् की सहायता के लिए बल पहुँचाएँ। रण से थके वानरों के साथ हनुमान् आकर एक अत्यन्त दुःखद समाचार सुनाते हैं—रावणपुत्र इन्द्रजित ने उनके सामने रोती हुई सीता को मार गिराया। यह सुनते ही शोक से अभिभूत राम छिन्नमूल वृक्ष की भाँति गिर पड़ते हैं। वानर-वीर उन्हें उठाकर कमल-उत्पल-सुगन्धित जल छिड़कते हैं, मानो न बुझने वाली अग्नि की ज्वाला को शान्त कर रहे हों। तब लक्ष्मण व्याकुल राम को आलिंगन देकर तीक्ष्ण तर्कयुक्त वचन कहते हैं और धर्म-संकट उपस्थित करते हैं—यदि धर्मात्मा, संयमी पुरुष दुःख भोगे और अधर्मी समृद्ध हो, तो धर्म निष्फल-सा प्रतीत होता है। वे प्रश्न उठाते हैं कि क्या धर्म का फल प्रत्यक्ष मिलता है, क्या नियति ही सबका कारण है, और क्या ‘सत्य-वचन’ राजधर्म में सर्वथा संगत है। फिर वे अर्थ-प्रधान यथार्थ की ओर संकेत करते हैं—समृद्धि से ही सम्बन्ध, कर्म और गुण टिकते हैं; अर्थ-त्याग से कार्य रुकते हैं और प्रमाद बढ़ता है। अन्त में लक्ष्मण इन्द्रजितजनित शोक को पराक्रम से मिटाने का निश्चय प्रकट कर राम को उनके महात्म्य का स्मरण कराते हुए कर्तव्य में स्थिर होने को प्रेरित करते हैं।

44 verses | Rāma, Hanumān, Lakṣmaṇa

Sarga 84

निकुम्भिला-यज्ञविघ्नोपदेशः (Counsel to Disrupt the Nikumbhilā Rite)

इस सर्ग में युद्धभूमि पर उत्पन्न मनोवैज्ञानिक संकट और उसे विवेकपूर्ण परामर्श से दूर करने का प्रसंग आता है। विभीषण सेना की व्यवस्था करके लौटते हैं और देखते हैं कि राम लक्ष्मण की गोद में शोकाकुल पड़े हैं; हनुमान के समाचार को इन्द्रजीत द्वारा सीता-वध समझ लेने से राम मोहग्रस्त हो गए हैं। लक्ष्मण कारण बताते हैं, तब विभीषण राम को शांत करते हुए कहते हैं कि यह बात असंगत है—रावण सीता को नहीं मारेगा; यह वानर-सेना को विचलित करने के लिए रचा गया माया-प्रपंच है। फिर विभीषण मुख्य रणनीति बताते हैं—इन्द्रजीत निकुम्भिला में होम करने जा रहा है; यदि वह यज्ञ पूर्ण हो गया तो वह अत्यन्त दुर्जेय हो जाएगा, युद्ध में देवताओं के लिए भी मानो अदृश्य-सा। इसलिए विलम्ब छोड़कर सेना को तुरंत आगे बढ़ाना चाहिए, मिथ्या शोक त्यागना चाहिए और लक्ष्मण को निर्णायक रूप से भेजना चाहिए कि वे यज्ञ को भंग करें और इन्द्रजीत को वध्य बना दें। इस प्रकार विवेक और समय-संवेदी नीति के द्वारा शोक से धर्मयुक्त कर्म की ओर मार्ग प्रशस्त होता है।

23 verses | Lakshmana

Sarga 85

निकुम्भिला-यज्ञविघ्नः — Vibhishana’s Counsel and Lakshmana’s March to Nikumbhila

इस 85वें सर्ग में शोक से व्याकुल श्रीराम क्षणभर विभीषण की बात ठीक से नहीं समझ पाते; फिर मन को सँभालकर उनसे स्पष्ट रूप से पुनः कहने का अनुरोध करते हैं। विभीषण बताते हैं कि वानर-सेना का उचित विभाजन कर सबको उनके स्थानों पर तैनात कर दिया गया है। वे श्रीराम से कहते हैं कि दुर्बल करने वाली चिंता छोड़ें, क्योंकि उससे शत्रुओं का उत्साह बढ़ता है; अब सीता-प्राप्ति और राक्षस-विनाश के लिए पुनः दृढ़ प्रयत्न करना चाहिए। इसके बाद विभीषण अत्यन्त तात्कालिक गुप्त सूचना देते हैं—रावणि इन्द्रजीत निकुम्भिला में यज्ञ करने गया है। यदि वह यज्ञ पूर्ण हो गया तो वर-प्रभाव से राम-पक्ष पर भारी अनिष्ट आ पड़ेगा; यज्ञ का विघ्न न होने पर श्रीराम तक का वध संभव हो सकता है। इसलिए आदेश-निर्णय यह बनता है कि लक्ष्मण को तुरंत भेजा जाए—हनुमान के नेतृत्व में समस्त वानर-सेना उनके साथ रहे, जाम्बवान उनकी रक्षा करें, और मायाविद्या के ज्ञाता विभीषण भी सहायता हेतु पीछे-पीछे चलें। श्रीराम इन्द्रजीत की ब्रह्मास्त्र-शक्ति और माया-कौशल को स्मरण कर इस अभियान की आज्ञा देते हैं। लक्ष्मण शस्त्र धारण कर श्रीराम को प्रणाम करते हैं, तत्काल कार्य करने की प्रतिज्ञा करते हैं और वेग से निकुम्भिला की ओर बढ़ते हैं; वे भयंकर राक्षस-व्यूह में ऐसे प्रवेश करते हैं मानो अंधकार का आवरण हो।

36 verses | Rama, Lakshmana

Sarga 86

इन्द्रजितः कर्माननुष्ठानात् उत्थाय हनूमन्तं प्रति प्रस्थानम् / Indrajit Abandons the Unfinished Rite and Moves Against Hanuman

तब विभीषण ने लक्ष्मण को कार्य-साधक उपदेश दिया—मेघ-श्याम राक्षस-सेना को शीघ्र तोड़ दो, जिससे रावण-पुत्र इन्द्रजित् प्रकट हो जाए और उसका अनुष्ठान पूर्ण होने से पहले ही उसे मारा जा सके। इसके बाद घोर संग्राम छिड़ गया; आकाश मानो बाणों, वृक्षों और पर्वत-शिखरों से ढक गया। वानर और भालू अपने स्वाभाविक शस्त्रों से प्रचण्ड आक्रमण करने लगे। अपनी सेना की पीड़ा-ध्वनि सुनकर, दुर्जेय इन्द्रजित् अधूरा कर्म छोड़कर उठा। वह वन के अन्धकार से निकलकर सज्जित रथ पर चढ़ा और मेघ-प्रभा, रक्त नेत्रों तथा मृत्यु-सदृश रूप में प्रकट हुआ। राक्षसों द्वारा लक्ष्मण को घिरा देखकर हनुमान ने विशाल वृक्ष उठाकर प्रलयाग्नि की भाँति शत्रु-पंक्तियों को चीर डाला। हजारों राक्षस त्रिशूल, खड्ग, शक्ति, लोहे के दण्ड, परशु, घन, भिन्दिपाल आदि समस्त अस्त्र-शस्त्रों से हनुमान पर टूट पड़े। तब इन्द्रजित् ने सारथि को वानर-वीर की ओर बढ़ने का आदेश दिया और रथ से शर-वृष्टि होने लगी। हनुमान ने प्रहार सहकर प्रत्यक्ष चुनौती दी। विभीषण ने लक्ष्मण को सावधान किया कि इन्द्रजित् हनुमान पर चढ़ आया है—तुरन्त घात करो; लक्ष्मण ने रथस्थ इन्द्रजित् को पहचानकर प्रत्युत्तर में बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी।

35 verses

Sarga 87

न्यग्रोध-प्रवेश-निवारणम् (Preventing Indrajit’s Banyan-Tree Rite) / Indrajit Confronts Vibhishana

विभीषण लक्ष्मण को सम्यक् उपदेश देकर उसे वन-प्रदेश में ले जाते हैं और मेघ-श्याम, भयावह न्यग्रोध (बरगद) दिखाते हैं। वे बताते हैं कि इन्द्रजीत वहाँ हवन-आहुति देकर मंत्रबल से अदृश्य हो जाता है और युद्ध में घातक बढ़त पा लेता है; इसलिए लक्ष्मण को चाहिए कि इन्द्रजीत के न्यग्रोध में प्रवेश करने से पहले ही अग्नि-सदृश बाणों से उसके रथ, घोड़े और सारथी का विनाश कर दे। लक्ष्मण धनुष चढ़ाकर, प्रत्यंचा टंकारते हुए, उसी घड़ी की प्रतीक्षा करता है। तभी तेजस्वी रथ पर इन्द्रजीत प्रकट होकर प्रत्यक्ष युद्ध की चुनौती देता है। इसके बाद कटु वाद-विवाद होता है—इन्द्रजीत विभीषण को स्वजनों का त्याग कर ‘परायों’ की शरण लेने वाला कहकर धिक्कारता है और कहता है कि दोष होने पर भी अपने पक्ष का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। विभीषण धर्म के आधार पर उत्तर देते हैं कि राक्षस-कुल में जन्म लेकर भी उन्होंने क्रूर कर्म त्यागे; अधर्म का संग विषधर सर्प को झटक देने या जलते घर से निकल भागने के समान है। वे रावण के दोष—चोरी, पर-स्त्रीहरण, मित्रों पर अविश्वास, ऋषि-वध, देव-द्वेष, अहंकार, क्रोध और वैर—गिनाकर कहते हैं कि इन्हीं ने उसके कल्याण को मेघों की भाँति ढक दिया है और लंका का विनाश निकट है। अंत में वे चेतावनी देते हैं कि इन्द्रजीत मृत्यु-पाश से बँधा है; लक्ष्मण के बाणों का सामना करके वह जीवित लौट नहीं सकेगा।

30 verses | Vibhishana, Lakshmana, Indrajit (Meghanada)

Sarga 88

इन्द्रजित्–लक्ष्मण संवादः तथा युद्धप्रवृत्तिः (Indrajit and Lakshmana: War-Boasts, Rebuke, and the Clash)

सर्ग ८८ में वाक्युद्ध शीघ्र ही धनुर्विद्या के संघर्ष में बदल जाता है। विभीषण की बातें सुनकर क्रोधित इन्द्रजित, काले घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर युद्धभूमि में आता है। वह लक्ष्मण को पिछली रात्रि के युद्ध की याद दिलाते हुए यमलोक भेजने की धमकी देता है और कहता है कि गिद्ध और सियार उनके शव को नोचेंगे। वह भय उत्पन्न करने के लिए कठोर वचनों का प्रयोग करता है। लक्ष्मण, निडर और क्रोधित होकर, क्षात्र-धर्म के अनुसार उत्तर देते हैं कि विजय केवल बातों से नहीं, बल्कि कर्म से सिद्ध होती है। वे कहते हैं कि अदृश्य होकर लड़ना चोरों का काम है, वीरों का नहीं। इसके पश्चात दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ जाता है। इन्द्रजित विषैले सर्पों के समान बाण छोड़ता है, फिर भी लक्ष्मण 'धूमरहित अग्नि' के समान चमकते हैं। लक्ष्मण ने इन्द्रजित की छाती में पांच बाण मारे और इन्द्रजित ने तीन बाणों से पलटवार किया। यह सर्ग दो महायोद्धाओं के बीच समान तेज और शक्ति के अद्भुत प्रदर्शन के साथ समाप्त होता है।

36 verses

Sarga 89

इन्द्रजित्–लक्ष्मणयोर् घोरः शरयुद्धः (Indrajit and Lakshmana’s Fierce Exchange of Arrows)

इस 89वें सर्ग में लक्ष्मण और इन्द्रजित का द्वंद्व वाक्-युद्ध और शर-युद्ध के क्रमिक उतार-चढ़ाव के साथ और भी घोर हो उठता है। लक्ष्मण क्रोध को संयमित कर अचूकता से बाण चलाते हैं; धनुष की टंकार से राक्षस-नायक के मन में कंपकंपी फैलती है। विभीषण इन्द्रजित के चेहरे की पीलापन को मनोबल में आई दरार का संकेत मानते हैं। इन्द्रजित पूर्व युद्ध में लक्ष्मण के मूर्च्छित होने की बात छेड़कर उन्हें उकसाता है, स्मृति को चुनौती देता है और ‘यमलोक’ की ओर बढ़ने का दुस्साहसिक निमंत्रण देता है। फिर दोनों ओर से बाणों की वर्षा होने लगती है—लक्ष्मण की बाण-वृष्टि के प्रत्युत्तर में इन्द्रजित लक्ष्मण, हनुमान और विभीषण को भी बेध देता है; कवच, ढाल और ध्वज-चिह्न टूट-फूट जाते हैं। वर्णन में धैर्य का विशेष बल है—न कोई पीछे हटता है, न थकान दिखती है। आकाश बाणों के जाल से भर जाता है, मानो प्रलयकाल के मेघ छा गए हों। रक्तधाराएँ जलप्रपात-सी बहती हैं और घायल देह पुष्पित वृक्षों-सी चमकती हैं—यह युद्ध-शास्त्र का पाठ है: संयम, लक्ष्य-भेदन और मनोवैज्ञानिक बढ़त न छोड़ना। सर्ग के अंत में विभीषण अजेय-से लक्ष्मण के सहायक बनकर आगे आते हैं, मित्रधर्म और रण-सेवा का संकेत देते हुए।

42 verses | Indrajit (Rāvaṇi), Lakshmana, Vibhishana

Sarga 90

इन्द्रजित्-लक्ष्मणयुद्धम् तथा वानरप्रोत्साहनम् (Indrajit–Lakshmana Battle and the Rallying of the Vanaras)

युद्धकाण्ड के इस 90वें सर्ग में लंका-युद्ध का निर्णायक चरण दो धाराओं में प्रकट होता है—(1) विभीषण द्वारा वानर-नायकों का रणनीतिक उत्साहवर्धन और (2) लक्ष्मण तथा इन्द्रजित (रावणि) का तीव्र द्वन्द्व। लक्ष्मण और इन्द्रजित दोनों विजय के लिए उद्यत हैं, मानो दो मदमत्त गज भिड़ रहे हों; विभीषण अग्रिम मोर्चे पर रहकर युद्ध का साक्षी और मार्गदर्शक बनता है। विभीषण पहले मारे जा चुके प्रमुख राक्षस सेनापतियों का उल्लेख कर शेष युद्ध को एक संकुचित लक्ष्य में बदल देता है—राक्षस-प्रतिरोध का मुख्य स्तम्भ अब इन्द्रजित ही है (रावण अन्तिम शेष)। वह राम-कार्य के लिए अपने भाई के पुत्र पर प्रहार करने के धर्म-संकट और युद्ध में कुल-घात की पीड़ा भी व्यक्त करता है। वानर-श्रेष्ठ इस वाणी से और अधिक उत्साहित होकर रणोन्माद में भर उठते हैं। इसके बाद युद्ध-चित्र और उग्र हो जाता है—जाम्बवान् वानर-सेना सहित शस्त्रधारी राक्षसों से भिड़ता है; हनुमान लक्ष्मण को रथ से उतारकर उखाड़े हुए साल-वृक्ष से राक्षस-पंक्तियों का संहार करता है। लक्ष्मण–इन्द्रजित का शर-वर्ष इतना तीव्र हो जाता है कि धनुष-हाथ की गति भी अदृश्य-सी लगती है; आकाश बाण-जाल से ढक जाता है, अन्धकार और अपशकुन बढ़ते हैं, और रण-ध्वनि देवासुर-संग्राम जैसी प्रतीत होती है। फिर निर्णायक मोड़ आते हैं—सौमित्रि इन्द्रजित के चारों घोड़ों को बेध देता है; भल्ल से सारथी का शिरच्छेद होता है; इन्द्रजित क्षणभर स्वयं सारथी का कार्य करता है। वानर-नायक कूदकर घोड़ों का वध कर देते हैं, जिससे इन्द्रजित को पैदल युद्ध करना पड़ता है। लक्ष्मण सघन बाण-वर्षा से उसे रोकता है; इन्द्रजित के विषाद को देखकर वानरों का मनोबल बढ़ता है। सर्ग का अंत इन्द्रजित के पैदल आगे बढ़ने और लक्ष्मण के उसके पुनः उठे शर-वर्ष को अवरुद्ध करने के साथ होता है, जिससे उसके पतन की दिशा में गति दृढ़ होती है।

54 verses | Vibhīṣaṇa

Sarga 91

इन्द्रजित्-वधः (The Slaying of Indrajit)

युद्धकाण्ड के 91वें सर्ग में सौमित्रि लक्ष्मण और रावणि इन्द्रजित का निर्णायक द्वन्द्व होता है। इन्द्रजित स्वर्णाभूषित रथ सजाकर फिर रण में आता है और लक्ष्मण तथा विभीषण पर तीव्र बाण-वर्षा करता है; वह वानर-नायकों को भी अपनी लाघव-युक्त शरवृष्टि से पीड़ित करता है। लक्ष्मण उसके धनुषों को काट देते हैं, उसे बार-बार घायल करते हैं और सारथी को मारकर रथ की व्यवस्था बिगाड़ देते हैं, जिससे घोड़े बिना नियंत्रण के घूमने लगते हैं। विभीषण भी सामने से युद्ध करते हैं। क्रोध और भाग्य से प्रेरित इन्द्रजित पहले अग्नि-अस्त्र, फिर असुर-अस्त्र छोड़ता है जो शस्त्र-वृष्टि के रूप में प्रकट होता है। लक्ष्मण सौर्य और माहेश्वर उपायों से उन अस्त्रों को निष्फल कर देते हैं; देवगण साक्षी बनकर उनकी रक्षा करते हैं। अन्त में लक्ष्मण अजेय ऐन्द्र अस्त्र को धारण कर सत्य-प्रतिज्ञा से उसका संस्कार करते हैं और छोड़ देते हैं; उससे इन्द्रजित का सिर कट जाता है और लोकों का भय समाप्त हो जाता है। आकाश में जयध्वनि होती है, पुष्प-वर्षा होती है और राक्षस-सेना तितर-बितर होकर भाग जाती है।

97 verses

Sarga 92

युद्धकाण्डे द्विनवतितमः सर्गः — Indrajit’s Fall, Rama’s Embrace, and Sushena’s Battlefield Healing

इस सर्ग में इन्द्रजीत-वध के तुरंत बाद की घटनाएँ वर्णित हैं। रक्त से सने और बाणों से घायल लक्ष्मण श्रीराम को इन्द्रजीत के भयंकर वध का समाचार देते हैं; विभीषण भी राक्षसकुमार का सिर कट जाने की पुष्टि करते हैं। तब श्रीराम लक्ष्मण की कीर्ति बढ़ाते हुए उन्हें स्नेहपूर्वक अपनी गोद में बैठाते हैं, बार-बार उनके बाण-पीड़ित शरीर को देखते हैं और सांत्वना देते हैं। श्रीराम इसे रावण की युद्ध-शक्ति के निर्णायक क्षय के रूप में मानते हैं और कहते हैं कि शोकाकुल रावण अब बड़े दल के साथ बाहर आएगा; वे उसे समाप्त करने के लिए तत्परता प्रकट करते हैं। इसके बाद रणभूमि की चिकित्सा और सेना-कल्याण का प्रसंग आता है—श्रीराम सुषेण को बुलाकर लक्ष्मण, विभीषण तथा घायल भालू और वानर वीरों के बाण निकालने और उपचार करने की आज्ञा देते हैं। सुषेण नासिका से सूँघाई जाने वाली परम औषधि देता है; उसी क्षण लक्ष्मण विशल्य, वेदना-रहित और पूर्णतः स्वस्थ हो जाते हैं। सभी मित्र-नायक आनंदित होते हैं, और इस लगभग असंभव कार्य की प्रशंसा से सेना का उत्साह अत्यंत बढ़ जाता है।

28 verses | Lakshmana, Vibhishana, Rama

Sarga 93

Sarga 93: Rāvaṇa’s Grief and Fury after Indrajit’s Fall; Move to Slay Vaidehī and Ministerial Restraint

इस सर्ग में पौलस्त्य रावण के मंत्री लक्ष्मण द्वारा—विभीषण की सहायता से—मेघनाद/इन्द्रजित के वध का दुःखद समाचार देते हैं। यह सुनकर रावण पहले मूर्छित होता है, फिर पुत्र-शोक में विलाप करता है और अंततः उसका क्रोध प्रलय-तुल्य हो उठता है। उसके भौंहों को प्रलय-सागर-सा, मुख से धुआँ-आग निकलने-सा और आँसुओं को जलते दीपक से टपकते तेल-सा बताकर उसके मनोविकार का चित्र खींचा गया है। वह ब्रह्मा के वरदान से प्राप्त अटूट कवच और भयंकर धनुष का स्मरण कर अपने वर-बल और दिव्यास्त्रों की सुरक्षा का गर्व प्रकट करता है, राक्षसों का युद्ध-उत्साह फिर जगाता है और राम-लक्ष्मण पर पुनः आक्रमण की घोषणा करता है। पर शोक प्रतिशोध को भटका देता है—वह वैदेही सीता का वध करने का निश्चय कर खड्ग लेकर अशोक-वाटिका की ओर दौड़ पड़ता है; राक्षस उसे अजेय मानकर हर्षित होते हैं। इसके बाद दृष्टि सीता पर आती है—वह भयभीत होकर हनुमान द्वारा पहले दिए गए उद्धार-प्रस्ताव को न मानने पर स्वयं को धिक्कारती है और राम तथा कौसल्या की चिंता करती है। तभी धर्मनिष्ठ मंत्री सुपार्श्व रावण को रोकता है—स्त्री-वध अधर्म है; क्रोध का उपयोग रण में होना चाहिए, सीता पर नहीं। रावण यह उपदेश मानकर लौट आता है और सभा की ओर फिर बढ़ता है—निजी प्रतिशोध से हटकर युद्ध-धर्म की ओर क्षणिक पुनर्संयोजन होता है।

68 verses | Rāvaṇa, Sītā (Vaidehī/Maithilī), Suparśva (amātya)

Sarga 94

रावणस्य सभाप्रवेशः — रामस्य शरवृष्ट्या राक्षससेनाविनाशः (Ravana Enters Council; Rama’s Arrow-Storm Destroys the Rakshasa Host)

सर्ग 94 में रावण शोक और क्रोध से व्याकुल होकर सभा में प्रवेश करता है और सेनानायकों से हाथ जोड़कर कहता है कि आक्रमण को एक ही लक्ष्य—राम—पर केंद्रित किया जाए। वह हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना की संयुक्त तैनाती का आदेश देता है। सूर्योदय होते ही भयंकर युद्ध छिड़ जाता है। बाण, गदा, तलवार, परशु, वृक्ष और शिलाएँ एक-दूसरे पर चलती हैं; रणभूमि धूल और रक्त से भर जाती है—मानो रक्त की नदियाँ बह रही हों, शव तैरते काष्ठ हों और युद्ध-यंत्र तट व वृक्ष बन गए हों। वानर घायल होकर राम की शरण लेते हैं। तब राम राक्षस-सेना में प्रवेश कर बाणों की प्रचंड वर्षा करते हैं और गान्धर्व-सम्बद्ध परमास्त्र का प्रयोग करते हैं। उनके वेग से राक्षसों को भ्रम होता है—उन्हें अनेक राम दिखाई देते हैं, वे राम को ठीक से देख नहीं पाते और मोह में क्रुद्ध होकर एक-दूसरे पर ही प्रहार करने लगते हैं। अल्प समय में राक्षस-सेना का भारी विनाश हो जाता है और बचे हुए लंका की ओर भागते हैं। देवगण राम की स्तुति करते हैं; राम सुग्रीव, विभीषण, हनुमान, जाम्बवान, मैन्द और द्विविद से कहते हैं कि ऐसी दिव्य अस्त्र-शक्ति केवल उनके और त्र्यम्बक (शिव) के ही अधिकार में है।

39 verses | Ravana, Rama

Sarga 95

युद्धकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः (Sarga 95: Lamentation in Laṅkā and the Causal Chain of Enmity)

इस सर्ग में युद्ध की भीषण क्षति का लेखा-जोखा और उसके कारणों का आत्ममंथन है। रावण द्वारा भेजी गई अग्निवर्ण अश्वों वाली सेनाएँ, ध्वजों से सजे स्वर्णाभूषित रथ, लोहे के दण्डधारी योद्धा और मायावी राक्षस—सब राम के तीक्ष्ण, दीप्त, स्वर्णालंकृत बाणों से धराशायी हो जाते हैं; राम की अक्लिष्ट-कर्मता (अथक पराक्रम) विशेष रूप से उभरती है। इसके बाद राक्षसी स्त्रियाँ और बचे हुए जन एकत्र होकर पति, पुत्र और बंधुओं के लिए विलाप करते हैं और पूछते हैं कि यह वैर-परंपरा कहाँ से आरम्भ हुई—शूर्पणखा की राम के प्रति दुर्भावित कामना, उसका निंदित आक्रमण, उससे खर-दूषण का विनाश और अंततः सीता-हरण। राम के पराक्रम के “पर्याप्त प्रमाण” के रूप में विराध-वध, जनस्थान-युद्ध, खर-दूषण-त्रिशिरा-कबंध-वाली का वध और सुग्रीव का पुनर्स्थापन स्मरण किया जाता है; विभीषण की धर्मयुक्त सलाह को रावण द्वारा ठुकराया जाना भी कहा जाता है। सामूहिक भय तीव्र हो उठता है—लंका श्मशान-सी प्रतीत होती है, अपशकुन उठते हैं, और राम की तुलना रुद्र, विष्णु, इन्द्र अथवा अंतक (मृत्यु) से की जाती है। ब्रह्मा से मिले वरदान का स्मरण कर बताया जाता है कि देव-दानव-राक्षसों से रावण सुरक्षित था, पर मनुष्यों से नहीं; इसलिए मनुष्यावतार राम ही उसके पतन का साधन बने। अंत में स्त्रियाँ एक-दूसरे से लिपटकर करुण क्रंदन करती हैं—यह युद्ध केवल सैन्य पराजय नहीं, धर्म के सामने कर्मफल का न्याय भी है।

41 verses

Sarga 96

युद्धाय रावणस्य निर्याणं तथा उत्पातदर्शनम् (Ravana’s Mobilization for War and the ظهور of Fatal Portents)

लंका में चारों ओर विलाप सुनकर रावण ने नगर की व्याकुलता और युद्ध का गृहस्थ-जीवन पर पड़ा भारी प्रभाव जाना और क्षणभर ठिठक गया। फिर वह क्रोध से भयानक रूप धारण कर महोदर, महापार्श्व और विरूपाक्ष को शीघ्र आज्ञा देता है कि शेष निशाचरों को युद्ध के लिए जुटा दें। अहंकारपूर्ण प्रतिज्ञाओं में वह कहता है कि राघव और लक्ष्मण को यमलोक भेज दूँगा, खर, कुम्भकर्ण, प्रहस्त और इन्द्रजित के वध का प्रतिशोध लूँगा, और मेघ-सम बाणवर्षा से वानर-दलों का संहार कर दूँगा। राक्षस विविध शस्त्र धारण कर रथों पर चढ़ते हैं और गर्जना करते हुए निकल पड़ते हैं। रावण धनुष उठाए तेजस्वी होकर आगे बढ़ता है, तभी घोर अपशकुन प्रकट होते हैं—सूर्य म्लान पड़ता है, दिशाएँ अँधियारी हो जाती हैं, उल्काएँ गिरती हैं, रक्तवृष्टि होती है, पशु-पक्षी अशुभ शब्द करते हैं, और उसके बाएँ नेत्र व भुजा में फड़कन होती है। फिर भी वह नहीं रुकता; घमासान युद्ध छिड़ जाता है और उसके स्वर्ण-पंखों वाले बाण वानर-पंक्तियों में भयंकर घाव कर देते हैं।

44 verses

Sarga 97

सप्तनवतितमः सर्गः (Yuddha Kāṇḍa 97): Sugrīva’s Onslaught and the Fall of Virūpākṣa

इस सर्ग में रावण के प्रचण्ड बाण-वर्षा से रणभूमि में भारी क्षय का चित्रण है। वानर तेजस्वी बाणों को सह न सके, तितर-बितर हो गए और भूमि कटे-फटे शवों से भर गई। बहुतों को रौंदकर रावण फिर रणनीति बदलते हुए राघव (श्रीराम) की ओर बढ़ चला। यह देखकर सेनापति सुग्रीव ने बिखरी वानर-सेना को संभालने हेतु सुसेण को व्यूह-रक्षा में नियुक्त किया और स्वयं वृक्ष को हथियार बनाकर आगे बढ़े; अन्य यूथपति भी शिलाएँ और वृक्ष लेकर साथ चले। सुग्रीव ने मेघों की ओलावृष्टि-सी शिलावृष्टि कर राक्षस-पंक्तियों को तहस-नहस कर दिया, जिससे वे डगमगा उठे। तभी विरूपाक्ष नामक राक्षस-वीर अपना नाम घोषित कर मदोन्मत्त हाथी पर चढ़ा और बाणों से सुग्रीव तथा वानर-अग्रिम पंक्ति पर प्रहार कर सेना का उत्साह बढ़ाने लगा। दोनों में वृक्ष-प्रहार, शिला-प्रक्षेप, खड्ग-छेदन, घूँसे और हथेली के आघातों से घोर द्वंद्व हुआ। अंत में सुग्रीव की वज्र-तुल्य हथेली की चोट से विरूपाक्ष गिर पड़ा; रक्त झरने-सा बह निकला। वानर हर्षित हुए और राक्षस-सेना स्तब्ध व अव्यवस्थित हो गई।

36 verses

Sarga 98

महोदरवधः (The Slaying of Mahodara)

युद्धकाण्ड के अट्ठानवे सर्ग में महोदर-वध का वर्णन है। अपनी सेना के क्षय और विरूपाक्ष के मारे जाने से क्रुद्ध रावण महोदर को ‘विजय की आशा’ मानकर उसे राज-आश्रय का ऋण चुकाने हेतु अद्भुत पराक्रम दिखाने की आज्ञा देता है। महोदर पतंगे की भाँति अग्नि में कूदकर वानर-सेना में घुसता है, भारी संहार करता है और दलों को तितर-बितर कर देता है। वानरों के भग्न होने पर सुग्रीव उन्हें धैर्य बँधाकर स्वयं महोदर से द्वन्द्व करने आते हैं। युद्ध में शिलाओं का प्रहार, शाल-वृक्ष को गदा की तरह चलाना, परिघ (लोहे की छड़) का प्रयोग, गदा-युद्ध और अंततः खड्ग-ढाल का घोर संग्राम होता है। उपमाएँ बताती हैं कि सेना ग्रीष्म में सूखे सरोवर-सी क्षीण हो चली है और दोनों योद्धा बिजली सहित मेघों-से गरजते हैं। अंत में महोदर जब शरीर में अटके खड्ग को निकालने में लगा होता है, तभी सुग्रीव उसका सिर काट देते हैं। इससे राक्षसों में आतंक फैलकर वे भाग खड़े होते हैं, वानर हर्षित होकर जयघोष करते हैं और रावण का क्रोध और भी बढ़ जाता है—यह प्रसंग युद्ध में निर्णायक मोड़ और संकट में नेतृत्व-धर्म का नैतिक उदाहरण बनता है।

38 verses

Sarga 99

Mahāpārśva-vadhaḥ — The Slaying of Mahāpārśva (Angada’s Counterstrike)

सुग्रीव के हाथों महोदर के मारे जाने पर महापार्श्व का क्रोध भड़क उठा। उसने बाणों की घोर वर्षा करके अङ्गद की वानर-सेना को क्षत-विक्षत कर दिया—कहीं अंग-भंग, कहीं घाव; अग्रिम पंक्ति क्षण भर को शिथिल और विषण्ण हो गई। यह देखकर अङ्गद आगे बढ़ा और लोहे का परिघ फेंककर महापार्श्व को रथ से गिरा दिया; उसी समय जाम्बवान ने विशाल शिला फेंककर राक्षसों की रथ-पंक्ति पर प्रहार किया, घोड़ों को मारकर रथ को तोड़ डाला। होश में आकर महापार्श्व फिर युद्ध में कूद पड़ा। उसने अङ्गद को बाणों से बेधा और जाम्बवान तथा गवाक्ष को भी घायल किया। तब अङ्गद ने भयानक परिघ उठाकर घुमाया और महापार्श्व पर प्रहार किया, फिर निकट जाकर हथेली से भी आघात किया। महापार्श्व ने प्रत्युत्तर में परशु फेंका, जिसे अङ्गद ने बचा लिया। अन्त में अङ्गद ने वक्ष-हृदय-प्रदेश में लक्ष्य करके निर्णायक मुष्टि-प्रहार किया; महापार्श्व का हृदय विदीर्ण हो गया और वह राक्षस मृत होकर गिर पड़ा। वानर जयघोष करने लगे, लंका के भवन काँप उठे; उस कोलाहल को सुनकर रावण ने फिर युद्ध की ओर मन लगाया—रणनीति और मनोबल, दोनों में तीव्र उछाल आया।

26 verses

Sarga 100

रावण–रामयुद्धप्रारम्भः (The Intensification of the Rama–Ravana Duel)

महोधर, महापार्श्व और महाबली विरूपाक्ष के वध के बाद रावण अत्यन्त क्रोध से भर उठता है और सारथि को वेग से आगे बढ़ने का आदेश देता है। उसके रथ के बढ़ते ही मानो दिशाएँ काँप उठती हैं। तब वह ब्रह्मा-प्रदत्त तमसास्त्र का संधान करता है; अन्धकार छा जाता है, वानर-सेना जलती-सी व्याकुल होकर भागने लगती है और धरती पर धूल का घोर गुबार उठता है। भागते वानरों और रावण के निकट आते रूप को देखकर श्रीराम लक्ष्मण सहित दृढ़ होकर खड़े होते हैं—दोनों विष्णु और इन्द्र के समान तेजस्वी प्रतीत होते हैं, और राम का धनुष मानो आकाश को छूने लगता है। फिर दोनों ओर से शर-वर्षा का दीर्घ संग्राम चलता है—आकाश में ही बाणों का छेदन, हाथों की अद्भुत फुर्ती, रथों का परिक्रामी संचालन; दृश्य ऐसा कि राहु सूर्य-चन्द्र के समीप आ गया हो और नभ बिजली-रेखाओं वाले मेघों से ढक गया हो। रावण नाराचों की वर्षा से राम के ललाट को लक्ष्य करता है; राम बिना विकल हुए सह लेते हैं और रौद्रास्त्र का प्रयोग करते हैं, पर रावण का कवच उस वेग को रोक लेता है। तब रावण राक्षसाधिष्ठित मायावी शस्त्र-जाल छोड़ता है—पशु-मुख और पंचशीर्ष सर्पाकार बाण; श्रीराम अग्न्यधिष्ठित सूर्य, चन्द्र, केतु, ग्रह और विद्युत्-सदृश अस्त्रों से उन्हें काटकर सहस्र टुकड़ों में बिखेर देते हैं। शत्रु-अस्त्रों के निवारण से वानर-नायक हर्षित होते हैं और सुग्रीव दाशरथि के अटूट पराक्रम की जय-जयकार करता है।

51 verses | Rāvaṇa, Sugrīva

Sarga 101

शक्तिप्रहारः (Ravana’s Shakti Javelin and Lakshmana’s Wounding)

सर्ग १०१ में राम और रावण के बीच का द्वंद्व भीषण रूप ले लेता है। राम रावण के भयानक अस्त्रों को विफल कर देते हैं। इसके पश्चात, लक्ष्मण रावण के रथ के ध्वज को काट देते हैं और सारथी का वध कर देते हैं, जबकि विभीषण रावण के घोड़ों को गदा से मार गिराते हैं। प्रतिशोध में, रावण विभीषण पर एक ज्वलंत शक्ति चलाता है, जिसे लक्ष्मण बीच में ही काट देते हैं। तब रावण मयदानव द्वारा निर्मित, आठ घंटियों वाली अमोघ शक्ति लक्ष्मण पर छोड़ता है, जो उनकी छाती को भेद देती है और वे मूर्छित हो जाते हैं। राम शोक को क्रोध में बदलकर लक्ष्मण के शरीर से वह शक्ति निकालकर तोड़ देते हैं। वे हनुमान और सुग्रीव को लक्ष्मण की रक्षा का भार सौंपते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं कि आज संसार या तो रावण से विहीन होगा या राम से।

63 verses | Ravana, Rama

Sarga 102

लक्ष्मण-प्राणरक्षा: (Lakshmana’s Revival by the Herb-Mountain)

इस सर्ग में रणभूमि की एक गंभीर वैद्यकीय आपदा और उससे उपजा धर्म-विचार वर्णित है। रावण की शक्ति (भाला) से लक्ष्मण घायल होकर रक्तरंजित गिर पड़ते हैं। उन्हें देखकर श्रीराम का धैर्य टूट जाता है; वे विजय, जीवन और युद्ध के प्रयोजन पर ही प्रश्न करने लगते हैं—भाई के बिना सब कुछ उन्हें निरर्थक प्रतीत होता है। तब वैद्य सुषेण श्रीराम को तर्कपूर्ण निदान से ढाढ़स बँधाते हैं—लक्ष्मण के मुख पर तेज बना है, हृदय और अंगों में जीवन-लक्षण हैं—अतः शोक त्यागने को कहते हैं। वे हनुमान को औषधि-पर्वत से चार महौषधियाँ लाने का आदेश देते हैं—सवर्णकरणी, सावर्‍ण्यकरणी, संजीवकरणी और संधानिनी। हनुमान उन्हें पहचान न पाने पर दक्षिण शिखर सहित पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं और वेग से रणभूमि में रख देते हैं। सुषेण औषधियाँ निकालकर पीसते हैं और नासिका द्वारा लक्ष्मण को देते हैं; लक्ष्मण शक्ति से मुक्त होकर पीड़ा-रहित उठ बैठते हैं। वानर-वीर हर्षित होते हैं, श्रीराम आँसुओं सहित लक्ष्मण को आलिंगन करते हैं। लक्ष्मण श्रीराम को स्मरण कराते हैं कि प्रतिज्ञा का पालन कर रावण-वध पूर्ण करें—व्यक्तिगत शोक को धर्म, वचन-पालन और लोक-न्याय के अधीन रखकर।

49 verses | Rama (Raghava), Sushena, Hanuman, Lakshmana (Saumitrि)

Sarga 103

ऐन्द्ररथप्रदानम् — Indra’s Chariot Offered to Rāma; The Duel Intensifies

इस सर्ग में युद्ध की असमानता पर प्रश्न उठता है—श्रीराम भूमि पर हैं और रावण रथ पर; इसलिए देवता और दिव्य जन कहते हैं कि यह समर समान नहीं। उनके अमृत-तुल्य वचनों को सुनकर इन्द्र, अपने सारथि मातलि को आज्ञा देते हैं कि दिव्य रथ रणभूमि में ले जाकर श्रीराम को उस पर आरूढ़ कराएँ। मातलि स्वर्ण-विभूषित, हरित अश्वों से युक्त दिव्य रथ लेकर आता है और इन्द्र के युद्धोपकरण प्रस्तुत करता है—महाधनुष, अग्नि-दीप्त कवच, सूर्य-सदृश बाण तथा शुभ, निर्मल शक्ति। वह श्रीराम को प्रणाम कर विजय हेतु इन्द्र का उपहार निवेदित करता है और स्वयं सारथि बनने की विनती करता है। श्रीराम आदरपूर्वक प्रदक्षिणा कर रथ पर चढ़ते हैं और तेज से दीप्त हो उठते हैं। इसके बाद युद्ध और भी उग्र हो जाता है। रावण भयानक राक्षसास्त्र छोड़ता है; उसके बाण विषधर सर्पों की भाँति दिशाओं को भर देते हैं। श्रीराम गरुड़ास्त्र से उनका प्रतिकार करते हैं; सर्प-बाण सुवर्ण-सुपर्ण रूप धारण कर नष्ट हो जाते हैं। रावण फिर घने शरवर्ष से मातलि को आहत करता है, रथ-ध्वज काट देता है और इन्द्र के अश्वों को घायल करता है; इससे देव, ऋषि और वानर-नायक चिंतित हो उठते हैं। सर्ग का अंत ग्रह-योग, सूर्य की म्लानता और समुद्र-क्षोभ जैसे अपशकुन-चित्रों से होता है, जो राम–रावण संघर्ष की विश्वव्यापी महत्ता को प्रकट करते हैं।

39 verses | Lakṣmaṇa, Rāma, Indra (Śakra), Mātali

Sarga 104

रावणशूलप्रक्षेपः — Ravana Hurls the Trident; Rama Counters with Indra’s Javelin

इस सर्ग में राम और रावण का द्वंद्व युद्ध अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है। श्रीराम के क्रोधित स्वरूप को देखकर पर्वत कांपने लगते हैं, समुद्र में उथल-पुथल मच जाती है और आकाश में अपशकुन रूपी बादल मंडराने लगते हैं। देव, गंधर्व और ऋषिगण इस प्रलयंकारी युद्ध को भयभीत होकर देखते हैं। रावण, लाल नेत्रों के साथ, वज्र के समान कठोर और घण्टा-ध्वनि से युक्त एक भयानक शूल (त्रिशूल) उठाता है और राम के वध की घोषणा करते हुए उसे चलाता है। श्रीराम अपने बाणों की वर्षा से उस शूल को रोकने का प्रयास करते हैं, परंतु वह शूल उन बाणों को पतंगों की भांति भस्म कर देता है। तब श्रीराम मातलि द्वारा लाई गई इंद्र की अमोघ 'शक्ति' को धारण करते हैं, जो प्रलयकाल की उल्का के समान चमक रही थी। राम उस शक्ति का प्रहार कर रावण के शूल को नष्ट कर देते हैं। इसके पश्चात, राम अपने तीक्ष्ण बाणों से रावण के घोड़ों को मार गिराते हैं और रावण के वक्ष तथा ललाट को भेद देते हैं। रक्त से लथपथ रावण, पुष्पित अशोक वृक्ष की भांति प्रतीत होता है, जो पीड़ा और क्रोध से व्याकुल है।

32 verses | Ravana, Devas (collective acclamation), Asuras (collective acclamation)

Sarga 105

रावणक्रोधः—रामस्य परुषवाक्यम् (Ravana’s Fury and Rama’s Harsh Admonition)

इस सर्ग में द्वंद्वयुद्ध का एक मानसिक मोड़ दिखता है। काकुत्स्थ के बाणों से पीड़ित रणगर्वी रावण प्रचंड क्रोध में भरकर घने बाण-वर्षा से क्षणभर रणभूमि को अँधेरा कर देता है। पर राम अचल पर्वत-से अविचल रहते हैं; बाण-जाल को काटते हुए सूर्य-किरणों की तरह उस वर्षा को सह लेते हैं। राम के शरीर पर रक्त-चिह्न उभरते हैं तो वे पराजय नहीं, बल्कि खिले हुए किंशुक-वृक्ष की भाँति धैर्य और सहनशीलता का संकेत बनते हैं। फिर राम का रोष धर्म-न्याय के रूप में प्रकट होता है। वे रावण को ‘सच्चा वीर’ मानने से इंकार करते हैं, क्योंकि उसने असहाय सीता का चोर की तरह अपहरण किया—यह मर्यादा और स्वीकृत आचरण के विरुद्ध है। राम का वचन आगे चलकर युद्ध-भविष्यवाणी बन जाता है—कटे हुए सिर, गिद्ध, फटे हुए अंतड़ियों की छवि—जो मनोयुद्ध भी है और अधर्म पर निर्णय भी। राम का पराक्रम मानो दुगुना हो उठता है; आत्म-ज्ञान और शुभ-निमित्तों से अस्त्र उन्हें स्वतः उपलब्ध होते प्रतीत होते हैं, और वे आक्रमण तीव्र कर देते हैं। राम के बाण-वर्षा और वानरों की शिला-वृष्टि के संयुक्त दबाव में रावण मानसिक रूप से भ्रमित हो जाता है, ठीक से प्रत्युत्तर नहीं दे पाता; तब उसका सारथि उसे रणभूमि से हटा ले जाता है—उत्साह और कर्तृत्व का अस्थायी पतन सूचित होता है।

31 verses

Sarga 106

रावण-सारथि-संवादः (Ravana and the Charioteer: Counsel, Omens, and Battlefield Conduct)

युद्धकाण्ड के इस सर्ग में रणभूमि से क्षणिक हटाव के समय रावण और उसके सारथि के बीच तीव्र संवाद होता है। क्रोध से लाल नेत्रों वाला, मोहग्रस्त और दैव-प्रेरित रावण शत्रु के सामने रथ मोड़ने पर सारथि को धिक्कारता है—उसे कायर, अयोग्य और शत्रुओं से मिला हुआ तक कह देता है। सारथि विनय और नीति-युक्त वाणी में उत्तर देता है कि न उसे भय है, न द्रोह; उसने यह कार्य स्वामी के हित के लिए किया। वह बताता है कि सारथि को काल, देश, संकेत-अपशकुन, योद्धा की अवस्था, सेना की शक्ति-दुर्बलता और घोड़ों की दशा देखकर निर्णय करना चाहिए; घोड़े थक चुके थे और अशुभ निमित्त भी दिखे, इसलिए पीछे हटकर उचित स्थान लेना धर्मसम्मत और रणनीतिक है। रावण उसकी बात से संतुष्ट होकर उसकी प्रशंसा करता है, शुभ हस्ताभूषण प्रदान करता है और तुरंत राघव की ओर बढ़ने की आज्ञा देता है। रथ वेग से जाकर राम के रथ के सामने आ खड़ा होता है, और क्रोधपूर्ण आदेश तथा विवेकपूर्ण परामर्श के बीच का तनाव फिर उभर आता है।

27 verses

Sarga 107

आदित्यहृदयम् (Aditya Hridayam Upadeśa — Agastya’s Instruction to Rāma)

इस सर्ग में रणभूमि पर राम क्षणभर युद्ध की तीव्रता से मन में भार अनुभव करते हैं और सामने रावण युद्ध के लिए तत्पर खड़ा है। तभी देवताओं सहित ऋषि अगस्त्य वहाँ आते हैं, निर्णायक संग्राम का साक्षी बनने के लिए, और राम को “गुह्यं सनातनम्” कहकर आदित्यहृदय स्तोत्र का उपदेश देते हैं। अगस्त्य सूर्य/आदित्य को जगत्-नियन्ता, देवों-प्राणियों और यज्ञ-व्यवस्था का अन्तर्यामी, सृष्टि-संहारकर्ता, अन्धकार और शीत का नाशक, ज्योतियों के स्वामी तथा वैदिक कर्मों के कारण और फल-स्वरूप बताकर स्तुति करते हैं। वे एकाग्र होकर उपासना करने और त्रिकाल पाठ करने से शोक का क्षय, चिंता का निवारण और विजय की सिद्धि बताते हैं। राम आचमन करके आदित्य का ध्यान करते हैं, स्तोत्र का जप करते हैं; उनकी बुद्धि निर्मल होती है और हर्ष जागता है। वे धनुष उठाकर रावण-वध के लिए दृढ़ निश्चय से आगे बढ़ते हैं; अंत में सूर्यदेव की अनुमोदनपूर्ण प्रेरणा से निकट विजय का संकेत मिलता है।

33 verses

Sarga 108

रावणरथवैभव–निमित्तदर्शन–राममातलिसंवादः (Ravana’s Chariot, Portents, and Rama–Matali Instructions)

इस सर्ग में पहले रावण के रथ का भव्य वर्णन आता है—गन्धर्व-नगर के समान विचित्र, ध्वज-पताकाओं से भारी, स्वर्ण-श्रृंखलाओं से सुसज्जित अश्वों से युक्त और रणभूमि में भय उत्पन्न करने वाला। युद्ध तीव्र होने पर श्रीराम रावण के रथ की उग्र चाल देखकर मातलि से कहते हैं कि उसका उलटा, उन्मत्त और असंयत गमन आत्म-विनाश का संकेत है। फिर वे मातलि को स्पष्ट निर्देश देते हैं—सावधान रहो, शत्रु की ओर सीधा रथ बढ़ाओ, मन को भ्रमित न होने दो और स्थिर दृष्टि से लगाम को वश में रखो। मातलि प्रसन्न होकर कौशल से रथ चलाते हैं और चक्रों से उठी धूल द्वारा रावण को विचलित करते हैं। रावण श्रीराम पर बाणों की वर्षा करता है; श्रीराम इन्द्र-सदृश महाधनुष उठाकर प्रत्युत्तर के लिए दृढ़ हो जाते हैं। दोनों सिंहों की भाँति एक-दूसरे के वध का संकल्प लिए आमने-सामने डट जाते हैं; देवगण भी इस द्वन्द्व को देखने एकत्र होते हैं। तत्पश्चात रावण के चारों ओर घोर अपशकुन प्रकट होते हैं—रक्त-वृष्टि, घूमती हवाएँ, गिद्ध और सियार, धूल से धूसर दिशाएँ, उल्कापात, बिना मेघ के वज्र-ध्वनि आदि; जबकि श्रीराम के लिए विजय-सूचक शुभ लक्षण उदित होते हैं। इन निमित्तों को समझकर श्रीराम विजय-निश्चय से भर उठते हैं और बढ़े हुए पराक्रम के साथ शत्रु के अन्त के लिए आगे बढ़ते हैं।

36 verses

Sarga 109

राघव-रावणयोः घोर-द्वैरथ-युद्धम् (The Fierce Chariot-Duel of Rama and Ravana)

इस सर्ग में श्रीराम और रावण का घोर द्वैरथ-युद्ध और भी तीव्र हो उठता है, जिसका भय संसार तक में वर्णित है। दोनों सेनाएँ क्षणभर के लिए अपने-अपने संग्राम रोककर, अस्त्र उठाए स्तब्ध खड़ी रहती हैं और विस्मय से इस निर्णायक द्वंद्व को देखती हैं। क्रोध से भरकर रावण श्रीराम के रथ-ध्वज को लक्ष्य कर बाण चलाता है, पर ध्वज कटता नहीं; बाण रथ को छूकर गिर जाते हैं। तब श्रीराम संयत रोष के साथ रावण के ध्वजदंड/केतु को बाण से काट गिराते हैं; ध्वजदंड के धरती पर गिरते ही रावण की ज्वलंत क्रोधाग्नि और भड़क उठती है। रावण प्रतिशोध में बाणों की वर्षा करता है और मायाबल से विशाल ‘शस्त्र-वर्षा’ रचता है—गदाएँ, लोहे के दंड, चक्र, मुद्गर, पर्वत-शिखर, वृक्ष, त्रिशूल और परशु आदि। दोनों ओर से छूटे बाणों से आकाश जाल-सा भर जाता है, मानो दूसरा आकाश बन गया हो; कोई अस्त्र व्यर्थ नहीं जाता—या तो लक्ष्य भेदता है या मध्य में टकराकर गिर पड़ता है। प्रहार-प्रतिप्रहार की इस धारा में दोनों के अश्वों पर भी वार होते हैं। ध्वज-भंग के अपमान से रावण का रोष और बढ़ता है और यह द्वैरथ-युद्ध कुछ समय के लिए अत्यंत रोमांचक, उग्र और कोलाहलपूर्ण हो उठता है।

29 verses | Rama (Rāghava/Kākutstha), Ravana (Daśagrīva)

Sarga 110

रामरावणयोर्युद्धवैषम्यं तथा रावणशिरश्छेदनम् (Rama–Ravana Duel Intensifies; Ravana’s Heads Severed and Reappear)

इस 110वें सर्ग में श्रीराम और रावण का द्वंद्व समस्त प्राणियों के लिए अद्भुत दृश्य बन जाता है। देवगण, सिद्ध-चारण और गंधर्व विस्मय तथा चिंता के साथ युद्ध देखते हैं। दोनों रथ तीव्र गति से घूमते, आगे बढ़ते और पीछे हटते हैं; सारथियों की कुशलता और प्रतिघात की समानता स्पष्ट होती है। रावण मेघगर्जन-से बाणों से राम के सारथि मातलि को लक्ष्य करता है, पर मातलि तनिक भी विचलित नहीं होता। तब श्रीराम अपने सहायक के अपमान से धर्मयुक्त क्रोध में प्रत्युत्तर देते हैं, व्यक्तिगत पीड़ा से नहीं। बाणों और भारी आयुधों—गदा, मुद्गर, लोहे के दंड आदि—की घोर मार से जगत् में क्षोभ फैलता है: समुद्र मथने लगते हैं, पातालवासी व्याकुल होते हैं, पृथ्वी कांपती है, सूर्य का तेज मंद पड़ता है और वायु थम-सी जाती है। देव और ऋषि गो-ब्राह्मणों के कल्याण हेतु मंगलपाठ करते हुए राम-विजय का आह्वान करते हैं, जिससे युद्ध का धर्ममय लक्ष्य प्रकट होता है। श्रीराम रावण का एक सिर काट देते हैं, पर उसी क्षण दूसरा सिर उग आता है; बार-बार शिरच्छेदन भी राक्षसराज का अंत नहीं कर पाता। सर्वास्त्र-निपुण राम विचार करते हैं कि जो बाण पहले निर्णायक होते थे, वे अब निष्फल-से क्यों प्रतीत हो रहे हैं। सर्ग के अंत में युद्ध बिना विराम जारी रहता है और मातलि कुछ कहने को उद्यत होते हैं—मानो रावण के प्राणाधार और उसके वध के उचित उपाय का रहस्य बताने वाले हों।

39 verses | Mātali (introduced as about to speak)

Sarga 111

रावणवधः — The Slaying of Ravana (Brahmāstra Discharge)

इस सर्ग में निर्णायक क्षण सघन क्रम में आता है। सारथि‑मंत्री के समान मातलि राम को स्मरण कराते हैं कि रावण के विनाश के लिए नियत समय पर पितामह‑प्रदत्त ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करें। तब राम अगस्त्य से प्राप्त महान बाण को उठाते हैं; उसके निर्माण का वैश्विक स्वरूप बताया गया है—वायु, अग्नि, सूर्य, पर्वत और आकाश उसके अधिष्ठाता तत्त्व हैं—जिससे शस्त्र को केवल हिंसा नहीं, धर्म‑यज्ञमय तेज की विधि के रूप में दिखाया गया है। वेदोक्त विधि से शक्ति का संधान कर राम बाण चढ़ाते हैं; पृथ्वी काँप उठती है और प्राणी भयभीत हो जाते हैं। संयत क्रोध में वे बाण छोड़ते हैं; वह इन्द्र के वज्र की भाँति रावण के वक्ष को भेदकर उसके प्राण हर लेता है और कार्य पूर्ण कर शांत भाव से तरकश में लौट आता है। रावण के गिरते ही उसका धनुष छूट जाता है, राक्षस तितर‑बितर हो जाते हैं और वानर विजयोल्लास करते हैं। आकाश में दुन्दुभियाँ बजती हैं, पुष्पवृष्टि होती है, सुगंधित पवन बहती है और देवगण “साधु” कहकर प्रशंसा करते हैं। फिर जगत् संतुलित हो उठता है—भूमि स्थिर, दिशाएँ उज्ज्वल, सूर्य स्थिर—और मित्रगण राम का सम्मान करते हैं; राम देवों में इन्द्र के समान तेजस्वी दीखते हैं।

34 verses

Sarga 112

रावणवधोत्तरं विभीषणशोकः—क्षत्रधर्मोपदेशः (Vibhishana’s Lament after Ravana’s Fall; Instruction on Kshatriya-Dharma)

इस सर्ग में रावण-वध के तुरंत बाद का दृश्य है। रणभूमि में भाई को मृत पड़ा देखकर विभीषण शोक से टूट पड़ते हैं और रावण का वर्णन ऊँची उपमाओं में करते हैं—मानो “राक्षस-राज का वृक्ष” राघव-रूपी आँधी से टूट गया हो, इक्ष्वाकु-सिंह ने मदोन्मत्त गज को गिरा दिया हो, और राम-मेघ की वर्षा से राक्षस-अग्नि बुझ गई हो। वे यह भी विलाप करते हैं कि रावण के साथ लंका की व्यवस्था, तेज और प्राण-शक्ति भी ढह गई; जैसे जगत उलट गया हो—सूर्य गिर पड़ा, चंद्रमा मलिन हो गया, अग्नि शांत हो गई। राम गंभीर धर्मोपदेश देते हैं—क्षत्रधर्म के अनुसार युद्ध में गिरा वीर शोक का पात्र नहीं; युद्ध में विजय कभी पूर्ण और निरपेक्ष नहीं होती; और तीनों लोकों से भय पाने वाले भी काल के अधीन हैं। यह सुनकर विभीषण रावण के अंत्येष्टि-संस्कार करने की अनुमति माँगते हैं, उसकी वैदिक-यज्ञीय प्रतिष्ठा का स्मरण कराते हैं और कहते हैं कि मृत्यु के साथ वैर समाप्त हो जाता है। राम अनुमति देते हैं और युद्ध से संस्कार की ओर, तथा राज्य-धर्म और विधि-व्यवस्था की स्थिरता की ओर संक्रमण का निर्देश करते हैं।

25 verses

Sarga 113

रावणवधदर्शनम् — Lament of the Rākṣasa Women upon Seeing Rāvaṇa Slain

इस सर्ग में रावण-वध के तुरंत बाद लंका के नगर-जीवन और अंतःपुर के भीतर का शोक रणभूमि पर उमड़ आता है। शोकाकुल राक्षसी स्त्रियाँ अंतःपुर से निकलकर रक्त और कीचड़ से सनी युद्धभूमि में प्रवेश करती हैं और कटे धड़ों तथा गिरे हुए शवों के बीच अपने पति और स्वजनों को खोजती फिरती हैं। वे रावण के विशाल शव को—काले पर्वत-समूह के समान—देखकर उसके अंगों पर गिर पड़ती हैं; कोई उसे आलिंगन करती है, कोई चरणों और ग्रीवा से लिपटती है, कोई भूमि पर लोटती है, कोई मूर्छित होती है, और कोई कमल पर ओस-बिंदुओं की तरह आँसुओं से उसका मुख भिगोती है। उनका विलाप चिंतन और उपदेश का रूप ले लेता है। वे स्मरण करती हैं कि जो रावण पहले इन्द्र, यम, गन्धर्व, ऋषि और देवताओं तक को भयभीत करता था, वही आज एक नश्वर मनुष्य-वीर के हाथों मारा जाकर असहाय पड़ा है। वे कारण भी स्पष्ट बताती हैं—हितैषी सलाह न मानना, विशेषतः विभीषण की वाणी की अवहेलना, सीता का अपहरण और उसका निरोध; इसी से उनके कुल का ‘मूलहर’ हो गया। अंत में वे दैव की अटल गति का प्रतिपादन करती हैं कि न धन, न इच्छा, न पराक्रम, न राजाज्ञा उसके प्रवाह को रोक सकती; और क्रौंच/कुररी पक्षियों-सी करुण पुकार के साथ उनका शोक युद्धकाण्ड के भीतर भी शोक-गाथा की मर्यादा बनाए रखता है।

26 verses | Rākṣasī women (Rāvaṇa’s wives/antaḥpura women, collective lament)

Sarga 114

रावणस्य अन्त्येष्टिः — Ravana’s Funeral Rites and the Ethics of Post-War Conduct

यह सर्ग युद्ध के बाद के दृश्य पर आता है। राक्षसी स्त्रियाँ विलाप करती हैं; मन्दोदरी और प्रमुख रानी शोक में डूबी हुई पूर्व संकेतों को स्मरण करती हैं—हनुमान का ‘दुर्गम’ लंका में प्रवेश और समुद्र पर वानर-सेतु—और इन्हें इस बात का प्रमाण मानती हैं कि राम साधारण मनुष्य नहीं हैं। रावण का पतन अधर्म का फल, विशेषतः सीता-हरण के पाप का कर्मफल, के रूप में प्रतिपादित होता है। इसके बाद नीति का निर्णायक प्रसंग आता है: राम कहते हैं कि मृत्यु के बाद वैर नहीं रहता, इसलिए गिरे हुए राजा का विधिपूर्वक अन्त्येष्टि-संस्कार किया जाए। विभीषण लंका में जाकर पुरोहितों, अग्नि, चन्दन और सुगन्धित द्रव्यों को जुटाता है, सुसज्जित शय्या/अर्थी के साथ अन्त्येष्टि-यात्रा का आयोजन करता है। राक्षस वेदसम्मत पितृमेध-विधि के अनुसार वेदी-स्थापन, आहुति और दाह-कर्म करते हैं; फिर विभीषण विधवाओं को सांत्वना देकर नम्र भाव से राम के पास लौटता है। अंत में राम दिव्य आयुधों को रखकर क्रोध त्यागते हैं और सौम्यता धारण करते हैं—विजय में भी मर्यादा का आदर्श स्थापित करते हुए।

126 verses | Mandodarī, Rāma, Vibhīṣaṇa

Sarga 115

विभीषणाभिषेकः (Vibhīṣaṇa’s Consecration) and Hanumān’s Commission to Sītā

रावण के पतन के बाद देव, गन्धर्व और दानव अपने-अपने विमानों से स्वर्ग को लौट गए। वे विजय की शुभ कथाएँ कहते हुए श्रीराम के पराक्रम, वानर-सेना के अभियान, सुग्रीव की नीति, लक्ष्मण की भक्ति और वीरता, सीता की पतिव्रता निष्ठा तथा हनुमान के अद्भुत शौर्य का गुणगान करते हैं। तब श्रीराम इन्द्र के सारथि मातलि को विधिपूर्वक विदा करते हैं और दिव्य रथ के साथ उसे स्वर्ग भेज देते हैं; फिर सुग्रीव को आलिंगन कर शिविर में लौट आते हैं। श्रीराम लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं कि लंका में विभीषण का अभिषेक कर उन्हें राज्य पर प्रतिष्ठित करें—उनकी भक्ति, निष्ठा और पूर्व-सेवा का स्मरण कराते हुए। लक्ष्मण स्वर्ण-कलश मँगवाते हैं; शीघ्रगामी वानर-वीर समुद्र-जल लाते हैं; विभीषण को उत्तम सिंहासन पर बैठाकर, मंत्रोच्चार सहित शास्त्रोक्त विधि से, स्पष्टतः “राम की आज्ञा से” राक्षसों के बीच अभिषेक किया जाता है और उनका धर्मसम्मत राज्य स्थापित होता है। राक्षस और वानर हर्षित होकर श्रीराम को प्रणाम करते हैं। विभीषण प्रजा को सांत्वना देते हैं, दही, अक्षत, मिष्ठान्न, लाजा, पुष्प आदि मंगल द्रव्य ग्रहण कर श्रीराम-लक्ष्मण को अर्पित करते हैं; श्रीराम उनके स्नेह का मान रखकर स्वीकार करते हैं। अंत में श्रीराम विभीषण की अनुमति लेकर हनुमान को आदेश देते हैं कि लंका में जाकर वैदेही सीता को शुभ समाचार सुनाएँ और उनका संदेश लेकर शीघ्र लौट आएँ।

26 verses | Rāma, Lakṣmaṇa (Saumitri), Vibhīṣaṇa

Sarga 116

सीतासान्त्वनम् / Hanuman Consoles Sita with the News of Victory

युद्ध के बाद नई व्यवस्था में लंका में आदर पाकर हनुमान् उचित मर्यादा के साथ नगर में प्रवेश करते हैं और अशोक-वाटिका में सीता से मिलने जाते हैं। वहाँ वे सीता को दुर्बल, शोकाकुल और राक्षसियों के पहरे में देखते हैं। हनुमान् राम का संदेश सुनाते हैं—रावण मारा गया है, लंका विभीषण के अधीन सुरक्षित है, अब भय का कारण नहीं; कैद की स्थिति समाप्त हो गई है। यह सुनकर सीता हर्ष से वाणी खो बैठती हैं। फिर कृतज्ञ होकर दूत को उपहार देने की इच्छा प्रकट करती हैं, पर कहती हैं कि शुभ समाचार के समान कोई धन नहीं। हनुमान् उन राक्षसियों पर प्रतिशोध करने का प्रस्ताव रखते हैं जिन्होंने सीता को धमकाया था, किंतु सीता बदला लेने से मना करती हैं—अपने दुःख को दैव और पूर्व परिस्थितियों का फल मानती हैं तथा धर्मसम्मत नीति बताती हैं कि आज्ञा के अधीन अपराध करने वालों पर भी संयम और करुणा रखनी चाहिए। हनुमान् सीता की धर्म-प्रतिष्ठा स्वीकार कर राम के लिए प्रत्युत्तर माँगते हैं। सीता अपने पति के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त करती हैं। अंत में हनुमान् शीघ्र लौटकर सीता के वचन राघव को उसी क्रम में यथावत् सुना देते हैं, जिससे संदेश और भाव की शुद्ध परंपरा स्थापित होती है।

54 verses

Sarga 117

सीतासमीपगमनम् / Sītā Brought Near to Rāma (Public Witness and Protocol)

इस सर्ग में युद्ध-विजय के बाद धर्म-निर्णय की भूमिका एक संयमित मिलन के माध्यम से रची जाती है। बहुश्रुत हनुमान राम को सब समाचार देकर निवेदन करते हैं कि जिनके लिए यह समस्त अभियान हुआ, उस शोकाकुल मैथिली को अब देखिए। राम अश्रुपूरित होकर कुछ क्षण मनन करते हैं और विभीषण को आज्ञा देते हैं कि सीता को स्नान कराकर, चंदनादि से अनुलेपित, वस्त्र-भूषणों से सुसज्जित करके उपस्थित किया जाए। सीता बिना स्नान राम-दर्शन चाहती हैं, पर विभीषण रामाज्ञा का पालन आवश्यक बताकर उन्हें तैयार करते हैं और सीता सहमत हो जाती हैं। तदनंतर अनेक राक्षसों की रक्षा में दीप्त पालकी में सीता लाई जाती हैं। उनके आगमन का समाचार सुनकर राम के मन में हर्ष, रोष और क्रोध—तीनों भाव उठते हैं, मानो निजी मिलन और लोक-मान्यता के बीच का तनाव प्रकट हो। राम सीता को समीप लाने को कहते हैं; विभीषण भीड़ हटाना चाहते हैं, पर राम रोक देते हैं—“ये मेरे अपने जन हैं।” वे धर्म-नीति बताते हैं कि आपत्ति, संग्राम या यज्ञादि प्रसंगों में स्त्री का सार्वजनिक दर्शन स्वभावतः दोष नहीं, और सीता का उनके निकट आना भी निर्दोष है। फिर राम पालकी हटाकर सीता को पैदल, वानरों के सामने, स्पष्ट रूप से आने का आदेश देते हैं ताकि सामूहिक साक्ष्य बना रहे। लक्ष्मण, सुग्रीव और हनुमान राम के कठोर भाव से व्याकुल होकर सीता के प्रति अप्रसन्नता की आशंका करते हैं। सीता लज्जा से धीरे-धीरे आगे बढ़कर राममुख का दर्शन करती हैं और उनका दीर्घ शोक शांत हो जाता है—भाव-विमोचन के साथ सर्ग समाप्त होता है, पर आगे होने वाली नैतिक परीक्षा का संकेत भी देता है।

36 verses | Hanumān, Rāma, Vibhīṣaṇa, Sītā (Vaidehī/Maithilī)

Sarga 118

सीताप्रत्याख्यानम् / Rama’s Post-Victory Address to Sītā (Public Opinion and Royal Duty)

युद्ध के बाद राम सीता को अपने निकट खड़ी देखकर हृदय में संचित क्रोध और आशंका को लोक के सामने प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि रावण-वध से अपमान का प्रतिशोध पूरा हुआ, प्रतिज्ञाएँ निभीं और सहायकों का परिश्रम सफल हुआ—हनुमान का समुद्र-लाँघना और लंका-दहन, सुग्रीव की नीति और सेना का श्रम, तथा विभीषण का शरणागमन। फिर राम राजधर्म और कुल-कीर्ति की बात करते हुए कहते हैं कि यह युद्ध-परिश्रम ‘सीता के लिए’ नहीं, बल्कि अपने वंश की मर्यादा, आचरण और लोकापवाद से रक्षा के लिए किया गया। वे स्वीकार करते हैं कि एक ओर निजी स्नेह है, दूसरी ओर जनवाद का भय—हृदय विभाजित है। कठोर तर्क देकर वे कहते हैं कि पराए घर में रही और परदृष्टि से देखी गई पत्नी को स्वीकार करना अनुचित है; इसलिए सीता जहाँ चाहें जाएँ—और लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव या विभीषण को आश्रय-रक्षक के रूप में भी संकेत करते हैं। राम के इन वचनों से सीता आँसुओं से भर जाती हैं, काँप उठती हैं और हाथी से आहत लता-सी हो जाती हैं—यह दृश्य शारीरिक उद्धार के बाद सार्वजनिक तिरस्कार से उत्पन्न मानसिक आघात को प्रकट करता है।

25 verses

Sarga 119

सीताया अग्निप्रवेशः (Sita’s Ordeal by Fire / Agni-Pariksha)

इस सर्ग में सभा के बीच राम का लोक-लाज से प्रेरित कठोर वचन वैदेही को गहरे आहत करता है। सीता क्रमबद्ध और तर्कपूर्ण उत्तर देती हैं—वे कहती हैं कि साध्वी स्त्री का निर्णय “साधारण/ग्राम्य स्त्रियों” के आचरण से नहीं होना चाहिए; बंदी अवस्था में शरीर पर बल हो सकता है, पर मन-हृदय की निष्ठा अडिग रहती है। वे दाम्पत्य के दीर्घ विश्वास का स्मरण कराती हैं और कहती हैं कि यदि संदेह ही निर्णायक हो, तो उद्धार और मित्रों का पराक्रम सब व्यर्थ ठहरेगा। विवाद से आगे बढ़कर वे धर्मसम्मत प्रमाण के रूप में लक्ष्मण से चिता सजाने को कहती हैं—सभा में तिरस्कृत होकर उनके लिए आत्मदाह ही शेष मर्यादित मार्ग है। लक्ष्मण क्रुद्ध होकर भी राम के मौन संकेत से आज्ञा मानकर अग्नि प्रज्वलित करते हैं; राम मृत्यु-सम निश्चय वाले प्रतीत होते हैं, कोई उन्हें रोक नहीं पाता। सीता प्रदक्षिणा कर देवताओं और ब्राह्मणों को प्रणाम करती हैं, लोकदेवताओं और अग्नि को साक्षी मानकर वाणी, मन और कर्म से अपनी पतिव्रता-निष्ठा की घोषणा करती हैं। फिर वे निर्भय होकर धधकती अग्नि में प्रवेश करती हैं; मनुष्य, वानर, राक्षस और देवगण विस्मय, विलाप और जयघोष के साथ इस सार्वजनिक साक्ष्य-आधारित परीक्षा के साक्षी बनते हैं।

36 verses

Sarga 120

रामस्तवः — ब्रह्मणा रामस्य नारायणत्वप्रकाशनम् (Rama-Stava: Brahma Reveals Rama’s Nārāyaṇa Identity)

युद्ध के बाद का मानवीय शोक इस सर्ग में एक दिव्य रहस्योद्घाटन में बदल जाता है। प्रजा का विलाप सुनकर राम आँसुओं से भरी आँखों के साथ क्षणभर ठहर जाते हैं—यह संकेत है कि राजा का धर्म लोकभावना और उत्तरदायित्व से जुड़ा है। तभी सूर्य-सम तेजस्वी विमानों में देवगण लंका पहुँचते हैं—कुबेर (वैश्रवण), पितरों सहित यम, इन्द्र, वरुण, षड्‌नेत्र वृषध्वज महेश्वर और ब्रह्मा—और एक विराट देवसभा बनती है, जो हाल की घटनाओं को लौकिक दृष्टि से ऊपर उठाकर देखती है। देव प्रश्न करते हैं कि सृष्टिकर्ता और प्रभु कहे जाने वाले राम सीता की अग्निपरीक्षा के कष्ट को कैसे अनदेखा कर सकते हैं—यहाँ दिव्य सर्वज्ञता और मानवीय आचरण के बीच का तनाव प्रकट होता है। राम उत्तर देते हैं कि वे स्वयं को दशरथ का मनुष्य पुत्र ही मानते हैं और ब्रह्मा से अपने वास्तविक उद्गम का स्पष्टीकरण माँगते हैं। ब्रह्मा तब विस्तृत स्तुति में राम को नारायण/विष्णु के रूप में प्रकट करते हैं—यज्ञ और ओंकार-स्वरूप, आदि-मध्य-अन्त, दिशाओं और समस्त प्राणियों में व्याप्त पालनकर्ता तत्त्व, तथा त्रिविक्रम-वामन होकर बलि को बाँधने वाले। अंत में कहा जाता है कि रावण-वध अवतार-कार्य की सिद्धि है, और इस प्राचीन स्तव का पाठ सफलता देता तथा अपयश से रक्षा करता है—इस प्रकार सर्ग कथा-समाधान के साथ एक लिटर्जिकल प्रमाण भी बन जाता है।

33 verses | Rama (Raghava, Kakutstha, Dasharatha-atmaja), Brahma (creator, foremost of Brahmavids)

Sarga 121

अग्निपरीक्षासाक्ष्यं (Agni’s Testimony and Sītā’s Revalidation)

इस सर्ग में युद्धकथा का न्यायिक‑दैवी समापन साक्ष्य के द्वारा होता है। ब्रह्मा के उपदेश के बाद अग्नि (विभावसु/हव्यवाहन/पावक) ‘लोक‑साक्षी’ बनकर अग्निकुण्ड से प्रकट होते हैं और वैदेही को अपनी गोद में उठाकर राम को लौटा देते हैं—सीता तेजस्विनी, निष्कलंक और पूर्ववत् निर्मल रूप में दिखाई देती हैं। अग्नि विधिवत् घोषणा करते हैं कि सीता वाणी, मन, बुद्धि और दृष्टि तक से राम के प्रति अचल निष्ठा वाली हैं; राक्षसियों की निगरानी, प्रलोभन और भय‑धमकियों के बीच भी वे कभी धर्म से नहीं डिगीं। इसके बाद राम लोक‑विश्वास की नीति स्पष्ट करते हैं—तीनों लोकों में सीता की पवित्रता उन्हें ज्ञात है, पर रावण के अन्तःपुर में दीर्घ निवास से समाज में शंका उठ सकती थी; इसलिए ‘लोक‑प्रत्यय’ के लिए उन्होंने अग्नि‑प्रवेश होने दिया, अपने मन में संदेह से नहीं। वे सीता की अक्षुण्णता को ऐसी ज्वाला के समान बताते हैं जो दुष्ट के मन में भी स्पर्श्य नहीं, और कहते हैं कि जैसे कोई अपनी कीर्ति या अपने ही आत्मस्वरूप को नहीं त्याग सकता, वैसे ही वे सीता का त्याग नहीं कर सकते। अंत में राम परामर्श स्वीकार करते हैं, प्रशंसा पाते हैं और पत्नी के साथ धर्मोचित सुख का अनुभव करते हैं।

22 verses

Sarga 122

दशरथदर्शनम् — Dasharatha’s Epiphany and Benedictions (Sarga 122)

इस सर्ग में युद्ध-समाप्ति के बाद दिव्य-दर्शन और उपदेश का क्रम आता है। महेश्वर राघव के मंगल वचन सुनकर मंगल आदेश देते हैं—राम अयोध्या लौटें, भरत तथा कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को सांत्वना दें, इक्ष्वाकु-राज्य की व्यवस्था स्थिर करें, राजधर्म का पालन करें, अश्वमेध आदि यज्ञ करें और ब्राह्मणों को दान दें—इस प्रकार रणधर्म से नगरधर्म की पूर्णता हो। फिर महेश्वर विमान में स्थित दशरथ को प्रकट करते हैं। राम-लक्ष्मण प्रणाम करते हैं। तेजस्वी दशरथ राम को आलिंगन कर अपनी गोद में बैठाकर कहते हैं—राम के बिना स्वर्ग का सम्मान भी नीरस है; आज वनवास की समाप्ति और शत्रुनाश देखकर मैं कृतार्थ हुआ। वे कैकेयी के वनवास-वरदान से उत्पन्न पीड़ा का स्मरण करते हुए भी भरत और कैकेयी पर कृपा रखने को कहते हैं; राम प्रार्थना करते हैं कि भयानक शाप उन्हें न छुए। दशरथ लक्ष्मण की निष्ठापूर्ण सेवा की प्रशंसा कर आशीर्वाद देते हैं और सीता को धैर्य तथा पतिव्रत-धर्म का सौम्य उपदेश देते हुए राम को उनका परम आश्रय बताते हैं। अंत में दशरथ विमान से इन्द्रलोक को प्रस्थान करते हैं—पिता-पुत्र के विछोह का विधिवत् समापन होकर कथा अयोध्या के पुनर्स्थापन की ओर बढ़ती है।

39 verses

Sarga 123

इन्द्रवरदानम् / Indra Grants Boons: Restoration of the Vanara Host

युद्ध के उपरान्त यह सर्ग देवसंवाद के रूप में आता है। महेन्द्र (पाकशासन, सहस्राक्ष) अञ्जलि बाँधे खड़े श्रीराम से कहते हैं—“जो वर चाहो, माँगो।” तब श्रीराम अपना नहीं, सबका कल्याण माँगते हैं—जो वानर और ऋक्ष उनके कार्य के लिए युद्ध करते हुए यमलोक को पहुँच गए हैं, वे सब पुनः जीवित हों, उनके घाव मिट जाएँ और वे अपने स्वजनों से मिलें; साथ ही वानरों के निवास-स्थानों में ऋतु के विपरीत भी पुष्प-फल की समृद्धि हो और नदियाँ निर्मल तथा पूर्ण प्रवाह वाली रहें। इन्द्र इस महान और निश्चित वर को स्वीकार कर देते हैं। उसी क्षण गिरे हुए और घायल वानर-ऋक्ष ऐसे उठ खड़े होते हैं मानो नींद से जागे हों—बल और तेज से भरकर, विस्मित होकर। देवगण श्रीराम-लक्ष्मण की स्तुति करते हैं और अयोध्या लौटने की सलाह देते हैं—वानरों को विदा करना, मैथिली को सांत्वना देना, भरत-शत्रुघ्न से मिलना, माताओं के दर्शन करना और राज्याभिषेक प्राप्त करना। इसके बाद देवता सूर्य-प्रभ विमानों में इन्द्र के साथ प्रस्थान करते हैं। श्रीराम वानर-सेना को विश्राम हेतु विधिवत् विसर्जित करते हैं; पुनर्जीवित होकर वह सेना नूतन शोभा और उज्ज्वल तेज से दीप्त हो उठती है।

24 verses

Sarga 124

पुष्पकविमान-प्रस्थानम् (The Pushpaka Vimāna Offered and the Return Prepared)

विश्राम की रात्रि के बाद विभीषण ने श्रीराम को प्रणाम कर विजय की स्थिति पूछी। फिर उसने स्नान, उबटन, वस्त्र, आभूषण, चन्दन और मालाओं सहित शृंगार-निपुण सेवकों द्वारा सज्जित सत्कार-व्यवस्था प्रस्तुत की और श्रीराम तथा वानर-नायकों से शीतलोपचार ग्रहण करने का निवेदन किया। श्रीराम ने संयमित किन्तु तात्कालिकता-युक्त वचन कहा—चित्रकूट में भरत की जो प्रार्थना मैंने पहले स्वीकार नहीं की थी, अब उसी भरत के दर्शन के लिए मेरा हृदय शीघ्र दौड़ रहा है; रानियों और नगरवासियों की विनतियाँ भी स्मरण में हैं। तब विभीषण ने पुष्पक विमान अर्पित किया—सूर्य-सा तेजस्वी, मेघ-सा विशाल, इच्छानुसार चलने वाला, अजेय और मन के समान वेगवान। उसने बताया कि यह कुबेर का वाहन है, जिसे रावण ने युद्ध में छीन लिया था और अब राम-कार्य के लिए सुरक्षित रखा गया है। श्रीराम ने अधिक ठहरना अस्वीकार कर प्रस्थान की अनुमति माँगी और विमान को तैयार करने का आदेश दिया। विमान लाया गया—स्वर्ण-रचना, मणि-वेदिकाएँ, ध्वज, घण्टियाँ, मोतियों से जड़े झरोखे; विश्वकर्मा-कृत, मेरु-सम विशाल। उसकी महिमा देखकर राम-लक्ष्मण विस्मित होकर उसमें बैठे; यहीं से युद्ध-समाप्ति के बाद गृह-प्रयाण की कथा आरम्भ होती है।

30 verses | Vibhīṣaṇa, Rama

Sarga 125

पुष्पकारोहणम् (Boarding the Puṣpaka; Honoring the Allies and Departure for Ayodhyā)

इस सर्ग में विजय के बाद शान्ति, कृतज्ञता और अयोध्या-प्रस्थान का मंगलमय क्रम आता है। विभीषण पुष्पों से सुसज्जित कुबेर-स्वामित्व वाले पुष्पक विमान को आदरपूर्वक दूर खड़े होकर श्रीराम को अर्पित करता है और आज्ञा पूछता है। लक्ष्मण के सुनते हुए श्रीराम विचार कर नीति-वचन कहते हैं—वन में विचरने वाले वानर आदि मित्रों ने युद्ध का भार उठाया है, अतः उन्हें धन-रत्न देकर सम्मानित करना चाहिए; कृतज्ञता ही राज्य की प्रतिष्ठा को स्थिर रखती है, और जो राजा गुणहीन होकर उपकार भूलता है, उसकी सेना शीघ्र ही विमुख हो जाती है। विभीषण उसी प्रकार बहुमूल्य वस्तुएँ बाँटता है। मित्रसेना के सम्मानित होने पर श्रीराम श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होते हैं। सभा के बीच लज्जावती सीता को श्रीराम अपने आलिंगन में लेकर विमान में बैठाते हैं। फिर श्रीराम सुग्रीव सहित वानरों को किष्किन्धा लौटने की अनुमति देते हैं और विभीषण को लंका में सुरक्षित, धर्मयुक्त राज्य का आशीर्वाद देते हैं। मित्रगण श्रीराम के साथ अयोध्या जाकर अभिषेक देखने और कौशल्या को प्रणाम करने की इच्छा प्रकट करते हैं; श्रीराम सहर्ष स्वीकार करते हैं। उनकी अनुमति से पुष्पक आकाश में उठता है और श्रीराम युद्धोत्तर उज्ज्वल, न्यायपूर्ण प्रभुत्व के प्रतीक रूप में कुबेर के समान शोभित होते हैं।

27 verses | Vibhīṣaṇa, Rāma

Sarga 126

पुष्पकविमानयात्रा—सेतुबन्धादि-दर्शनम् (Pushpaka Aerial Journey and Survey of Sacred Landmarks)

युद्ध के बाद पुष्पक विमान में राम सीता को साथ लेकर आकाशमार्ग से यात्रा करते हैं और मार्ग में स्मृतियों के सहारे स्थान-स्थान का परिचय कराते हैं। राम की अनुमति से हंस-सा, मधुर-नाद वाला पुष्पक ऊपर उठता है और चलती हुई दृष्टि-स्थली बन जाता है। राम रक्तरंजित रणभूमि दिखाकर प्रमुख राक्षसों के वध और उनके वधकर्ताओं का क्रम से उल्लेख करते हैं—यह युद्ध-समापन का औपचारिक लेखा और उत्तरदायित्व का संकेत है। फिर कथा पवित्र भूगोल की ओर मुड़ती है—समुद्र-तट, नल का सेतु (नलसेतु), वरुण का आवास गर्जता समुद्र, हनुमान के गमन से जुड़ा विश्राम-पर्वत, और त्रिलोके वंदित, पाप-नाशक सेतुबन्ध तीर्थ का दर्शन कराया जाता है। इसके बाद विमान किष्किन्धा और ऋष्यमूक, पम्पा और शबरी-प्रदेश, जनस्थान और जटायु के पतन-स्थल, खर–दूषण–त्रिशिरा प्रसंग का क्षेत्र, गोदावरी और अगस्त्य-आश्रम, सुतिक्ष्ण व शरभंग के आश्रम, अत्रि का निवास, विराध-प्रदेश, चित्रकूट, यमुना और भरद्वाज-आश्रम, गंगा, शृंगिबेर (गुह), सरयू—इन सबको पार कर अंत में अयोध्या को अमरावती-सी शोभामयी देखता है; सीता श्रद्धापूर्वक प्रणाम करती हैं। साथ ही सीता तारा और अन्य वानरी स्त्रियों को अयोध्या चलने का आग्रह करती हैं। राम अनुमति देते हैं, सुग्रीव अपने गृह-समूह को बुलाते हैं, और सीता के दर्शन की उत्कंठा से वे सब पुष्पक पर आरूढ़ होकर साथ चल पड़ती हैं।

57 verses

Sarga 127

भरद्वाजाश्रम-समागमः / Meeting Bharadvaja at the Hermitage (Homeward Blessings)

निर्वासन-काल की समाप्ति (निश्चित तिथि सहित) पर श्रीराम और लक्ष्मण भरद्वाज मुनि के आश्रम पहुँचकर श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं। श्रीराम अयोध्या का कुशल—प्रजा की समृद्धि, भरत का शासन, तथा माताओं (रानियों) का स्वास्थ्य—पूछते हैं; इससे युद्ध-लक्ष्य से नगर-धर्म और पुनर्स्थापन की ओर कथा का प्रवाह मुड़ता है। भरद्वाज स्नेह से बताते हैं कि भरत तपस्वी-सा वेश धारण किए, श्रीराम की पादुकाएँ सामने रखकर उन्हीं की प्रतीक्षा कर रहे हैं—यह न्यस्त-राज्य और अटूट निष्ठा का संकेत है। मुनि कहते हैं कि तपस्या और शिष्यों के समाचार से श्रीराम की समस्त यात्रा उन्हें ज्ञात है—ऋषि-ब्राह्मणों की रक्षा में सीता-हरण, मारीच व कबन्ध से भेंट, पम्पा में आगमन, सुग्रीव से मैत्री, वाली-वध, हनुमान द्वारा सीता का पता और लंका-दहन, नल का सेतु, रावण-वध तथा देवताओं के वरदान। भरद्वाज अर्घ्य देकर वर माँगने को कहते हैं। श्रीराम प्रार्थना करते हैं कि अयोध्या-मार्ग पर ऋतु-विरुद्ध भी अमृत-गंध वाले फल-पुष्प प्रचुर हों। मुनि की स्वीकृति से कई योजन तक प्रकृति बदल जाती है—सूखे वृक्ष फलने लगते हैं, पत्तों से रहित वृक्ष फिर हरित हो उठते हैं, मधुर-रस की समृद्धि छा जाती है; यह लौटते हुए धर्म-स्थापन का शुभ संकेत बनता है।

23 verses

Sarga 128

अयोध्याप्रत्यागमन-सन्देशः (Hanuman Sent Ahead to Ayodhya)

पुष्पक विमान से अयोध्या को देखते हुए श्रीराम लौटने की यात्रा के प्रमुख प्रसंगों का स्मरण करते हैं—समुद्र के निकट पहुँचना, सागरदेव का प्राकट्य, सेतु-निर्माण, रावण-वध और देवताओं से प्राप्त वरदान। फिर वे हनुमान को शीघ्र दूत बनाकर अयोध्या भेजते हैं। राम हनुमान को निर्देश देते हैं कि भरत के अंतःभाव को बाह्य लक्षणों से परखें—मुख का रंग, दृष्टि और वाणी से; क्योंकि राज्य की समृद्धि कभी-कभी सद्गुणी को भी विचलित कर सकती है। इस प्रकार संवेदनशील उत्तराधिकार से पहले राजनीतिक सत्यापन की विधि बताई जाती है। हनुमान मनुष्य-रूप में वेग से चलकर गंगा–यमुना संगम पार करते हैं, शृंगबेरपुर पहुँचकर गुह से मिलते हैं और राम के कुशल तथा यात्रा-वृत्तांत का संदेश देते हैं। आगे नंदीग्राम की ओर बढ़ते हुए वे भरत का तपस्वी-सा शासन देखते हैं—कृश देह, वैराग्यपूर्ण वेश, राम की पादुका को सिंहासन-चिह्न मानकर प्रतीकात्मक राजकाज, और साथ में मंत्री, पुरोहित तथा सेनानायक। हनुमान राम की विजय, सीता की प्राप्ति और शीघ्र मिलन का समाचार सुनाते हैं। यह सुनकर भरत आनंद से विह्वल होकर मूर्छित हो जाते हैं, हनुमान को आलिंगन करते हैं और शुभ समाचार के लिए बहुमूल्य दान देते हैं; साथ ही संक्रमण काल में भी राम-निष्ठा और धर्ममय शासन की पुनः पुष्टि करते हैं।

46 verses | Rama, Hanuman, Bharata, Guha

Frequently Asked Questions

Yuddhakāṇḍa frames war as a dharmic necessity rather than a celebration of violence: force becomes legitimate only when subordinated to truth, restraint, and the protection of the wronged. The narrative repeatedly contrasts Rāma’s disciplined adherence to counsel, alliance-ethics, and vows with Rāvaṇa’s pride-driven rejection of wise advice. Vibhīṣaṇa’s defection and Rāma’s granting of asylum further establish rājadharma as the capacity to recognize virtue even in an enemy camp. The book thus presents adharma not merely as “sin” but as strategic blindness that collapses sovereignty from within.

Key episodes include: Hanumān’s report and the march to the sea; Rāma’s observance and confrontation with Sāgara; construction and crossing of the setu; reconnaissance and the siege of Laṅkā; Vibhīṣaṇa’s counsel, rejection, and asylum; successive gate-battles and the fall of leading commanders (e.g., Dhumrākṣa, Vajradaṃṣṭra, Prahasta); Indrajit’s māyā that temporarily disables Rāma and Lakṣmaṇa and the counter-operation against his ritual power (Nikumbhilā); Kumbhakarṇa’s awakening, rampage, and death; and the tightening of the campaign toward the final confrontation with Rāvaṇa and the recovery of Sītā.

The central figures are Rāma and Lakṣmaṇa (leaders of the righteous campaign), Sītā (the moral and emotional center), Hanumān and Sugrīva (vānaras coalition leadership), and Vibhīṣaṇa (insider counselor who joins Rāma). The principal antagonists are Rāvaṇa (king of Laṅkā), Indrajit/Meghanāda (ritual and illusion warfare specialist), and Kumbhakarṇa (colossal champion). Aṅgada and Jāmbavān function as prominent vānaras leaders who stabilize morale and lead assaults.

Yuddhakāṇḍa is the epic’s decisive resolution-phase: it transforms the quest and alliance-building of earlier books into direct confrontation, adjudicating the moral claims established in Araṇya and Kiṣkindhā and operationalized in Sundara through Hanumān’s mission. It also prepares the ethical aftermath addressed in the concluding book (Uttarakāṇḍa), where questions of kingship, public scrutiny, and the costs of restoring order are explored. Structurally, it is the hinge where private suffering (Sītā’s captivity, Rāma’s grief) becomes a public test of sovereignty and dharma.

The book teaches that (1) power without counsel and humility becomes self-destructive; (2) perseverance and clarity can be restored even after catastrophic reversals; (3) righteous leadership includes ethical alliance-making and protection of those who seek refuge; (4) grief is real and voiced, yet duty demands action guided by principle; and (5) adharma ultimately erodes both personal judgment and political stability, leading to downfall despite material strength.

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