
अष्टादशः सर्गः — Kaikeyī Discloses the Boons: Exile to Daṇḍaka and Bharata’s Consecration
अयोध्याकाण्ड
राम अंतःपुर में प्रवेश कर शुभ शय्या पर पड़े हुए दीन‑पाण्डुर दशरथ को कैकेयी के पास बैठा देखता है। पहले पिता को, फिर कैकेयी को प्रणाम करके वह देखता है कि राजा आँसुओं से भरे नेत्रों और भारी श्वासों के साथ केवल “राम” कह पा रहे हैं; न वे दृष्टि उठा पाते हैं, न स्पष्ट वचन बोल पाते हैं। राम क्रमबद्ध ढंग से कारण पूछता है—क्या उससे अनजाने में कोई अपराध हुआ, क्या राजा को शारीरिक या मानसिक पीड़ा है, क्या भरत‑शत्रुघ्न या रानियों पर कोई विपत्ति आई है, अथवा कैकेयी ने कठोर वचन कहकर राजा का मन विचलित कर दिया है। तब कैकेयी कहती है कि प्रिय पुत्र को अप्रिय सत्य कहने का भय ही राजा की चुप्पी है, और वह राम से पूर्व में दिए गए दो वरों को सत्य रूप से पूरा करने की मांग करती है। राम अपनी अटल आज्ञाकारिता प्रकट करता है—पिता‑गुरु और हितैषी की आज्ञा हो तो वह अग्नि में प्रवेश, विषपान या जल में डूबना भी स्वीकार करेगा—और राजा की आज्ञा सुनने को कहता है। तब कैकेयी वरदानों का कथन करती है: भरत का राज्याभिषेक और राम का चौदह वर्ष के लिए दण्डकारण्य में वनवास, अभिषेक त्यागकर जटा‑अजिन धारण कर तपस्वी‑जीवन। सर्ग का अंत राम की स्थिरता और कैकेयी के कठोर वचनों के बीच उसके धैर्य के साथ होता है, जबकि दशरथ पुत्र पर आई आपदा से अत्यन्त व्याकुल हो उठते हैं। सत्य, व्रत और उत्तराधिकार के प्रश्न पर आधारित धर्म‑संकट यहाँ स्पष्ट रूप से उभर आता है।
Verse 1
स ददर्शासने रामो निषण्णं पितरं शुभे।कैकेयीसहितं दीनं मुखेन परिशुष्यता।।।।
वहाँ राम ने शुभ शय्या पर बैठे अपने पिता को देखा; कैकेयी उनके पास थी, और राजा दीन-हीन, मुख से शोकवश सूखा-सा प्रतीत हो रहा था।
Verse 2
स पितुश्चरणौ पूर्वमभिवाद्य विनीतवत्।ततो ववन्दे चरणौ कैकेय्या स्सुसमाहितः।।।।
विनयपूर्वक और चित्त को संयत रखकर उसने पहले पिता के चरणों में प्रणाम किया; फिर सुसमाहित होकर कैकेयी के चरणों को वंदन किया।
Verse 3
रामेत्युक्त्वा तु वचनं बाष्पपर्याकुलेक्षणः।शशाक नृपतिर्दीनो नेक्षितुं नाभिभाषितुम्।।।।
केवल “राम” इतना कहकर, आँसुओं से भरी आँखों वाले दीन राजा इतने शोकाकुल हो गए कि न वे उसकी ओर देख सके, न आगे कुछ बोल सके।
Verse 4
तदपूर्वं नरपतेर्दृष्ट्वा रूपं भयावहम्।रामोऽपि भयमापन्नः पदा स्पृष्ट्वेव पन्नगम्।।।।
राजा पिता का वह अभूतपूर्व, भयावह रूप देखकर राम भी भयभीत हो गए—मानो पाँव से सर्प को छू लिया हो।
Verse 5
इन्द्रियैरप्रहृष्टैस्तं शोकसन्तापकर्शितम्।निश्श्वसन्तं महाराजं व्यथिताकुलचेतसम्।।।।ऊर्मिमालिनमक्षोभ्यं क्षुभ्यन्तमिव सागरम्।उपप्लुतमिवादित्यमुक्तानृतमृषिं यथा।।।।
इन्द्रियाँ हर्षहीन हो गई थीं; शोक और संताप से क्षीण वह महाराज भारी-भारी श्वास ले रहे थे, उनका चित्त व्यथित और आकुल था। स्वभाव से अचल होते हुए भी वे तरंगमालाओं से मुकुटित समुद्र की भाँति मथित-से, ग्रहणग्रस्त सूर्य की भाँति मलिन, और असत्य वचन कहकर पतित हुए ऋषि की भाँति खिन्न प्रतीत हो रहे थे।
Verse 6
इन्द्रियैरप्रहृष्टैस्तं शोकसन्तापकर्शितम्।निश्श्वसन्तं महाराजं व्यथिताकुलचेतसम्।।2.18.5।।ऊर्मिमालिनमक्षोभ्यं क्षुभ्यन्तमिव सागरम्।उपप्लुतमिवादित्यमुक्तानृतमृषिं यथा।।2.18.6।।
इन्द्रियाँ हर्षहीन हो गई थीं; शोक और संताप से क्षीण वह महाराज भारी-भारी श्वास ले रहे थे, उनका चित्त व्यथित और आकुल था। स्वभाव से अचल होते हुए भी वे तरंगमालाओं से मुकुटित समुद्र की भाँति मथित-से, ग्रहणग्रस्त सूर्य की भाँति मलिन, और असत्य वचन कहकर पतित हुए ऋषि की भाँति खिन्न प्रतीत हो रहे थे।
Verse 7
अचिन्त्यकल्पं हि पितुस्तं शोकमुपधारयन्।बभूव संरब्धतर स्समुद्र इव पर्वणि।।।।
पिता के उस अचिन्त्य-सा शोक को मन में धारण कर राम और भी अधिक उद्विग्न हो उठे—जैसे पूर्णिमा के ज्वार पर समुद्र तरंगों से उफन उठता है।
Verse 8
चिन्तयामास च तदा रामः पितृहिते रतः।किं स्विदद्यैव नृपतिर्न मां प्रत्यभिनन्दति।।।।
तब पिता के हित में रत राम ने सोचा—“आज ही क्या कारण है कि नरेश मुझे प्रत्यभिवादन करके प्रसन्न नहीं होते?”
Verse 9
अन्यदा मां पिता दृष्ट्वा कुपितोऽपि प्रसीदति।तस्य मामद्य संप्रेक्ष्य किमायासः प्रवर्तते।।।।
“अन्य समय में पिता मुझे देखकर, क्रोधित हों तो भी शांत हो जाते हैं; पर आज मुझे देखते हुए भी उनमें यह क्लेश क्यों उठ रहा है?”
Verse 10
स दीन इव शोकार्तो विषण्णवदनद्युतिः।कैकेयीमभिवाद्यैव रामो वचनमब्रवीत्।।।।
राम शोक से पीड़ित, दीन-सा और विषाद से मुखमंडल की ज्योति म्लान किए हुए, पहले कैकेयी को प्रणाम करके बोले।
Verse 11
कच्चिन्मया नापराद्धमज्ञानाद्येन मे पिता।कुपितस्तन्ममाचक्ष्व त्वं चैवैनं प्रसादय।।।।
क्या मुझसे अज्ञानवश कोई अपराध हो गया है, जिसके कारण मेरे पिता मुझ पर क्रोधित हैं? वह मुझे बताओ, और तुम स्वयं भी उन्हें प्रसन्न कर दो।
Verse 12
अप्रसन्नमनाः किन्नु सदा मां प्रति वत्सलः।विवर्णवदनो दीनो न हि मामभिभाषते।।।।
जो सदा मुझ पर स्नेह रखने वाले हैं, उनका मन अब अप्रसन्न क्यों है? उनका मुख क्यों फीका और उदास है, और वे मुझसे क्यों नहीं बोलते?
Verse 13
शरीरो मानसो वापि कच्चिदेनं न बाधते।सन्तापोवाऽभितापो वा दुर्लभं हि सदा सुखम्।।।।
क्या उन्हें शरीर का कोई रोग सताता है, या मन का कोई दुःख—कोई पीड़ा या तीव्र संताप? क्योंकि स्थायी सुख तो सचमुच दुर्लभ है।
Verse 14
कच्चिन्न किञ्चिद्भरते कुमारे प्रियदर्शने।शत्रुघ्ने वा महासत्त्वे मात्रूणां वा ममाशुभम्।।।।
आशा है कि प्रियदर्शी कुमार भरत को, महाबली शत्रुघ्न को, या मेरी माताओं में से किसी को भी कोई अशुभ नहीं हुआ है।
Verse 15
अतोषयन्महाराजमकुर्वन्वा पितुर्वचः।मुहूर्तमपि नेच्छेयं जीवितुं कुपिते नृपे।।।।
यदि मैंने कभी महाराज—अपने पिता—को अप्रसन्न किया हो, या उनके वचन का पालन न किया हो, और राजा क्रोधित हो गए हों, तो मैं एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहूँगा।
Verse 16
यतोमूलं नरः पश्येत्प्रादुर्भावमिहात्मनः।कथं तस्मिन्नवर्तेत प्रत्यक्षे सति दैवते।।।।
जब मनुष्य इस लोक में अपने उत्पत्ति-कारण को प्रत्यक्ष देख लेता है, तब सामने उपस्थित उस दैव-स्वरूप के रहते वह उसके अनुसार आचरण कैसे न करे?
Verse 17
कच्चित्ते परुषं किञ्चिदभिमानात्पतिता मम।उक्तो भवत्या कोपेन यत्रास्य लुलितं मनः।।।।
क्या तुमने अभिमान से आहत होकर क्रोध में मेरे पिता से कोई कठोर वचन कह दिया, जिससे उनका मन विचलित हो गया?
Verse 18
एतदाचक्ष्व मे देवि तत्त्वेन परिपृच्छतः।किं निमित्तमपूर्वोयं विकारो मनुजाधिपे।।।।
देवि, मैं सत्य जानने के लिए बार-बार पूछ रहा हूँ—मनुजाधिप (राजा) में यह अभूतपूर्व परिवर्तन किस कारण से हुआ है, यह मुझे यथार्थ बताओ।
Verse 19
एवमुक्ता तु कैकेयी राघवेण महात्मना।उवाचेदं सुनिर्लज्जा धृष्टमात्महितं वचः।।।।
महात्मा राघव के ऐसा कहने पर कैकेयी ने—निर्लज्ज होकर—अपने ही हित के लिए ये धृष्ट वचन कहे।
Verse 20
न राजा कुपितो राम व्यसनं नास्य किञ्चन।किञ्चिन्मनोगतंत्वस्य त्वद्भयान्नाभिभाषते।।।।
हे राम! न राजा कुपित हैं, न उन्हें कोई विपत्ति आई है। परन्तु आपके भय से वे मन में जो बात है, उसे कह नहीं पाते।
Verse 21
प्रियं त्वामप्रियं वक्तुं वाणी नास्योपवर्तते।तदवश्यं त्वया कार्यं यदनेनाश्रुतं मम।।।।
आप उसे अत्यन्त प्रिय हैं, इसलिए उसकी वाणी आपको अप्रिय बात कहने को प्रवृत्त नहीं होती। अतः उसने जो बात मुझसे कही थी, उसे आपको अवश्य पूरा करना चाहिए।
Verse 22
एष मह्यं वरं दत्त्वा पुरा मामभिपूज्य च।स पश्चात्तप्यते राजा यथाऽन्यः प्राकृतस्तथा।।।।
इस राजा ने पहले मेरा सम्मान करके मुझे वर दिया था; अब वह बाद में पछताता है—जैसे कोई साधारण मनुष्य।
Verse 23
अतिसृज्य ददानीति वरं मम विशांपतिः।स निरर्थं गतजले सेतुं बन्धितुमिच्छति।।।।
‘मैं दे दूँगा’ कहकर मनुष्यों के स्वामी ने मुझे वर तो सहज ही दे दिया; अब वह व्यर्थ ही उस स्थान पर बाँध बाँधना चाहता है जहाँ से जल निकल चुका है।
Verse 24
धर्ममूलमिदं राम विदितं च सतामपि।तत्सत्यं न त्यजेद्राजा कुपितस्त्वत्कृते यथा।।।।
हे राम! यह धर्म का मूल है, जिसे सत्पुरुष भी जानते हैं—कि राजा आपके कारण क्रोधित हो जाए, तब भी वह उस सत्य को न छोड़े।
Verse 25
यदि तद्वक्ष्यते राजा शुभं वा यदि वाऽशुभम्।करिष्यसि ततस्सर्वमाख्यास्यामि पुनस्त्वहम्।।।।
यदि राजा जो कुछ कहें—शुभ हो या अशुभ—तुम उसे सब प्रकार से करोगे, तो उसके बाद मैं तुम्हें सब कुछ फिर से कह दूँगी।
Verse 26
यदि त्वभिहितं राज्ञा त्वयि तन्न विपत्स्यते।ततोऽहमभिधास्यामि न ह्येष त्वयि वक्ष्यति।।।।
यदि राजा ने तुमसे जो कहा है, उसका तुम उल्लंघन नहीं करोगे, तब मैं कहूँगी; क्योंकि वे स्वयं तुमसे यह नहीं कहेंगे।
Verse 27
एतत्तु वचनं श्रुत्वा कैकेय्या समुदाहृतम्।उवाच व्यथितो रामस्तां देवीं नृपसन्निधौ।।।।
कैकेयी के कहे हुए ये वचन सुनकर व्यथित राम ने राजा के सामने उस देवी-स्वरूपा रानी से कहा।
Verse 28
अहो धिङ्नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वचः।अहं हि वचनाद्राज्ञः पतेयमपि पावके।।।।भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं मज्जेयमपि चार्णवे।नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च।।।।
अहो, धिक्कार! हे देवि, तुम्हें मुझसे ऐसे वचन कहना शोभा नहीं देता। मैं तो राजा की आज्ञा से अग्नि में भी कूद पड़ूँ; तीक्ष्ण विष भी पी लूँ, समुद्र में भी डूब जाऊँ—क्योंकि वे मेरे पिता, गुरु-तुल्य, हितैषी नरेश हैं और उनके द्वारा नियुक्त हूँ।
Verse 29
अहो धिङ्नार्हसे देवि वक्तुं मामीदृशं वचः।अहं हि वचनाद्राज्ञः पतेयमपि पावके।।2.18.28।।भक्षयेयं विषं तीक्ष्णं मज्जेयमपि चार्णवे।नियुक्तो गुरुणा पित्रा नृपेण च हितेन च।।2.18.29।।
अहो, धिक्कार! हे देवि, तुम्हें मुझसे ऐसे वचन कहना शोभा नहीं देता। मैं तो राजा की आज्ञा से अग्नि में भी कूद पड़ूँ; तीक्ष्ण विष भी पी लूँ, समुद्र में भी डूब जाऊँ—क्योंकि वे मेरे पिता, गुरु-तुल्य, हितैषी नरेश हैं और उनके द्वारा नियुक्त हूँ।
Verse 30
तद्ब्रूहि वचनं देवि राज्ञो यदभिकाङ्क्षितम्।करिष्ये प्रतिजाने च रामो द्विर्नाभिभाषते।।।।
इसलिए, हे देवी, राजा जो चाहते हैं वह बात मुझे कहिए। मैं उसे करूँगा—मैं प्रतिज्ञा करता हूँ; राम दोहरी बात नहीं बोलता (वचन से नहीं फिरता)।
Verse 31
तमार्जवसमायुक्तमनार्या सत्यवादिनम्।उवाच रामं कैकेयी वचनं भृशदारुणम्।।।।
सीधेपन और सत्यवचन में स्थित राम से, अनार्या कैकेयी ने अत्यन्त कठोर वचन कहे।
Verse 32
पुरा दैवासुरे युद्धे पित्रा ते मम राघव।रक्षितेन वरौ दत्तौ सशल्येन महारणे।।।।
हे राघव, पहले देवासुर संग्राम के महान युद्ध में, जब तुम्हारे पिता घायल थे और मैंने उनकी रक्षा की थी, तब उस महायुद्ध में उन्होंने मुझे दो वर दिए थे।
Verse 33
तत्र मे याचितो राजा भरतस्याभिषेचनम्।गमनं दण्डकारण्ये तव चाद्यैव राघव।।।।
उसी के अनुसार मैंने राजा से भरत के अभिषेक की, और हे राघव, तुम्हारे आज ही दण्डकारण्य जाने की याचना की है।
Verse 34
यदि सत्यप्रतिज्ञं त्वं पितरं कर्तुमिच्छसि।आत्मानं च नरश्रेष्ठ मम वाक्यमिदं शृणु।।।।
यदि तुम अपने पिता को उनकी प्रतिज्ञा में सत्य करना चाहते हो—और स्वयं को भी, हे नरश्रेष्ठ—तो मेरी यह बात सुनो।
Verse 35
सन्निदेशे पितुस्तिष्ठ यथा तेन प्रतिश्रुतम्।त्वयाऽरण्यं प्रवेष्टव्यं नव वर्षाणि पञ्च च।।।।
पिता की आज्ञा के अनुसार दृढ़ रहो, जैसा उन्होंने वचन दिया है; तुम्हें नौ वर्ष और पाँच वर्ष—कुल चौदह वर्ष—वन में प्रवेश करना होगा।
Verse 36
भरतस्त्वभिषिच्येत यदेतदभिषेचनम्।त्वदर्थे विहितं राज्ञा तेन सर्वेण राघव।।।।
राजा ने तुम्हारे लिए जो यह समस्त अभिषेक-तैयारी कराई है, उसी से—हे राघव—भरत का अभिषेक हो।
Verse 37
सप्त सप्त च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः।अभिषेकमिमं त्यक्त्वा जटाजिनधरो वस।।।।
इस अभिषेक को त्यागकर दण्डकारण्य का आश्रय लो और जटा व मृगचर्म धारण करके सात और सात वर्ष—चौदह वर्ष—वहाँ वास करो।
Verse 38
भरतः कोसलपुरे प्रशास्तु वसुधामिमाम्।नानारत्न समाकीर्णां सवाजिरथकुञ्जराम्।।।।
“भरत कोसल-नगरी (अयोध्या) में रहकर इस वसुंधरा का शासन करें—जो नाना रत्नों से समाकीर्ण है और घोड़े, रथ तथा हाथियों से समृद्ध है।”
Verse 39
एतेन त्वां नरेन्द्रोऽयं कारुण्येन समाप्लुतः।शोकसंक्लिष्ट वदनो न शक्नोति निरीक्षितुम्।।।।
इसी कारण यह नरेन्द्र करुणा से आप्लावित हैं; शोक से क्लिष्ट मुख वाले वे आपको देखने का भी साहस नहीं कर पाते।
Verse 40
एतत्कुरु नरेन्द्रस्य वचनं रघुनन्दन।सत्येन महता राम तारयस्व नरेश्वरम्।।।।
हे रघुनन्दन! नरेन्द्र के इस वचन को पूरा करो। हे राम! अपने महान सत्यनिष्ठा से मनुष्यों के स्वामी राजा का उद्धार करो।
Verse 41
इतीव तस्यां परुषं वदन्त्यांन चैव रामः प्रविवेश शोकम्।प्रविव्यथे चापि महानुभावोराजा तु पुत्रव्यसनाभितप्तः।।।।
उसके ऐसे कठोर वचन कहते रहने पर भी राम शोक में नहीं डूबे; पर महानुभाव राजा, पुत्र-विपत्ति से दग्ध होकर, भीतर ही भीतर व्यथित हो उठे।
The sarga presents a dharma-sankat where Daśaratha’s prior promise (two boons) collides with the planned coronation; Rāma must choose whether vow-keeping and filial obedience override personal and political entitlement to kingship.
Truth is treated as dharma’s root: Rāma models maryādā by committing to fulfill the father’s word even under manipulation, illustrating that ethical legitimacy arises from self-governed restraint and fidelity to pledged speech.
Daṇḍakāraṇya is named as the exile destination, while Ayodhyā/Kosala is framed as the seat of royal consecration (abhiṣeka); ascetic markers—jaṭā and ajina—signal the cultural transition from courtly life to forest discipline.
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