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बालकाण्ड
The Book of Childhood
बालकाण्ड रामायण की स्थापत्य-भूमि है। यह काव्य के उद्गम (काव्य-जन्य) को रूप देता है, श्रीराम के धर्ममय व्यक्तित्व की स्थापना करता है, और वंश, यज्ञ तथा ब्रह्माण्डीय व्यवस्था की उन पूर्व-शर्तों को बताता है जिनसे आगे चलकर महाकाव्य का केंद्रीय संघर्ष जन्म लेता है। आरम्भ में वाल्मीकि का नारद से प्रश्न और उनसे प्राप्त “रामायण-कथा-संक्षेप” कथा की रूपरेखा को धर्म-दृष्टि सहित निश्चित करता है। फिर क्रौंच-पक्षियों के करुण प्रसंग से प्रथम श्लोक का प्राकट्य होता है—यह करुणा (करुणा-रस) पर आधारित काव्य-धर्म का उद्घोष है, जो रामायण को नैतिक-सौन्दर्य शिक्षण के रूप में प्रमाणित करता है। वाल्मीकि रचना को पूर्ण कर कुश-लव को सौंपते हैं, जिससे पाठ, गान, रस और स्वर-रचना सहित इसकी प्रदर्शन-परम्परा भी प्रतिष्ठित होती है। कथा-क्रम में अयोध्या का आदर्श राज्य और दशरथ का राजधर्म दिखाया जाता है, परन्तु उत्तराधिकारी के अभाव का संकट भी उभरता है। अश्वमेध और पुत्रेष्टि यज्ञ, ऋष्यशृंग की भूमिका, तथा दिव्य पायस-वितरण के द्वारा चारों राजकुमारों का जन्म होता है; श्रीराम को विष्णु के अंशावतार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकार धर्म-रक्षा हेतु दैवी योजना और राजवंशीय उत्तराधिकार का सूत्र एक साथ जुड़ता है। दूसरा प्रमुख प्रवाह विश्वामित्र की मांग से आरम्भ होता है। राम राजधर्म और तपो-शासन का समन्वय सीखते हैं, दिव्यास्त्रों की दीक्षा पाते हैं, और ताड़का-वध, मारीच-सुबाहु पर विजय तथा यज्ञ-रक्षा के द्वारा लोक-रक्षण का प्रथम महान कर्म करते हैं। साथ ही गंगा-अवतरण, सगर-पुत्रों की कथा और स्वयं विश्वामित्र के रूपान्तरण जैसे कारण-आख्यान चलते हैं, जो तप, वंश और धर्म-व्यवस्था की गहराई को स्पष्ट करते हैं। गौतम-आश्रम में अहल्या का उद्धार राम को शुद्धि और पुनर्स्थापन के दैवी साधन के रूप में उजागर करता है। मिथिला में जनक के यहाँ शिव-धनुष का प्रसंग, राम द्वारा उसका चढ़ाना और भंग करना, तथा सीता-स्वयंवर की सिद्धि काण्ड का शिखर है। इसके बाद चारों भाइयों के विवाह—राम-सीता, लक्ष्मण-ऊर्मिला, भरत-माण्डवी, शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति—राजनीतिक-सांस्कृतिक गठबंधनों को दृढ़ करते हैं। परशुराम से सामना एक अनुष्ठानिक-सांकेतिक क्षण बनता है, जहाँ राम की श्रेष्ठता से युद्ध-तेज और दैवी अधिकार का हस्तान्तरण सूचित होता है। IIT कानपुर द्वारा संरक्षित दक्षिणी पाठ-परम्परा में बालकाण्ड के कुछ अतिरिक्त पारम्परिक श्लोक और विस्तार भी मिलते हैं, जो यज्ञ-विधि, वंशावली और उपदेशात्मक ढाँचे को अधिक उभारते हैं। इस प्रकार बालकाण्ड 24,000 श्लोकों वाले आदिकाव्य की जीवित परम्परा में करुणा, धर्म, यज्ञ, तप और राज-नीति को एक सूत्र में बाँधकर रामकथा की आधार-रचना स्थापित करता है।
श्रीमद्रामायणकथासङ्क्षेपः / The Ramayana in Synopsis (Narada’s Summary to Valmiki)
यह प्रथम सर्ग भूमिका के रूप में सम्पूर्ण रामकथा का संक्षेप प्रस्तुत करता है। तप और स्वाध्याय में रत महर्षि वाल्मीकि नारद से पूछते हैं—क्या संसार में ऐसा आदर्श पुरुष है जो सत्यवादी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, वीर, करुणामय और सर्वगुणसम्पन्न हो? नारद उत्तर देते हैं कि इक्ष्वाकुवंश में श्रीराम ऐसे ही धर्मात्मा हैं, और फिर उनके चरित्र का क्रमबद्ध सार सुनाते हैं—राम के उत्तम गुण, दशरथ का युवराज्याभिषेक का निश्चय, कैकेयी के वरदानों से वनवास, तथा सीता और लक्ष्मण का साथ वनगमन। आगे दशरथ का देहान्त, भरत का राज्य स्वीकार न करना और पादुकाओं को राजचिह्न बनाकर शासन चलाना, दण्डकारण्य में ऋषियों की सेवा, विराध-वध, अगस्त्य से दिव्यास्त्र-प्राप्ति, शूर्पणखा प्रसंग और जनस्थान का संग्राम वर्णित है। फिर मारीच की युक्ति से रावण द्वारा सीताहरण, जटायु का वीरगति और अन्त्येष्टि, कबन्ध-वध तथा शबरी से भेंट, हनुमान के द्वारा सुग्रीव से मैत्री, वाली-वध और वानरों द्वारा सीता-खोज का प्रसंग आता है। हनुमान का समुद्र-लाँघकर लंका में सीता-दर्शन और लौटना, नल द्वारा सेतु-निर्माण, लंका-विजय, रावण-वध, अग्नि-परीक्षा, विभीषण का राज्याभिषेक, अयोध्या-प्रत्यावर्तन और रामराज्य की स्थापना—यह सब संक्षेप में कहा गया है। अंत में फलश्रुति के रूप में बताया गया है कि इस पवित्र रामायण का पाठ-श्रवण सभी वर्गों को विद्या, समृद्धि और पुण्य प्रदान करता है।
द्वितीयः सर्गः · श्लोकप्रादुर्भावः (The Manifestation of the Śloka)
नारद का यथोचित सत्कार करके उन्हें विदा करने के बाद वाल्मीकि गंगा के निकट तमसा नदी के तट पर स्नान हेतु जाते हैं। वहाँ शांत, पवित्र तीर्थ को देखकर वे अपने शिष्य भरद्वाज को उस स्थान की शुद्धता और शोभा बताते हैं। पास के वन में वे मधुर स्वर वाले क्रौंच पक्षियों के एक युगल को, जो सदा साथ रहने वाले हैं, देखते हैं। तभी पापबुद्धि और क्रूरता से प्रेरित एक निषाद शिकारी नर क्रौंच को मार देता है; मादा का करुण विलाप सुनकर वाल्मीकि का हृदय दया और रोष से भर उठता है। उसी क्षण उनके मुख से स्वतः छंदोबद्ध शापरूप वाणी निकलती है—जो प्रथम श्लोक के रूप में प्रसिद्ध होती है। वाल्मीकि उस वाणी के स्वरूप पर विचार करते हुए उसके चार पाद, समान अक्षर-गणना और लयात्मक माधुर्य का वर्णन करते हैं। आश्रम लौटकर वे उसी घटना में तल्लीन रहते हैं; तब ब्रह्मा प्रकट होकर श्लोक की पुष्टि करते हैं और इसी छंद में श्रीराम के समग्र चरित की रचना का आदेश देते हैं, साथ ही सत्यता तथा गुप्त घटनाओं का भी ज्ञान प्रदान करते हैं। ब्रह्मा रामायण की चिरस्थायी कीर्ति और वाल्मीकि की अमर प्रसिद्धि का वरदान देकर अंतर्धान हो जाते हैं। इसके बाद शिष्य बार-बार उस श्लोक का पाठ करते हैं और वाल्मीकि नव-प्रकट छंद में सम्पूर्ण महाकाव्य रचने का संकल्प करते हैं।
तृतीयः सर्गः (Bālakāṇḍa 3): Vālmīki’s Yogic Verification and the Epic Synopsis
नारदजी से श्रीरामकथा का सम्यक् वृत्तान्त सुनकर धर्मात्मा वाल्मीकि को और अधिक स्पष्टता की इच्छा हुई (१.३.१)। उन्होंने आचमन करके शुद्धि की, कुशासन पर बैठकर हाथ जोड़ तप और धर्म के द्वारा घटनाओं का यथार्थ अन्वेषण करने लगे (१.३.२)। तब योगदृष्टि से उन्होंने श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, दशरथ तथा अयोध्या-राज्य को प्रत्यक्ष-सा देख लिया—मानो हथेली पर आँवला हो (१.३.६); उनके वचन, हास, संकल्प और कर्मों के फल तक का सत्य स्वरूप जान लिया (१.३.३–१.३.५)। इस प्रकार सत्य का दर्शन कर वाल्मीकि ने निश्चय किया कि वे धर्म को प्रधान लक्ष्य बनाकर, काम और अर्थ को भी उचित स्थान देते हुए ऐसा महाकाव्य रचेंगे जो रत्नों से भरे समुद्र के समान और कान व मन को प्रिय हो (१.३.७–१.३.८)। आगे यह सर्ग रामायण की व्यापक रूपरेखा देता है—रामजन्म और गुण, वनवास, मित्रता-सहायता, लंका-प्रयाण, युद्ध, राज्याभिषेक, तथा उत्तरकाण्ड में वर्णित उत्तरवृत्तान्त (१.३.१०–१.३.३८); इस प्रकार यह अध्याय काव्य-विस्तार का आन्तरिक विषय-सूची भी बन जाता है।
कुशिलवगानप्रशंसा · The Commissioning and Public Performance of the Rāmāyaṇa
इस चौथे सर्ग में रामायण को रचित, शिक्षणीय और सार्वजनिक रूप से गेय-प्रवचनीय ‘इतिहास-काव्य’ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। दिव्य ऋषि वाल्मीकि श्रीराम के सम्पूर्ण चरित—राज्य-प्राप्ति तक—का संकलन करते हैं और ग्रंथ की प्रमाण-सीमा भी बताते हैं: चौबीस हजार श्लोक, छह काण्ड, तथा अतिरिक्त उत्तरकाण्ड। इसके बाद कवि विचार करते हैं कि इस काव्य का यथोचित गायन-पाठ कौन कर सकता है। तभी तपस्वी-वेश में कुश और लव आते हैं। वे धर्म-ज्ञाता राजकुमार के रूप में पहचाने जाते हैं और वाल्मीकि उन्हें दीक्षा देते हैं, ताकि यह काव्य ‘वेदों का उपबृंहण’ (वेदोपबृंहण) बने। उनके पाठ-गान का वर्णन संगीत-शास्त्रीय संकेतों सहित होता है—पाठ और गीत, तीन ताल-प्रमाण, सात स्वर, तंत्री-वाद्य के समय-नियम, तथा अनेक रस—जिससे रामायण एक बहु-माध्यम सांस्कृतिक कृति के रूप में प्रकट होती है। ऋषि-सभाओं और नगर-पथों में उनके गान से श्रोताओं की आँखें भर आती हैं, प्रशंसा होती है और दान दिए जाते हैं। आगे चलकर श्रीराम उनसे मिलते हैं, उन्हें राजभवन में आदरपूर्वक ठहराते हैं और राजसभा में विधिवत् प्रस्तुति का आग्रह करते हैं; वहाँ उनका गायन-पाठ ऐसा प्रभाव उत्पन्न करता है मानो अतीत की घटनाएँ वर्तमान में सजीव हो उठी हों।
अयोध्यानगरवर्णनम् (Description of Ayodhya and the Ikshvaku Royal Setting)
इस पंचम सर्ग में प्रजापति/मनु से आरम्भ होकर विजयी राजाओं की प्राचीन सार्वभौम परम्परा का वर्णन करते हुए उसे इक्ष्वाकु वंश से जोड़ा गया है और इसी पृष्ठभूमि में रामायण-कथा की प्रतिष्ठा स्थापित की जाती है। सरयू-तट पर स्थित कोसल देश का निर्देश करके मनु-निर्मित मानी जाने वाली अयोध्या को आदर्श राजधानी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अयोध्या योजनों में मापी हुई, सुव्यवस्थित राजमार्गों वाली, अनुशासित नागरिक-व्यवस्था से युक्त, समृद्ध और सौन्दर्यपूर्ण बताई गई है। परिखा-प्राकारों से सुरक्षित, द्वारों और बाजारों से शोभित, शिल्पियों और व्यापारियों से परिपूर्ण, प्रासादों तथा रत्नजटित भवनों से विभूषित, वाद्य-गीत के मधुर नाद, उद्यानों और आम्रवनों तथा अन्न-धन की प्रचुरता से सम्पन्न नगर का काव्यमय चित्र खींचा गया है। यहाँ धनुर्विद्या और वन-युद्ध में निपुण सहस्रों महारथी सन्नद्ध हैं; प्रजा वेद-वेदाङ्ग में पारंगत, यज्ञ-कर्म में तत्पर, दानशील और सत्यनिष्ठ है। ऐसे धर्ममय नगर-परिवेश में राजा दशरथ का निवास दिखाकर अयोध्या को धर्मयुक्त शासन की सजीव अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित किया गया है।
अयोध्यावर्णनम् · Description of Ayodhya under Daśaratha
इस षष्ठ सर्ग में पहले राजा दशरथ का राजधर्ममय स्वरूप वर्णित है। वे वेदविद्या में निपुण, सर्वसंग्रह (प्रशासन) में कुशल, दूरदर्शी, नगर और जनपद में प्रिय, रणकुशल, यज्ञपरायण तथा जितेन्द्रिय हैं; उनका शासन मनु के समान प्रजापालक और रक्षक कहा गया है। फिर अयोध्या की समृद्धि और शुचिता का चित्र आता है। नागरिक सुसज्जित, सम्पन्न और अन्न-धन से परिपूर्ण हैं; कहीं दैन्य का चिह्न नहीं। चोरी, क्रूरता, नास्तिकता, असत्य, अयोग्यता और सामाजिक अव्यवस्था का अभाव बताया गया है; दानशीलता, भोजन में संतोष और इन्द्रियनिग्रह सर्वत्र प्रतिष्ठित हैं। ब्राह्मण स्वधर्मनिष्ठ, वेदाङ्ग-विद, अध्ययन और दान में तत्पर तथा ग्रहण और गृहस्थ-जीवन में संयमी हैं। वर्ण-व्यवस्था सुव्यवस्थित है—क्षत्रिय ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं, वैश्य क्षत्रियों के अनुगामी हैं और शूद्र तीनों की सेवा करते हैं। अंत में अयोध्या की सैन्य-आर्थिक शक्ति—वीर योद्धा, प्रसिद्ध प्रदेशों के उत्तम घोड़े और श्रेष्ठ वंश के बलवान हाथी—वर्णित होकर नगर को सुदृढ़, अजेय और इन्द्रतुल्य राजा द्वारा शासित बताया गया है।
अमात्य-गुणवर्णनम् (The Virtues of Daśaratha’s Ministers and the Order of Governance)
इस सर्ग में राजा दशरथ के अधीन अयोध्या की शासन-व्यवस्था का संस्थागत चित्र प्रस्तुत है। पहले अमात्यों का स्वरूप बताया गया है—वे सदाचारी, मंत्र-ज्ञान में निपुण और इङ्गित-ज्ञान (मन की बात समझने) में कुशल हैं तथा राजा के प्रिय और हित—दोनों की ओर सदा प्रवृत्त रहते हैं। फिर उनके आठ होने और नाम—धृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, अशोक, मन्त्रपाल और सुमन्त्र—का उल्लेख है। इनके साथ परम आदरणीय राजपुरोहित वसिष्ठ और वामदेव भी हैं, जिससे नीति-प्रज्ञा और वैदिक-यज्ञाधिकार का समन्वय प्रकट होता है। मंत्री शिक्षित, संयमी, सत्यवादी, वचन और कर्म में एकरूप तथा समाज-व्यवहार में दक्ष बताए गए हैं; साथ ही वे कोष-वृद्धि और सेना-व्यवस्था में भी समर्थ हैं। दण्डनीति निष्पक्ष है—समय पर और उचित मात्रा में दण्ड होता है, अपने पुत्रों तक के लिए; पर निर्दोष को कष्ट नहीं दिया जाता, और ब्राह्मण-क्षत्रिय मन, वाणी, कर्म से पीड़ित नहीं किए जाते। फलतः नगर और राज्य में नैतिक-नागरिक शान्ति रहती है—न झूठ, न व्यभिचार, सर्वत्र संतोष और सुव्यवस्था। अंत में कहा गया है कि ऐसे अमात्य-परिवार के कारण दशरथ का यश और शासन-प्रभाव बढ़ता है—मंत्र-गोपन, संधि-विग्रह का विवेक, धर्म-नीति का ज्ञान और मधुर वाणी उनकी राजश्री के आधार हैं। गुप्तचर-व्यवस्था, धर्मनिष्ठा और अनुपम सार्वभौमत्व का भी विशेष उल्लेख है; राजा की दीप्ति उदय होते सूर्य के समान कही गई है।
अष्टमः सर्गः · Daśaratha Resolves on the Aśvamedha (Horse-Sacrifice) for Progeny
इस अष्टम सर्ग में धर्मज्ञ और प्रतापी राजा दशरथ पुत्रहीन होने के कारण चिंतित होते हैं। मंत्रियों से विचार-विमर्श कर वे शास्त्रसम्मत उपाय के रूप में अश्वमेध यज्ञ द्वारा पुत्र-प्राप्ति का निश्चय करते हैं और सुमंत्र को आदेश देते हैं कि आचार्यों तथा ऋत्विज ब्राह्मणों को बुलाया जाए। सुमंत्र वसिष्ठ सहित वेदवेत्ता सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि और काश्यप को ले आते हैं। राजा विनयपूर्वक निवेदन करते हैं कि पुत्राभाव से उन्हें दुःख है, अतः वे विधिपूर्वक अश्वमेध करना चाहते हैं; वे ब्राह्मणों से परामर्श और यज्ञ-प्रक्रिया का निर्देश मांगते हैं। ब्राह्मण इस संकल्प की प्रशंसा करते हैं, सामग्री-संग्रह और यज्ञाश्व के उत्सर्ग की आज्ञा देते हैं तथा आश्वासन देते हैं कि धर्मयुक्त संकल्प से इच्छित पुत्र अवश्य प्राप्त होंगे। राजा प्रसन्न होकर मंत्रियों को आज्ञा देते हैं कि सब सामग्री जुटाई जाए, सरयू के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि बनाई जाए और कल्पसूत्रानुसार प्रायश्चित्त व मंगलकर्म किए जाएँ। वे सावधान करते हैं कि श्रेष्ठ यज्ञ निर्दोष होना चाहिए; विद्वान ब्रह्मराक्षस यज्ञ में ‘छिद्र’ खोजते हैं और दोषयुक्त कर्म यजमान का नाश कर देता है—इसलिए सब व्यवस्था शास्त्रानुसार कुशल जनों से कराई जाए। अंत में वे रानियों को दीक्षा ग्रहण करने का आदेश देते हैं; यह सुनकर उनके मुख प्रसन्न हो उठते हैं।
ऋश्यशृङ्गानयनकथा · The Account of Bringing Ṛśyaśṛṅga (and the Remedy for Drought)
इस नवम सर्ग में सुमंत्र सूत एकांत में महाराज दशरथ को बताता है कि उसने पुरातन दृष्टांत सुना है, जो ब्राह्मण-उपदेश की परंपरा से चला आया है। यह प्रसंग सनत्कुमार के पूर्व उपदेश से जुड़ा माना गया है, जिसमें ऋषियों के बीच राजवंश-वृद्धि का उपाय कहा गया था। उसी में विभाण्डक के आश्रम में ऋश्यशृंग का एकांत पालन-पोषण, कठोर ब्रह्मचर्य, नियम और यज्ञ-सेवा का वर्णन आता है। उधर अङ्गदेश में राजा रोमपाद के आचार-भंग से घोर अनावृष्टि और दुर्भिक्ष पड़ता है। वह विद्वान ब्राह्मणों से प्रायश्चित्त और नियम-पालन का उपाय पूछता है। ब्राह्मण कहते हैं—ऋश्यशृंग को आदरपूर्वक बुलाओ और विधिपूर्वक शान्ता का विवाह उन्हें अर्पित करो; तब वर्षा होगी और संतान-लाभ भी होगा। मंत्री पहले ऋषि के तपोबल से भयभीत होकर दोष-भय से शर्तें सोचते हैं, फिर व्यवहार्य उपाय सुझाते हैं। अंततः गणिकाएँ मध्यस्थ बनकर ऋश्यशृंग को लाती हैं; उनके आगमन से वर्षा लौट आती है, शान्ता का विवाह होता है और ऋषि प्रजा तथा वंश-वृद्धि के कारण बनते हैं। यह सुनकर दशरथ प्रसन्न होकर सुमंत्र से आग्रह करते हैं कि ऋश्यशृंग को लाने की विधि विस्तार से सुनाओ, क्योंकि यह दृष्टांत उनके अपने वंश-लक्ष्य से भी जुड़ता है।
ऋश्यशृङ्ग-आनयनम् (Bringing Ṛśyaśṛṅga to Aṅga and His Marriage to Śāntā)
राजा दशरथ के पूछने पर, मंत्रियों की सभा में सुमंत्र पूर्वकथा सुनाते हैं कि किस प्रकार ऋष्यशृंग को रोमपाद के राज्य में लाया गया। रोमपाद के पुरोहित और मंत्री एक ‘निरपाय’ (जोखिम-न्यून) उपाय बताते हैं—वन में पले, स्त्री और नगर-सुख से अनजान तपस्वी को सुशोभित गणिकाओं द्वारा आकर्षित किया जाए। वे विभाण्डक के आश्रम के निकट वन में जाकर अवसर की प्रतीक्षा करती हैं। संयोग से ऋष्यशृंग उनसे मिलते हैं। वे उनका परिचय पूछती हैं; ऋष्यशृंग स्वयं को विभाण्डक का पुत्र बताते हैं और अर्घ्य, पाद्य, मूल-फल आदि से विधिपूर्वक अतिथि-सत्कार करते हैं। पिता के लौट आने के भय से वे स्त्रियाँ लौट जाती हैं, पर मिठाइयाँ और भोजन छोड़ जाती हैं; ऋष्यशृंग उन्हें ‘फल’ समझ लेते हैं—उनकी निष्कपटता और नवीन इंद्रिय-सुख की आकर्षण-शक्ति प्रकट होती है। अगले दिन वे फिर उसी स्थान पर आते हैं। स्त्रियाँ उन्हें अपने ‘आश्रम-पद’ का निमंत्रण देकर धीरे-धीरे अङ्गदेश की ओर ले जाती हैं। उनके आगमन पर पर्जन्य वर्षा करता है—कल्याण का संकेत। रोमपाद दंडवत् प्रणाम कर पूजन-उपहारों से उनका स्वागत करता है, विभाण्डक के क्रोध की आशंका से क्षमा-प्रसाद चाहता है, और अंत में अपनी पुत्री शान्ता का विधिवत् विवाह ऋष्यशृंग से कर देता है। इस सर्ग में तपः-प्रभाव, राज-नीति और लोक-कल्याण (वृष्टि-समृद्धि) का गूढ़ संबंध दिखाया गया है।
ऋष्यशृङ्गानयनम् · Bringing Ṛśyaśṛṅga to Ayodhyā (Bālakāṇḍa, Sarga 11)
इस सर्ग में सुमंत्र अपनी राजसभा-प्रसंग की कथा को आगे बढ़ाते हुए सनत्कुमार के प्राचीन उपदेश को प्रमाण रूप में स्मरण कराते हैं। इसमें दशरथ के धर्मनिष्ठ स्वरूप तथा अङ्गदेश के वंश से—रोमपाद और शान्ता के माध्यम से—रणनीतिक मैत्री-संबंध का संकेत मिलता है। फिर भविष्यवाणी से कर्म की ओर प्रवृत्ति होती है—दशरथ वसिष्ठ से परामर्श कर उनकी अनुमति लेकर रानियों और मंत्रियों सहित रोमपाद के देश जाते हैं; वन-नदियाँ पार कर तपोदीप्त ऋष्यशृङ्ग का दर्शन करते हैं। रोमपाद मित्रता के आधार पर विशेष आतिथ्य से दशरथ का सम्मान करते हैं; परस्पर संबंध सुनकर ऋष्यशृङ्ग भी यथोचित सत्कार करते हैं। एक सप्ताह ठहरकर दशरथ संतान-प्राप्ति और धर्मलाभ हेतु होने वाले महायज्ञ (पुत्रेष्टि) के लिए शान्ता और उनके पति को अयोध्या चलने का अनुरोध करते हैं; रोमपाद सहर्ष स्वीकार करते हैं और शान्ता सहित ऋष्यशृङ्ग प्रस्थान करते हैं। दशरथ लौटकर शीघ्र दूत भेजते हैं; सजी हुई अयोध्या में शंख-नगाड़ों के साथ प्रवेश करते हुए ब्राह्मणों को अग्रस्थान देते हैं। अंतःपुर में शास्त्रोक्त आतिथ्य होता है और शान्ता के आगमन से राजमहिलाएँ आनंदित होती हैं—इस प्रकार यह अध्याय सफल राजधर्म-राजनीतिक व्यवस्था के साथ पुत्रेष्टि-यज्ञ और चार पुत्रों के जन्म की दिशा का आरंभ कर देता है।
द्वादशः सर्गः · Aśvamedha-saṅkalpa (Daśaratha resolves on the Horse Sacrifice)
इस द्वादश सर्ग में अयोध्या-नरेश दशरथ वंश-परंपरा की निरंतरता और पुत्रहीनता के शोक से प्रेरित होकर अश्वमेध यज्ञ करने का विधिवत् संकल्प करते हैं। वसंत ऋतु में वे शास्त्रानुसार यज्ञ-आचरण का निश्चय प्रकट करते हैं और कहते हैं कि ऋष्यशृंग के तपोबल-प्रभाव से यज्ञ का फल अवश्य सिद्ध होगा। तत्पश्चात् वे सुमंत्र को आज्ञा देते हैं कि वसिष्ठ, सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, काश्यप आदि प्रधान ऋत्विजों और विद्वान ब्राह्मणों को बुलाया जाए। सभा में आए पुरोहित “साधु” कहकर निर्णय का अनुमोदन करते हैं, यज्ञ-सामग्री के संग्रह तथा यज्ञाश्व के विधिपूर्वक विमोचन का निर्देश देते हैं और राजा की धर्ममयी बुद्धि के फलस्वरूप महान पराक्रमी चार पुत्रों की प्राप्ति का आश्वासन देते हैं। फिर सरयू के उत्तरी तट पर यज्ञभूमि निश्चित कर शांति-कर्म और कल्प-विधि के अनुसार सब व्यवस्था करने का आदेश होता है। साथ ही चेतावनी दी जाती है कि ब्रह्मराक्षस यज्ञ में ‘छिद्र’ खोजते हैं; यदि यज्ञ दूषित हो जाए तो यजमान के लिए भी अनिष्टकारी होता है। अंत में मंत्री आदेशों का पालन करने लगते हैं, ब्राह्मण अपने-अपने स्थान को लौटते हैं और राजा अंतःपुर में प्रवेश करते हैं—संकल्प से कार्यान्वयन की ओर कथा बढ़ती है।
हयमेध-यज्ञोपक्रमः · Commencement of the Aśvamedha Preparations
एक वर्ष पूर्ण होने पर वसन्त के पुनः आगमन के साथ राजा दशरथ पुत्र-प्राप्ति हेतु अश्वमेध यज्ञ की तैयारी आरम्भ करने के लिए यज्ञ-परिसर में प्रवेश करते हैं। वसिष्ठ यज्ञ के अधीक्षक बनकर विधि-नियम बताते हैं—वेदज्ञ ब्राह्मणों के साथ-साथ कुशल कर्मियों को भी बुलाया जाए: स्थापत्य-विशेषज्ञ, ईंट बनाने वाले, बढ़ई, खोदने वाले, शिल्पी, लेखाकार तथा नट-गायक आदि, ताकि यज्ञ की समस्त व्यवस्था सुचारु हो। वसिष्ठ विशेष रूप से अतिथि-सत्कार और किसी का तिरस्कार न करने पर बल देते हैं। ब्राह्मणों तथा नगर-जनपद से आने वाले अतिथियों के लिए पर्याप्त निवास-स्थान तैयार हों; आचार के अनुसार भोजन, पेय, सम्मान और मनोरंजन दिया जाए; सभी वर्णों और यज्ञ-कर्म में लगे श्रमिकों तक को आदर मिले। वे चेतावनी देते हैं कि अवमानना के साथ दिया गया दान दाता के लिए हानिकारक होता है। फिर वे सुमंत्र को आदेश देते हैं कि धर्मपरायण राजाओं को चारों दिशाओं से आमंत्रित करें—मिथिला के जनक, काशी के राजा, केकय-नरेश, अंग के रोमपाद तथा पूर्व, दक्षिण, सिन्धु-सौवीर और सौराष्ट्र आदि के शासक। दूत भेजे जाते हैं; राजा उपहारों सहित आते हैं; वसिष्ठ सफल आतिथ्य और पूर्ण तैयारी की सूचना देते हैं। शुभ दिन दशरथ यज्ञ-स्थल पर जाते हैं और वसिष्ठ-प्रधान ब्राह्मणसभा, ऋष्यशृंग के अग्रणी होने पर, शास्त्र-विधि के अनुसार यज्ञकर्म का विधिवत आरम्भ करती है।
अश्वमेधप्रवृत्तिः · Commencement and Performance of Daśaratha’s Aśvamedha
इस सर्ग में सरयू के उत्तरी तट पर एक वर्ष पूर्ण कर लौटे यज्ञाश्व के साथ दशरथ के अश्वमेध का विधिवत् संचालन वर्णित है। ऋष्यशृंग के नेतृत्व में वेदपारंगत ऋत्विजों ने बिना किसी त्रुटि के सवन, प्रवर्ग्य, उपसद और क्रमबद्ध आहुतियाँ सम्पन्न कीं। यज्ञ के साथ लोककल्याण का भाव भी प्रकट होता है—ब्राह्मणों, तपस्वियों, संन्यासियों, आश्रितों, स्त्रियों, बच्चों, वृद्धों और रोगियों तक को अन्न-जल का प्रचुर वितरण कर राजा की उदारता और समावेशी यज्ञ-व्यवस्था दिखाई गई है। इसके बाद यज्ञ-निर्माण की विधियाँ आती हैं—बिल्व, खदिर, पर्णिन, श्लेष्मातक और देवदारु की लकड़ियों से अनेक यूप खड़े किए जाते हैं, उन पर स्वर्णालंकार होता है और माप-नियम निश्चित किए जाते हैं। ईंटों से गरुड़ाकार, स्वर्णपक्ष-सदृश अग्निवेदि बनाई जाती है, जिसमें अठारह अग्निकुण्ड होते हैं। शास्त्रानुसार पशु, पक्षी, सर्प और जलचर आदि की व्यवस्था होती है; कौसल्या यज्ञाश्व के चारों ओर नियत कर्म करती हैं और ऋत्विज मंत्रोच्चार के साथ आहुतियाँ पूर्ण करते हैं। समापन पर राजा दक्षिणा में पृथ्वी दान करना चाहते हैं, पर ऋत्विज शासन स्वीकार नहीं करते और द्रव्य-दान की याचना करते हैं। तब दशरथ अपार धन और सम्मान प्रदान करते हैं; ऋष्यशृंग उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं, जिससे रामकथा की वंश-परम्परा और दैवी योजना आगे बढ़ती है।
पञ्चदशः सर्गः · देवकृत-प्रार्थना, रावणवधोपायः, विष्णोः मानुषावतारनियोजनम् (Sarga 15: The Devas’ Petition, the Means to Slay Ravana, and Vishnu’s Commission to Incarnate as Man)
ऋष्यशृंग ने विचार करके दशरथ से कहा कि वे अथर्वशिर मंत्रों के अनुसार विधिपूर्वक पुत्रीयेष्टि यज्ञ करेंगे। तत्पश्चात उन्होंने अग्नि में आहुतियाँ देकर यज्ञ आरम्भ किया; देवता तथा गन्धर्व, यक्ष आदि सभी अपने-अपने यज्ञभाग ग्रहण करने के लिए वहाँ एकत्र हुए। उधर देवसभा में देवताओं ने ब्रह्मा से निवेदन किया कि ब्रह्मा के वर से बलवान रावण तीनों लोकों को पीड़ित कर रहा है और इन्द्र पर भी आक्रमण का साहस करता है; वह ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, असुरों और ब्राह्मणों का अपमान कर मर्यादा लाँघता है। ब्रह्मा ने वरदान की वह शर्त स्मरण कराई कि रावण ने मनुष्यों को तुच्छ समझकर उनसे अभेद्यता नहीं माँगी थी; इसलिए उसका वध केवल मनुष्य के द्वारा ही संभव है। तभी विष्णु पधारे और स्तुतियों से पूजित हुए। देवताओं ने प्रार्थना की कि वे अपने को चार भागों में विभक्त कर दशरथ की तीन रानियों से पुत्ररूप में जन्म लें और मानवरूप धारण करके लोककण्टक रावण का उसके सहायकों सहित संहार करें। विष्णु ने आश्वासन दिया—भय त्यागो; मैं रावण और उसके पक्षधरों का विनाश कर धर्मपूर्वक मनुष्यलोक में निवास करूँगा—और अवतार के लिए दशरथ को पिता स्वीकार करने का निश्चय किया।
पायसप्रादुर्भावः · The Manifestation of the Divine Payasa and the Avatara Resolution
इस सर्ग में दैवी योजना और यज्ञकर्म का सुंदर संयोग दिखाया गया है। सर्वज्ञ होते हुए भी नारायण विष्णु देवताओं से रावण-वध का उपाय कहते हैं—ब्रह्मा के वरदान से रावण देव-गंधर्व-यक्ष आदि से अवध्य है, पर मनुष्यों से नहीं; इसलिए देवता विष्णु से मनुष्य-रूप धारण करने की प्रार्थना करते हैं। विष्णु दशरथ को पिता के रूप में चुनते हैं और उनके पुत्रीयेष्टि यज्ञ के साथ अपने अवतार-संकल्प को जोड़ देते हैं। यज्ञाग्नि से तेजस्वी प्राजापत्य पुरुष प्रकट होता है। वह स्वर्ण पात्र और रजत ढक्कन सहित दिव्य पायस लाकर देता है, जिसे पुत्र-प्रद, श्री-वर्धक और आरोग्य-कर कहा गया है। दशरथ श्रद्धापूर्वक उसे ग्रहण कर उस दिव्य पुरुष की प्रदक्षिणा करते हैं और पायस का नियत भाग कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को बाँट देते हैं। पायस सेवन के बाद रानियाँ शीघ्र गर्भवती होती हैं। पुत्र-प्राप्ति से राजा का शोक दूर होकर हर्ष लौट आता है, जिसकी उपमा स्वर्ग में पूजित विष्णु के आनंद से दी गई है; इस प्रकार यज्ञ की सिद्धि ही अवतार की मानवीय जन्म-परंपरा का तत्काल कारण बनती है।
सप्तदशः सर्गः · देवसंवादः तथा वानर-ऋक्ष-उत्पत्तिः (Divine Council and the Generation of Vanara Allies)
इस सत्रहवें सर्ग में महाकाव्य की रणनीतिक कारण-श्रृंखला स्पष्ट होती है। जब विष्णु दशरथ के पुत्र रूप में अवतार लेने का निश्चय करते हैं, तब ब्रह्मा समस्त देवों को संबोधित कर आदेश देते हैं कि वे राम/विष्णु की सहायता हेतु ऐसे शक्तिशाली साथी उत्पन्न करें जिनमें कामरूपता, अद्भुत वेग, बुद्धि और युद्ध-कौशल हो। इसके बाद वानर-नेताओं की दिव्य उत्पत्ति का वर्णन आता है—इन्द्र से वालि, सूर्य से सुग्रीव, वायु से हनुमान, अग्नि से नील, विश्वकर्मा से नल, बृहस्पति से तारा, वरुण से सुषेण, पर्जन्य से शरभ तथा अश्विनीकुमारों से मैन्द और द्विविद। ब्रह्मा जाम्बवान की पूर्व-सृष्टि भी बताते हैं—जंभाई के समय ब्रह्मा के मुख से उनका प्राकट्य हुआ, जो प्राचीन सृष्टि-प्रसंग का संकेत है। आगे देव, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष, नाग, सिद्ध, विद्याधर आदि अप्सराओं, नागकन्याओं और गन्धर्वियों के द्वारा असंख्य वनवासी वानर-ऋक्ष-सेनाएँ उत्पन्न करते हैं। ये सहायक शिला-वृक्षों को आयुध बनाते, नख-दन्तों से प्रहार करते, पर्वत हिला देने वाला बल रखते और समुद्र लाँघने जैसा वेग धारण करते हैं; तथा वालि को भालुओं, गोपुच्छ-वानरों और कपियों का रक्षक ठहराया जाता है। सर्ग स्पष्ट करता है कि यह समस्त सृष्टि आगे चलकर दाशग्रीव रावण के विरुद्ध राम की सहायता के लिए ही है।
पुत्रजन्मोत्सवः · Birth of the Princes and Viśvāmitra’s Arrival (Bālakāṇḍa 18)
दशरथ के महान यज्ञों के पूर्ण होने पर देवताओं ने अपना-अपना हवि-भाग ग्रहण किया और अपने धामों को लौट गए। राजा ने दीक्षा-विधानों का सम्यक् पालन करके रानियों, अमात्यों और सेना सहित पुनः अयोध्या में प्रवेश किया। आए हुए राजाओं को सम्मानपूर्वक विदा किया गया; ऋष्यशृंग शांता सहित रोमपाद के साथ अपने देश लौट गए। छः ऋतुओं का एक चक्र पूर्ण होने पर श्रीराम-जन्म का शुभ काल विस्तार से बताया गया—चैत्र मास, शुक्ल पक्ष की नवमी, पुनर्वसु नक्षत्र (अदिति-दैवत), पाँच ग्रह उच्च के, और कर्क लग्न। कौसल्या ने विष्णु-अंश श्रीराम को जन्म दिया। कैकेयी ने विष्णु के चतुर्थांश भरत को, और सुमित्रा ने लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न—विष्णु-अंशों—को जन्म दिया; भरत के लिए पुष्य/मीन लग्न तथा जुड़वाँ पुत्रों के लिए आश्लेषा/कर्क लग्न का उल्लेख है। अयोध्या में उत्सव छा गया—गंधर्वों का गान, अप्सराओं का नृत्य, दिव्य दुंदुभियों का निनाद और पुष्प-वर्षा। राजा ने प्रचुर दान दिए और वसिष्ठ से नामकरण आदि संस्कार कराए। चारों कुमारों की वेदविद्या, शौर्य, प्रजाहित-चिंतन और धनुर्विद्या का वर्णन है; विशेषतः लक्ष्मण का राम के प्रति प्राण-सम अनुराग और शत्रुघ्न का भरत के प्रति दृढ़ स्नेह बताया गया है। इसी बीच दशरथ जब पुत्रों के विवाह का विचार करने लगे, तब महर्षि विश्वामित्र अयोध्या पधारे। राजा ने विधिपूर्वक उनका स्वागत कर अर्घ्यादि से सत्कार किया; विश्वामित्र ने राज्य-कुशल पूछा। दशरथ ने विस्तृत आतिथ्य कर सेवा का वचन दिया, जिससे तपस्वी मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए।
विश्वामित्रस्य यज्ञरक्षा-याचना (Visvamitra Requests Rama for Yajna-Protection)
यह सर्ग राजसभा में हुए तर्कपूर्ण संवाद का वर्णन करता है। विश्वामित्र दशरथ के विनम्र वचनों का उत्तर देकर यज्ञ में उपस्थित संकट प्रकट करते हैं—रूप बदलने वाले राक्षस मारीच और सुबाहु यज्ञ की समाप्ति के निकट वेदी पर मांस और रक्त की वर्षा करके अनुष्ठान को विफल कर देते हैं। यज्ञ-नियमों से बँधे मुनि क्रोधवश शाप नहीं देते; वे धर्मसम्मत उपाय के रूप में राजसहायता चाहते हैं। वे दशरथ से निवेदन करते हैं कि अपने ज्येष्ठ पुत्र, पराक्रमी और सत्यप्रतापी राम को केवल दस रात्रियों के लिए यज्ञ-रक्षा हेतु सौंप दें, ताकि नियत समय पर यज्ञ पूर्ण हो सके। विश्वामित्र आश्वासन देते हैं कि उनके संरक्षण और राम के दिव्य तेज के सामने वे राक्षस टिक नहीं पाएँगे; वे राम को ऐसे आशीर्वाद देंगे जिससे तीनों लोकों में उनकी कीर्ति फैलेगी। साथ ही वे विधि बताते हैं कि वसिष्ठ-प्रमुख ऋषियों और मंत्रियों की सम्मति से ही राम को भेजा जाए। सर्ग के अंत में दशरथ पुत्र-स्नेह और राजधर्म के बीच फँसकर भयभीत, शोकाकुल और व्याकुल हो उठते हैं; उनके शरीर की कंपकंपी और मन की पीड़ा इस तनाव को तीव्र रूप से प्रकट करती है।
राज्ञः शङ्का-प्रत्याख्यानम् (Daśaratha’s Objections to Sending Rāma): Bala Kanda, Sarga 20
विश्वामित्र की याचना सुनकर राजा दशरथ क्षणभर के लिए धैर्य खो बैठते हैं। वे पिता-धर्म और राज्य-नीति का आधार लेकर कहते हैं—राम अभी सोलह वर्ष के भी नहीं, माया-छल से लड़ने वाले राक्षसों के विरुद्ध युद्ध-कौशल में पूर्णतः प्रशिक्षित नहीं; और मैं उनके वियोग को सह नहीं सकता। वे विकल्प देते हैं—अपनी पूरी अक्षौहिणी सेना, अनुभवी वीर, यहाँ तक कि स्वयं भी साथ चलने को तैयार हैं; पर राजकुमार को ले जाना अनुचित है, ऐसा वे बार-बार कहते हैं। दशरथ अपनी वृद्धावस्था और कठिन तप-प्रार्थनाओं से प्राप्त राम की दुर्लभता का स्मरण कराकर भावनात्मक और वंशगत दाँव को और गहरा करते हैं। फिर वे राक्षसों की शक्ति, कुल, आकार, रक्षक तथा उचित प्रतिकार-नीति का विस्तृत विवरण माँगते हैं। विश्वामित्र उत्तर में पुलस्त्य-वंश का प्रसंग रखकर बताते हैं कि ब्रह्मा के वर से समर्थ रावण तीनों लोकों को पीड़ित करता है; वह स्वयं यज्ञ में सीधे विघ्न नहीं डालता, पर मारीच और सुबाहु को उकसाकर विघ्न कराता है। अंत में मुनि का क्रोध घृताहुति से प्रज्वलित यज्ञाग्नि के समान बढ़ उठता है—तपःसमर्थ धर्म की अवहेलना के नैतिक और राजनीतिक परिणाम तुरंत होते हैं, यह संकेत देकर।
बालकाण्डे एकविंशः सर्गः · Daśaratha’s Promise, Vasiṣṭha’s Counsel, and Viśvāmitra’s Weapon-Lore
इस सर्ग में राजधर्म के मूल—प्रतिज्ञा-पालन—पर तीव्र धर्म-विचार होता है। स्नेहवश दशरथ भीतर से द्वंद्व में पड़कर राम को न भेजने की विनती करते हैं; इससे विश्वामित्र क्रोधित हो उठते हैं और प्रतिज्ञा-भंग की गंभीरता को सूचित करने वाले लोक-कंपन जैसे संकेत प्रकट होते हैं। तब वसिष्ठ धर्म-न्याय के स्थिरकर्ता बनकर हस्तक्षेप करते हैं। वे दशरथ को इक्ष्वाकु वंश का आदर्श बताकर समझाते हैं कि दिया हुआ वचन छोड़ने से पूर्व यज्ञों और दानों का पुण्य नष्ट हो जाता है; सत्य-पालन ही राजा की मर्यादा और लोक-विश्वास का आधार है। इसके बाद प्रसंग विश्वामित्र की रक्षण-शक्ति और अस्त्र-विद्या की महिमा पर आता है। उन्हें धर्मात्मा, पराक्रम और बुद्धि में अनुपम तथा तीनों लोकों में अस्त्रों के अद्वितीय ज्ञाता कहा जाता है। भृशाश्व के पुण्यशील पुत्रों तथा दक्ष की पुत्रियाँ जया और सुप्रभा द्वारा उत्पन्न सौ तेजस्वी अस्त्र-स्वरूपों की वंशकथा कही जाती है; विश्वामित्र उन सबको यथार्थ रूप से जानते हैं और नए अस्त्र भी उत्पन्न कर सकते हैं। अंत में दशरथ संयमपूर्वक सहमति देते हैं और पुत्र-कल्याण तथा राज-प्रतिष्ठा की रक्षा हेतु राम को विश्वामित्र के साथ जाने की आज्ञा प्रदान करते हैं।
बलातिबलोपदेशः · The Instruction of Bala and Atibala
इस सर्ग में राजकीय संरक्षण का विधिपूर्वक तपस्वी-रक्षण में रूपान्तरण और राम को मंत्र-विद्या का प्रथम स्पष्ट उपदेश वर्णित है। वसिष्ठ की सम्मति के बाद दशरथ ने लक्ष्मण सहित राम को बुलाया और माता-पिता तथा राजपुरोहित द्वारा किए गए स्वस्त्ययन आदि मंगलकर्मों के साथ उन्हें विश्वामित्र के संरक्षण में सौंप दिया। प्रस्थान के समय पराग-रहित मंद पवन, पुष्प-वृष्टि तथा दिव्य दुंदुभि-शंखनाद जैसे शुभ संकेतों से यह यात्रा देवसम्मत और विधिसिद्ध प्रतीत होती है। विश्वामित्र आगे-आगे चले और दोनों भ्राता धनुषधारी, तेजस्वी होकर पीछे-पीछे अनुयायी बने। उन्हें बहुफण नागों के समान तथा शिव के पीछे चलने वाले स्कन्द-विशाख के समान उच्च उपमानों से वर्णित किया गया है, जिससे आध्यात्मिक अनुशासन के अधीन उनकी युद्ध-तत्परता प्रकट होती है। सarayū के दक्षिण तट पर आधे योजन से अधिक चलकर मुनि ने राम को जल लेकर आचमन-वत् शुद्धि करने को कहा और ‘बला’ तथा ‘अतिबला’ नामक युग्म विद्याएँ/मंत्र प्रदान किए। इनके फल बताए गए—थकान, ज्वर और देह-क्षय का अभाव; निद्रा या असावधानी में भी राक्षसों से अभेद्य रक्षा; तथा जप से भूख-प्यास का शमन। राम ने शुद्ध होकर विद्याएँ ग्रहण कीं और शरद्-सूर्य के समान अधिक दीप्तिमान हो उठे। फिर तीनों सरयू-तट पर कुश-शय्या बिछाकर रात्रि-विश्राम करते हैं; मुनि के सौम्य वचनों और गुरु-शिष्य सेवा-धर्म से यह विश्राम पवित्र रूप लेता है।
कामाश्रम-प्रवेशः / Entry into Kāma’s Hermitage at the Sarayū-Gaṅgā Confluence
प्रातःकाल विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को जगाकर संध्या-वंदन तथा नित्यकर्म पूर्ण करने का आदेश देते हैं। स्नान, तर्पण और जप करके दोनों राजकुमार विनयपूर्वक यात्रा के लिए तैयार हो जाते हैं। आगे बढ़ते हुए वे सरयू और दिव्य त्रिस्रोतसी गंगा के पावन संगम को देखते हैं और वहीं एक प्राचीन आश्रम भी देखते हैं, जहाँ दीर्घकाल से तपस्वी मुनि सहस्रों वर्षों तक कठोर तप करते रहे हैं। जिज्ञासु होकर दोनों भाई पूछते हैं कि यह किसका आश्रम है। विश्वामित्र बताते हैं कि यह स्थान कंदर्प/काम से जुड़ा है। एक बार शिव के घोर ध्यान में काम ने विघ्न डाला; क्रुद्ध शिव की दृष्टि-अग्नि से काम भस्म होकर अशरीरी हो गया, इसलिए वह ‘अनंग’ कहलाया और यह प्रदेश भी अनंग-संबंध से प्रसिद्ध हुआ। फिर वे पवित्र नदियों के बीच उसी आश्रम में रात्रि-विश्राम करते हैं। तपोबल से उन्हें पहचानकर आश्रमवासी मुनि अर्घ्य-पाद्य आदि से सत्कार करते हैं; सायं-संध्या विधिपूर्वक होती है। विश्वामित्र अनुशासन, तीर्थ-भूगोल और मर्यादा-भंग करने वाली कामना के नैतिक परिणामों पर उपदेशात्मक कथाएँ सुनाकर राजकुमारों को प्रसन्न करते हैं।
गङ्गा-सरयू-सङ्गमः, मलद-करूश-देशकथा, ताटकावनप्रवेशोपदेशः (The Confluence of Gaṅgā and Sarayū; the Tale of Malada-Karūśa; Counsel on Tātakā’s Forest)
उज्ज्वल प्रभात में राम और लक्ष्मण अपने नित्यकर्म पूर्ण कर विश्वामित्र के साथ नदी-तट पर पहुँचे। तपस्वियों ने शुभ नौका दी; सबने गंगा पार की। बीच धारा में एक प्रचण्ड निनाद सुनकर राम ने कारण पूछा। विश्वामित्र ने बताया कि जहाँ गंगा सरयू के निकट संगम करती है, वहाँ जल का यह गर्जन-सा शब्द उठता है; अतः एकाग्र होकर दोनों नदियों को नमस्कार करो। दोनों भाइयों ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और दक्षिण तट पर उतर आए। आगे एक अनछुआ, भयावह वन दिखा—घने वृक्ष, अशुभ पशु-पक्षियों की ध्वनियाँ और आतंक का वातावरण। राम के पूछने पर विश्वामित्र ने उस प्रदेश का पूर्व वैभव सुनाया—मलद और करूश—जो मानो दिव्य शिल्पियों द्वारा रचा गया था। वृत्र-वध के प्रसंग के बाद इन्द्र की शुद्धि होने पर इस भूमि को वर मिला और वही नाम प्रसिद्ध हुए। कालांतर में मारीच की माता, रूप बदलने वाली भयंकर यक्षी ताटका ने उस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया, प्रजा को सताने लगी और मार्ग रोक दिया। तब विश्वामित्र ने राम को आदेश दिया कि तपस्वी की आज्ञा से यह धर्मकार्य है—अपने पराक्रम से इस ‘काँटे’ को हटाकर देश को निर्भय करो।
ताटकावृत्तान्तः · The Account of Tāṭakā and the Royal Duty to Protect
इस पच्चीसवें सर्ग में विश्वामित्र और राम के बीच उपदेशात्मक संवाद है। राम ऋषि की आज्ञा को प्रणाम कर एक युक्तिसंगत शंका रखते हैं—यक्षों की शक्ति सीमित कही जाती है, फिर एक स्त्री में हजार हाथियों के समान बल कैसे हो सकता है? तब विश्वामित्र वंश और कारण का वृत्तान्त सुनाते हैं—यक्ष सुकेतु ने तप किया; ब्रह्मा ने उसे पुत्री ताटका दी और उसे असाधारण, गज-सहस्र-तुल्य बल प्रदान किया। ताटका का विवाह सुन्द से हुआ और उससे मारीच उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर शापवश राक्षस बन गया। सुन्द के मारे जाने पर ताटका और मारीच ने अगस्त्य पर आक्रमण का प्रयास किया; तब अगस्त्य ने मारीच को राक्षसरूप धारण करने का शाप दिया और ताटका को यक्षी-रूप त्यागकर भयानक नरभक्षिणी राक्षसी बनने का शाप दिया। इसके बाद विश्वामित्र नीति का मूल सिद्धान्त बताते हैं—राजधर्म का सनातन कर्तव्य प्रजा, चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था, गौ और ब्राह्मणों की रक्षा है; इसलिए अधर्मकारी का नाश, चाहे वह स्त्री ही क्यों न हो, लोक-रक्षा हेतु करना चाहिए। इन्द्र द्वारा मन्थरा-वध और विष्णु द्वारा काव्या (भृगु-पत्नी) के विनाश के दृष्टान्त देकर यह सर्ग राजकीय संरक्षण-धर्म के अंतर्गत न्यायोचित बल-प्रयोग का आधार स्पष्ट करता है।
ताटकावधः (The Slaying of Tāṭakā)
इस सर्ग में विश्वामित्र की आज्ञा सुनकर श्रीराम अपने कर्तव्य का कारण स्पष्ट करते हैं—राजा दशरथ की आज्ञा का पालन, कौशिक मुनि के वचन का सम्मान, तथा गो‑ब्राह्मण‑हित और जनकल्याण के लिए राक्षसों का दमन। तत्पश्चात राम धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर टंकार करते हैं; उस ध्वनि से वन काँप उठता है और ताड़का क्रोध से आकर्षित होकर सामने आती है। राम उसके भयानक रूप को देखकर पहले संयमित उपाय का विचार करते हैं—स्त्री होने के कारण उसे मारने के बजाय उसकी शक्ति और गति को निष्फल करना। पर ताड़का माया से धूल का अंधड़, शिलावर्षा, अदृश्य होना और रूप बदलना आदि उपाय करती है। तब विश्वामित्र अनुचित करुणा छोड़ने को कहते हैं और बताते हैं कि संध्या के समय राक्षसी शक्तियाँ बढ़ जाती हैं। राम शब्द‑वेध की कुशलता से उसके छल को भेदते हैं, शिलावृष्टि को रोकते हैं और वज्र के समान वेग से धावती ताड़का के वक्ष में बाण मारकर उसका वध कर देते हैं। इन्द्र सहित देवगण राम की स्तुति करते हैं और विश्वामित्र को योग्य राजकुमार को दिव्यास्त्र देने की प्रेरणा देते हैं। संध्या होने पर शाप‑मुक्त वन में वे वहीं विश्राम करते हैं; विश्वामित्र स्नेहपूर्वक राम को आशीर्वाद देते हैं और प्रातः अपने आश्रम की ओर प्रस्थान का निश्चय करते हैं।
अस्त्रप्रदानम् · Bestowal of Divine Astras to Rama
रात्रि-विश्राम के बाद महर्षि विश्वामित्र राम से अत्यन्त प्रसन्न होकर स्नेहवश उन्हें सम्पूर्ण दिव्यास्त्र-सम्पदा प्रदान करने का निश्चय करते हैं और शुभाशीर्वाद देते हैं। फिर वे चक्र, पाश, गदा, वज्र आदि तथा अनेक नामवाले दिव्यास्त्रों का क्रमशः वर्णन करते हैं, जैसे विधिपूर्वक प्रदान किए जाते हैं। शुद्ध होकर पूर्वाभिमुख महर्षि अनुत्तम मन्त्र-समूहों का उपदेश देकर उन अस्त्रों का विधिवत् दान करते हैं। तब उन अस्त्रों की अधिष्ठात्री शक्तियाँ प्रकट होकर राम के आज्ञाकारी सेवक के रूप में उपस्थित होती हैं। राम उन्हें ग्रहण कर मन में धारण करते हुए आदेश देते हैं कि वे ‘मेरे मन में स्थित रहें’—अर्थात् शक्ति का प्रयोग संयम, स्मरण और धर्म के अधीन हो। अंत में राम विश्वामित्र को प्रणाम कर आगे की यात्रा के लिए तत्पर हो जाते हैं।
अस्त्रग्रहणं संहारोपदेशश्च · Receiving the Astras and Instruction on Withdrawal
शुद्धि-विधि के बाद महर्षि विश्वामित्र राम को दिव्य अस्त्रों का विधिवत् हस्तांतरण करते हैं। कथा-भाषा में राम अब ‘देवताओं के लिए भी अजेय’ कहे जाते हैं, फिर भी वे केवल अस्त्र-प्राप्ति से संतुष्ट नहीं होते; वे अस्त्रों के संहार (वापसी/निवृत्ति) की विधि—प्रत्याहार-मंत्र—माँगते हैं, जिससे संयम और धर्मयुक्त शक्ति-प्रयोग का भाव प्रकट होता है। विश्वामित्र संहार-मंत्र सिखाकर भृशाश्व के पुत्र कहे गए तेजस्वी, रूप बदलने वाले अनेक अस्त्रों की सूची क्रम से प्रदान करते हैं। तब अस्त्र-देवताएँ साकार होकर—कुछ अंगार-से काले, कुछ धुएँ-सी, कुछ सूर्य-चंद्र के समान दीप्त—हाथ जोड़कर राम के पास आती हैं और सेवा का वचन देती हैं। राम उन्हें आदेश देते हैं कि वे ‘मन में निवास’ करें और आवश्यकता पड़ने पर सहायता करें; फिर उन्हें विदा करते हैं। वे प्रदक्षिणा करके लौट जाती हैं। आगे चलते हुए राम पर्वत के निकट मेघ-सी छाया वाला एक उपवन देखते हैं, जहाँ पशु-पक्षी और मधुर कलरव है। वे पूछते हैं कि यह किसका आश्रम है, और साथ ही विश्वामित्र के यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षसों की उत्पत्ति और निवास-स्थान के विषय में भी जानना चाहते हैं, जिससे आगे का रक्षण-कार्य निश्चित हो सके।
सिद्धाश्रम-प्रसङ्गः (Siddhashrama and the Vāmana Narrative)
राम के ‘वह वन कौन-सा है?’ पूछने पर विश्वामित्र सिद्धाश्रम का प्राचीन वृत्तान्त सुनाते हैं। वे बताते हैं कि इस आश्रम की पवित्रता भगवान विष्णु के योग-तप से प्रतिष्ठित हुई—देवश्रेष्ठ विष्णु ने यहाँ तपस्या की थी। आगे वैरोचनि बलि देवताओं को जीतकर त्रैलोक्य पर शासन करने लगता है; तब अग्नि आदि देवगण विष्णु के पास जाकर देवहित के लिए ‘मायायोग’ से वामन रूप धारण करने की प्रार्थना करते हैं। कश्यप और अदिति के प्रसंग में अदिति का सहस्रवर्ष तप, विष्णु की स्तुति और वरदान का वर्णन आता है; ‘अदिति, मैं तुम्हारा पुत्र बनूँ’—इस याचना से वामनावतार का कारण स्पष्ट होता है। वामन भगवान तीन पगों से बलि को आक्रान्त कर त्रैलोक्य इन्द्र को पुनः दे देते हैं; इसी से यह आश्रम ‘श्रमनाशन’ कहलाता है। इसके बाद विश्वामित्र राम-लक्ष्मण सहित सिद्धाश्रम पहुँचते हैं; वहाँ के मुनि राजकुमारों का सत्कार करते हैं। विश्राम के पश्चात राम-लक्ष्मण विश्वामित्र को दीक्षा के लिए प्रेरित करते हैं और वे संयत इन्द्रियों से दीक्षा में प्रविष्ट होते हैं। प्रातःकाल दोनों भाई संध्या-उपासना, जप, अग्निहोत्र आदि करके विश्वामित्र को प्रणाम करते हैं; अध्याय आश्रम-रक्षा के धर्म की भूमिका के साथ समाप्त होता है।
सिद्धाश्रम-यज्ञरक्षणम् · Protection of Viśvāmitra’s Sacrifice at Siddhāśrama
इस सर्ग में देश‑काल के ज्ञाता और वाणी‑कुशल राम‑लक्ष्मण विश्वामित्र से पूछते हैं कि रात्रि में राक्षस कब आएँगे, जिससे यज्ञ की रक्षा की जा सके। ऋषि उन्हें आदेश देते हैं कि विश्वामित्र के दीक्षा‑मौन के समय तक छह रातों तक यज्ञ‑रक्षा करनी होगी। छठे दिन यज्ञ का तेज बढ़ जाता है; वेदी पर ऋत्विज, कुश, स्रुव, समिधा और हवि‑द्रव्यों के बीच अग्नि प्रज्वलित हो उठती है। तभी आकाश से भयंकर शब्द होता है। मारीच और सुबाहु अपने अनुचरों सहित मायाबल से आकाश ढककर रक्त‑वर्षा द्वारा वेदी को दूषित करने आते हैं। राम तुरंत लक्ष्मण को सावधान कर ‘मानवास्त्र’ का प्रयोग करते हैं—धर्मानुकूल और प्राणहरण‑रहित भाव से—जिससे मारीच सौ योजन दूर उफनते समुद्र में जा गिरता है, मूर्छित होता है पर मारा नहीं जाता। फिर राम शेष निर्दय यज्ञ‑विघ्नकारियों के विनाश का संकल्प करते हैं। वे दिव्य ‘आग्नेयास्त्र’ से सुबाहु का वध करते हैं और ‘वायव्यास्त्र’ से अन्य राक्षसों का संहार कर देते हैं। यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण होने पर विश्वामित्र राम की प्रशंसा करते हैं—गुरु की आज्ञा सिद्ध हुई और ‘सिद्धाश्रम’ नाम सार्थक हुआ। ऋषिगण विजय के बाद इन्द्र की भाँति राम का सम्मान करते हैं।
सिद्धाश्रमात् शोणातटं प्रस्थानम् · Departure from Siddhāśrama and the Invitation to Janaka’s Yajña (Bow of Mithilā)
सिद्धाश्रम में विश्वामित्र का कार्य सफल होने के बाद कथा अब उत्तर दिशा में मिथिला-यात्रा की ओर मुड़ती है। राम और लक्ष्मण कृतकृत्य और प्रसन्न होकर रात्रि बिताते हैं, प्रातःकाल नित्यकर्म-उपासना करते हैं और मुनि की आज्ञा के लिए स्वयं को समर्पित सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं—तप-यज्ञ की मर्यादा में अनुशासित सेवा का भाव स्पष्ट होता है। तब ऋषिगण मिथिला में राजा जनक के आगामी परमधार्मिक यज्ञ का समाचार देते हैं और राम को वहाँ चलकर एक अद्भुत “धनुरत्न” देखने का निमंत्रण देते हैं। वह धनुष भयानक, अपरिमित सामर्थ्य वाला और देवताओं द्वारा कभी यज्ञसभा में प्रदान किया गया बताया जाता है; उसकी दुर्गमता ऐसी कि देव, गन्धर्व, असुर, राक्षस तथा बड़े-बड़े राजा और राजकुमार भी उसे चढ़ा तो दूर, उठाने तक में समर्थ नहीं। जनक के राजभवन में वह यज्ञफल-रूप पवित्र वस्तु की तरह सुगंध, चंदन, धूप और अगरु से पूजित होता है—राजचिह्न भी और अनुष्ठान-वस्तु भी। विश्वामित्र ऋषियों सहित वनदेवताओं से विदा लेकर प्रस्थान करते हैं; पक्षी और मृग भी पीछे-पीछे चलते हैं, फिर उन्हें लौटा दिया जाता है। संध्या समय दल शोणा नदी के तट पर ठहरता है; स्नान कर अग्नि प्रज्वलित करके विश्वामित्र के साथ बैठते हैं। उस रम्य प्रदेश को देखकर राम जिज्ञासा प्रकट करते हैं, जिससे आगे की कारण-कथा का प्रसंग बनता है।
कुशवंशवर्णनम् · The Line of Kuśa and the Disfigurement of Kuśanābha’s Daughters by Vāyu
इस सर्ग में बालकाण्ड के धर्म-परिप्रेक्ष्य में कुशवंश का संक्षिप्त इतिहास आता है। ब्रह्मा से उत्पन्न, तप में स्थिर और सत्पुरुषों का सम्मान करने वाले कुश का वर्णन है। उनके चार पुत्र—कुशाम्ब, कुशनाभ, अधूर्तरजस और वसु—धर्मपूर्वक राज्य करते हैं और नगर बसाते हैं: कुशाम्बी, महोदय, धर्मारण्य और गिरिव्रज। वसु का देश ‘वसुमती’ कहलाता है, जहाँ पाँच पर्वतों के बीच प्रसिद्ध सुमागधी/मागधी नदी बहती है। फिर कथा कुशनाभ की ओर मुड़ती है, जिनकी अप्सरा घृताची से उत्पन्न सौ कन्याएँ उद्यान-शोभा के साथ वर्णित हैं। उनकी सुंदरता देखकर वायु विवाह का प्रस्ताव रखता है और अमरत्व तथा अजर-यौवन का वरदान देने की बात कहता है। कन्याएँ पिता की आज्ञा को विवाह-धर्म मानकर वायु को अस्वीकार करती हैं और तपस्वियों के तेज का स्मरण कराती हैं। क्रुद्ध वायु उनके अंगों में प्रवेश कर उन्हें कुब्ज कर देता है। वे लज्जित होकर रोती हुई लौटती हैं; कुशनाभ अधर्म-आघात पर विचार करते हुए अंतर्मुख होकर समाधि में स्थित हो जाते हैं—यह प्रसंग नीति-शिक्षा और कथा-परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण बिंदु बनता है।
कुशनाभकन्याशतविवाहः · The Marriage of Kuśanābha’s Hundred Daughters (and the Birth of Brahmadatta)
इस सर्ग में दो परस्पर जुड़ी धर्मकथाएँ आती हैं। पहले, कुशनाभ की सौ कन्याएँ सर्वव्यापी वायुदेव द्वारा किए गए बलात्-प्रयास का वृत्तान्त पिता से कहती हैं और स्पष्ट करती हैं कि विवाह में उनका स्वेच्छाचार नहीं; कोई भी प्रस्ताव पिता की सम्मति से ही स्वीकार्य है। कुशनाभ उनकी एकता और क्षमा की प्रशंसा करते हुए कहता है कि क्षमा कुल की रक्षा करने वाली और धर्म को धारण करने वाली महान शक्ति है। फिर वंश-प्रसंग से समाधान प्रकट होता है। ब्रह्मचारी तपस्वी चूली, ऊर्मिला की पुत्री गन्धर्वी सोमदा की भक्ति-सेवा से प्रसन्न होकर उसे मन से उत्पन्न पुत्र ब्रह्मदत्त प्रदान करता है; वही आगे काञ्पिल्य का राजा बनता है। कुशनाभ मंत्रियों से देश-काल और योग्य वर का विचार कर, ब्रह्मदत्त को वर चुनकर अपनी सौ कन्याएँ उसे देने का निश्चय करता है। ब्रह्मदत्त के विधिवत् पाणिग्रहण करते ही कन्याओं की विकृति और पीड़ा तत्काल दूर हो जाती है—धर्मसम्मत विवाह से सामाजिक और शारीरिक सामंजस्य की पुनर्स्थापना का संकेत। अंत में विवाह-संस्कार पूर्ण होते हैं और सोमदा अपने पुत्र के उचित आचरण से प्रसन्न होकर उसे अनुमोदित करती है।
कुशिकवंश-प्रसङ्गः / Genealogy of the Kuśika Line and the Kausikī River
इस सर्ग में विश्वामित्र राम को अपने वंश और देश-परिचय का वृत्तांत पूर्ण करते हैं। ब्रह्मदत्त के विवाह करके प्रस्थान करने के बाद कुशनाभ के पुत्रेष्टि-यज्ञ का प्रसंग आता है और उससे गाधि का जन्म होता है। विश्वामित्र गाधि को अपना पिता बताते हैं और कुश-वंश से संबंध के कारण अपने “कौशिक” नाम की उत्पत्ति समझाते हैं। फिर वे अपनी ज्येष्ठ बहन सत्यवती का पवित्र चरित कहते हैं—ऋचीक मुनि से विवाह के बाद वह पति के साथ स्वर्गलोक को गई और पुनः हिमालय से प्रवाहित होने वाली महान कौशिकी नदी के रूप में लोक-कल्याण हेतु प्रकट हुई। इसके बाद रात्रि का शांत दृश्य वर्णित है—स्थिर वृक्ष, विश्राम करते पशु, तारों से भरा आकाश और उदित चंद्रमा; तथा यक्ष, राक्षस और मांसभक्षी निशाचरों का विचरण। विश्वामित्र का उपदेश समाप्त होता है, ऋषि उनकी प्रशंसा करते हैं और राम-लक्ष्मण विश्राम हेतु शयन करते हैं।
गङ्गाजन्मवर्णनम् / The Origin of the Ganga (Tripathagā Narrative)
प्रातःकाल शोण नदी के तट पर विश्वामित्र राम को जगाकर प्रातःकर्म और आगे की यात्रा के लिए प्रेरित करते हैं। स्नान-आदि विधियाँ पूर्ण कर राम पूछते हैं कि गहरी, रेतीले तटों से सुशोभित शोण को कैसे पार करेंगे; तब विश्वामित्र उन्हें पूर्व ऋषियों द्वारा अपनाए गए मार्ग से चलने का निर्देश देते हैं। आधे दिन तक विविध वनों से होकर चलते हुए वे जह्नवी (गंगा) के पास पहुँचते हैं, जो तपस्वियों द्वारा पूजित है और हंस-क्रौंच आदि पक्षियों से रमणीय लगती है। वे गंगा-तट पर विश्राम करते हैं, स्नान करते हैं, पितरों को तर्पण देते हैं, अग्निहोत्र करते हैं और पवित्र शेष का सेवन करते हैं। शुद्ध नदी-तट पर सब विश्वामित्र के चारों ओर बैठकर शांत भाव से रहते हैं। तब राम एक गूढ़ प्रश्न करते हैं—गंगा को ‘त्रिपथगा’ क्यों कहा जाता है, और वह तीनों लोकों को पवित्र करती हुई समुद्र में कैसे प्रविष्ट हुई? इस जिज्ञासा से प्रेरित होकर विश्वामित्र गंगा के उद्गम का वर्णन आरंभ करते हैं—पर्वतराज हिमवान, जो धातुओं का महान भंडार है, और उनकी पत्नी मनोरमा (मेरु की पुत्री) की दो कन्याएँ हैं—ज्येष्ठा गंगा और कनिष्ठा उमा। देवकार्य हेतु देवता गंगा की याचना करते हैं; हिमवान धर्म के अनुसार त्रिलोकी के कल्याण के लिए उन्हें दे देते हैं और देवता कृतार्थ होकर लौट जाते हैं। उमा कठोर तप करके रुद्र से विवाह पाती हैं। अंत में विश्वामित्र गंगा को स्वर्गगामिनी, पापहरिणी दिव्य नदी बताकर कथा को विराम देते हैं।
बालकाण्ड सर्ग ३६ · गङ्गा-प्रभवप्रश्नः, शिवतेजोधारणं, कार्त्तिकेय-जन्म, उमाशापः
राम और लक्ष्मण विश्वामित्र की कथा सुनकर उसकी प्रशंसा करते हैं और पूछते हैं कि गंगा ‘त्रिपथगा’ (तीनों लोकों में प्रवाहित) क्यों कहलाती हैं तथा किन कर्मों से उनकी पवित्रता प्रतिष्ठित हुई। तब विश्वामित्र शिव और उमा से संबंधित कारणकथा सुनाते हैं। शिव-उमा का संयोग सौ दिव्य वर्षों तक चलता है, पर संतान नहीं होती। ब्रह्मा के नेतृत्व में देवगण भयभीत होते हैं कि यदि शिव के तेज से पुत्र उत्पन्न हुआ तो उसका प्रभाव लोकों के लिए असह्य होगा। वे शिव से प्रार्थना करते हैं कि त्रिलोकरक्षा हेतु उस तेज को रोककर धारण करें। शिव मान जाते हैं, पर पूछते हैं कि यदि तेज बाहर निकले तो उसे कौन धारण करेगा; देव पृथ्वी (धरा) को पात्र बताते हैं। शिव अपना तेज पृथ्वी पर छोड़ते हैं; वायु की सहायता से अग्नि उसे ग्रहण कर ले जाती है। उससे श्वेतपर्वत और प्रज्वलित शरवण-वन प्रकट होता है, जहाँ अग्नि से महाबली कार्त्तिकेय का जन्म होता है। देव और ऋषि शिव-उमा की पूजा करते हैं, किंतु विघ्न से क्रुद्ध उमा देवों को शाप देती हैं कि उनकी पत्नियाँ संतानहीन रहेंगी, और पृथ्वी को शाप देती हैं कि वह अनेक रूपों व अनेक स्वामियों वाली होकर भी पुत्र-प्रसव के सुख से वंचित रहेगी। इसके बाद विश्वामित्र ‘पर्वतनन्दिनी’ प्रसंग की समाप्ति बताकर गंगा-जन्म की कथा की ओर सेतु बाँधते हैं।
कुमारसम्भवः · गङ्गायां तेजोनिक्षेपः (The Birth of Kumāra/Skanda and the Deposition of Śiva’s Energy through Gaṅgā)
इस सर्ग में विश्वामित्र राम को एक पौराणिक प्रसंग सुनाते हैं। उमा के अचूक वचन के कारण देवता अपनी पत्नियों से संतान नहीं पा सके, तब वे ब्रह्मा के पास जाकर नए सेनापति की याचना करते हैं। ब्रह्मा धर्मसम्मत उपाय बताते हैं—अग्नि शिव/ईश्वर के तेज को वहन करके दिव्य गंगा के माध्यम से पुत्र उत्पन्न करेगा, और यह व्यवस्था उमा को भी स्वीकार्य होगी। देवता रत्न-मणियों से विभूषित कैलास पर जाकर अग्नि से निवेदन करते हैं कि वह शिव-तेज को गंगा में स्थापित करे। गंगा दिव्य रूप धारण करती है, पर बढ़ते हुए अग्नितेज को धारण नहीं कर पाती; अग्नि के निर्देश से वह हिमालय की ढलानों पर गर्भ को रखकर अपने प्रवाहों द्वारा उसे आगे बहा देती है। पृथ्वी-स्पर्श से ‘जातरूप’ (स्वर्ण) तथा अन्य धातुएँ उत्पन्न होती हैं—इसी से हिमालय के स्वर्णवन का कारण बताया गया है। तदनंतर कुमार का जन्म होता है; कृतिका-गण धायें नियुक्त होती हैं, इसलिए वे कार्त्तिकेय कहलाते हैं। गंगा से ‘स्कन्न’ (बहकर उतरा) होने के कारण उनका नाम स्कंद भी प्रसिद्ध होता है। कोमल देह होते हुए भी वे दैत्यों के समूहों को परास्त कर अपनी सहज वीरता दिखाते हैं, और देवता उन्हें विधिवत अपने सैन्य का सेनापति स्थापित करते हैं। अंत में कहा गया है कि कार्त्तिकेय की भक्ति-पूर्वक वंदना से दीर्घायु, संतान और स्कंदलोक की प्राप्ति होती है।
सगरस्य पुत्रलाभः · Sagara’s Boons, Progeny, and the Rise of the Sixty Thousand
पूर्व प्रसंग सुनाकर विश्वामित्र मुनि अयोध्या के प्राचीन नरेश सगर का वर्णन करते हैं—धर्मात्मा होते हुए भी वे पुत्रहीन थे। उनकी दो रानियाँ थीं: विदर्भराजकुमारी केशिनी और अरिष्टनेमि की पुत्री सुमति, जो अनुपम रूपवती थीं तथा सुपर्ण (गरुड़) की बहन कही जाती हैं। सगर ने दोनों रानियों सहित हिमालय के भृगुप्रस्रवण में दीर्घ तप किया। प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने वर दिया—एक रानी को एक ही पुत्र मिलेगा जो वंश चलाएगा, और दूसरी को साठ हजार पुत्र। रानियों ने वर का भेद पूछा; विकल्प मिलने पर केशिनी ने वंशधर एक पुत्र का वर चुना और सुमति ने बहुसंतान का। समय आने पर केशिनी से असमंजस उत्पन्न हुआ, जो सरयू में बच्चों को फेंकने जैसे क्रूर कर्मों से कुख्यात हुआ; प्रजा को पीड़ा देने पर सगर ने उसे देशनिकाला दे दिया। पर उसका पुत्र अंशुमान पराक्रमी और सर्वप्रिय था। सुमति ने लौकी के समान एक गर्भ पिंड प्रसव किया, जो फटकर साठ हजार पुत्रों में विभक्त हो गया; वे घी से भरे घड़ों में पाले गए और युवावस्था को पहुँचे। अंत में सगर ने यज्ञ आरंभ करने का संकल्प किया, जिससे आगे की वंश-और-यज्ञकथा का क्रम चल पड़ता है।
सगरयज्ञाश्वहरणम् · The Stolen Sacrificial Horse of Sagara
पूर्वकथा के अंत में प्रसन्न और सावधान राम ने विश्वामित्र से निवेदन किया कि सगर के यज्ञ की व्यवस्था का विस्तृत वर्णन करें। तब विश्वामित्र ने सगर-प्रसंग आरम्भ किया—हिमालय और विन्ध्य के बीच के प्रदेश में सगर का यज्ञ चल रहा था और यज्ञाश्व की रक्षा के लिए अंशुमान को नियुक्त किया गया था। पर्व (पूर्णिमा/समापन-दिवस) पर वासव इन्द्र ने राक्षस-रूप धारण कर यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। ऋत्विजों ने सभा में सगर से कहा कि यज्ञ में दोष पड़ना अशुभ है, इसलिए अश्व को तुरंत वापस लाना चाहिए। सगर दीक्षा में स्थित रहकर अंशुमान और पुरोहित-वर्ग के साथ वहीं रहे और अपने साठ हजार पुत्रों को आज्ञा दी कि समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी को खोजो, क्रम से खोदते जाओ, जब तक अश्व और चोर दोनों न मिल जाएँ। राजकुमारों ने उत्साहपूर्वक हीरे-से तीखे नखों, हलों और भालों से विशाल भूभाग को उधेड़ डाला। धरती के मथने से भयानक शब्द उठे और पाताल के जीव भी मारे जाने लगे। तब व्याकुल देव, गन्धर्व, असुर और नाग ब्रह्मा के पास जाकर बोले—सगर के पुत्र ‘यज्ञ-विघ्नकारी’ समझकर प्राणियों का संहार कर रहे हैं और समूची पृथ्वी फटती चली जा रही है।
सगरपुत्राणां रसातलगमनम् · The Descent of Sagara’s Sons and the Wrath of Kapila
इस सर्ग में भयभीत देवता ब्रह्मा की शरण लेते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि यह सब पूर्वनियत है—पृथ्वी को वासुदेव ही कपिल-रूप धारण कर धारण करते हैं; इसलिए सगर के पुत्रों द्वारा पृथ्वी का विदारण और अंततः उनका विनाश निश्चित है, क्योंकि वे कपिल का अपराध करेंगे। ब्रह्मा सगर को आदेश देते हैं कि अश्व-चोर का पता लगाने हेतु पुनः उत्खनन कराया जाए। सगर के साठ हजार पुत्र रसातल की ओर उतरते हुए चार दिग्गजों को देखते हैं—पूर्व में विरूपाक्ष, दक्षिण में महापद्म, पश्चिम में सौमनस और उत्तर में भद्र—जो पर्वत-सम विशाल होकर पृथ्वी को धारण किए हैं। उनके सिर के हिलने से पवित्र दिनों में भूकम्प होते हैं—यह कारण भी बताया जाता है। वे सबका सम्मान कर ईशान्य दिशा में खोदते हुए कपिल मुनि (सनातन वासुदेव) को और पास ही चरते यज्ञ-अश्व को देखते हैं। कपिल को ही चोर समझकर वे औज़ारों और शस्त्रों सहित दौड़ते हैं, आरोप लगाते हैं और क्रोध जगाते हैं। कपिल के केवल वचन से वे भस्म हो जाते हैं। सर्ग का संदेश है—अज्ञान से हुई पहचान-भूल, यज्ञ की उतावली और सिद्ध पुरुष के प्रति अधर्म अत्यन्त विनाशकारी है।
अंशुमान् · अश्वान्वेषणम्, दिशागजसंवादः, कपिलदाहवृत्तान्तः, गङ्गोपदेशः (Anshuman’s Search for the Horse and the Counsel to Bring Ganga)
राजा सगर ने जब देखा कि उसके पुत्र बहुत समय से लौटे नहीं हैं, तब उसने अपने पौत्र अंशुमान को—जो पराक्रम, विद्या और कुल-तेज से युक्त था—यज्ञाश्व के अपहरणकर्ता और लुप्त राजकुमारों का पता लगाने के लिए भेजा। उसे धनुष-शस्त्र धारण करने, सत्पुरुषों का सम्मान करने और यज्ञ में आने वाले विघ्नों को दूर कर यज्ञ पूर्ण कराने की आज्ञा दी। अंशुमान सगर-पुत्रों द्वारा खोदे गए भूमिगत मार्ग से चला और दिशाओं के रक्षक दिग्गजों के दर्शन किए, जिनकी अनेक प्राणी पूजा करते हैं। उसने उनकी प्रदक्षिणा कर विनयपूर्वक प्रश्न किया; दिग्गजों ने उसे आश्वासन दिया कि वह अश्व सहित लौटेगा। आगे बढ़कर उसने सगर के साठ हजार पुत्रों को भस्मरूप में पड़ा देखा और उनके विनाश पर शोक किया; पास ही यज्ञाश्व चरता हुआ मिला। तर्पण के लिए जल खोजने पर जल न मिला; तब उसने गरुड़ (सुपर्ण/वैनतेय) को देखा। गरुड़ ने बताया कि कपिल मुनि के तेज से वे दग्ध हुए हैं और साधारण जल से क्रिया उचित नहीं; केवल हिमवान की ज्येष्ठ पुत्री गंगा ही उनकी भस्म को पवित्र कर स्वर्गगति दे सकती है। अंशुमान अश्व को लेकर शीघ्र लौट आया और सब वृत्तांत सगर को सुनाया; सगर ने कल्पोक्त विधि से यज्ञ तो पूर्ण किया, पर गंगा को पृथ्वी पर लाने का उपाय तत्काल न कर सका। दीर्घकाल राज्य करके वह अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ।
गङ्गावतरण-प्रार्थना (Bhagīratha’s Petition for the Descent of Gaṅgā)
इस सर्ग में सगर-पुत्रों के उद्धार हेतु चल रही इक्ष्वाकु-वंश की कथा आगे बढ़ती है। सगर के निधन के बाद प्रजा धर्मात्मा अंशुमान को राजा बनाती है। अंशुमान बाद में दिलीप को राज्य सौंपकर हिमालय के पवित्र शिखर पर कठोर तप करता है, पर उद्देश्य पूर्ण किए बिना ही स्वर्ग को प्राप्त हो जाता है। दिलीप पूर्वजों की विपत्ति से शोकाकुल होकर गंगा के अवतरण और जल-क्रिया का उपाय नहीं पा सके और चिंतन में लीन रहे; तभी उनके यहाँ धर्मात्मा पुत्र भगिरथ का जन्म होता है। दिलीप दीर्घकाल तक यज्ञों सहित राज्य करके भगिरथ का राज्याभिषेक करते हैं और पुण्यबल से इन्द्रलोक चले जाते हैं। संतानहीन भगिरथ वंश-परंपरा और पितरों के उद्धार के लिए दृढ़ संकल्प लेकर मंत्रियों को शासन सौंपते हैं और गोकर्ण में दीर्घकाल तक पंचतप करते हैं—भुजाएँ उठाए, इन्द्रियों को वश में रखकर, मास में एक बार आहार लेते हुए। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा प्रकट होते हैं। भगिरथ गंगा-जल से सगर-पुत्रों की मुक्ति हेतु जल-क्रिया तथा इक्ष्वाकु-वंश की निरंतरता का वर माँगते हैं। ब्रह्मा वर देते हैं, पर बताते हैं कि गंगा के प्रचंड वेग को धारण करने में केवल शिव समर्थ हैं; इसलिए पहले शिव की आराधना करनी होगी। यह कहकर ब्रह्मा देवताओं सहित स्वर्ग लौट जाते हैं।
गङ्गावतरणम् (The Descent of the Gaṅgā and Bhagiratha’s Fulfilment)
ब्रह्मा के चले जाने पर भगीरथ ने गंगा के प्रचण्ड वेग को सँभालने के लिए शिव की शरण लेने का निश्चय किया। वे एक वर्ष तक कठोर तप करते रहे—एक पैर के अँगूठे पर स्थिर खड़े होकर—और महादेव से प्रार्थना की कि वे पर्वतजा गंगा को अपने शिर पर धारण करें। तप से प्रसन्न होकर शिव ने यह भार स्वीकार किया। गंगा को क्षणिक गर्व हुआ; वह शिव को बहा ले जाकर पाताल में ले जाने-सी चेष्टा करने लगी, परंतु शिव की जटाओं के जाल में वह बँधकर ठहर गई। तब भगीरथ ने फिर तप किया; शिव ने गंगा को बूँद-बूँद करके मुक्त किया। वह ‘बिन्दुसर’ कहलाकर सात धाराओं में विभक्त हुई—तीन पूर्व की ओर (ह्लादिनी, पावनी, नलिनी), तीन पश्चिम की ओर (सुचक्शु, सीता, सिन्धु) और सातवीं धारा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चली। देव, ऋषि, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध और जलचर प्राणी उस अवतरण को फेन, विद्युत्-सी दीप्ति और निर्मल प्रकाश के बीच देखते रहे। आगे गंगा का प्रवाह ऋषि जह्नु के यज्ञ में जा पड़ा; क्रुद्ध होकर उन्होंने गंगा को पी लिया, फिर कानों से छोड़ दिया—इससे वह ‘जाह्नवी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। अंततः गंगा भगीरथ के साथ समुद्र तक पहुँची और पाताल में जाकर सगर-पुत्रों की भस्म को धोकर उन्हें पवित्र कर स्वर्गगमन का कारण बनी—कर्म, तीर्थजल और मोक्षफल का पवित्र संबंध स्पष्ट करती हुई।
गङ्गावतरण-समापनः (Conclusion of the Descent of Gaṅgā)
इस सर्ग में गङ्गावतरण-प्रसंग का उपसंहार होता है। भगीरथ गङ्गा को समुद्र तक ले जाकर फिर पृथ्वी के अधोलोक में उतरते हैं, जहाँ सगर के पुत्र भस्मरूप में पड़े हैं। गङ्गाजल से उन भस्मों का अभिषेक होते ही ब्रह्मा प्रकट होकर उनके उद्धार और स्वर्गारोहण की पुष्टि करते हैं, और पितृ-तर्पण तथा दैवी अनुग्रह की सिद्धि को स्थापित करते हैं। ब्रह्मा गङ्गा को ‘भागीरथी’ और ‘त्रिपथगा’ के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं—त्रिलोक-पावनी, दिव्य और भगीरथ के व्रत से लोकस्मृति में अमर। वे भगीरथ को समस्त पितरों के लिए सलिल-क्रिया पूर्ण करने की आज्ञा देते हैं तथा बताते हैं कि जो व्रत सगर, अंशुमान और दिलीप से न हो सका, वही भगीरथ ने सिद्ध किया। ब्रह्मा भगीरथ की प्रतिज्ञा-पूर्ति की प्रशंसा कर उसे कीर्ति और ‘धर्म में महान पद’ का फल बताते हैं तथा गङ्गास्नानादि से शुद्धि का उपदेश देते हैं। ब्रह्मा के स्वर्ग लौटने पर भगीरथ विधिपूर्वक जलकर्म संपन्न कर शुद्ध होकर राजधानी लौटते हैं और कृतार्थ होकर राज्य करते हैं; प्रजा शोक-चिन्ता से मुक्त होकर आनंदित होती है। अंत में फलश्रुति है—इस पुण्यकथा के श्रवण-पाठ से पुण्य, समृद्धि, दीर्घायु, संतान, देव-पितृ-तोष तथा पापों का नाश होता है।
विशालानगरीप्रवेशः · Entry toward Viśālā and the Indra-Kṣīrodamathana Legend
सर्ग 45 में विश्वामित्र की पूर्वकथा (विशेषतः गंगा-अवतरण) सुनकर विस्मित राम रात भर उसी का मनन करते हैं। प्रभात में वे विनयपूर्वक मुनि से कहते हैं कि ध्यान में लीन रहने से रात्रि क्षण-सी बीत गई। फिर सब लोग पुण्य ऋषियों से संबद्ध नौका द्वारा त्रिपथगा गंगा को पार कर उत्तर तट पर पहुँचते हैं, तपस्वी जनों का सत्कार करते हैं और स्वर्ग-सी शोभायमान विशालानगरी को देखते हैं। राम हाथ जोड़कर विशालापुरी के राजवंश और उत्पत्ति का कारण पूछते हैं। तब विश्वामित्र शक्र (इन्द्र) से जुड़ी प्राचीन कथा आरम्भ करते हैं—देवों और दैत्यों ने अमृत के लिए क्षीरसागर-मंथन का निश्चय किया; मन्दर पर्वत मथनी बना और वासुकि नाग रस्सी। मंथन से पहले हालाहल विष निकला; देवों ने रुद्र/शंकर की शरण ली, हरि के परामर्श से शिव ने विष धारण किया, और विष्णु ने कूर्म रूप धारण कर मन्दर को आधार दिया। इसके बाद धन्वन्तरि, अप्सराएँ, वारुणी, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ मणि और अंत में अमृत प्रकट हुआ। अमृत को लेकर देव-दानव संघर्ष हुआ; विष्णु ने मोहिनी रूप से देवों को अमृत दिलाया और इन्द्र ने अपना राज्य दृढ़ किया। इस प्रकार गंगा-तट और विशालापुरी का प्रसंग, पौराणिक इतिहास से जुड़कर प्रश्नोत्तर-रूप में उपदेशात्मक ढंग से प्रस्तुत होता है।
दितितपः-शक्रपरिचर्या-गर्भभेदः (Diti’s Penance, Indra’s Service, and the Severing of the Embryo)
इस सर्ग में दिति के शोक और संकल्प के माध्यम से देव–असुर धर्म-संघर्ष का नैतिक पक्ष उभरता है। देवों द्वारा उसके पुत्रों के वध के बाद दिति मरीचि-पुत्र कश्यप से प्रार्थना करती है कि उसे ऐसा पुत्र मिले जो इन्द्र का वध कर सके; वह कठोर तप करने का व्रत लेकर ऐसी संतान के लिए अनुमति और वर मांगती है। कश्यप शर्त सहित वर देते हैं—हजार वर्षों तक निरन्तर शौच और संयम का पालन करने पर त्रैलोक्याधिपति पुत्र उत्पन्न होगा। तब दिति कुशप्लवन में घोर तप आरम्भ करती है। इन्द्र आने वाले संकट को जानकर प्रत्यक्ष विरोध के स्थान पर सेवा का मार्ग अपनाता है। वह अग्नि, कुश, जल, फल-मूल आदि तपस्या के लिए आवश्यक वस्तुएँ पहुँचाता है और दिति की थकान दूर करने में भी स्वयं उपस्थित रहता है। तप पूर्ण होने से दस वर्ष पूर्व दिति प्रसन्न होकर इन्द्र से कहती है कि उसे एक भाई मिलेगा और वह विजय में सहभागी होगा। मध्याह्न में दिति अशुद्ध अवस्था में, सिर की ओर पाँव करके सो जाती है। इसी प्रमाद का लाभ उठाकर इन्द्र उसके गर्भ में प्रवेश करता है और भ्रूण को सात भागों में चीर देता है; साथ ही बार-बार “मा रुदः” (मत रोओ) कहकर मरुतों की उत्पत्ति का कारण बताता है। दिति जागकर वध से रोकती है; इन्द्र लौटकर अपना अपराध स्वीकार करता है और कहता है कि अशौच के कारण अवसर मिला—फिर क्षमा माँगता है। इस प्रकार सर्ग तप के साथ शौच-नियम की अनिवार्यता और यह शिक्षा देता है कि अनुशासन में छोटी-सी चूक भी महान परिणामों को बदल सकती है।
दितेर्गर्भभङ्गो मरुत्प्रतिष्ठा च (Diti’s Severed Embryo and the स्थापना of the Maruts; Viśālā-nagara Lineage)
इस सर्ग में दैवी-पुराणकथा और स्थानीय राजवंश-परंपरा को जोड़कर पवित्र भूगोल को कथा-स्मृति में स्थापित किया गया है। दिति अपने गर्भ के सात भागों में कट जाने से शोकाकुल होकर अजेय इन्द्र से विनयपूर्वक कहती है कि इसमें इन्द्र का दोष नहीं, यह उसके अपने व्रत-भंग/प्रमाद का फल है। वह अपने दुःख को लोक-कल्याण में रूपांतरित करते हुए प्रार्थना करती है कि वे सात खंड ‘मरुत’ बनें—वायु के विभागों तथा दिशाओं के रक्षक देव। इन्द्र हाथ जोड़कर स्वीकार करता है और उनके लोकों व दिशाओं में विचरण करने की दिव्य शक्ति की पुष्टि करता है; माता और पुत्र कृतार्थ होकर स्वर्गगमन करते हैं। फिर कथा स्थान-निर्माण की ओर मुड़ती है—जिस देश में पूर्वकाल में इन्द्र निवास करते थे, उसका उल्लेख होता है। इक्ष्वाकु के धर्मात्मा पुत्र विशाल (अलम्बुषा से उत्पन्न) ने वैशाली नगरी बसाई; उसके बाद हेमचन्द्र, सुचन्द्र, धूम्राश्व, संजय, सहदेव, कुशाश्व, सोमदत्त, ककुत्स्थ आदि राजाओं की परंपरा बताई जाती है, जो वर्तमान राजा सुमति पर आकर पूर्ण होती है। अंत में अतिथियों के रात्रि-विश्राम की व्यवस्था होती है और आगे जनक से मिलने का संकेत मिलता है; सुमति स्वयं बाहर आकर विश्वामित्र का स्वागत करता है और मुनि-आगमन को अपना सौभाग्य बताता है।
अहल्याशापवर्णनम् (The Account of Ahalyā’s Curse and the Deserted Hermitage near Mithilā)
इस सर्ग में राम-लक्ष्मण मिथिला की ओर बढ़ते हुए यज्ञीय अतिथि-सत्कार और पवित्र भूगोल के बीच स्थापित होते हैं। कुशल-प्रश्न के बाद राजा सुमति उन्हें विशिष्ट अतिथि मानकर आदरपूर्वक ठहराते हैं; वे एक रात्रि वहाँ निवास कर जनक की शुभ नगरी की ओर प्रस्थान करते हैं, जिसकी ऋषिगण श्रद्धा से प्रशंसा करते हैं। मिथिला के निकट राम एक प्राचीन, सुंदर परंतु निर्जन आश्रम देखकर विश्वामित्र से उसका इतिहास पूछते हैं। विश्वामित्र बताते हैं कि यह देवों से भी पूजित महर्षि गौतम का आश्रम था, जहाँ गौतम और अहल्या ने अनेक वर्षों तक तप किया। अवसर पाकर इन्द्र गौतम का वेष धारण कर संगम की याचना करता है; अहल्या इन्द्र को पहचानते हुए भी कौतूहल और प्रवृत्ति से सहमत हो जाती हैं। तपोदीप्त गौतम लौटकर इन्द्र का छल प्रकट करते हैं—इन्द्र को वीर्य-नाश का शाप देते हैं और अहल्या को दीर्घकाल तक अदृश्य रहकर आश्रम में वायु-आहार और भस्म-शय्या के साथ प्रायश्चित्त करने का विधान करते हैं। शाप में ही धर्मपूर्ण समाधान भी कहा गया है—जब वन में विचरते श्रीराम उस स्थान पर आकर अहल्या का आतिथ्य स्वीकार करेंगे, तब वह शुद्ध होकर पुनः अपने स्वरूप को प्राप्त होगी। इसके बाद गौतम हिमालय की ओर तप हेतु चले जाते हैं और वह आश्रम अपराध, प्रायश्चित्त और उद्धार का पवित्र स्मारक-स्थल बन जाता है।
अहल्याशापमोक्षः · The Release of Ahalya and Indra’s Restoration
इस सर्ग में दिव्य-यज्ञ प्रसंग और धर्म-स्थापन की कथा एक साथ आती है। गौतम मुनि के तप में विघ्न डालने और पर-स्त्री की मर्यादा भंग करने के कारण शापग्रस्त इन्द्र अपने अपमान और हानि पर विलाप करता है तथा अग्नि के नेतृत्व में देवताओं से उपाय माँगता है। अग्नि की आज्ञा से पितृदेव मेष के अण्डकोष इन्द्र में प्रत्यारोपित करते हैं; इसी से यज्ञ-परम्परा में अण्डकोष-रहित मेष का भी हवि-रूप में स्वीकार होने की रीति स्थापित होती है। इसके बाद विश्वामित्र राम को गौतम के आश्रम में प्रवेश करने को कहते हैं—शाप से अदृश्य की गई अहल्या का मोक्ष राम के आगमन से ही निश्चित था। विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण अहल्या को देखते हैं; उसकी तपस्या-शुद्ध दीप्ति का वर्णन धुंध से ढकी चन्द्र-प्रभा और सूर्य-सदृश तेज के उपमानों से किया गया है। शाप-काल पूर्ण होते ही दोनों भाई उसके चरण स्पर्श करते हैं; अहल्या पाद्य, अर्घ्य आदि से अतिथि-सत्कार करती है। तब पुष्प-वृष्टि, दुन्दुभि-नाद, गन्धर्व-अप्सराओं का गान-नृत्य—ऐसा दिव्य उत्सव होता है। गौतम मुनि अहल्या से पुनर्मिलन कर राम का सम्मान करते हैं और पुनः तप में प्रवृत्त होते हैं। तत्पश्चात राम मिथिला की ओर प्रस्थान करते हैं।
यज्ञवाटप्रवेशः जनक-विश्वामित्रसंवादश्च (Arrival at the Sacrificial Ground and Janaka’s Reception)
इस सर्ग में मिथिला की यज्ञवाट में औपचारिक स्वागत-क्रम का वर्णन है। विश्वामित्र के नेतृत्व में राम और लक्ष्मण ईशान दिशा की ओर बढ़कर यज्ञ-परिसर में पहुँचते हैं। वहाँ वेदपाठी ब्राह्मणों की विशाल सभा, तपस्वियों की कुटियाँ और रथ-शकटों से भरे शिविर देखकर राम उपयुक्त निवास-स्थान पूछते हैं; विश्वामित्र जल के निकट एक शांत स्थान चुन देते हैं। विश्वामित्र के आगमन का समाचार पाकर राजा जनक अपने पुरोहित शतानन्द के साथ शीघ्र स्वागत हेतु आते हैं और ऋत्विज मंत्रोच्चार सहित अर्घ्य अर्पित करते हैं। कुशल-प्रश्न और यज्ञ की प्रगति के बाद पदानुसार आसन-व्यवस्था होती है। जनक कहते हैं कि विश्वामित्र की उपस्थिति से यज्ञ सफल हुआ; अभी बारह दिन शेष हैं और देवता अपने भाग ग्रहण करने अवश्य पधारेंगे। फिर जनक श्रद्धापूर्वक जिज्ञासा करते हैं कि ये दोनों तेजस्वी, शस्त्रधारी, समरूप और मानो दिव्य युवक कौन हैं। विश्वामित्र उन्हें दशरथ के पुत्र बताकर उनकी यात्रा का संक्षेप करते हैं—सिद्धाश्रम में निवास, राक्षस-वध, विशालानगरी का दर्शन, अहल्या का दर्शन और गौतम से भेंट—तथा शिव के महान धनुष को देखने का उद्देश्य बताते हैं; और वहीं यह राजसभा-यज्ञवाट का दृश्य मौन में समाप्त होता है।
शतानन्दोपदेशः · Śatānanda’s Welcome to Rāma and the Prelude to Viśvāmitra’s History
इस सर्ग में आश्रम-परिसर में हुआ संवाद आतिथ्य-धर्म, अहल्या के उद्धार और वंश-इतिहास को शिक्षारूप में जोड़ता है। गौतम के ज्येष्ठ पुत्र, तपस्वी तेजस्वी शतानन्द, विश्वामित्र का नाम सुनकर और राम को देखकर हर्ष-विस्मय से भर उठते हैं। वे विश्वामित्र से पूछते हैं—क्या राम को अहल्या के दर्शन कराए गए, क्या अहल्या ने वन्य-हवियों से पूजन-सत्कार किया, क्या इन्द्र के अपराध से जुड़ी प्राचीन कथा राम को सुनाई गई, और क्या राम की उपस्थिति से अहल्या का गौतम से पुनर्मिलन हुआ। विश्वामित्र उत्तर देते हैं कि जो कुछ आवश्यक था, उसमें कुछ भी शेष नहीं रहा; अहल्या का गौतम से पुनः संयोग हो गया, जैसे रेणुका का जमदग्नि से। तब शतानन्द राम का विधिवत् स्वागत करते हैं और विश्वामित्र को अचिन्त्य कर्मों वाले ब्रह्मर्षि कहकर स्तुति करते हुए उन्हें राम का रक्षक-मार्गदर्शक बताते हैं, जिससे राम की यात्रा तपस्वी-परम्परा की स्वीकृति से प्रतिष्ठित होती है। इसके बाद सर्ग इतिहास-क्रम में प्रवेश करता है—विश्वामित्र का पूर्व राजत्व, धर्मपूर्वक शासन, और कुश → कुशनाभ → गाधि → विश्वामित्र की वंशावली। अंत में वसिष्ठ के आश्रम का सजीव वर्णन आता है—मानो दूसरा ब्रह्मलोक; सिद्ध, चारण, देवरषि, ब्रह्मर्षि और विविध तपस्वी-व्रतों से परिपूर्ण, जहाँ कोई जलाहार करता है, कोई वायु-आहार, कोई पर्ण-फल-मूल पर जीवन धारण करता है—और यहीं से वसिष्ठ–विश्वामित्र प्रसंग की भूमिका बनती है।
वसिष्ठ-आतिथ्यं (Vasiṣṭha’s Hospitality to Viśvāmitra and the Summoning of Śabalā/Kāmadhenu)
इस 52वें सर्ग में आतिथ्य-धर्म के माध्यम से राजबल और तपोबल का औपचारिक साक्षात्कार दिखाया गया है। महाबली, पराक्रमी विश्वामित्र हर्षपूर्वक वसिष्ठ के आश्रम में आते हैं, आदर से प्रणाम करते हैं। वसिष्ठ उनका स्वागत कर आसन देते हैं और वन के फल-मूल आदि से यथोचित सत्कार करते हैं। फिर दोनों ओर से कुशल-प्रश्न होते हैं—तपस्या, अग्निहोत्र, शिष्यों और आश्रम के वृक्षों तक; इसके बाद वसिष्ठ राजा से रजधर्म की दृष्टि से राज्य-व्यवस्था पूछते हैं—प्रजा, सेवक, कोष, सेना, मित्र-राज्य और उत्तराधिकारियों का कल्याण कैसा है। दीर्घ सौहार्दपूर्ण वार्ता के बाद वसिष्ठ राजा और उसकी सेना के लिए अधिक विस्तृत अतिथि-सत्कार का प्रस्ताव रखते हैं। विश्वामित्र पहले विनय से कहते हैं कि फल-मूल और ऋषि-दर्शन ही पर्याप्त हैं, पर वसिष्ठ बार-बार आग्रह करते हैं। स्वीकृति मिलने पर वसिष्ठ चितकबरी गौ शबला (कामधेनु) को बुलाकर आज्ञा देते हैं कि वह षड्रसयुक्त प्रचुर अन्न-पान—पेय, खाद्य, लेह्य और चोष्य—उत्पन्न करे। इस प्रकार आश्रम की समृद्धि, तपः-शक्ति और अतिथि-पूजन की धर्ममय मर्यादा का प्रभावपूर्ण चित्रण होता है।
शबलाप्रार्थना-वसिष्ठप्रतिज्ञा (The Request for Śabalā and Vasiṣṭha’s Refusal)
इस सर्ग में वसिष्ठ के आश्रम में शबला (कामधेनु) के सामर्थ्य से हुए अद्भुत आतिथ्य से प्रसन्न होकर विश्वामित्र प्रशंसा करते हैं, परन्तु राजा होने के अधिकार का दावा करते हुए शबला को “रत्न” मानकर मांग लेते हैं। वे पहले एक लाख गायों का विनिमय प्रस्ताव रखते हैं, फिर प्रस्ताव बढ़ाते हुए चौदह हजार स्वर्णाभूषित हाथी, आठ सौ स्वर्ण रथ चार श्वेत अश्वों सहित, ग्यारह हजार उत्तम घोड़े, और अंत में एक करोड़ तरुण गायें तथा असीम रत्न-स्वर्ण देने की बात कहते हैं। वसिष्ठ बार-बार विनम्र किंतु दृढ़ता से अस्वीकार करते हैं—शबला ही उनका रत्न, धन और प्राण है; जैसे धर्मात्मा से कीर्ति अलग नहीं होती, वैसे ही वे शबला से अलग नहीं हो सकते। वे बताते हैं कि हव्य-कव्य, अग्निहोत्र का पालन, बलि-होम, स्वाहा-वाषट की सिद्धि और विद्याओं की प्रवृत्ति तक शबला पर आश्रित है; अतः उसे वस्तु की तरह खरीदा-बेचा नहीं जा सकता। इस प्रकार अध्याय में ब्रह्मर्षि की स्वायत्तता और पवित्र साधनों की अविक्रेयता प्रतिपादित होती है। अंत में विश्वामित्र का क्षोभ बढ़ता है और अर्थ-समर्थ राजकीय अधिग्रहण तथा धर्म-समर्थ तपोयज्ञाधिकार के बीच नैतिक टकराव स्पष्ट हो जाता है।
शबलाहरणम् · The Attempted Seizure of Sabalā (Kāmadhenu) and the Triumph of Brahmic Power
इस सर्ग में क्षात्र-बल (राजसत्ता का दमनकारी बल) और ब्रह्म-बल (ब्रह्मर्षि की तपोमय, यज्ञीय सत्ता) का न्यायिक-आध्यात्मिक संघर्ष दिखाया गया है। वसिष्ठ जब कामधेनु शबला को देने से इंकार करते हैं, तब विश्वामित्र बलपूर्वक उसे खींचकर ले जाने लगता है। शबला व्याकुल होकर सोचती है कि कहीं उसे त्याग तो नहीं दिया गया; वह राजसेवकों के बंधन से छूटकर सीधे वसिष्ठ की शरण में जाती है। वसिष्ठ स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने उसे नहीं छोड़ा—राजा बल से हर रहा है; वे विश्वामित्र की राज-प्रतिष्ठा और अक्षौहिणी सेना की लौकिक शक्ति को मानते हुए भी उससे ऊपर ब्रह्म-बल की ओर संकेत करते हैं। शबला सिद्धान्तपूर्वक कहती है कि ब्राह्मण-बल क्षत्रिय-बल से श्रेष्ठ, दिव्य और अपरिमेय है। वसिष्ठ की आज्ञा से वह अपने ‘हुम्भा’ शब्द से पप्लवों को उत्पन्न करती है, जो विश्वामित्र की सेना को परास्त करते हैं; उनके मारे जाने पर शकों और यवनों सहित अन्य दल प्रकट होकर शेष सेना को जला-भगा देते हैं। विश्वामित्र अस्त्रों का प्रयोग कर इन उत्पन्न सेनाओं को तितर-बितर कर देता है। इस प्रकार यह अध्याय राजनीति-बल, चमत्कारी सृष्टि-बल और मन्त्र-आधारित अस्त्र-बल की परतें दिखाकर विश्वामित्र के भीतर ब्रह्मर्षि-पद पाने की तीव्र प्रेरणा को और प्रखर करता है।
कामधेनुसैन्यप्रादुर्भावः · Kamadhenu’s Forces, Visvamitra’s Austerities, and Vasishta’s Wrath
इस सर्ग में क्षात्रबल और ब्रह्मतेज का संघर्ष और तीव्र हो जाता है। विश्वामित्र की सेना जब दिव्य अस्त्रों से दब जाती है, तब वसिष्ठ कामधेनु को योगबल से नई-नई सेनाएँ उत्पन्न करने की आज्ञा देते हैं। कामधेनु के शरीर और नाद से अनेक दल प्रकट होते हैं और वे शीघ्र ही विश्वामित्र की पूरी सेना का संहार कर देते हैं। क्रोध से भरे विश्वामित्र के पुत्र शस्त्र लेकर वसिष्ठ पर टूट पड़ते हैं, पर महर्षि के केवल हुंकार से वे भस्म हो जाते हैं। पुत्रहीन और सैन्यहीन होकर विश्वामित्र शोक में डूब जाते हैं; क्षत्रिय-रीति से एक शेष पुत्र को राज्य सौंपकर वे हिमालय की ढलानों पर महादेव को प्रसन्न करने हेतु तप करने चले जाते हैं। शिव प्रकट होकर वर देते हैं; विश्वामित्र धनुर्वेद के अंग-उपांग और रहस्यों सहित तथा समस्त दिव्य और अमानुष अस्त्रों के ज्ञान की याचना करते हैं और उसे प्राप्त कर लेते हैं। वर पाकर उनका गर्व बढ़ जाता है। वे वसिष्ठ को पराजित मानकर आश्रम लौटते हैं और ऐसे अस्त्र छोड़ते हैं कि तपोवन जलने लगता है; ऋषि, शिष्य, पशु और पक्षी भय से भागते हैं। वसिष्ठ सबको धैर्य बँधाते हैं और फिर क्रुद्ध होकर विश्वामित्र के आचरण की निंदा करते हुए अपना दंड यमदंड के समान उठाते हैं—यह संकेत देते हुए कि अहंकारी हिंसा के विरुद्ध अब ब्रह्मतेज का प्रचंड प्रतिकार होने वाला है।
बालकाण्ड ५६: विश्वामित्र-वसिष्ठ अस्त्रसंघर्षः (Visvamitra and Vasistha: Contest of Divine Weapons)
इस सर्ग में क्षत्रिय-बल (शस्त्र/अस्त्र) और ब्राह्मण-तेज का सिद्धान्तात्मक संघर्ष दिखाया गया है। वसिष्ठ के वचन सुनकर महाबली विश्वामित्र अग्नेयास्त्र उठाकर प्रहार का आदेश देते हैं, पर वसिष्ठ अपने ब्रह्मदण्ड से उसे शांत कर देते हैं—यह दर्शाते हुए कि ब्राह्मण-तेज अस्त्र-बल से श्रेष्ठ है। इसके बाद विश्वामित्र वरुण, रौद्र, ऐन्द्र, पाशुपत आदि तथा मोहन, स्वापन, धर्मचक्र, विष्णुचक्र जैसे अनेक विशेष अस्त्रों का प्रयोग करते हैं। समस्त जगत् भयावह दृश्य से व्याकुल हो उठता है, किंतु ब्रह्मा-पुत्र वसिष्ठ अपने दण्ड-तेज से उन सबको मानो ‘निगल’ लेते हैं। अंत में विश्वामित्र ब्रह्मास्त्र छोड़ते हैं, जिससे तीनों लोक, देव-ऋषि-गन्धर्व और महान नाग भी आतंकित हो जाते हैं। वसिष्ठ ब्राह्मण-ऊर्जा से ब्रह्मास्त्र को भी उपसंहृत कर लेते हैं और क्रोधरूप धारण कर रोमकूपों से ज्वालाएँ प्रकट करते हैं। ऋषिगण उनकी स्तुति कर लोक-कल्याण हेतु संयम का निवेदन करते हैं। पराजित विश्वामित्र को बोध होता है कि ब्रह्म-तेज क्षत्रिय-बल से बढ़कर है; तब वे ब्रह्मत्व प्राप्त करने के लिए महान तप करने का संकल्प करते हैं।
विश्वामित्रस्य दक्षिणतपः तथा त्रिशङ्कोः स्वशरीरेण स्वर्गगमनाभिलाषः (Visvamitra’s Southern Austerity and Trisanku’s Bodily Ascent Aspiration)
विश्वामित्र अपने पूर्व अपमान और वसिष्ठ से उत्पन्न वैर को स्मरण कर मुख्य रानी सहित दक्षिण दिशा में जाते हैं। वहाँ फल-मूल पर निर्वाह करते हुए, इन्द्रियों को वश में रखकर वे अत्यन्त कठोर तपस्या करते हैं। सहस्र वर्षों के तप के बाद ब्रह्मा प्रकट होकर उन्हें केवल ‘राजर्षि’ की उपाधि देते हैं; इससे विश्वामित्र का असंतोष बढ़ता है और वे उच्चतर आध्यात्मिक पद की आकांक्षा से पुनः अधिक कठोर तप में प्रवृत्त होते हैं। इसी बीच इक्ष्वाकुवंशी राजा त्रिशंकु, सत्यवादी और संयमी, एक अभूतपूर्व संकल्प करते हैं—अपने स्थूल शरीर सहित स्वर्ग जाने का। वे महायज्ञ द्वारा यह सिद्ध करना चाहते हैं, पर वसिष्ठ इसे असंभव कहकर अस्वीकार कर देते हैं। तब त्रिशंकु दक्षिण प्रदेश में वसिष्ठ के सौ तपस्वी पुत्रों के पास जाकर विनयपूर्वक शरण लेते हैं और उनसे यज्ञ कराने की प्रार्थना करते हैं, जिससे देह सहित स्वर्गगमन सिद्ध हो सके। इस सर्ग में तपोबल, यज्ञाधिकार और धर्मसम्मत आकांक्षा की मर्यादा—इन सबका तुलनात्मक चित्रण होता है।
त्रिशङ्कुशापः · Trishanku’s Curse and Appeal to Viśvāmitra
इस सर्ग में यज्ञाधिकार, गुरु-परंपरा की मर्यादा और नियुक्त आचार्य को छोड़कर दूसरे उपाय अपनाने की सीमा पर एक सुसंगठित धर्म-विवाद प्रस्तुत होता है। राजा त्रिशंकु देह सहित स्वर्गारोहण की इच्छा से वसिष्ठ से प्रार्थना करता है, पर वसिष्ठ उसे स्वीकार नहीं करते। तब त्रिशंकु वसिष्ठ के सौ पुत्रों के पास जाता है; वे सत्यनिष्ठ गुरु की आज्ञा को लाँघकर मार्ग बदलने के प्रयास पर उसे कठोर वचन कहते हैं और इसे इक्ष्वाकु कुल की पुरोहित-परंपरा का अपमान मानते हैं। जब त्रिशंकु कहता है कि वह कोई और उपाय करेगा, तो क्रुद्ध पुत्र उसे चाण्डाल होने का शाप दे देते हैं। शाप रातोंरात फलित होता है—उसके शरीर और सामाजिक स्थिति पर चिह्न प्रकट हो जाते हैं; मंत्री, प्रजा और अनुयायी भयभीत होकर उसे छोड़ देते हैं। अकेला और व्याकुल त्रिशंकु विश्वामित्र की शरण में जाता है; विश्वामित्र करुणा से कारण पूछते हैं। त्रिशंकु अपने व्रत-सदृश संकल्प, यज्ञों का पुण्य, धर्मपूर्वक राज्य-पालन और सत्य-प्रतिज्ञा का स्मरण कराता है, और कहता है कि मानो विधि ने उसके पुण्य पर आघात किया है। वह विश्वामित्र से निवेदन करता है कि पुरुषार्थ द्वारा भाग्य का प्रतिकार किया जाए। इस प्रकार यह प्रसंग धर्म, अधिकार, शाप-प्रभाव और पुरुषार्थ–दैव के तनाव पर विचार कराता है।
विश्वामित्रस्य शरणागति-प्रशंसा तथा वासिष्ठपुत्र-शापः (Visvamitra grants refuge; the curse upon Vasishta’s sons)
इस सर्ग में शरणागति-धर्म, यज्ञ की मर्यादा और तपस्वी-वाणी की दण्ड-शक्ति का सुस्पष्ट निरूपण है। शाप से चाण्डाल-रूप धारण किए हुए राजा को देखकर विश्वामित्र करुणा से उसे धैर्य बँधाते हैं, उसकी स्थिति की सत्यता स्वीकार कर उसे स्पष्ट रूप से शरण देते हैं। फिर वे शिष्यों को आज्ञा देते हैं कि आगामी यज्ञ के लिए अनेक ऋषियों और ब्रह्मवादियों को बुलाएँ, और यदि कोई उनकी आज्ञा का अनादर करे तो उसका वृत्तान्त भी यथावत् बतलाएँ। शिष्य लौटकर कहते हैं कि अनेक प्रदेशों से ब्राह्मण आ गए हैं, पर महोदय के विषय में विशेष बाधा/अपवाद है। वे वसिष्ठ के सौ पुत्रों के क्रोधपूर्ण वचन भी सुनाते हैं—कि एक क्षत्रिय का पुरोहित बनना कैसे उचित है, वह भी चाण्डाल के लिए; और ऐसे यजमान से सम्बन्धित हवि का सेवन करने से अनिष्ट होगा। यह सुनकर विश्वामित्र का रोष शाप में परिणत होता है—वे अपराधी हीन योनियों में जन्म लें और कठोर जीविका से जीवन बिताएँ; तथा महोदय को दीर्घकाल तक निषाद-रूप में दीन-दशा भोगने का शाप मिलता है। अंत में ऋषि-सभा में विश्वामित्र मौन हो जाते हैं, धर्म-सीमा और तपस्वी के अपमान के घोर परिणाम को प्रकट करते हुए।
त्रिशङ्कुस्वर्गारोহণम् · Trishanku’s Bodily Ascent and the New Constellations
इस सर्ग में विश्वामित्र के तपोबल और त्रिशंकु की देह सहित स्वर्ग जाने की इच्छा का धर्म–अधर्म के संदर्भ में गहन वर्णन है। वसिष्ठों से पूर्व वैर स्मरण कर विश्वामित्र यज्ञ आरम्भ करते हैं और देवताओं को हवि-भाग के लिए विधिवत् आह्वान करते हैं; परन्तु देव उपस्थित नहीं होते। तब वे अपनी प्रतिज्ञा के बल से यज्ञ-शक्ति को त्रिशंकु के पक्ष में मोड़कर उसे सशरीर स्वर्गारोहण का आदेश देते हैं। इन्द्र गुरु-शाप से दूषित मानकर त्रिशंकु को अस्वीकार करते हैं और उसे सिर के बल नीचे गिराने की आज्ञा देते हैं। गिरते समय त्रिशंकु विश्वामित्र की शरण लेता है; विश्वामित्र उसे बीच में रोक देते हैं और क्रोध में दक्षिण दिशा में नये सप्तर्षि तथा नक्षत्र-मालाएँ रच देते हैं, यहाँ तक कि नये इन्द्र की सृष्टि की भी धमकी देते हैं। ऋषि, सुर और असुर भयभीत होकर सभा करते हैं और समझौता होता है—त्रिशंकु विश्वामित्र-निर्मित नये दिव्य प्रदेश में उल्टा होकर भी तेजस्वी रूप से मध्य में स्थिर रहेगा, और रची हुई तारकाएँ लोकों के रहने तक बनी रहेंगी। इस प्रकार यह अध्याय गुरु-शाप, देव-नियमन और ऋषि की सत्यप्रतिज्ञा—इन तीनों के बीच उत्पन्न नैतिक तनाव को प्रकट करता है।
शुनःशेफविक्रयः · The Sale of Śunaḥśepa for the Sacrifice
इस सर्ग में तपस्वियों के निवास-परिवर्तन और राजयज्ञ के संकट का संगम है। वन में ऋषियों को अन्यत्र जाते देखकर विश्वामित्र दक्षिण दिशा के एक बाधक प्रदेश से सबको हटाकर पश्चिम के विस्तृत क्षेत्र में पुष्कर ले जाते हैं और उसे कठोर तप के लिए श्रेष्ठ तपोवन मानकर वहीं निवास करते हैं। उधर अयोध्या के राजा अम्बरीष यज्ञ आरम्भ करते हैं, पर इन्द्र नियत यज्ञ-पशु को हर लेते हैं, जिससे यज्ञ की पूर्णता संकट में पड़ जाती है। पुरोहित इसे राजदोष से उत्पन्न मानकर तत्काल विकल्प—पशु या मनुष्य—लाने की मांग करते हैं। अम्बरीष अनेक देशों में खोज करते हुए भारी मूल्य के रूप में असंख्य गौएँ देने का प्रस्ताव रखते हैं और अंततः भृगुतुण्ड में ब्रह्मर्षि ऋचीक को परिवार सहित पाते हैं। राजा यज्ञार्थ एक पुत्र को क्रय करने की प्रार्थना करते हैं; ऋचीक ज्येष्ठ पुत्र को बेचने से इंकार करते हैं और माता कनिष्ठ शुनक को छोड़ने से मना करती हैं। माता-पिता के इस पक्षपात को समझकर मध्यम पुत्र शुनःशेफ स्वयं को अर्पित कर देता है; अम्बरीष उसे एक लाख गौओं में खरीदकर शीघ्र लौट पड़ते हैं—यज्ञ-व्रत की कठोरता, पारिवारिक आसक्ति और यज्ञ-आवश्यकता से उत्पन्न नैतिक दबाव को उजागर करते हुए।
शुनश्शेफरक्षा-विश्वामित्रशापः (Sunassepha’s Rescue and Visvamitra’s Curse)
इस सर्ग में पुष्कर-तीर्थ की पवित्र भूमि पर राजा अम्बरीष के यज्ञ-संकट का वर्णन है। शुनश्शेफ को साथ लेकर राजा मध्याह्न में ठहरता है। दुःखी बालक वहाँ अपने मामा विश्वामित्र को अन्य ऋषियों के साथ तप करते देखता है और धर्म-वचन कहकर शरण माँगता है—ऋषि सबके रक्षक हैं और यज्ञ अधर्म से पूर्ण नहीं होना चाहिए। विश्वामित्र उसे आश्वासन देकर अपने पुत्रों से कहते हैं कि अग्नि की तुष्टि और यज्ञ की रक्षा हेतु वे स्वयं बलि-स्थान पर प्रस्तुत हों। पुत्र आत्महित में डूबे हुए इस बात को घोर और अनुचित कहकर अस्वीकार कर देते हैं। तब क्रोधित विश्वामित्र उन्हें शाप देते हैं कि वे हजार वर्षों तक श्वमांस-भोजी होकर पतित जातियों के समान जीवन बिताएँ। इसके बाद वे शुनश्शेफ को दो दिव्य गाथाएँ/मंत्र सिखाते हैं—पहले अग्नि के लिए, फिर इन्द्र और उपेन्द्र के लिए। शुनश्शेफ यज्ञशाला में लौटकर वैष्णव यूप पर पवित्र रस्सियों से बाँधा जाता है और लाल अलंकारों से सजाया जाता है। उसके स्तोत्रों से इन्द्र प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु प्रदान करते हैं; अम्बरीष यज्ञ पूर्ण कर अनेक गुना फल पाते हैं। अंत में विश्वामित्र पुष्कर में दीर्घ तप में प्रवृत्त होकर यज्ञ-परंपरा, शरणागत-रक्षा और तपस्वी-क्रोध की तीव्रता का संदेश दृढ़ करते हैं।
विश्वामित्रस्य तपोविघ्नः, मेनकाप्रसङ्गः, महर्षिपदप्रदानम् (Visvamitra’s Austerity Obstructed; Menaka Episode; Conferment of Maharshi Status)
इस सर्ग में तपस्या की परीक्षा और देवताओं की प्रतिक्रिया का क्रम बताया गया है। विश्वामित्र सहस्र वर्षों तक घोर तप करके अंत में स्नान-विधि पूर्ण करते हैं। तब देवगण तप का “फल” देने के उद्देश्य से आते हैं, पर कथा इसे उनकी आध्यात्मिक परिपक्वता की परीक्षा के रूप में प्रस्तुत करती है। पुष्कर में अप्सरा मेनका के द्वारा काम-प्रलोभन आता है। विश्वामित्र कामवश होकर उसे आश्रम में रहने का निमंत्रण देते हैं और दिन-रात के बहाने दस वर्ष बीत जाते हैं। फिर उन्हें पश्चात्ताप होता है; वे इसे तप का विघ्न समझकर मधुर वचनों से मेनका को विदा करते हैं और नैष्ठिक बुद्धि से आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प लेकर कौशिकी तट तथा आगे उत्तर पर्वतों में अत्यंत कठोर तप आरम्भ करते हैं, जिससे देवता भयभीत हो उठते हैं। देव-परामर्श के बाद ब्रह्मा उन्हें “महर्षि” पद प्रदान करते हैं। विश्वामित्र निर्विकार रहकर कहते हैं कि यह पद तभी सार्थक है जब इन्द्रियाँ जीती हों; ब्रह्मा बताते हैं कि अभी पूर्ण संयम सिद्ध नहीं हुआ और लौट जाते हैं। अंत में विश्वामित्र ऊर्ध्वबाहु, वायु-आहार, पंचतप और ऋतु-सहन जैसी तपश्चर्याएँ बढ़ाते हैं; देवताओं की चिंता फिर बढ़ती है और इन्द्र रम्भा को भेजने की योजना बनाते हैं—यह संकेत देते हुए कि तप को इन्द्रिय-जय से ही पूर्णता मिलती है।
रम्भा-प्रलोभनम् · Rambhā’s Temptation and Viśvāmitra’s Curse
इस 64वें सर्ग में तपस्या की क्षोभ के सामने नाजुकता दिखाई गई है। देवों के हित के लिए सहस्राक्ष इन्द्र वसन्त-काल में कन्दर्प की सहायता और मनोहर कोकिल-गान के सहारे अप्सरा रम्भा को कौशिक विश्वामित्र को काम-मोह में फँसाने के लिए भेजते हैं। मुनि के शाप से भयभीत रम्भा भी दिव्य रूप धारण कर उनके आश्रम की ओर जाती है। विश्वामित्र कोकिल का अनुपम स्वर सुनकर और रम्भा को देखकर इन्द्र की चाल पहचान लेते हैं। क्रोधावेश में वे रम्भा को दस हज़ार वर्षों तक शिला होने का शाप देते हैं, साथ ही यह भी कहते हैं कि तपोबल से युक्त कोई तेजस्वी ब्राह्मण आगे चलकर उसे मुक्त करेगा। शाप देने के बाद उन्हें पश्चात्ताप होता है; वे इसे इन्द्रिय-असंयम से तप-क्षय मानकर क्रोध और वाणी का त्याग, प्राण-निग्रह और दीर्घकालीन निराहार तप का संकल्प लेते हैं—ब्राह्मणत्व प्राप्ति हेतु एक सहस्र-वर्ष का अनुपम अनुष्ठान। इस प्रकार सर्ग में देव-हस्तक्षेप, नैतिक उत्तरदायित्व और तपोबल की आन्तरिक मर्यादा का संगम दिखता है।
विश्वामित्रस्य ब्राह्मर्षित्वप्राप्तिः · Viśvāmitra Attains Brahmarṣi Status
इस सर्ग में शतानन्द विश्वामित्र के क्षत्रिय-तपस्वी से ब्रह्मर्षि बनने की अंतिम सिद्धि का विद्वत् वर्णन करते हैं—तपस्या की विधि, इन्द्र की परीक्षा और उसके त्रैलोक्य-प्रभाव को स्पष्ट करते हुए। विश्वामित्र हिमालय-प्रदेश छोड़कर पूर्व दिशा में घोर तप करते हैं। वे एक सहस्र वर्ष का मौन-व्रत निभाते हैं। व्रत पूर्ण होने पर इन्द्र ब्राह्मण-रूप में आकर उनके लिए तैयार अन्न माँगते हैं; विश्वामित्र बिना बोले सब अर्पित कर देते हैं और फिर और कठोर साधना में प्रवृत्त होते हैं—दूसरे सहस्र वर्ष तक प्राण-निग्रह करके तप करते हैं। तब उनके मस्तक से धुआँ उठता है और तीनों लोक विचलित हो जाते हैं—अन्धकार छा जाता है, पृथ्वी काँपती है, समुद्र उद्विग्न होते हैं, पर्वत फटने लगते हैं और सूर्य का तेज मन्द पड़ जाता है। देवगण भयभीत होकर ब्रह्मा के साथ उन्हें शान्त करने आते हैं, प्रसन्नता प्रकट करते हैं और स्वीकार करते हैं कि उन्होंने तीव्र तप से ब्राह्मण्य प्राप्त कर लिया है। विश्वामित्र वसिष्ठ से औपचारिक मान्यता चाहते हैं; देवताओं के आग्रह से वसिष्ठ उन्हें ‘ब्रह्मर्षि’ कहकर स्वीकार करते हैं और मैत्री स्थापित करते हैं। फिर कथा मिथिला में लौटती है—शतानन्द वर्णन समाप्त करते हैं; जनक राम-लक्ष्मण के सामने हाथ जोड़कर विश्वामित्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और सायंकालीन कर्मों के लिए अनुमति माँगते हैं, तत्पश्चात सब लोग आदरपूर्वक विश्राम को जाते हैं।
शिवधनुर्न्यासकथा तथा सीतोत्पत्तिविवाहशुल्क-निश्चयः (The Bow of Śiva: Its Deposit, Sītā’s Origin, and the Prowess-Brideprice Vow)
प्रातःकाल राजा जनक ने अपने नित्यकर्म पूर्ण करके महर्षि विश्वामित्र का, तथा उनके साथ आए राम और लक्ष्मण का विधिपूर्वक स्वागत किया और सेवा-निवेदन किया। तब विश्वामित्र ने जनक से कहा कि ये दोनों राजकुमार आपके संरक्षण में रखे अद्भुत शिवधनुष को देखने की इच्छा रखते हैं। जनक ने धनुष का इतिहास सुनाया—दक्ष के यज्ञ में रुद्र ने धनुष उठाकर देवताओं को उनके यज्ञ-भाग की उपेक्षा के कारण भयभीत किया; देवताओं ने शंकर की शरण लेकर स्तुति की, तब प्रसन्न होकर महादेव ने वह धनुष परंपरा से सुरक्षित रखने हेतु सौंप दिया, जो आगे चलकर जनक के कुल की धरोहर बना। फिर जनक ने सीता की उत्पत्ति बताई—यज्ञभूमि को शुद्ध करते हुए जब वे हल चला रहे थे, तब पृथ्वी से वह प्रकट हुई; वह अयोनिजा थी और पुत्री की भाँति उनके यहाँ पली-बढ़ी। जनक ने विवाह की कठोर शर्त भी निश्चित की—जो वीर उस धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा सके, वही सीता का वर होगा। अनेक राजा आए, पर धनुष उठाना तो दूर, हिला भी न सके; जनक ने उन्हें असमर्थ जानकर लौटा दिया। अपमानित होकर उन्होंने एक वर्ष तक मिथिला को घेर लिया; नगर की सामग्री क्षीण होने लगी। तब जनक ने तप किया, दिव्य चतुरंगिणी सेना प्राप्त कर आक्रमणकारियों को पराजित किया और वे भाग गए। अंत में जनक ने राम-लक्ष्मण को वह तेजस्वी धनुष दिखाने का वचन दिया और कहा कि यदि राम उसे उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा दें, तो वे सीता को राम को अर्पित करेंगे।
शिवधनुर्दर्शनं · रामेण धनुर्भङ्गश्च (The Showing of Śiva’s Bow and Rama’s Breaking of It)
मिथिला में विश्वामित्र की प्रार्थना सुनकर राजा जनक ने पूज्य दिव्य शिवधनुष को मँगाने की आज्ञा दी। मंत्रियों ने उसे लोहे के संदूक में रखकर आठ पहियों वाले रथ पर बड़े परिश्रम से लाया, जिससे उसके अतिमानवीय भार और पवित्रता का बोध हुआ। जनक ने विश्वामित्र और राजकुमारों से कहा कि देव, असुर, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, नाग और किन्नर—अत्यन्त बलवान होकर भी—इस धनुष को न तो चढ़ा सके, न उठा सके। विश्वामित्र के संकेत पर राम ने संदूक खोला और धनुष को छूने, उठाने तथा प्रत्यंचा चढ़ाने की अनुमति माँगी। फिर हजारों के सामने उन्होंने सहज भाव से धनुष उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और खींचा; तभी धनुष बीच से टूट गया। मेघगर्जन-सा भयंकर शब्द हुआ और पृथ्वी काँप उठी; जनक, विश्वामित्र और दोनों राघवों को छोड़कर अधिकांश दर्शक मूर्छित हो गए। सब शांत होने पर जनक ने राम के अचिन्त्य पराक्रम की प्रशंसा की, अपने ‘वीर्य-शुल्क’ के व्रत को पूर्ण माना और सीता को राम को देने का निश्चय किया। तत्पश्चात उन्होंने दूतों को अयोध्या भेजकर दशरथ को बुलाने और समस्त वृत्तान्त विस्तार से निवेदित करने का आदेश दिया।
जनकदूतागमनम् · The Arrival of Janaka’s Messengers in Ayodhya
यह सर्ग मिथिला के धनुष-यज्ञ के परिणाम और अयोध्या के राजकीय निर्णय के बीच कूटनीतिक सेतु का कार्य करता है। जनक के दूत तीन दिन की यात्रा और तीन रातों के मार्ग-श्रम से थके हुए अयोध्या पहुँचते हैं और द्वारपालों से निवेदन कर राज-दर्शन की अनुमति माँगते हैं। सभा में प्रवेश पाकर वे वृद्ध दशरथ को विनयपूर्ण, मधुर वाणी से प्रणाम करते हैं और जनक के बार-बार किए गए कुशल-प्रश्न सुनाते हैं—राजा, आचार्यों और पुरोहितों की कुशलता पूछते हुए, यज्ञाग्नि को अग्र में रखकर विधि-पालन का संकेत देते हैं। फिर वे निर्णायक समाचार देते हैं कि महान सभा में राम ने दिव्य धनुष तोड़ दिया है; इससे जनक की वह प्रतिज्ञा सिद्ध हुई कि सीता ‘वीर्य-शुल्क’—पराक्रम के पुरस्कार—रूप में उसी को दी जाएगी जो धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा सके। जनक दशरथ की सम्मति चाहता है, आचार्यों और कुल-पुरोहित सहित शीघ्र मिथिला आने का निमंत्रण देता है और राजकुमारों के दर्शन से दोनों कुलों को समान आनंद होगा—ऐसा आश्वासन देता है। दूतों के निवेदन के बाद दशरथ हर्षित होते हैं और वसिष्ठ, वामदेव, अन्य मंत्रियों तथा उपस्थित ऋषियों से परामर्श करते हैं। सबकी सहमति मिलने पर राजा अगले ही दिन मिथिला प्रस्थान की घोषणा करते हैं—और वृत्तांत से राजकीय कर्म की ओर कथा का संक्रमण होता है।
एकोनसप्ततितमः सर्गः · Daśaratha’s Departure to Videha and Marriage Arrangements
इस सर्ग में रात्रि बीतने पर राजा दशरथ अपने पुरोहितों और बंधुओं सहित सुमंत्र को आदेश देते हैं। वे कहते हैं कि कोषाध्यक्ष बहुत-सा धन और विविध रत्न लेकर पहले चलें, रथ-हाथी-घोड़े-पैदल की चतुरंगिणी सेना शीघ्र वाहनों सहित तैयार हो, और जनक के दूतों की उतावली के कारण विलंब न हो—इसलिए वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, मार्कण्डेय और कात्यायन आदि श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि अग्रिम रूप से प्रस्थान करें। इस प्रकार समस्त दल यात्रा कर चार दिनों में विदेह पहुँचता है। जनक आगमन का समाचार पाकर आदरपूर्ण आतिथ्य की व्यवस्था करते हैं और वृद्ध दशरथ का ‘दिष्ट्या’ कहकर मंगल-वचन से स्वागत करते हैं। वे इस मिलन को राजकुमारों के पराक्रम का फल बताते हैं, वसिष्ठ के आगमन की इन्द्र-सदृश प्रशंसा करते हैं, और रघुवंश से संबंध होने को विघ्न-निवारण तथा कुल-गौरव की वृद्धि मानते हैं। वे निवेदन करते हैं कि प्रातः यज्ञ-समाप्ति के बाद ऋषियों की सम्मति से विवाह-संस्कार संपन्न किया जाए। दशरथ धर्म-सम्बद्ध, संयत वाणी में प्रस्ताव स्वीकार कर धर्मसम्मत परामर्श के अनुसार करने की प्रतिज्ञा करते हैं। फिर ऋषि और राजा परस्पर हर्ष के साथ रात्रि बिताते हैं; जनक यज्ञ तथा अपनी पुत्रियों के लिए आवश्यक मंगल-क्रियाएँ पूर्ण करते हैं।
वंशवर्णनम् तथा विवाहप्रार्थना · Genealogy of the Ikshvaku Line and the Proposal for Marriage
प्रातःकाल नित्यकर्म और यज्ञादि अनुष्ठान पूर्ण कर मिथिला में राजा जनक अपने पुरोहित शतानन्द से राजकार्य की व्यवस्था पर विचार करते हैं। वे दूतों को भेजकर इक्षुमती नदी के तट पर सांकाश्या में रहने वाले अपने छोटे भाई कुशध्वज को बुलाते हैं। कुशध्वज शीघ्र आकर जनक को प्रणाम करते हैं और राजोचित सम्मान के साथ आसन ग्रहण करते हैं। उसी क्रम में मिथिला-सभा दशरथ को भी आमंत्रित करती है; प्रधान मंत्री सुदामन दूत बनकर जाते हैं। दशरथ ऋषियों, आचार्यों, पुरोहितों, मंत्रियों और स्वजनों सहित मिथिला पहुँचते हैं और सत्कार पाते हैं। दशरथ विधि-सम्बन्धी वचनों के लिए वसिष्ठ को अधिकृत वक्ता नियुक्त करते हैं, और विश्वामित्र भी इसकी स्वीकृति देते हैं। तब वसिष्ठ ब्रह्मा से लेकर मरीचि, कश्यप, विवस्वान, मनु तथा इक्ष्वाकु वंश का क्रमशः वर्णन करते हुए दशरथ और उनके पुत्रों तक वंशावली सुनाते हैं। यह वंशवर्णन शुद्ध वंश, सत्यनिष्ठा और राजधर्म की प्रतिष्ठा का प्रमाण बनता है। अंत में वसिष्ठ जनक से स्पष्ट प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह राम और लक्ष्मण से करें—यह संयोग पुण्य और वंशोचित मर्यादा के अनुरूप है।
जनककुलवर्णनम् तथा सीतोर्मिलादानम् (Janaka’s Genealogy and the Bestowal of Sita and Urmila)
इस सर्ग में राजसभा का शिष्ट, विधिपूर्ण संवाद है। इक्ष्वाकुवंश का वर्णन सुनकर जनक वसिष्ठ से कहते हैं कि कन्या-प्रदान के समय कुल की वंशावली का पूर्ण उच्चारण करना धर्म है। फिर वे विदेह वंश का क्रम बताते हैं—प्रसिद्ध राजा निमि से लेकर मिथि (मिथिला के निर्माता) और आगे जनकों की परंपरा, अंत में ह्रस्वरोमा; जिनके दो पुत्र हैं—स्वयं जनक और छोटे भाई कुशध्वज। जनक अपने पिता के वन-गमन, अपने राज्यारोहण, धर्मपूर्वक शासन तथा कुशध्वज के प्रति स्नेहपूर्ण संरक्षण का उल्लेख करते हैं। इसके बाद राजनीतिक संकट आता है—सांकाश्य के राजा सुधन्वा शिवधनुष और सीता की मांग करता है। जनक अस्वीकार करते हैं, युद्ध में उसे मारकर सांकाश्य का राज्य कुशध्वज को सौंप देते हैं। अंततः सार्वजनिक विवाह-घोषणा होती है—जनक आनंदपूर्वक सीता को राम को और ऊर्मिला को लक्ष्मण को प्रदान करते हैं; विधि-निश्चय हेतु दान-वचन तीन बार दोहराते हैं। वे दशरथ को गो-दान और पितृकर्म आदि का निर्देश देते हैं तथा शुभ मुहूर्त बताते हैं—मख नक्षत्र के उदय पर, उत्तर-फाल्गुनी में तीसरे दिन विवाह।
वैवाहिकसंबन्ध-निश्चयः / Fixing the Mithila-Ayodhya Marital Alliance
इस सर्ग में मिथिला और अयोध्या के राजवंशों का वैवाहिक-संबन्ध सभा में संवाद और विधिपूर्वक तैयारी के साथ निश्चित होता है। जनक के वंश-वर्णन के बाद विश्वामित्र, वसिष्ठ के समर्थन से, इक्ष्वाकु और विदेह कुलों की अतुल महिमा बताकर ‘सदृश’ (उचित) विवाह का परामर्श देते हैं—सीता का राम से, उर्मिला का लक्ष्मण से; तथा कुशध्वज की दोनों कन्याओं का भरत और शत्रुघ्न को देने का प्रस्ताव भी रखते हैं। जनक हाथ जोड़कर यह सम्मति स्वीकार करते हैं, अपने कुल को धन्य मानते हैं और फाल्गुनी नक्षत्रों से युक्त, भग-प्रजापति के प्रशस्त मुहूर्त में विवाह निश्चित करते हैं। वे ऋषियों को आसन देकर मिथिला और अयोध्या की राजसत्ता की समता का आश्वासन देते हैं तथा विधि-व्यवस्था के लिए यथोचित नेतृत्व का आमंत्रण करते हैं। दशरथ कृतज्ञता से स्तुति कर फिर पुत्रों के निमित्त श्राद्ध-कर्म और दीक्षापूर्वक गो-दान करते हैं। वे ब्राह्मणों को बहुसंख्यक गौएँ, जिन पर वस्त्र-आभूषण और धन-सम्पदा सहित दान देते हैं। अंत में दशरथ पुत्रों से घिरे प्रजापति के समान लोकपालों के बीच शोभित दिखते हैं—जिससे यह राजनीतिक गठबंधन यज्ञ-दान द्वारा पवित्र और दिव्य रूप पाता है।
त्रिसप्ततितमः सर्गः (Sarga 73): Mithilā Vivāha · Kanyādāna and the Fourfold Marriage Rites
इस सर्ग में मिथिला में विवाह-संस्कारों का विधिवत् संपादन वर्णित है। उसी दिन भरत के मामा युधाजित् आते हैं और दशरथ आदर्श गो-दान करके राजधर्म की दानशीलता को शुभ समय से जोड़ते हैं। सत्कार और प्रातःकर्म के बाद राम और उनके भ्राता, पूर्ण अलंकरण तथा विवाह-पूर्व विधियों को पूर्ण कर, वसिष्ठ आदि महर्षियों के साथ दशरथ के पास आते हैं। वसिष्ठ जनक से, कन्यादाता के रूप में, विवाह-कार्य आरम्भ करने का निवेदन करते हैं। जनक हर्षपूर्वक कहते हैं कि अपने ही घर में संकोच कैसा—उनकी कन्याएँ वेदी पर प्रस्तुत हैं। वे वसिष्ठ को वैवाहिक क्रिया कराने का अधिकार देते हैं; वसिष्ठ वेदी बनाकर सजाते हैं, अग्नि की स्थापना करते हैं और मंत्रोच्चार सहित आहुतियाँ देते हैं। जनक सीता को अग्नि और राम के सम्मुख लाकर कन्यादान करते हैं—सीता का हाथ राम के हाथ में रखकर ‘सहधर्मचारिणी’ होने की घोषणा करते हैं। तभी ‘साधु’ का दिव्य घोष, देवदुंदुभियाँ और पुष्प-वृष्टि से अनुमोदन होता है। फिर जनक उर्मिला को लक्ष्मण, मांडवी को भरत और श्रुतकीर्ति को शत्रुघ्न को प्रदान करते हैं; चारों राजकुमार वसिष्ठ की अनुमति से चारों हाथ ग्रहण कर अग्नि-वेदी की प्रदक्षिणा करते हुए विवाह पूर्ण करते हैं। गंधर्व-अप्सराओं के उत्सव और संगीत से मंडप गूँज उठता है, और अंत में सभी दंपति अपने-अपने आवासों को जाते हैं; दशरथ, ऋषि और स्वजन उन्हें साथ छोड़ने जाते हैं।
परशुरामप्रादुर्भावः · The Appearance of Parasurama on the Return from Mithila
रात्रि बीतने पर विश्वामित्र ने रघुकुल के दोनों राजकुमारों को आशीर्वाद दिया और उत्तर दिशा के पर्वतों (हिमालय) की ओर प्रस्थान किया। तब दशरथ ने जनक से विदा ली और अयोध्या लौटने लगे; जनक भी कुछ दूर तक साथ चले और कन्याधन के रूप में अपार दान दिया—गायों के बड़े-बड़े झुंड, उत्तम वस्त्र, स्वर्ण-रत्न आदि, दास-दासियाँ तथा चतुरंगिणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ, पैदल)। मार्ग में आगे-आगे ऋषि चल रहे थे कि पक्षियों के अशुभ-से क्रंदन सुनाई पड़े, जबकि मृग दाहिनी ओर से शुभ संकेत करते हुए चले। इन मिले-जुले निमित्तों से व्याकुल होकर राजा ने वसिष्ठ से पूछा। वसिष्ठ ने कहा—पक्षियों का शब्द किसी महान, दिव्य और कठोर घटना का सूचक है, पर मृग शमन और मंगल का संकेत देते हैं; इसलिए शोक त्यागो। तभी अचानक आँधी-बारिश और घोर अंधकार छा गया; सूर्य ढक गया और राख-सी धूल सेना पर छा गई, बहुत-से लोग मूर्छित हो गए, पर राजा, उनके पुत्र और प्रमुख ऋषि धैर्य से स्थिर रहे। उसी भयावह अंधकार में उन्होंने भृगुवंशी जामदग्न्य परशुराम को देखा—जटाधारी, तेजस्वी, हाथ में परशु, बिजली-से धनुष और प्रधान बाण सहित, त्रिपुरघ्न शिव के समान भयानक। उनके पूर्वकाल के क्षत्रिय-संहारक क्रोध को स्मरण कर मुनि सशंक हुए और अर्घ्य देकर मधुर वचनों से उन्हें शांत करने लगे। परशुराम ने सत्कार स्वीकार किया और फिर सीधे राम दाशरथि से बोलने लगे, जिससे आगे तपस्वी अधिकार, क्षात्र-वैधता और धर्म-संयम की परीक्षा का प्रसंग बनता है।
जामदग्न्य-रामसंवादः · Parashurama Confronts Rama with the Vaishnava Bow
इस सर्ग में शिवधनुष-भंग के बाद अत्यन्त गंभीर संवाद होता है। जामदग्न्य परशुराम वहाँ आकर राम के अद्भुत पराक्रम की प्रशंसा करते हैं और विश्वकर्मा-निर्मित अजेय वैष्णव धनुष का परिचय देते हैं। वे दो दिव्य धनुषों की उत्पत्ति बताते हैं—एक त्रिपुर-वध के प्रसंग में रुद्र को मिला और दूसरा विष्णु को सौंपा गया। फिर ब्रह्मा की प्रेरणा से देवताओं की जिज्ञासा के कारण शिव और विष्णु की शक्ति-परीक्षा का प्रसंग आता है; विष्णु के ‘हुंकार’ से शिव का धनुष निष्क्रिय हो जाता है और देव-ऋषि विष्णु को श्रेष्ठ मानते हैं। परशुराम आगे वैष्णव धनुष की मानव-परंपरा बताते हैं—विष्णु से ऋचीक, ऋचीक से जमदग्नि और जमदग्नि से परशुराम तक। वे कार्तवीर्य अर्जुन द्वारा अपने पिता जमदग्नि के अन्यायपूर्ण वध का स्मरण कर, प्रतिशोध में किए गए क्षत्रिय-संहार और फिर अपने विरक्त हो जाने का वर्णन करते हैं। राजा दशरथ पुत्रों की रक्षा के लिए विनती करते हैं, पर परशुराम उसे अनसुना कर देते हैं। वे राम को चुनौती देते हैं कि वैष्णव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर बाण संधान करें; यदि राम सफल हों तो द्वंद्व होगा—यह क्षत्रिय-धर्म, संयम और उचित अधिकार की कठोर परीक्षा है।
बालकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः · Rāma Subdues Paraśurāma; the Vaiṣṇava Arrow Is Discharged
परशुराम की चुनौती भरी वाणी सुनकर श्रीराम ने धर्मयुक्त उत्तर दिया। पिता दशरथ के सम्मान में वे विवाद को बढ़ाना नहीं चाहते थे, फिर भी उकसावे का प्रत्युत्तर देना आवश्यक समझा। परशुराम उन्हें क्षत्रिय-धर्म में अयोग्य मान रहे हैं—यह जानकर राम ने क्षणभर में भार्गव धनुष और बाण अपने हाथ में ले लिया, धनुष को झुका कर प्रत्यंचा चढ़ा दी; इस अद्भुत कर्म से समस्त जगत् विस्मय में स्तब्ध हो गया। राम ने स्पष्ट कहा कि परशुराम ब्राह्मण हैं और विश्वामित्र से उनका संबंध है, इसलिए वे उनका वध नहीं करेंगे; पर वैष्णव बाण व्यर्थ नहीं जा सकता। अतः वे या तो परशुराम की पाद-गति (चलने की शक्ति) नष्ट करेंगे या तपस्या से अर्जित लोकों को। तब परशुराम ने अपनी प्रतिज्ञा स्मरण कर—कश्यप को पृथ्वी दान देकर रात्रि में पृथ्वी पर न रहने की—राम से निवेदन किया कि बाण उनके तपस्या-प्राप्त लोकों पर ही छोड़ा जाए। इस दृश्य को देखने ब्रह्मा सहित देवगण, गन्धर्व और अन्य दिव्य प्राणी एकत्र हुए। परशुराम ने राम को विष्णु-स्वरूप पहचानकर बिना लज्जा पराजय स्वीकार की, उनकी प्रदक्षिणा की और महेन्द्र पर्वत की ओर प्रस्थान किया। तत्पश्चात दिशाएँ तम से मुक्त हो गईं और देव-ऋषियों ने राम के धनुर्धारण-पराक्रम की स्तुति की।
सप्तसप्ततितमः सर्गः · Ayodhya Return, Bridal Reception, and Bharata’s Departure
परशुराम के चले जाने पर दशरथ की चिंता शांत हो जाती है। राम समस्त वृत्तांत निवेदित करते हैं; राजा उन्हें हृदय से आलिंगन कर पिता–पुत्र दोनों के लिए इस क्षण को नवजीवन-सा मानते हैं। फिर चतुरंगिणी सेना सहित सब लोग अयोध्या की ओर बढ़ते हैं; ध्वज-पताकाएँ, तूर्य-नाद, जल छिड़के मार्ग और पुष्प-वृष्टि से सजे राजपथ नगर में राजवैभव और लोक-समक्ष वैधता का उत्सव रचते हैं। अंतःपुर में कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी तथा अन्य राजस्त्रियाँ सीता, ऊर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति—इन नववधुओं का मंगल स्वागत करती हैं। वे शुभाचार कर कुलदेवताओं के मंदिरों में पूजन करती हैं, कुबेर-भवन-से सुशोभित आवासों में प्रवेश करती हैं और ब्राह्मणों को गौ, धन और धान्य आदि दान देकर तृप्त करती हैं—धर्म, पुण्य और सामाजिक परस्परता का विधान प्रकट होता है। इसके बाद केकय के युधाजित् आकर भरत को ले जाने की बात कहते हैं। दशरथ सभा में भरत से अनुरोध करते हैं; भरत शत्रुघ्न सहित सबको प्रणाम कर प्रस्थान करता है। भरत के अभाव में राम और लक्ष्मण पिता-सेवा तथा राज्य-कार्य में अधिक तत्पर होते हैं; राम–सीता का दांपत्य मौन में भी हृदय-हृदय के संवाद से युक्त बताया गया है, जिससे गृहस्थ-धर्म को नीति-धर्म का ही विस्तार माना गया है।
Vālmīki learns Rāma’s story from Nārada; moved by the krauñca-bird tragedy, he utters the first śloka and composes the Ramayana, taught to Kuśa and Lava for public performance. In Ayodhyā, Daśaratha’s heirlessness leads to Aśvamedha/Putreṣṭi and the births of Rāma and his brothers. Viśvāmitra takes Rāma and Lakṣmaṇa to protect sacrifices; Rāma receives divine astras, kills Tātakā, and defeats Mārīca/Subāhu. Traveling through sacred landscapes, they reach Mithilā; Rāma breaks Śiva’s bow, wins Sītā, and the brothers marry. On return, Paraśurāma challenges Rāma but yields, affirming Rāma’s supremacy.
Bālakāṇḍa centers on the establishment of dharma as both an inner virtue and a public responsibility. It presents Rāma as the exemplary human—truthful, self-controlled, compassionate, and resolute—whose greatness is not merely martial but ethical. The book also defines legitimate authority through ritual and counsel: Daśaratha’s sacrifices, Vasiṣṭha’s guidance, and Viśvāmitra’s ascetic mandate collectively show that power must be authorized by dharma, not preference. Finally, the origin of the first śloka demonstrates that moral emotion (karuṇā) can be a disciplined source of knowledge and art, transforming grief into a universally instructive poem.
Major episodes include: Nārada’s synopsis to Vālmīki; the krauñca-bird incident and first śloka; composition and performance transmission via Kuśa and Lava; Daśaratha’s Aśvamedha and Putreṣṭi; the births of Rāma, Lakṣmaṇa, Bharata, and Śatrughna; Viśvāmitra taking Rāma and Lakṣmaṇa to protect sacrifice; slaying of Tātakā; defeat of Mārīca and killing of Subāhu; liberation of Ahalyā; arrival at Mithilā and breaking of Śiva’s bow; the four marriages; and the concluding confrontation with Paraśurāma, ending in his withdrawal.
The principal figures are Vālmīki and Nārada (framing and authorization of the epic), Daśaratha and his queens (dynastic and ritual preconditions), Rāma and Lakṣmaṇa (heroic initiation), Viśvāmitra and Vasiṣṭha (ascetic and ritual authority), Ṛṣyaśṛṅga (ritual catalyst for progeny), Janaka and Sītā (Mithilā arc and marriage), Śatānanda and Ahalyā (purification/restoration), antagonists such as Tātakā, Mārīca, and Subāhu (yajña-disruption), and Paraśurāma (theological-martial rival whose yielding confirms Rāma’s supremacy).
Bālakāṇḍa supplies the epic’s enabling conditions: the poem’s own origin and intended mode of transmission; the Ikṣvāku dynasty’s legitimacy; Rāma’s birth as a divinely purposed event; and Rāma’s early formation through ascetic discipline, weapon-knowledge, and sacrificial protection. The Mithilā marriage secures alliances and introduces Sītā as the narrative’s ethical and emotional center. The Paraśurāma episode functions as a threshold: it closes the “origins” phase by confirming Rāma’s unmatched prowess and prepares the transition to the courtly and political developments that will culminate in exile and the larger conflict.
Key lessons include: (1) righteous governance requires moral restraint, generosity, and protection of the vulnerable; (2) duty may demand painful relinquishment of personal attachment (Daśaratha’s consent to Viśvāmitra); (3) spiritual power (tapas) must be ethically governed, as seen in Viśvāmitra’s struggles with anger and temptation; (4) ritual and hospitality are portrayed as civilizational duties that sustain social and cosmic order; and (5) restoration is possible—Ahalyā’s liberation exemplifies reintegration and the transformative force of purity and grace.
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