
गुहस्य सन्देहः, गङ्गातीर-रक्षा, भरतस्य सत्कारः (Guha’s Suspicion, Securing the Ganga Bank, and Hospitality to Bharata)
अयोध्याकाण्ड
अयोध्याकाण्ड के 84वें सर्ग में गंगा-तट पर एक तनावपूर्ण प्रसंग आता है। निषादराज गुह जब नदी किनारे भरत की ध्वजायुक्त सेना को डेरा डाले देखता है, तो पहले उसे शंका होती है कि कहीं यह बल वनवासी राम के लिए संकट तो नहीं। वह रणनीतिक चिंता प्रकट करता है—क्या भरत राम को बाँधने या मारने आया है, या नदी-प्रदेश के लोगों को दबाने? इसी आशंका में गुह रक्षा-व्यवस्था करता है—मछुआरों और नदी-रक्षकों को अपने-अपने स्थानों पर तैनात करता है और पाँच सौ नावें सुसज्जित दल के साथ तैयार रखने का आदेश देता है। उसका निर्णय स्पष्ट है: यदि यह सिद्ध हो जाए कि भरत राम के प्रति दुर्भावना नहीं रखते, तो सेना उसी दिन सुरक्षित रूप से पार उतर सकती है। बात स्पष्ट होने पर गुह भरत के पास भेंट लेकर जाता है—मछली, मांस और मदिरा—और विनयपूर्वक अपने सेवक-गृह में ठहरने का अनुरोध करता है, अपने प्रदेश को अधीन मानकर स्वागत करता है। सुमंत्र मध्यस्थ बनकर गुह को राम का वृद्ध मित्र और दण्डकारण्य-परिचित बताता है तथा भरत को उससे मिलने की सलाह देता है। इस प्रकार शंका मित्रता में बदलती है और गंगा-पार का मार्ग धर्मसम्मत समझौते से सुरक्षित होता है।
Verse 1
ततो निविष्टां ध्वजिनीं गङ्गामन्वाश्रितां नदीम्।निषादराजो दृष्ट्वैव ज्ञातीन्सन्त्वरितोऽऽब्रवीत्।।।।
तब गङ्गा-तट के सहारे ध्वजाओं सहित सेना को डेरा डाले देखकर निषादराज गुह ने तुरंत अपने बंधुओं के पास जाकर कहा।
Verse 2
महतीयमितस्सेना सागराभा प्रदृश्यते।नास्यान्तमधिगच्छामि मनसापि विचिन्तयन्।।।।
इस ओर की यह सेना समुद्र के समान विशाल दिखाई देती है; मन में विचार करने पर भी मैं इसकी सीमा नहीं पा सकता।
Verse 3
यथा तु खलु दुर्बुद्धिर्भरत स्स्वयमागतः।स एष हि महाकायः कोविदारध्वजो रथे।।।।
लगता है कि दुर्बुद्धि भरत स्वयं ही आ पहुँचा है; देखो, रथ पर कोविदार-वृक्ष के चिह्न वाला वह विशाल ध्वज स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
Verse 4
बन्धयिष्यति वा दाशानथवाऽस्मान्वधिष्यति।अथ दाशरथिं रामं पित्रा राज्याद्विवासितम्।।।।सम्पन्नां श्रियमन्विच्छन्स्तस्य राज्ञ स्सुदुर्लभाम्।भरतः कैकयीपुत्रो हन्तुं समधिगच्छति।।।।
क्या वह मछुआरों को रस्सियों से बाँधने आया है, या हमें ही मार डालेगा? अथवा पिता द्वारा राज्य से निर्वासित दाशरथि राम पर आघात करने आया है?
Verse 5
बन्धयिष्यति वा दाशानथवाऽस्मान्वधिष्यति।अथ दाशरथिं रामं पित्रा राज्याद्विवासितम्।।2.84.4।।सम्पन्नां श्रियमन्विच्छन्स्तस्य राज्ञ स्सुदुर्लभाम्।भरतः कैकयीपुत्रो हन्तुं समधिगच्छति।।2.84.5।।
उस राजा की दुर्लभ और पूर्ण राजलक्ष्मी की चाह में, कैकेयी-पुत्र भरत क्या राम-वध का संकल्प करके आगे बढ़ रहा है?
Verse 6
भर्ताचैव सखाचैव रामो दाशरथिर्मम।तस्यार्थकामास्सन्नद्धा गङ्गाऽनूपे प्रतिष्ठत।।।।
दशरथ-पुत्र राम मेरे स्वामी भी हैं और मित्र भी। इसलिए उनके हित-साधन के लिए सन्नद्ध होकर गंगा के तट-प्रदेश पर डट जाओ।
Verse 7
तिष्ठन्तु सर्वे दाशाश्च गङ्गामन्वाश्रिता नदीम्।बलयुक्ता नदीरक्षा मांसमूलफलाशनाः।।।।
मांस, मूल और फल पर जीवित रहने वाले बलयुक्त नदी-रक्षक सब मछुवारे गंगा-नदी के किनारे-किनारे आश्रय लेकर वहीं डटे रहें।
Verse 8
नावां शतानां पञ्चानां कैवर्तानां शतं शतम्।सन्नद्धानां तथा यूनां तिष्ठन्त्वित्यभ्यचोदयत्।।।।
उसने प्रेरित किया—“पाँच सौ नावें तैयार रहें, और प्रत्येक नाव में सौ-सौ युवा केवट पूर्ण साज-सज्जा सहित तत्पर खड़े रहें।”
Verse 9
यदाऽऽदुष्टस्तु भरतो रामस्येह भविष्यति।सेयं स्वस्तिमती सेना गङ्गामद्य तरिष्यति।।।।
यदि यहाँ भरत राम के प्रति दुष्टभाव वाला न निकले, तो यह सेना मंगलपूर्वक आज ही गंगा पार कर लेगी।
Verse 10
इत्युक्त्वोपायनं गृह्य मत्स्यमांसमधूनि च।अभिचक्राम भरतं निषादाधिपतिर्गुहः।।।।
ऐसा कहकर निषादाधिपति गुह मछली, मांस और मदिरा आदि उपहार लेकर भरत से मिलने चल पड़ा।
Verse 11
तमायान्तं तु सम्प्रेक्ष्य सूतपुत्रः प्रतापवान्।भरतायाऽचचक्षेऽथ विनयज्ञो विनीतवत्।।।।
उसे आते देखकर प्रतापी सूतपुत्र सुमंत्र—विनय-धर्म में निपुण—विनीत भाव से भरत को सूचना देने लगा।
Verse 12
एष ज्ञातिसहस्रेण स्थपतिः परिवारितः।कुशलो दण्डकारण्ये वृद्धो भ्रातुश्च ते सखा।।।।
यह वही प्रधान पुरुष है, जो अपने सहस्रों स्वजनों से घिरा हुआ है—दण्डकारण्य के मार्गों में निपुण, वयोवृद्ध, और तुम्हारे भ्राता का भी मित्र।
Verse 13
तस्मात्पश्यतु काकुत्स्थ त्वां निषादाधिपो गुहः।असंशयं विजानीते यत्र तौ रामलक्ष्मणौ।।।।
अतः हे काकुत्स्थवंशज, निषादों के अधिपति गुह तुम्हें मिलें; निःसंदेह वही जानता है कि राम और लक्ष्मण कहाँ हैं।
Verse 14
एतत्तु वचनं श्रुत्वा सुमन्त्राद्भरत श्शुभम्।उवाच वचनं शीघ्रं गुहः पश्यतु मामिति।।।।
सुमंत्र से ये शुभ वचन सुनकर भरत ने तुरंत कहा—“गुह अभी मुझे मिलें।”
Verse 15
लब्ध्वाऽभ्यनुज्ञां संहृष्टो ज्ञातिभिः परिवारितः।आगम्य भरतं प्रह्वो गुहो वचनमब्रवीत्।।।।
अनुमति पाकर प्रसन्न हुआ गुह अपने स्वजनों सहित भरत के पास आया; विनीत होकर झुककर उसने कहा।
Verse 16
निष्कुटश्चैव देशोऽयं वञ्चिताश्चापि ते वयम्।निवेदयामस्ते सर्वे स्वके दासकुले वस।।।।
यह प्रदेश तो मानो तुम्हारा निजी उपवन है, और हम भी तुम्हारे सेवक-जन हैं। हम सब निवेदन करते हैं—अपने दास के घर में निवास करो।
Verse 17
अस्ति मूलं फलञ्चैव निषादैस्समुपाहृतम्।आर्द्रं च मांसं शुष्कं च वन्यं चोच्चावचं महत्।।।।
निषादों ने कन्द-मूल और फल एकत्र कर यहाँ पहुँचा दिए हैं; ताज़ा और सूखा मांस भी है, तथा वन के अनेक प्रकार के प्रचुर उपहार भी हैं।
Verse 18
आशंसे स्वाशिता सेना वत्स्यतीमां विभावरीम्।अर्चितो विविधैः कामै श्श्व स्ससैन्यो गमिष्यसि।।।।
मुझे आशा है कि आपकी सेना तृप्त होकर इसी रात्रि यहाँ विश्राम करेगी; विविध सत्कार और सुविधाएँ पाकर आप कल अपनी सेना सहित प्रस्थान करेंगे।
Guha faces a dharma-laden security dilemma: protect Rāma’s interests and his own river community while avoiding unjust hostility toward Bharata; he responds with conditional defense—prepare boats and guards—until Bharata’s intent is verified.
The episode models prudent ethics: vigilance is compatible with goodwill when guided by evidence, mediation, and respect for legitimate bonds; hospitality becomes a civic instrument that transforms potential conflict into ordered passage.
The Gaṅgā bank (anūpa) is treated as a strategic corridor controlled by boatmen (dāśa/kaivarta) and local polities (Niṣādas), while Dandaka is referenced as the forest-region Guha knows—mapping routes relevant to Rāma and Lakṣmaṇa’s whereabouts.
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