
सीताया वनानुगमननिश्चयः — Sita’s Resolve to Accompany Rama to the Forest
अयोध्याकाण्ड
अयोध्याकाण्ड के 30वें सर्ग में पति-पत्नी के बीच धर्म और कर्तव्य का संवाद सान्त्वना तथा प्रत्युत्तर के रूप में प्रकट होता है। राम पहले सीता को वनवास में साथ चलने से रोकना चाहते हैं, पर सीता दृढ़ता से कहती हैं कि उनका पतिव्रत एकमात्र आश्रय है; राम से वियोग उन्हें असह्य है। वे वन की कठिनाइयों को भी राम के साथ होने पर सुख मानती हैं—धूल चन्दन-सी, कुश-तृण शय्या-सा, और संचित फल अमृत-से। अंत में वे स्पष्ट कह देती हैं कि परित्याग या अयोध्या में शत्रु-शक्ति के अधीन रहने से अच्छा मृत्यु है। इसके बाद राम उन्हें आलिंगन कर आश्वस्त करते हैं और बताते हैं कि उनका वनगमन पिता की आज्ञा-पालन और माता-पिता के वचन की पवित्रता के कारण है। वे माता-पिता और गुरु को प्रत्यक्ष देवता मानकर उनकी सेवा को परम फलदायी बताते हैं। सीता को सहधर्मचारिणी स्वीकार कर राम उन्हें तैयारी का आदेश देते हैं—आभूषण, वस्त्र, शय्या, रथ आदि सेवकों और ब्राह्मणों को दान करें तथा याचकों/संन्यासियों को अन्न दें। सीता प्रसन्न होकर आज्ञा का पालन करती हैं और भावनात्मक विवाद त्याग तथा धर्मसज्जा में परिणत हो जाता है।
Verse 1
सान्त्व्यमाना तु रामेण मैथिली जनकात्मजा।वनवासनिमित्ताय भर्तारमिदमब्रवीत्।।2.30.1।।
वनवास के प्रसंग में राम द्वारा सांत्वना पाकर भी जनकनन्दिनी मैथिली ने अपने पति से ये वचन कहे।
Verse 2
सा तमुत्तमसंविग्ना सीता विपुलवक्षसम्।प्रणयाच्चाभिमानाच्च परिचिक्षेप राघवम्।।2.30.2।।
गंभीर चिंता से अत्यन्त व्याकुल सीता ने, विशाल-वक्ष राघव को—प्रेमवश और आहत स्वाभिमानवश—उलाहना दिया।
Verse 3
किं त्वाऽमन्यत वैदेहः पिता मे मिथिलाधिपः।राम जामातरं प्राप्य स्त्रियं पुरुषविग्रहम्।।2.30.3।।
हे राम! मेरे पिता, मिथिला के अधिपति वैदेह जनक ने तुम्हें जामाता पाकर क्या यह समझा था कि तुम पुरुष-रूप धारण की हुई स्त्री हो?
Verse 4
अनृतं बत लोकोऽयमज्ञानाद्यदि वक्ष्यति।तेजो नास्ति परं रामे तपतीव दिवाकरे।।2.30.4।।
यदि लोग अज्ञानवश यह कहें कि राम में परम तेज नहीं है, तो वह निश्चय ही असत्य होगा; क्योंकि राम में सूर्य के समान दहकता हुआ सर्वोच्च तेज प्रकट है।
Verse 5
किं हि कृत्वा विषण्णस्त्वं कुतो वा भयमस्ति ते।यत्परित्यक्तुकामस्त्वं मामनन्यपरायणाम्।।2.30.5।।
तुम किस कारण से इतनी विषण्ण हो? तुम्हें यह भय कहाँ से उत्पन्न हुआ कि तुम मुझे—जो केवल तुम्हीं में एकमात्र शरण रखती हूँ—त्यागना चाहती हो?
Verse 6
द्युमत्सेनसुतं वीर सत्यवन्तमनुव्रताम्।सावित्रीमिव मां विद्धि त्वमात्मवशवर्तिनीम्।।2.30.6।।
हे वीर! द्युमत्सेन-पुत्र सत्यवान् के प्रति अनुव्रता सावित्री के समान मुझे जानो; मैं सदा तुम्हारे ही वश में रहने वाली हूँ।
Verse 7
न त्वहं मनसाऽप्यन्यं द्रष्टाऽस्मि त्वदृतेऽनघ।त्वया राघव गच्छेयं यथाऽन्या कुलपांसिनी।।2.30.7।।
हे अनघ! तुम्हारे बिना मैंने मन से भी किसी अन्य को नहीं देखा। हे राघव! मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगी; मैं उन अन्य स्त्रियों जैसी नहीं जो कुल पर कलंक लाती हैं।
Verse 8
स्वयं तु भार्यां कौमारीं चिरमध्युषितां सतीम्।शैलूष इव मां राम परेभ्यो दातुमिच्छसि।।2.30.8।।
हे राम! तुम स्वयं मुझे—अपनी कौमारी, सती, जो चिरकाल से तुम्हारे साथ रही है—एक नट की भाँति दूसरों को सौंपना चाहते हो।
Verse 9
यस्य पथ्यं च रामाऽत्थ यस्य चार्थेऽवरुध्यसे।त्वं तस्य भव वश्यश्च विधेयश्च सदाऽनघ।।2.30.9।।
हे निष्पाप राम! जिनके हित की बात तुम कहते हो और जिनके कारण तुम मुझे रोकते हो, तुम सदा उनके वश में और आज्ञाकारी रहो।
Verse 10
स मामनादाय वनं न त्वं प्रस्थातुमर्हसि।तपो वा यदि वाऽरण्यं स्वर्गो वा स्यात्सह मे त्वया।।2.30.10।।
मुझे साथ लिये बिना तुम वन को जाने के योग्य नहीं हो। तपस्या हो या अरण्य-जीवन, या स्वर्ग ही क्यों न हो—मैं तुम्हारे साथ ही चाहती हूँ।
Verse 11
न च मे भविता तत्र कश्चित्पथि परिश्रमः।पृष्ठतस्तव गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव।।2.30.11।।
और वहाँ मार्ग में मुझे तनिक भी कष्ट न होगा। तुम्हारे पीछे-पीछे चलती हुई मैं उसे विहार-यात्रा के समान, शय्या पर विश्राम के समान ही सुखद मानूँगी।
Verse 12
कुशकाशशरेषीका ये च कण्टकिनो द्रुमाः।तूलाजिनसमस्पर्शा मार्गे मम सह त्वया।।2.30.12।।
मार्ग में कुश, काश, शर, ईषीका घासें और काँटेदार वृक्ष भी—जब मैं तुम्हारे साथ रहूँगी—मुझे रूई या मृगचर्म के समान कोमल स्पर्श वाले लगेंगे।
Verse 13
महावातसमुद्धूतं यन्मामपकरिष्यति।रजो रमण तन्मन्ये परार्थ्यमिव चन्दनम्।।2.30.13।।
हे प्रिय! प्रचण्ड वायु से उड़ी हुई जो धूल मुझे चुभे या कष्ट दे, उसे भी मैं उत्तम चन्दन-लेप के समान ही मानूँगी।
Verse 14
शाद्वलेषु यथा शिश्ये वनान्ते वनगोचर।कुथास्तरणतल्पेषु किं स्यात्सुखतरं ततः।।2.30.14।।
हे वन-विहारि! वन के किनारे हरे-भरे तृण-मैदानों पर यदि मैं शयन करूँ, तो उत्तम बिछौनों और बहुमूल्य आच्छादनों से सजे पलंगों से भी अधिक सुखद और क्या होगा?
Verse 15
पत्रं मूलं फलं यत्त्वमल्पं वा यदि वा बहु।दास्यसि स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम्।।2.30.15।।
हे राम! तुम स्वयं जो पत्ता, मूल या फल—थोड़ा हो या बहुत—लाकर मुझे दोगे, वह मेरे लिए अमृत-रस के समान होगा।
Verse 16
न मातुर्न पितुस्तत्र स्मरिष्यामि न वेश्मनः।आर्तवान्युपभुञ्जाना पुष्पाणि च फलानि च।।2.30.16।।
वहाँ वन में ऋतु के फूलों और फलों का उपभोग करती हुई मैं न माता को याद करूँगी, न पिता को, न ही घर के सुखों को।
Verse 17
न च तत्र ततः किञ्चिद्द्रष्टुमर्हसि विप्रियम्।मत्कृते न च ते शोको न भविष्यामि दुर्भरा।।2.30.17।।
इसलिए वहाँ वन में तुम मुझसे कोई अप्रिय बात देखने की आशा न करना। मेरे कारण तुम्हें शोक न होगा, और मैं तुम्हारे लिए भाररूप भी न बनूँगी।
Verse 18
य स्त्वया सह स स्वर्गो निरयो यस्त्वया विना।इति जानन्परां प्रीतिं गच्छ राम मया सह।।2.30.18।।
जहाँ मैं तुम्हारे साथ हूँ वही स्वर्ग है; और जहाँ तुम नहीं हो वह नरक है। यह जानकर, हे राम, परम प्रीति स्वीकार करो और मेरे साथ चलो।
Verse 19
अथ मामेवमव्यग्रां वनं नैव नयिष्यति।विषमद्यैव पास्यामि मा विशं द्विषतां गमम्।।2.30.19।।
यदि मैं इस प्रकार दृढ़ निश्चय और अविचल होकर खड़ी हूँ, फिर भी तुम मुझे वन न ले जाओगे, तो मैं आज ही विष पी लूँगी; मैं शत्रुओं के वश में जाकर नहीं रहूँगी।
Verse 20
पश्चादपि हि दुःखेन मम नैवास्ति जीवितम्।उज्झितायास्त्वया नाथ तदैव मरणं वरम्।।2.30.20।।
इसके बाद भी, ऐसे दुःख में मेरे भीतर जीवन का कोई अवशेष नहीं रहेगा। हे नाथ! यदि आप मुझे त्याग दें, तो उसी क्षण मृत्यु ही श्रेष्ठ है।
Verse 21
इमं हि सहितुं शोकं मुहूर्तमपि नोत्सहे।किं पुनर्दशवर्षाणि त्रीणि चैकं च दुःखिता।।2.30.21।।
मैं इस शोक को एक मुहूर्त भर भी सह नहीं सकती; फिर दुःखिनी होकर चौदह वर्षों—दस, तीन और एक—तक कैसे सहूँगी?
Verse 22
इति सा शोकसन्तप्ता विलप्य करुणं बहु।चुक्रोश पतिमायस्ता भृशमालिङ्ग्य सस्वरम्।।2.30.22।।
इस प्रकार शोक से संतप्त वह करुण विलाप करती रही; फिर थककर पति के पास जाकर उसे कसकर आलिंगन कर ऊँचे स्वर में चिल्ला उठी।
Verse 23
सा विद्धा बहुभिर्वाक्यैर्दिग्धैरिव गजाङ्गना।चिरसन्नियतं बाष्पं मुमोचाग्निमिवारणिः।।2.30.23।।
विष-बाणों से बेधी गई हथिनी की भाँति, ऐसे तीखे वचनों से आहत होकर उसने बहुत समय से रोके हुए आँसुओं को छोड़ दिया—जैसे अरणि से अग्नि प्रकट होती है।
Verse 24
तस्या स्फटिकसङ्काशं वारि सन्तापसम्भवम्।नेत्राभ्यां परिसुस्राव पङ्कजाभ्यामिवोदकम्।।2.30.24।।
उसकी आँखों से संतापजन्य, स्फटिक-सा निर्मल जल बह निकला—जैसे दो कमलों से जल टपकता हो।
Verse 25
तच्चैवामलचन्द्राभं मुखमायतलोचनम्।पर्यशुष्यत बाष्पेण जलोद्धृतमिवाम्बुजम्।।2.30.25।।
वह निर्मल चन्द्रमा-सा दीप्त, दीर्घ नेत्रों वाला मुख आँसुओं से भीगकर भी धीरे-धीरे सूखने लगा—जैसे जल से उखाड़ा हुआ कमल मुरझा जाता है।
Verse 26
तां परिष्वज्य बाहुभ्यां विसंज्ञामिव दुःखिताम्।उवाच वचनं रामः परिविश्वासयंस्तदा।।2.30.26।।
दुःख से व्याकुल, मानो मूर्छित-सी सीता को राम ने दोनों भुजाओं से आलिंगन किया और तब उसे धैर्य बँधाते हुए वचन कहा।
Verse 27
न देवि तव दुःखेन स्वर्गमप्यभिरोचये।न हि मेऽस्ति भयं किञ्चित्स्वयम्भोरिव सर्वतः।।2.30.27।।
हे देवि! तुम्हारे दुःख में मुझे स्वर्ग भी नहीं भाता। क्योंकि मुझे किसी दिशा से कोई भय नहीं—जैसे स्वयंभू ब्रह्मा को।
Verse 28
तव सर्वमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने।वासं न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे।।2.30.28।।
हे शुभानने! तुम्हारे संपूर्ण अभिप्राय को जाने बिना, मैं तुम्हारे वन में रहने को स्वीकार नहीं कर सका—यद्यपि मैं तुम्हारी रक्षा करने में समर्थ हूँ।
Verse 29
यत्सृष्टाऽसि मया सार्धं वनवासाय मैथिलि।न विहातुं मया शक्या कीर्तिरात्मवता यथा।।2.30.29।।
हे मैथिलि! तुम मेरे साथ वनवास के लिए ही नियत हुई हो; इसलिए मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता—जैसे आत्मसम्मानी पुरुष अपनी कीर्ति नहीं त्यागता।
Verse 30
धर्मस्तु गजनासोरु सद्भिराचरितः पुरा।तं चाहमनुवर्तेऽद्य यथा सूर्यं सुवर्चला।।2.30.30।।
हे गजनासोरु! धर्म तो प्राचीन काल से सत्पुरुषों द्वारा आचरित है; उसी धर्म का मैं आज अनुसरण करूँगा, जैसे सुवर्चला सूर्य का अनुसरण करती है।
Verse 31
न खल्वहं न गच्छेयं वनं जनकनन्दिनि।वचनं तन्नयति मां पितु स्सत्योपबृंहितम्।।2.30.31।।
हे जनकनन्दिनि! ऐसा नहीं कि मैं वन को न जाऊँ; पिता का सत्य से पुष्ट किया हुआ वही वचन मुझे वहाँ ले जा रहा है।
Verse 32
एष धर्मस्तु सुश्रोणि पितुर्मातुश्च वश्यता।अतश्च तं व्यतिक्रम्य नाहं जीवितुमुत्सहे।।2.30.32।।
हे सुश्रोणि! पिता और माता की आज्ञा में वश्य रहना ही धर्म है; इसलिए उसे लाँघकर मैं जीने का साहस नहीं कर सकता।
Verse 33
अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरभिराध्यते।स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम्।।2.30.33।।
जो हमारे वश में नहीं, उस दैव को भला किस प्रकार प्रसन्न किया जा सकता है, यदि अपने निकट और वश में स्थित माता, पिता और गुरु का अतिक्रमण कर दिया जाए?
Verse 34
यत्त्रयं तत्त्रयो लोकाः पवित्रं तत्समं भुवि।नान्यदस्ति शुभापाङ्गे तेनेदमभिराध्यते।।2.30.34।।
हे शुभापाङ्गे! जहाँ माता, पिता और गुरु—ये तीनों उपस्थित हों, वहीं मानो तीनों लोक हैं। पृथ्वी पर इनके समान पवित्र और कुछ नहीं; इसलिए इन्हीं की श्रद्धापूर्वक पूजा और आराधना करनी चाहिए।
Verse 35
न सत्यं दानमानौ वा न यज्ञाश्चाप्तदक्षिणाः।तथा बलकरा स्सीते यथा सेवा पितुर्हिता।।2.30.35।।
हे सीते! न सत्य बोलना, न दान और सम्मान, न उचित दक्षिणा सहित यज्ञ—इनमें से कोई भी उतना बल देने वाला नहीं है जितनी पिता के हित के लिए की गई सेवा।
Verse 36
स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्याः पुत्रास्सुखानि च।गुरुवृत्त्यनुरोधेन न किञ्चिदपि दुर्लभम्।।2.30.36।।
बड़ों के उचित अभिप्राय और मार्गदर्शन के अनुसार चलने से स्वर्ग, धन, धान्य, विद्या, पुत्र और सुख—इनमें से कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।
Verse 37
देवगन्धर्वगोलोकान्ब्रह्मलोकां स्तथाऽपरान्।प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणाः।।2.30.37।।
माता-पिता में परायण महात्मा जन देव-लोक, गन्धर्व-लोक, गो-लोक, ब्रह्म-लोक तथा अन्य उच्च लोकों को प्राप्त होते हैं।
Verse 38
स मां पिता यथा शास्ति सत्यधर्मपथे स्थितः।तथा वर्तितुमिच्छामि स हि धर्मस्सनातनः।।2.30.38।।
सत्य और धर्म के पथ पर स्थित मेरे पिता मुझे जैसा आदेश देते हैं, मैं वैसा ही आचरण करना चाहती हूँ; क्योंकि वही सनातन धर्म है।
Verse 39
मम सन्ना मतिस्सीते त्वां नेतुं दण्डकावनम्।वसिष्यामीति सा त्वं मामनुयातुं सुनिश्चिता।।2.30.39।।
हे सीते, दण्डकवन में तुम्हें ले जाने का मेरा निश्चय दृढ़ है; और तुम भी ‘मैं वहाँ रहूँगी’ ऐसा कहकर मेरे पीछे चलने को अटल निश्चय कर चुकी हो।
Verse 40
सा हि सृष्टाऽनवद्याङ्गि वनाय मदिरेक्षणे।अनुगच्छस्व मां भीरु सहधर्मचरी भव।।2.30.40।।
जैसे सत्य-धर्म के पथ पर स्थित पिता मुझे अनुशासित करते हैं, वैसे ही मैं आचरण करना चाहता हूँ; क्योंकि वही धर्म सनातन है।
Verse 41
सर्वथा सदृशं सीते मम स्वस्य कुलस्य च।व्यवसायमनुक्रान्ता कान्ते त्वमतिशोभनम्।।2.30.41।।
हे सीते, प्रियतम! तुमने हर प्रकार से मेरे, अपने और अपने कुल के अनुरूप जो संकल्प किया है, वह अत्यन्त शोभनीय है।
Verse 42
आरभस्व शुभश्रोणि वनवासक्षमाः क्रियाः।नेदानीं त्वदृते सीते स्वर्गोऽपि मम रोचते।।2.30.42।।
हे शुभश्रोणि सीते! वनवास के योग्य तैयारियाँ आरम्भ करो; अब तुम्हारे बिना मुझे स्वर्ग भी रुचिकर नहीं लगता।
Verse 43
ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुकेभ्यश्च भोजनम्।देहि चाशंसमानेभ्य स्सन्त्वरस्व च मा चिरम्।।2.30.43।।
ब्राह्मणों को रत्न दो और भिक्षुकों को भोजन; जो याचना नहीं करते, ऐसे अभावग्रस्तों को भी दो—शीघ्र करो, विलम्ब मत करो।
Verse 44
भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च।रमणीयाश्च ये केचित्क्रीडार्थाश्चाप्युपस्कराः।।2.30.44।।शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च।देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम्।।2.30.45।।
जो अत्यन्त मूल्यवान आभूषण, उत्तम वस्त्र, तथा भोग और क्रीड़ा के लिए जो-जो मनोहर उपस्कर हैं—वे सब।
Verse 45
भूषणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च।रमणीयाश्च ये केचित्क्रीडार्थाश्चाप्युपस्कराः।।2.30.44।।शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च।देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम्।।2.30.45।।
मेरे शय्या-आसन, वाहन और अन्य जो भी वस्तुएँ हैं, उन्हें पहले अपने सेवक-समुदाय को दे दो; उसके बाद जो शेष रहे, वह ब्राह्मणों को दे देना।
Verse 46
अनुकूलं तु सा भर्तुर्ज्ञात्वा गमनमात्मनः।क्षिप्रं प्रमुदिता देवी दातुमेवोपचक्रमे।।2.30.46।।
अपने जाने को पति के अनुकूल जानकर वह देवी अत्यन्त प्रसन्न हुई और शीघ्र ही दान देने का कार्य आरम्भ कर दिया।
Verse 47
ततः प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसायशश्विनी भर्तुरवेक्ष्य भाषितम्।धनानि रत्नानि च दातुमङ्गनाप्रचक्रमे धर्मभृतां मनस्स्विनी।।2.30.47।।
तब यशस्विनी अङ्गना, पति के वचनों को देखकर, हर्षित और पूर्ण-हृदया होकर, धर्मनिष्ठ जनों को धन और रत्न दान करने लगी।
The dilemma is whether Sītā should be excluded from exile for her safety or included as Rāma’s sahadharmacāriṇī; Sītā frames separation as adharma toward marital unity, while Rāma balances spousal protection against the binding force of his father’s truth-backed command.
Dharma is enacted through relational obligations: marital companionship as a shared vocation, and filial obedience as a visible form of worship; the chapter also models renunciation by converting royal wealth into dāna before entering the forest discipline.
The forest-world is mapped through Dandaka as the intended destination and through culturally specific markers—kuśa and reeds, meadow sleeping, seasonal forest produce—along with courtly-to-ascetic transition practices such as gifting ornaments and provisions to brāhmaṇas and mendicants.
Read Valmiki Ramayana in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.