Ramayana Ayodhya Kanda Sarga 71
Ayodhya KandaSarga 717 Verses

Sarga 71

भरतस्य अयोध्याप्रत्यागमनम् — Bharata’s Return Journey and the Distant Sight of Ayodhya

अयोध्याकाण्ड

इस सर्ग में भरत राजगृह से प्रस्थान कर पूर्व दिशा की ओर बढ़ते हुए अयोध्या के निकट पहुँचते हैं। मार्ग में वे सुदामा और ह्लादिनी नदियों को पार करते हैं तथा तरंगों से युक्त, विस्तृत और पश्चिमाभिमुख बहने वाली शतद्रू को देखते हैं। आगे एलाधान, सर्वतीर्थ और लौहित्य आदि नामित स्थानों पर अनेक तीर्थों और नदियों—उत्तानिका, कुटिका, कपीवती आदि—का क्रमशः अतिक्रमण होता है; पर्वतीय घोड़ों और हाथी-यान का उल्लेख यात्रा-वृत्तांत को मानचित्र-सा सघन बना देता है। दूर से अयोध्या दिखाई देती है—श्वेत भूमि से सुशोभित, उद्यानों से युक्त, वेदपाठी ऋत्विजों और ब्राह्मणों से परिपूर्ण, कीर्तिमती नगरी। परंतु समीप आने पर भरत गृहों और देवालयों में अमंगल के संकेत देखते हैं—घर असाफ़ और उपेक्षित हैं, द्वार खुले पड़े हैं, धूप-दीप और नैवेद्य का अभाव है, परिवार भूख से पीड़ित हैं। प्रजा आँसू भरी, कृश और शोक में डूबी दिखती है; इस प्रकार सर्ग पूर्व की धर्ममय, अनुष्ठान-समृद्ध राजधानी और वर्तमान में ठहरी हुई गृह-धार्मिक लय के बीच तीव्र विरोध दिखाकर राज-धर्म के विच्छेद का संकेत करता है।

Shlokas

Verse 2

स प्राङ्मुखो राजगृहादभिनिर्याय राघवः। ततस्सुदामां द्युतिमान् सन्तीर्यावेक्ष्य तां नदीम्।।2.71.1।। ह्लादिनीं दूरपारां च प्रत्यक्स्रोतस्तरङ्गिणीम्। शतद्रूमतरच्छ्रीमान्नदीमिक्ष्वाकुनन्दनः।।2.71.2।।

राघव राजगृह से पूर्वाभिमुख होकर निकले। तेजस्वी होकर उन्होंने सुदामा नदी को देखा और उसे पार किया। फिर इक्ष्वाकुवंश के आनंदस्वरूप श्रीराम ने दूर-तट वाली ह्लादिनी को, और पश्चिमाभिमुख प्रवाह वाली तरंगिणी शतद्रू—उस विशाल, शोभामयी नदी—को भी पार किया।

Verse 4

ऐलाधाने नदीं तीर्त्वा प्राप्य चापरपर्पटान्। शिलामकुर्वतीं तीर्त्वा आग्नेयं शल्यकर्षणम्।।2.71.3।। सत्यसन्धश्शुचिश्श्रीमान्प्रेक्षमाण श्शिलावहाम्। अत्ययात्स महाशैलान्वनं चैत्ररथं प्रति।।2.71.4।।

ऐलाधान में नदी पार करके और अपर-पर्पट प्रदेश में पहुँचकर, पर्वत से निकलने वाली नदी को भी पार कर वे आग्नेय दिशा के शल्यकर्षण की ओर बढ़े। सत्यप्रतिज्ञ, शुद्ध और श्रीसम्पन्न राघव शिलावहा के प्रवाह को देखते हुए महान पर्वतों को लाँघकर चैत्ररथ नामक वन की ओर चले।

Verse 15

वासं कृत्वा सर्वतीर्थे तीर्त्वा चोत्तानिकां नदीम्। अन्या नदीश्च विविधाः पार्वतीयैस्तुरङ्गमैः।।2.71.14।। हस्तिपृष्ठकमासाद्य कुटिकामत्यवर्तत। ततार च नरव्याघ्रो लौहित्ये स कपीवतीम्।।2.71.15।।

सर्वतीर्थ में निवास करके उन्होंने उत्तानिका नदी को पार किया, और पर्वतीय घोड़ों से अनेक प्रकार की अन्य नदियाँ भी लाँघीं। फिर हाथी पर आरूढ़ होकर कुटिका को पार किया; और वह नरव्याघ्र लौहित्य प्रदेश में कपीवती नदी को भी तैरकर पार कर गया।

Verse 20

एषा नातिप्रतीता मे पुण्योद्याना यशस्विनी।।2.71.19।। अयोध्या दृश्यते दूरात्सारथे पाण्डुमृत्तिका। यज्वभिर्गुणसम्पन्नैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।।2.71.20।। भूयिष्ठमृद्धैराकीर्णा राजर्षिपरिपालिता।

हे सारथि, यह पुण्य उद्यानों से सुशोभित, यशस्विनी अयोध्या दूर से दिखाई तो देती है, पर मुझे अभी स्पष्ट नहीं दिख रही। श्वेत-सी मिट्टी वाली वह पुरी अत्यन्त धनवानों से भरी है; यज्ञ करने वाले, गुणसम्पन्न, वेद-पारंगत ब्राह्मणों से परिपूर्ण है और राजर्षियों द्वारा सुरक्षित है।

Verse 38

सम्मार्जनविहीनानि परुषाण्युपलक्षये।।2.71.37।। असंयत कवाटानि श्रीविहीनानि सर्वशः। बलिकर्मविहीनानि धूपसम्मोदनेन च।।2.71.38।। अनाशितकुटुम्बानि प्रभाहीनजनानि च। अलक्ष्मीकानि पश्यामि कुटुम्बिभवनान्यहम्।।2.71.39।।

मैं गृहस्थों के घर झाड़ू-बुहार से रहित, मैल से भरे और रूखे देखता हूँ। उनके द्वार खुले-से, असंयत हैं और सर्वत्र लक्ष्मी का अभाव जान पड़ता है। न बलि-दान हो रहा है, न धूप की सुगन्ध से मन प्रसन्न होता है। परिवार भूखे हैं, जनों का तेज बुझा है; मैं घरों पर अमंगल की छाया देखता हूँ।

Verse 39

सम्मार्जनविहीनानि परुषाण्युपलक्षये।।2.71.37।। असंयत कवाटानि श्रीविहीनानि सर्वशः। बलिकर्मविहीनानि धूपसम्मोदनेन च।।2.71.38।। अनाशितकुटुम्बानि प्रभाहीनजनानि च। अलक्ष्मीकानि पश्यामि कुटुम्बिभवनान्यहम्।।2.71.39।।

मैं गृहस्थों के घर झाड़ू-बुहार से रहित, मैल से भरे और रूखे देखता हूँ। उनके द्वार खुले-से, असंयत हैं और सर्वत्र लक्ष्मी का अभाव जान पड़ता है। न बलि-दान हो रहा है, न धूप की सुगन्ध से मन प्रसन्न होता है। परिवार भूखे हैं, जनों का तेज बुझा है; मैं घरों पर अमंगल की छाया देखता हूँ।

Verse 44

देवायतनचैत्येषु दीनाः पक्षिगणास्तथा।।2.71.43।। मलिनं चाश्रुपूर्णाक्षं दीनं ध्यानपरं कृशम्। सस्त्रीपुंसं च पश्यामि जनमुत्कण्ठितं पुरे।।2.71.44।।

नगर में मैं स्त्री-पुरुष सभी को मलिन, कृश और दीन देखता हूँ; उनकी आँखें आँसुओं से भरी हैं और वे शोकपूर्ण चिन्ता में डूबे, उत्कण्ठित से प्रतीत होते हैं।

Frequently Asked Questions

Rather than a courtroom-like dilemma, the chapter presents an ethical diagnostic action: Bharata reads the city’s disrupted household and ritual routines as evidence of moral-political rupture, implying that governance and dharma are measurable through civic well-being and maintained rites.

The sarga teaches that social auspiciousness (śrī) is not merely aesthetic but ethical: when leadership falters and communal grief dominates, ordinary dharmic practices—cleanliness, offerings, incense, hospitality, and emotional steadiness—collapse, revealing the interdependence of polity, ritual, and inner resilience.

Geographically, the sarga highlights a chain of rivers and regions—Sudāmā, Hlādinī, Śatadrū, Uttānikā, Kuṭikā, Kapīvatī; locales such as Rājagṛha, Elādhāna, Sarvatīrtha, and Lauhitya—while culturally it foregrounds Ayodhyā’s temples/caityas, Veda-versed brāhmaṇas and sacrificers, and the visible absence of domestic-ritual markers (oblations and incense).

Read Valmiki Ramayana in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App