Ramayana Ayodhya Kanda Sarga 16
Ayodhya KandaSarga 1648 Verses

Sarga 16

सुमन्त्रदर्शनम् तथा रामस्य राजदर्शनाय प्रस्थानम् (Sumantra Meets Rama; Rama Departs to See the King)

अयोध्याकाण्ड

इस सर्ग में सुमंत्र जनसमूह से भरे अंतःपुर-द्वार को पार कर एकांत कक्ष की ओर जाते हैं। वहाँ युवकों द्वारा—भाले और धनुष धारण किए, सतर्क प्रहरी-भाव से—अंतःपुर-परिसर की रक्षा का वर्णन है। द्वार पर खड़े काषाय-वस्त्रधारी वृद्ध स्त्री-अध्यक्षों को देखकर सुमंत्र विनयपूर्वक अपना आगमन निवेदित करते हैं; वे तुरंत राम को सूचना देते हैं। सुमंत्र राम को देखते हैं—स्वर्ण-पर्यंक पर विराजमान, उत्तम चंदन से अनुलिप्त, कुबेर-तुल्य तेजस्वी; और पास ही सीता हाथ में चँवर लिए खड़ी होकर उन्हें ‘चित्रित चंद्रमा’ की भाँति शोभित कर रही हैं। सुमंत्र प्रणाम कर दशरथ का संदेश सुनाते हैं—कैकेयी सहित राजा राम को तुरंत देखना चाहते हैं, विलंब न हो। राम प्रसन्न होकर अभिषेक-संबंधी विचार मन में उठते हुए सीता से कहते हैं; सीता मंगलकामना करती हुई दिशाओं के देवताओं से रक्षा की प्रार्थना करती हैं और दीक्षा-व्रत के चिह्न—अजिन और मृग-शृंग—का संकेत भी करती हैं। फिर राम सुमंत्र के साथ निकलते हैं; द्वार पर हाथ जोड़कर खड़े लक्ष्मण को देखकर उन्हें साथ ले चलते हैं। रथ-प्रस्थान नगर-उत्सव जैसा हो उठता है—वाद्यों और स्तुतियों का निनाद, जनसमूह का कोलाहल, पुष्प-वर्षा, नागरिकों की प्रशंसा-वाणी, घोड़े-हाथी-रथों से भरा राजपथ, रथ का मेघ-गर्जन-सा घोष और मणि-स्वर्ण की शोभा। इस प्रकार यह सर्ग राज्याभिषेक की आशा-उत्साह की सार्वजनिक प्रतिध्वनि और राम के शील-प्रभाव को स्थापित करता है।

Recitation with translationValmiki Ramayana 2.16

Shlokas

Verses 1-2

तदन्तःपुरद्वारं समतीत्य जनाकुलम् ।प्रविविक्तां ततः कक्ष्यामाससाद पुराणवित् ॥१॥प्रासकार्मुकबिभ्रद्भिर्युवभिर्मृष्टकुण्डलैः ।अप्रमादिभिरेकाग्रै स्स्वनुरक्तैरधिष्ठिताम् ॥२॥

प्राचीन मर्यादाओं के ज्ञाता सुमंत्र जनसमूह से भरे अन्तःपुर-द्वार को पार करके, फिर एकांत-सी कक्ष्या (आँगन) में पहुँचे।

Verse 3

तत्र काषायिणो वृद्धान् वेत्रपाणीन् स्वलङ्कृतान् ।ददर्श विष्ठितान् द्वारि स्त्र्यध्यक्षान्सुसमाहितान् ॥३॥

वहाँ द्वार पर उन्होंने स्त्री-अन्तःपुर के वृद्ध अधीक्षकों को देखा—काषाय वस्त्रधारी, सुशोभित, हाथों में दण्ड लिए हुए और पूर्ण एकाग्रता से खड़े।

Verse 4

ते समीक्ष्य समायान्तं रामप्रियचिकीर्षवः ।सहसोत्पतितास्सर्वे स्वासनेभ्यस्ससम्भ्रमाः ॥४॥

सुमन्त्र को आते देखकर, राम का हित चाहने वाले वे सब लोग उत्साहपूर्वक हड़बड़ी में अपने-अपने आसनों से सहसा उठ खड़े हुए।

Verse 5

तानुवाच विनीतात्मा सूतपुत्रः प्रदक्षिणः ।क्षिप्रमाख्यात रामाय सुमंन्त्रो द्वारि तिष्ठति ॥५॥

विनीत-चित्त, अत्यन्त शिष्ट सारथि-पुत्र ने उनसे कहा— “शीघ्र जाकर राम को निवेदन करो; सुमंत्र द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

Verse 6

ते राममुपसङ्गम्य भर्तुः प्रियचिकीर्षवः ।सहभार्याय रामाय क्षिप्रमेवाभिचक्षिरे ॥६॥

स्वामी को प्रसन्न करने की इच्छा से वे राम के पास गए—जो पत्नी सहित थे—और शीघ्र ही सब समाचार निवेदित कर दिया।

Verse 7

प्रतिवेदितमाज्ञाय सूतमभ्यन्तरं पितुः ।तत्रैवानाययामास राघवप्रियकाम्यया ॥७॥

उनके निवेदन से जानकर कि पिता के अंतरंग सारथि आए हैं, राघव (राम) ने उनका सत्कार करने की इच्छा से उन्हें उसी स्थान पर बुलवा लिया।

Verses 8-10

तं वैश्रवणसङ्काशमुपविष्टं स्वलङ्कृतम् ।ददर्श सूतः पर्य्यङ्के सौवर्णे सोत्तरच्छदे ॥८॥वराहरुधिराभेण शुचिना च सुगन्धिना ।अनुलिप्तं परार्ध्येन चन्दनेन परन्तपम् ॥९॥स्थितया पार्श्वतश्चापि वालव्यजनहस्तया ।उपेतं सीतयाभूयश्चित्रया शशिनं यथा ॥१०॥

सुमंत्र ने राम को देखा—वैश्रवण (कुबेर) के समान तेजस्वी—जो उत्तम आच्छादन सहित स्वर्णमय पलंग पर विराजमान, भली-भाँति अलंकृत थे। शत्रु-विनाशक प्रभु के अंगों पर वराह-रुधिर-सी लालिमा वाले, शुद्ध, सुगंधित, अमूल्य चंदन का लेप था। और पास ही चँवर हाथ में लिए सीता खड़ी थीं; वे चित्रा नक्षत्र के साथ चंद्रमा के समान शोभित हो रहे थे।

Verse 11

तं तपन्तमिवादित्यमुपपन्नं स्वतेजसा ।ववन्दे वरदं वन्दी विनयज्ञो विनीतवत् ॥११॥

स्वतेज से दीप्त, तपते सूर्य के समान प्रकाशमान, वरद राम को विनय-निपुण वन्दी सुमंत्र ने अत्यन्त नम्र होकर प्रणाम किया।

Verse 12

प्राञ्जलिस्सुमुखं दृष्ट्वा विहारशयनासने ।राजपुत्रमुवाचेदं सुमन्त्रो राजसत्कृतः ॥१२॥

विहार-शय्या पर विराजमान, सुमुख राजकुमार को देखकर, राजा द्वारा सत्कृत सुमंत्र ने हाथ जोड़कर ये वचन कहे।

Verse 13

कौशल्यासुप्रजा राम पिता त्वां द्रष्टुमिच्छति ।महिष्या सह कैकेय्या गम्यतां तत्र मा चिरम् ॥१३॥

कौशल्या के सुपुत्र राम! पिता आपको देखना चाहते हैं; महारानी कैकेयी के साथ वहाँ चलिए, विलंब मत कीजिए।

Verse 14

एवमुक्तस्तु संहृष्टो नरसिंहो महाद्युतिः ।ततस्सम्मानयामास सीतामिदमुवाच ह ॥१४॥

ऐसा कहे जाने पर महातेजस्वी नरसिंह राम हर्षित हुए। फिर सुमंत्र का यथोचित सम्मान करके उन्होंने सीता से ये वचन कहे।

Verse 15

देवि देवश्च देवी च समागम्य मदन्तरे ।मन्त्रयेते धृवं किञ्चिदभिषेचनसंहितम् ॥१५॥

देवि! राजा और रानी मेरे विषय में मिलकर निश्चय ही मेरे अभिषेक से संबंधित किसी बात का परामर्श कर रहे हैं।

Verse 16

लक्षयित्वा ह्यभिप्रायं प्रियकामा सुदक्षिणा ।सञ्चोदयति राजानं मदर्थमसितेक्षणा ॥१६॥

उनका अभिप्राय समझकर, प्रिय की कामना करने वाली, सुशील और श्यामलोचना रानी मेरे हित के लिए राजा को प्रेरित कर रही हैं।

Verse 17

सा प्रहृष्टा महाराजं हितकामानुवर्तिनी ।जननी चार्थकामा मे केकयाधिपतेस्सुता ॥१७॥

मेरी माता—केकयाधिपति की पुत्री—हर्षित होकर महाराज के हितकारी अभिप्राय के अनुसार चलती हुई, मेरे कल्याण की ही कामना करती है।

Verse 18

दिष्ट्या खलु महाराजो महिष्या प्रियया सह ।सुमन्त्रं प्राहिणोद्दूतमर्थकामकरं मम ॥१८॥

धन्य है हमारा सौभाग्य कि महाराज ने अपनी प्रिय महारानी के साथ, मेरे अर्थ और धर्मोचित कामनाओं को सिद्ध करने वाले दूत सुमन्त्र को भेजा है।

Verse 19

यादृशी परिषत्तत्र तादृशो दूत आगतः ।ध्रुवमद्यैव मां राजा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥१९॥

जैसी वहाँ की परिषद् है, वैसा ही योग्य दूत आया है। निश्चय ही आज ही राजा मुझे युवराज्य में अभिषिक्त करेंगे।

Verse 20

हन्त शीघ्रमितो गत्वा द्रक्ष्यामि च महीपतिम् ।सह त्वं परिवारेण सुखमास्व रमस्व च ॥२०॥

अहो, मैं शीघ्र ही यहाँ से जाकर महीपति को देखूँगा। तुम अपने परिचारकों सहित यहाँ सुख से बैठो और निश्चिन्त रहो।

Verse 21

पतिसम्मानिता सीता भर्तारमसितेक्षणा ।आद्वारमनुवव्राज मङ्गलान्यभिदध्युषी ॥२१॥

पति द्वारा सम्मानित, कृष्णनेत्री सीता अपने स्वामी के पीछे-पीछे द्वार तक चली, और मन में मंगल-घटनाओं का चिंतन करती रही।

Verse 22

राज्यं द्विजातिभिर्जुष्टं राजसूयाभिषेचनम् ।कर्तुमर्हति ते राजा वासवस्येव लोककृत् ॥२२॥

द्विजों द्वारा सुशोभित राज्य और राजसूय-अभिषेक तुम्हारे लिए करने योग्य हैं; जैसे लोककर्ता ने वासव (इन्द्र) को राज्य-वैभव प्रदान किया था।

Verse 23

दीक्षितं व्रतसम्पन्नं वराजिनधरं शुचिम् ।कुरङ्गशृङ्गपाणिं च पश्यन्ती त्वां भजाम्यहम् ॥२३॥

दीक्षा-युक्त, व्रत-सम्पन्न, शुद्ध, उत्तम मृगचर्म धारण किए हुए, और हाथ में कुरङ्ग-शृंग लिए तुम्हें देखकर मैं हर्षित होऊँगी।

Verse 24

पूर्वां दिशं वज्रधरो दक्षिणां पातु ते यमः ।वरुणः पश्चिमामाशां धनेशस्तूत्तरां दिशम् ॥२४॥

पूर्व दिशा में वज्रधर (इन्द्र) तुम्हारी रक्षा करें; दक्षिण में यम; पश्चिम में वरुण; और उत्तर दिशा में धनेश (कुबेर) तुम्हें सुरक्षित रखें।

Verse 25

अथ सीतामनुज्ञाप्य कृतकौतुकमङ्गलः ।निश्चक्राम सुमन्त्रेण सह रामो निवेशनात् ॥२५॥

तब सीता से अनुमति लेकर, मंगलमय अलंकार धारण किए हुए, राम सुमन्त्र के साथ अपने निवास से बाहर निकले।

Verse 26

पर्वतादिव निष्क्रम्य सिंहो गिरिगुहाशयः ।लक्ष्मणं द्वारिसोऽपश्यत्प्रह्वाञ्जलिपुटं स्थितम् ॥२६॥

पर्वत-गुफा से निकलते सिंह के समान, बाहर आते ही श्रीराम ने द्वार पर लक्ष्मण को देखा—वे श्रद्धा से झुके हुए, हाथ जोड़कर खड़े थे।

Verses 27-28

अथ मध्यमकक्ष्यायां समागच्छत्सुहृज्जनैः ।स सर्वानर्थिनो दृष्ट्वा समेत्य प्रतिनन्द्य च ॥२७॥ततः पावकसङ्काशमारुरोह रथोत्तमम् ।वैयाघ्रं पुरुषव्याघ्रो राजतं राजनन्दनः ॥२८॥

फिर मध्य प्रांगण में वे अपने सुहृदों से मिले। सबको अपने लिए उत्कंठित देखकर वे पास गए और उनका अभिनंदन किया। इसके बाद अग्नि-सम तेजस्वी, पुरुषों में व्याघ्र वह राजकुमार व्याघ्रचर्म धारण किए हुए रजत-निर्मित उत्तम रथ पर आरूढ़ हुए।

Verses 29-30

मेघनादमसम्बाधं मणिहेमविभूषितम् ।मुष्णन्तमिव चक्षूंषि प्रभया सूर्यवर्चसम् ॥२९॥करेणुशिशुकल्पैश्च युक्तं परमवाजिभिः ।हरियुक्तं सहस्राक्षो रथमिन्द्र इवाशुगम् ॥३०॥प्रययौ तूर्णमास्थाय राघवो ज्वलितश्श्रिया ।

वह रथ मेघ-गर्जन के समान निनाद करता, विशाल और अवरोध-रहित था; मणि और स्वर्ण से विभूषित, सूर्य-सम तेज से ऐसा दीप्त कि मानो नेत्रों को हर ले। परम श्रेष्ठ अश्वों से युक्त—जो बल में गजराज-शिशुओं के समान थे—वह हरि-युक्त रथ सहस्राक्ष इन्द्र के रथ की भाँति अत्यन्त वेगवान था।

Verse 31

स पर्जन्य इवाकाशे स्वनवानभिनादयन् ॥३१॥निकेतान्निर्ययौ श्रीमान्महाभ्रादिव चन्द्रमाः ।

आकाश में पर्जन्य के समान गर्जना करता हुआ वह श्रीमान रथ निवास-स्थान से बाहर निकला—जैसे घने मेघ-पुंज के पीछे से चन्द्रमा प्रकट हो।

Verse 32

छत्रचामरपाणिस्तु लक्ष्मणो राघवानुजः ॥३२॥जुगोप भ्रातरं भ्राता रथमास्थाय पृष्ठतः ।

छत्र और चँवर हाथ में लिए राघव के अनुज लक्ष्मण रथ पर पीछे चढ़े और सच्चे भ्राता की भाँति अपने भ्राता राम की रक्षा करते रहे।

Verse 33

ततो हलहलाशब्दस्तुमुलस्समजायत ॥३३॥तस्य निष्क्रममाणस्य जनौघस्य समन्ततः ।

तब उनके निकलते ही चारों ओर उमड़े जनसमूह से ‘हाय-हाय’ का घोर कोलाहल उठ खड़ा हुआ।

Verse 34

ततो हयवरा मुख्या नागाश्च गिरिसन्निभाः ॥३४॥अनुजग्मुस्तदा रामं शतशोऽथ सहस्रशः ।

तब उत्तम घोड़ों पर आरूढ़ अग्रणी वीर और पर्वत-से विशाल हाथियों पर सवार लोग, सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में राम के पीछे चल पड़े।

Verse 35

अग्रतश्चास्य सन्नद्धाश्चन्दनागरुभूषिताः ॥३५॥खड्गचापधराश्शूरा जग्मुराशंसवो जनाः ।

उनके आगे-आगे कवचधारी, चन्दन और अगरु से सुशोभित, तलवार और धनुष धारण किए शूरवीर—उनके आगमन की घोषणा करने वाले अग्रदूत बनकर चले।

Verse 36

ततो वादित्रशब्दाश्च स्तुतिशब्दाश्च वन्दिनाम् ॥३६॥सिंहनादाश्च शूराणां तदा शुश्रुविरे पथि ।

तब मार्ग में वाद्यों की ध्वनि, वन्दियों के स्तुति-गान और शूरवीरों के सिंहनाद—ये सब सुनाई देने लगे।

Verse 37

हर्म्यवातायनस्थाभिर्भूषिताभिस्समन्ततः ॥३७॥कीर्यमाण स्सुपुष्पौघैर्ययौ स्त्रीभिररिन्दमः ।

महलों की खिड़कियों पर खड़ी, अलंकृत स्त्रियाँ चारों ओर से पुष्प-समूहों की वर्षा करती रहीं; शत्रुओं का दमन करने वाले श्रीराम आगे बढ़ते गए।

Verse 38

रामं सर्वानवद्याङ्ग्यो रामपिप्रीषया ततः ॥३८॥वचोभिरग्य्रैर्हर्म्यस्था क्षितिस्थाश्च ववन्दिरे ।

तब सर्वांग-सुन्दरी स्त्रियाँ—कुछ अट्टालिकाओं पर और कुछ भूमि पर—राम को प्रसन्न करने की इच्छा से उत्तम, मधुर वचनों द्वारा वन्दना करने लगीं।

Verse 39

नूनं नन्दति ते माता कौशल्यामातृनन्दन ॥३९॥पश्यन्ती सिद्धयात्रं त्वां पित्र्यं राज्यमवस्थितम् ।

हे मातृनन्दन! निश्चय ही तुम्हारी माता कौशल्या आनन्दित होंगी, जब वे तुम्हें—जीवन-यात्रा सिद्ध हुई—पिता के राज्य में दृढ़तापूर्वक स्थित देखेंगी।

Verse 40

सर्वसीमन्तिनीभ्यश्च सीतां सीमन्तिनी वराम् ॥४०॥अमन्यन्त हि ता नार्यो रामस्य हृदयप्रियाम् ।

वे स्त्रियाँ राम के हृदय को प्रिय सीता को समस्त कुलवधुओं में श्रेष्ठ कुलवधू मानती थीं।

Verse 41

तया सुचरितं देव्या पुरा नूनं महत्तपः ॥४१॥रोहिणीव शशाङ्केन रामसंयोगमाप या ।

निश्चय ही उस देवी ने पूर्वकाल में महान् तप का उत्तम आचरण किया था; इसी से वह राम के संयोग को प्राप्त हुई—जैसे रोहिणी चन्द्रमा के साथ।

Verses 42-43

इति प्रासादशृङ्गेषु प्रमदाभिर्नरोत्तमः ॥४२॥शुश्राव राजमार्गस्थः प्रिया वाच उदाहृताः ।आत्मसंपूजनै शृण्वन् ययौ रामौ महापथम् ॥४३॥

इस प्रकार राजमार्ग में स्थित राम ने ऊँचे प्रासादों के शिखरों पर खड़ी स्त्रियों द्वारा कही गई प्रिय वाणी सुनी। अपने ही गुणों की स्तुति सुनते हुए वे महापथ पर आगे बढ़े।

Verse 44

स राघवस्तत्र कथाप्रपञ्चान् शुश्राव लोकस्य समागतस्य ।आत्माधिकारा विविधाश्च वाचः प्रहृष्टरूपस्य पुरो जनस्य ॥४४॥

वहाँ राघव ने एकत्रित जनसमूह की अनेक प्रकार की बातें सुनीं—अपने ही विषय में विविध वचन; और उनके आगे के नागरिक हर्ष से दीप्त थे।

Verse 45

एष श्रियं गच्छति राघवोऽद्य राजप्रसादाद्विपुलां गमिष्यन् ।एते वयं सर्व समृद्धकामा येषामयं नो भविता प्रशास्ता ॥४५॥

आज यह राघव राजा की कृपा से विशाल ऐश्वर्य की ओर जा रहा है, राज्य-प्राप्ति के लिए। जिसके शासन में हम सबकी समस्त कामनाएँ समृद्ध होंगी।

Verse 46

लाभो जनस्यास्य यदेष सर्वं प्रपत्स्यते राष्ट्रमिदं चिराय ।न ह्यप्रियं किञ्चन जातु कश्चि त्पश्येन्न दुःखं मनुजाधिपेऽस्मिन् ॥४६॥

यदि यह श्रीराम दीर्घकाल तक इस समस्त राज्य को प्राप्त करें, तो यही प्रजा का सच्चा लाभ होगा; इस नराधिप के रहते कोई भी कभी अप्रिय या दुःख का लेशमात्र भी न देखेगा।

Verse 47

स घोषवद्भिश्च मतङ्गाजैर्ययैः पुरस्सरै स्स्वस्तिकसूतमागधैः ।महीयमानः प्रवरैश्च वादकै रभिष्टुतो वैश्रवणो यथा ययौ ॥४७॥

घोष करते हुए गजराजों और अश्वों के साथ, आगे-आगे स्वस्तिवाचन करने वाले सूत-मागध चलते हुए, श्रेष्ठ वादकों द्वारा सम्मानित और स्तुत, राम वैश्रवण (कुबेर) के समान राजसी ठाठ से आगे बढ़े।

Verse 48

करेणुमातंङ्गरथाश्वसंकुलं महाजनौघ परिपूर्णचत्वरम् ।प्रभूतरत्नं बहुपण्यसञ्चयं ददर्श रामो रुचिरं महापथम् ॥४८॥

राम ने उस रमणीय राजमार्ग को देखा, जो हथिनियों, गजराजों, रथों और अश्वों से भरा था; जिसके चौराहे महान् जनसमूहों से परिपूर्ण थे; जो बहुमूल्य रत्नों से समृद्ध और विविध व्यापार-सामग्री के भंडारों से सम्पन्न था।

Frequently Asked Questions

The pivotal action is Rama’s immediate, respectful compliance with the king’s summons (delivered by Sumantra), framed through vinaya and readiness for duty; the episode models how royal protocol and personal humility operate before any political reversal is revealed.

The chapter teaches that auspicious expectation must be held with discipline: Rama interprets events as coronation-related yet proceeds through right conduct—honouring elders, attending to messages promptly, and receiving public praise without losing composure.

Cultural landmarks include the inner apartments (antaḥpura), guarded courtyards, the royal highway (rājamārga/mahāpatha), rooftop/window viewing (prāsāda-śṛṅga, vātāyana), and consecration motifs (rājasūya, dīkṣā, maṅgala, directional deity invocations).

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