Adhyaya 47
Bhishma ParvaAdhyaya 47109 Versesरण-उत्साह और पक्ष-प्रतिबद्धता तीव्र; निर्णायक टकराव की ओर वातावरण उन्मुख।

Adhyaya 47

Chapter 47: Krauñca-vyūha Deployment and Conch-Signals (Kaurava–Pāṇḍava Readiness)

Upa-parva: Vyūha-nirmāṇa (Krauñca-vyūha) and Śaṅkha-nāda Episode

Sañjaya reports that on seeing a daunting Krauñca formation arranged against the Pāṇḍavas, Duryodhana approaches senior figures—Droṇa (ācārya), Kṛpa, Śalya, Saumadatti, Vikarṇa, Aśvatthāman, and his brothers and allied warriors—and delivers a timed exhortation. He asserts their individual prowess, contrasts perceived adequacy and inadequacy of forces while Bhīṣma commands, and assigns protective responsibilities: specific regional and clan contingents are positioned to guard Bhīṣma and to hold the left wing, right wing, and rear. The Kaurava command structure is then shown in motion—Droṇa and Bhīṣma advance the formation to obstruct the Pāṇḍavas, with Śakuni and others guarding supporting elements. The episode transitions into formalized acoustic signaling: Kauravas sound conches and instruments; Bhīṣma answers with a loud conch; then Kṛṣṇa and Arjuna, followed by Bhīma, Yudhiṣṭhira, Nakula, Sahadeva, and allied leaders, blow their conches. The resulting tumult symbolizes synchronized mobilization and the resumption of engagement.

Chapter Arc: रणभूमि के कोलाहल के बीच एक ओर गीता-महात्म्य की गूँज—‘गीता सर्वशास्त्रमयी’—और दूसरी ओर कौरव-पक्ष की सभा में युधिष्ठिर के नाम पर धिक्कार; धर्म और युद्ध एक ही श्वास में टकराते हैं। → कौरव-शिविर में शल्य के सामने युद्ध-नीति और निष्ठा का प्रश्न तीखा होता जाता है—‘युद्ध से अन्य क्या चाहता है?’ जैसे वाक्य शल्य को क्लीबता के आरोप से उकसाते हैं; उधर पाण्डवों की कीर्ति का वृत्तान्त दूर-दूर तक फैलकर जन-समूह को भाव-विह्वल कर देता है। → शल्य का निर्णायक कथन—‘काम योत्स्ये परस्यार्थे… बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः’—वह स्वीकार करता है कि वह कौरवों के अर्थ-बन्धन से बँधा होकर पराये पक्ष के लिए भी युद्ध करने को विवश है; इसी क्षण युद्ध का नैतिक द्वंद्व नग्न हो उठता है। → सभा में ‘साधु साधु’ की स्तुतियाँ उठती हैं, और पाण्डवों के यश का समाचार सुनकर आर्य-म्लेच्छ तक गद्गद होकर रो पड़ते हैं; महाभेरियाँ और शंखनाद वातावरण को भर देते हैं—युद्ध का निर्णय भावनाओं के ज्वार में स्थिर हो जाता है। → शंख-भेरी के उन्माद के साथ अगला प्रहार किस ओर झुकेगा—शल्य की विवश निष्ठा कौरवों को उठाएगी या भीतर का धर्म उसे किसी अप्रत्याशित मोड़ पर ले जाएगा?

Shlokas

Verse 1

१०), 'सो5हमस्मि”--वह ब्रह्म ही मैं हूँ, आदि महावाक्योंके अनुसार जिसकी परमात्मामें अभिन्नभावसे नित्य अटल स्थिति हो जाती है, ऐसे सांख्ययोगीका वाचक यहाँ “ब्रह्मभूत:” पद है। गीताके पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें और छठे अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें भी इस स्थितिवाले योगीको “ब्रह्म भूत” कहा है। ५. जिसका मन पवित्र, स्वच्छ और शान्त हो तथा निरन्तर शुद्ध प्रसन्न रहता हो, उसे “प्रसन्नात्मा' कहते हैं। <&. ब्रह्मभूत योगीकी सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेके कारण संसारकी किसी भी वस्तुमें उसकी भिन्न सत्ता, रमणीय-बुद्धि और ममता नहीं रहती। अतएव शरीरादिके साथ किसीका संयोग-वियोग होनेमें उसका कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं; इस कारण वह किसी भी हालतमें किसी भी कारणसे किंचिन्मात्र भी चिन्ता या शोक नहीं करता और वह पूर्णकाम हो जाता है, इसलिये वह कुछ भी नहीं चाहता। ७. जो ज्ञानयोगका फल है, जिसको ज्ञानकी परा निष्ठा और तत्त्वज्ञान भी कहते हैं, उसीको “परा भक्ति” कहा है। ८. इस परा भक्तिरूप तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति होनेके साथ ही वह योगी उस तत्त्वज्ञानके द्वारा मेरे यथार्थ रूपको जान लेता है; मेरा निर्गुण-निराकार रूप क्‍या है तथा सगुण-निराकार और सगुण-साकार रूप क्या है, मैं निराकारसे साकार कैसे होता हूँ और पुन: साकारसे निराकार कैसे होता हूँ---इत्यादि कुछ भी जानना उसके लिये शेष नहीं रहता। ९, परमात्माके तत्त्वज्ञान और उनकी प्राप्तिमें अन्तर यानी व्यवधान नहीं होता, परमात्माके स्वरूपको यथार्थ जानना और उनमें प्रविष्ट होना--दोनों एक साथ होते हैं। परमात्मा सबके आत्मरूप होनेसे वास्तवमें किसीको अप्राप्त नहीं हैं, अतः उनके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान होनेके साथ ही उनकी प्राप्ति हो जाती है। ३. अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जितने भी शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म हैं--जिनका वर्णन पहले “नियत कर्म” और 'स्वभावज कर्म” के नामसे किया गया है तथा जो भगवान्‌की आज्ञा और प्रेरणाके अनुकूल हैं--उन सबका वाचक यहाँ 'सर्वकर्माणि” पद है। २. समस्त कर्मोंका और उनके फलरूप समस्त भोगोंका आश्रय त्यागकर जो भगवानके ही आश्रित हो गया है, जो अपने मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको, उसके द्वारा किये जानेवाले समस्त कर्मोंकोी और उनके फलको भगवानके समर्पण करके उन सबसे ममता, आसक्ति और कामना हटाकर भगवानके ही परायण हो गया है, भगवान्‌को ही अपना परम प्राप्य, परम प्रिय, परम हितैषी, परमाधार और सर्वस्व समझकर जो भगवानके विधानमें सदैव प्रसन्न रहता है--किसी भी सांसारिक वस्तुके संयोग-वियोगमें और किसी भी घटनामें कभी हर्ष-शोक नहीं करता, सदा भगवानपर ही निर्भर रहता है, वह भक्तिप्रधान कर्मयोगी ही भगवत्परायण है। 3. जो सदासे है और सदा रहता है, जिसका कभी अभाव नहीं होता, वह सच्चिदानन्दघन, पूर्णब्रह्म, सर्वशक्तिमान्‌, सर्वाधार परमेश्वर परम प्राप्य है, इसलिये उसे “परम पद” के नामसे कहा गया है। इसीको पैंतालीसवें श्लोकमें 'संसिद्धि', छियालीसवेंमें 'सिद्धि" और पचपनवें श्लोकमें “माम्‌” पदवाच्य परमेश्वर कहा गया है। ४. सांख्ययोगी समस्त परिग्रह और समस्त भोगोंका त्याग करके एकान्त देशमें निरन्तर परमात्माके ध्यानका साधन करता हुआ जिस परमात्माको प्राप्त करता है, भगवदाश्रयी कर्मयोगी स्ववर्णाश्रमोचित समस्त कर्मोंको सदा करता हुआ भी उसी परमात्माको प्राप्त हो जाता है; दोनोंके फलमें किसी प्रकारका भेद नहीं होता। ५. अपने मन, इन्द्रिय और शरीरको, उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोको और संसारकी समस्त वस्तुओंको भगवान्‌ूकी समझकर उन सबमें ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग कर देना तथा मुझमें कुछ भी करनेकी शक्ति नहीं है, भगवान्‌ ही सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करके मेरे द्वारा अपने इच्छानुसार समस्त कर्म करवाते हैं, मैं कुछ भी नहीं करता--ऐसा समझकर भगवान्‌के आज्ञानुसार उन्हींके लिये, उन्हींकी प्रेरणासे, जैसे करावें वैसे ही, निमित्तमात्र बनकर समस्त कर्मोंको कठपुतलीकी भाँति करते रहना--यही समस्त कर्मोंको मनसे भगवानमें अर्पण कर देना है। ६. सिद्धि और असिद्धिमें, सुख और दु:खमें, लाभ और हानिमें, इसी प्रकार संसारके समस्त पदार्थोंमें और प्राणियोंमें जो समबुद्धि है, उसको “बुद्धियोग” कहते हैं। ७. भगवानको ही अपना परम प्राप्य, परम गति, परम हितैषी, परम प्रिय और परमाधार मानना, उनके विधानमें सदा ही संतुष्ट रहना और उनकी प्राप्तिके साधनोंमें तत्पर रहना भगवान्‌के परायण होना है। ८. मन-बुद्धिको अटलभावसे भगवान्‌में लगा देना; भगवान्‌के सिवा अन्य किसीमें किंचिन्मात्र भी प्रेमका सम्बन्ध न रखकर अनन्यप्रेमपूर्वक निरन्तर भगवान्‌का ही चिन्तन करते रहना; क्षणमात्रके लिये भी भगवान्‌की विस्मृतिका असहा हो जाना; उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते, सोते-जागते और समस्त कर्म करते समय भी नित्य-निरन्तर मनसे भगवान्‌के दर्शन करते रहना--यही निरन्तर भगवानूमें चित्तवाला होना है। ९, निरन्तर मुझमें मन लगा देनेके बाद तुम्हें और कुछ भी नहीं करना पड़ेगा, मेरी दयाके प्रभावसे अनायास ही तुम्हारे इस लोक और परलोकके समस्त दुःख टल जायँगे, तुम सब प्रकारके दुर्गुण और दुराचारोंसे रहित होकर सदाके लिये जन्म-मरणरूप महान्‌ संकटसे मुक्त हो जाओगे और मुझ नित्य- आनन्दघन परमेश्वरको प्राप्त कर लोगे। $. यद्यपि भगवान्‌ अर्जुनसे पहले यह कह चुके हैं कि तुम मेरे भक्त हो (गीता ४।३) और यह भी कह आये हैं कि 'न मे भक्तः प्रणश्यति' अर्थात्‌ मेरे भक्तका कभी पतन नहीं होता (गीता ९३१) और यहाँ यह कहते हैं कि तुम नष्ट हो जाओगे अर्थात्‌ तुम्हारा पतन हो जायगा; इसमें विरोध मालूम होता है; किंतु भगवानने स्वयं ही उपर्युक्त वाक्यमें “चेत्‌” पदका प्रयोग करके इस विरोधका समाधान कर दिया है। अभिप्राय यह है कि भगवानके भक्तका कभी पतन नहीं होता, यह ध्रुव सत्य है और यह भी सत्य है कि अर्जुन भगवानके परम भक्त हैं; इसलिये वे भगवान्‌की बात न सुनें, उनकी आज्ञाका पालन न करें--यह हो ही नहीं सकता; किंतु इतनेपर भी यदि अहंकारके वशमें होकर भगवान्‌की आज्ञाकी अवहेलना कर दें तो फिर भगवानके भक्त नहीं समझे जा सकते, इसलिये फिर उनका पतन होना भी युक्तिसंगत ही है। २. पहले भगवानके द्वारा युद्ध करनेकी आज्ञा दी जानेपर (गीता २।३) जो अर्जुनने भगवानसे यह कहा था कि “न योत्स्ये'--मैं युद्ध नहीं करूँगा (गीता २।९), उसी बातको स्मरण कराते हुए भगवान्‌ कहते हैं कि तुम जो यह मानते हो कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा', तुम्हारा यह मानना केवल अहंकारमात्र है; युद्ध न करना तुम्हारे हाथकी बात नहीं है। 3. जन्म-जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंके संस्कार जो वर्तमान जन्ममें स्वभावरूपसे प्रादुर्भूत हुए हैं, उनके समुदायको प्रकृति यानी स्वभाव कहते हैं। इस स्वभावके अनुसार ही मनुष्यका भिन्न-भिन्न कर्मोंके अधिकारीसमुदायमें जन्म होता है और उस स्वभावके अनुसार ही भिकन्न-भिन्न मनुष्योंकी भिन्न-भिन्न कर्मोमें प्रवृत्ति हुआ करती है। अतएव यहाँ उपर्युक्त वाक्यसे भगवानने यह दिखलाया है कि जिस स्वभावके कारण तुम्हारा क्षत्रियकुलमें जन्म हुआ है, वह स्वभाव तुम्हारी इच्छा न रहनेपर भी तुमको जबर्दस्ती युद्धमें प्रवृत्त करा देगा। योग्यता प्राप्त होनेपर वीरतापूर्वक युद्ध करना, युद्धसे डरना या भागना नहीं--यह तुम्हारा सहज कर्म है; अतएव तुम इसे किये बिना रह नहीं सकोगे, तुमको युद्ध अवश्य करना पड़ेगा। यहाँ क्षत्रियके नाते अर्जुनको युद्धके विषयमें जो बात कही है, वही बात अन्य वर्णवालोंको अपने-अपने स्वाभाविक कर्मोके विषयमें समझ लेनी चाहिये। ४. अर्जुनकी माता कुन्ती बड़ी वीर महिला थी, उसने स्वयं श्रीकृष्णके हाथ सँदेशा भेजते समय पाण्डवोंको युद्धके लिये उत्साहित किया था। अतः भगवान्‌ यहाँ अर्जुनको 'कौन्तेय” नामसे सम्बोधित करके यह भाव दिखलाते हैं कि तुम वीर माताके पुत्र हो, स्वयं भी शूरवीर हो, इसलिये तुमसे युद्ध किये बिना नहीं रहा जायगा। ५. न्यायसे प्राप्त सहजकर्मको न करनेका अविवेकके अतिरिक्त दूसरा कोई युक्तियुक्त कारण नहीं है। ६. यहाँ भगवानने यह भाव दिखलाया है कि युद्ध तो तुम्हें अपने स्वभावके वशमें होकर करना ही पड़ेगा। इसलिये यदि मेरी आज्ञाके अनुसार अर्थात्‌ सत्तावनवें श्लोकमें बतलायी हुई विधिके अनुसार उसे करोगे तो कर्मबन्धनसे मुक्त होकर मुझे प्राप्त हो जाओगे, नहीं तो राग-द्वेषके जालमें फँसकर जन्म- मृत्युरूप संसारसागरमें गोते लगाते रहोगे। जिस प्रकार नदीके प्रवाहमें बहता हुआ मनुष्य उस प्रवाहका सामना करके नदीके पार नहीं जा सकता, वरं अपना नाश कर लेता है और जो किसी नौका या काठका आश्रय लेकर या तैरनेकी कलासे जलके ऊपर तैरता रहकर उस प्रवाहके अनुकूल चलता है, वह किनारे लगकर उसको पार कर जाता है; उसी प्रकार प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ जो मनुष्य प्रकृतिका सामना करता है, यानी हठसे कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर देता है, वह प्रकृतिसे पार नहीं हो सकता, वरं उसमें अधिक फँसता जाता है और जो परमेश्वरका या कर्मयोगका आश्रय लेकर या ज्ञानमार्गके अनुसार अपनेको प्रकृतिसे ऊपर उठाकर प्रकृतिके अनुकूल कर्म करता रहता है, वह कर्मबन्धनसे मुक्त होकर प्रकृतिके पार चला जाता है अर्थात्‌ परमात्माको प्राप्त हो जाता है। ३. यहाँ शरीरको यन्त्रका रूपक देकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि जैसे रेलगाड़ी आदि किन्हीं यन्त्रोंपर बैठा हुआ मनुष्य स्वयं नहीं चलता, तो भी रेलगाड़ी आदि यन्त्रके चलनेसे उसका चलना हो जाता है--उसी प्रकार यद्यपि आत्मा निश्चल है, उसका किसी भी क्रियासे वास्तवमें कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, तो भी अनादिसिद्ध अज्ञानके कारण उसका शरीरसे सम्बन्ध होनेसे उस शरीरकी क्रिया उसकी क्रिया मानी जाती है तथा ईश्वरको सब भूतोंके हृदयमें स्थित बतलाकर यह भाव दिखलाया है कि यन्त्रको चलानेवाला प्रेरक जैसे स्वयं भी उस यन्त्रमें रहता है, उसी प्रकार ईश्वर भी समस्त प्राणियोंके अन्त:करणमें स्थित है। २. समस्त प्राणियोंको उनके पूर्वार्जित कर्म-संस्कारोंके अनुसार फल भुगतानेके लिये बार-बार नाना योनियोंमें उत्पन्न करना तथा भिन्न-भिन्न पदार्थोंसे, क्रियाओंसे और प्राणियोंसे उनका संयोग-वियोग कराना और उनके स्वभाव (प्रकृति)-के अनुसार उन्हें पुन: चेष्टा करनेमें लगाना--यही भगवान्‌का उन प्राणियोंको अपनी मायाद्वारा भ्रमण कराना है। यहाँ यदि कोई यह कहे कि कर्म करनेमें और न करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है या परतन्त्र? यदि परतन्त्र है तो किसके परतन्त्र है--प्रकृतिके या स्वभावके अथवा ईश्वरके? क्योंकि प्राणीको उनसठवें और साठवें श्लोकोंमें प्रकृतिके और स्वभावके अधीन बतलाया है तथा इस श्लोकमें ईश्वरके अधीन बतलाया है, तो कहना होगा कि कर्म करने और न करनेमें मनुष्य परतन्त्र है, इसीलिये यह कहा गया है कि कोई भी प्राणी क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता (गीता ३।५)। मनुष्यका जो कर्म करनेमें अधिकार बतलाया गया है, उसका अभिप्राय भी उसको स्वतन्त्र बतलाना नहीं है, बल्कि परतन्त्र बतलाना ही है; क्योंकि वहाँ कर्मोके त्यागमें अशक्यता सूचित की गयी है तथा मनुष्यको प्रकृतिके अधीन बतलाना, स्वभावके अधीन बतलाना और ईश्वरके अधीन बतलाना--े तीनों बातें एक ही हैं। क्योंकि स्वभाव और प्रकृति तो पर्यायवाची शब्द हैं और ईश्वर स्वयं निरपेक्षभावसे अर्थात्‌ सर्वथा निर्लिप्त रहते हुए ही जीवोंकी प्रकृतिके अनुरूप अपनी मायाशक्तिके द्वारा उनको कर्मोंमें नियुक्त करते हैं, इसलिये ईश्वरके अधीन बतलाना प्रकृतिके ही अधीन बतलाना है। दूसरे पक्षमें ईश्वर ही प्रकृतिके स्वामी और प्रेरक हैं, इस कारण प्रकृतिके अधीन बतलाना भी ईश्वरके ही अधीन बतलाना है। इसपर कोई यह कहे कि यदि मनुष्य सर्वथा ही परतन्त्र है तो फिर उसके उद्धार होनेका कया उपाय है और उसके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यका विधान करनेवाले शास्त्रोंकी क्या आवश्यकता है; तो कहना होगा कि कर्तव्य-अकर्तव्यका विधान करनेवाले शास्त्र मनुष्यको उसके स्वाभाविक कर्मोंसे हटानेके लिये या उससे स्वभावविरुद्ध कर्म करवानेके लिये नहीं हैं, किंतु उन कर्मोंको करनेमें जो राग-द्वेषके वशमें होकर वह अन्याय कर लेता है, उस अन्यायका त्याग कराकर उसे न्यायपूर्वक कर्तव्यकर्मोंमें लगानेके लिये है। इसलिये मनुष्य कर्म करनेमें स्वभावके परतन्त्र होते हुए भी उस स्वभावका सुधार करनेमें परतन्त्र नहीं है। अतएव यदि वह शास्त्र और महापुरुषोंके उपदेशसे सचेत होकर प्रकृतिके प्रेरक सर्वशक्तिमान्‌ परमेश्वरकी शरण ग्रहण कर ले और राग-द्वेषादि विकारोंका त्याग करके शास्त्रविधिके अनुसार न्यायपूर्वक अपने स्वाभाविक कर्मोंको निष्कामभावसे करता हुआ अपना जीवन बिताने लगे तो उसका उद्धार हो सकता है। 3. भगवानके गुण, प्रभाव, तत्त्व और स्वरूपका श्रद्धापूर्वक निश्चय करके भगवान्‌को ही परम प्राप्य, परम गति, परम आश्रय और सर्वस्व समझना तथा उनको अपना स्वामी, भर्ता, प्रेरक, रक्षक और परम हितैषी समझकर सब प्रकारसे उनपर निर्भर और निर्भय हो जाना एवं सब कुछ भगवान्‌का समझकर और भगवानको सर्वव्यापी जानकर समस्त कर्मोमें ममता, अभिमान, आसक्ति और कामनाका त्याग करके भगवानके आज्ञानुसार अपने कर्मोद्वारा समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित परमेश्वरकी सेवा करना; जो कुछ भी दु:ख-सुखके भोग प्राप्त हों, उनको भगवान्‌का भेजा हुआ पुरस्कार समझकर सदा ही संतुष्ट रहना; भगवान्‌के किसी भी विधानमें कभी किंचिन्मात्र भी असंतुष्ट न होना; मान, बड़ाई और प्रतिष्ठाका त्याग करके भगवान्‌के सिवा किसी भी सांसारिक वस्तुमें ममता और आसक्ति न रखना; अतिशय श्रद्धा और अनन्यप्रेमपूर्वक भगवानके नाम, गुण, प्रभाव, लीला, तत्त्व और स्वरूपका नित्य-निरन्तर श्रवण, चिन्तन और कथन करते रहना--ये सभी भाव तथा क्रियाएँ सब प्रकारसे परमेश्वरकी शरण ग्रहण करनेके अन्तर्गत हैं। ३. उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्‌की शरण ग्रहण करनेवाले भक्तपर परम दयालु, परम सुहृद, सर्वशक्तिमान्‌ परमेश्वरकी अपार दयाका स्रोत बहने लगता है--जो उसके समस्त दुःखों और बन्धनोंको सदाके लिये बहा ले जाता है। इस प्रकार भक्तका जो समस्त दुःखोंसे और समस्त बन्धनोंसे छूटकर सदाके लिये परमानन्दसे युक्त हो जाना और सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मय सनातन परमेश्वरको प्राप्त हो जाना है, यही परमेश्वरकी कृपासे परम शान्तिको और सनातन परम धामको प्राप्त हो जाना है। २. भगवानूने गीताके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे आरम्भ करके यहाँतक अर्जुनको अपने गुण, प्रभाव, तत्त्व और स्वरूपका रहस्य भलीभाँति समझानेके लिये जितनी बातें कही हैं--उस समस्त उपदेशका वाचक यहाँ 'ज्ञान' शब्द है; वह सारा-का-सारा उपदेश भगवानका प्रत्यक्ष ज्ञान करानेवाला है, इसलिये उसका नाम 'ज्ञान' रखा गया है। संसारमें और शास्त्रोंमें जितने भी गुप्त रखनेयोग्य रहस्यके विषय माने गये हैं, उन सबमें भगवानके गुण, प्रभाव और स्वरूपका यथार्थ ज्ञान करा देनेवाला उपदेश सबसे बढ़कर गुप्त रखनेयोग्य माना गया है; इसलिये इस उपदेशका महत्त्व समझानेके लिये और यह बात समझानेके लिये कि अनधिकारीके सामने इन बातोंको प्रकट नहीं करना चाहिये, इस ज्ञानको अत्यन्त गोपनीय बतलाया गया है। 3. गीताके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श"्लोकसे उपदेश आरम्भ करके भगवान्‌ने अर्जुनको सांख्ययोग और कर्मयोग, इन दोनों ही साधनोंके अनुसार स्वधर्मरूप युद्ध करना जगह-जगह (गीता २।१८, ३७; ३।३०; ८।७; ११।३४) कर्तव्य बतलाया तथा अपनी शरण ग्रहण करनेके लिये कहा। इसपर भी कोई उत्तर न मिलनेसे पुनः अर्जुनको सावधान करनेके लिये परमेश्वरको सबका प्रेरक और सबके हृदयमें स्थित बतलाकर उसकी शरण ग्रहण करनेके लिये कहा। इतनेपर भी जब अर्जुनने कुछ नहीं कहा, तब इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें उपदेशका उपसंहार करके एवं कहे हुए उपदेशका महत्त्व दिखलाकर इस वाक्यसे पुनः उसपर विचार करनेके लिये अर्जुनको सावधान करते हुए अन्तमें भगवानने यह कहा कि मैंने जो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग आदि बहुत प्रकारके साधन बतलाये हैं, उनमेंसे तुम्हें जो साधन अच्छा मालूम पड़े, उसीका पालन करो अथवा और जो कुछ तुम ठीक समझो, वही करो। ४. भगवानने यहाँतक अर्जुनको जितनी बातें कहीं, वे सभी बातें गुप्त रखनेयोग्य हैं; अत: उनको भगवानने जगह-जगह “परम गुह्म/! और “उत्तम रहस्य” नाम दिया है। उस समस्त उपदेशमें भी जहाँ भगवानने खास अपने गुण, प्रभाव, स्वरूप, महिमा और ऐश्वर्यको प्रकट करके यानी मैं ही स्वयं सर्वव्यापी, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्‌, साक्षात्‌ सगुण-निर्गुण परमेश्वर हूँ--इस प्रकार कहकर अर्जुनको अपना भजन करनेके लिये और अपनी शरणमें आनेके लिये कहा है, वे वचन अधिक-से-अधिक गुप्त रखनेयोग्य हैं (गीता ९।१-२)। वे पहले भी कहे जा चुके हैं (गीता ९।३४; १२।६-७; १८।५६-५७)। अत: यहाँ भगवान्‌के कहनेका यह अभिप्राय है कि पहले कहे हुए उपदेशमें भी जो अत्यन्त गुप्त रखनेयोग्य सबसे अधिक महत्त्वकी बात है, वह मैं तुम्हें अगले दो श्लोकोंमें फिर कहूँगा। ५. तिरसठवें श्लोकमें कही हुई बातको सुनकर भगवान्‌ने अर्जुनको अपने कर्तव्यका निश्चय करनेके लिये स्वतन्त्र विचार करनेको कह दिया, उसका भार उन्होंने अपने ऊपर नहीं रखा; इस बातको सुनकर जब अर्जुनके मनमें उदासी छा गयी, वे सोचने लगे कि कया मेरा भगवानपर विश्वास नहीं है, क्या मैं इनका भक्त और प्रेमी नहीं हूँ, तब अर्जुनका शोक दूर करनेके लिये उन्हें उत्साहित करते हुए भगवान्‌ यह भाव दिखलाते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो, तुम्हारा और मेरा प्रेमका सम्बन्ध अटल है; अतः तुम किसी तरहका शोक मत करो। ३. भगवानको सर्वशक्तिमान्‌, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वान्तिर्यामी, सर्वव्यापी, सर्वेश्वर तथा अतिशय सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य आदि गुणोंके समुद्र समझकर अनन्य प्रेमपूर्वक निश्चलभावसे मनको भगवान्‌में लगा देना, क्षणमात्र भी भगवान्‌की विस्मृतिको न सह सकना “भगवानमें मनवाला' होना है। २. भगवानको ही एकमात्र अपना भर्ता, स्वामी, संरक्षक, परम गति और परम आश्रय समझकर सर्वथा उनके अधीन हो जाना, किंचिन्मात्र भी अपनी स्वतन्त्रता न रखना, सब प्रकारसे उनपर निर्भर रहना, उनके प्रत्येक विधानमें सदा ही संतुष्ट रहना और उनकी आज्ञाका सदा पालन करना तथा उनमें अतिशय श्रद्धापूर्वक अनन्यप्रेम करना “भगवान्‌का भक्त बनना' है। 3. गीताके नवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकके वर्णनानुसार पत्र-पुष्पादिसे श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक भगवान्‌के विग्रहका पूजन करना; मनसे भगवान्‌का आवाहन करके उनकी मानसिक पूजा करना; उनके वचनोंका, उनकी लीलाभूमिका और उनके विग्रहका सब प्रकारसे आदर-सम्मान करना तथा सबमें भगवानको व्याप्त समझकर या समस्त प्राणियोंको भगवान्‌का स्वरूप समझकर उनकी यथायोग्य सेवा- पूजा, आदर-सत्कार करना आदि सब “भगवान्‌की पूजा” करनेके अन्तर्गत हैं। ४. जिन परमेश्वरके सगुण-निर्मुण, निराकार-साकार आदि अनेक रूप हैं; जो अर्जुनके सामने श्रीकृष्णरूपमें प्रकट होकर गीताका उपदेश सुना रहे हैं; जिन्होंने रामरूपमें प्रकट होकर संसारमें धर्मकी मर्यादाका स्थापन किया और नृसिंहरूप धारण करके भक्त प्रह्नादका उद्धार किया--उन्हीं सर्वशक्तिमान्‌, सर्वगुणसम्पन्न, अन्तर्यामी, परमाधार, समग्र पुरुषोत्तम भगवान्‌के किसी भी रूपको, चित्रको, चरणचिह्लोंको या चरणपादुकाओंको तथा उनके गुण, प्रभाव और तत्त्वका वर्णन करनेवाले शास्त्रोंको साष्टांग प्रणाम करना या समस्त प्राणियोंमें उनको व्याप्त या समस्त प्राणियोंको भगवान्‌का स्वरूप समझकर सबको प्रणाम करना “भगवान्‌को नमस्कार करना है। ५. जिसमें चारों साधन पूर्णरूपसे होते हैं, उसको भगवानकी प्राप्ति हो जाय--इसमें तो कहना ही क्या है; परंतु इनमेंसे एक-एक साधनसे भी भगवान्‌की प्राप्ति हो सकती है; क्योंकि भगवानने स्वयं ही गीताके आठवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें केवल अनन्यचिन्तनसे अपनी प्राप्तिको सुलभ बतलाया है। गीताके सातवें अध्यायके तेईसवें और नवेंके पचीसवेंमें अपने भक्तको अपनी प्राप्ति बतलायी है और नवें अध्यायके छब्बीसवेंसे अट्ठाईसवेंतक एवं इस अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें केवल पूजनसे अपनी प्राप्ति बतलायी है। ६. अर्जुन भगवानके प्रिय भक्त और सखा थे, अतएव उनपर प्रेम और दया करके उनका अपने ऊपर अतिशय दृढ़ विश्वास करानेके लिये और अर्जुनके निमित्तसे अन्य अधिकारी मनुष्योंका विश्वास दृढ़ करानेके लिये भगवान्‌ने कहा है कि मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ। ७. वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार जिस मनुष्यके लिये जो-जो कर्म कर्तव्य बतलाये गये हैं, गीताके बारहवें अध्यायके छठे श्लोकमें 'सर्वाणि' विशेषणके सहित “कर्माणि' पदसे और इस अध्यायके सत्तावनवें श्लोकमें 'सर्वकर्माणि' पदसे जिनका वर्णन किया गया है, उन शास्त्रविहित समस्त कर्मोंको जो उन दोनों श्लोकोंकी व्याख्यामें बतलाये हुए प्रकारसे भगवानमें समर्पण कर देना है अर्थात्‌ सब कुछ भगवान्‌का समझकर मन, इन्द्रिय और शरीरमें तथा उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोमें और उनके फलरूप समस्त भोगोंमें ममता, आसक्ति, अभिमान और कामनाका सर्वथा त्याग कर देना और केवल भगवानके ही लिये भगवान्‌की आज्ञा और प्रेरणाके अनुसार, जैसे वे करवावें, वैसे कठपुतलीकी भाँति उनको करते रहना--यही यहाँ समस्त धर्मोंका परित्याग करना है, उनका स्वरूपसे त्याग करना नहीं। ३. गीताके बारहवें अध्यायके छठे श्लोकमें, नवें अध्यायके अन्तिम श्लोकमें तथा इस अध्यायके सत्तावनवें श्लोकमें कहे हुए प्रकारसे भगवान्‌को ही अपना परम प्राप्य, परम गति, परमाधार, परम प्रिय, परम हितैषी, परम सुहृद, परम आत्मीय तथा भर्ता, स्वामी, संरक्षक समझकर उठते-बैठते, खाते-पीते, चलते-फिरते, सोते-जागते और हरेक प्रकारसे उनकी आज्ञाओंका पालन करते समय परम श्रद्धापूर्वक अनन्यप्रेमसे नित्य-निरन्तर उनका चिन्तन करते रहना और उनके विधानमें सदा ही संतुष्ट रहना एवं सब प्रकारसे केवलमात्र एक भगवानपर ही भक्त प्रह्मादकी भाँति निर्भर रहना एकमात्र परमेश्वरकी शरणमें चला जाना है। २. शुभाशुभ कर्मोका फलरूप जो कर्मबन्धन है--जिससे बँधा हुआ मनुष्य जन्म-जन्मान्तरसे नाना योनियोंमें घूम रहा है, उस कर्मबन्धनसे मुक्त कर देना ही पापोंसे मुक्त कर देना है। इसलिये गीताके तीसरे अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें 'कर्मभि: मुच्यन्ते” से, बारहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें “मृत्युसंसारसागरात्‌ समुद्धर्ता भवामि' से और इस अध्यायके अद्वावनवें श्लोकमें “मत्प्रसादात्‌ सर्वदुर्गाणि तरिष्यसि' से जो बात कही गयी है, वही बात यहाँ “मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त कर दूँगा" इस वाक्यसे कही गयी है। 3. गीताके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें “अशोच्यान” पदसे जिस उपदेशका उपक्रम किया था, उसका "मा शुच:” पदसे उपसंहार करके भगवानने यह दिखलाया है कि गीताके दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें तुम मेरी शरणागति स्वीकार कर ही चुके हो, अब पूर्णरूपसे मेरे शरणागत होकर तुम कुछ भी चिन्ता न करो और शोकका सर्वथा त्याग करके सदा-सर्वदा मुझ परमेश्वरपर निर्भर हो रहो। यह शोकका सर्वथा अभाव और भगव्त्साक्षात्कार ही गीताका मुख्य तात्पर्य है। ४. इससे भगवानने यह दिखलाया है कि यह गीताशास्त्र बड़ा ही गुप्त रखनेयोग्य विषय है, तुम मेरे अतिशय प्रेमी भक्त और दैवी सम्पदासे युक्त हो, इसलिये इसका अधिकारी समझकर मैंने तुम्हारे हितके लिये तुम्हें यह उपदेश दिया है। अत: जो मनुष्य स्वधर्मपालनरूप तप करनेवाला न हो, ऐसे मनुष्यको मेरे गुण, प्रभाव और तत्त्वके वर्णनसे भरपूर यह गीताशास्त्र नहीं सुनाना चाहिये। तथा जिसका मुझ परमेश्वरमें विश्वास, प्रेम और पूज्यभाव नहीं है, जो अपनेको ही सर्वे-सर्वा समझनेवाला नास्तिक है--ऐसे मनुष्यको भी यह अत्यन्त गोपनीय गीताशास्त्र नहीं सुनाना चाहिये। इसी प्रकार यदि कोई अपने धर्मका पालनरूप तप भी करता हो; किंतु गीताशास्त्रमें श्रद्धा और प्रेम न होनेके कारण वह उसे सुनना न चाहता हो, तो उसे भी यह परम गोपनीय शास्त्र नहीं सुनाना चाहिये; क्योंकि ऐसा मनुष्य उसको ग्रहण नहीं कर सकता, इससे मेरे उपदेशका और मेरा अनादर होता है। एवं संसारका उद्धार करनेके लिये सगुणरूपसे प्रकट मुझ परमेश्वरमें जिसकी दोषदृष्टि है, जो मेरे गुणोंमें दोषारोपण करके मेरी निन्‍दा करनेवाला है--ऐसे मनुष्यको तो किसी भी हालतमें यह उपदेश नहीं सुनाना चाहिये; क्योंकि वह मेरे गुण, प्रभाव और ऐश्वर्यको न सह सकनेके कारण इस उपदेशको सुनकर मेरी पहलेसे भी अधिक अवज्ञा करेगा, अतः वह अधिक पापका भागी होगा। ५. यह उपदेश मनुष्यको संसारबन्धनसे छुड़ाकर साक्षात्‌ परमेश्वरकी प्राप्ति करानेवाला होनेसे अत्यन्त ही श्रेष्ठ और गुप्त रखनेयोग्य है। ६. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि जो मुझको समस्त जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और पालन करनेवाले, सर्वशक्तिमान्‌ और सर्वेश्वर समझकर मुझमें प्रेम करना है; जिसके चित्तमें मेरे गुण, प्रभाव, लीला और तत्त्वकी बातें सुननेकी उत्सुकता रहती है और सुनकर प्रसन्नता होती है--वह मेरा भक्त है। उसमें पूर्वश्लोकमें वर्णित चारों दोषोंका अभाव अपने-आप हो जाता है। इसलिये जो मेरा भक्त है, वही इसका अधिकारी है तथा सभी मनुष्य--चाहे किसी भी वर्ण और जातिके क्‍यों न हों--मेरे भक्त बन सकते हैं (गीता ९।३२); अत: वर्ण और जाति आदिके कारण इसका कोई भी अनधिकारी नहीं है। $. स्वयं भगवान्‌में या उनके वचनोंमें अतिशय श्रद्धायुक्त होकर एवं भगवानके नाम, गुण, लीला, प्रभाव और स्वरूपकी स्मृतिसे उनके प्रेममें विह्लल होकर केवल भगवान्‌की प्रसन्नताके ही लिये निष्कामभावसे उपर्युक्त भगवद्धक्तोंमें इस गीताशास्त्रका वर्णन करना, इसके मूल श्लोकोंका अध्ययन कराना, उनकी व्याख्या करके अर्थ समझाना, शुद्ध पाठ करवाना, उनके भावोंको भलीभाँति प्रकट करना और समझाना, श्रोताओंकी शंकाओंका समाधान करके गीताके उपदेशको उनके ह्ृदयमें जमा देना और गीताके उपदेशानुसार चलनेकी उनमें दृढ़ भावना उत्पन्न कर देना आदि सभी क्रियाएँ भगवान्‌में परम प्रेम करके भगवानके भक्तोंमें गीताका कथन करना है। २. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि गीताशास्त्रका उपर्युक्त प्रकारसे प्रचार करना--यह मेरी प्राप्तिका ऐकान्तिक उपाय है; इसलिये मेरी प्राप्ति चाहनेवाले अधिकारी भक्तोंको इस गीताशास्त्रके कथन तथा प्रचारका कार्य अवश्य करना चाहिये। 3. यहाँ भगवान्‌ यह बतलाते हैं कि यज्ञ, दान, तप, सेवा, पूजा और जप, ध्यान आदि जितने भी मेरे प्रिय कार्य हैं, उन सबसे बढ़कर "मेरे भावोंको मेरे भक्तोंमें विस्तार करना” मुझे अधिक प्रिय है। इस कारण जो मेरा प्रेमी भक्त मेरे भावोंका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक मेरे भक्तोंमें विस्तार करता है, वही सबसे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला है; उससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं। केवल इस समय ही उससे बढ़कर मेरा कोई प्रिय कार्य करनेवाला नहीं है, यही बात नहीं है; किंतु उससे बढ़कर मेरा प्यारा काम करनेवाला कोई हो सकेगा, यह भी सम्भव नहीं है। इसलिये मेरी प्राप्तिके जितने भी साधन हैं, उन सबमें यह “भक्तिपूर्वक मेरे भक्तोंमें मेरे भावोंका विस्तार करनारूप” साधन सर्वोत्तम है--ऐसा समझकर मेरे भक्तोंको यह कार्य करना चाहिये। ४. यह साक्षात्‌ परमेश्वरके द्वारा कहा हुआ शास्त्र है; इस कारण इसमें जो कुछ उपदेश दिया गया है, वह सब-का-सब धर्मसे ओतप्रोत है। ५. गीताका मर्म जाननेवाले भगवानके भक्तोंसे इस गीताशास्त्रको पढ़ना, इसका नित्य पाठ करना, इसके अर्थका पाठ करना, अर्थपर विचार करना और इसके अर्थको जाननेवाले भक्तोंसे इसके अर्थको समझनेकी चेष्टा करना आदि सभी अभ्यास गीताशास्त्रको पढ़नेके अन्तर्गत है। श्लोकोंका अर्थ बिना समझे इस गीताको पढ़ने और उसका नित्य पाठ करनेकी अपेक्षा उसके अर्थको भी साथ-साथ पढ़ना और अर्थज्ञानके सहित उसका नित्य पाठ करना अधिक उत्तम है, तथा उसके अर्थको समझकर पढ़ते या पाठ करते समय प्रेममें विह्लल होकर भावान्वित हो जाना उससे भी अधिक उत्तम है। ६. इस गीताशास्त्रका अध्ययन करनेसे मनुष्यको मेरे सगुण-निर्गुण और साकार-निराकार तत्त्वका भलीभाँति यथार्थ ज्ञान हो जाता है। अत: इस गीताशास्त्रका अध्ययन करना ज्ञानयञ्ञके द्वारा मेरी पूजा करना है; क्योंकि सभी साधनोंका अन्तिम फल भगवानके तत्त्वको भलीभाँति जान लेना है और वह फल इस ज्ञानयज्ञसे अनायास ही मिल जाता है। ३. जिसके अंदर इस गीताशास्त्रको श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेकी भी रुचि नहीं है, वह तो मनुष्य कहलानेयोग्य भी नहीं है; क्योंकि उसका मनुष्यजन्म पाना व्यर्थ हो रहा है। इस कारण वह मनुष्यके रूपमें पशुके ही तुल्य है। २. भगवानकी सत्तामें और उनके गुण-प्रभावमें विश्वास करके तथा यह गीताशास्त्र साक्षात्‌ भगवान्‌की ही वाणी है, इसमें जो कुछ भी कहा गया है सब-का-सब यथार्थ है--ऐसा निश्चयपूर्वक मानकर और उसके वक्तापर विश्वास करके प्रेम और रुचिके साथ गीताजीके मूल श्लोकोंके पाठका या उसके अर्थकी व्याख्याका श्रवण करना, यह श्रद्धासे युक्त होकर गीताशास्त्रका श्रवण करना है और उसका श्रवण करते समय भगवानपर या भगवान्‌के वचनोंपर किसी प्रकारका दोषारोपण न करना--यह दोषदृष्टिसे रहित होकर उसका श्रवण करना है। 3. जो अड़सठवें श्लोकके वर्णनानुसार इस गीताशास्त्रका दूसरोंको अध्ययन कराता है तथा जो सत्तरवें श्लोकके कथनानुसार स्वयं अध्ययन करता है, उन लोगोंकी तो बात ही क्या है, पर जो इसका श्रद्धापूर्वक श्रवणमात्र भी कर पाता है, वह भी जन्म-जन्मान्तरोंमें किये हुए पशु-पक्षी आदि नीच योनियोंके और नरकके हेतुभूत पापकर्मसे छूटकर इन्द्रलोकसे लेकर भगवान्‌के परमधामपर्यन्त अपने-अपने प्रेम और श्रद्धाके अनुरूप भिन्न-भिन्न लोकोंको प्राप्त हो जाता है। ४. भगवानके इस प्रश्नका अभिप्राय यह है कि मेरा यह उपदेश बड़ा ही दुर्लभ है, मैं हरेक मनुष्यके सामने “मैं ही साक्षात्‌ परमेश्वर हूँ, तू मेरी ही शरणमें आ जा' इत्यादि बातें नहीं कह सकता; इसलिये तुमने मेरे उपदेशको भलीभाँति ध्यानपूर्वक सुन तो लिया है न? क्योंकि यदि कहीं तुमने उसपर ध्यान न दिया होगा तो तुमने निःसंदेह बड़ी भूल की है। ५. भगवानके इस प्रश्नका भाव यह है कि जिस मोहसे युक्त होकर तुम धर्मके विषयमें अपनेको मूढचेता बतला रहे थे (गीता २।७) तथा अपने स्वधर्मका पालन करनेमें पाप समझ रहे थे (गीता १।३६ से ३९) और समस्त कर्तव्यकर्मोंका त्याग करके भिक्षाके अन्नसे जीवन बिताना श्रेष्ठ समझ रहे थे (गीता २।५) एवं जिसके कारण तुम स्वजन-वधके भयसे व्याकुल हो रहे थे (गीता १।४५--४७) और अपने कर्तव्यका निश्चय नहीं कर पाते थे (गीता २।६-७)--तुम्हारा वह अज्ञानजनित मोह अब नष्ट हो गया या नहीं? यदि मेरे उपदेशको तुमने ध्यानपूर्वक सुना होगा तो अवश्य ही तुम्हारा मोह नष्ट हो जाना चाहिये और यदि तुम्हारा मोह नष्ट नहीं हुआ है तो यही मानना पड़ेगा कि तुमने उस उपदेशको एकाग्रचित्तसे नहीं सुना। यहाँ भगवानके इन दोनों प्रश्नोंमें यह उपदेश भरा हुआ है कि मनुष्यको इस गीताशास्त्रका अध्ययन और श्रवण बड़ी सावधानीके साथ एकाग्रचित्तसे तत्पर होकर करना चाहिये और जबतक अज्ञानजनित मोहका सर्वथा नाश न हो जाय, तबतक यह समझना चाहिये कि अभीतक मैं भगवानके उपदेशको यथार्थ नहीं समझ सका हूँ, अत: पुन: उसपर श्रद्धा और विवेकपूर्वक विचार करना आवश्यक है। ६. अर्जुनके कहनेका अभिप्राय यह है कि आपने यह दिव्य उपदेश सुनाकर मुझपर बड़ी भारी दया की है, आपके उपदेशको सुननेसे मेरा अज्ञानजनित मोह सर्वथा नष्ट हो गया है अर्थात्‌ आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपको यथार्थ न जाननेके कारण जिस मोहसे व्याप्त होकर मैं आपकी आज्ञाको माननेके लिये तैयार नहीं होता था (गीता २।९) और बन्धु-बान्धवोंके विनाशका भय करके शोकसे व्याकुल हो रहा था (गीता १२८ से ४७ तक)--वह सब मोह अब सर्वथा नष्ट हो गया है तथा मुझे आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपकी पूर्ण स्मृति प्राप्त हो गयी है और आपका समग्र रूप मेरे प्रत्यक्ष हो गया है--मुझे कुछ भी अज्ञात नहीं रहा है। अब आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार स्वरूपके विषयमें तथा धर्म-अधर्म और कर्तव्य-अकर्तव्य आदिके विषयमें मुझे किंचिन्मात्र भी संशय नहीं रहा है। आपकी दयासे मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, मेरे लिये अब कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहा; अतएव आपके कथनानुसार लोकसंग्रहके लिये युद्धादि समस्त कर्म जैसे आप करवायेंगे, निमित्तमात्र बनकर लीलारूपसे मैं वैसे ही करूँगा। ३. संजयके कथनका यह भाव है कि साक्षात्‌ नर-ऋषिके अवतार महात्मा अर्जुनके पूछनेपर सबके हृदयमें निवास करनेवाले सर्वव्यापी परमेश्वर श्रीकृष्णके द्वारा यह उपदेश दिया गया है, इस कारण यह बड़े ही महत्त्वका है तथा यह उपदेश बड़ा ही आश्चर्यजनक और असाधारण है; इससे मनुष्यको भगवान्‌के दिव्य अलौकिक गुण, प्रभाव और एऐश्वर्ययुक्त समग्ररूपका पूर्ण ज्ञान हो जाता है तथा मनुष्य इसे जैसे-जैसे सुनता और समझता है, वैसे-ही-वैसे हर्ष और आश्चर्यके कारण उसका शरीर पुलकित हो जाता है, उसके समस्त शरीरमें रोमांच हो जाता है। २. संजयके कथनका अभिप्राय यह है कि भगवान्‌ व्यासजीने दया करके जो मुझे दिव्य दृष्टि अर्थात्‌ दूर देशमें होनेवाली समस्त घटनाओंको देखने, सुनने और समझने आदिकी अद्भुत शक्ति प्रदान की है, उसीके कारण आज मुझे भगवान्‌का यह दिव्य उपदेश सुननेके लिये मिला; नहीं तो मुझे ऐसा सुयोग कैसे मिलता! 3. भगवानकी प्राप्तिके उपायभूत कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग आदि साधनोंका इसमें भलीभाँति वर्णन किया गया है तथा वह स्वयं भी अर्थात्‌ श्रद्धापूर्वक इसका पाठ भी परमात्माकी प्राप्तिका साधन होनेसे योगरूप ही है। ४. संजयके कथनका यह भाव है कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण और अर्जुनका दिव्य संवादरूप यह गीताशास्त्र अध्ययन, अध्यापन, श्रवण, मनन और वर्णन आदि करनेवाले मनुष्यको परम पवित्र करके उसका सब प्रकारसे कल्याण करनेवाला तथा भगवानके आश्वर्यमय गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य, तत्त्व, रहस्य और स्वरूपको बतानेवाला है; अतः यह अत्यन्त ही पवित्र, दिव्य एवं अलौकिक है। इस उपदेशने मेरे हृदयको इतना आकर्षिीत कर लिया है कि अब मुझे दूसरी कोई बात ही अच्छी नहीं लगती; मेरे मनमें बार-बार उस उपदेशकी स्मृति हो रही है और उन भावोंके आवेशमें मैं असीम हर्षका अनुभव कर रहा हूँ, प्रेम और हर्षके कारण विह्नल हो रहा हूँ। ५. भगवान्‌ श्रीकृष्णके गुण, प्रभाव, लीला, ऐश्वर्य, महिमा, नाम और स्वरूपका श्रवण, मनन, कीर्तन, दर्शन और स्पर्श आदिके द्वारा उनके साथ किसी प्रकारका भी सम्बन्ध हो जानेसे वे मनुष्यके समस्त पापोंको, अज्ञानको और दु:खको हरण कर लेते हैं तथा वे अपने भक्तोंके मनको चुरानेवाले हैं; इसलिये उन्हें 'हरि' कहते हैं। ६. जिस अत्यन्त आश्वर्यमय दिव्य विश्वरूपका भगवान्‌ने अर्जुनको दर्शन कराया था और जिसके दर्शनका महत्त्व भगवानने ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें और अड़तालीसमें श्लोकोंमें स्वयं बतलाया है, उसी विराट्‌ स्वरूपको लक्ष्य करके संजय यह कह रहे हैं कि भगवान्‌का वह रूप मेरे चित्तसे उतरता ही नहीं, उसे मैं बार-बार स्मरण करता रहता हूँ और मुझे बड़ा आश्वर्य हो रहा है कि भगवान्‌के अतिशय दुर्लभ उस दिव्य रूपका दर्शन मुझे कैसे हो गया! मेरा तो ऐसा कुछ भी पुण्य नहीं था, जिससे मुझे ऐसे रूपके दर्शन हो सकते। अहो! इसमें केवलमात्र भगवानकी अहैतुकी दया ही कारण है। साथ ही उस रूपके अत्यन्त अदभुत दृश्योंको और घटनाओंको याद कर-करके भी मुझे बड़ा आश्वर्य होता है तथा उसे बार- बार याद करके मैं हर्ष और प्रेममें विह्नल भी हो रहा हूँ; मेरे आनन्दका पारावार नहीं है। ३. यहाँ संजयके कहनेका अभिप्राय यह है कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण समस्त योगशक्तियोंके स्वामी हैं; वे अपनी योगशक्तिसे क्षणभरमें समस्त जगतू्‌की उत्पत्ति, पालन और संहार कर सकते हैं; वे साक्षात्‌ नारायण भगवान्‌ श्रीकृष्ण जिस धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक हैं, उसकी विजयमें क्या शंका है। इसके सिवा अर्जुन भी नर ऋषिके अवतार, भगवान्‌के प्रिय सखा और गाण्डीव-धनुषके धारण करनेवाले महान्‌ वीर पुरुष हैं; वे भी अपने भाई युधिष्ठिरकी विजयके लिये कटिबद्ध हैं। अत: आज उस युधिष्ठिरकी बराबरी दूसरा कौन कर सकता है; क्योंकि जहाँ सूर्य रहता है, प्रकाश उसके साथ ही रहता है --उसी प्रकार जहाँ योगेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण और अर्जुन रहते हैं, वहीं सम्पूर्ण शोभा, सारा ऐश्वर्य और अटल न्याय [(धर्म)--ये सब उनके साथ-साथ रहते हैं और जिस पक्षमें धर्म रहता है, उसीकी विजय होती है। अतः पाण्डवोंकी विजयमें किसी प्रकारकी शंका नहीं है। यदि अब भी तुम अपना कल्याण चाहते हो तो अपने पुत्रोंकी समझाकर पाण्डवोंसे संधि कर लो। (भीष्मवधपर्व) त्रिचत्वारिशो< ध्याय: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठटिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना वैशम्पायन उवाच गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रसंग्रहै: । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपदञ्माद्‌ विनि:सृता,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! अन्य बहुत-से शास्त्रोंका संग्रह करनेकी क्या आवश्यकता है? गीताका ही अच्छी तरहसे गान (श्रवण, कीर्तन, पठन-पाठन, मनन और धारण) करना चाहिये; क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ भगवानके साक्षात्‌ मुखकमलसे निकली हुई है

Vaiśampāyana said: “O Janamejaya, what need is there to amass many other scriptural compendia? The Bhagavad Gītā alone should be well ‘sung’—that is, heard, recited, studied, reflected upon, and held in the heart—for it has issued directly from the lotus-mouth of Padmanābha (the Lord Himself).”

Verse 2

सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरि: । सर्वतीर्थमयी गंगा सर्ववेदमयो मनु:,गीता सर्वशास्त्रमयी है (गीतामें सब शास्त्रोंके सार-तत्त्वका समावेश है)। भगवान्‌ श्रीहरि सर्वदेवमय हैं। गंगा सर्वतीर्थमयी हैं और मनु (उनका धर्मशास्त्र) सर्ववेदमय हैं

Vaiśampāyana said: The Gītā embodies the essence of all śāstras; Hari (Śrī Viṣṇu) is the very presence of all the gods. The Gaṅgā contains the sanctity of all pilgrimage-places, and Manu (and his dharma-teaching) embodies the purport of all the Vedas. Thus the tradition points to a few supreme sources as comprehensive guides for dharma and right conduct.

Verse 3

गीता गंगा च गायत्री गोविन्देति हृदि स्थिते । चतुर्गकारसंयुक्ते पुनर्जन्म न विद्यते,गीता, गंगा, गायत्री और गोविन्द--इन “ग” कारयुक्त चार नामोंको हृदयमें धारण कर लेनेपर मनुष्यका फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता

Vaiśampāyana said: When the heart is firmly established in these four sacred names beginning with the sound “ga”—Gītā, Gaṅgā, Gāyatrī, and Govinda—one is freed from the cycle of rebirth. The verse frames liberation not as a mere ritual claim, but as the ethical and devotional transformation that comes from inwardly holding scripture, sacred purity, mantra, and the Lord’s name.

Verse 4

नाप () आजआसर- 'श्रीमद्भगवद्गीता”' “आनन्दचिद्धन' षडैश्वर्यपू्ण चराचरवन्दित परमपुरुषोत्तम, साक्षात्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णकी दिव्य वाणी है। यह अनन्त रहस्योंसे पूर्ण है। परम दयामय भगवान्‌ श्रीकृष्णकी कृपासे ही किसी अंभशमें इसका रहस्य समझमें आ सकता है। जो पुरुष परम श्रद्धा और प्रेममयी विशुद्ध भक्तिसे अपने हृदयको भरकर भगवदगीताका मनन करते हैं, वे ही भगवत्‌- कृपाका प्रत्यक्ष अनुभव करके गीताके स्वरूपका किसी अंशमें अनुभव कर सकते हैं। अतएव अपना कल्याण चाहनेवाले नर-नारियोंको उचित है कि वे भक्तवर अर्जुनको आदर्श मानकर अपनेमें अर्जुनके-से दैवी गुणोंका अर्जन करते हुए श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गीताका श्रवण-मनन और अध्ययन करें एवं भगवानके अआज्ञानुसार यथायोग्य तत्परताके साथ साधनमें लग जायँ। जो पुरुष इस प्रकार करते हैं, उनके अन्तःकरणमें नित्य नये-नये परमानन्ददायक अनुपम और दिव्य भावोंकी स्फुरणाएँ होती रहती हैं तथा वे सर्वथा शुद्धान्त:करण होकर भगवान्‌की अलौकिक कृपा-सुधाका रसास्वादन करते हुए शीघ्र ही भगवान्‌को प्राप्त हो जाते हैं। 3. अर्जुनके प्रश्नका यह भाव है कि संन्यास (ज्ञानयोग)-का क्या स्वरूप है, उसमें कौन-कौनसे भाव और कर्म सहायक एवं कौन-कौनसे बाधक हैं, उपासनासहित सांख्ययोगका और केवल सांख्ययोगका साधन किस प्रकार किया जाता है; इसी प्रकार त्याग (फलासक्तिके त्यागरूप कर्मयोग)-का क्‍या स्वरूप है; केवल कर्मयोगका साधन किस प्रकार होता है, क्या करना इसके लिये उपयोगी है और क्या करना इसमें बाधक है; भक्तिमिश्रित कर्मयोग कौन-सा है; भक्तिप्रधान कर्मयोग कौन-सा है तथा लौकिक और शास्त्रीय कर्म करते हुए भक्तिमिश्रित एवं भक्तिप्रधान कर्मयोगका साधन किस प्रकार किया जाता है--इन सब बातोंको भी मैं भलीभाँति जानना चाहता हूँ। उत्तरमें भगवानने इस अध्यायके तेरहवेंसे सत्रहवें श्लोकतक संन्यास (ज्ञानयोग)-का स्वरूप बतलाया है। उन्नीसवेंसे चालीसवें श्लोकतक जो सात्त्विक भाव और कर्म बतलाये हैं, वे इसके साधनमें उपयोगी हैं और राजस, तामस इसके विरोधी हैं। पचासवेंसे पचपनवेंतक उपासनासहित सांख्ययोगकी विधि और फल बतलाया है तथा सत्रहवें श्लोकमें केवल सांख्ययोगका साधन करनेका प्रकार बतलाया है। इसी प्रकार छठे श्लोकमें (फलासक्तिके त्यागरूप) कर्मयोगका स्वरूप बतलाया है। नवें श्लोकमें सात्विक त्यागके नामसे केवल कर्मयोगके साधनकी प्रणाली बतलायी है। सैंतालीसवें और अड़तालीसवें श्लोकोंमें स्वधर्मके पालनको इस साधनमें उपयोगी बतलाया है और सातवें तथा आठवें श्लोकोंमें वर्णित तामस, राजस त्यागको इसमें बाधक बतलाया है। पैंतालीसवें और छियालीसवें श्लोकोंमें भक्तिमिश्रित कर्मयोगका और छप्पनवेंसे छाछठवें श्लोकतक भक्तिप्रधान कर्मयोगका वर्णन है। छियालीसवें श्लोकमें लौकिक और शास्त्रीय समस्त कर्म करते हुए भक्तिमिश्रित कर्मयोगके साधन करनेकी रीति बतलायी है और सत्तावनवें श्लोकमें भगवानने भक्तिप्रधान कर्मयोगके साधन करनेकी रीति बतलायी है। ३. स्त्री, पुत्र, धन और स्वर्गादि प्रिय वस्तुओंकी प्राप्तिके लिये और रोग-संकटादि अप्रियकी निवृत्तिके लिये यज्ञ, दान, तप और उपासना आदि जिन शुभ कर्मोंका शास्त्रोंमें विधान किया गया है--ऐसे शुभ कर्मोका नाम “काम्यकर्म' है। २. ईश्वरकी भक्ति, देवताओंका पूजन, माता-पितादि गुरुजनोंकी सेवा, यज्ञ, दान और तप तथा वर्णाश्रमके अनुसार जीविकाके कर्म और शरीरसम्बन्धी खान-पान इत्यादि जितने भी शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म हैं, उनके अनुष्ठानसे प्राप्त होनेवाले स्त्री, पुत्र, धन, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गसुख आदि जितने भी इस लोक और परलोकके भोग हैं--उन सबकी कामनाका सर्वथा त्याग कर देना ही समस्त कर्मोके फलका त्याग करना है। 3. आरम्भ (क्रिया) मात्रमें ही कुछ-न-कुछ पापका सम्बन्ध हो जाता है, अतः विहित कर्म भी सर्वथा निर्दोष नहीं हैं; इस भावको लेकर कितने ही विद्वानोंका कहना है कि कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको नित्य, नैमित्तिक और काम्य आदि सभी कर्मौंका स्वरूपसे त्याग कर देना चाहिये। ४. बहुत-से विद्वानोंके मतमें यज्ञ, दान और तपरूप कर्म वास्तवमें दोषयुक्त नहीं हैं। वे मानते हैं कि उन कर्मोंके निमित्त किये जानेवाले आरम्भमें जिन अवश्यम्भावी हिंसादि पापोंका होना देखा जाता है, वे वास्तवमें पाप नहीं हैं। इसलिये कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको निषिद्ध कर्मोंका ही त्याग करना चाहिये, शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये। ५. शास्त्रविधिके अनुसार अंग-उपांगोंसहित निष्कामभावसे भलीभाँति अनुष्ठान करनेवाले बुद्धिमान्‌ मुमुक्षु पुरुषोंका वाचक यहाँ “मनीषिणाम्‌” पद है। ६. शास्त्रोंमें अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जिसके लिये जिस कर्मका विधान है--जिसको जिस समय जिस प्रकार यज्ञ करनेके लिये, दान देनेके लिये और तप करनेके लिये कहा गया है--उसे उसका त्याग नहीं करना चाहिये, यानी शास्त्र-आज्ञाकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि इस प्रकारके त्यागसे किसी प्रकारका लाभ होना तो दूर रहा, उलटा प्रत्यवाय होता है। इसलिये इन कर्मोका अनुष्ठान मनुष्यको अवश्य करना चाहिये। ३. भगवान्‌के कथनका भाव यह है कि ऊपर विद्वानोंके मतानुसार जो त्याग और संन्यासके लक्षण बतलाये गये हैं, वे पूर्ण नहीं हैं; क्योंकि केवल काम्य कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेपर भी अन्य नित्य- नैमित्तिक कर्मोमें और उनके फलमें मनुष्यकी ममता, आसक्ति और कामना रहनेसे वे बन्धनके हेतु बन जाते हैं। सब कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग कर देनेपर भी उन कर्मोमें ममता और आसक्ति रह जानेसे वे बन्धनकारक हो सकते हैं। अहंता, ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग किये बिना यदि समस्त कर्मोंको दोषयुक्त समझकर कर्तव्यकर्मोंका भी स्वरूपसे त्याग कर दिया जाय तो मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता; क्योंकि ऐसा करनेपर वह विहित कर्मके त्यागरूप प्रत्यवायका भागी होता है। इसी प्रकार यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंको करते रहनेपर भी यदि उनमें आसक्ति और उनके फलकी कामनाका त्याग न किया जाय तो वे बन्धनके हेतु बन जाते हैं। इसलिये उन विद्वानोंके बतलाये हुए लक्षणोंवाले संन्यास और त्यागसे मनुष्य कर्मबन्धनसे सर्वथा मुक्त नहीं हो सकता; क्योंकि कर्म स्वरूपत: बन्धनकारक नहीं हैं, उनके साथ ममता, आसक्ति और फलका सम्बन्ध ही बन्धनकारक है। अत: कर्मोमें जो ममता और फलासक्तिका त्याग है, वही वास्तविक त्याग है; क्योंकि इस प्रकार कर्म करनेवाला मनुष्य समस्त कर्मबन्धनोंसे मुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाता है। २. वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिकी अपेक्षासे जिस मनुष्यके लिये यज्ञ, दान, तप, अध्ययन- अध्यापन, उपदेश, युद्ध, प्रजापालन, पशुपालन, कृषि, व्यापार, सेवा और खान-पान आदि जो-जो कर्म शास्त्रोंमें अवश्यकर्तव्य बतलाये गये हैं, उसके लिये वे नियत कर्म हैं। ऐसे कर्मोका स्वरूपसे त्याग करनेवाला मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन न करनेके कारण पापका भागी होता है; क्योंकि इससे कर्मोंकी परम्परा टूट जाती है और समस्त जगत्‌में विप्लव हो जाता है (गीता ३।२३-२४)। इसलिये नियत कर्मोंका स्वरूपसे त्याग उचित नहीं है। 3. कर्तव्यकर्मके त्यागको भूलसे मुक्तिका हेतु समझकर त्याग करना मोहपूर्वक होनेके कारण तामस त्याग है; इसलिये उपर्युक्त त्याग ऐसा त्याग नहीं है; जिसके करनेसे मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। यह तो प्रत्यवायका हेतु होनेसे उलटा अधोगतिको ले जानेवाला है। ४. कर्तव्य कर्मोके अनुष्ठानमें मन, इन्द्रिय और शरीरको परिश्रम होता है; अनेक प्रकारके विघ्न उपस्थित होते हैं; बहुत-सी सामग्री एकत्र करनी पड़ती है; शरीरके आरामका त्याग करना पड़ता है; व्रत, उपवास आदि करके कष्ट सहन करना पड़ता है और बहुत-से भिन्न-भिन्न नियमोंका पालन करना पड़ता है --इस कारण समस्त कर्मोंको दुःखरूप समझकर मन, इन्द्रिय और शरीरके परिश्रमसे बचनेके लिये तथा आराम करनेकी इच्छासे जो यज्ञ, दान और तप आदि शास्त्रविहित कर्मोंका त्याग करना है--यही उनको दुःखरूप समझकर शारीरिक क्लेशके भयसे उनका त्याग करना है। ५. जबतक मनुष्यकी मन, इन्द्रिय और शरीरमें ममता और आसक्ति रहती है, तबतक वह किसी प्रकार भी कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता। अतः यह राजस त्याग नाममात्रका ही त्याग है, सच्चा त्याग नहीं है। इसलिये कल्याण चाहनेवाले साधकोंको ऐसा त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि मन, इन्ट्रिय और शरीरके आराममें आसक्तिका होना रजोगुणका कार्य है। अतएव ऐसा त्याग करनेवाला मनुष्य वास्तविक त्यागके फलको, जो कि समस्त कर्मबन्धनोंसे छूटकर परमात्माको पा लेना है, नहीं पाता। $. वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिकी अपेक्षासे जिस मनुष्यके लिये जो-जो कर्म शास्त्रमें अवश्यकर्तव्य बतलाये गये हैं, वे समस्त कर्म ही नियत कर्म हैं, निषिद्ध और काम्य कर्म नियत कर्म नहीं हैं। नियत कर्मोको न करना भगवान्‌की आज्ञाका उल्लंघन करना है--इस भावसे भावित होकर उन कर्मोमें और उनके फलरूप इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंमें ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग करके उत्साहपूर्वक विधिवत्‌ उनको करते रहना ही साच्त्विक त्याग है; क्योंकि कर्मोंके फलरूप इस लोक और परलोकके भोगोंमें आसक्ति और कामनाका त्याग ही वास्तविक त्याग है। त्यागका परिणाम कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होना चाहिये और यह परिणाम ममता, आसक्ति और कामनाके त्यागसे ही हो सकता है--केवल स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेसे नहीं। २. शास्त्रनिषिद्ध कर्म और काम्यकर्म सभी अकुशल कर्म हैं; क्योंकि पापकर्म तो मनुष्यको नाना प्रकारकी नीच योनियोंमें और नरकमें गिरानेवाले हैं एवं काम्यकर्म भी फलभोगके लिये पुनर्जन्म देनेवाले हैं। साच्चिक त्यागीमें राग-द्वेषका सर्वधा अभाव हो जानेके कारण वह जो निषिद्ध और काम्यकर्मोंका त्याग करता है, वह द्वेष-बुद्धिसे नहीं करता; किंतु शास्त्रदृष्टिसे लोकसंग्रहके लिये उनका त्याग करता है। 3. शास्त्रविहित नित्य-नैमित्तिक यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कर्म निष्कामभावसे किये जानेपर मनुष्यके पूर्वकृत संचित पापोंका नाश करके उसे कर्मबन्धनसे छूुड़ा देनेमें समर्थ हैं, इसलिये ये कुशल कहलाते हैं। सात््विक त्यागी जो उपर्युक्त शुभ कर्मोंका विधिवत्‌ अनुष्ठान करता है, वह आससक्तिपूर्वक नहीं करता; किंतु शास्त्रविहित कर्मोंका करना मनुष्यका कर्तव्य है--इस भावसे ममता, आसक्ति और फलेच्छा छोड़कर लोकसंग्रहके लिये ही उनका अनुष्ठान करता है। ४. इस प्रकार राग-द्वेषसे रहित होकर केवल कर्तव्यबुद्धिसे कर्मोंका ग्रहण और त्याग करनेवाला शुद्ध सत्त्वगुणसे युक्त पुरुष संशयरहित है, यानी उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि यह कर्मयोगरूप सातच्विक त्याग ही कर्मबन्धनसे छूटकर परमपदको प्राप्त कर लेनेका पूर्ण साधन है। इसीलिये वह बुद्धिमान्‌ है और वह सच्चा त्यागी है। ५. कोई भी देहधारी मनुष्य बिना कर्म किये रह नहीं सकता (गीता ३।५); क्योंकि बिना कर्म किये शरीरका निर्वाह ही नहीं हो सकता (गीता ३।८)। इसलिये मनुष्य किसी भी आश्रममें क्यों न रहता हो-- जबतक वह जीवित रहेगा, तबतक उसे अपनी परिस्थितिके अनुसार खाना-पीना, सोना-बैठना, चलना- फिरना और बोलना आदि कुछ-न-कुछ कर्म तो करना ही पड़ेगा। अतएव सम्पूर्णतासे सब कर्मोंका स्वरूपसे त्याग किया जाना सम्भव नहीं है। ६. जो निषिद्ध और काम्यकर्मोंका सर्वथा त्याग करके यथावश्यक शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका अनुष्ठान करते हुए उन कर्मोमें और उनके फलमें ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग कर देता है, वही सच्चा त्यागी है। ऊपरसे इन्द्रियोंकी क्रियाओंका संयम करके मनसे विषयोंका चिन्तन करनेवाला मनुष्य त्यागी नहीं है तथा अहंता, ममता और आसक्तिके रहते हुए शास्त्रविहित यज्ञ, दान और तप आदि कर्तव्यकर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेवाला भी त्यागी नहीं है। $. जिन्होंने अपने द्वारा किये जानेवाले कर्मोमें और उनके फलमें ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग नहीं किया है; जो आसक्ति और फलेच्छापूर्वक सब प्रकारके कर्म करनेवाले हैं, उनके द्वारा किये हुए शुभ कर्मोंका जो स्वर्गादिकी प्राप्ति या अन्य किसी प्रकारके सांसारिक इष्ट भोगोंकी प्राप्तिरूप फल है, वह अच्छा फल है; तथा उनके द्वारा किये हुए पापकर्मोंका जो पशु, पक्षी, कीट, पतंग और वृक्ष आदि तिर्यक्‌ योनियोंकी प्राप्ति या नरकोंकी प्राप्ति अथवा अन्य किसी प्रकारके दु:खोंकी प्राप्तिरूप फल है--वह बुरा फल है। इसी प्रकार जो मनुष्यादि योनियोंमें उत्पन्न होकर कभी इष्ट भोगोंको प्राप्त होना और कभी अनिष्ट भोगोंको प्राप्त होना है, वह मिश्रित फल है। उन पुरुषोंके कर्म अपना फल भुगताये बिना नष्ट नहीं हो सकते, जन्म-जन्मान्तरोंमें शुभाशुभ फल देते रहते हैं; इसीलिये ऐसे मनुष्य संसारचक्रमें घूमते रहते हैं। २. कर्मोमें और उनके फलमें ममता, आसक्ति और कामनाका जिन्होंने सर्वथा त्याग कर दिया है; इस अध्यायके दसवें श्लोकमें त्यागीके नामसे जिनके लक्षण बतलाये गये हैं; गीताके छठे अध्यायके पहले श्लोकमें जिनके लिये 'संन्यासी” और “योगी” दोनों पदोंका प्रयोग किया गया है तथा गीताके दूसरे अध्यायके इक्यावनवें श्लोकमें जिनको अनामय पदकी प्राप्तिका होना बतलाया गया है-ऐसे कर्मयोगियोंको यहाँ 'संन्यासी' कहा गया है। इस प्रकार कर्मफलका त्याग कर देनेवाले त्यागी मनुष्य जितने कर्म करते हैं, वे भूने हुए बीचकी भाँति होते हैं, उनमें फल उत्पन्न करनेकी शक्ति नहीं होती तथा इस प्रकार यज्ञार्थ किये जानेवाले निष्कामकर्मोंसे पूर्वसंचित समस्त शुभाशुभ कर्मोंका भी नाश हो जाता है (गीता ४।२३)। इस कारण उनके इस जन्ममें या जन्मान्तरोंमें किये हुए किसी भी कर्मका किसी प्रकारका भी फल किसी भी अवस्थामें, जीते हुए या मरनेके बाद कभी नहीं होता; वे कर्मबन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। 3. “कृत” नाम कर्मोंका है; अत: जिस शास्त्रमें उनका अन्त करनेका उपाय बतलाया गया हो, उसका नाम “कृतान्त' है। 'सांख्य'-का अर्थ ज्ञान है (सम्यक्‌ ख्यायते ज्ञायते परमात्मानेनेति सांख्य॑ तत्त्वज्ञानम्‌)। अतएव जिस शामस्त्रमें तत्त्वहज्ञानके साधनरूप ज्ञानयोगका प्रतिपादन किया गया हो, उसको सांख्य कहते हैं। इसलिये यहाँ “'कृतान्ते” विशेषणके सहित “सांख्ये” पद उस शास्त्रका वाचक मालूम होता है, जिसमें ज्ञानयोगका भलीभाँति प्रतिपादन किया गया हो और उसके अनुसार समस्त कर्मोंको प्रकृतिद्वारा किये हुए एवं आत्माको सर्वथा अकर्ता समझकर कर्मोंका अभाव करनेकी रीति बतलायी गयी हो। ४. 'सर्वकर्मणाम्‌” पद यहाँ शास्त्रविहित और निषिद्ध, सभी प्रकारके कर्मोंका वाचक है तथा किसी कर्मका पूर्ण हो जाना यानी उसका बन जाना ही उसकी सिद्धि है। ५. “अधिष्ठान” शब्द यहाँ मुख्यतासे करण और क्रियाके आधाररूप शरीरका वाचक है; किंतु गौणरूपसे यज्ञादि कर्मोमें तद्विषयक क्रियाके आधाररूप भूमि आदिका वाचक भी माना जा सकता है। ६. यहाँ “कर्ता” शब्द प्रकृतिस्थ पुरुषका वाचक है। इसीको गीताके तेरहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भोक्ता बतलाया गया है। ७. मन, बुद्धि और अहंकार भीतरके करण हैं तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ--ये दस बाहरके करण हैं; इनके सिवा गौणरूपसे जैसे खुवा आदि उपकरण यज्ञादि कर्मोंके करनेमें सहायक होते हैं, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न कर्मोके करनेमें जितने भी भिन्न-भिन्न द्वार अथवा सहायक हैं, उन सबको यहाँ बाह्य करण कहा जा सकता है। ८. एक स्थानसे दूसरे स्थानमें गमन करना, हाथ-पैर आदि अंगोंका संचालन, श्वासोंका आना-जाना, अंगोंको सिकोड़ना-फैलाना, आँखोंको खोलना और मूँदना, मनमें संकल्प-विकल्पोंका होना आदि जितनी भी हलचलखरूप क्रियाएँ हैं, वे ही नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ हैं। ३. पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मोंके संस्कारोंको 'दैव” कहते हैं, प्रारब्ध भी इसीके अन्तर्गत है। २. वर्ण, आश्रम, प्रकृति और परिस्थितिके भेदसे जिसके लिये जो कर्म कर्तव्य माने गये हैं--उन न्यायपूर्वक किये जानेवाले यज्ञ, दान, तप, विद्याध्ययन, युद्ध, कृषि, गोरक्षा, व्यापार, सेवा आदि समस्त शास्त्रविहित कर्मोंके समुदायका वाचक यहाँ “न्याय्यम्‌” पद है। 3. वर्ण, आश्रम, प्रकृति और परिस्थितिके भेदसे जिसके लिये जिन कर्मोंके करनेका शास्त्रोंमें निषेध किया गया है तथा जो कर्म नीति और धर्मके प्रतिकूल हैं--ऐसे असत्यभाषण, चोरी, व्यभिचार, हिंसा, मद्यपान, अभक्ष्य-भक्षण आदि समस्त पापकर्मौंका वाचक यहाँ “विपरीतम्‌” पद है। ४. मनुष्यशरीरमें ही जीव पुण्य और पापरूप नवीन कर्म कर सकता है। अन्य सब भोगयोनिरययाँ हैं; उनमें पूर्वकृत कर्मोंका फल भोगा जाता है, नवीन कर्म करनेका अधिकार नहीं है। ५. यहाँ मन, वाणी और शरीरद्वारा किये जानेवाले जितने भी पुण्य और पापरूप कर्म हैं--जिनका इस जन्म तथा जन्मान्तरमें जीवको फल भोगना पड़ता है--उन सबके “ये पाँचों कारण हैं'--इनमेंसे किसी एकके न रहनेसे कर्म नहीं बन सकता। इसीलिये बिना कर्तापनके किया जानेवाला कर्म वास्तवमें कर्म नहीं है। ६. सत्संग और सत-शास्त्रोंके अभ्यासद्वारा तथा विवेक, विचार और शम-दमादि आध्यात्मिक साधनोंद्वारा जिसकी बुद्धि शुद्ध की हुई नहीं है--ऐसे प्राकृत अज्ञानी मनुष्यको “अकृतबुद्धि" कहते हैं। ७. वास्तवमें आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध, निर्विकार और सर्वथा असंग है; प्रकृतिसे, प्रकृतिजनित पदार्थोंसे या कर्मोंसे उसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है; किंतु अनादिसिद्ध अविद्याके कारण असंग आत्माका ही इस प्रकृतिके साथ सम्बन्ध-सा हो रहा है; अतः वह दुर्मति प्रकृतिद्वारा सम्पादित क्रियाओंमें मिथ्या अभिमान करके (गीता ३।२७) स्वयं उन कर्मोंका कर्ता बन जाता है। इस प्रकार कर्ता बने हुए पुरुषका नाम ही 'प्रकृतिस्थ पुरुष' है; वह उन प्रकृतिद्वारा सम्पन्न हुई क्रियाओंका कर्ता बनता है, तभी उनकी “कर्म” संज्ञा होती है और वे कर्म फल देनेवाले बन जाते हैं। इसीलिये उस प्रकृतिस्थ पुरुषको अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म धारण करके उन कर्मोका फल भोगना पड़ता है (गीता १३।२१)। इसलिये चौदहवें श्लोकमें कर्मोकी सिद्धिके पाँच हेतुओंमें एक हेतु जो “कर्ता” माना गया है, वह प्रकृतिमें स्थित पुरुष है और यहाँ आत्माके केवल यानी संगरहित, शुद्ध स्वरूपका वर्णन है, अतः उसको अकर्ता बतलाकर उसके यथार्थ स्वरूपका लक्षण किया गया है। जो आत्माके यथार्थ स्वरूपको समझ लेता है, उसके कर्मोंमें “कर्ता” रूप पाँचवाँ हेतु नहीं रहता। इसी कारण उसके कर्मोंकी कर्म संज्ञा नहीं रहती। यही बात अगले श्लोकमें समझायी गयी है। ८. सांख्ययोगी पुरुषमें मन, इन्द्रियों और शरीरद्वारा की जानेवाली समस्त क्रियाओंमें “अमुक कर्म मैंने किया है', “यह मेरा कर्तव्य है” इस प्रकारके भावका लेशमात्र भी न रहना--यही “मैं कर्ता हूँ" इस भावका न होना है। ३. कर्मोमें और उनके फलरूप स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई, स्वर्गसुख आदि इस लोक और परलोकके समस्त पदार्थोमें ममता, आसक्ति और कामनाका अभाव हो जाना, किसी भी कर्मसे या उसके फलसे अपना किसी प्रकारका भी सम्बन्ध न समझना तथा उन सबको स्वप्नके कर्म और भोगोंकी भाँति क्षणिक, नाशवान्‌ और कल्पित समझ लेनेके कारण अन्तःकरणमें उनके संस्कारोंका संगृहीत न होना ही बुद्धिका लिपायमान न होना है। २. उपर्युक्त प्रकारसे आत्मस्वरूपको भलीभाँति जान लेनेके कारण जिसका अज्ञानजनित अहंभाव सर्वथा नष्ट हो गया है; मन, बुद्धि, इन्द्रियों और शरीरद्वारा होनेवाले कर्मोंसे या उनके फलसे जिसका किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहा है, उस पुरुषके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा जो लोकसंग्रहार्थ प्रारब्धानुसार कर्म होते हैं, वे सब शास्त्रानुकूल और सबका हित करनेवाले ही होते हैं। अत: जैसे अग्नि, वायु और जल आदिके द्वारा प्रारब्धवश किसी प्राणीकी मृत्यु हो जाय तो वे अग्नि, वायु आदि न तो वास्तवमें उस प्राणीको मारनेवाले हैं और न वे उस कर्मसे बँधते ही हैं--उसी प्रकार उपर्युक्त महापुरुष शुभकर्मोंको करके उनका कर्ता नहीं बनता और उनके फलसे नहीं बँधता, इसमें तो कहना ही क्‍या है; किंतु क्षात्रधर्म-जैसे--किसी कारणसे योग्यता प्राप्त हो जानेपर समस्त प्राणियोंका संहाररूप-.क्रूर कर्म करके भी उसका वह कर्ता नहीं बनता और उसके फलसे भी नहीं बँधता। जैसे भगवान्‌ सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति, पालन और संहार आदि कार्य करते हुए भी वास्तवमें उनके कर्ता नहीं हैं (गीता ४।१३) और उन कर्मोंसे उनका कोई सम्बन्ध नहीं है (गीता ४।१४; ९।९)--उसी प्रकार सांख्ययोगीका भी उसके मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा होनेवाले समस्त कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता; किंतु उसका अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध हो जानेके कारण उसके द्वारा अज्ञानमूलक चोरी, व्यभिचार, मिथ्याभाषण, हिंसा, कपट, दम्भ आदि पापकर्म नहीं होते। 3. किसी भी पदार्थके स्वरूपका निश्चय करनेवालेको 'ज्ञाता” कहते हैं; वह जिस वृत्तिके द्वारा वस्तुके स्वरूपका निश्चय करता है, उसका नाम 'ज्ञान' है और जिस वस्तुके स्वरूपका निश्चय करता है, उसका नाम 'ज्ञेय” है। इन तीनोंका सम्बन्ध ही मनुष्यको कर्ममें प्रवृत्त करनेवाला है; क्योंकि जब अधिकारी मनुष्य ज्ञानवृत्तिद्वारा यह निश्चय कर लेता है कि अमुक-अमुक साधनोंद्वारा अमुक प्रकारसे अमुक सुखकी प्राप्तिके लिये अमुक कर्म मुझे करना है, तभी उसकी उस कर्ममें प्रवृत्ति होती है। ४. देखना, सुनना, समझना, स्मरण करना, खाना, पीना आदि समस्त क्रियाओंको करनेवाले प्रकृतिस्थ पुरुषको “कर्ता” कहते हैं; उसके जिन मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा उपर्युक्त समस्त क्रियाएँ की जाती हैं, उनको “करण” और उपर्युक्त समस्त क्रियाओंको “कर्म” कहते हैं। इन तीनोंके संयोगसे ही कर्मका संग्रह होता है; क्योंकि जब मनुष्य स्वयं कर्ता बनकर अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा क्रिया करके किसी कर्मको करता है, तभी कर्म बनता है, इसके बिना कोई भी कर्म नहीं बन सकता। इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें जो कर्मकी सिद्धिके अधिष्ठानादि पाँच हेतु बतलाये गये हैं, उनमेंसे अधिष्ठान और दैवको छोड़कर शेष तीनोंको “कर्म-संग्रह” नाम दिया गया है। ५. जिस शास्त्रमें सत्त, रज और तम--इन तीनों गुणोंके सम्बन्धसे समस्त पदार्थोके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना की गयी हो, ऐसे शास्त्रका वाचक “गुणसंख्याने” पद है। अतः उसमें बतलाये हुए गुणोंके भेदसे तीन-तीन प्रकारके ज्ञान, कर्म और कर्ताको सुननेके लिये कहकर भगवानने उस शास्त्रको इस विषयमें आदर दिया है और कहे जानेवाले उपदेशको ध्यानपूर्वक सुननेके लिये अर्जुनको सावधान किया है। ध्यान रहे कि ज्ञाता और कर्ता अलग-अलग नहीं हैं, इस कारण भगवानने ज्ञाताके भेद अलग नहीं बतलाये हैं तथा करणके भेद बुद्धिके और धृतिके नामसे एवं ज्ञेयके भेद सुखके नामसे आगे बतलायेंगे। इस कारण यहाँ पूर्वोक्त छ: पदार्थोमेंसे तीनके ही भेद पहले बतलानेका संकेत किया है। ३. जिस प्रकार आकाश-तत्त्वको जाननेवाला मनुष्य घड़ा, मकान, गुफा, स्वर्ग, पाताल और समस्त वस्तुओंके सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें एक ही आकाश-तत्त्वको देखता है, वैसे ही लोकदृष्टिसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होनेवाले समस्त चराचर प्राणियोंमें गीताके छठे अध्यायके उनतीसवें और तेरहवें अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें वर्णित सांख्ययोगके साधनसे होनेवाले अनुभवके द्वारा एक अद्वितीय अविनाशी निर्विकार ज्ञानस्वरूप परमात्मभावको विभागरहित समभावसे व्याप्त देखना ही सात््विक ज्ञान है। २. कीट, पतंग, पशु, पक्षी, मनुष्य, राक्षस और देवता आदि जितने भी प्राणी हैं, उन सबमें आत्माको उनके शरीरोंकी आकृतिके भेदसे और स्वभावके भेदसे भिन्न-भिन्न प्रकारके अनेक और अलग-अलग समझना ही राजस ज्ञान है। 3. जिस विपरीत ज्ञानके द्वारा मनुष्य प्रकृतिके कार्यरूप शरीरको ही अपना स्वरूप समझ लेता है और ऐसा समझकर उस क्षणभंगुर नाशवान्‌ शरीरमें सर्वस्वकी भाँति आसक्त रहता है--अर्थात्‌ उसके सुखसे सुखी एवं उसके दुःखसे दुःखी होता है तथा उसके नाशसे ही सर्वनाश मानता है, आत्माको उससे भिन्न या सर्वव्यापी नहीं समझता--वह ज्ञान वास्तवमें ज्ञान नहीं है। इसलिये भगवानने इस श्लोकमें 'ज्ञान' पदका प्रयोग भी नहीं किया है; क्योंकि यह विपरीत ज्ञान वास्तवमें अज्ञान ही है। ४. नियत कर्मकी व्याख्या इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें देखनी चाहिये। ५. यहाँ 'संग” नाम आसक्तिका नहीं है; क्योंकि आसक्तिका अभाव “अरागद्वेषत:ःः पदसे अलग बतलाया गया है। इसलिये यहाँ जो कर्मोमें कर्तापनका अभिमान करके उन कर्मोंसे अपना सम्बन्ध जोड़ लेना है, उसका नाम “संग” समझना चाहिये। ६. कर्मोके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके जितने भी भोग हैं, उनमें ममता और आसक्तिका अभाव हो जानेके कारण जिसको किंचिन्मात्र भी उन भोगोंकी आकांक्षा नहीं रही है, जो किसी भी कर्मसे अपना कोई भी स्वार्थ सिद्ध करना नहीं चाहता, जो अपने लिये किसी भी वस्तुकी आवश्यकता नहीं समझता--ऐसे पुरुषद्वारा होनेवाले जो कर्म राग-द्वेषके बिना केवल लोकसंग्रहके लिये होते हैं--उन कर्मोंको “बिना राग-द्वेषके किया हुआ कर्म” कहते हैं। ७. इसी अध्यायके नवें श्लोकमें वर्णित सात्त्विक त्यागसे इस सात्त्विक कर्ममें यह विशेषता है कि इसमें कर्तापनके अभिमानका और राग-द्वेषका भी अभाव दिखलाया गया है; किंतु नवें श्लोकमें कर्मोमें आसक्ति और फलेच्छाका त्याग ही बतलाया गया है, कर्तापनके अभावकी बात नहीं कही है, बल्कि कर्तव्यबुद्धिसे कर्मोको करनेके लिये कहा है। दोनोंका ही फल तत्त्वज्ञानके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति है; भेद केवल अनुष्ठानके प्रकारका है। ८. जो पुरुष समस्त कर्म--स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा आदि इस लोक और परलोकके भोगोंके लिये ही करता है--ऐसे स्वार्थपरायण पुरुषका वाचक यहाँ “कामेप्सुना” पद है। ९. जिस मनुष्यका शरीरमें अभिमान है और जो प्रत्येक कर्म अहंकारपूर्वक करता है तथा “मैं अमुक कर्मका करनेवाला हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है; मैं यह कर सकता हूँ, वह कर सकता हूँ--इस प्रकारके भाव मनमें रखनेवाला और वाणीद्वारा इस तरहकी बातें करनेवाला है, उसका वाचक यहाँ 'साहंकारेण' पद है। $. सातच्विक कर्मसे राजस कर्मका यह भेद है कि सात्त्विक कर्मोंके कर्ताका शरीरमें अहंकार नहीं होता और कर्मोंमें कर्तापन नहीं होता; अत: उसे किसी भी क्रियाके करनेमें किसी प्रकारके परिश्रम या क्लेशका बोध नहीं होता। इसलिये उसके कर्म आयासयुक्त नहीं हैं; किंतु राजस कर्मके कर्ताका शरीरमें अहंकार होनेके कारण वह शरीरके परिश्रम और दु:खोंसे स्वयं दुःखी होता है। इस कारण उसे प्रत्येक क्रियामें परिश्रमका बोध होता है। इसके सिवा सात्त्विक कर्मोंके कर्ताद्वारा केवल शास्त्रदृष्टिसे या लोकदृष्टिसे कर्तव्यरूपमें प्राप्त हुए कर्म ही किये जाते हैं; अत: उसके द्वारा कर्मोंका विस्तार नहीं होता; किंतु राजस कर्मका कर्ता आसक्ति और कामनासे प्रेरित होकर प्रतिदिन नये-नये कर्मोंका आरम्भ करता रहता है, इससे उसके कर्मोंका बहुत विस्तार हो जाता है। इस कारण यहाँ बहुत परिश्रमवाले कर्मोंको राजस बतलाया गया है। २. जिस पुरुषमें भोगोंकी कामना और अहंकार दोनों हैं, उसके द्वारा किये हुए कर्म राजस हैं--इसमें तो कहना ही क्‍या है; किंतु इनमेंसे किसी एक दोषसे युक्त पुरुषद्वारा किये हुए कर्म भी राजस ही हैं। 3. किसी भी कर्मका आरम्भ करनेसे पहले अपनी बुद्धिसे विचार करके जो यह सोच लेना है कि अमुक कर्म करनेसे उसका भावी परिणाम अमुक प्रकारसे सुखकी प्राप्ति या अमुक प्रकारसे दुःखकी प्राप्ति होगा, यह उसके अनुबन्धका यानी परिणामका विचार करना है तथा जो यह सोचना है कि अमुक कर्ममें इतना धन व्यय करना पड़ेगा, इतने बलका प्रयोग करना पड़ेगा, इतना समय लगेगा, अमुक अंभमें धर्मकी हानि होगी और अमुक-अमुक प्रकारकी दूसरी हानियाँ होंगी--यह क्षयका यानी हानिका विचार करना है और जो यह सोचना है कि अमुक कर्मके करनेसे अमुक मनुष्योंको या अन्य प्राणियोंको अमुक प्रकारसे इतना कष्ट पहुँचेगा, अमुक मनुष्योंका या अन्य प्राणियोंका जीवन नष्ट होगा--यह हिंसाका विचार करना है। इसी तरह जो यह सोचना है कि अमुक कर्म करनेके लिये इतने सामर्थ्यकी आवश्यकता है, अत: इसे पूरा करनेकी सामर्थ्य हममें है या नहीं--यह पौरुषका यानी सामर्थ्यका विचार करना है। इस तरह परिणाम, हानि, हिंसा और पौरुष--इन चारोंका या चारोंमेंसे किसी एकका विचार न करके केवल मोहसे कर्मका आरम्भ करना ही तामस कर्म है। ४. मन, इन्द्रिय और शरीरद्वारा जो कुछ भी कर्म किये जाते हैं, उनमें और उनके फलरूप मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा, स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंमें जिसकी किंचिन्मात्र भी ममता, आसक्ति और कामना नहीं रही है--ऐसे मनुष्यको “मुक्तसंग” कहते हैं। ५. मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और शरीर--इन अनात्म पदार्थोंमें आत्मबुद्धि न रहनेके कारण जो किसी भी कर्ममें कर्तापनका अभिमान नहीं करता तथा इसी कारण जो आसुरी प्रकृतिवालोंकी भाँति, मैंने अमुक मनोरथ सिद्ध कर लिया है, अमुकको और सिद्ध कर लूँगा, मैं ईश्वर हूँ, भोगी हूँ, बलवान हूँ, सुखी हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है, मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा (गीता १६।१३, १४, १५) इत्यादि अहंकारके वचन कहनेवाला नहीं है, किंतु सरलभावसे अभिमानशून्य वचन बोलनेवाला है--ऐसे मनुष्यको “अनहंवादी' कहते हैं। ६. शास्त्रविहित स्वधर्मपालनरूप किसी भी कर्मके करनेमें बड़ी-से-बड़ी विघ्न-बाधाओंके उपस्थित होनेपर भी विचलित न होना “धैर्य” है और कर्म-सम्पादनमें सफलता न प्राप्त होनेपर या ऐसा समझकर कि यदि मुझे फलकी इच्छा नहीं है तो कर्म करनेकी क्या आवश्यकता है--किसी भी कर्मसे न उकताना, किंतु जैसे कोई सफलता प्राप्त कर चुकनेवाला और कर्मफलको चाहनेवाला मनुष्य करता है, उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक उसे करनेके लिये उत्सुक रहना “उत्साह” है। इन दोनों गुणोंसे युक्त होकर जो मनुष्य न तो किसी भी कर्मके पूर्ण होनेमें हर्षित होता है और न उसमें विघ्न उपस्थित होनेपर शोक ही करता है तथा इसी तरह जिसमें अन्य किसी प्रकारका भी कोई विकार नहीं होता, जो हरेक अवस्थामें सदा-सर्वदा सम रहता है--ऐसा समतायुक्त पुरुष ही सात्विक कर्ता है। १. जिस मनुष्यकी कर्मोमें और उनके फलरूप इस लोक और परलोकके भोगोंमें ममता और आसक्ति है--ऐसे मनुष्यको 'रागी” कहते हैं। २. जो कर्मोके फलरूप स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा आदि इस लोक और परलोकके नाना प्रकारके भोगोंकी इच्छा करता रहता है, ऐसे स्वार्थपरायण पुरुषका वाचक “कर्मफललप्रेप्सु:' पद है। 3. धनादि पदार्थोमें आसक्ति रहनेके कारण जो न्यायसे प्राप्त अवसरपर भी अपनी शक्तिके अनुरूप धनका व्यय नहीं करता तथा न्याय-अन्यायका विचार न करके सदा धनसंग्रहकी लालसा रखता है, यहाँतक कि दूसरोंके स्वत्वको हड़पनेकी भी इच्छा रखता है और वैसी ही चेष्टा करता है--ऐसे मनुष्यका वाचक (“लुब्ध:” पद है। ४. जिस किसी भी प्रकारसे दूसरोंको कष्ट पहुँचाना ही जिसका स्वभाव है, जो अपनी अभिलाषाकी पूर्तिके लिये कर्म करते समय अपने आराम तथा भोगके लिये दूसरोंको कष्ट देता रहता है-ऐसे हिंसापरायण मनुष्यका वाचक यहाँ 'हिंसात्मक:' पद है। ५. जो न तो शास्त्रविधिके अनुसार जल-मृतिकादिसे शरीर और वस्त्रादिको शुद्ध रखता है और न यथायोग्य बर्ताव करके अपने आचरणोंको ही शुद्ध रखता है, किंतु भोगोंमें आसक्त होकर नाना प्रकारके भोगोंकी प्राप्तिके लिये शौचाचार और सदाचारका त्याग कर देता है--ऐसे मनुष्यका वाचक यहाँ “अशुचि: पद है। ६. जिसके मन और इन्द्रियाँ वशमें किये हुए नहीं हैं, बल्कि जो स्वयं उनके वशीभूत हो रहा है तथा जिसमें श्रद्धा और आस्तिकताका अभाव है--ऐसे पुरुषको “अयुक्त' कहते हैं। ७. जिसको किसी प्रकारकी सुशिक्षा नहीं मिली है, जिसका स्वभाव बालकके समान है, जिसको अपने कर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं है, जिसके अन्तःकरण और इन्द्रियोंका सुधार नहीं हुआ है-ऐसे संस्काररहित स्वाभाविक मूर्खको “प्राकृत” कहते हैं। ८. जिसका स्वभाव अत्यन्त कठोर है, जिसमें विनयका अत्यन्त अभाव है, जो सदा ही घमंडमें चूर रहता है--अपने सामने दूसरोंको कुछ भी नहीं समझता--ऐसे मनुष्यको “घमंडी” कहते हैं। ९. जो दूसरोंको ठगनेवाला वंचक है, द्वेषको छिपाये रखकर गुप्तभावसे दूसरोंका अपकार करनेवाला है, मन-ही-मन दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये दाव-पेंच सोचता रहता है--ऐसे मनुष्यको 'धूर्त' कहते हैं। १०. नाना प्रकारसे दूसरोंकी वृत्तिमें बाधा डालना ही जिसका स्वभाव है--ऐसे मनुष्यको दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला कहते हैं। ११. जिसका रात-दिन पड़े रहनेका स्वभाव है, किसी भी शास्त्रीय या व्यावहारिक कर्तव्यकर्ममें जिसकी प्रवृत्ति और उत्साह नहीं होते, जिसके अन्तः:करण और इन्द्रियोंमें आलस्य भरा रहता है--वह मनुष्य 'आलसी' है। १२. जो किसी कार्यका आरम्भ करके बहुत कालतक उसे पूरा नहीं करता--आज कर लेंगे, कल कर लेंगे, इस प्रकार विचार करते-करते एक रोजमें हो जानेवाले कार्यके लिये बहुत समय निकाल देता है और फिर भी उसे पूरा नहीं कर पाता--ऐसे शिथिल प्रकृतिवाले मनुष्यको *“दीर्घसूत्री” कहते हैं। १३. जिस पुरुषमें उपर्युक्त समस्त लक्षण घटते हों या उनमेंसे कितने ही लक्षण घटते हों, उसे तामस कर्ता समझना चाहिये। $. “बुद्धि' शब्द यहाँ निश्चय करनेकी शक्तिविशेषका वाचक है, इस अध्यायके बीसवें, इक्कीसवें और बाईसवें श्लोकोंमें जिस ज्ञानके तीन भेद बतलाये गये हैं, वह बुद्धिसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञान यानी बुद्धिकी वृत्तिवेशेष है और यह बुद्धि उसका कारण है। अठारहवें श्लोकमें “ज्ञान” शब्द कर्म-प्रेरणाके अन्तर्गत आया है और बुद्धिका ग्रहण “करण' के नामसे कर्म-संग्रहमें किया गया है। यही ज्ञानका और बुद्धिका भेद है। यहाँ कर्म-संग्रहमें वर्णित करणोंके साक््विक-राजस-तामस भेदोंको भलीभाँति समझानेके लिये प्रधान “करण' बुद्धिके तीन भेद बतलाये जाते हैं। 'धृति” शब्द धारण करनेकी शक्तिविशेषका वाचक है; यह भी बुद्धिकी ही वृत्ति है। मनुष्य किसी भी क्रिया या भावको इसी शक्तिके द्वारा दृढ़तापूर्वक धारण करता है। इस कारण वह “करण” के ही अन्तर्गत है। इस अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें सात््विक कतकि लक्षणोंमें 'धृति" शब्दका प्रयोग हुआ है, इससे यह समझनेकी गुंजाइश हो जाती है कि 'धृति" केवल सात्त्विक ही होती है; किंतु ऐसी बात नहीं है, इसके भी तीन भेद होते हैं--यही बात समझानेके लिये इस प्रकरणमें 'धृति" के तीन भेद बतलाये गये हैं। २. गृहस्थ-वानप्रस्थादि आश्रमोंमें रहकर ममता, आसक्ति, अहंकार और फलेच्छाका त्याग करके परमात्माकी प्राप्तिके लिये उसकी उपासनाका तथा शास्त्रविहित यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कमोंका, अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुसार जीविकाके कर्मोंका और शरीरसम्बन्धी खान-पान आदि कर्मोंका निष्कामभावसे आचरणरूप जो परमात्माको प्राप्त करनेका मार्ग है--वह “प्रवृत्तिमार्ग" है। और राजा जनक, अम्बरीष, महर्षि वसिष्ठ और याज्ञवल्क्य आदिकी भाँति उसे ठीक-ठीक समझकर उसके अनुसार चलना ही उसको यथार्थ जानना है। 3. समस्त कर्मोका और भोगोंका बाहर-भीतरसे सर्वथा त्याग करके, संन्यास-आश्रममें रहकर परमात्माकी प्राप्तिके लिये सब प्रकारकी सांसारिक झंझटोंसे विरक्त होकर अहंता, ममता और आसक्तिके त्यागपूर्वक शम, दम, तितिक्षा आदि साधनोंके सहित निरन्तर श्रवण, मनन, निदिध्यासन करना या केवल भगवान्‌के भजन, स्मरण, कीर्तन आदिमें ही लगे रहना--इस प्रकार जो परमात्माको प्राप्त करनेका मार्ग है, उसका नाम निवृत्तिमार्ग) है और श्रीसनकादि, नारदजी, ऋषभदेवजी और शुकदेवजीकी भाँति उसे ठीक-ठीक समझकर उसके अनुसार चलना ही उसको यथार्थ जानना है। ४. वर्ण, आश्रम, प्रकृति और परिस्थितिकी तथा देश-कालकी अपेक्षासे जिसके लिये जिस समय जो कर्म करना उचित है, वही उसके लिये “कर्तव्य” है और जिस समय जिसके लिये जिस कर्मका त्याग उचित है, वही उसके लिये “अकर्तव्य” है। इन दोनोंको भलीभाँति समझ लेना--अर्थात्‌ किसी भी कार्यके सामने आनेपर यह मेरे लिये कर्तव्य है या अकर्तव्य, इस बातका यथार्थ निर्णय कर लेना ही कर्तव्य और अकर्तव्यको यथार्थ जानना है। ५. किसी दु:खप्रद वस्तुके या घटनाके उपस्थित हो जानेपर या उसकी सम्भावना होनेसे मनुष्यके अन्तःकरणमें जो एक आकुलताभरी कम्पवृत्ति होती है, उसे “भय” कहते हैं और इससे विपरीत जो भयके अभावकी वृत्ति है, उसे 'अभय' कहते हैं। इन दोनोंके तत््वको भलीभाँति समझकर निर्भय हो जाना ही भय और अभय--इन दोनोंको यथार्थ जानना है। ६. शुभाशुभ कर्मोंके सम्बन्धसे जो जीवको अनादि कालसे निरन्तर परवश होकर जन्म-मृत्युके चक्रमें भटकना पड़ रहा है, यही “बन्धन' है और सत्संगके प्रभावसे कर्मयोग, भक्तियोग तथा ज्ञानयोगादि साधनोंमेंसे किसी साधनके द्वारा भगवत्कृपासे समस्त शुभाशुभ कर्मबन्धनोंका कट जाना और जीवका भगवानको प्राप्त हो जाना ही "मोक्ष" है। ७. अहिंसा, सत्य, दया, शान्ति, ब्रह्मचर्य, शम, दम, तितिक्षा तथा यज्ञ, दान, तप एवं अध्ययन, प्रजापालन, कृषि, पशुपालन और सेवा आदि जितने भी वर्णाश्रमके अनुसार शास्त्रविहित शुभकर्म हैं-- जिन आचरणोंका फल शास्त्रोंमें इस लोक और परलोकके सुख-भोग बतलाया गया है--तथा जो दूसरोंके हितके कर्म हैं, उन सबका नाम “धर्म” है एवं झूठ, कपट, चोरी, व्यभिचार, हिंसा, दम्भ, अभक्ष्यभक्षण आदि जितने भी पापकर्म हैं--जिनका फल शास्त्रोंमें दु:ख बतलाया है उन सबका नाम “अधर्म” है। किस समय किस परिस्थितिमें कौन-सा कर्म धर्म है और कौन-सा कर्म अधर्म है--इसका ठीक-ठीक निर्णय करनेमें बुद्धिका कुण्ठित हो जाना या संशययुक्त हो जाना आदि उन दोनोंका यथार्थ न जानना है। १. वर्ण, आश्रम, प्रकृति, परिस्थिति तथा देश और कालकी अपेक्षासे जिस मनुष्यके लिये जो शास्त्रविहित करनेयोग्य कर्म है--वह कार्य (कर्तव्य) है और जिसके लिये शास्त्रमें जिस कर्मको न करनेयोग्य--निषिद्ध बतलाया है, बल्कि जिसका न करना ही उचित है--वह अकार्य (अकर्तव्य) है। इस दृष्टिसे शास्त्रनिषिद्ध पापकर्म तो सबके लिये अकार्य हैं ही, किंतु शास्त्रविहित शुभकर्मोंमें भी किसीके लिये कोई कर्म कार्य होता है और किसीके लिये कोई अकार्य। जैसे शूद्रके लिये सेवा करना कार्य है और यज्ञ, वेदाध्ययन आदि करना अकार्य है; संन्यासीके लिये विवेक, वैराग्य, शम, दमादिका साधन कार्य है और यज्ञ-दानादिका आचरण अकार्य है; ब्राह्मणके लिये यज्ञ करना-कराना, दान देना-लेना, वेद पढ़ना-पढ़ाना कार्य है और नौकरी करना अकार्य है; वैश्यके लिये कृषि, गोरक्षा और वाणिज्यादि कार्य है और दान लेना आदि अकार्य है। इसी तरह स्वर्गादिकी कामनावाले मनुष्यके लिये काम्य-कर्म कार्य हैं और मुमुक्षुके लिये अकार्य हैं; विरक्त ब्राह्मणके लिये संन्यास ग्रहण करना कार्य है और भोगासक्तके लिये अकार्य है। इससे यह सिद्ध है कि शास्त्रविहित धर्म होनेसे ही वह सबके लिये कर्तव्य नहीं हो जाता। इस प्रकार धर्म कार्य भी हो सकता है और अकार्य भी। यही धर्म-अधर्म और कार्य-अकार्यका भेद है। किसी भी कर्मके करनेका या त्यागनेका अवसर आनेपर “अमुक कर्म मेरे लिये कर्तव्य है या अकर्तव्य, मुझे कौन-सा कर्म किस प्रकार करना चाहिये और कौन-सा नहीं करना चाहिये"--इसका ठीक-ठीक निर्णय करनेमें जो बुद्धिका किंकर्तव्यविमूढ हो जाना या संशययुक्त हो जाना है--यही कर्तव्य और अकर्तव्यको यथार्थ न जानना है। २. जिस बुद्धिसे मनुष्य धर्म-अधर्मका और कर्तव्य-अकर्तव्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर सकता, जो बुद्धि इसी प्रकार अन्यान्य बातोंका भी ठीक-ठीक निर्णय करनेमें समर्थ नहीं होती, वह रजोगुणके सम्बन्धसे विवेकमें अप्रतिष्ित, विक्षिप्त और अस्थिर रहती है; इसी कारण वह राजसी है। 3. ईश्वरनिन्दा, देवनिन्दा, शास्त्रविरोध, माता-पिता-गुरु आदिका अपमान, वर्णाश्रमधर्मके प्रतिकूल आचरण, असंतोष, दम्भ, कपट, व्यभिचार, असत्यभाषण, परपीडन, अभक्ष्य भोजन, यथेच्छाचार और पर-सत्त्वापहरण आदि निषिद्ध पापकर्मोंको धर्म मान लेना और धृति, क्षमा, मनोनिग्रह, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध, ईश्वरपूजन, देवोपासना, शास्त्रसेवन, वर्णाश्रमधर्मानुसार आचरण, माता-पिता आदि गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन, सरलता, ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, अहिंसा और परोपकार आदि शास्त्रविहित पुण्यकर्मोंको अधर्म मानना--यही अधर्मको धर्म और धर्मको अधर्म मानना है। ४. अधर्मको धर्म मान लेनेकी भाँति ही अकर्तव्यको कर्तव्य, दुःखको सुख, अनित्यको नित्य, अशुद्धको शुद्ध और हानिको लाभ मान लेना आदि जितनी भी विपरीत मान्यताएँ हैं, वे सब अन्य पदार्थोंको विपरीत मान लेनेके अन्तर्गत हैं। ५. किसी भी क्रिया, भाव या वृत्तिको धारण करनेकी--उसे दृढ़तापूर्वक स्थिर रखनेकी जो शक्तिविशेष है, जिसके द्वारा धारण की हुई कोई भी क्रिया, भावना या वृत्ति विचलित नहीं होती, प्रत्युत चिरकालतक स्थिर रहती है, उस शक्तिका नाम 'धृति' है; परंतु इसके द्वारा मनुष्य जबतक भिन्न-भिन्न उद्देश्योंसे, नाना विषयोंको धारण करता रहता है, तबतक इसका व्यभिचारदोष नष्ट नहीं होता; जब इसके द्वारा मनुष्य अपना एक अटल उद्देश्य स्थिर कर लेता है, उस समय यह “अव्यभिचारिणी” हो जाती है। सात्विक धृतिका एक ही उद्देश्य होता है--परमात्माको प्राप्त करना। इसी कारण उसे “अव्यभिचारिणी' कहते हैं। ऐसी धारणशक्तिसे परमात्माको प्राप्त करनेके लिये ध्यानयोगद्वारा मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको अटलरूपसे परमात्मामें रोके रखना ही “सात्विक धृति' है। ३. आसत्तिपूर्वक धर्मका पालन करना धृतिके द्वारा धर्मको धारण करना है एवं धनादि पदार्थोकोी और उनसे सिद्ध होनेवाले भोगोंको ही जीवनका लक्ष्य बनाकर अत्यन्त आसक्तिके कारण दृढ़तापूर्वक उनको पकड़े रखना धृतिके द्वारा अर्थ और कामोंको धारण करना है। २. जिसकी बुद्धि अत्यन्त मन्द और मलिन हो, जिसके अन्तःकरणमें दूसरोंका अनिष्ट करने आदिके भाव भरे रहते हों--ऐसे दुष्टबुद्धि मनुष्यको “दुर्मेधा" कहते हैं। 3. निद्रा और तन्‍्दा आदि जो मन और इन्द्रियोंको तमसाच्छन्न, बाह्म क्रियासे रहित और मूढ़ बनानेवाले भाव हैं, उन सबका नाम "निद्रा" है; धन आदि पदार्थोंके नाशकी, मृत्युकी, दुःखप्राप्तिकी, सुखके नाशकी अथवा इसी तरह अन्य किसी प्रकारके इष्टके नाश और अनिष्टप्राप्तिकी आशंकासे अन्त:करणमें जो एक आकुलता और घबराहटभरी वृत्ति होती है, उसका नाम “भय” है; मनमें होनेवाली नाना प्रकारकी दुश्चिन्‍्ताओंका नाम “शोक” है; उसके द्वारा जो इन्द्रियोंमें संताप हो जाता है, उसे “दुःख” कहते हैं; यह शोकका ही स्थूल भाव है तथा जो धन, जन और बल आदिके कारण होनेवाली--विवेक, भविष्यके विचार और दुरदर्शितासे रहित-उन्मत्तवृत्ति है, उसे “मद” कहते हैं; इसीका नाम गर्व, घमंड और उन्मत्तता भी है। इन सबको तथा प्रमाद आदि अन्यान्य तामसभावोंको जो अन्त:करणसे दूर हटानेकी चेष्टा न करके इन्हींमें डूबे रहना है, यही धृतिके द्वारा इनको न छोड़ना अर्थात्‌ धारण किये रहना है। ४. मनुष्यको इस सुखका अनुभव तभी होता है, जब वह इस लोक और परलोकके समस्त भोग- सुखोंको क्षणिक समझकर उन सबसे आसक्ति हटाकर निरन्तर परमात्मस्वरूपके चिन्तनका अभ्यास करता है (गीता ५।२१); बिना साधनके इसका अनुभव नहीं हो सकता--यही भाव दिखलानेके लिये इस सुखका “जिसमें अभ्याससे रमण करता है” यह लक्षण किया गया है। ५. जिस सुखमें रमण करनेवाला मनुष्य आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक--सब प्रकारके दुःखोंके सम्बन्धसे सदाके लिये छूट जाता है; जिस सुखके अनुभवका फल निरतिशय सुखस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति बतलाया गया है (गीता ५२१, २४; ६।२८)--वही सात्त्विक सुख है। ६. जिस प्रकार बालक अपने घरवालोंसे विद्याकी महिमा सुनकर विद्याभ्यासकी चेष्टा करता है, पर उसके महत्त्वका यथार्थ अनुभव न होनेके कारण आरम्भकालमें अभ्यास करते समय उसे खेल-कूदको छोड़कर विद्याभ्यासमें लगे रहना अत्यन्त कष्टप्रद और कठिन प्रतीत होता है, उसी प्रकार सात््विक सुखके लिये अभ्यास करनेवाले मनुष्यको भी विषयोंका त्याग करके संयमपूर्वक विवेक, वैराग्य, शम, दम और तितिक्षा आदि साधनोंमें लगे रहना अत्यन्त श्रमपूर्ण और कष्टप्रद प्रतीत होता है; यही साक्त्विक सुखका आरम्भकालनमें विषके तुल्य प्रतीत होना है। ७. जब सात्त्विक सुखकी प्राप्तिके लिये साधन करते-करते साधकको उस ध्यानजनित सुखका अनुभव होने लागता है, तब उसे वह अमृतके तुल्य प्रतीत होता है; उस समय उसके सामने संसारके समस्त भोग- सुख तुच्छ, नगण्य और दुःखरूप प्रतीत होने लगते हैं। $. उपर्युक्त प्रकारसे अभ्यास करते-करते निरन्तर परमात्माका ध्यान करनेके फलस्वरूप अन्त:करणके स्वच्छ होनेपर इस सुखका अनुभव होता है, इसीलिये इस सुखको परमात्मबुद्धिके प्रसादसे उत्पन्न होनेवाला बतलाया गया है। २. जब मनुष्य मनसहित इन्द्रियोंद्रार किसी विषयका सेवन करता है, तब वह उसे आसक्तिके कारण अत्यन्त प्रिय मालूम होता है; उस समय वह उसके सामने किसी भी अदृष्ट सुखको कोई चीज नहीं समझता, परंतु यह राजस सुख प्रतीतिमात्रका ही सुख है, वस्तुतः सुख नहीं है। प्रत्युत विषयोंमें आसक्ति बढ़ जानेसे पुनः उनकी प्राप्ति न होनेपर अभावके दुःखका अनुभव होता है तथा उनसे वियोग होते समय भी अत्यन्त दुःख होता है। इसलिये विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला यह क्षणिक सुख यद्यपि वस्तुतः सब प्रकारसे दुःखरूप ही है, तथापि जैसे रोगी मनुष्य आसक्तिके कारण स्वादके लोभसे परिणामका विचार न करके कुपथ्यका सेवन करता है और परिणाममें रोग बढ़ जानेसे दुःखी होता है या मृत्यु हो जाती है; उसी प्रकार विषयासक्त मनुष्य भी मूर्खता और आसक्तिवश परिणामका विचार न करके सुखबुद्धिसे विषयोंका सेवन करता है और परिणाममें अनेकों प्रकारसे भाँति-भाँतिके भीषण दु:ख भोगता है (गीत ५।२२)। 3. निद्राके समय मन और इन्द्रियोंकी क्रिया बंद हो जानेके कारण थकावटसे होनेवाले दुःखका अभाव होनेसे तथा मन और इन्द्रियोंको विश्राम मिलनेसे जो सुखकी प्रतीति होती है, वह निद्राजनित सुख जितनी देरतक निद्रा रहती है उतनी ही देरतक रहता है, निरन्तर नहीं रहता--इस कारण क्षणिक है। इसके अतिरिक्त उस समय मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमें प्रकाशका अभाव हो जाता है, किसी भी वस्तुका अनुभव करनेकी शक्ति नहीं रहती। इस कारण तो वह सुख भोगकालमें आत्माको यानी अन्त:करण और इन्द्रियोंको तथा इनके अभिमानी पुरुषको मोहित करनेवाला है और इस सुखकी आसक्तिके कारण परिणाममें मनुष्यको अज्ञानमय वृक्ष, पहाड़ आदि जड योनियोंमें जन्म ग्रहण करना पड़ता है अतएव यह परिणाममें भी आत्माको मोहित करनेवाला है। इसी तरह समस्त क्रियाओंका त्याग करके पड़े रहनेके समय जो मन, इन्द्रिय और शरीरके परिश्रमका त्याग कर देनेसे आरामकी प्रतीति होती है, वह आलस्यजनित सुख भी निद्राजनित सुखकी भाँति भोगकालमें और परिणाममें भी मोहित करनेवाला है। व्यर्थ क्रियाओंके करनेमें मनकी प्रसन्नताके कारण और कर्तव्यका त्याग करनेमें परिश्रमसे बचनेके कारण मूर्खतावश जो सुखकी प्रतीति होती है, उस प्रमादजनित सुखभोगके समय मनुष्यको कर्तव्य- अकर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता, उसकी विवेकशक्ति मोहसे ढक जाती है; अतः कर्तव्यकी अवहेलना होती है। इस कारण यह प्रमादजनित सुख भोगकालमें आत्माको मोहित करनेवाला है तथा उपर्युक्त व्यर्थ कर्मोंमें अज्ञान और आसक्तिवश होनेवाले झूठ, कपद, हिंसा आदि पापकर्मोंका और कर्तव्यकर्मोंके त्यागका फल भोगनेके लिये ऐसा करनेवालोंको सूकर-कूकर आदि नीच योनियोंकी और नरकोंकी प्राप्ति होती है; इससे यह परिणाममें भी आत्माको मोहित करनेवाला है। ४. 'सत्त्व” शब्द यहाँ वस्तुमात्रका यानी सब प्रकारके प्राणियोंका और समस्त पदार्थोंका वाचक है। ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो; क्योंकि समस्त जडवर्ग तो गुणोंका कार्य होनेसे गुणमय है ही और समस्त प्राणियोंका उन गुणोंसे और गुणोंके कार्यरूप पदार्थोंसे सम्बन्ध है, इससे ये सब भी तीनों गुणोंसे युक्त ही हैं; इसलिये पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षत्ोक तथा देवलोकके एवं अन्य सब लोकोंके प्राणी एवं पदार्थ सभी इन तीनों गुणोंसे युक्त हैं। ३. ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य--ये तीनों ही द्विज हैं। तीनोंका ही यज्ञोपवीतधारणपूर्वक वेदाध्ययनमें और यज्ञादि वैदिक कर्मोमें अधिकार है; इसी हेतुसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य--इन तीनोंको सम्मिलित करके कहा गया है। शूद्र द्विज नहीं हैं, अतएव उनका यज्ञोपवीतधारणमें तथा वेदाध्ययनमें और यज्ञादि वैदिक कर्मोंमें अधिकार नहीं है--यह भाव दिखलानेके लिये उनको इन तीनोंसे अलग कहा गया है। २. प्राणियोंके जन्म-जन्मान्तरोंमें किये हुए कर्मोंके जो संस्कार हैं, उनका नाम स्वभाव है; उस स्वभावके अनुरूप प्राणियोंके अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाली सत्त्व, रज और तम--इन गुणवृत्तियोंके अनुसार ही ब्राह्मण आदि वर्णोमें मनुष्य उत्पन्न होते हैं; इस कारण उन गुणोंकी अपेक्षासे ही शास्त्रमें चारों वर्णोके कर्मोंका विभाग किया गया है। जिसके स्वभावमें केवल सत्त्वमुण अधिक होता है, वह ब्राह्मण होता है; इस कारण उसके स्वाभाविक कर्म शम-दमादि बतलाये गये हैं। जिसके स्वभावमें सत्त्वमिश्रित रजोगुण अधिक होता है, वह क्षत्रिय होता है; इस कारण उसके स्वाभाविक कर्म शूरवीरता, तेज आदि बतलाये गये हैं। जिसके स्वभावमें तमोमिश्रित रजोगुण अधिक होता है, वह वैश्य होता है; इसलिये उसके स्वाभाविक कर्म कृषि, गोरक्षा आदि बतलाये गये हैं और जिसके स्वभावमें रजोमिश्रित तमोगुण प्रधान होता है, वह शूद्र होता है; इस कारण उसका स्वाभाविक कर्म तीनों वर्णोंकी सेवा करना बतलाया गया है। इस प्रकार गुण और कर्मके विभागसे ही वर्णविभाग बनता है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि मनमाने कर्मसे वर्ण बदल जाता है। वर्णका मूल जन्म है और कर्म उसके स्वरूपकी रक्षामें प्रधान कारण है। इस प्रकार जन्म और कर्म दोनों ही वर्णमें आवश्यक हैं। केवल कर्मसे वर्णको माननेवाले वस्तुतः वर्णको मानते ही नहीं। वर्ण यदि कर्मपर ही माना जाय तब तो एक दिनमें एक ही मनुष्यको न मालूम कितनी बार वर्ण बदलना पड़ेगा। फिर तो समाजमें कोई शृंखला या नियम ही न रहेगा; सर्वथा अव्यवस्था फैल जायगी, परंतु भारतीय वर्णधर्ममें ऐसी बात नहीं है। १३. अन्त:करणको अपने वशमें करके उसे विक्षेपरहित--शान्त बना लेना तथा सांसारिक विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देना “शमः है। २. समस्त इन्द्रियोंको वशमें कर लेना तथा वशमें की हुई इन्द्रियोंको बाह्म विषयोंसे हटाकर परमात्माकी प्राप्तिके साधनोंमें लगाना “दम” है। 3. स्वधर्मपालनके लिये कष्ट सहन करना--अर्थात्‌ अहिंसादि महाव्रतोंका पालन करना, भोग- सामग्रियोंका त्याग करके सादगीसे रहना, एकादशी आदि व्रत-उपवास करना और वनमें निवास करना-- ये सब “तप' के अन्तर्गत हैं। ४. मन, इन्द्रिय और शरीरको तथा उनके द्वारा की जानेवाली क्रियाओंको पवित्र रखना, उनमें किसी प्रकारकी अशुद्धिको प्रवेश न होने देना ही 'शौच' है। इसका विस्तार गीताके तेरहवें अध्यायके सातवें श्लोककी टिप्पणीमें है। ५. दूसरोंके द्वारा किये हुए अपराधोंको क्षमा कर देनेका नाम 'क्षान्ति" है। गीताके दसवें अध्यायके चौथे श्लोककी टिप्पणीमें इसका विस्तार है। ६. मन, इन्द्रिय और शरीरकों सरल रखना अर्थात्‌ मनमें किसी प्रकारका दुराग्रह और ऐंठ नहीं रखना; जैसा मनका भाव हो, वैसा ही इन्द्रियोंद्वारा प्रकट करना; इसके अतिरिक्त शरीरमें भी किसी प्रकारकी ऐंठ नहीं रखना--यह सब “आर्जव'के अन्तर्गत है। ७. वेद-शास्त्रोंके श्रद्धापूर्वक अध्ययन-अध्यापन करनेका और उनमें वर्णित उपदेशको भलीभाँति समझनेका नाम यहाँ 'ज्ञान' है। <. वेद-शास्त्रोंमें बतलाये हुए और महापुरुषोंसे सुने हुए साधनोंद्वारा परमात्माके स्वरूपका साक्षात्कार कर लेनेका नाम यहाँ “विज्ञान' है। ९, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक--इन सबकी ससत्तामें पूर्ण विश्वास रखना; वेद-शास्त्रोंके और महात्माओंके वचनोंको यथार्थ मानना और धर्मपालनमें दृढ़ विश्वास रखना--ये सब “आस्तिकता'के लक्षण हैं। ३०. ब्राह्मणमें केवल सत्त्वगुणकी प्रधानता होती है, इस कारण उपर्युक्त कर्मोमें उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है; उसका स्वभाव उपर्युक्त कर्मोके अनुकूल होता है, इस कारण उपर्युक्त कर्मोंके करनेमें उसे किसी प्रकारकी कठिनता नहीं होती। इन कर्मोंमें बहुत-से सामान्य धर्मोंका भी वर्णन हुआ है। इससे यह समझना चाहिये कि क्षत्रिय आदि अन्य वर्णोंके वे स्वाभाविक कर्म तो नहीं हैं; परंतु परमात्माकी प्राप्तिमें सबका अधिकार है, अतएव उनके लिये वे प्रयत्नसाध्य हैं। ३१. बड़े-से-बड़ा बलवान शत्रुका न्याययुक्त सामना करनेमें भय न करना तथा न्याययुक्त युद्ध करनेके लिये सदा ही उत्साहित रहना और युद्धके समय साहसपूर्वक गम्भीरतासे लड़ते रहना “शूरवीरता” है। भीष्मपितामहका जीवन इसका ज्वलन्त उदाहरण है। ३२. जिस शक्तिके प्रभावसे मनुष्य दूसरोंका दबाव मानकर किसी भी कर्तव्यपालनसे कभी विमुख नहीं होता और दूसरे लोग न्‍्यायके और उसके प्रतिकूल व्यवहार करनेमें डरते रहते हैं, उस शक्तिका नाम 'तेज' है। इसीको प्रताप और प्रभाव भी कहते हैं। ३३3. बड़े-से-बड़ा संकट उपस्थित हो जानेपर--युद्धस्थलमें शरीरपर भारी-से-भारी चोट लग जानेपर, अपने पुत्र पौत्रादिके मर जानेपर, सर्वस्वका नाश हो जानेपर या इसी तरह अन्य किसी प्रकारकी भारी-से- भारी विपत्ति आ पड़नेपर भी व्याकुल न होना और अपने कर्तव्यपालनसे कभी विचलित न होकर न्यायानुकूल कर्तव्यपालनमें संलग्न रहना--इसीका नाम “चैर्य! है। १४. परस्पर झगड़ा करनेवालोंका न्याय करनेमें, अपने कर्तव्यका निर्णय और पालन करनेमें, युद्ध करनेमें तथा मित्र, वैरी और मध्यस्थोंके साथ यथायोग्य व्यवहार करने आदिमें जो कुशलता है, उसीका नाम “चतुरता'” है। $. युद्ध करते समय भारी-से-भारी संकट आ पड़नेपर भी पीठ न दिखलाना, हर हालतमें न्यायपूर्वक सामना करके अपनी शक्तिका प्रयोग करते रहना और प्राणोंकी परवा न करके युद्धमें डटे रहना ही *“युद्धमें न भागना' है। इसी धर्मको ध्यानमें रखते हुए वीर बालक अभिमन्युने छः: महारथियोंसे अकेले युद्ध करके प्राण दे दिये, किंतु शस्त्र नहीं छोड़े (महा०, द्रोणग० ४९।२२)। २. शासनके द्वारा लोगोंको अन्यायाचरणसे रोककर सदाचारमें प्रवृत्त करना, दुराचारियोंको दण्ड देना, लोगोंसे अपनी आज्ञाका न्याययुक्त पालन करवाना तथा समस्त प्रजाका हित सोचकर निःस्वार्थभावसे प्रेमपूर्वक पुत्रकी भाँति उसकी रक्षा और पालन-पोषण करना--'स्वामिभाव' है। 3. उपर्युक्त कर्मोमें क्षत्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, इनका पालन करनेमें उन्हें किसी प्रकारकी कठिनाई नहीं होती। इन कर्मोंमें भी जो धृति, दान आदि सामान्य धर्म हैं, उनमें सबका अधिकार होनेके कारण वे अन्य वर्णवालोंके लिये अधर्म या परधर्म नहीं हैं; किंतु वे उनके स्वाभाविक कर्म नहीं हैं। इसी कारण वे उनके लिये प्रयत्नसाध्य हैं। ४. जमीनमें बीज बोकर गेहूँ, जौ, चने, मूँग, धान, मक्की, उड़द, हल्दी, धनियाँ आदि समस्त खाद्य पदार्थोंको, कपास और नाना प्रकारकी ओषधियोंको और इसी प्रकार देवता, मनुष्य और पशु आदिके उपयोगमें आनेवाली अन्य पवित्र वस्तुओंको न्यायानुकूल उत्पन्न करनेका नाम “कृषि” यानी खेती करना है। ५. नन्‍्द आदि गोपोंकी भाँति गौओंको अपने घरमें रखना; उनको जंगलमें चराना, घरमें भी यथावश्यक चारा देना, जल पिलाना तथा व्याप्र आदि हिंसक जीवोंसे उनको बचाना; उनसे दूध, दही, घृत आदि पदार्थोंको उत्पन्न करके उन पदार्थोंसे लोगोंकी आवश्यकताओंको पूर्ण करना और उसके परिवर्तनमें प्राप्त धनसे अपनी गृहस्थीके सहित उन गौओंका भलीभाँति न्यायपूर्वक निर्वाह करना “गौरक्ष्य" यानी गोपालन है। पशुओंमें “गौ' प्रधान है तथा मनुष्यमात्रके लिये सबसे अधिक उपकारी पशु भी “गौ” ही है; इसलिये भगवानने यहाँ “पशुपालनम्‌” पदका प्रयोग न करके उसके बदलेमें “गौरक्ष्यम' पदका प्रयोग किया है। अतएव यह समझना चाहिये कि मनुष्यके उपयोगी भैंस, ऊँट, घोड़े और हाथी आदि अन्यान्य पशुओंका पालन करना भी वैश्योंका कर्म है; अवश्य ही गोपालन उन सबकी अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है। ६. मनुष्योंके और देवता, पशु, पक्षी आदि अन्य समस्त प्राणियोंके उपयोगमें आनेवाली समस्त पवित्र वस्तुओंको धर्मानुकूल खरीदना और बेचना तथा आवश्यकतानुसार उनको एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँचाकर लोगोंकी आवश्यकताओंको पूर्ण करना “वाणिज्य” यानी क्रय-विक्रयरूप व्यवहार है। वाणिज्य करते समय वस्तुओंके खरीदने-बेचनेमें तौल-नाप और गिनती आदिसे कम दे देना या अधिक ले लेना; वस्तुको बदलकर या एक वस्तुमें दूसरी वस्तु मिलाकर अच्छीके बदले खराब दे देना या खराबके बदले अच्छी ले लेना; नफा, आढ़त और दलाली आदि ठहराकर उससे अधिक लेना या कम देना; इसी तरह किसी भी व्यापारमें झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्तीका या अन्य किसी प्रकारके अन्यायका प्रयोग करके दूसरोंके स्वत्वको हड़प लेना--ये सब वाणिज्यके दोष हैं। इन सब दोषोंसे रहित जो सत्य और न्याययुक्त पवित्र वस्तुओंका खरीदना और बेचना है, वही क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार है। तुलाधारने इस व्यवहारसे ही सिद्धि प्राप्त की थी (महाभारत, शान्तिपर्व)। ७. उपर्युक्त द्विजाति वर्णोकी अर्थात्‌ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी दासवृत्तिसे रहना; उनकी आज्ञाओंका पालन करना; घरमें जल भर देना, स्नान करा देना, उनके जीवन-निर्वाहके कार्योंमें सुविधा कर देना, दैनिक कार्यमें यथायोग्य सहायता करना, उनके पशुओंका पालन करना, उनकी वस्तुओंको सँभालकर रखना, कपड़े साफ करना, क्षौरकर्म करना आदि जितने भी सेवाके कार्य हैं, उन सबको करके उनको संतुष्ट रखना अथवा सबके काममें आनेवाली वस्तुओंको कारीगरीके द्वारा तैयार करके उन वस्तुओंसे उनकी सेवा करके अपनी जीविका चलाना--ये सब “परिचर्यात्मक” यानी सब वर्णोंकी सेवा करनारूप कर्मके अन्तर्गत हैं। ३. समाज-शरीरका मस्तिष्क ब्राह्मण है, बाहु क्षत्रिय है, ऊरु वैश्य है और चरण शूद्र है। चारों एक ही समाज-शरीरके चार आवश्यक अंग हैं और एक-दूसरेकी सहायतापर सुरक्षित और जीवित हैं। घृणा या अपमानकी तो बात ही क्या है, इनमेंसे किसीकी तनिक भी अवहेलना नहीं की जा सकती। न इनमें ऊँच- नीचकी कल्पना है। अपने-अपने स्थान और कार्यके अनुसार चारों ही बड़े हैं। ब्राह्मण ज्ञानबलसे, क्षत्रिय बाहुबलसे, वैश्य धनबलसे और शूद्र जनबल या श्रमबलसे बड़ा है और चारोंकी ही पूर्ण उपयोगिता है। एक ही घरके चार भाइयोंकी तरह एक ही घरकी सम्मिलित उन्नतिके लिये चारों भाई प्रसन्नता और योग्यताके अनुसार बाँटे हुए अपने-अपने पृथक्‌-पृथक्‌ आवश्यक कर्तव्यपालनमें लगे रहते हैं। यों चारों वर्ण परस्पर--ब्राह्मण धर्मस्थापनके द्वारा, क्षत्रिय बाहुबलके द्वारा, वैश्य धनबलके द्वारा और शूद्र शारीरिक श्रमबलके द्वारा एक-दूसरेका हित करते हुए, समाजकी शक्ति बढ़ाते हुए परम सिद्धिको प्राप्त कर लेते हैं। २. भगवान्‌ इस जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले, सर्वशक्तिमान्‌, सर्वाधार, सबके प्रेरक, सबके आत्मा, सर्वान्तर्यामी और सर्वव्यापी हैं; यह सारा जगत्‌ उन्हींकी रचना है और वे स्वयं ही अपनी योगमायासे जगत्‌के रूपमें प्रकट हुए हैं, अतएव यह सम्पूर्ण जगत्‌ भगवान्‌का है; मेरे शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा मेरे द्वारा जो कुछ भी यज्ञ, दान आदि स्ववर्णोचित कर्म किये जाते हैं--वे सब भी भगवानके हैं और मैं स्वयं भी भगवानका ही हूँ; समस्त देवताओंके एवं अन्य प्राणियोंके आत्मा होनेके कारण वे ही समस्त कर्मोंके भोक्ता हैं (गीता ५।२९)--परम श्रद्धा और विश्वासके साथ इस प्रकार समस्त कर्मोमें ममता, आसक्ति और फलेच्छाका सर्वथा त्याग करके भगवानके आज्ञानुसार उन्हींकी प्रसन्नताके लिये अपना कर्तव्य पालन करते हुए अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा समस्त जगत्‌की सेवा करना--समस्त प्राणियोंको सुख पहुँचाना ही अपने स्वाभाविक कर्माँद्वारा परमेश्वरकी पूजा करना है। 3. प्रत्येक मनुष्य, चाहे वह किसी भी वर्ण या आश्रममें स्थित हो, अपने कर्मोंसे भगवान्‌की पूजा करके परम सिद्धि रूप परमात्माको प्राप्त कर सकता है; परमात्माको प्राप्त करनेमें सबका समान अधिकार है। अपने शम, दम आदि कर्मोंको उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्‌के समर्पण करके उनके द्वारा भगवान्‌की पूजा करनेवाला ब्राह्मण जिस पदको प्राप्त होता है, अपने शूरवीरता आदि कर्मोंके द्वारा भगवान्‌की पूजा करनेवाला क्षत्रिय भी उसी पदको प्राप्त होता है; उसी प्रकार अपने कृषि आदि कर्मोद्वारा भगवान्‌की पूजा करनेवाला वैश्य तथा अपने सेवा-सम्बन्धी कर्मोद्वारा भगवान्‌की पूजा करनेवाला शूद्र भी उसी परमपदको प्राप्त होता है। अतएव कर्मबन्धनसे छूटकर परमात्माको प्राप्त करनेका यह बहुत ही सुगम मार्ग है। इसलिये मनुष्यको उपर्युक्त भावसे अपने कर्तव्य-पालनद्वारा परमेश्वरकी पूजा करनेका अभ्यास करना चाहिये। ४. वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिकी अपेक्षासे जिस मनुष्यके लिये जो कर्म विहित है, उसके लिये वही स्वधर्म है। झूठ, कपट, चोरी, हिंसा, ठगी, व्यभिचार आदि निषिद्ध कर्म तो किसीके भी स्वधर्म नहीं हैं और काम्यकर्म भी किसीके लिये अवश्यकर्तव्य नहीं हैं; इस कारण उनकी गणना यहाँ किसीके स्वधर्मोमें नहीं है। इनको छोड़कर जिस वर्ण और आश्रमके जो विशेष धर्म बतलाये गये हैं, जिनमें एकसे दूसरे वर्ण-आश्रमवालोंका अधिकार नहीं है, वे तो उन-उन वर्ण-आश्रमवालोंके अलग-अलग स्वधर्म हैं और जिन कर्मोमें द्विजमात्रका अधिकार बतलाया गया है, वे वेदाध्ययन और यज्ञादि कर्म द्विजोंके लिये स्वधर्म हैं तथा जिनमें सभी वर्णाश्रमोंके स्त्री-पुरुषोंका अधिकार है, वे ईश्वरभक्ति, सत्य-भाषण, माता-पिताकी सेवा, इन्द्रियोंका संयम, ब्रह्मचर्ययालन और विनय आदि सामान्य धर्म सबके स्वधर्म हैं। ३. जो कर्म गुणयुक्त हों और जिनका अनुष्ठान भी पूर्णतया किया गया हो, किंतु वे अनुष्ठान करनेवालेके लिये विहित न हों, दूसरोंके लिये ही विहित हों--ऐसे भलीभाँति आचरित कर्मोंकी अपेक्षा अर्थात्‌ जैसे वैश्य और क्षत्रिय आदिकी अपेक्षा ब्राह्मणके विशेष धर्मोमें अहिंसादि सदगुणोंकी अधिकता है, गृहस्थकी अपेक्षा संन्यास-आश्रमके धर्मोमें सदगुणोंकी बहुलता है, इसी प्रकार शूद्रकी अपेक्षा वैश्य और क्षत्रियके कर्म गुणयुक्त हैं, ऐसे परधर्मकी अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म श्रेष्ठ है। भाव यह है कि जैसे देखनेमें कुरूप और गुणरहित होनेपर भी स्त्रीके लिये अपने ही पतिका सेवन करना कल्याणप्रद है, उसी प्रकार देखनेमें गुणोंसे हीन होनेपर भी तथा उसके अनुष्ठानमें अंगवैगुण्य हो जानेपर भी जिसके लिये जो कर्म विहित है, वही उसके लिये कल्याणप्रद है। २. क्षत्रियका स्वधर्म युद्ध करना और दुष्टोंको दण्ड देना आदि है; उसमें अहिंसा और शान्ति आदि गुणोंकी कमी मालूम होती है। इसी तरह वैश्यके “कृषि' आदि कर्मोमें भी हिंसा आदि दोषोंकी बहुलता है, इस कारण ब्राह्मणोंके शान्तिमय कर्मोंकी अपेक्षा वे भी विगुण यानी गुणहीन हैं एवं शूद्रोंके कर्म वैश्यों और क्षत्रियोंकी अपेक्षा भी निम्न श्रेणीके हैं। इसके सिवा उन कर्मोंके पालनमें किसी अंगका छूट जाना भी गुणकी कमी है। उपर्युक्त प्रकारसे स्वधर्ममें गुणोंकी कमी रहनेपर भी वह गुणयुक्त परधर्मकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। 3. दूसरेका धर्म पालन करनेसे उसमें हिंसादि दोष कम होनेपर भी परवृत्तिच्छेदन आदि पाप लगते हैं; किंतु अपने स्वाभाविक कर्मोंका न्यायपूर्वक आचरण करते समय उनमें जो आनुषंगिक हिंसादि पाप बन जाते हैं, वे उसको नहीं लगते। ४. वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिकी अपेक्षासे जिसके लिये जो कर्म बतलाये गये हैं, उसके लिये वे ही सहज कर्म हैं। अतएव इस अध्यायमें जिन कर्मोंका वर्णन स्वधर्म, स्वकर्म, नियत कर्म, स्वभावनियत कर्म और स्वभावज कर्मके नामसे हुआ है, उन्हींको यहाँ 'सहज' कर्म कहा है। ५. जो स्वाभाविक कर्म श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त हों, उनका त्याग नहीं करना चाहिये--इसमें तो कहना ही क्या है; पर जिनमें साधारणत: हिंसादि दोषोंका मिश्रण दीखता हो, वे भी शास्त्रविहित एवं न्‍्यायोचित होनेके कारण दोषयुक्त दीखनेपर भी वास्तवमें दोषयुक्त नहीं हैं। इसलिये उन कर्मोंका भी त्याग नहीं करना चाहिये। ६. जिस प्रकार धूएँसे अग्नि ओतप्रोत रहती है, धूआँ अग्निसे सर्वधा अलग नहीं हो सकता--उसी प्रकार आरम्भमात्र दोषसे ओतप्रोत हैं, क्रियामात्रमें किसी-न-किसी प्रकारसे किसी-न-किसी प्राणीकी हिंसा हो जाती है; क्योंकि संन्यास-आश्रममें भी शौच, स्नान और भिक्षाटनादि कर्मद्वारा किसी-न-किसी अंभमें प्राणियोंकी हिंसा होती ही है और ब्राह्मणके यज्ञादि कर्मोंमें भी आरम्भकी बहुलता होनेसे क्षुद्र प्राणियोंकी हिंसा होती है। इसलिये किसी भी वर्ण-आश्रमके कर्म साधारण दृष्टिसे सर्वथा दोषरहित नहीं हैं और कर्म किये बिना कोई रह नहीं सकता (गीता ३।५); इस कारण स्वधर्मका त्याग कर देनेपर भी कुछ-न-कुछ कर्म तो मनुष्यको करना ही पड़ेगा तथा वह जो कुछ करेगा, वही दोषयुक्त होगा। इसीलिये अमुक कर्म नीचा है या दोषयुक्त है--ऐसा समझकर मनुष्यको स्वधर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; बल्कि उसमें ममता, आसक्ति और फलेच्छारूप दोषोंका त्याग करके उनका न्याययुक्त आचरण करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होकर उसे शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। १. अन्त:करण और इन्द्रियोंके सहित शरीरमें, उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोमें तथा समस्त भोगोंमें और चराचर प्राणियोंके सहित समस्त जगतूमें जिसकी आसक्तिका सर्वथा अभाव हो गया है; जिसके मन- बुद्धिकी कहीं किंचिन्मात्र भी संलग्नता नहीं रही है--वह 'सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला' है। जिसकी स्पृहाका सर्वथा अभाव हो गया है, जिसको किसी भी सांसारिक वस्तुकी किंचिन्मात्र भी परवा नहीं रही है, उसे 'स्पृहारहित"” कहते हैं और जिसका इन्द्रियोंके सहित अन्तःकरण अपने वशमें किया हुआ है, उसे “जीते हुए अन्तःकरणवाला'” कहते हैं। जो उपर्युक्त तीनों गुणोंसे सम्पन्न होता है, वही मनुष्य सांख्ययोगके द्वारा परमात्माके यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति कर सकता है। २. संन्यास--ज्ञानयोग यानी सांख्ययोगका स्वरूप भगवानने इक्यावनवेंसे तिरपनवें श"्लोकतक बतलाया है। इस साधनका फल जो कि कर्मबन्धनसे सर्वथा छूटकर सच्चिदानन्दघन निर्विकार परमात्माके यथार्थ ज्ञानको प्राप्त हो जाना है, वही 'परम नैष्कर्म्यसिद्धि' है, जिसको संन्यासके द्वारा प्राप्त किया जाता है। 3. जो ज्ञानयोगकी अन्तिम स्थिति है, जिसको परा भक्ति और तत्त्वज्ञान भी कहते हैं, जो समस्त साधनोंकी अवधि है, जो पूर्वश्लोकमें “नैष्कर्म्यसिद्धि' के नामसे कही गयी है, वही यहाँ 'सिद्धि' के नामसे तथा वही “परा निष्ठा” के नामसे कही गयी है। ४. नित्य-निर्विकार, निर्मुण-निराकार, सच्चिदानन्दघन, पूर्णब्रह्म परमात्माका वाचक यहाँ “ब्रह्म” पद है और तत्त्वज्ञानके द्वारा पचपनवें श्लोकके वर्णनानुसार अभिन्नभावसे उसमें प्रविष्ट हो जाना ही उसको प्राप्त होना है। ५. जो साधनके उपयुक्त अनायास हजम हो जानेवाले सात्त्विक पदार्थोंका (गीता १७८) अपनी प्रकृति, आवश्यकता और शक्तिके अनुरूप नियमित और परिमित भोजन करता है--ऐसे युक्त आहारके करनेवाले (गीता ६।१७) पुरुषको “लघ्वाशी” कहते हैं। <. पूर्वार्जित पापके संस्कारोंसे रहित अन्त:करणवाला ही *विशुद्ध बुद्धिसे युक्त” कहलाता है। ७. जहाँका वायुमण्डल पवित्र हो, जहाँ बहुत लोगोंका आना-जाना न हो, जो स्वभावसे ही एकान्त और स्वच्छ हो या झाड़-बुहारकर और धोकर जिसे स्वच्छ बना लिया गया हो--ऐसे नदीतट, देवालय, वन और पहाड़की गुफा आदि स्थानोंमें निवास करना ही 'एकान्त और शुद्ध देशका सेवन करना' है। ८. इन्द्रियों और अन्त:करणका समस्त विषयोंसे सम्बन्ध-विच्छेद कर देना ही उनका संयम करना है। ९. मन, वाणी और शरीरमें इच्छाचारिताका तथा बुद्धिके विचलित करनेकी शक्तिका अभाव कर देना ही उनको वशमें कर लेना है। १०. इस लोक या परलोकके किसी भी भोगमें, किसी भी प्राणीमें तथा किसी भी पदार्थ, क्रिया अथवा घटनामें किंचिन्मात्र भी आसक्ति या द्वेष न रहने देना 'राग-द्वेषका सर्वथा नाश कर देना” है। $. शरीर, इन्द्रियों और अन्त:करणमें जो आत्मबुद्धि है, जिसके कारण मनुष्य मन, बुद्धि और शरीरद्वारा किये जानेवाले कर्मोंमें अपनेको कर्ता मान लेता है, उसका नाम “अहंकार' है। अन्यायपूर्वक बलात्‌ जो दूसरोंपर प्रभुत्व जमानेका साहस है, उसका नाम “बल” है। धन, जन, विद्या, जाति और शारीरिक शक्ति आदिके कारण होनेवाला जो गर्व है, उसका नाम “दर्प” यानी घमंड है। इस लोक और परलोकके भोगोंको प्राप्त करनेकी इच्छाका नाम “काम' है। अपने मनके प्रतिकूल आचरण करनेवालेपर और नीतिविरुद्ध व्यवहार करनेवालेपर जो अन्तःकरणमें उत्तेजनाका भाव उत्पन्न होता है--जिसके कारण मनुष्यके नेत्र लाल हो जाते हैं, होंठ फड़कने लगते हैं, हृदयमें जलन होने लगती है और मुख विकृत हो जाता है-- उसका नाम “क्रोध” है। भोग्यबुद्धिसे सांसारिक भोग-सामग्रियोंके संग्रहका नाम “परिग्रह” है, अतएव इन सबका त्याग करके पूर्वोक्त प्रकारसे सात्त्विक धृतिके द्वारा मन-इन्द्रियोंकी क्रियाओंको रोककर समस्त स्फुरणाओंका सर्वथा अभाव करके, नित्य-निरन्तर सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका अभिन्नभावसे चिन्तन करना (गीता ६।२५) तथा उठते-बैठते, सोते-जागते एवं शौच-स्नान, खान-पान आदि आवश्यक क्रिया करते समय भी नित्य-निरन्तर परमात्माके स्वरूपका चिन्तन करते रहना एवं उसीको सबसे बढ़कर परम कर्तव्य समझना “ध्यानयोगके परायण रहना'* है। २. मन और इन्द्रियोंके सहित शरीरमें, समस्त प्राणियोंमें, कर्मोमें, समस्त भोगोंमें एवं जाति, कुल, देश, वर्ण और आश्रममें ममताका सर्वथा त्याग कर देना ही “ममतासे रहित होना है। ३. जिसके अन्तःकरणमें विक्षेपका सर्वधा अभाव हो गया है और जिसका अन्तः:करण अटल शान्ति और शुद्ध सात्विक प्रसन्नतासे व्याप्त रहता है, वह उपरत पुरुष 'शान्तियुक्त” कहा जाता है। ४. जो सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित हो जाता है, जिसकी दृष्टिमें एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्मसे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता नहीं रहती, “अहं ब्रह्मास्मि'--मैं ब्रह्म हूँ (बृहदारण्यक उप० १,षट्शतानि सर्विंशानि श्लोकानां प्राह केशव: । अर्जुन: सप्तपञ्चाशत्‌ सप्तषष्टिं तु संजय:

Sañjaya said: Keśava (Śrī Kṛṣṇa) spoke six hundred and twenty verses; Arjuna spoke fifty-seven; and I, Sañjaya, spoke sixty-seven.

Verse 5

भारतामृतसर्वस्वगीताया मथितस्य च । सारमुद्धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम्‌,भारतरूपी अमृतराशिके सर्वस्व सारभूत गीताका मन्‍न्थन करके उसका सार निकालकर श्रीकृष्णने अर्जुनके मुखमें (कानोंद्वारा मन-बुद्धिमें) डाल दिया है

Vaiśampāyana said: From the Bhagavad Gītā—regarded as the very essence of the nectar-like Mahābhārata—Kṛṣṇa, having churned out its meaning and drawn forth its concentrated core, poured that essence into Arjuna’s mouth, that is, imparted it directly into his inner faculty through instruction, so that Arjuna might regain clarity of duty and steadiness of mind amid the moral crisis of war.

Verse 6

- संजय उवाच ततो धनंजयं दृष्टवा बाणगाण्डीवधारिणम्‌ | पुनरेव महानादं व्यसृजन्त महारथा:,संजय कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर अर्जुनको गाण्डीव धनुष और बाण धारण किये देख पाण्डव महारथियों, सोमकों तथा उनके अनुगामी सैनिकोंने पुनः बड़े जोरसे सिंहनाद किया। साथ ही उन सभी वीरोंने प्रसन्नतापूर्वक समुद्रसे प्रकट होनेवाले शंखोंको बजाया

Sanjaya said: Then, seeing Dhanañjaya (Arjuna) bearing his arrows and the Gāṇḍīva bow, the great chariot-warriors raised once more a mighty roar. Their renewed acclamation signals restored confidence and collective resolve as the battle’s moral and martial stakes intensify.

Verse 7

पाण्डवा: सोमकाश्रैव ये चैषामनुयायिन: । दध्मुश्न मुदिता: शड्खान्‌ वीरा: सागरसम्भवान्‌,संजय कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर अर्जुनको गाण्डीव धनुष और बाण धारण किये देख पाण्डव महारथियों, सोमकों तथा उनके अनुगामी सैनिकोंने पुनः बड़े जोरसे सिंहनाद किया। साथ ही उन सभी वीरोंने प्रसन्नतापूर्वक समुद्रसे प्रकट होनेवाले शंखोंको बजाया

Sanjaya said: O King, then the Pāṇḍavas, the Somakas, and all their followers—cheered at the sight of Arjuna bearing the Gāṇḍīva bow and his arrows—again raised a mighty lion-roar; and those heroes, rejoicing, blew their conches said to be born of the ocean. The scene signals renewed resolve and solidarity on the side that claims to fight for rightful order (dharma) as the battle’s moral stakes sharpen.

Verse 8

ततो भेर्यक्ष पेश्यक्ष॒ क्रराचा गोविषाणिका: । सहसैवाभ्यहन्यन्त तत: शब्दो महानभूत्‌,तदनन्तर भेरी, पेशी, क्रकच और नरसिंहे आदि बाजे सहसा बज उठे। इससे वहाँ महान्‌ शब्द गूँजने लगा

Sañjaya said: Then drums and kettledrums, the harsh-sounding instruments, and the cow-horn trumpets were suddenly struck together. From that, a great roar of sound arose—an audible sign of the armies’ readiness and the irreversible momentum toward battle.

Verse 9

तथा देवा: सगन्धर्वा: पितरश्ष॒ जनाधिप । सिद्धचारणसंघाश्न समीयुस्ते दिदृक्षया,नरेश्वरर उस समय देवता, गन्धर्व, पितर, सिद्ध, चारण तथा महाभाग महर्षिगण देवराज इन्द्रकों आगे करके उस भीषण मार-काटको देखनेके लिये एक साथ वहाँ आये

Sañjaya said: “So too, O lord of men, the gods along with the Gandharvas, the Pitṛs, and the assembled hosts of Siddhas and Cāraṇas came together there, eager to witness that dreadful slaughter.”

Verse 10

ऋषयश्न महाभागा: पुरस्कृत्य शतक्रतुम्‌ । समीयुस्‍्तत्र सहिता द्रष्ट॑ं तद्‌ वैशसं महत्‌,नरेश्वरर उस समय देवता, गन्धर्व, पितर, सिद्ध, चारण तथा महाभाग महर्षिगण देवराज इन्द्रकों आगे करके उस भीषण मार-काटको देखनेके लिये एक साथ वहाँ आये

Sañjaya said: The blessed great seers, placing Śatakratu (Indra) at their head, assembled there together to witness that vast and dreadful slaughter. The scene draws even celestial and perfected beings as spectators, underscoring how the war’s violence becomes a cosmic event that tests the moral order (dharma) and the consequences of human choices.

Verse 11

ततो युधिष्ठिरो दृष्टवा युद्धाय समवस्थिते । ते सेने सागरप्रख्ये मुहुः प्रचलिते नूप,राजन! तदनन्तर वीर राजा युधिष्ठिरने समुद्रके समान उन दोनों सेनाओंको युद्धके लिये उपस्थित और चंचल हुई देख कवच खोलकर अपने उत्तम आयुधोंको नीचे डाल दिया और रथसे शीघ्र उतरकर वे पैदल ही हाथ जोड़े पितामह भीष्मको लक्ष्य करके चल दिये। धर्मराज युधिष्छिर मौन एवं पूर्वाभिमुख हो शत्रुसेनाकी ओर चले गये

Sañjaya said: Then Yudhiṣṭhira, seeing the armies drawn up for battle—those two forces vast as the ocean and repeatedly surging with restless movement—did something striking, O king. The heroic ruler removed his armor, laid down his excellent weapons, quickly descended from his chariot, and, with hands joined in reverence, walked on foot toward Grandsire Bhīṣma. Silent and facing east, Dharmarāja Yudhiṣṭhira proceeded toward the enemy host—an ethical gesture of humility and duty even at the threshold of war.

Verse 12

विमुच्य कवचं वीरो निक्षिप्य च वरायुधम्‌ । अवरुह्ा रथात्‌ क्षिप्रंं पद्भधयामेव कृतांजलि:,राजन! तदनन्तर वीर राजा युधिष्ठिरने समुद्रके समान उन दोनों सेनाओंको युद्धके लिये उपस्थित और चंचल हुई देख कवच खोलकर अपने उत्तम आयुधोंको नीचे डाल दिया और रथसे शीघ्र उतरकर वे पैदल ही हाथ जोड़े पितामह भीष्मको लक्ष्य करके चल दिये। धर्मराज युधिष्छिर मौन एवं पूर्वाभिमुख हो शत्रुसेनाकी ओर चले गये

Sañjaya said: “O King, the hero, having unfastened his armor and laid down his excellent weapons, quickly descended from his chariot. With palms joined in reverence, he proceeded on foot.” The act signals a deliberate shift from combat posture to humility and dharmic propriety—seeking rightful conduct and blessing before the violence of battle.

Verse 13

पितामहमभिप्रेक्ष्य धर्मराजो युधिष्ठिर: । वाग्यत: प्रययौ येन प्राडुमुखो रिपुवाहिनीम्‌,राजन! तदनन्तर वीर राजा युधिष्ठिरने समुद्रके समान उन दोनों सेनाओंको युद्धके लिये उपस्थित और चंचल हुई देख कवच खोलकर अपने उत्तम आयुधोंको नीचे डाल दिया और रथसे शीघ्र उतरकर वे पैदल ही हाथ जोड़े पितामह भीष्मको लक्ष्य करके चल दिये। धर्मराज युधिष्छिर मौन एवं पूर्वाभिमुख हो शत्रुसेनाकी ओर चले गये

Sañjaya said: Seeing the Grandsire, Dharma-king Yudhiṣṭhira—restraining his speech—set out toward him, facing east, in the direction of the enemy host. The moment underscores Yudhiṣṭhira’s ethical gravity: even at the brink of battle he approaches the revered elder with disciplined silence, guided by dharma rather than impulse.

Verse 14

त॑ प्रयान्तमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो धनंजय: । अवतीर्य रथात्‌ तूर्ण भ्रातृभि: सहितो5न्वयात्‌,कुन्तीपुत्र धनंजय उन्हें शत्रु-सेनाकी ओर जाते देख तुरंत रथसे उतर पड़े और भाइयोंसहित उनके पीछे-पीछे जाने लगे। भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी उनके पीछे गये तथा उन्हींमें चित्त लगाये रहनेवाले प्रधान-प्रधान राजा भी उत्सुक होकर उनके साथ गये

Sañjaya said: Seeing him moving ahead toward the enemy host, Dhanañjaya (Arjuna), the son of Kuntī, quickly descended from his chariot and, accompanied by his brothers, followed after him. The scene underscores the pull of kinship and duty amid war: leaders respond at once when a revered elder advances into danger, and the moral weight of the moment compels immediate action.

Verse 15

वासुदेवश्च भगवान्‌ पृष्ठतोडनुजगाम तम्‌ । तथा मुख्याश्न राजानस्तच्चित्ता जग्मुरुत्सुका:,कुन्तीपुत्र धनंजय उन्हें शत्रु-सेनाकी ओर जाते देख तुरंत रथसे उतर पड़े और भाइयोंसहित उनके पीछे-पीछे जाने लगे। भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी उनके पीछे गये तथा उन्हींमें चित्त लगाये रहनेवाले प्रधान-प्रधान राजा भी उत्सुक होकर उनके साथ गये

Sañjaya said: The Blessed Lord Vāsudeva followed him from behind. Likewise, the foremost kings—their minds fixed upon him—went along eagerly. The scene underscores how Arjuna’s decisive movement draws even great rulers into alignment, and how Kṛṣṇa’s steady accompaniment frames the moment with divine guidance amid the moral tension of war.

Verse 16

अर्जुन उवाच कि ते व्यवसितं राजन्‌ यदस्मानपहाय वै | पद्धयामेव प्रयातो5सि प्राड्मुखो रिपुवाहिनीम्‌,अर्जुनने पूछा--राजन्‌! आपने क्या निश्चय किया है कि हमलोगोंको छोड़कर आप पूर्वाभिमुख हो पैदल ही शत्रुसेनाकी ओर चल दिये हैं?

Arjuna said: “O King, what resolve have you formed, that—leaving us behind—you have set out on foot, facing east, toward the enemy host? What is your intention in advancing alone in this manner?”

Verse 17

भीमसेन उवाच क्व गमिष्यसि राजेन्द्र निक्षिप्तकवचायुध: । दंशितेष्वरिसैन्येषु भ्रातृनुत्सृज्य पार्थिव,भीमसेनने पूछा--महाराज! पृथ्वीनाथ! कवच और आयुध नीचे डालकर भाइयोंको भी छोड़कर कवच आदिसे सुसज्जित हुई शत्रु-सेनामें कहाँ जायँगे?

Bhīmasena said: “O best of kings, where are you going, having cast aside your armor and weapons? O ruler of the earth, abandoning your brothers and entering the enemy’s ranks that stand fully armed—what is this course you choose?”

Verse 18

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌गीतापवके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्‌ श्रीकृष्णार्जुन-संवादमें मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,नकुल उवाच एवं गते त्वयि ज्येछे मम भ्रातरि भारत | भीर्मे दुनोति हृदयं ब्रूहि गनता भवान्‌ क्व नु नकुलने पूछा--भारत! आप मेरे बड़े भाई हैं। आपके इस प्रकार शत्रुसेनाकी ओर चल देनेपर भारी भय मेरे हृदयको पीड़ित कर रहा है। बताइये, आप कहाँ जायूँगे?

Sañjaya said: Thus, within the Mahābhārata’s Bhīṣma Parva—within the section known as the Bhagavad Gītā—ends the Upaniṣad called the Bhagavad Gītā, a teaching of Brahma-knowledge and the discipline of Yoga, in the dialogue between Śrī Kṛṣṇa and Arjuna; the eighteenth chapter, named ‘Yoga of Liberation through Renunciation,’ is complete. Nakula said: “O Bhārata, you are my eldest brother. As you go forth in this manner toward the enemy host, a great fear torments my heart. Tell me—where indeed are you going?”

Verse 19

सहदेव उवाच अस्मिन्‌ रणसमूहे वै वर्तमाने महाभये । उत्सृज्य क्व नु गन्तासि शत्रूनभिमुखो नृूप,सहदेवने पूछा--नरेश्वर! इस रणक्षेत्रमें जहाँ शत्रु-सेनाका समूह जुटा हुआ है और महान्‌ भय उपस्थित है, आप हमें छोड़कर शत्रुओंकी ओर कहाँ जायँगे?

Sahadeva said: “O king, when this massed battle is underway and great peril has arisen, where will you go, leaving us behind, while facing the enemy?”

Verse 20

संजय उवाच एवमाभाष्यमाणो<पि भ्रातृभि: कुरुनन्दन: । नोवाच वाग्यतः किंचिद्‌ गच्छत्येव युधिछिर:,संजय कहते हैं--राजन्‌! भाइयोंके इस प्रकार कहनेपर भी कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले राजा युधिष्ठिर उनसे कुछ नहीं बोले। चुपचाप चलते ही गये

Sañjaya said: O King, though addressed in this manner by his brothers, Yudhiṣṭhira—the delight of the Kuru line—spoke nothing at all. Restrained in speech, he simply continued on in silence, suggesting an inward struggle where duty and conscience weigh heavily amid the approach of war.

Verse 21

तानुवाच महाप्राज्ञो वासुदेवो महामना: । अभिप्रायो<स्य विज्ञातो मयेति प्रहसन्निव,तब परम बुद्धिमान महामना भगवान्‌ वासुदेवने उन चारों भाइयोंसे हँसते हुए-से कहा --“ इनका अभिप्राय मुझे ज्ञात हो गया है

Sañjaya said: Then the great-souled Vāsudeva, supremely wise, addressed them with a smile, as if amused: “I have understood his intention.” The line underscores Kṛṣṇa’s discerning insight into motives—an ethical reminder that in moments of conflict, true wisdom reads not only words and actions but the underlying resolve that drives them.

Verse 22

एष भीष्म तथा द्रोणं गौतमं शल्यमेव च । अनुमान्य गुरून्‌ सर्वान्‌ योत्स्यते पार्थिवोडरिभि:,'ये राजा युधिष्ठिर भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और शल्य--इन समस्त गुरुजनोंसे आज्ञा लेकर शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे

Sañjaya said: “This king, having first paid due respect and sought the assent of all his elders and teachers—Bhīṣma, Droṇa, Gautama (Kṛpa), and Śalya—will now engage in battle against his foes.” The verse underscores the tension between reverence for gurus and the inexorable duty of kingship in war.

Verse 23

श्रूयते हि पुराकल्पे गुरूनननुमान्य यः । युध्यते स भवेद्‌ व्यक्तमपध्यातो महत्तरै:,'सुना जाता है कि प्राचीन कालमें जो गुरुजनोंकी अनुमति लिये बिना ही युद्ध करता था, वह निश्चय ही उन माननीय पुरुषोंकी दृष्टिमें गिर जाता था

Sañjaya said: “It is indeed heard from ancient tradition that one who enters battle without first seeking the consent of his elders and teachers is clearly regarded as fallen from propriety in the eyes of the venerable.”

Verse 24

अनुमान्य यथाशान्त्र यस्तु युध्येन्महत्तरै: । ध्रुवस्तस्य जयो युद्धे भवेदिति मतिर्मम,“जो शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार माननीय पुरुषोंसे आज्ञा लेकर युद्ध करता है, उसकी उस युद्धमें अवश्य विजय होती है, ऐसा मेरा विश्वास है”

Sañjaya said: “In my judgment, one who undertakes battle only after duly obtaining the consent and sanction of venerable elders, in accordance with the injunctions of the śāstras, is certain to gain victory in that war.”

Verse 25

एवं ब्रुवति कृष्णेउत्र धार्तराष्ट्रचमूं प्रति । (नेत्रैरनिमिषै: सर्व: प्रेक्षन्ते सम युधिष्ठिरम्‌ ।।) हाहाकारो महानासीक्नि:शब्दास्त्वपरेडभवन्‌,जब भगवान्‌ श्रीकृष्ण ये बातें कह रहे थे, उस समय दुर्योधनकी सेनाकी ओर आते हुए युधिष्ठिरको सब लोग अपलक नेत्रोंसे देख रहे थे। कहीं महान्‌ हाहाकार हो रहा था और कहीं दूसरे लोग मुँहसे एक शब्द भी न बोलकर चुप हो गये थे

Sañjaya said: While Kṛṣṇa was speaking thus, facing the army of the sons of Dhṛtarāṣṭra, all eyes—unblinking—were fixed upon Yudhiṣṭhira as he advanced toward them. In some quarters there arose a great outcry, while elsewhere others fell utterly silent, unable to utter a single word. The moment captures the moral tension of the battlefield: Kṛṣṇa’s counsel and Yudhiṣṭhira’s movement stir fear, awe, and ethical uncertainty across the opposing host.

Verse 26

दृष्टवा युधिष्ठिरं दूराद्‌ धार्तराष्ट्रस्य सैनिका: । मिथ: संकथयाज्चक्रुरेषो हि कुलपांसन:,श्रीकृष्ण एवं भाइयोंसहित युधिछ्िरका भीष्मको प्रणाम करके उनसे युद्धके लिये आज्ञा माँगना युधिष्ठिरको दूरसे ही देखकर दुर्योधनके सैनिक आपसमें इस प्रकार बातचीत करने लगे --“यह युधिष्ठिर तो अपने कुलका जीता-जागता कलंक ही है

Seeing Yudhiṣṭhira from afar, the soldiers of Dhṛtarāṣṭra began speaking among themselves: “This man is truly the living disgrace of his lineage.” The remark reflects the Kaurava camp’s moral contempt and propaganda—judging Yudhiṣṭhira’s conduct through the lens of factional honor and perceived weakness, even as the war’s ethical stakes intensify.

Verse 27

व्यक्त भीत इवाभ्येति राजासौ भीष्ममन्तिकम्‌ | युधिष्ठटिर: ससोदर्य: शरणार्थ प्रयाचक:,“देखो, स्पष्ट ही दिखायी दे रहा है कि वह राजा युधिष्ठिर भयभीतकी भाँति भाइयोंसहित भीष्मजीके निकट शरण माँगनेके लिये आ रहा है

Sañjaya said: “Look—clearly visible, that king Yudhiṣṭhira is approaching Bhīṣma at close range, as if overcome by fear. Accompanied by his brothers, he comes as a supplicant, seeking refuge.”

Verse 28

धनंजये कथं नाथे पाण्डवे च वृकोदरे | नकुले सहदेवे च भीतिरभ्येति पाण्डवम्‌,'पाण्डुनन्दन धनंजय, वृकोदर भीम तथा नकुल-सहदेव-जैसे सहायकोंके रहते हुए युधिष्ठिरके मनमें भय कैसे हो गया!

Sañjaya said: “How could fear arise in the heart of the Pāṇḍava (Yudhiṣṭhira) when Dhanañjaya Arjuna stands as his lordly protector, and when Vṛkodara Bhīma, along with Nakula and Sahadeva, are present as his steadfast allies?”

Verse 29

न नून॑ क्षत्रियकुले जात: सम्प्रथिते भुवि । यथास्य हृदयं भीतमल्पसत्त्वस्य संयुगे,“निश्चय ही यह भूमण्डलमें विख्यात क्षत्रियोंके कुलमें उत्पन्न नहीं हुआ है। इसका मानसिक बल अत्यन्त अल्प है; इसीलिये युद्धके अवसरपर इसका हृदय इतना भयभीत है!

Sanjaya said: “Surely he was not born in a renowned Kshatriya lineage celebrated upon the earth; for in the very hour of battle his heart is so frightened—his inner strength is exceedingly small.”

Verse 30

ततस्ते सैनिका: सर्वे प्रशंसन्ति सम कौरवान्‌ | हृष्टा: सुमनसो भूत्वा चैलानि दुधुवुश्च ह,तदनन्तर वे सब सैनिक कौरवोंकी प्रशंसा करने लगे और प्रसन्नचित्त हो हर्षमें भरकर अपने कपड़े हिलाने लगे

Then all those soldiers began praising the Kauravas. Delighted and of cheerful mind, they were filled with exhilaration and waved their garments—an outward sign of approval and rising morale amid the tensions of war.

Verse 31

व्यनिन्दश्न॒ तथा सर्वे योधास्तव विशाम्पते । युधिष्ठिरं ससोदर्य सहितं केशवेन हि,प्रजानाथ! आपके वे सब योद्धा भाइयों तथा श्रीकृष्णसहित युधिष्ठिरकी विशेषरूपसे निन्‍्दा करते थे

Sanjaya said: O lord of the people, O ruler of men, all your warriors were likewise speaking in blame—censuring Yudhiṣṭhira, together with his brothers, and even with Keśava (Kṛṣṇa) beside him. The scene underscores how, in the heat of war, partisan judgment and moral denunciation are used as weapons, turning ethical critique into a tool of hostility against the opposing side’s leadership and counsel.

Verse 32

ततस्तत्‌ कौरवं सैन्यं धिक्‌कृत्वा तु युधिष्ठिरम्‌ नि:शब्दम भवत्‌ तूर्ण पुनरेव विशाम्पते,राजन! इस प्रकार युधिष्ठिरको धिक्कार देकर सारी कौरव-सेना पुनः शीघ्र ही चुप हो गयी

Sañjaya said: Then the Kaurava host, having reviled Yudhiṣṭhira with cries of contempt, quickly fell silent again, O lord of the people. The moment captures how, amid the moral strain of war, collective emotion surges into harsh judgment and then subsides—hinting at the uneasy conscience and volatile discipline of an army facing dharma’s complexities on the battlefield.

Verse 33

कि नु वक्ष्यति राजासौ कि भीष्म: प्रतिवक्ष्यति । कि भीम: समरश्लाघी कि नु कृष्णार्जुनाविति,सब लोग मन-ही-मन सोचने लगे कि वह राजा क्‍या कहेगा और भीष्मजी क्‍या उत्तर देंगे? युद्धकी शलाघा रखनेवाले भीमसेन तथा श्रीकृष्ण और अर्जुन भी क्‍या कहेंगे?

Sañjaya said: “What, indeed, will that king say? What will Bhīṣma reply? What will Bhīma—who prides himself on battle—say? And what, indeed, will Kṛṣṇa and Arjuna say?” Thus, all present began to ponder inwardly, anticipating the words and counsels that would shape the course of the war and the demands of duty.

Verse 34

विवक्षितं किमस्येति संशय: सुमहान भूत्‌ । उभयो: सेनयो राजन्‌ युधिष्िरकृते तदा,राजन! दोनों ही सेनाओंमें युधिष्ठिरके विषयमें महान्‌ संशय उत्पन्न हो गया था। सब सोचते थे कि राजा युधिष्िर क्या कहना चाहते हैं

Sañjaya said: “A very great doubt arose—‘What is it that he intends to say?’ O King. At that time, in both armies, uncertainty spread regarding Yudhiṣṭhira, as all wondered what the righteous king meant to declare.”

Verse 35

सो<वगाहा चमूं शत्रो: शरशक्तिसमाकुलाम्‌ | भीष्ममेवाभ्ययात्‌ तूर्ण भ्रातृभि: परिवारित:,बाण और शक्तियोंसे भरी हुई शत्रुकी सेनामें घुसकर भाइयोंसे घिरे हुए युधिष्छिर तुरंत ही भीष्मजीके पास जा पहुँचे

Sañjaya said: Having plunged into the enemy host, thick with arrows and spears, Yudhiṣṭhira—surrounded by his brothers—swiftly advanced straight toward Bhīṣma. The moment underscores a dharmic tension: the king, bound by duty to protect his side and uphold righteous order, is nevertheless compelled to confront an elder and revered guardian of the Kuru line amid the brutal necessities of war.

Verse 36

तमुवाच तत:ः पादौ कराभ्यां पीड्य पाण्डव: । भीष्मं शान्तनवं राजा युद्धाय समुपस्थितम्‌,वहाँ जाकर उन पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने दोनों हाथोंसे पितामहके चरणोंको दबाया और युद्धके लिये उपस्थित हुए उन शान्तनुनन्दन भीष्मसे इस प्रकार कहा

Sañjaya said: Then the Pāṇḍava king, pressing the grandsire’s feet with both hands in reverence, addressed Bhīṣma, the son of Śantanu, who stood ready for battle. The scene underscores the ethical tension of war: even as conflict becomes inevitable, the warrior-king upholds dharma through humility, respect for elders, and seeking rightful consent or blessing before engaging in violence.

Verse 37

॥6५ ५4 बट .$| /५ | पु सन धप बज ५ ; कक १५. सी लि लॉ टि्ट ्िि ह/ हट 22205 ५ डे युधिष्ठिर उदाच आमन्त्रये त्वां दुर्धर्ष त्वया योत्स्यामहे सह । अनुजानीहि मां तात आशिषश्ल प्रयोजय,युधिष्ठिर बोले--दुर्धर्ष वीर पितामह! मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ, मुझे आपके साथ युद्ध करना है। तात! इसके लिये आप मुझे आज्ञा और आशीर्वाद प्रदान करें

Yudhiṣṭhira said: “O unconquerable grandsire, I take leave of you. We must now fight with you. O revered father-figure, grant me your permission, and strengthen me with your blessings.”

Verse 38

भीष्म उवाच यद्येवं नाभिगच्छेथा युधि मां पृथिवीपते । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय भारत,भीष्मजी बोले--पृथ्वीपते! भरतकुलनन्दन! महाराज! यदि इस युद्धके समय तुम इस प्रकार मेरे पास नहीं आते तो मैं तुम्हें पराजित होनेके लिये शाप दे देता

Bhīṣma said: “O lord of the earth, O scion of Bharata, O great king—if, in this battle, you had not come to face me in this manner, I would have pronounced a curse upon you, that you should meet with defeat.”

Verse 39

प्रीतो&हं पुत्र युध्यस्व जयमाप्रुहि पाण्डव । यत्‌ तेडभिलषितं चान्यत्‌ तदवाप्रुहि संयुगे,पाण्डुनन्दन! पुत्र! अब मैं प्रसन्न हूँ और तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम युद्ध करो और विजय पाओ। इसके सिवा और भी जो तुम्हारी अभिलाषा हो, वह इस युद्धभूमिमें प्राप्त करो

Bhishma said: “My son, I am pleased. Fight on, O Pandava, and attain victory. And whatever other desire you cherish—fulfil that too here in the battle, O joy of Pandu’s line.”

Verse 40

व्रियतां च वर: पार्थ किमस्मत्तो5भिकड्क्षसि । एवंगते महाराज न तवास्ति पराजय:,पार्थ! वर माँगो। तुम मुझसे क्या चाहते हो? महाराज! ऐसी स्थितिमें तुम्हारी पराजय नहीं होगी

Bhīṣma said: “O Pārtha, choose a boon—what do you desire from me? O great king, now that matters have come to this, there will be no defeat for you.” In the ethical frame of the epic, Bhīṣma—bound by his vow yet committed to kṣatriya-dharma—acknowledges the decisive turn of events and offers a boon as a final, duty-bound concession to the rightful claimant of victory.

Verse 41

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थों न कस्यचित्‌ । इति सत्यं महाराज बद्धो<स्म्यर्थेन कौरवै:,महाराज! पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ

Bhishma said: “A man becomes the servant of wealth; wealth is servant to no one. This, O great king, is the truth. Bound by wealth—by the Kauravas’ obligations and patronage—I find myself constrained.”

Verse 42

भीष्मपर्वणि तु द्विचत्वारिंशोडध्याय:,भीष्मपर्वमें बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ अतत्त्वां क्लीबवद्‌ वाक्‍्यं ब्रवीमि कुरुनन्दन । भृतो<स्म्यर्थेन कौरव्य युद्धादन्‍यत्‌ किमिच्छसि कुरुनन्दन! इसीलिये आज मैं तुम्हारे सामने नपुंसकके समान वचन बोलता हूँ। कौरव! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने धनके द्वारा मेरा भरण-पोषण किया है; इसलिये (तुम्हारे पक्षमें होकर) उनके साथ युद्ध करनेके अतिरिक्त तुम क्या चाहते हो, यह बताओ

Sanjaya said: “O joy of the Kurus, I speak words that are not truly worthy—like those of a coward. O son of Kuru, I have been maintained by the Kauravas with their wealth; therefore, apart from fighting on their side, what else do you want me to do? Tell me.”

Verse 43

धृतराष्ट्र: श्लोकमेकं॑ गीताया मानमुच्यते । इस गीतामें छः सौ बीस श्लोक भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहे हैं, सत्तावन श्लोक अर्जुनके कहे हुए हैं, सड़सठ श्लोक संजयने कहे हैं और एक श्लोक धृतराष्ट्रका कहा हुआ है। यह गीताका मान बताया जाता है,युधिछिर उवाच मन्त्रयस्व महाबाहो हितैषी मम नित्यश: । युध्यस्व कौरवस्यार्थे ममैष सततं वर: युधिष्ठिर बोले--महाबाहो! आप सदा मेरा हित चाहते हुए मुझे अच्छी सलाह दें और दुर्योधनके लिये युद्ध करें। मैं सदाके लिये यही वर चाहता हूँ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्पादिसम्मानने त्रिचत्वारिंशो 5ध्याय:

Vaiśampāyana said: “Dhṛtarāṣṭra’s single verse is counted in the measure of the Gītā.” Thus the traditional reckoning of the Bhagavad Gītā’s verses is stated. Yudhiṣṭhira said: “O mighty-armed one, ever wishing my welfare, counsel me continually; and fight for the cause of the Kaurava (Duryodhana). This is the boon I desire always.” (Here the narrative frames a formal counting of the Gītā’s speakers and then presents Yudhiṣṭhira’s request, highlighting the tension between personal loyalty, political alignment, and the ethical weight of counsel and warfare.)

Verse 44

भीष्म उवाच राजन्‌ किमत्र साहां ते करोमि कुरुनन्दन । काम योत्स्ये परस्यार्थे ब्रूहि यत्‌ ते विवक्षितम्‌,भीष्म बोले--राजन्‌! कुरुनन्दन! मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? युद्ध तो मैं इच्छानुसार तुम्हारे शत्रुकी ओरसे ही करूँगा; अतः बताओ, तुम क्‍या कहना चाहते हो?

Verse 45

युधिछिर उवाच कथं जयेय॑ संग्रामे भवनन्‍्तमपराजितम्‌ । एतन्मे मन्त्रय हित॑ यदि श्रेय: प्रपश्यसि,युधिष्ठिर बोले--पितामह! आप तो किसीसे पराजित होनेवाले हैं नहीं, फिर मैं आपको युद्धमें कैसे जीत सकूँगा? यदि आप मेरा कल्याण देखते और सोचते हैं तो मेरे हितकी सलाह दीजिये

Verse 46

भीष्म उवाच नैनं पश्यामि कौन्तेय यो मां युध्यन्तमाहवे । विजयेत पुमान्‌ कश्रित्‌ साक्षादपि शतक्रतु:,भीष्मने कहा--कुन्तीनन्दन! मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो संग्रामभूमिमें युद्ध करते समय मुझे पराजित कर सके। युद्धकालमें कोई पुरुष, साक्षात्‌ इन्द्र ही क्‍यों न हो, मुझे परास्त नहीं कर सकता

Bhishma said: “O son of Kunti, I do not see any man who could defeat me while I am fighting on the battlefield. In the time of war, no person can overcome me—not even Śatakratu (Indra) himself, were he to stand before me.”

Verse 47

युधिछिर उवाच हन्त पृच्छामि तस्मात्‌ त्वां पितामह नमोस्तु ते । वधोपायं ब्रवीहि त्वमात्मन: समरे परै:,युधिष्ठिर बोले--पितामह! आपको नमस्कार है। इसलिये अब मैं आपसे पूछता हूँ, आप युद्धमें शत्रुओंद्वारा अपने मारे जानेका उपाय बताइये

Yudhiṣṭhira said: “Well then, I ask you—O Grandfather, my salutations to you. Tell me the means by which, in battle, you may be brought down by the enemy.”

Verse 48

भीष्म उवाच न सम तं तात पश्यामि समरे यो जयेत माम्‌ | न तावन्मृत्युकालो5पि पुनरागमनं कुरु,भीष्म बोले--बेटा! जो समरभूमिमें मुझे जीत ले, ऐसे किसी वीरको मैं नहीं देखता हूँ। अभी मेरा मृत्युकाल भी नहीं आया है; अतः अपने इस प्रश्नका उत्तर लेनेके लिये फिर कभी आना

Bhishma said: “My dear son, I do not see anyone on the battlefield who could defeat me in combat. Nor has my appointed time of death yet arrived; therefore, come again later to obtain the answer to your question.”

Verse 49

संजय उवाच ततो युधिष्ठिरो वाक्‍्यं भीष्मस्य कुरुनन्दन । शिरसा प्रतिजग्राह भूयस्तमभिवाद्य च,संजय बोले--कुरुनन्दन! तदनन्तर महाबाहु युधिष्ठिरने भीष्मकी आज्ञाको शिरोधार्य किया और पुनः उन्हें प्रणाम करके वे द्रोणाचार्यके रथकी ओर गये। सारी सेना देख रही थी और वे उसके बीचसे होकर भाइयोंसहित द्रोणाचार्यके पास जा पहुँचे। वहाँ राजाने उन्हें प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और उन दुर्जय वीर-शिरोमणिसे अपने हितकी बात पूछी »“»णः

Sañjaya said: Then Yudhiṣṭhira, O delight of the Kurus, accepted Bhīṣma’s words with bowed head. Having once again paid him reverence, he proceeded onward—acting in humility and discipline, placing duty above pride even amid the pressures of war.

Verse 50

प्रायात्‌ पुनर्महाबाहुराचार्यस्य रथं प्रति । पश्यतां सर्वसैन्यानां मध्येन भ्रातृभि: सह,संजय बोले--कुरुनन्दन! तदनन्तर महाबाहु युधिष्ठिरने भीष्मकी आज्ञाको शिरोधार्य किया और पुनः उन्हें प्रणाम करके वे द्रोणाचार्यके रथकी ओर गये। सारी सेना देख रही थी और वे उसके बीचसे होकर भाइयोंसहित द्रोणाचार्यके पास जा पहुँचे। वहाँ राजाने उन्हें प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और उन दुर्जय वीर-शिरोमणिसे अपने हितकी बात पूछी »“»णः

Sañjaya said: Then the mighty-armed (king) set out again toward the chariot of the Teacher (Droṇa). While all the armies looked on, he proceeded through their midst together with his brothers—an act that publicly displayed humility and adherence to rightful conduct even on the brink of battle.

Verse 51

स द्रोणमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम्‌ । उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनि:श्रेयसं वच:,संजय बोले--कुरुनन्दन! तदनन्तर महाबाहु युधिष्ठिरने भीष्मकी आज्ञाको शिरोधार्य किया और पुनः उन्हें प्रणाम करके वे द्रोणाचार्यके रथकी ओर गये। सारी सेना देख रही थी और वे उसके बीचसे होकर भाइयोंसहित द्रोणाचार्यके पास जा पहुँचे। वहाँ राजाने उन्हें प्रणाम करके उनकी परिक्रमा की और उन दुर्जय वीर-शिरोमणिसे अपने हितकी बात पूछी »“»णः

Sañjaya said: Then the king approached Droṇa, paid him reverence, and circumambulated him in respect. Having thus honored that unconquerable master of arms, he spoke words seeking what would be truly beneficial for his own highest good—placing duty and right conduct above pride even amid the press of war.

Verse 52

# 2 (से ही पर हिल /[]00 ५५५ ' आमन्त्रये त्वां भगवन्‌ योत्स्ये विगतकल्मष: । कथं जये रिपून्‌ सर्वाननुज्ञातस्त्वया द्विज,“भगवन्‌! मैं सलाह पूछता हूँ, किस प्रकार आपके साथ निरपराध एवं पापरहित होकर युद्ध करूँगा? विप्रवर! आपकी आज्ञासे मैं समस्त शत्रुओंको किस प्रकार जीतू?”

Sañjaya said: “O Blessed one, I seek your counsel. How may I fight, free from stain and wrongdoing? O best of Brahmins, once permitted by you, how shall I conquer all these enemies?”

Verse 53

द्रोण उवाच यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चय: । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय सर्वश:,द्रोणाचार्य बोले--महाराज! यदि युद्धका निश्चय कर लेनेपर तुम मेरे पास नहीं आते तो मैं तुम्हारी सर्वथा पराजय होनेके लिये तुम्हें शाप दे देता

Droṇa said: “O great king, if—having resolved upon battle—you did not come to me, I would have pronounced a curse upon you, ensuring your complete defeat.”

Verse 54

तत्‌ युधिष्ठिर तुष्टोडस्मि पूजितश्न त्वयानघ । अनुजानामि युध्यस्व विजयं समवाप्रुहि,निष्पाप युधिष्ठिर! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुमने मेरा बड़ा आदर किया। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, शत्रुओंसे लड़ो और विजय प्राप्त करो

Droṇa said: “O Yudhiṣṭhira, blameless one, I am pleased. You have honored me greatly. I grant you leave—go forth and fight; attain victory. O sinless Yudhiṣṭhira.”

Verse 55

करवाणि च ते काम ब्रूहि त्वमभिकड्क्षितम्‌ । एवंगते महाराज युद्धादन्‍यत्‌ किमिच्छसि,महाराज! मैं तुम्हारी कामना पूर्ण करूँगा। तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ क्या है? वर्तमान परिस्थितिमें मैं तुम्हारी ओरसे युद्ध तो कर नहीं सकता; उसे छोड़कर तुम बताओ, क्या चाहते हो?

Droṇa said: “I will fulfill your desire—tell me what you truly long for. Now that matters have come to this, O great king, I cannot fight on your behalf; setting battle aside, tell me what else you wish.”

Verse 56

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थों न कस्यचित्‌ । इति सत्यं महाराज बद्धो<स्म्यर्थेन कौरवै:,पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ

Droṇa said: “A man becomes the servant of wealth; wealth, however, is servant to no one. This is the truth, O great king. It is by wealth—by the obligations it creates—that I have been bound by the Kauravas.”

Verse 57

ब्रवीम्येतत्‌ क्लीबवत्‌ त्वां युद्धादन्‍यत्‌ किमिच्छसि । योत्स्ये5हं कौरवस्यार्थ तवाशास्यो जयो मया,इसीलिये आज नपुंसककी तरह तुमसे पूछता हूँ कि तुम युद्धके सिवा और क्या चाहते हो? मैं दुर्योधनके लिये युद्ध करूँगा; परंतु जीत तुम्हारी ही चाहूँगा

Droṇa said: “I say this to you—almost as one would question an impotent man: apart from battle, what else do you desire? I will fight for the Kaurava cause; yet the victory I wish for is yours.”

Verse 58

युधिषछ्िर उवाच जयमाशास्व मे ब्रह्मन्‌ मन्त्रयस्व च मद्धितम्‌ । युद्धयस्व कौरवस्यार्थे वर एब वृतो मया,युधिष्ठिर बोले--ब्रह्म! आप मेरी विजय चाहें और मेरे हितकी सलाह देते रहें; युद्ध दुर्योधनकी ओरसे ही करें। यही वर मैंने आपसे माँगा है

Yudhiṣṭhira said: “O Brahmin, wish me victory and continue to counsel what is for my welfare. Yet fight on the Kauravas’ side—this alone is the boon I have chosen from you.”

Verse 59

द्रोण उवाच ध्रुवस्ते विजयो राजन्‌ यस्य मन्त्री हरिस्तव । अहं त्वामभिजानामि रणे शत्रून्‌ विमोक्ष्यसे,द्रोणाचार्यने कहा--राजन्‌! तुम्हारी विजय तो निश्चित है; क्योंकि साक्षात्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण तुम्हारे मन्त्री हैं। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम युद्धमें शत्रुओंको उनके प्राणोंसे विमुक्त कर दोगे

Droṇa said: “O King, your victory is assured, for Hari (Śrī Kṛṣṇa) himself is your counsellor. I know your true mettle; in battle you will release your enemies from life.” The statement frames martial success as grounded not merely in force but in righteous guidance, while also revealing the grim ethic of war where ‘liberation’ can mean death dealt in combat.

Verse 60

यतो धर्मस्तत: कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जय: । युद्धयस्व गच्छ कौन्तेय पृच्छ मां कि ब्रवीमि ते,जहाँ धर्म है, वहाँ श्रीकृष्ण हैं और जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है। कुन्तीकुमार! जाओ, युद्ध करो। और भी पूछो, तुम्हें क्या बताऊँ?

Wherever dharma stands, there stands Kṛṣṇa; and wherever Kṛṣṇa stands, there is victory. Therefore, O son of Kuntī, go forth and fight. Ask further if you wish—what more can I tell you?

Verse 61

युधिछिर उवाच पृच्छामि व्वां द्विजश्रेष्ठ शृणु यन्मेडभिकाड्क्षितम्‌ । कथं जयेय॑ संग्रामे भवन्‍तमपराजितम्‌,युधिष्ठिर बोले--द्विजश्रेष्ठ)! मैं आपसे पूछता हूँ। आप मेरे मनोवांछित प्रश्नको सुनिये। आप किसीसे भी परास्त होनेवाले नहीं हैं; फिर आपको मैं युद्धमें कैसे जीत सकूँगा?

Yudhiṣṭhira said: “I ask you, O best of the twice-born; listen to what I long to know. Since you are one who cannot be defeated by anyone, how could I ever overcome you in battle?”

Verse 62

द्रोण उवाच न ते5स्ति विजयस्तावद्‌ यावत्‌ युद्धयाम्यहं रणे । ममाशु निधने राजन्‌ यतस्व सह सोदरै:,द्रोणाचार्य बोले--राजन्‌! मैं जबतक समरभूमिमें युद्ध करूँगा, तबतक तुम्हारी विजय नहीं हो सकती। तुम अपने भाइयोंसहित ऐसा प्रयत्न करो, जिससे शीघ्र मेरी मृत्यु हो जाय

Droṇa said: “O King, so long as I continue to fight on the battlefield, victory will not be yours. Therefore, together with your brothers, strive in such a way that my death may come swiftly.”

Verse 63

युधिषछ्िर उवाच हन्त तस्मान्महाबाहो वधोपायं वदात्मन: । आचार्य प्रणिपत्यैष पृच्छामि त्वां नमो<स्तु ते,युधिष्ठिर बोले--महाबाहु आचार्य! इसलिये अब आप अपने वधका उपाय मुझे बताइये। आपको नमस्कार है। मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करके यह प्रश्न कर रहा हूँ

Yudhiṣṭhira said: “Well then, O mighty-armed teacher—therefore tell me the means by which you may be slain. I ask you this only after bowing down at your feet; salutations to you.”

Verse 64

द्रोण उदाच न शत्रुं तात पश्यामि यो मां हन्याद्‌ रथे स्थितम्‌ | युध्यमानं सुसंरब्धं शरवर्षोघवर्षिणम्‌,द्रोणाचार्य बोले--तात! जब मैं रथपर बैठकर कुपित हो बाणोंकी वर्षा करते हुए युद्धमें संलग्न रहूँ, उस समय जो मुझे मार सके, ऐसे किसी शत्रुकी नहीं देख रहा हूँ

Droṇa said: “Dear child, I do not see any enemy who could slay me while I stand upon my chariot—engaged in battle, fiercely aroused, and pouring forth a torrent of arrows like a rainstorm.” In context, the statement expresses the warrior’s confidence and pride in martial prowess, highlighting how self-assurance on the battlefield can harden resolve and intensify the ethical tension of war, where skill and anger together magnify destruction.

Verse 65

ऋते प्रायगतं राजन्‌ न्यस्तशस्त्रमचेतनम्‌ । हन्यान्मां युधि योधानां सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,राजन! जब मैं हथियार डालकर अचेत-सा होकर आमरण अनशनके लिये बैठ जाऊँ, उस अवस्थाको छोड़कर और किसी समय कोई मुझे नहीं मार सकता। उसी अवस्थामें कोई श्रेष्ठ योद्धा युद्धमें मुझे मार सकता है; यह मैं तुमसे सच्ची बात कह रहा हूँ

O King, except when I have taken up the vow of fasting unto death—having laid aside my weapons and sitting as one insensible—no one can slay me. Only in that condition could some foremost warrior kill me in battle. This I tell you as the truth.

Verse 66

शस्त्र चाहं रणे जहां श्रुत्वा तु महदप्रियम्‌ । श्रद्धेयवाक्यात्‌ पुरुषादेतत्‌ सत्यं ब्रवीमि ते,यदि मैं किसी विश्वसनीय पुरुषसे युद्ध-भूमिमें कोई अत्यन्त अप्रिय समाचार सुन लूँ तो हथियार नीचे डाल दूँगा। यह मैं तुमसे सच्ची बात कह रहा हूँ

Yudhiṣṭhira said: “If, on the battlefield, I were to hear some exceedingly unwelcome news from a man whose word is trustworthy, I would lay down my weapons. This I tell you as the truth.”

Verse 67

संजय उवाच एतच्छुत्वा महाराज भारद्वाजस्य धीमत: । अनुमान्य तमाचार्य प्रायाच्छारद्वतं प्रति,संजय कहते हैं--महाराज! परम बुद्धिमान्‌ द्रोणाचार्युकी यह बात सुनकर उनका सम्मान करके राजा युधिष्ठिर कृपाचार्यके पास गये

Sañjaya said: O King, having heard these words of the wise son of Bhāradvāja (Droṇa), the teacher respectfully assented to him and then went toward Śāradvata (Kṛpa). The scene underscores the ethic of honoring counsel and maintaining proper decorum among elders and preceptors even amid the pressures of war.

Verse 68

सो5भिवाद्य कृपं राजा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्‌ । उवाच दुर्धर्षतमं वाक्‍्यं वाक्यविदां वर:,उन्हें नमस्कार करके उनकी परिक्रमा करनेके पश्चात्‌ वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने दुर्धर्ष वीर कृपाचार्यसे कहा--

Having respectfully saluted Kṛpa and also circumambulated him, King Yudhiṣṭhira—foremost among skilled speakers—addressed the most unassailable Kṛpācārya with words that were difficult to withstand. The scene underscores the ethic of honoring elders and teachers even amid the harsh necessities of war, where right conduct (maryādā) must be preserved alongside strategic speech.

Verse 69

है! ५! ).04 अनुमानये त्वां योत्स्येडहं गुरो विगतकल्मष: । जयेयं च रिपून्‌ सर्वाननुज्ञातस्त्वयानघ,“निष्पाप गुरुदेव! मैं पापरहित रहकर आपके साथ युद्ध कर सकूँ, इसके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। आपका आदेश पाकर मैं समस्त शत्रुओंको संग्राममें जीत सकता हूँ”

Sañjaya said: “O Guru, I seek your consent so that I may fight while remaining free from moral taint. If you, O blameless one, grant me permission, I shall be able to conquer all enemies in battle.” The verse frames warfare as ethically weighty, presenting the disciple’s request for authorization as a means to align action with dharma and to avoid culpability.

Verse 70

कृप उवाच यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चय: । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय सर्वश:,कृपाचार्य बोले--महाराज! यदि युद्धका निश्चय कर लेनेपर तुम मेरे पास नहीं आते तो मैं तुम्हारी सर्वथा पराजय होनेके लिये तुम्हें शाप दे देता

Kṛpa said: “O great king, if—after resolving upon war—you did not come to me, I would have cursed you to utter defeat.”

Verse 71

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्‌ | इति सत्यं महाराज बद्धो<स्म्यर्थेन कौरवै:,पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ

Kripa said: “A man becomes the servant of wealth; wealth, however, is servant to no one. This, O great king, is the truth. I am bound by wealth—held fast by the Kauravas through their patronage and obligations—so I cannot act as I might otherwise choose.”

Verse 72

तेषामर्थ महाराज योद्धव्यमिति मे मतिः । अतत्त्वां क्लीबवद्‌ ब्रूयां युद्धादन्‍्यत्‌ किमिच्छसि,महाराज! मैं निश्चय कर चुका हूँ कि मुझे उन्हींके लिये युद्ध करना है; अतः तुमसे नपुंसककी तरह पूछ रहा हूँ कि तुम युद्धसम्बन्धी सहयोगको छोड़कर मुझसे और क्‍या चाहते हो?

O great king, my settled judgment is that I must fight for their sake. Therefore, I ask you—almost like a coward—what else do you want from me, apart from assistance in this war?

Verse 73

युधिछिर उवाच हन्त पृच्छामि ते तस्मादाचार्य शृणु मे वच: । इत्युक्त्वा व्यथितो राजा नोवाच गतचेतन:,युधिष्ठिर बोले--आचार्य! इसलिये अब मैं आपसे पूछता हूँ। आप मेरी बात सुनिये। इतना कहकर राजा युधिष्ठिर व्यथित और अचेत-से होकर उनसे कुछ भी बोल न सके

Yudhiṣṭhira said: “Well then, therefore I ask you, O teacher—listen to my words.” Having said this, the king, shaken with anguish and as though bereft of consciousness, could speak no further. The moment frames a moral crisis: even a righteous ruler, facing the weight of war and duty, can be overwhelmed before he can fully articulate his question.

Verse 74

संजय उवाच त॑ गौतम: प्रत्युवाच विज्ञायास्य विवक्षितम्‌ । अवध्यो5हं महीपाल युद्धयस्व जयमाप्रुहि,संजय कहते हैं--पृथ्वीपते! कृपाचार्य यह समझ गये कि युधिष्ठछिर क्या कहना चाहते हैं; अतः उन्होंने उनसे इस प्रकार कहा--'राजन! मैं अवध्य हूँ। जाओ, युद्ध करो और विजय प्राप्त करो”

Verse 75

प्रीतस्तेडभिगमेनाहं जयं तव नराधिप । आशासिष्ये सदोत्थाय सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते,“नरेश्वर! तुम्हारे इस आगमनसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है; अतः: सदा उठकर मैं तुम्हारी विजयके लिये शुभकामना करूँगा। यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ

Sañjaya said: “O king, I am delighted by your coming. Rising each day, I shall continually offer blessings for your victory. This I tell you in truth.”

Verse 76

एतच्छुत्वा महाराज गौतमस्य विशाम्पते | अनुमान्य कृपं राजा प्रययौ येन मद्रराट्‌,महाराज! प्रजानाथ! कृपाचार्यकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर उनकी अनुमति ले जहाँ मद्रराज शल्य थे, उस ओर चले गये

Sañjaya said: “O great king, O lord of the people, having heard these words of Gautama, King Yudhiṣṭhira—after respectfully taking Kṛpa’s assent—set out toward the place where the Madra king Śalya was.”

Verse 77

स शल्यमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम्‌ । उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनि:श्रेयसं वच:,दुर्जय वीर शल्यको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा करनेके पश्चात्‌ राजा युधिष्ठिरने उनसे अपने हितकी बात कही--

Sañjaya said: Having respectfully saluted Śalya and then circumambulated him in reverence, King Yudhiṣṭhira addressed him with words aimed at his own highest good—seeking counsel and support in a situation that was difficult to overcome amid the moral strain of war.

Verse 78

9॥ 00 )५200 0 30, :॥2:9 07 छल हम करन 477 | हा कि १ एू हक्छा अनुमानये त्वां दुर्धर्ष योत्स्ये विगतकल्मष: । जयेयं नु परान्‌ राजन्ननुज्ञातस्त्वया रिपून्‌,“दुर्धर्ष वीर! मैं पापरहित एवं निरपराध रहकर आपके साथ युद्ध करूँगा; इसके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। राजन! आपकी आज्ञा पाकर मैं समस्त शत्रुओंको युद्धमें परास्त कर सकता हूँ

Sañjaya said: “O unconquerable hero, I ask your permission: free from sin and blame, I will fight. O King, once authorized by you, I am confident I can defeat the enemy foes.” The utterance frames warfare as an act requiring rightful sanction and inner moral clarity, emphasizing that even martial prowess seeks legitimacy through the king’s consent and the warrior’s freedom from wrongdoing.

Verse 79

शल्य उवाच यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चय: । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय वै रणे,शल्य बोले--महाराज! यदि युद्धका निश्चय कर लेनेपर तुम मेरे पास नहीं आते तो मैं युद्धमें तुम्हारी पराजयके लिये तुम्हें शाप दे देता

Śalya said: “O great king, if—after resolving upon battle—you had not come to me, I would have pronounced a curse upon you, that you should meet defeat in the fight.”

Verse 80

तुष्टोडस्मि पूजितश्लास्मि यत्‌ काड्क्षसि तदस्तु ते । अनुजानामि चैव त्वां युध्यस्व जयमाप्नुहि,अब मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुमने मेरा बड़ा सम्मान किया। तुम जो चाहते हो, वह पूर्ण हो। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम युद्ध करो और विजय प्राप्त करो

Shalya said: “I am satisfied, and I feel honored by the respect you have shown me. May whatever you desire come to pass for you. I grant you leave—go forth, fight, and attain victory.”

Verse 81

ब्रूहि चैव परं वीर केनार्थ: कि ददामि ते । एवंगते महाराज युद्धादन्‍्यत्‌ किमिच्छसि,वीर! तुम कुछ और बताओ, किस प्रकार तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा? मैं तुम्हें क्या दूँ? महाराज! इस परिस्थितिमें युद्धवेिषयक सहयोगको छोड़कर तुम मुझसे और क्या चाहते हो?

Shalya said: “Speak plainly, O hero—what is it you seek, and what shall I give you? O great king, now that matters have come to this, apart from aid in war, what else do you desire from me?”

Verse 82

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थों न कस्यचित्‌ । इति सत्यं महाराज बद्धो<स्म्यर्थेन कौरवै:,पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। कौरवोंके द्वारा मैं अर्थसे बँधा हुआ हूँ

Śalya said: “A man becomes the servant of wealth; wealth is the servant of no one. This, O great king, is the truth. It is by wealth that I have been bound—by the Kauravas.”

Verse 83

करिष्यामि हि ते काम॑ भागिनेय यथेप्सितम्‌ । ब्रवीम्यत: क्लीबवत्‌ त्वां युद्धादन्‍यत्‌ किमिच्छसि,इसलिये मैं तुमसे नपुंसककी भाँति कह रहा हूँ। बताओ, तुम युद्धविषयक सहयोगके सिवा और क्‍या चाहते हो? मेरे भानजे! मैं तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करूँगा

Śalya said: “I will indeed fulfill your desire, nephew, exactly as you wish. Yet I speak to you as one would to a coward: apart from assistance in this war, what else do you seek? Tell me—your wish shall be granted.”

Verse 84

युधिछिर उवाच मन्त्रयस्व महाराज नित्यं मद्धितमुत्तमम्‌ । काम युद्धय परस्यार्थे वरमेतं वृणोम्पहम्‌,युधिष्ठिर बोले--महाराज! मैं आपसे यही वर माँगता हूँ कि आप प्रतिदिन उत्तम हितकी सलाह मुझे देते रहें। अपने इच्छानुसार युद्ध दूसरेके लिये करें

Yudhiṣṭhira said: “O great king, counsel me every day with what is best for my welfare. And if you wish, fight for another’s sake; this is the boon I choose.”

Verse 85

शल्य उवाच किमत्र ब्रूहि साहां ते करोमि नृपसत्तम । काम योत्स्ये परस्यार्थे बद्धो<5स्म्यर्थेन कौरवै:,शल्य बोले--नृपश्रेष्ठ। बताओ, इस विषयमें मैं तुम्हारी क्या सहायता करूँ? कौरवोंके द्वारा मैं अर्थसे बँधा हुआ हूँ; अतः अपने इच्छानुसार युद्ध तो मैं तुम्हारे विपक्षीकी ओरसे ही करूँगा

Śalya said: “Tell me—what help can I render you here, O best of kings? Though I may wish otherwise, I am bound by the Kauravas through wealth and obligation; therefore I will fight, as I choose, on behalf of your opponent.”

Verse 86

युधिछिर उवाच स एव मे वर: शल्य उद्योगे यस्त्वया कृत: । सूतपुत्रस्य संग्रामे कार्यस्तेजोवधस्त्वया,(त्वां हि योक्ष्यति सूतत्वे सूतपुत्रस्य मातुल । दुर्योधनो रणे शूरमिति मे नैष्ठिकी मति: ।।) युधिष्ठिर बोले--मामाजी! जब युद्धके लिये उद्योग चल रहा था, उन दिनों आपने मुझे जो वर दिया था, वही वर आज भी मेरे लिये आवश्यक है। सूतपुत्रका अर्जुनके साथ युद्ध हो तो उस समय आपको उसका उत्साह नष्ट करना चाहिये। मामाजी! मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि उस युद्धमें दुर्योधन आप-जैसे शूरवीरको सूतपुत्रके सारथिका कार्य करनेके लिये अवश्य नियुक्त करेगा

Yudhiṣṭhira said: “O Śalya, the very boon you granted me during the preparations for war is what I now require. When the charioteer’s son enters battle, you must undermine his ardor. For I am firmly convinced, O maternal uncle, that in the fighting Duryodhana will appoint a hero like you to serve as the charioteer of the charioteer’s son.”

Verse 87

शल्य उवाच सम्पत्स्यत्येष ते काम: कुन्तीपुत्र यथेप्सितम्‌ । गच्छ युध्यस्व विश्रब्ध: प्रतिजाने वचस्तव,शल्य बोले--कुन्तीनन्दन! तुम्हारा यह अभीष्ट मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। जाओ, निश्चिन्त होकर युद्ध करो। मैं तुम्हारे वचनका पालन करनेकी प्रतिज्ञा करता हूँ

Śalya said: “O son of Kuntī, your wish shall indeed be fulfilled exactly as you desire. Go—fight with a calm and confident mind. I pledge to uphold your word.”

Verse 88

संजय उवाच अनुमान्याथ कौन्तेयो मातुलं मद्रकेश्वरम्‌ । निर्जगाम महासैन्याद्‌ भ्रातृभि: परिवारित:,संजय कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार अपने मामा मद्रराज शल्यकी अनुमति लेकर भाइयोंसे घिरे हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर उस विशाल सेनासे बाहर निकल गये

Sañjaya said: O King, having obtained the consent of his maternal uncle, Śalya—the lord of Madra—Kuntī’s son Yudhiṣṭhira, surrounded by his brothers, went out from that vast army. The moment underscores disciplined conduct in war: even amid urgency, he proceeds with due permission and with fraternal solidarity.

Verse 89

वासुदेवस्तु राधेयमाहवेडभिजगाम वै | तत एनमुवाचेदं पाण्डवार्थ गदाग्रज:,इसी समय भगवान्‌ श्रीकृष्ण उस युद्धमें राधानन्दन कर्णके पास गये। वहाँ जाकर उन गदाग्रजने पाण्डवोंके हितके लिये उससे इस प्रकार कहा--

Vāsudeva (Śrī Kṛṣṇa) indeed approached Rādheya (Karna) on the battlefield. Having come to him there, the elder brother of the wielder of the mace (Balarāma’s younger brother, Kṛṣṇa), intent on the welfare of the Pāṇḍavas, addressed him in these words.

Verse 90

श्रुतं मे कर्ण भीष्मस्य द्वेषात्‌ किल न योत्स्यसे । अस्मान्‌ वरय राधेय यावद्‌ भीष्मो न हन्यते,“कर्ण! मैंने सुना है, तुम भीष्मसे द्वेष होनेके कारण युद्ध नहीं करोगे। राधानन्दन! ऐसी दशामें जबतक भीष्म मारे नहीं जाते हैं, तबतक हमलोगोंका पक्ष ग्रहण कर लो

Sañjaya said: “Karna, I have heard that, out of enmity toward Bhīṣma, you will not fight. O son of Rādhā, then choose our side—at least until Bhīṣma is slain.” The line frames a moral tension within the Kaurava camp: personal rivalry and wounded honor are asked to yield to collective duty in war.

Verse 91

हते तु भीष्मे राधेय पुनरेष्यसि संयुगम्‌ । धार्तराष्ट्रस्य साहाय्यं यदि पश्यसि चेत्‌ समम्‌,'राधेय! जब भीष्म मारे जाय, उसके बाद तुम यदि ठीक समझो तो युद्धमें पुनः दुर्योधनकी सहायताके लिये चले आना”

Sañjaya said: “But when Bhīṣma has been slain, O Rādheya, you may return again to the battlefield—if you judge it proper and fitting to render aid to Dhṛtarāṣṭra’s son.”

Verse 92

कर्ण उवाच न विप्रियं करिष्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशव । त्यक्तप्राणं हि मां विद्धि दुर्योधनहितैषिणम्‌,कर्ण बोला--केशव! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं दुर्योधनका हितैषी हूँ। उसके लिये अपने प्राणोंको निछावर किये बैठा हूँ; अतः मैं उसका अप्रिय कदापि नहीं करूँगा

Karna said: “O Keśava, I will not do what is displeasing to the son of Dhṛtarāṣṭra. Know me as one who has already renounced his life—one wholly devoted to Duryodhana’s welfare.”

Verse 93

संजय उवाच तच्छुत्वा वचन कृष्ण: संन्यवर्तत भारत | युधिष्ठिरपुरोगैश्व पाण्डवै:ः सह संगत:,संजय कहते हैं--भारत! कर्णकी यह बात सुनकर श्रीकृष्ण लौट आये और युधिष्छिर आदि पाण्डवोंसे जा मिले

Sanjaya said: O Bharata, having heard Karna’s words, Krishna turned back and rejoined the Pandavas, with Yudhishthira at their head. The moment underscores Krishna’s measured restraint in diplomacy—after receiving the reply, he returns to his own side, leaving the moral weight of the decision to those who must choose between conciliation and war.

Verse 94

अथ सैन्यस्य मध्ये तु प्राक्रोशत्‌ पाण्डवाग्रज: । यो<स्मान्‌ वृणोति तमहं वरये साह्कारणात्‌,तदनन्तर ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरने सेनाके बीचमें खड़े होकर पुकारा--“जो कोई वीर सहायताके लिये हमारे पक्षमें आना स्वीकार करे, उसे मैं भी स्वीकार करूँगा”

Then, standing in the midst of the army, the eldest of the Pāṇḍavas cried aloud: “Whoever chooses to side with us, him I accept and choose in return—as an ally and support.”

Verse 95

अथ तान्‌ समभिप्रेक्ष्य युयुत्सुरिदमब्रवीत्‌ । प्रीतात्मा धर्मराजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्‌,उस समय आपके पुत्र युयुत्सुने पाण्डवोंकी ओर देखकर प्रसन्नचित्त हो धर्मराज कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा--

Then, looking closely at them (the Pāṇḍavas), Yuyutsu—his heart filled with gladness—spoke these words to Dharmarāja Yudhiṣṭhira, the son of Kuntī. The moment underscores a deliberate ethical alignment: he turns toward the side he recognizes as grounded in dharma and addresses its foremost exemplar.

Verse 96

अहं योत्स्यामि भवत: संयुगे धृतराष्ट्रजान्‌ । युष्मदर्थ महाराज यदि मां वृणुषेडनघ,“महाराज! निष्पाप नरेश! यदि आप मुझे स्वीकार करें तो मैं आपलोगोंके लिये युद्धमें धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे युद्ध करूँगा'

Sañjaya said: “I will fight the sons of Dhṛtarāṣṭra in battle on your behalf, O great king. If you, O sinless ruler, choose to accept me, then for your sake I shall enter the war against them.”

Verse 97

युधिछिर उवाच एह्ीहि सर्वे योत्स्यामस्तव भ्रातृनपण्डितान्‌ । युयुत्सो वासुदेवश्न वयं च ब्रूम सर्वश:,युधिष्ठिर बोले--युयुत्तो! आओ, आओ। हम सब लोग मिलकर तुम्हारे इन मूर्ख भाइयोंसे युद्ध करेंगे। यह बात हम और भगवान्‌ श्रीकृष्ण सभी कह रहे हैं

Yudhiṣṭhira said: “Come, come, all of you. We shall fight your unwise brothers. This is what Yuyutsu, Vāsudeva (Kṛṣṇa), and we all declare openly.” In context, Yudhiṣṭhira frames the coming battle not as personal hatred but as a necessary confrontation against those who have abandoned sound judgment and righteousness, emphasizing collective resolve under Kṛṣṇa’s counsel.

Verse 98

वृणोमि त्वां महाबाहो युद्धयस्व मम कारणात्‌ । त्वयि पिण्डश्न तन्तुश्न धृतराष्ट्रस्य दृश्यते,महाबाहो! मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये युद्ध करो। राजा धृतराष्ट्रकी वंशपरम्परा तथा पिण्डोदक-क्रिया तुमपर ही अवलम्बित दिखायी देती है

Yudhiṣṭhira said: “O mighty-armed one, I choose you—fight for my sake. For it is upon you, it seems, that the continuation of Dhṛtarāṣṭra’s line and the performance of the ancestral rites (offerings of piṇḍa and water) depend.”

Verse 99

भजस्वास्मान्‌ राजपुत्र भजमानान्‌ महाद्ुते । न भविष्यति दुर्बुद्धिर्धार्तराष्ट्रोत्यमर्षण:,महातेजस्वी राजकुमार! हम तुम्हें अपनाते हैं। तुम भी हमें स्वीकार करो। अत्यन्त क्रोधी दुर्बुद्धि दुर्योधन अब इस संसारमें जीवित नहीं रहेगा

Yudhiṣṭhira said: “O prince, O mighty one, accept us who are ready to accept you. The ill-minded Dhārtarāṣṭra—Duryodhana—so intolerant and consumed by wrath, will not remain alive in this world.”

Verse 100

संजय उवाच ततो युयुत्सु: कौरव्यान्‌ परित्यज्य सुतांस्तव । (स सत्यमिति मन्वानो युधिष्ठिरवचस्तदा ।) जगाम पाण्डुपुत्राणां सेनां विश्राव्य दुन्दुभिम्‌,संजय कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर युयुत्सु युधिष्ठिकी बातको सच मानकर आपके सभी पुत्रोंको त्यागकर डंका पीटता हुआ पाण्डवोंकी सेनामें चला गया

Sañjaya said: Then Yuyutsu, abandoning the Kauravas—your sons—went over to the army of the sons of Pāṇḍu. Believing Yudhiṣṭhira’s words to be true, he proceeded at that time, sounding the war-drum as he entered the Pāṇḍava host—an open declaration of his choice of truth and righteousness over clan-loyalty.

Verse 101

(अवसद्‌ धार्तराष्ट्रस्य कुत्सयन्‌ कर्म दुष्कृतम्‌ सेनामध्ये हि तैः साक॑ युद्धाय कृतनिश्चय: ।।) वह दुर्योधनके पापकर्मकी निन्‍दा करता हुआ युद्धका निश्चय करके पाण्डवोंके साथ उन्हींकी सेनामें रहने लगा। ततो युधिष्ठिरो राजा सम्प्रहृष्ट: सहानुज: । जग्राह कवचं भूयो दीप्तिमत्‌ कनकोज्ज्वलम्‌,तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने भाइयोंसहित अत्यन्त प्रसन्न हो सोनेका बना हुआ चमकीला कवच धारण किया

Sanjaya said: Condemning the wicked deed of Dhritarashtra’s son, he remained within their army, having resolved to fight together with those (Pandavas). Then King Yudhishthira, greatly delighted and accompanied by his younger brothers, once again took up and donned a radiant coat of mail, shining with the brilliance of gold.

Verse 102

प्रत्यपद्यन्त ते सर्वे स्वरथान्‌ पुरुषर्षभा: । ततो व्यूहं यथापूर्व प्रत्यव्यूहन्त ते पुन:,फिर वे सभी श्रेष्ठ पुरुष अपने-अपने रथपर आरूढ़ हुए; इसके बाद उन्होंने पुनः शत्रुओंके मुकाबलेमें पहलेकी भाँति ही अपनी सेनाकी व्यूह-रचना की

Sañjaya said: Then all those bull-like heroes regained their own chariots. Thereafter, once again, they re-formed their battle-array against the enemy, just as before—returning to disciplined order amid the press of war.

Verse 103

अवादयन दुन्दुभी श्र शतशश्वैव पुष्करान्‌ । सिंहनादांश्व विविधान्‌ विनेदु: पुरुषर्षभा:,उन श्रेष्ठ पुरुषोंने सैकड़ों दुन्दुभियाँ और नगारे बजाये तथा अनेक प्रकारसे सिंह- गर्जनाएँ कीं

Sañjaya said: Then the foremost of men sounded hundreds of kettledrums and great war-drums, and they raised many kinds of lion-like roars—an exultant clamor that steels resolve and proclaims readiness for battle.

Verse 104

रथस्थान्‌ पुरुषव्याप्रान्‌ पाण्डवानू प्रेक्ष्य पार्थिवा: । धृष्टद्युम्नादय: सर्वे पुनर्जहषिरे तदा,पुरुषसिंह पाण्डवोंको पुनः रथपर बैठे देख धृष्टद्युम्मन आदि राजा बड़े प्रसन्न हुए

Sañjaya said: Seeing the Pāṇḍavas—those lion-like men—again seated upon their chariots and ready for action, all the kings beginning with Dhṛṣṭadyumna rejoiced once more. The moment signals a renewal of courage and resolve on the side of dharma as the warriors return to their appointed duty in battle.

Verse 105

गौरवं पाण्डुपुत्राणां मान्यान्‌ मानयतां च तान्‌ | दृष्टवा महीक्षितस्तत्र पूजयाउ्चक्रिरे भूशम्‌,माननीय पुरुषोंका सम्मान करनेवाले पाण्डवोंके उस गौरवको देखकर सब भूपाल उनकी बड़ी प्रशंसा करने लगे

Sañjaya said: Seeing the dignity of the sons of Pāṇḍu—men who themselves honor the honorable—those kings present there began to extol them greatly and to pay them marked respect. The scene underscores an ethical ideal: true eminence is shown not by demanding honor, but by giving it rightly to those who deserve it.

Verse 106

सौद्दं च कृपां चैव प्राप्तकालं महात्मनाम्‌ । दयां च ज्ञातिषु परां कथयाज्चक्रिरे नूपा:,सब राजा महात्मा पाण्डवोंके सौहार्द, कृपाभाव, समयोचित कर्तव्यके पालन तथा कुटम्बियोंके प्रति परम दयाभावकी चर्चा करने लगे

Sañjaya said: The kings began to speak of the noble conduct and compassion of the great-souled ones—of their timely discernment of what ought to be done, and of their supreme kindness toward their own kinsmen. In particular, all the rulers discussed the Pāṇḍava’s friendliness, his merciful disposition, his adherence to duty suited to the moment, and his deep, familial compassion.

Verse 107

साधु साध्विति सर्वत्र निश्चेरु: स्तुतिसंहिता: । वाच: पुण्या: कीर्तिमतां मनोहदयहर्षणा:,यशस्वी पाण्डवोंके लिये सब ओरसे उनकी स्तुतिप्रशंसासे भरी हुई 'साधु-साधु" की बातें निकलती थीं। उन्हें ऐसी पवित्र वाणी सुननेको मिलती थी, जो मन और हृदयके हर्षको बढ़ानेवाली थी

Sañjaya said: Everywhere there burst forth words of praise—“Well done! Well done!”—utterances filled with eulogy. Those were auspicious, meritorious speeches, spoken by the renowned, that gladdened both mind and heart—celebrating the illustrious Pāṇḍavas.

Verse 108

म्लेच्छाश्चार्याश्व ये तत्र ददृशु: शुश्रुवुस्तथा । वृत्तं तत्‌ पाण्डुपुत्राणां रुरुदुस्ते सगद्गदा:,वहाँ जिन-जिन म्लेच्छों और आर्योंने पाण्डवोंका वह बर्ताव देखा तथा सुना, वे सब गद्गदकण्ठ होकर रोने लगे

Sañjaya said: Those there—both the mlecchas and the āryas—who witnessed and likewise heard of that conduct of the sons of Pāṇḍu, all broke into tears, their voices choked with emotion. The scene underscores how righteous and compassionate behavior can move even hardened onlookers amid the harshness of war.

Verse 109

ततो जघ्नुर्महाभेरी: शतशश्न सहस्रश: | शड्खांश्व॒ गोक्षीरनिभान्‌ दश्मुरईष्टा मनस्विन:,तदनन्तर हर्षमें भरे हुए सभी मनस्वी पुरुषोंने सैकड़ों और हजारों बड़ी-बड़ी भेरियों तथा गोदुग्धके समान श्वेत शंखोंको बजाया

Sañjaya said: Thereafter, the high-spirited men, filled with exhilaration, struck great war-drums in their hundreds and thousands, and blew conches white as cow’s milk—raising a resounding clamor that signaled readiness for battle and the collective resolve of the warriors.

Frequently Asked Questions

The implicit dilemma is leadership under contested legitimacy: Duryodhana must project certainty and unity while acknowledging risk, using rhetoric and role assignments to stabilize morale—illustrating how duty-bound action can proceed amid strategic and ethical ambiguity.

The chapter instructs that large-scale action requires disciplined coordination: clear command communication, defined protective roles (front, wings, rear), and shared signaling protocols that convert individual prowess into organized collective capacity.

No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as archival narrative and strategic description, contributing to the epic’s broader didactic frame by modeling how authority, morale, and coordination operate within kṣatriya institutions.