
Kaumarika Khanda
This section is framed around southern coastal sacred geography (dakṣiṇa-sāgara / southern ocean littoral) and a cluster of five tīrthas presented as potent yet perilous due to aquatic guardians (grāha). The narrative treats the shoreline as a liminal ritual zone where pilgrimage merit, danger, and release (śāpa-mokṣa) converge, and where Kaumāra/Kumāreśa associations mark the region as a site of Skanda-linked sanctity.
66 chapters to explore.

Pañca-Tīrtha Prabhāva and the Grāha-Śāpa Liberation (पञ्चतीर्थप्रभावः ग्राहशापमोचनं च)
अध्याय का आरम्भ ऋषियों के प्रश्न से होता है—दक्षिण समुद्र-तट पर स्थित पाँच पवित्र तीर्थ कौन-से हैं और जिनका फल समस्त तीर्थ-यात्रा के समान कहा गया है, उनका माहात्म्य क्या है। उग्रश्रवा कुमार-सम्बन्धी पुण्यकथा का प्रसंग उठाकर बताता है कि ये पाँचों तीर्थ अत्यन्त प्रभावशाली हैं। इसके बाद राजवीर अर्जुन (फाल्गुन) उन तीर्थों पर पहुँचता है। तपस्वी कहते हैं कि स्नान करने वालों को ‘ग्राह’ पकड़ लेते हैं, इसलिए लोग भय से वहाँ नहीं जाते। अर्जुन धर्म-प्राप्ति में भय को बाधा नहीं मानता; वह विशेषतः सौभद्र तीर्थ में जल में उतरता है, ग्राह द्वारा पकड़ा जाता है और उसे बलपूर्वक जल से बाहर खींच लेता है। तब वह ग्राह एक दिव्य आभूषणों से विभूषित अप्सरा-रूप स्त्री में परिवर्तित हो जाता है। वह बताती है कि उसने और उसकी सखियों ने एक ब्राह्मण तपस्वी की तपस्या में विघ्न डालने का प्रयास किया था; उस ब्राह्मण ने उन्हें निश्चित काल तक जलचर ग्राह बनने का शाप दिया, और यह भी कहा कि किसी महापुरुष द्वारा जल से खींचे जाने पर ही मुक्ति होगी। आगे ब्राह्मण का उपदेश काम-निग्रह, गृहस्थ-धर्म की मर्यादा, वाणी और आचरण के संयम तथा उत्तम-अधम आचरण के भेद को सजीव दृष्टान्तों से स्पष्ट करता है। नारद मार्गदर्शक बनकर शप्त प्राणियों को दक्षिण के पंचतीर्थों की ओर भेजते हैं; अर्जुन के क्रमशः स्नान से उनका शापमोचन होता है। अंत में अर्जुन पूछता है कि धर्ममार्ग में ऐसे विघ्न क्यों होने दिए गए और शक्तिशाली रक्षक उन्हें क्यों न रोक सके—यहीं से आगे का विवेचन आरम्भ होता है।

Nārada–Arjuna संवादः: तीर्थयात्रा-नीतिः, स्थाणु-भक्ति, दानधर्मस्य प्रशंसा
इस अध्याय में तीर्थयात्रा की नीति और दानधर्म की महिमा का गम्भीर विवेचन है। सूत कहते हैं कि अर्जुन देव-पूजित नारद के पास आते हैं। नारद अर्जुन की धर्मबुद्धि की प्रशंसा करते हुए पूछते हैं कि बारह वर्ष की दीर्घ तीर्थयात्रा से कहीं थकान या खिन्नता तो नहीं हुई। यहीं यह सिद्धान्त रखा जाता है कि तीर्थ का फल केवल घूमने से नहीं, बल्कि हाथ-पाँव और मन के संयमयुक्त प्रयत्न से मिलता है। अर्जुन तीर्थ के साक्षात्-स्पर्श को श्रेष्ठ मानकर वर्तमान तीर्थ-परिस्थिति के गुण जानना चाहते हैं। नारद आगे ब्रह्मलोक का प्रसंग जोड़ते हैं—ब्रह्मा दूतों से ऐसे अद्भुत वृत्तान्त पूछते हैं जिनका श्रवण भी पुण्यदायक है। सुश्रवा बताता है कि सरस्वती तट पर कात्यायन के प्रश्न पर सारस्वत मुनि संसार की अस्थिरता का यथार्थ बोध कराते हैं और ‘स्थाणु’ (शिव) की भक्ति में शरण लेने, विशेषतः दान करने का उपदेश देते हैं। दान को सबसे कठिन और समाज में प्रत्यक्ष प्रमाणित होने वाला तप कहा गया है, क्योंकि इसमें परिश्रम से कमाए धन का त्याग होता है; यह घटाता नहीं, बढ़ाता है और संसार-सागर पार कराने वाली नौका है। देश-काल, पात्र की योग्यता और मन की शुद्धि के अनुसार दान का विधान बताया गया है तथा प्रसिद्ध दानवीरों के उदाहरण दिए गए हैं। अंत में नारद अपनी दरिद्रता और दान करने की व्यावहारिक कठिनाई पर विचार करते हुए बताते हैं कि इस साधना में शुद्ध नीयत और विवेक ही प्रधान हैं।

Reva-Śuklatīrtha and Stambha-tīrtha: Pilgrimage Purification and Ancestral Rites (Revā–Mahī–Sāgara Saṅgama Narrative)
इस अध्याय में नारद की तीर्थयात्रा और संवाद-क्रम का वर्णन है। वे रेवा (नर्मदा) तट पर भृगु के आश्रम पहुँचते हैं, जहाँ रेवा को परम पावनी, “सर्व-तीर्थमयी” और दर्शन, स्तुति तथा स्नान से विशेष फल देने वाली कहा गया है। रेवा पर स्थित शुक्लतीर्थ को पाप-नाशक बताया गया है, जहाँ स्नान से भारी अशौच और गंभीर दोष भी दूर हो जाते हैं। भृगु आगे मही–सागर संगम और प्रसिद्ध स्तम्भतीर्थ की कथा सुनाते हैं—वहाँ स्नान करने वाले विवेकी जन पाप से मुक्त होकर यमलोक के भय से बचते हैं। फिर देवशर्मा नाम संयमी ऋषि का प्रसंग आता है, जो गंगा–सागर में पितृतर्पण करते हैं; वे सुनते हैं कि सुभद्र के अनुसार मही–सागर संगम पर किया गया श्राद्ध-तर्पण पितरों को अधिक तृप्ति देता है। पत्नी के यात्रा-निषेध से देवशर्मा अपने दुर्भाग्य और गृहकलह पर शोक करते हैं। सुभद्र उपाय बताते हैं कि वे देवशर्मा की ओर से संगम पर श्राद्ध-तर्पण कर देंगे, और देवशर्मा अपने संचित तप-पुण्य का एक अंश देने का वचन देते हैं। अध्याय के अंत में भृगु संगम की अद्भुत महिमा का निष्कर्ष करते हैं और नारद उस पवित्र स्थान को देखने तथा उसकी महत्ता को प्रतिष्ठित करने का दृढ़ संकल्प करते हैं।

दानतत्त्व-व्याख्या (Doctrine of Dāna: Intent, Means, and Outcomes) / “Nārada Explains the Taxonomy of Giving”
इस अध्याय में नारद का व्यावहारिक धर्म-संकट प्रस्तुत है—वे सुरक्षित स्थान/भूमि प्राप्त करना चाहते हैं, पर प्रतिग्रह (दोषयुक्त स्वीकार) में फँसना नहीं चाहते। आरम्भ में धन का नैतिक वर्गीकरण किया गया है—शुक्ल (शुद्ध), शबल (मिश्र), और कृष्ण (अंधकारमय); और बताया गया है कि इन्हें धर्म में लगाने से क्रमशः देवत्व, मनुष्यत्व या तिर्यक्त्व का फल मिलता है। फिर सौराष्ट्र में एक सार्वजनिक प्रसंग आता है। राजा धर्मवर्मा दान-विषयक एक रहस्यमय श्लोक सुनते हैं—दो कारण, छह आधार, छह अंग, दो ‘विपाक’, चार प्रकार, त्रिविध श्रेणी और दान के तीन नाशक—और सही व्याख्या पर बड़े पुरस्कार की घोषणा करते हैं। वृद्ध ब्राह्मण के वेष में नारद इसका क्रमबद्ध अर्थ बताते हैं: कारण—श्रद्धा और शक्ति; आधार—धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, हर्ष, भय; अंग—दाता, पात्र, शुद्धि, दान-द्रव्य, धर्म-संकल्प, उचित देश-काल; विपाक—पात्र की योग्यता के अनुसार परलोक/इहलोक फल; प्रकार—ध्रुव, त्रिक, काम्य, नैमित्तिक; श्रेणी—उत्तम, मध्यम, अधम; नाशक—दान के बाद पछताना, बिना श्रद्धा दान, और अपमानपूर्वक दान। अंत में राजा कृतज्ञ होकर नारद की पहचान जानता है और उनके प्रयोजन हेतु भूमि व धन देने को तत्पर होता है।

Adhyāya 5: Nārada’s Search for Worthy Recipients and Sutanu’s Doctrinal Replies (Mātṛkā–Gṛha–Lobha–Brāhmaṇa-bheda–Kāla)
इस अध्याय में नारद रैवत पर्वत की ओर जाते हुए ‘ब्राह्मणों के हित’ के लिए दान-धर्म पर विचार आरम्भ करते हैं। वे बताते हैं कि अपात्र को दिया गया दान निष्फल होता है; जो ब्राह्मण अनुशासनहीन या अशिक्षित हो, वह दूसरों को पार नहीं लगा सकता—वह बिना पतवार की नाव के समान है। दान में देश, काल, साधन, द्रव्य और श्रद्धा की शुद्धता आवश्यक है, और पात्रता केवल विद्या से नहीं, विद्या के साथ आचार से सिद्ध होती है। नारद बारह कठिन प्रश्न पूछकर कालापग्राम पहुँचते हैं, जहाँ अनेक आश्रम और श्रुति-पारंगत ब्राह्मण वाद-विवाद में लगे हैं। वे प्रश्नों को सरल मानते हैं, पर उत्तर एक बालक सुतनु क्रमबद्ध रूप से देता है। वह मातृका-वर्णों का निरूपण ओंकार सहित करता है और ‘अ-उ-म्’ तथा अर्धमात्रा को सदाशिव-तत्त्व के रूप में समझाता है; ‘पाँच-पाँच का अद्भुत गृह’ को तत्त्वों की योजना बताकर सदाशिव तक ले जाता है। ‘बहुरूपा स्त्री’ को बुद्धि, और ‘महामकर’ को लोभ कहकर उसके नैतिक दुष्परिणाम भी बताता है। सुतनु विद्या और संयम के आधार पर ब्राह्मणों के आठ भेद बताता है तथा युगादि और मन्वंतरादि काल-चिह्नों को अक्षय पुण्य देने वाला कहता है। अंत में विचारपूर्वक कर्म से जीवन-योजना, वेदान्त में वर्णित अर्चि और धूम—दो मार्ग, तथा श्रुति-स्मृति के अनुसार देव और धर्म का निषेध करने वाले पथों का त्याग करने की शिक्षा देकर अध्याय समाप्त होता है।

Brahmaṇa-parīkṣā, ‘Caurāḥ’ as Inner Vices, and Cira-kārī Upākhyāna (Testing of Brahmins; inner ‘thieves’; the parable of deliberate action)
इस अध्याय में नारद का शातातप और अन्य ब्राह्मणों से संवाद है। परस्पर सम्मान के बाद नारद अपना उद्देश्य बताते हैं—पृथ्वी‑समुद्र के संगम पर स्थित महातीर्थ के निकट एक शुभ ब्राह्मण‑आसन/बस्ती स्थापित करना और वहाँ के ब्राह्मणों की योग्यता की परीक्षा करना। स्थान पर ‘चोरों’ की आशंका उठती है, पर कथा उन्हें बाहरी नहीं, भीतर के शत्रु—काम, क्रोध आदि—के रूप में समझाती है; और बताती है कि प्रमाद से तपस्या रूपी धन भी लुट जाता है। फिर केदार से कलाप/कलापक की ओर यात्रा‑निर्देश, गुह/स्कन्द की पूजा, स्वप्न‑आदेश, तथा पवित्र मिट्टी और जल से नेत्र‑अंजन व देह‑लेपन द्वारा गुफा‑मार्ग देखने और पार करने की विधि आती है। इसके बाद संगम पर सामूहिक स्नान, तर्पण, जप और ध्यान का वर्णन तथा दिव्य सभा का संकेत मिलता है। अतिथि‑प्रसंग में कपिल भूमि‑दान की व्यवस्था हेतु ब्राह्मणों की याचना करते हैं; इससे अतिथि‑धर्म और उसकी उपेक्षा के दुष्परिणाम स्पष्ट होते हैं। क्रोध और उतावलेपन पर विचार करते हुए ‘चिरकारी’ उपाख्यान आता है—पुत्र पिता की जल्दबाज़ आज्ञा को तुरंत न मानकर सोच‑समझकर विलंब करता है और भारी पाप से बचा लेता है; कठिन कर्मों में विवेक की प्रशंसा की जाती है। अंत में कलियुग में शापों के प्रभाव, प्रतिष्ठा‑कर्म और स्थापित तीर्थ की दैवी स्वीकृति का उपसंहार है।

Indradyumna-Kīrti-Punaruddhāraḥ (Recovery of Indradyumna’s Fame) and Nāḍījaṅgha’s Account of Ghṛtakambala-Śiva Worship
अर्जुन पूर्व में सुनी प्रशंसा के बाद नारद से पूछता है कि पृथ्वी पर आए संकट का मूल क्या है और कथा का विस्तार बताइए। नारद आदर्श राजा इन्द्रद्युम्न का वर्णन करते हैं—दानशील, धर्मज्ञ, लोकहितकारी, जिसने यज्ञ, दान, सरोवर और देवालय आदि अनेक सार्वजनिक कार्य किए। पर ब्रह्मा उसे बताते हैं कि केवल पुण्य से स्वर्ग में स्थिरता नहीं रहती; तीनों लोकों में फैली हुई निष्कलंक कीर्ति आवश्यक है, क्योंकि काल स्मृति को मिटा देता है। इन्द्रद्युम्न पृथ्वी पर उतरकर देखता है कि उसका नाम भुला दिया गया है। वह दीर्घजीवी साक्षी की खोज में नैमिषारण्य में मर्कण्डेय के पास जाता है; मर्कण्डेय भी उसे नहीं पहचानते, पर अपने प्राचीन मित्र नाड़ीजनघ का उपाय बताते हैं। नाड़ीजनघ भी इन्द्रद्युम्न को नहीं याद करता और अपनी असाधारण दीर्घायु का कारण सुनाता है—बाल्य में घृत-पात्र में रखे शिवलिंग का अपमान, फिर पश्चात्ताप से घृत द्वारा लिंगों को ढककर ‘घृतकम्बल-शिव’ की पूजा, जिससे शिव की कृपा से गणत्व मिला। आगे गर्व और काम से पतन हुआ; गालव ऋषि की पत्नी का अपहरण-प्रयत्न करने पर शाप से वह बगुला बना, और अंत में यह शमन मिला कि वह छिपी हुई कीर्ति के पुनरुद्धार में सहायता करेगा तथा इन्द्रद्युम्न की मुक्ति-यात्रा में सहभागी बनेगा। अध्याय राजधर्म, काल के प्रभाव, और भक्ति के साथ नैतिक संयम की अनिवार्यता को जोड़ता है।

अखण्डबिल्वपत्रार्चन-दीर्घायुः शापकथा च (Unbroken Bilva-Leaf Worship, Longevity, and the Curse Narrative)
इस अध्याय में अनेक वक्ताओं के माध्यम से धर्म-विचार चलता है। नारद प्रसंग रखते हैं कि राजा (इन्द्रद्युम्न को मानक रूप में स्मरण किया गया है) मार्कण्डेय के कठोर वचन सुनकर अत्यन्त व्याकुल हो जाता है। यहाँ सत्य और मित्रधर्म प्रमुख हैं—एक बार दिया हुआ वचन/प्रतिज्ञा, चाहे अपने लिए कष्टदायक हो, फिर भी निभाना ही धर्म है; उदाहरणों से सत्य-प्रतिबद्धता की महत्ता बढ़ाई गई है। समूह आत्मदाह का विचार छोड़कर शिव-लोक की तीर्थयात्रा का मार्ग अपनाता है, कैलास पहुँचकर प्राकारकर्ण नामक उल्लू से परामर्श करता है। वह बताता है कि वह पूर्वजन्म में घण्ट नामक ब्राह्मण था और अखण्ड बिल्वपत्रों से लिङ्ग-पूजा तथा त्रिकाल भक्ति के फल से उसे अद्भुत दीर्घायु मिली। शिव प्रकट होकर वर देते हैं; फिर कथा सामाजिक-नैतिक दोष की ओर मुड़ती है—बलात् गान्धर्व-विवाह जैसे आचरण से शाप लगता है और वह उल्लू (रात्रिचर) बन जाता है। शाप में शर्त है कि इन्द्रद्युम्न की पहचान कराने में सहायता करने पर उसका मूल रूप लौट आएगा; इस प्रकार अध्याय में बिल्वपत्र-पूजा, कर्मफल, वचनपालन और विवाह-धर्म की शिक्षा एक साथ गुंथी है।

इंद्रद्युम्नपरिज्ञानोपाख्यानम् (The Inquiry into King Indradyumna: Friendship, Vow, and the Gṛdhra’s Past)
अध्याय 9 संवाद के माध्यम से धर्म और नीति का प्रसंग रचता है। पूर्वजन्म के कारण सुनकर नाड़ीजनघ दुखी होता है कि राजा इंद्रद्युम्न की पहचान/खोज अभी तक नहीं हुई; वह मित्र-धर्म निभाने और प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए साथियों सहित अग्नि में प्रवेश करने जैसा कठोर उपाय सुझाता है। तभी उलूक रोककर दूसरा मार्ग बताता है—गंधमादन पर्वत पर एक दीर्घजीवी गृध्र रहता है, जो उसका प्रिय मित्र है; संभव है वह इंद्रद्युम्न के विषय में जानता हो। दल गृध्र के पास जाकर पूछता है। गृध्र कहता है कि अनेक कल्पों में उसने न इंद्रद्युम्न को देखा है, न उसका नाम सुना है; इससे सबका शोक बढ़ता है। तब वह अपना पूर्वजन्म सुनाता है—पहले वह चंचल वानर था, जो शिव के दामनक-उत्सव में स्वर्ण झूले और लिंग के निकट अनजाने में पहुँच गया; भक्तों की मार से वहीं मृत्यु हुई और वह काशी-नरेश का पुत्र कुशध्वज बनकर जन्मा, दीक्षा लेकर योग-साधना से शिवभक्त हुआ। आगे कामवश उसने अग्निवेश्य की पुत्री का अपहरण किया, जिससे ऋषि के शाप से वह गृध्र बना। ऋषि ने यह भी कहा कि जब वह राजा इंद्रद्युम्न की पहचान कराने में सहायता करेगा, तभी शाप से मुक्ति मिलेगी। इस प्रकार अध्याय मित्रता-नीति, व्रत/प्रतिज्ञा की मर्यादा, उत्सव-पुण्य और शाप-मोक्ष की शर्तों को एक साथ पिरोता है।

Indradyumna–Mantharaka-saṃvādaḥ (Dialogue of Indradyumna and the Tortoise Mantharaka)
नारद के वृत्तान्त को सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न शोक और विस्मय से भर उठते हैं। वे गिद्ध के कथन पर प्रश्न करते हुए निकट आती मृत्यु का कारण जानना चाहते हैं। सब लोग प्रसिद्ध मानस-सरोवर पहुँचकर गूढ़ बातों के ज्ञाता कछुए मन्थरक से परामर्श लेने जाते हैं। उन्हें आते देखकर मन्थरक जल में छिप जाता है; तब ऋषि कौशिक इसे आतिथ्य-धर्म का उल्लंघन बताकर अतिथि-सत्कार की मर्यादा और अतिथि-द्वेष के पाप का उपदेश देते हैं। मन्थरक उत्तर देता है कि वह आतिथ्य जानता है, पर इन्द्रद्युम्न से भयभीत है—पूर्वकाल में रौचकपुर में हुए राजा के यज्ञ में यज्ञाग्नि से उसका पृष्ठ जल गया था, वह घाव आज भी है; इसलिए फिर से जलने के भय से वह हट गया। इतना कहते ही आकाश से पुष्प-वृष्टि और दिव्य वाद्यों का निनाद होता है, जिससे राजा की पुनः प्रतिष्ठित कीर्ति की घोषणा होती है। तभी दिव्य विमान प्रकट होता है और देवदूत बताता है कि इन्द्रद्युम्न की कीर्ति फिर जाग्रत हुई है; वह ब्रह्मलोक चलने का निमंत्रण देता है और सिद्धान्त कहता है कि पृथ्वी पर जब तक कीर्ति रहती है, तब तक स्वर्ग में भी स्थिति रहती है; तथा तड़ाग, कूप, उद्यान आदि ‘पूर्त’ कर्म पुण्य-वृद्धि के साधन हैं। राजा मित्र-निष्ठा से अपने साथियों को भी साथ ले चलने की प्रार्थना करता है। दूत बताता है कि वे शापग्रस्त होकर गिरे हुए शिव-गण हैं, शापान्त तक प्रतीक्षारत हैं और महादेव के बिना स्वर्ग नहीं चाहते। इन्द्रद्युम्न भी पुनः पतन के भय वाला स्वर्ग अस्वीकार कर शिव-गणों के संग को ही श्रेष्ठ मानता है। फिर वह कछुए से दीर्घायु का कारण पूछता है; मन्थरक ‘दिव्य, पाप-नाशक’ शिव-महात्म्य का आरम्भ और फलश्रुति बताता है कि श्रद्धा से श्रवण करने पर शुद्धि होती है, और उसकी दीर्घायु तथा कछुआ-रूप शम्भु की कृपा से प्राप्त हैं।

Kūrma’s Past-Life Account: Śiva-Temple Merit, Ethical Lapse, and the Curse into Tortoisehood
इस अध्याय में कूर्म इन्द्रद्युम्न राजा को अपना पूर्वजन्म-स्मरण धर्म और नीति के उपदेश के रूप में सुनाता है। बाल्यकाल में वह ब्राह्मण शाण्डिल्य था; वर्षा ऋतु में उसने बालू-मिट्टी से पञ्चायतन-विन्यास सहित शिव-मन्दिर बनाया और लिङ्ग के सामने पुष्प-पूजा, गीत तथा नृत्य किया। आगे के जन्मों में भी शिव-भक्ति, दीक्षा और शिवालय-निर्माण को परम पुण्य कहा गया है तथा भिन्न-भिन्न पदार्थों से शिव-गृह बनाने के फल का वर्णन किया गया है। फिर कथा में उलटाव आता है—अजरता का अद्भुत वर पाकर वही भक्त राजा जयदत्त बनकर प्रमाद में पड़ता है और परस्त्री-गमन आदि से मर्यादा तोड़ता है; इसे आयु, तप, यश और समृद्धि के पतन का मुख्य कारण बताया गया है। धर्म-व्यवस्था बिगड़ने पर यम शिव से निवेदन करता है; शिव अपराधी को कूर्म-योनि का शाप देते हैं, पर भविष्य के किसी कल्प में मुक्ति का आश्वासन भी देते हैं। यज्ञ से जुड़े दाह-चिह्नों की स्मृति कूर्म की पीठ पर बताई गई है, तीर्थवत् शुद्धि-प्रभाव का संकेत मिलता है, और अंत में इन्द्रद्युम्न विवेक-वैराग्य धारण कर दीर्घजीवी लोमश मुनि से उपदेश लेने का संकल्प करता है—यह दिखाते हुए कि सत्संग तीर्थ से भी श्रेष्ठ है।

कूर्माख्यानम् (Kūrmākhyāna) — The Discourse on Kūrma and the Teaching of Lomaśa
इस अध्याय में नारद के कथन के माध्यम से बहुवाणी संवाद चलता है। इन्द्रद्युम्न राजा आदि एक ऐसे महातपस्वी से मिलते हैं जो ‘मैत्र’ मार्ग का आचरण करता है—अहिंसा और वाणी-संयम से युक्त—जिसके प्रति पशु भी श्रद्धा दिखाते हैं। कूर्म इन्द्रद्युम्न का परिचय कराते हैं कि राजा स्वर्ग की कामना नहीं, बल्कि कीर्ति की पुनःस्थापना और आत्मकल्याण चाहता है; अतः उसे शिष्य मानकर मार्गदर्शन दिया जाए। लोमश संसार के निर्माण और आसक्ति पर कठोर उपदेश देते हैं—घर, सुख-सुविधा, यौवन, धन आदि पर टिके प्रयत्न अनित्य हैं; मृत्यु सब कुछ छीन लेती है, इसलिए वैराग्य और धर्माचरण ही स्थिर आधार है। तब इन्द्रद्युम्न लोमश की असाधारण दीर्घायु का कारण पूछते हैं। लोमश अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत बताते हैं—एक समय वे दरिद्र थे, पर एक बार सच्ची श्रद्धा से शिवलिंग का स्नान कराया और कमलों से पूजा की; उसी पुण्य से स्मृति सहित पुनर्जन्म मिला और तप-भक्ति का मार्ग खुला। शिव से उन्हें अमरत्व नहीं, बल्कि कल्प-चक्र तक विस्तृत आयु का वर मिला; समय के निकट आने पर शरीर के रोम झड़ना उसका संकेत है। अंत में रहस्य यह बताया जाता है कि कमल-पूजा, प्रणव-जप और शिवभक्ति महापापों को भी शुद्ध करने वाली, सुलभ और अत्यन्त प्रभावशाली है; तथा भारत में मानव-जन्म, शिवभक्ति आदि ‘दुर्लभ’ वस्तुओं का स्मरण कराकर, क्षणभंगुर जगत में शिव-पूजा को ही सुरक्षित शरण और मुख्य कर्तव्य कहा गया है।

Mahī–Sāgara-saṅgama Māhātmya and the Indradyumneśvara Liṅga (महीसागर-संगम-माहात्म्य एवं इन्द्रद्युम्नेश्वर-लिङ्ग)
इस अध्याय में अनेक पात्रों के संवाद के माध्यम से भक्ति, तीर्थ-माहात्म्य और विधि-नियमों का विस्तार होता है। राजा लोमश ऋषि के निकट रहने का संकल्प करता है और शिव-दीक्षा लेकर लिङ्ग-पूजा करने की इच्छा प्रकट करता है; यहाँ सत्संग को तीर्थ-सेवा से भी श्रेष्ठ बताया गया है। शापग्रस्त पक्षी/पशु आदि प्राणी मुक्ति हेतु ऐसे स्थान की याचना करते हैं जो समस्त तीर्थों का फल दे; नारद उन्हें वाराणसी में स्थित योगी संवर्त के पास भेजते हैं और रात्रि-मार्ग में उसके पहचान-चिह्न का वर्णन करते हैं। संवर्त मही–सागर-संगम की सर्वोच्च महिमा बताता है—मही नदी की पवित्रता, वहाँ स्नान-दान आदि का फल प्रयाग और गया जैसे प्रसिद्ध तीर्थों के तुल्य या अधिक कहा गया है। अमावस्या में शनि-संयोग, व्यतीपात आदि विशेष योग, शनि-सूर्य को अर्पण, अर्घ्य-मंत्र, तथा जल में दाहिना हाथ उठाकर सत्य-परीक्षा जैसी विधियाँ भी दी गई हैं। याज्ञवल्क्य–नकुल संवाद के द्वारा कठोर वाणी का दोष, सदाचार और अनुशासन के बिना विद्या की अपूर्णता समझाई जाती है। अंत में लिङ्ग की स्थापना कर उसे इन्द्रद्युम्नेश्वर (महाकाल-संबद्ध) नाम दिया जाता है; शिव भक्तों को सायुज्य/सारूप्य-सदृश फल का वर देते हैं और संगम की असाधारण मोक्षदायिनी शक्ति की पुष्टि करते हैं।

कुमारेश्वर-माहात्म्यप्रश्नः तथा वज्राङ्गोपाख्यान-प्रस्तावः (Inquiry into the Glory of Kumāreśvara and Prelude to the Vajrāṅga Narrative)
इस अध्याय में अर्जुन कुमारनाथ/कुमारेश्वर के माहात्म्य और उससे जुड़े पात्रों की उत्पत्ति का विस्तृत, यथार्थ वर्णन पूछते हैं। नारद उत्तर देते हैं कि कुमारेश्वर का दर्शन, श्रवण, ध्यान, पूजा तथा वेदोक्त उपासना अत्यन्त पावन है; साथ ही यह अध्याय धर्म-आचरण और साधना की दिशा भी बताता है। फिर कथा वंश-परम्परा और सृष्टि-क्रम में फैलती है—दक्ष की कन्याएँ, उनका धर्म, कश्यप, सोम आदि को दिया जाना, और उनसे देव तथा अन्य कुलों की उत्पत्ति। दिति के पुत्र-वियोग, उसके तप, इन्द्र के हस्तक्षेप से मरुतों की उत्पत्ति, और पुनः दिति द्वारा एक प्रबल पुत्र की याचना का प्रसंग आता है; कश्यप के वरदान से वज्र-सदृश अवध्य देह वाला वज्राङ्ग जन्म लेता है। वज्राङ्ग का इन्द्र से संघर्ष होता है, पर ब्रह्मा उसे नीति सिखाते हैं—शरणागत शत्रु को छोड़ देना ही वीर-धर्म है; राज्य-लालसा छोड़कर तप में प्रवृत्त हो। ब्रह्मा उसे वराङ्गी नामक पत्नी भी देते हैं; दीर्घ तपस्या में इन्द्र उसके व्रत को तोड़ने का प्रयत्न करता है, पर वह क्षमा, धैर्य और दृढ़ता से टिकती है—तप ही परम ‘धन’ बताया गया है। अंत में वज्राङ्ग अपनी व्याकुल पत्नी को सांत्वना देकर गृहस्थ-धर्म और तप-आदर्श दोनों को पुष्ट करता है, और कुमारेश्वर-माहात्म्य की आगे की धारा का संकेत बना रहता है।

Tārakotpattiḥ, Tapasā Vara-prāptiś ca (Birth of Tāraka and the Boon Earned through Austerity)
इस अध्याय में कौमार-परंपरा की कारण-श्रृंखला स्पष्ट होती है—दुःख से प्रार्थना, प्रार्थना से धर्म-विचार, और विचार से तप, जो जगत् की शक्ति-संतुलन को बदल देता है। वराङ्गी परित्याग और पीड़ा से व्याकुल होकर ऐसा पुत्र माँगती है जो उसके भय और अपमान का अंत करे। दैत्य-नायक असुर रूप में होते हुए भी पति-धर्म की मर्यादा का समर्थन करता है; पत्नी को ‘जाया, भार्या, गृहिणी, कलत्र’ जैसे धर्म-संबद्ध नामों से स्मरण कर, पीड़ित पत्नी की उपेक्षा को नैतिक संकट बताता है। ब्रह्मा अत्यधिक तप के संकल्प को संयत कर ‘तारक’ नामक महाबली पुत्र का वर देते हैं। वराङ्गी सहस्र वर्ष तक गर्भ धारण करती है; तारक के जन्म पर जगत् में उत्पात और कम्पन होते हैं, जो उसके आगमन के विश्व-स्तरीय परिणाम का संकेत हैं। असुर-सम्राट के रूप में प्रतिष्ठित होकर तारक पहले और भी घोर तप करने, फिर देवताओं पर विजय पाने की नीति बनाता है। पारियात्र पर्वत पर वह पाशुपत दीक्षा प्राप्त कर पाँच मंत्रों का जप करता है, दीर्घ तप करता है और अंग-छेदन जैसे कठोर होमों से अपने तेज से देवताओं को भयभीत कर देता है। ब्रह्मा प्रसन्न होकर भी मृत्यु-नियम के कारण पूर्ण अभेद्यता नहीं देते; तारक शर्तयुक्त वर लेता है कि वह केवल सात दिन से अधिक आयु वाले बालक द्वारा ही मारा जा सके। अध्याय का अंत तारक की समृद्ध राजसभा, ऐश्वर्य और शक्ति-संकेन्द्रण के वर्णन से होता है।

Tāraka’s Mobilization and Bṛhaspati’s Nīti: The Deva–Asura War Preparations (तारक-सेनासंयोजनं बृहस्पति-नीतिविचारश्च)
इस अध्याय में देव–असुर महासंग्राम से पहले दोनों पक्षों की तैयारी का विस्तार है। पहले तारक मानव-धर्म के पतन की निन्दा करता है—राज्य को बुलबुले-सा क्षणभंगुर बताता है और स्त्री, जुआ, मदिरा आदि भोगों की मत्तता को ‘पौरुष’ (पुरुषार्थ/संकल्प-शक्ति) का नाशक कहता है। फिर वह देवों से जुड़ी त्रैलोक्य-समृद्धि छीनने हेतु शीघ्र सैन्य-सज्जा का आदेश देता है, भव्य रथ और अलंकृत चिह्न-ध्वज निर्धारित करता है। नारद बतलाते हैं कि असुर-सेनानायक ग्रासन ने रथ, वाहन और अनेक नायकों को जुटाकर पशु, राक्षस और पिशाच-आकृतियों वाले भयावह ध्वजों सहित विशाल सेना को व्यूहबद्ध किया; संख्या, रचना, यान और ध्वज-वैभव का वर्णन शक्ति-प्रदर्शन बन जाता है। इसके बाद कथा देव-पक्ष की ओर मुड़ती है। दूत रूप में वायु इन्द्र को असुर-बल का समाचार देते हैं। इन्द्र बृहस्पति से नीति पूछते हैं; वे साम, दान, भेद और दण्ड—इन चार उपायों का उपदेश देकर कहते हैं कि अधर्म में दृढ़ शत्रुओं पर सामादि निष्फल हैं, इसलिए दण्ड (बल-प्रयोग) ही उचित उपचार है। इन्द्र इस पर सहमत होकर शस्त्रों का पूजन कराते हैं, यम को सेनापति नियुक्त करते हैं और देवों तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच, किन्नर आदि सहयोगियों को ध्वजों और वाहनों सहित एकत्र करते हैं। अंत में ऐरावत पर आरूढ़ इन्द्र का तेजस्वी रूप प्रकट होता है, जो धर्म-रक्षा हेतु नीति-संयुत युद्ध-प्रस्थान का संकेत देता है।

Grasana–Yama Saṅgrāmaḥ (The Battle of Grasana and Yama) / ग्रसन–यमसंग्रामः
इस अध्याय में नारद के कथन से देव–असुर सेनाओं का महायुद्ध आरम्भ होता है। शंख, भेरी, नगाड़ों की ध्वनि तथा हाथी, घोड़े और रथों के कोलाहल से रणभूमि युगांत के समुद्र-क्षोभ जैसी प्रतीत होती है। फिर भाले, गदा, परशु, शक्ति, तोमर, अंकुश और बाणों की ऐसी घनी वर्षा होती है कि दिशाएँ मानो अंधकार से ढक जाती हैं और योद्धा एक-दूसरे को देखे बिना ही प्रहार करते हैं। टूटे रथ, गिरे हुए गज और रक्त की नदियाँ युद्ध-स्थल को भयावह बनाती हैं; मांसभक्षी प्राणी आकर्षित होते हैं और सीमांत-स्वभाव वाले गणों को भी वहाँ आनंद बताया गया है। इसके बाद कथा द्वंद्व पर सिमटती है—असुरराज ग्रसन यम (कृतांत) से भिड़ता है। दोनों बाण-वृष्टि करते हैं, गदा और दंड से प्रहार करते हैं तथा निकट युद्ध में कुश्ती तक होती है। ग्रसन का उग्र वेग यम के किंकरों को दबा देता है और अंततः यम को पीटकर निश्चेष्ट-सा कर देता है; ग्रसन विजय-गर्जना कर अपनी सेना को पुनः संगठित करता है। अध्याय का संकेत यह है कि काल और दंड के सामने लौकिक ‘पौरुष’ क्षणभंगुर है; देवगण विचलित होते हैं और रणभूमि काँपती हुई प्रतीत होती है।

Kubera–Daitya Saṅgrāma: Kujambha, Nirṛti, Varuṇa, Candra, and Divākara in Cosmic Conflict
नारद जी एक दीर्घ युद्ध-वृत्तांत सुनाते हैं। धनाधिप कुबेर पहले जंभ से भिड़ते हैं; घने शस्त्र-वर्षा के बीच भी उनकी प्रसिद्ध गदा जंभ को चूर कर देती है। फिर कुजंभ शर-जाल और भारी अस्त्रों से आक्रमण बढ़ाकर कुछ समय के लिए कुबेर को दबा देता है और धन, रत्न तथा वाहनों को छीन लेने का प्रयास करता है। युद्ध फैलने पर निरृति प्रवेश कर दैत्य-सेना को खदेड़ते हैं। दैत्यों की तामसी माया से सब अंधकार में जड़ हो जाते हैं, पर सावित्र अस्त्र उस तम को दूर कर देता है। वरुण पाश से कुजंभ को बाँधकर प्रहार करते हैं, किंतु दैत्य-नायक महिष वरुण और निरृति को धमकाता है, जिससे वे इंद्र की शरण की ओर हटते हैं। चंद्र अपने शीत-अस्त्र से दैत्य-दल को स्तब्ध कर देता है; हताश दैत्यों को कालनेमि डाँटता है और मानवाकार माया तथा अग्नि-सदृश प्रसार से शीत-प्रभाव पलट देता है। अंत में दिवाकर (सूर्य) आते हैं, अरुण को कालनेमि की ओर हाँकने का आदेश देते हैं और शंबर व इंद्रजाल जैसी माया-युक्त मारक शक्तियाँ छोड़ते हैं; भ्रम से दैत्य देवों को दैत्य समझ बैठते हैं और फिर संहार मचता है। अध्याय का संदेश है—विवेक से रहित शक्ति अस्थिर होती है, और अस्त्र, माया तथा देव-रक्षा से जगत का संतुलन पुनः स्थापित होता है।

कालनेमिवधप्रसङ्गः — The Episode of Kālanemi’s Defeat and the Devas’ Appeal to Viṣṇu
इस अध्याय में कालनेमि असुर क्रोध और मोह से निमि के स्वरूप को पहचान न पाकर युद्ध को अत्यन्त उग्र कर देता है। निमि की प्रेरणा से वह ब्रह्मास्त्र छोड़ता है, जिससे देवसेनाओं में भारी आतंक फैल जाता है; परन्तु उचित प्रतिकार से वह अस्त्र शांत कर दिया जाता है। इसके बाद भास्कर (सूर्य) भयंकर तापमय रूप धारण कर असुरों को दग्ध करता है, जिससे उनकी पंक्तियाँ टूटती हैं, तृष्णा और महाविनाश छा जाता है। तब कालनेमि मेघ-रूप धारण कर शीतल वर्षा से परिस्थिति पलट देता है, अपने पक्ष का उत्साह बढ़ाकर शस्त्र-वर्षा से देवों और उनके सहायकों का व्यापक संहार करता है। अश्विनीकुमार तीक्ष्ण बाणों और वज्रास्त्र-प्रभाव से उसके रथ-यंत्र को क्षति पहुँचाते हैं; कालनेमि चक्र, गदा आदि से प्रत्याघात करता है और आगे नारायणास्त्र का प्रसंग भी आता है। इन्द्र की स्थिति संकटपूर्ण होने और दिव्य अपशकुन बढ़ने पर देवगण विधिपूर्वक स्तुति कर वासुदेव की शरण लेते हैं। विष्णु योगनिद्रा से जागकर गरुड़ पर आरूढ़ होकर आते हैं, असुरों के प्रहारों को अपने में समेटते हुए कालनेमि से प्रत्यक्ष युद्ध करते हैं। अस्त्रों और निकट-युद्ध के बाद विष्णु निर्णायक प्रहार से उसे घायल कर वश में करते हैं, परन्तु भविष्य में उसके अंतिम अंत का संकेत देकर उसे अस्थायी अवकाश देते हैं; भयभीत सारथी उसे जगदीश्वर से दूर ले जाता है।

Viṣṇu–Dānava Saṅgrāma: Astrayuddha and the Fall of Grasana
नारद एक विराट युद्ध का वर्णन करते हैं, जिसमें अनेक दानव भयंकर पशुओं और रथों पर चढ़कर नारायण (विष्णु) पर टूट पड़ते हैं। निमि, मथन, शुम्भ, जम्भ, सेनापति ग्रसन और महिष आदि योद्धा नाम सहित आते हैं। पहले तीक्ष्ण बाणों की वर्षा होती है; फिर विष्णु धनुष से गदा पर आते हैं और परत-दर-परत अस्त्रों का प्रत्यस्त्रों से प्रतिकार करते हैं। ग्रसन छोड़े गए रौद्रास्त्र को ब्रह्मास्त्र से शांत कर देता है। तब विष्णु भय उत्पन्न करने वाला कालदण्डास्त्र चलाते हैं, जिससे दानव-सेना में भारी विनाश होता है, पर अंततः उसे भी प्रतिअस्त्रों से रोका जाता है। इसके बाद विष्णु सुदर्शन चक्र से ग्रसन का निर्णायक वध कर देते हैं। निकट युद्ध में कुछ असुर गरुड़ और विष्णु से लिपटकर उन्हें दबाने का प्रयास करते हैं; विष्णु झटककर उन्हें दूर करते हैं। मथन थोड़े ही समय में विष्णु की गदा से मारा जाता है। महिष उग्र आक्रमण करता है, पर ब्रह्मा की पूर्व घोषणा के अनुसार उसका वध स्त्री के हाथों होना नियत है—इस कारण विष्णु उसे तत्काल मृत्यु से मुक्त कर देते हैं। शुम्भ उपदेश पाकर पीछे हटता है; जम्भ गर्व से गरुड़ और विष्णु को भारी प्रहारों से क्षणिक रूप से अचेत कर देता है, पर विष्णु के संभलते ही भाग जाता है। अध्याय अस्त्र-तत्त्व, नियति-धर्म और सेनापति-वध से संतुलन-स्थापन को उजागर करता है।

Jambha–Tāraka Saṅgrāma, Nārāyaṇāstra, and Kāla-Upadeśa (जंभतारकसंग्रामः कालोपदेशश्च)
यह अध्याय नारद द्वारा दैत्यों के पुनः संगठित होने पर इन्द्र की हिचकिचाहट देखने से आरम्भ होता है। इन्द्र विष्णु के पास जाकर सहायता माँगता है; विष्णु अपनी सामर्थ्य बताते हुए यह भी स्पष्ट करते हैं कि वरदानों और शर्तों के कारण कुछ सीमाएँ हैं, इसलिए सही लक्ष्य—जम्भ—और उचित उपाय की ओर इन्द्र को निर्देश देते हैं। फिर वे देवसेना का व्यूह रचते हैं और ग्यारह रुद्र-प्रभावों को अग्रसर बनाकर आगे बढ़ाते हैं; उनके हस्तक्षेप में गजासुर का वध तथा उसके चर्म-परिवर्तन का प्रसंग आता है। इसके बाद युद्ध में अस्त्रों का दीर्घ आदान-प्रदान होता है—मौशल, शैल, वज्र, आग्नेय, वारुण, वायव्य, नारसिंह, गारुड़ आदि अस्त्र चलाए जाते हैं और प्रतिअस्त्रों से उनका शमन होता है; पाशुपत/अघोर-मन्त्र के संयोग से अस्त्र-शासन की तात्त्विक व्यवस्था भी प्रकट होती है। अंततः विष्णु-प्रभावित बाणों की श्रृंखला से जम्भ गिरता है और दैत्य तारक के पास भागते हैं। तारक देवों को दबा देता है, तब विष्णु कपि-रूप का छल धारण कर तारक की सभा में प्रवेश करते हैं और काल व कर्म पर उपदेश देते हैं—सत्ता की अनित्यता, कर्तृत्व का मोह, तथा धर्म की अनिवार्यता। तारक शिक्षा स्वीकार कर देवों को अभय देता है और एक अवधि के लिए उन्हें प्रशासनिक दायित्व सौंपता है; अध्याय का समापन कालाधीन प्रतिनिधि-शक्ति के अंतर्गत लोक-कार्यों के पुनर्वितरण से होता है।

Virāṭ-stuti, Tāraka-vadha-upāya, and Rātri’s Commission for the Goddess’s Rebirth (विराट्स्तुति–तारकवधोपाय–रात्र्यादेशः)
इस अध्याय में नारद बताते हैं कि तारक के अत्याचार से पीड़ित देवता रूप बदलकर छिपे हुए स्वयम्भू ब्रह्मा के पास जाते हैं। ब्रह्मा उन्हें आश्वस्त करते हैं और उनकी विराट-स्तुति स्वीकार करते हैं, जिसमें पाताल से स्वर्ग तक समस्त लोकों को परम-पुरुष के अंगों से जोड़ा गया है; सूर्य, चन्द्र, दिशाएँ और प्राण-मार्ग भी विश्व-शरीर की दिव्य रचना के रूप में वर्णित हैं। फिर देवता बताते हैं कि तारक ने एक पवित्र तट/तीर्थ का विनाश किया, देव-शक्तियों को छीन लिया और जगत की निष्ठा उलट दी। ब्रह्मा वरदान की मर्यादा समझाते हैं—तारक लगभग अवध्य है—और धर्मसम्मत उपाय बताते हैं: सात दिन का एक दिव्य बालक उसका वध करेगा; तथा पूर्व सती देवी हिमाचल की पुत्री बनकर पुनर्जन्म लेंगी और शंकर से पुनर्मिलन हेतु तपस्या ही सिद्धि का अनिवार्य साधन होगी। ब्रह्मा रात्रि (विभावरी) को आदेश देते हैं कि वह मेना के गर्भ में प्रवेश कर देवी के वर्ण को श्यामल करे, जिससे आगे चलकर काली/चामुण्डा-स्वरूप और दैत्य-वध का संकेत प्रकट हो। अंत में देवी के शुभ जन्म के समय जगत में सामंजस्य, धर्मोन्मुख प्रवृत्तियाँ, प्राकृतिक समृद्धि और देव-ऋषि, पर्वत, नदियाँ तथा समुद्रों का उत्सवपूर्ण सहभाग वर्णित है।

Nārada–Himavat-saṃvāda: Pārvatyāḥ Pati-nirdeśa (Narada’s Dialogue with Himavat on Pārvatī’s Destined Spouse)
इस अध्याय में पवित्र भूगोल और गृहधर्म के संदर्भ में संवाद-शैली से कथा आगे बढ़ती है। नारद शैलजा देवी (पार्वती) की देव-अप्सरा आदि कन्याओं के साथ क्रीड़ा का वर्णन करते हैं; फिर मेरु पर इन्द्र (शक्र) उन्हें स्मरण कर बुलाते हैं। इन्द्र निवेदन करता है कि शैलजा का हरा (शिव) से विवाह ही सर्वथा उचित है, अतः नारद इस मिलन के लिए प्रेरणा दें। नारद हिमालय पहुँचते हैं, हिमवान उन्हें आदर से ग्रहण करता है। नारद पर्वत की महिमा—आश्रय, जल, तपस्या-साधन और जीवन-धारण—के रूप में बताते हैं। मेना विनय और भक्ति से आती हैं; पार्वती लज्जाशील बालिका रूप में प्रस्तुत होती हैं। नारद मेना को सौभाग्य, गृहलक्ष्मी-धर्म और वीर संतान के शुभ आशीर्वाद देते हैं। मेना जब पार्वती के भावी पति के विषय में पूछती हैं, तो नारद पहले विरोधाभासी लक्षण बताते हैं—अजन्मा, दिगम्बर, निर्धन, उग्र—जिससे हिमवान व्याकुल हो उठता है और मनुष्य-जन्म की दुर्लभता, गृहस्थ-धर्म तथा धर्म-पालन की कठिनता पर विचार होता है। अंत में नारद रहस्य खोलते हैं कि पार्वती जगन्माता हैं और उनके नियत पति सनातन शंकर हैं—जो अजन्मा होकर भी सर्वत्र विद्यमान, ‘निर्धन’ होकर भी सर्वदाता हैं; इस प्रकार शिव की परात्परता और सान्निध्य का तात्त्विक स्पष्टीकरण देकर अध्याय पूर्ण होता है।

Kāma’s Mission, Śiva’s Yoga, and the Burning of Manmatha (कामदहनप्रसङ्गः)
इस अध्याय में नारद हिमालय से हुई पूर्व बातचीत का वृत्तान्त सुनाते हैं। होने वाली देवी के उठे हुए दाहिने हाथ को वे समस्त प्राणियों के लिए नित्य ‘अभय’ का संकेत बताते हैं। फिर नारद कहते हैं कि लोक-कल्याण हेतु एक महान दिव्य कार्य शेष है—हिमालय-कन्या देवी (पार्वती) के साथ शिव का पुनर्मिलन। नारद के संकेत पर इन्द्र काम (मनमथ) को बुलाते हैं। काम तपस्वी-वेदान्ती दृष्टि से आपत्ति करता है कि इच्छा/कामना ज्ञान पर आवरण है और विवेकियों का शत्रु है, इसलिए उसकी निन्दा होती है। इन्द्र उत्तर देता है कि काम के तीन रूप (तामस, राजस, सात्त्विक) हैं; नियत और शुद्ध कामना से ही संसार के कार्य सिद्ध होते हैं, और संयमित इच्छा उच्च उद्देश्य की साधिका भी बन सकती है। काम वसन्त और रति के साथ शिव-आश्रम पहुँचकर शिव को गहन समाधि में देखता है और भ्रमर-नाद के बहाने सूक्ष्म विघ्न डालकर प्रवेश करना चाहता है। शिव सचेत होकर तृतीय नेत्र की अग्नि छोड़ते हैं और काम भस्म हो जाता है। अग्नि का प्रचण्ड वेग जगत् को दग्ध करने लगे तो शिव उसे चन्द्रमा, पुष्प, संगीत, भ्रमर, कोयल और भोग-रस आदि में विभक्त कर देते हैं—इसी से प्राणियों में विरह-तृष्णा की ‘आग’ बनी रहती है। रति विलाप करती है; शिव उसे आश्वासन देते हैं कि देहधारी जगत् में काम की शक्ति रूपान्तर से कार्य करती रहेगी। वे भविष्यवाणी करते हैं कि जब विष्णु वासुदेव के पुत्र रूप में अवतीर्ण होंगे, तब काम उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में पुनः प्रकट होगा और रति का दाम्पत्य फिर स्थापित होगा।

पार्वतीतपः–ब्रह्मचारिवेषधरीश्वरीक्षण–स्वयंवरप्रसंगः | Pārvatī’s Austerity, Śiva’s Brahmacārin Test, and the Svayaṃvara Episode
अध्याय का आरम्भ अर्जुन के निवेदन से होता है कि नारद सती-वियोग और स्मर (काम) के दहन के बाद शिव के अभिप्राय से जुड़ी “अमृत-सी” कथा फिर से सुनाएँ। नारद तपस्या को महान सिद्धियों का मूल कारण बताते हैं—तप के बिना देह-शुद्धि, योग्यता और बड़े कार्यों की सिद्धि नहीं होती। फिर पार्वती का दुःख और दृढ़ निश्चय वर्णित है। वे केवल भाग्यवाद का खण्डन कर कहती हैं कि फल दैव, पुरुषार्थ और स्वभाव—तीनों के संयोग से होते हैं, और तप सिद्ध साधन है। माता-पिता की कठिन सहमति लेकर वे हिमालय पर क्रमशः आहार-निग्रह करती हैं—अल्पाहार से प्राणाधार तक, और अंत में लगभग पूर्ण उपवास; साथ ही प्रणव-जप और ईश्वर-ध्यान में स्थिर रहती हैं। शिव ब्रह्मचारी-वेष में आकर धर्म-तत्त्व की परीक्षा लेते हैं; बनावटी डूबने की घटना से पार्वती की धर्म-प्रधानता और व्रत-निष्ठा प्रकट होती है। फिर वे शिव के वैराग्य-चिह्नों की निन्दा-सी करके उनके विवेक को परखते हैं; पार्वती श्मशान, सर्प, त्रिशूल और वृषभ आदि को ब्रह्माण्डीय तत्त्वों के प्रतीक बताकर शास्त्रीय उत्तर देती हैं। तब शिव अपना स्वरूप प्रकट कर उन्हें स्वीकार करते हैं और हिमवान को स्वयंवर की व्यवस्था करने को कहते हैं। स्वयंवर में देवता और अनेक प्राणी आते हैं। शिव क्रीड़ा से शिशु-रूप धारण कर देवों के अस्त्र निष्फल कर देते हैं और अपनी प्रभुता दिखाते हैं। ब्रह्मा लीला पहचानकर स्तुति कराते हैं और देवों को दिव्य-दृष्टि मिलती है जिससे वे शिव को यथार्थ देखते हैं। पार्वती शिव को वरमाला पहनाती हैं, सभा जयघोष करती है—अध्याय तप, विवेक और अनुग्रह की महिमा स्थापित करता है।

शिवपार्वतीविवाहः (Śiva–Pārvatī Vivāha: The Cosmic Wedding and Ritual Protocol)
इस अध्याय में शिव–पार्वती के विवाह का विधिपूर्वक स्थापन और उसका विराट्, ब्रह्माण्डीय स्वरूप वर्णित है। ब्रह्मा महादेव से विवाह आरम्भ करने की प्रार्थना करते हैं; तब रत्नजटित विशाल नगर और विवाहमण्डप की रचना होती है। समस्त देवता, ऋषि, गन्धर्व और अप्सराएँ आमंत्रित होते हैं, परन्तु विरोधी दैत्यों को दूर रखा जाता है, ताकि यह आयोजन विश्व-लिटर्जी के समान पवित्र बने। देवगण शिव को विविध अलंकार और चिह्न प्रदान करते हैं—चन्द्र-शिखा, कपर्दा-विन्यास, मुण्डमाला, वस्त्र और आयुध आदि। असंख्य गण तथा दिव्य वादक एकत्र होते हैं; ढोल-नगाड़ों, गीत-नृत्य और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ वरयात्रा आगे बढ़ती है। हिमालय के दरबार में एक विधि-संबंधी प्रश्न उठता है—लाजाहोम के लिए वधू के भाई का अभाव और वर के कुल/गोत्र की चर्चा। विष्णु उमा के भाई का रूप धारण कर दोनों समस्याओं का समाधान करते हैं और संबंध-तर्क द्वारा विधि की शुद्धता बनाए रखते हैं। ब्रह्मा होतृ बनकर यज्ञ सम्पन्न कराते हैं; ब्रह्मा, अग्नि और ऋषियों को हवि तथा दक्षिणा दी जाती है। अंत में फलश्रुति कहती है कि इस विवाह-कथा का श्रवण/पाठ करने से निरन्तर मंगल-वृद्धि और शुभ-समृद्धि प्राप्त होती है।

विघ्नपतिप्रादुर्भावः, गणेशमर्यादा-प्रतिपादनं, तथा उमा-शंकरनर्मसंवादः (Manifestation of Vighnapati, Norms of Merit, and the Uma–Śaṅkara Dialogue)
इस अध्याय में नारद मन्दर पर्वत पर शिव–देवी के दिव्य गृहस्थ-परिसर का वर्णन करते हैं। तारकासुर से पीड़ित देवगण स्तुतियों सहित शंकर की शरण में आते हैं। उसी स्तुति-सन्निधि में देवी के उबटन-मल से गजानन विघ्नपति प्रकट होते हैं; देवी उन्हें पुत्र रूप में स्वीकार करती हैं और शिव उनके शौर्य व करुणा को अपने समान बताते हैं। आगे विघ्नों का धर्म-नियम कहा गया है—जो वेद-धर्म का तिरस्कार करते, शिव/विष्णु का निषेध करते या लोक-रीति को उलटते हैं, उनके जीवन में बार-बार बाधाएँ, गृहकलह और अशान्ति रहती है; जो श्रुति-धर्म, गुरु-आदर और संयम का पालन करते हैं, उनके विघ्न दूर होते हैं। देवी लोक-नीति की ‘मर्यादा’ स्थापित करती हैं—कूप, तालाब, सरोवर आदि बनवाने का पुण्य है, पर वृक्षारोपण और उसका पालन उससे भी श्रेष्ठ फल देता है; जीर्णोद्धार (पुराने का जीर्ण-उद्धार) का फल द्विगुण कहा गया है। फिर शिव के गणों के विविध रूप, निवास और आचरण का वर्णन आता है; उनमें वीरक नामक गण को देवी स्नेहपूर्वक पुत्रवत् ग्रहण करती हैं। अंत में उमा–शंकर का नर्म, किंतु तिक्त-सा संवाद—वाणी, वर्ण-छवि और परस्पर आरोपों के माध्यम से—अर्थ-ग्रहण, आहत-भाव और संबंध-धर्म की सूक्ष्म शिक्षा देता है।

गिरिजातपः-नियमनम् — Pārvatī’s Austerity and Protective Boundary near Śiva
अध्याय में नारद बताते हैं कि प्रस्थान करती हुई गिरिजा (पार्वती) को पर्वत की तेजस्विनी देवी कुसुमामोदिनी मिलती है, जो शिखरनाथ शिव की भक्त है। वह स्नेहपूर्वक पूछती है कि आप कहाँ जा रही हैं; गिरिजा बताती हैं कि शंकर से उत्पन्न मतभेद के कारण यह निर्णय हुआ है। फिर वह देवी के निरंतर सान्निध्य और मातृवत् संरक्षण को स्वीकार कर एक व्यावहारिक-धार्मिक निर्देश देती हैं—यदि कोई अन्य स्त्री पिनाकिन (शिव) के निकट आए, तो पुत्र/अनुचर तुरंत सूचना दे, और उचित निवारण किया जाएगा। इसके बाद गिरिजा एक सुंदर ऊँचे शिखर पर जाकर आभूषण उतारती हैं, वल्कल धारण करती हैं और तप आरंभ करती हैं—ग्रीष्म में पंचाग्नि-साधना तथा वर्षा में जल-नियम। उनके पुत्र/रक्षक वीरक को शिव के समीप मर्यादा-सीमा की रक्षा का दायित्व दिया जाता है; वह सहमति देकर भावुक होकर (गजवक्त्र कहकर संबोधित) निवेदन करता है कि मुझे भी साथ रखें, क्योंकि हमारा भाग्य एक है और छलपूर्ण विरोधियों पर धर्मपूर्वक विजय आवश्यक है। यह प्रसंग तप, कर्तव्य और पवित्र सान्निध्य की नियंत्रित मर्यादा का उपदेश देता है।

आर्बुदाख्यानम् (Arbuda-ākhyāna) and Kaumāra Narrative Cycle: Pārvatī’s Tapas, Māyā-Discernment, and Skanda’s Investiture
इस अध्याय में नारद के माध्यम से अनेक प्रसंगों वाला दिव्य आख्यान आता है। गिरिजा पर्वत की अधिष्ठात्री देवी कुसुमामोदिनी से मिलकर ऊँचे शिखर पर कठोर तप करती हैं और ऋतु-ऋतु के अनुसार शीत, उष्ण और वर्षा आदि कष्ट सहकर तपस्या का तेज प्रकट करती हैं। इसी बीच अन्धक-वंश से जुड़ा असुर आडि ब्रह्मा से शर्तयुक्त वर पाता है—रूप बदलने पर ही उसकी मृत्यु होगी—और छल से शिव के निकट पहुँचकर उमा-जैसा रूप धारण कर अनिष्ट करना चाहता है; शिव शरीर-चिह्नों से कपट पहचानकर उसे शांत कर देते हैं, जिससे माया पर विवेक की विजय दिखती है। भ्रमवश गिरिजा क्रोध में पुत्रवत् द्वारपाल वीरक को शाप देती हैं; पर कथा बताती है कि यह शाप भी विधि का मार्ग है—वीरक शिला से मानव-जन्म लेकर आगे सेवा करेगा। अर्बुद/अर्बुदारण्य की प्रशंसा और अचलेश्वर-लिङ्ग की तारक शक्ति का विशेष वर्णन होता है। ब्रह्मा गिरिजा को रूप-परिवर्तन का वर देते हैं, जिससे कौशिकी देवी प्रकट होती हैं; उन्हें सिंह वाहन, रक्षण-कार्य और दैत्य-विजय का दायित्व मिलता है। फिर कौमार सृष्टि-प्रसंग आता है—स्वाहा द्वारा अग्नि के साथ षडृषियों की पत्नियों के रूप धारण (अरुंधती को छोड़कर), रुद्र-तेज का संचार, उसका निक्षेप, और स्कन्द/गुह का जन्म व पालन-पोषण। विश्वामित्र द्वारा 108 से अधिक नामों का स्तोत्र बताया गया है, जो रक्षा और पवित्रता देता है। बाल-स्कन्द के पराक्रम से देवगण विचलित होते हैं; इन्द्र के वज्र से शाख और नैगमेय आदि तथा मातृगण प्रकट होते हैं; अंत में स्कन्द सेनापति पद स्वीकार कर इन्द्र की राजसत्ता की पुष्टि करते हैं। श्वेतपर्वत पर देवोत्सव और माता-पिता का पुत्र-मिलन, क्रोध के परिणाम, स्तोत्र-यज्ञ-भाग और अर्बुद-क्षेत्र की महिमा—सब एक शिक्षाप्रद क्रम में जुड़ते हैं।

Skanda’s Senāpati-Abhiṣeka at the Mahī–Ocean Confluence (महीसमुद्रसंगमे स्कन्दाभिषेकः)
अध्याय 30 में नारद श्वेतपर्वत से दक्षिण दिशा में तारक-वध हेतु बढ़ते हुए स्कन्द को देखते हैं। साथ ही ग्रह, उपग्रह, वेताल, शाकिनी, उन्माद, अपस्मार, पिशाच आदि विघ्नकारी शक्तियों का उल्लेख करके संयमित आचरण, नियम और भक्ति द्वारा संरक्षण का उपदेश दिया जाता है। फिर कथा मही नदी के तट पर आती है, जहाँ देवगण मही-माहात्म्य का गान करते हैं और विशेषतः मही–समुद्र संगम को समस्त तीर्थों का सार बताते हैं। वहाँ स्नान और पितृ-तर्पण को सर्वत्र फलदायक कहा गया है; जल के खारे होने पर भी उसकी दिव्य प्रभावशीलता को रूपान्तरकारी शक्ति के दृष्टान्तों से समझाया जाता है। इसके बाद देव और ऋषि स्कन्द का सेनापति-अभिषेक विधिपूर्वक करते हैं। अभिषेक-सामग्री एकत्र होती है, मंत्र-शुद्ध हवन होता है और मुख्य ऋत्विजों में ब्रह्मा तथा कपिल का उल्लेख आता है। हवन-कुण्ड में महादेव द्वारा लिङ्ग-रूप का प्राकट्य एक दिव्य प्रमाण के रूप में प्रकट होता है। अंत में सहभागी देवताओं, लोकवर्गों और विविध प्राणियों की विस्तृत गणना होती है; स्कन्द को दान, आयुध, पार्षद तथा अनेक मातृगण प्रदान किए जाते हैं। स्कन्द की विनम्र वंदना और देवों की वरदान-तत्परता के साथ अध्याय समाप्त होता है, जिसमें तीर्थ-गौरव, अभिषेक-विधि, रक्षात्मक नीति और नेतृत्व की दैवी मान्यता एक साथ स्थापित होती है।

Guha’s March to Tārakapura and the Deva-Host: Oath, Mobilization, and Stuti (गुहस्य तारकपुराभियानम्)
अध्याय में नारद बताते हैं कि देवताओं ने गुह (स्कन्द) से वर माँगा—पापी तारक का वध। गुह ने स्वीकार किया, मयूर पर आरूढ़ होकर युद्ध के लिए प्रस्थान किया और एक धर्म-शर्त स्पष्ट की—जो गौ और ब्राह्मण का अपमान करते हैं, उन्हें वह क्षमा नहीं करेगा; अतः यह अभियान विजय-लालसा नहीं, धर्म-रक्षा का संकल्प है। फिर देवसेना का विराट संचलन वर्णित है—शिव पार्वती सहित सिंहों से जुते तेजोमय रथ पर अग्रसर होते हैं, ब्रह्मा लगाम सँभालते हैं; कुबेर, इन्द्र, मरुत, वसु, रुद्र, यम, वरुण तथा आयुध-उपकरणों के देवतुल्य रूप साथ चलते हैं। पीछे से विष्णु समूचे व्यूह की रक्षा करते हुए आते हैं। उत्तर तट पर ताम्र-सी प्राचीर के निकट सेना ठहरती है और स्कन्द तारकपुर की समृद्धि का निरीक्षण करते हैं। इसके बाद दूत-नीति आती है—इन्द्र दूत भेजने का प्रस्ताव रखते हैं; दूत तारक को कठोर चेतावनी देता है कि बाहर निकलो, नहीं तो नगर का विनाश होगा। अपशकुनों से विचलित तारक विशाल देवसेना को देखता है और स्कन्द के ‘महासेन’ नाम से गूँजते जयघोष व स्तुतियाँ सुनता है; अंत में औपचारिक स्तुति द्वारा उनसे देव-शत्रुओं के संहार की प्रार्थना की जाती है।

Tārakāsura–Vadhasya Prastāvaḥ (Prelude to the Slaying of Tāraka) / The Battle with Tāraka and the Release of Śakti
अध्याय 32 में युद्ध और धर्म-चिन्तन दोनों का घना प्रसंग आता है। नारद के समाचार से दैत्यराज तारक सतर्क होकर मंत्रियों को बुलाता है, रणभेरी बजवाकर सेनाएँ जुटाता है और देवताओं पर चढ़ाई करता है। भीषण संग्राम में कुछ समय के लिए देवगण पीछे हटते हैं; कालनेमि के प्रहार से इन्द्र मूर्छित-सा हो जाता है। फिर इन्द्र, शंकर, विष्णु आदि देव अलग-अलग दैत्य-नायकों से भिड़ते हैं और युद्ध का पलड़ा बदलने लगता है। इसी बीच नीति-धर्म का विवाद उठता है। स्कन्द यह सुनकर कि तारक ‘रुद्र-भक्त’ है, उसे मारने में संकोच करता है; विष्णु समझाते हैं कि जो प्राणियों को कष्ट देता और धर्म का विरोध करता है, वह सच्चा भक्त नहीं कहलाता। तारक रुद्र के रथ पर आक्रमण करता है; शिव रणनीति से हटते हैं, जिससे देवताओं का संयुक्त प्रतिआक्रमण होता है और क्षणभर सृष्टि-सी डगमगा जाती है। विष्णु का क्रोध उपदेश से संयत होता है और स्कन्द को अपना उद्देश्य स्मरण कराया जाता है—सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का दमन। अंत में तारक के मस्तक से एक व्यक्त रूप ‘शक्ति’ प्रकट होकर बताती है कि तप से वह उसे मिली थी, पर पुण्य-क्षय की सीमा पर वह उसे छोड़ रही है। तभी स्कन्द शक्ति-अस्त्र छोड़ते हैं; वह तारक के हृदय को भेद देता है और जगत में शान्ति लौट आती है। शुभ पवन, दिशाओं की निर्मलता और देव-स्तुति के साथ अध्याय समाप्त होता है तथा क्रौञ्च पर्वत पर बाण से युद्ध का निर्देश देकर कौमार अभियान आगे बढ़ता है।

Tārakavadhānantara-śoka, Dharmopadeśa, and Tri-liṅga-pratiṣṭhā (प्रतिज्ञेश्वर–कपालेश्वर-स्थापनम्)
अध्याय 33 में नारद तारक के गिरे हुए शरीर का वर्णन करते हैं और देवताओं का विस्मय प्रकट होता है। विजयी होने पर भी स्कन्द (गुह) के मन में धर्मचिन्ता और शोक उठता है; वे उत्सव-स्तुति रोककर कहते हैं कि रुद्र-भक्ति से जुड़े शत्रु के वध के कारण उन्हें प्रायश्चित्त का मार्ग बतलाया जाए। तब वासुदेव श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराण के आधार पर समझाते हैं कि उपद्रवी और हिंसक दुष्ट के दमन में दोष नहीं होता; लोक-व्यवस्था की रक्षा के लिए ऐसे हिंसकों को रोकना आवश्यक है। इसके बाद वे उच्चतर उपाय बताते हैं—रुद्र-आराधना, विशेषतः लिङ्ग-पूजन, सब प्रायश्चित्तों से श्रेष्ठ और कल्याणकारी है। शिव की महिमा हलाहल-धारण, मस्तक पर गङ्गा, त्रिपुर-विजय और दक्ष-यज्ञ के उपाख्यानों से कही जाती है। लिङ्ग का जल व पञ्चामृत से अभिषेक, पुष्पार्चन, नैवेद्य आदि विधियाँ तथा लिङ्ग-प्रतिष्ठा का अद्भुत फल—वंश-उद्धार और रुद्रलोक-प्राप्ति—वर्णित है। शिव स्वयं हरि से अभेद बताकर सम्प्रदाय-सामंजस्य को सिद्धान्त रूप में स्थापित करते हैं। स्कन्द तीन लिङ्गों की स्थापना का संकल्प करते हैं; विश्वकर्मा उन्हें बनाते हैं और प्रतिष्ठा का विधान आता है—प्रतिज्ञेश्वर, कपालेश्वर आदि नाम, अष्टमी और कृष्ण-चतुर्दशी के व्रत, समीप शक्ति-पूजन, ‘शक्तिच्छिद्र’ स्थान तथा एक विशेष तीर्थ की प्रशंसा, जहाँ स्नान-जप से शुद्धि और परलोक-गति प्राप्त होती है।

कुमारेश्वर-लिङ्गप्रतिष्ठा, तीर्थमाहात्म्य, स्तव-फलश्रुति (Kumarēśvara Liṅga Installation, Tīrtha-Greatness, and Hymn’s Fruits)
अध्याय का आरम्भ नारद के कथन से होता है कि ब्रह्मा तीसरे लिंग की प्रतिष्ठा करना चाहते हैं—स्वभाव से शुभ होते हुए भी उसे और अधिक दर्शनीय, मनोहर तथा फलदायक रूप में स्थापित करने का संकल्प करते हैं। देवता स्कन्द के आनन्द हेतु एक रमणीय सरोवर बनाते हैं और गंगा आदि प्रमुख तीर्थों के जल को उसी में एकत्र करते हैं। वैशाख की शुभ तिथि पर ब्रह्मा और ऋत्विज रुद्र-मंत्रों सहित विधिपूर्वक प्रतिष्ठा, हवन और अर्पण करते हैं; गन्धर्व-अप्सराएँ वाद्य-गीत से उत्सव मनाती हैं। स्कन्द स्नान कर ‘सर्व-तीर्थ जल’ से लिंगाभिषेक करते हैं और पाँच मंत्रों से पूजन करते हैं; शिव लिंग के भीतर से पूजन स्वीकार करते हैं। स्कन्द अर्पणों के फल पूछते हैं। शिव विस्तार से बताते हैं कि लिंग-प्रतिष्ठा और मंदिर-निर्माण से शिवलोक में दीर्घ निवास मिलता है। ध्वज, सुगन्ध, दीप, धूप, नैवेद्य, पुष्प, बिल्वपत्र, छत्र, संगीत, घंटा आदि दानों से स्वास्थ्य, समृद्धि, कीर्ति, ज्ञान और पापक्षय जैसे विशिष्ट फल प्राप्त होते हैं। कुमारेश्वर को ‘गुप्त क्षेत्र’ में शिव-निवास बताया गया है, जैसे काशी में विश्वनाथ। स्कन्द एक दीर्घ शैव स्तोत्र का पाठ करते हैं; जो प्रातः-सायं इसका जप करे, उसे शिव कृपा-फल देते हैं। इसके बाद तीर्थ-नियम आते हैं—महिषासागर-संगम में विशेष चन्द्र-सूर्य अवसरों पर स्नान-पूजन से महान पुण्य होता है। अनावृष्टि-निवारण का विधान भी है: कई रात्रियों तक सुगन्धित जल से अभिषेक, अर्पण, ब्राह्मण-भोजन, होम, दान और रुद्र-जप; इससे वर्षा और लोक-कल्याण सिद्ध होता है। नियमित पूजन से जाति-स्मृति, तीर्थ में देहान्त से रुद्रलोक-प्राप्ति, तथा कपर्दी (गणेश) द्वारा विघ्न-नाश का आश्वासन दिया गया है। अंत में परशुराम आदि भक्तों के उदाहरण और यह आदेश कि माहात्म्य का पाठ/श्रवण इष्टफल देता है; श्राद्ध में पढ़ने से पितरों का हित और गर्भवती को सुनाने से शुभ संतान की प्राप्ति होती है।

जयस्तम्भ-स्थापनम् तथा स्तम्भेश्वर-लिङ्गप्रतिष्ठा (Installation of the Victory Pillar and the Stambheśvara Liṅga)
इस अध्याय में नारद के प्रसंग से देवगण गुहा-स्कन्द के पास हाथ जोड़कर आते हैं और निवेदन करते हैं कि युद्ध में शत्रुओं पर विजय पाने वाले विजेता की परम्परा है कि वह विजय-चिह्नयुक्त स्तम्भ (जयस्तम्भ) स्थापित करे। स्कन्द की विजय-स्मृति हेतु वे विश्वकर्मा-निर्मित उत्तम स्तम्भ, जो श्रेष्ठ लिङ्ग-परम्परा से सम्बद्ध है, स्थापित करने का प्रस्ताव रखते हैं। स्कन्द की अनुमति से इन्द्र (शक्र) आदि देव रणभूमि में जाम्बूनद-स्वर्ण-सा दीप्तिमान स्तम्भ प्रतिष्ठित करते हैं; यज्ञभूमि रत्न-कल्प अलंकारों से सजती है। अप्सराएँ गीत-नृत्य करती हैं, विष्णु वादन-सहाय बनते हैं और आकाश से पुष्पवृष्टि देव-अनुमोदन का संकेत होती है। इसके बाद स्तम्भेश्वर नामक शिवलिङ्ग की स्थापना स्वयं त्रिनेत्र-प्रभु के पुत्र स्कन्द करते हैं। समीप ही स्कन्द एक कूप बनाते हैं, जिसके भीतर से गङ्गा के प्रकट होने का वर्णन है—जल-पावनता और लिङ्ग-पावनता का संगम। माघ कृष्ण चतुर्दशी को कूप-स्नान कर पितृ-तर्पण करने से गया-श्राद्ध के तुल्य पुण्य कहा गया है। सुगन्ध और पुष्पों से स्तम्भेश्वर-पूजन वाजपेय यज्ञ-समान फल देता है; अमावस्या-पूर्णिमा के श्राद्ध, विशेषतः पृथ्वी-समुद्र-संगम की भावना के साथ, स्तम्भेश्वर-आराधना सहित करने से पितर तृप्त होते हैं, पाप नष्ट होते हैं और रुद्रलोक में उत्कर्ष प्राप्त होता है। अंत में कहा गया है कि यह उपदेश रुद्र ने स्कन्द के प्रियार्थ कहा और देवताओं ने इस प्रतिष्ठा की प्रशंसा की।

सिद्धेश्वरलिङ्ग-स्थापनम् तथा सिद्धकूप-माहात्म्यम् (Establishment of Siddheśvara Liṅga and the Glory of Siddhakūpa)
इस अध्याय में स्थल और समुद्र के संगम पर स्कन्द द्वारा पूर्व में स्थापित अनेक लिङ्गों को देखकर ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवगण एकत्र होते हैं। बिखरी हुई पूजा की कठिनाई पर विचार कर वे सामूहिक भक्ति और क्षेत्र-स्थैर्य हेतु एक ही शुभ लिङ्ग स्थापित करने का निश्चय करते हैं। महेश्वर की अनुमति से ब्रह्मा-निर्मित लिङ्ग की स्थापना होती है, जिसे गुह ‘सिद्धेश्वर’ नाम देते हैं; साथ ही एक पवित्र सरोवर खोदकर विविध तीर्थ-जल से भर दिया जाता है। फिर कथा पाताल के संकट की ओर मुड़ती है—तारक-युद्ध के बाद भागे हुए नाग प्रलम्ब दैत्य के अत्याचार बताते हैं। स्कन्द अपनी शक्ति को पाताल भेजते हैं; वह पृथ्वी को भेदकर प्रलम्ब का वध करती है और जो दरार बनती है वह शुद्ध करने वाली पाताल-गङ्गा के जल से भर जाती है। स्कन्द इस स्थान को ‘सिद्धकूप’ कहते हैं और कृष्णाष्टमी व चतुर्दशी को स्नान, सिद्धेश्वर-पूजन तथा श्राद्ध का विधान करते हैं, जिससे पाप नष्ट होते हैं और स्थायी फल मिलता है। क्षेत्र की प्रतिष्ठा हेतु सिद्धाम्बिका की स्थापना, क्षेत्रपालों की नियुक्ति (चौंसठ महेश्वर सहित) तथा आरम्भ-सिद्धि के लिए सिद्धिविनायक की स्थापना भी कही गई है। अंत में फलश्रुति में पाठ-श्रवण से समृद्धि, रक्षा और अंततः षण्मुख के लोक की निकटता का फल बताया गया है।

बर्बरीतीर्थमाहात्म्य-प्रस्तावना तथा सृष्टि-भूगोलवर्णनम् (Barbarī Tīrtha Prologue and Cosmography of Creation)
अध्याय का आरम्भ नारद के इस वचन से होता है कि वे अर्जुन को बर्बरी/बरबरी तीर्थ का माहात्म्य सुनाएँगे। यहाँ बर्बरिका को ‘कुमारी’ भी कहा गया है और कौमारिकाखण्ड को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ देने वाला बताया गया है। अर्जुन कुमारी की कथा का विस्तार, सृष्टि में कर्मभेद कैसे उत्पन्न होता है, और भारतखण्ड की रचना-विन्यास जानना चाहता है। नारद तत्त्वमय सृष्टिक्रम बताते हैं—अव्यक्त से, प्रधाना और पुरुष के संयोग से महत्, फिर त्रिगुणात्मक अहंकार, तन्मात्राएँ, पंचभूत, मन सहित ग्यारह इन्द्रियाँ, और इस प्रकार चौबीस तत्त्वों की पूर्ण व्यवस्था। इसके बाद ब्रह्माण्ड को बुलबुले-से अण्डाकार रूप में वर्णित किया गया है, जिसमें ऊपर देव, मध्य में मनुष्य और नीचे नाग-दैत्य आदि का निवास बताया गया है। फिर सात द्वीपों और उनके चारों ओर भिन्न-भिन्न द्रव्यों के समुद्रों का वर्णन आता है। मेरु के प्रमाण, दिशाओं के पर्वत, वन-सरिताएँ/सर, सीमापर्वत तथा जम्बूद्वीप के वर्ष-विभाग बताए गए हैं; ऋषभ के पुत्र नाभि और उनके वंशज भरत के कारण ‘भारत’ नाम की उत्पत्ति कही गई है। शाक, कुश, क्रौञ्च, शाल्मलि, गोमेद और पुष्कर द्वीपों के शासक, विभाग और वहाँ की उपासना-पद्धतियाँ—वायु, जातवेदस्/अग्नि, आपः, सोम, सूर्य तथा ब्रह्म-चिन्तन—का निर्देश देकर अध्याय ऊर्ध्वलोक-व्यवस्था की ओर बढ़ता है।

रथ-मण्डल-लोकविन्यासः (Cosmography of Chariots, Spheres, and Lokas)
इस अध्याय में नारद के मुख से ब्रह्माण्डीय ज्योतिष-रचना का सूक्ष्म वर्णन आता है। सूर्य-मण्डल और उसके रथ की बनावट—अक्ष, चक्र, माप-प्रमाण—बताए गए हैं, तथा सूर्य के सात अश्वों को वैदिक छन्दों (गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुभ्, अनुष्टुभ्, पंक्ति) से जोड़ा गया है। उदय और अस्त को वास्तविक नाश नहीं, केवल दृष्टि में प्रकट-अप्रकट होना कहा गया है; उत्तरायण-दक्षिणायन में राशियों के मार्ग और गति-भेद को कुम्हार के चाक के दृष्टान्त से समझाया गया है। सन्ध्या-काल में सूर्य को हानि पहुँचाने वाले प्राणियों के संघर्ष का उल्लेख है और गायत्री से शुद्ध जल-तर्पण सहित सन्ध्या-आचरण को धर्मरक्षा व नैतिक संरक्षण का साधन बताया गया है। आगे चन्द्र-मण्डल, नक्षत्र-मण्डल, ग्रहों के स्थान व रथ, सप्तर्षि-मण्डल तक की व्यवस्था और ध्रुव को ज्योतिष-चक्र का धुरी/अक्ष माना गया है। भूर्, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य—इन सात लोकों की गणना, उनकी दूरियाँ तथा कृतक-अकृतक स्वरूप का संकेत मिलता है। अंत में गङ्गा की विश्व-स्थिति और सात वायु-स्कन्धों का वर्णन है जो दिव्य-तंत्र को बाँधकर घुमाते हैं, और यहीं से पाताल-वर्णन की ओर संक्रमण होता है।

Pātāla–Naraka Cosmography and the Barkareśvara–Stambhatīrtha Māhātmya (कालमान-वर्णन सहित)
अध्याय 39 में पाताल और नरकों का विस्तृत, उपदेशात्मक वर्णन आता है। नारद अतल से पाताल तक सातों पाताल-लोकों को अत्यन्त रमणीय बताकर वहाँ दानव, दैत्य और नागों की निवास-व्यवस्था कहते हैं, तथा ब्रह्मा द्वारा प्रतिष्ठित ‘श्रीहाटकेश्वर’ नामक महान् लिंग का उल्लेख करते हैं। इसके बाद पातालों के नीचे स्थित अनेक नरकों की गणना करते हुए मिथ्या साक्ष्य, हिंसा, नशे का दुरुपयोग, गुरु/अतिथि-धर्म का उल्लंघन और अधर्माचरण जैसे पापों को उनके-उनके नरकों से जोड़कर कर्मफल का स्पष्ट बोध कराते हैं। फिर वर्णन ‘ब्रह्माण्ड-यंत्र’ की ओर बढ़ता है—कालाग्नि, अनन्त, दिग्गज और जगत् को घेरे ‘कटाह’ का निरूपण होता है। निमेष से लेकर युग, मन्वन्तर और कल्प तक काल-मान की क्रमबद्ध गणना तथा कुछ नामित कल्पों का भी उल्लेख मिलता है। इसके बाद स्तम्भतीर्थ की कथा आती है: समुद्र-भूमि संगम के निकट पूर्वजन्म के कारण से बर्करी-मुखी कुमारीका तप और तीर्थ-क्रियाओं द्वारा शुद्धि पाकर ‘बर्करेश्वर’ की स्थापना करती है और ‘स्वस्तिक-कूप’ प्रसिद्ध होता है। वहाँ दाह-संस्कार और अस्थि-विसर्जन के स्थायी शुभ-फल बताए गए हैं। अंत में भारतखण्ड का वंशानुसार विभाजन, प्रमुख पर्वतों व नदियों के उद्गम, तथा अनेक प्रदेशों के ग्राम/पत्तन-गणना सहित पवित्र भूगोल का पुराणोक्त मानचित्र प्रस्तुत होता है।

Mahākāla-prādurbhāva and the Discourse on Tarpaṇa, Śrāddha, and Yuga-Dharma (महाकालप्रादुर्भावः)
अर्जुन नारद से पूछते हैं कि एक विशेष तीर्थ में महाकाल कौन हैं और उनकी प्राप्ति कैसे होती है। नारद वाराणसी के तपस्वी माण्डि की कथा सुनाते हैं, जो पुत्र-प्राप्ति के लिए दीर्घकाल तक रुद्र-जप करते हैं। शिव उन्हें अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र का वर देते हैं, पर वह बालक वर्षों तक गर्भ में रहकर ‘काल-मार्ग’ से भय व्यक्त करता है और मुक्ति से जुड़े ‘अर्चिस्-पथ’ का संकेत देता है। शिव की कृपा और ‘विभूतियों’ के प्राकट्य से उसका जन्म होता है और उसका नाम ‘कालभीति’ पड़ता है। कालभीति पाशुपत भक्त बनकर तीर्थ-यात्रा करते हुए बिल्व-वृक्ष के नीचे कठोर मंत्र-जप करते हैं और परमानन्द में स्थित होकर उस स्थान की अद्भुत पवित्रता व प्रभाव को पहचानते हैं। शत-वर्षीय व्रत के दौरान एक रहस्यमय पुरुष जल देने आता है; शुद्धि, कुल-ज्ञान और दान-ग्रहण की मर्यादा पर विवाद होता है, और अंत में एक गड्ढे का सरोवर बन जाना चमत्कार रूप में दिखाया जाता है। वह पुरुष अंतर्धान हो जाता है और विशाल स्वयम्भू लिंग प्रकट होता है; देव-उत्सव होता है। कालभीति बहुमुखी शिव-स्तोत्र करते हैं; शिव प्रकट होकर उनके धर्म की प्रशंसा करते हैं और वर देते हैं—स्वयम्भू लिंग में नित्य निवास, वहाँ पूजा-दान का अक्षय फल, तथा पास के कूप में स्नान और पितृ-तर्पण से सर्व-तीर्थ फल, साथ ही विशेष तिथियों के विधान। बाद में राजा करन्धम आते हैं और पूछते हैं कि जल-तर्पण पितरों तक कैसे पहुँचता है और श्राद्ध का फल कैसे सिद्ध होता है। महाकाल सूक्ष्म तत्त्वों द्वारा ग्रहण (इन्द्रिय-तन्मात्रा के माध्यम से), मंत्र-सहित अर्पण की अनिवार्यता, तथा दर्भ, तिल और अक्षत के रक्षात्मक प्रयोजन का विवेचन करते हैं। फिर चार युगों के धर्म बताते हैं—सत्ययुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में नियम-आचार, और कलि में दान—और कलियुग की स्थितियों तथा धर्म-पुनरुत्थान के संकेतों का वर्णन करते हैं।

Adhyāya 41 — Deva-tāratamya-vicāra, Pāpa-vibhāga, Śiva-pūjā-vidhi, and Ācāra-saṅgraha (Mahākāla’s Instruction)
इस अध्याय में महाकाल, करण्ढम के प्रश्नों के उत्तर में क्रमबद्ध धर्म-उपदेश देते हैं। पहले देव-तारतम्य का विचार आता है—कोई शिव को, कोई विष्णु को, कोई ब्रह्मा को मोक्ष का साधन मानता है; महाकाल सरल ‘श्रेष्ठता’ के दावे से सावधान करते हैं और नैमिषारण्य के ऋषियों की पूर्व कथा स्मरण कराते हैं, जहाँ अनेक दिव्य रूपों का सम्मान स्वीकार किया गया। फिर पाप-विभाग बताया जाता है—मानसिक, वाचिक और कायिक दोष; शिव-द्वेष को अत्यन्त घोर कहा गया है; महापातक, उपपातक तथा छल, क्रूरता, शोषण, निन्दा आदि सामाजिक-अनैतिक कर्मों की श्रेणियाँ भी दी जाती हैं। इसके बाद संक्षिप्त किन्तु तकनीकी शिव-पूजा-विधि आती है—पूजा के समय, शुद्धि (भस्म सहित), मंदिर-प्रवेश व स्वच्छता, जल-पात्र (गडुक) की व्यवस्था, अर्पण, ध्यान, मंत्र-प्रयोग (मूलमंत्र सहित), अर्घ्य, धूप-दीप-नैवेद्य, नीराजन तथा अंत में स्तोत्र और अपराध-क्षमा की प्रार्थना। फिर गृहस्थ-भक्त के लिए विस्तृत आचार-संग्रह—संध्या-वंदन, वाणी-संयम, देह-शुचिता, बड़ों व पवित्र वस्तुओं का आदर, और धर्म-रक्षा हेतु व्यवहार-नियम। अंत में देव-सभा महाकाल का सम्मान करती है, लिंग और तीर्थ की कीर्ति प्रतिपादित होती है, तथा श्रवण, पाठ और पूजा करने वालों के फल का वर्णन किया जाता है।

Aitareya-Māhātmya and Ekādaśī-Jāgara: Vāsudeva Installation, Bhāva-Śuddhi, and Liberation Theology
यह अध्याय तीन परस्पर जुड़े प्रसंगों में चलता है। पहले नारद तीर्थ-तत्त्व बताते हैं—वासुदेव के बिना तीर्थ अपूर्ण है। वे दीर्घ योग-पूजन और अष्टाक्षर-जप करते हुए लोक-कल्याण हेतु विष्णु की एक ‘कला’ की स्थापना की प्रार्थना करते हैं; भगवान् विष्णु स्वीकार करते हैं और वासुदेव की प्रतिष्ठा से उस स्थान की विशेष ख्याति तथा विधि-प्रामाण्य स्थापित होता है। दूसरे भाग में कार्त्तिक शुक्ल एकादशी का व्रत-विधान है—निर्दिष्ट जल में स्नान, पंचोपचार पूजा, उपवास, रात्रि-जागरण में कीर्तन/पाठ/वाद्य, क्रोध-मान का त्याग और दान। भक्तिमय आचार-गुणों का आदर्श रूप बताया गया है और कहा गया है कि पूर्ण जागरण करने वाला फिर जन्म नहीं लेता। तीसरे भाग में उपदेशात्मक दृष्टान्त आता है। अर्जुन के पूछने पर नारद ऐतरेय की वंश-परंपरा, निरंतर मंत्र-जप के कारण उसकी मौन-सी अवस्था और गृह-तनाव का वर्णन करते हैं। ऐतरेय देहधारी जीवन के व्यापक दुःख, बाह्य शुद्धि की सीमा और भाव-शुद्धि की अनिवार्यता समझाकर निरवेद→वैराग्य→ज्ञान→विष्णु-साक्षात्कार→मोक्ष का क्रम बताते हैं। विष्णु प्रकट होकर उसके स्तोत्र से प्रसन्न होते हैं, वर देते हैं, स्तोत्र को ‘अघा-नाशन’ प्रभाव वाला कहते हैं और कोटितीर्थ व हरिमेधस प्रसंग का निर्देश देते हैं; अंततः ऐतरेय वासुदेव-स्मरण से मुक्ति पाता है।

Bhattāditya-pratiṣṭhā, Sūrya-stuti (aṣṭottara-śata-nāma), and Arghya-vidhi at Kāmarūpa
इस अध्याय में संवाद-रूप से नारद अर्जुन को लोक-कल्याण हेतु की गई सूर्य-भक्ति का वृत्तान्त सुनाते हैं। आरम्भ में सूर्य को जगत् का धारक, प्राणियों का पोषक और सर्वव्यापक नियन्ता कहकर तत्त्वतः स्तुति की जाती है तथा बताया जाता है कि स्मरण, स्तवन और नित्य-पूजा से लौकिक सिद्धि और रक्षा—दोनों प्राप्त होते हैं। फिर नारद के दीर्घ तप का वर्णन है, जिसके फलस्वरूप सूर्य साक्षात् प्रकट होकर वर देते हैं कि उनकी ‘कामरूप-कला’ वहाँ सदा प्रतिष्ठित रहेगी। इसके बाद नारद ‘भट्टादित्य’ नाम से देवता की प्रतिष्ठा करते हैं और अष्टोत्तर-शतनाम शैली में विस्तृत सूर्य-स्तुति करते हैं, जिसमें सूर्य को जगत्-शासक, वैद्य, धर्म-समर्थक और दुःख-रोग-नाशक रूप में अनेक नामों से स्मरण किया गया है। आगे अर्जुन के पूछने पर अर्घ्य-विधि का तकनीकी विधान आता है—प्रातः शुद्धि, मण्डल-रचना, अर्घ्य-पात्र की सामग्री, द्वादश-रूप सूर्य का ध्यान, आवाहन-मन्त्र, तथा पाद्य, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि उपचार; अंत में क्षमा-प्रार्थना और विसर्जन। अंततः क्षेत्र-माहात्म्य में वन-कुण्ड, माघ शुक्ल सप्तमी का स्नान, रथ-पूजा व रथयात्रा, तथा महातीर्थ-सदृश फल का वर्णन है; भट्टादित्य की सतत उपस्थिति से पाप-नाश और धर्म-वृद्धि का आश्वासन दिया गया है।

दिव्य-शपथ-प्रकरणम् (Divya Ordeals and Oath-Procedure Discourse)
अर्जुन प्रमाण न मिलने पर चल रहे विवादों में ‘दिव्य’—अर्थात् सत्य-परीक्षा के विधानों का स्पष्ट विवेचन पूछते हैं। नारद मान्य दिव्यों का वर्णन करते हुए बताते हैं कि शपथ और दिव्य-प्रक्रियाएँ शासन-धर्म में सत्य स्थापित करने हेतु, विवाद, अभियोग और गंभीर अपराधों में ही नियत रूप से प्रयुक्त हों। अध्याय बार-बार चेताता है कि झूठी शपथ देव-साक्षियों से छिपती नहीं—सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, पृथ्वी, जल, हृदय/अंतरात्मा, यम, दिन-रात, संध्या और धर्म साक्षी हैं; छल या हल्केपन से ली गई शपथ विनाश का कारण बनती है। फिर तुला/घट-आधारित तौल-दिव्य, विष-दिव्य, तप्त लोहे द्वारा अग्नि-दिव्य, तप्तमाष/स्वर्ण-ग्रहण, फाल/जिह्वा-परीक्षा, तण्डुल-विधि (विशेषतः चोरी के प्रसंग में) तथा जल-दिव्य (डूबने की अवधि) आदि के क्रमबद्ध नियम, सामग्री, माप, अधिकारी और उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण लक्षण बताए जाते हैं। अंत में इन्हें राजाओं व अधिकारियों के लिए नियंत्रित साधन मानकर, निष्पक्ष व कुशल संचालकों तथा कपट-निवारण के उपायों के साथ ही प्रयोग करने की शिक्षा दी जाती है।

बहूदकतīर्थे नन्दभद्र-सत्यव्रतसंवादः (Nandabhadra–Satyavrata Dialogue at Bahūdaka Tīrtha)
अध्याय 45 में नारद कामरूप के बहूदक तीर्थ में इस संवाद का प्रसंग स्थापित करते हैं। वे तीर्थ के नाम और महिमा का कारण बताते हैं—कपिल मुनि की तपस्या तथा कपिलेश्वर लिंग की प्रतिष्ठा से यह स्थान अत्यन्त पावन हुआ। फिर नन्दभद्र का परिचय एक आदर्श धर्मात्मा के रूप में होता है—मन, वाणी और कर्म में संयमी, शिव-पूजा में रत, और छल-कपट से रहित न्यायपूर्ण आजीविका (अल्प लाभ वाला निष्कपट व्यापार) करने वाला। वह यज्ञ, संन्यास, कृषि, राजसत्ता और तीर्थयात्रा की केवल बाहरी प्रशंसा को अस्वीकार करता है; शुद्धता और अहिंसा से रहित कर्मों को निष्फल बताता है। उसके अनुसार सच्चा यज्ञ वही है जो निष्कपट भक्ति से देवताओं को प्रसन्न करे, और आत्मा पाप-त्याग से शुद्ध होती है। पास का संशयवादी सत्यव्रत नन्दभद्र में दोष खोजता है और पुत्र तथा पत्नी के वियोग जैसे दुःखों को धर्म और लिंग-पूजा के विरुद्ध प्रमाण मानता है। वह वाणी के गुण-दोषों का तकनीकी विवेचन करके ‘स्वभाव’ को ही कारण मानने वाला ईश्वर-निरपेक्ष मत रखता है। नन्दभद्र उत्तर देता है कि दुःख अधर्मियों को भी होता है; वह देवताओं और वीरों द्वारा लिंग-स्थापन के उदाहरण देकर लिंग-पूजा की रक्षा करता है और अलंकारयुक्त परन्तु असंगत वाणी से सावधान करता है। अंत में वह बहूदक-कुण्ड की ओर प्रस्थान करता है और वेद, स्मृति तथा धर्मसम्मत युक्ति—इन विश्वसनीय प्रमाणों पर स्थित धर्म को ही प्रामाण्य मानकर निष्कर्ष देता है।

Bahūdaka-kuṇḍa Māhātmya and the Instruction on Guṇas, Karma, and Detachment (बाहूदककुण्डमाहात्म्यं तथा गुणकर्मवैराग्योपदेशः)
इस अध्याय में बहूदक-कुण्ड के तट पर कपिलेश्वर-लिङ्ग की पूजा करके नन्दभद्र संसार की विषमता पर प्रश्न उठाते हैं—निर्लेप भगवान् ने दुःख, वियोग और स्वर्ग-नरक जैसी असमान गतियों वाला जगत् क्यों रचा। तभी सात वर्ष का रोगी बालक आकर समाधान देता है—शारीरिक और मानसिक दुःख के कारण पहचाने जा सकते हैं; मानसिक पीड़ा का मूल ‘स्नेह’ (आसक्ति) है, जिससे राग, काम, क्रोध और तृष्णा उत्पन्न होते हैं। नन्दभद्र पूछते हैं कि अहंकार, काम और क्रोध को त्यागकर भी धर्म का आचरण कैसे हो। बालक प्रकृति-पुरुष, गुणों की उत्पत्ति, अहंकार, तन्मात्रा और इन्द्रियों के प्रादुर्भाव का वर्णन कर बताता है कि रजस्-तमस् को सत्त्व द्वारा शुद्ध करना ही साधना है। वह यह भी समझाता है कि भक्तों को भी दुःख क्यों मिलता है—पूजा की शुद्धि-अशुद्धि, कर्मफल की अनिवार्यता और ईश्वर-कृपा के विधान से; कृपा से कहीं फल का संक्षिप्त भोग होता है, कहीं जन्म-जन्मान्तर में फल का क्षय। अन्त में बालक अपना पूर्वजन्म बताता है—कपट उपदेशक नरक में दण्डित हुआ, अनेक योनियों में भटका, फिर व्यासजी के सारस्वत मन्त्र से अनुगृहीत हुआ। वह बहूदक में एक विधि बताता है—सप्ताह-उपवास और सूर्य-जप, निर्दिष्ट तीर्थ में दाह-संस्कार, अस्थि-विसर्जन और बहूदक में भास्कर-प्रतिमा की प्रतिष्ठा। फलश्रुति में स्नान, दान, तर्पण, कर्म, भोजन-सेवा, स्त्रियों के सत्कार, योगाभ्यास और श्रद्धापूर्वक श्रवण से पुण्य तथा मोक्षाभिमुख फल कहा गया है।

Śakti-vyāpti, Digdevī-sthāpana, Navadurgā-pratiṣṭhā, and Tīrtha-phalapradāna (Chapter 47)
अध्याय 47 में शक्ति का सुव्यवस्थित तात्त्विक निरूपण है। उसे नित्य प्रकृति और सर्वव्यापिनी कहा गया है, जैसे परमेश्वर की सर्वव्याप्ति; वही शक्ति उपासना और अभिमुखता से मोक्षदायिनी, और विमुखता से बन्धनकारिणी बनती है। शक्ति की अवहेलना करने वालों का आध्यात्मिक पतन वाराणसी के पतित योगियों के दृष्टान्त से दिखाया गया है। इसके बाद दिग्-लिटर्जिकल भूगोल बताया गया है—चारों दिशाओं में चार महाशक्तियों की स्थापना: पूर्व में सिद्धाम्बिका, दक्षिण में तारा (कूर्म-प्रसंग से जुड़ी, वेद-धर्म की रक्षिका), पश्चिम में भास्करा (सूर्य-नक्षत्रादि को तेज देने वाली), और उत्तर में योगनन्दिनी (योग-शुद्धि तथा सनकादि से सम्बद्ध)। फिर तीर्थ में नवदुर्गाओं की प्रतिष्ठा आती है—त्रिपुरा, कोलम्बा (रुद्राणी-संबद्ध कुण्ड/कूप; माघ अष्टमी स्नान-विशेष; महान तीर्थों से भी श्रेष्ठता का कथन), कपालेशी, सुवर्णाक्षी, ‘चर्चिता’ नाम से महादुर्गा (पराक्रमदायिनी; बन्धनग्रस्त वीर के भविष्य-उदाहरण से), त्रैलोक्यविजया (सोमलोक से), एकवीरा (प्रलय-शक्ति), हरसिद्धि (रुद्रदेह से उत्पन्न; डाकिनी-विघ्न नाशिनी), और ईशान कोण में चण्डिका/नवमी (चण्ड-मुण्ड, अन्धक, रक्तबीज आदि संग्राम-प्रसंग)। नवरात्र-पूजा का विधान बलि, पूपा, नैवेद्य, धूप, गन्ध आदि अर्पणों सहित बताया गया है और चौराहों/मार्गों जैसे सार्वजनिक स्थानों में भी रक्षा-फल का वर्णन है। भूतमाता/गुहाशक्ति उपद्रवी प्राणियों की सीमा बाँधकर वैशाख-दर्शा के दिन निर्दिष्ट उपहारों से पूजन करने वालों को वर देती है। अंत में तीर्थ को अनेक देवियों के अनेक स्थानों का आश्रय बताकर, धर्म-व्यवस्था, संरक्षण और इच्छित सिद्धि हेतु विधिपूर्वक आराधना को मुख्य साधन कहा गया है।

स्तम्भतीर्थमाहात्म्ये सोमनाथवृत्तान्तवर्णनम् (Somanātha Account within the Glory of Stambha-tīrtha)
अध्याय का आरम्भ नारद के वचन से होता है कि वे स्तम्भतीर्थ-माहात्म्य के अंतर्गत सोमनाथ की महिमा स्पष्ट रूप से बताएँगे; सुनना और पाठ करना पाप-नाशक साधन कहा गया है। तेजस्वी ब्राह्मण ऊर्जयन्त और प्रालेय प्रभास तथा उसके तीर्थों की प्रशंसा करने वाला एक श्लोक सुनकर स्नान-यात्रा का संकल्प करते हैं। वे वन-नदियों को पार करते हुए नर्मदा को भी लाँघते हैं और उस पवित्र प्रदेश में पहुँचते हैं जहाँ भूमि और समुद्र का संगम-सा दृश्य है; श्रम, भूख और प्यास उनकी तीर्थ-निष्ठा की परीक्षा बनते हैं। सिद्धलिंग के पास वे मूर्छित-से गिरते हैं और सिद्धनाथ को प्रणाम करते हैं। उसी सीमांत अवस्था में लिंग के प्रादुर्भाव, आकाशवाणी और पुष्प-वृष्टि का वर्णन आता है; प्रालेय को सोमनाथ के तुल्य फल प्राप्त होता है और समुद्र-तट पर स्थापित एक लिंग का संकेत दिया जाता है। फिर कथा प्रभास की ओर मुड़कर यात्रिक-द्वय से जुड़ी ‘द्विविध सोमनाथ’ की भावना प्रकट करती है। इसके बाद हाटकेश्वर का प्रसंग आता है—ब्रह्मा द्वारा लिंग-प्रतिष्ठा का वर्णन और फिर एक सुव्यवस्थित स्तुति, जिसमें शिव के विश्वरूप (अष्टमूर्ति-सदृश—सूर्य/अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश-शब्द आदि) गिनाए गए हैं। फलश्रुति में कहा गया है कि ब्रह्मा की स्तुति का श्रवण-पाठ और हाटकेश्वर का स्मरण करने से अष्टविध शिव में सायुज्य/समीप्य मिलता है तथा भूमि-समुद्र संगम पर पुण्य-स्थानों की अपार समृद्धि सिद्ध होती है।

Jayāditya-Māhātmya and the Discourse on Karma, Rebirth, and the ‘Twofold Food’
अर्जुन महीनगरक में स्थापित प्रमुख तीर्थों का वर्णन पूछते हैं। नारद उस क्षेत्र का परिचय देकर जयादित्य (सूर्य-स्वरूप) की महिमा बताते हैं—उसके नाम-स्मरण से रोगों का शमन और हृदय की कामनाओं की पूर्ति होती है, तथा उसका दर्शन भी परम मंगलकारी माना गया है। नारद पूर्व प्रसंग सुनाते हैं: वे सूर्यलोक गए, जहाँ भास्कर ने पूछा कि नारद द्वारा बसाए गए स्थान के ब्राह्मण कैसे हैं। नारद स्तुति या निंदा—दोनों के नैतिक दोष बताकर निर्णय देवता पर छोड़ देते हैं। तब भास्कर वृद्ध ब्राह्मण का वेश धरकर तट-प्रदेश में आते हैं; हारित के नेतृत्व में स्थानीय ब्राह्मण उन्हें अतिथि मानकर आदर देते हैं। अतिथि ‘परम-भोजन’ माँगते हैं। हारित-पुत्र कमठ बताते हैं कि भोजन दो प्रकार का है—एक साधारण, जो शरीर को तृप्त करता है; दूसरा ‘परम’, जो धर्मोपदेश के श्रवण-शिक्षण से आत्मा/क्षेत्रज्ञ को पोषण देता है। फिर अतिथि जन्म, लय और भस्म होने के बाद जीव की गति पूछते हैं; कमठ सात्त्विक, तामस और मिश्र कर्मों के अनुसार स्वर्ग, नरक, तिर्यक और मानव-योनियों में पुनर्जन्म का विधान बताते हैं। आगे गर्भ-उत्पत्ति, गर्भस्थ दुःख और देह को क्षेत्रज्ञ का ‘गृह’ कहकर यह निष्कर्ष आता है कि कर्म और ज्ञान से ही मोक्ष, स्वर्ग और नरक की प्राप्ति होती है।

Śarīra–Brahmāṇḍa-sāmya, Dhātu–Nāḍī-vyavasthā, and Karma–Preta-yātrā (Body–Cosmos Correspondence and Post-mortem Ethics)
यह अध्याय संवाद-रूप में एक तकनीकी धर्म-तत्त्व-विचार प्रस्तुत करता है। अतिथि शरीर के लक्षणों का उपदेश माँगते हैं; कमठ बताते हैं कि शरीर ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म प्रतिरूप है—पाताल से सत्यलोक तक के लोक-स्तर शरीर में मानो अंकित हैं। फिर सात धातुओं (त्वचा, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र), अस्थियों व नाड़ियों की संख्या, तथा प्रमुख अंग-प्रत्यंग और आन्तरिक अवयवों का वर्णन आता है। इसके बाद क्रियात्मक शरीर-विज्ञान बताया गया है—मुख्य नाड़ियाँ (सुषुम्ना, इड़ा, पिङ्गला), पाँच वायु (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) और उनके कर्म-संबंधी कार्य, पाचन-अग्नि के पाँच भेद (पाचक आदि) तथा कफ/सोम के विविध पक्ष (क्लेदक, बोधक, तर्पण, श्लेष्मक, आलम्बक आदि)। आहार रस बनकर क्रमशः रक्त आदि धातुओं में परिणत होता है और मल बारह मल-आश्रयों से बाहर निकलते हैं। फिर नीति-शिक्षा दी गई है कि शरीर को पुण्य-साधन के उपकरण की तरह संभालना चाहिए; कर्म का फल देश-काल और सामर्थ्य के अनुसार मिलता है। अंत में मृत्यु और परलोक-यात्रा का वर्णन है—जीव कर्मानुसार देह के छिद्रों से निकलकर अतिवाहिक रूप धारण करता है, यमलोक की ओर ले जाया जाता है, वैतरणी का प्रसंग आता है और प्रेत-लोक की अवस्थाएँ भोगनी पड़ती हैं। श्राद्ध, दान-उपहार, वार्षिक क्रिया और सपिण्डीकरण प्रेतत्व-निवारण में सहायक बताए गए हैं; निष्कर्ष यह कि मिश्र कर्मों से कर्म-प्रमाण के अनुसार स्वर्ग-नरक की मिश्र गति मिलती है।

Jayāditya-pratiṣṭhā, Karma-phala Lakṣaṇa, and Sūrya-stuti (जयादित्यप्रतिष्ठा—कर्मफललक्षण—सूर्यस्तुति)
इस अध्याय में तीन जुड़े हुए प्रसंग आते हैं। पहले, परलोक और कर्मफल पर उठने वाले संदेहों को शांत करने हेतु कामठ ‘कर्म-फल-लक्षण’ क्रमबद्ध रूप से बताते हैं—हिंसा, चोरी, छल, व्यभिचार, गुरु-अवमानना तथा गौ-ब्राह्मण आदि को कष्ट देने जैसे पापों के अनुसार देह में रोग, विकलांगता, दरिद्रता और समाज में तिरस्कार जैसी स्थितियाँ फलरूप से प्रकट होती हैं। यह सूची श्रोताओं में नैतिक निश्चय दृढ़ करने के लिए उपदेशात्मक ढंग से दी गई है। फिर धर्म का निष्कर्ष कहा जाता है—धर्म से दोनों लोकों में सुख मिलता है और अधर्म से दुःख; शुद्ध कर्म से युक्त अल्पायु भी, दोनों लोकों के विरोधी दीर्घ जीवन से श्रेष्ठ है। अंत में नारद और ब्राह्मण कामठ के वचन की प्रशंसा करते हैं। सूर्यदेव प्रकट होकर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं और वर देते हैं। ब्राह्मण स्थायी निवास की प्रार्थना करते हैं; सूर्य ‘जयादित्य’ नाम से वहीं प्रतिष्ठित होकर उपासकों की दरिद्रता व रोग हरने का आश्वासन देते हैं। कामठ स्तुति का पाठ करते हैं; सूर्य रविवार तथा विशेषकर आश्विन मास, कोटितीर्थ-स्नान, पूजन-सामग्री और विधि बताकर शुद्धि व सूर्यलोक-प्राप्ति का फल कहते हैं, और अंत में इसे प्रसिद्ध तीर्थों के तुल्य पुण्यदायक बताते हैं।

कोटितीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Koti-tīrtha Māhātmya: The Glory and Ritual Efficacy of Koti Tirtha)
इस अध्याय में अर्जुन नारद से पूछते हैं कि कोटितीर्थ कैसे उत्पन्न हुआ, किसने इसका निर्माण किया और इसके फल की इतनी प्रशंसा क्यों की जाती है। नारद बताते हैं कि ब्रह्मा को ब्रह्मलोक से लाया गया; उन्होंने असंख्य तीर्थों का स्मरण किया तो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल के वे तीर्थ अपने-अपने लिंगों सहित स्मरणमात्र से प्रकट हो गए। स्नान-पूजन के बाद ब्रह्मा ने मन से एक सरोवर रचा और आज्ञा दी कि सभी तीर्थ उसी सरोवर में निवास करें तथा वहाँ एक ही लिंग की पूजा समस्त लिंगों की पूजा के समान मानी जाए। फलश्रुति में कहा गया है कि कोटितीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थों और नदियों—गंगा सहित—का फल मिलता है; श्राद्ध और पिंडदान से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है; कोटीश्वर की पूजा से कोटि-लिंग-पूजन का पुण्य प्राप्त होता है। आगे ऋषियों के उदाहरण आते हैं—अत्रि दक्षिण में अत्रीश्वर की स्थापना कर सरोवर बनाते हैं; भरद्वाज भरद्वाजेश्वर स्थापित कर तप और यज्ञ करते हैं; गौतम अहल्या के हेतु घोर तप करते हैं, तब अहल्या अहल्या-सरोवर बनाती हैं—वहाँ स्नान, कर्म और गौतमीश्वर-पूजा से ब्रह्मलोक की प्राप्ति कही गई है। दान के नियम स्पष्ट हैं: श्रद्धा से एक ब्राह्मण को भोजन कराने से ‘कोटि’ तृप्त होती है और यहाँ दिया दान अनेक गुना फल देता है; पर दान का वचन देकर न देना घोर दोष बताया गया है। माघ, मकर-संक्रांति, कन्या-संक्रांति और कार्तिक में फल विशेष बढ़ता है, कोटि-यज्ञ के तुल्य पुण्य कहा गया है; अंत में इस क्षेत्र में मृत्यु, दाह और अस्थि-विसर्जन की महिमा को वाणी से परे बताकर कोटितीर्थ की अद्वितीयता स्थापित की गई है।

त्रिपुरुषशालामाहात्म्य–नारदीयसरोमाहात्म्य–द्वारदेवीपूजाफलवर्णनम् (Chapter 53: Glory of the Trīpuruṣa Śālā, Nārādīya Pond, and Gate-Goddess Worship Results)
इस अध्याय में नारद के मुख से तीर्थ-माहात्म्य और रक्षाविधि का संक्षिप्त किन्तु समग्र वर्णन है। पवित्र स्थल के लुप्त हो जाने की आशंका सुनकर नारद ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—त्रिदेवों—की आराधना कर वर माँगते हैं कि यह स्थान न मिटे और इसकी कीर्ति सदा बनी रहे; त्रिदेव अपने-अपने अंश से वहाँ स्थायी संरक्षण प्रदान करते हैं। फिर एक धर्म-रक्षा-व्यवस्था बताई जाती है—विद्वान ब्राह्मण नियत समय पर वेदपाठ करें (पूर्वाह्न में ऋग्वेद, मध्याह्न में यजुर्वेद, तृतीय प्रहर में सामवेद) और उपद्रव होने पर शाला के अग्रभाग में शाप-वाक्य उच्चार कर शत्रु के निश्चित काल में भस्म होने की घोषणा करें—यह पूर्व वरदान की रक्षा-प्रतिज्ञा का ही प्रवर्तन है। इसके बाद नारदीय सरोवर का माहात्म्य आता है। नारद एक सरोवर खुदवाकर उसमें समस्त तीर्थों से लाए गए श्रेष्ठ जल भरते हैं; वहाँ स्नान, श्राद्ध और दान—विशेषतः आश्विन मास में रविवार को—पितरों को दीर्घकाल तक तृप्त करता है और वहाँ दिया गया दान ‘अक्षय’ फल देने वाला कहा गया है। कद्रू के शाप से मुक्ति हेतु नागों की तपस्या, फिर नागेश्वर-लिंग की प्रतिष्ठा का वर्णन है; वहाँ पूजन से महान पुण्य और सर्प-भय का शमन होता है। अंत में द्वार-सम्बद्ध देवियों—‘अपर-द्वारका’ तथा नगर-द्वार की द्वारवासिनी—की पूजा बताई गई है; कुंड-स्नान कर चैत्र कृष्ण नवमी और आश्विन नवरात्रि आदि तिथियों में पूजन करने से विघ्न दूर होते हैं, अभीष्ट सिद्धि, समृद्धि और संतान-लाभ का फल बताया गया है।

Nārada’s Wandering, Dakṣa’s Curse, and the Kārttika Prabodhinī Rite at Nārada-kūpa (नारदचापल्य-शापकथा तथा प्रबोधिनी-विधिः)
इस अध्याय में संवाद-परंपरा के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। नारद जी कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रबोधिनी तिथि पर अपने व्रत-पूजन का संकेत देकर कहते हैं कि इससे कलि-जन्य दोषों से मुक्ति और मोक्ष-मार्ग की सिद्धि होती है। अर्जुन का पुराना संशय प्रकट होता है—समत्वशील, संयमी और मोक्षपरायण नारद जी कलि से पीड़ित जगत में वायु के समान चंचल होकर निरंतर क्यों विचरते दिखाई देते हैं? सूता जी इस प्रसंग को सुनाते हुए हारीत वंश के ब्राह्मण बाब्ह्रव्य को प्रस्तुत करते हैं, जो कृष्ण से सुनी बात बताता है। अंतर्कथा में कृष्ण समुद्र-संगम क्षेत्र में जाकर पिण्डदान, उदार दान, गुहेश्वर आदि लिंगों की विधिवत पूजा, कोटितीर्थ में स्नान और नारद जी का सत्कार करते हैं। उग्रसेन के प्रश्न पर कृष्ण बताते हैं कि सृष्टि-मार्ग में विघ्न डालने के कारण दक्ष ने नारद को शाप दिया था—इससे उनका निरंतर भ्रमण और लोगों को प्रेरित/उकसाने की ख्याति बनी; पर सत्य, एकाग्रता और भक्ति के कारण वे मलिन नहीं होते। कृष्ण नारद-स्तुति में उनके गुण (इन्द्रिय-निग्रह, निष्कपटता, स्थिरता, शास्त्र-ज्ञान, अद्रोह) गिनाकर नियमित पाठ करने वालों को नारद-कृपा का फल बताते हैं। फिर व्रत-विधि आती है—कार्तिक शुक्ल द्वादशी (प्रबोधिनी) को नारद-कूप में स्नान कर सावधानी से श्राद्ध करें; तप, दान और जप यहाँ अक्षय कहे गए हैं। “इदं विष्णु” मंत्र से विष्णु को जगाकर, फिर नारद को भी प्रबोधित कर पूजन करें और सामर्थ्य अनुसार ब्राह्मणों को छत्र, वस्त्र (धोती) और कमण्डलु आदि दान दें। फल यह है कि पाप नष्ट होते हैं, कलि के उपद्रव नहीं उठते और सांसारिक क्लेश शांत होते हैं।

गौतमेश्वरलिङ्गमाहात्म्यं तथा अष्टाङ्गयोगोपदेशः (Gautameśvara Liṅga Māhātmya and Instruction on Aṣṭāṅga Yoga)
इस अध्याय में गुप्त-क्षेत्र की पूर्व प्रशंसा सुनकर जिज्ञासु नारद से और विस्तार पूछता है। नारद पहले गौतमेश्वर लिंग की उत्पत्ति और प्रभाव बताते हैं—गौतम ऋषि (अक्षपाद), गोदावरी तट पर अहल्या-संबंध से जुड़कर कठोर तप करते हैं, योग-सिद्धि पाते हैं और लिंग की स्थापना करते हैं। महालिंग का स्नान, चंदन-लेपन, पुष्पार्चन और गुग्गुल-धूप से पूजन पाप-शोधनकारी कहा गया है, जिससे रुद्रलोक आदि उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है। फिर अर्जुन के योग-प्रश्न पर नारद योग को ‘चित्तवृत्ति-निरोध’ रूप में परिभाषित कर अष्टांग-योग का उपदेश देते हैं—यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, तुष्टि/संतोष, तप, जप/स्वाध्याय, गुरु-भक्ति)। प्राणायाम के प्रकार, मात्रा, फल और सावधानियाँ; प्रत्याहार, धारण (प्राण का भीतर संचरण और स्थिरता), शिव-केन्द्रित ध्यान और समाधि में इंद्रिय-निग्रह का वर्णन आता है। अध्याय में साधना के विघ्न-उपसर्ग, सात्त्विक आहार, स्वप्न व देह-चिह्नों से मृत्यु-सूचना, तथा सिद्धियों का विस्तृत वर्गीकरण—अंत में अणिमा आदि आठ महा-सिद्धियाँ—भी दी गई हैं। सिद्धियों में आसक्ति से सावधान करते हुए मोक्ष को परमात्मा में आत्म-तादात्म्य बताया गया है; और श्रवण-पूजन का फल पुनः कहा गया है—विशेषतः आश्विन मास की कृष्ण चतुर्दशी को अहल्या-सरोवर में स्नान कर लिंग-पूजा करने से शुद्धि और ‘अक्षय’ अवस्था प्राप्त होती है।

ब्रह्मेश्वर–मोक्षेश्वर–गर्भेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Brahmeśvara, Mokṣeśvara, and Garbheśvara: A Māhātmya of Sacred Liṅgas and Tīrthas)
इस अध्याय में नारद संवाद-शैली में तीर्थों और लिंग-प्रतिष्ठा की परंपराएँ तथा उनके कर्म-विधान बताते हैं। सृष्टि-प्रेरणा से ब्रह्मा सहस्र वर्ष कठोर तप करते हैं; प्रसन्न शंकर उन्हें वर देते हैं। तब ब्रह्मा नगर के पूर्व में पाप-नाशक ब्रह्मसरस का उत्खनन करते हैं और उसके तट पर, जहाँ साक्षात् शंकर की उपस्थिति कही गई है, महालिंग की स्थापना करते हैं। यहाँ स्नान, पितरों के लिए पिंडदान, यथाशक्ति दान और भक्ति-पूजन—विशेषकर कार्तिक मास में—का विधान है; इसके पुण्य को पुष्कर, कुरुक्षेत्र और गंगा-तीर्थों के तुल्य कहा गया है। फिर मोक्षलिंग का माहात्म्य आता है—मोक्षेश्वर नामक श्रेष्ठ लिंग की स्थापना और दर्भाग्र से खोदे गए कूप का वर्णन, जिसमें ब्रह्मा अपने कमंडलु से सरस्वती को लाकर प्राणियों के मोक्ष-हित के लिए प्रतिष्ठित करते हैं। कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को उस कूप में स्नान कर तिल-पिंड अर्पित करने से ‘मोक्षतीर्थ’ का फल मिलता है और कुल में बार-बार प्रेत-स्थिति नहीं होती—ऐसा फलश्रुति में कहा गया है। आगे जयादित्यकूप तीर्थ में गर्भेश्वर की वंदना से पुनः-पुनः गर्भ-प्रवेश का निवारण बताया गया है। अंत में श्रद्धापूर्वक श्रवण को भी परम पावन और फलदायक कहा गया है।

नीलकण्ठमाहात्म्यवर्णनम् | Nīlakaṇṭha Māhātmya (Glorification of Nīlakaṇṭha)
अध्याय संवादरूप में नारद के वचन से आरम्भ होता है। नारद और ब्राह्मण महेश्वर को प्रसन्न करके लोककल्याण हेतु पवित्र महीनगरक में शंकर की स्थापना करते हैं। अत्रीश के उत्तर में स्थित उत्तम केदार-लिंग का वर्णन है, जिसे महापापों का नाशक कहा गया है। विधि बताई गई है—अत्रिकुण्ड में स्नान, नियमपूर्वक श्राद्ध, अत्रीश को प्रणाम, फिर केदार का दर्शन; ऐसा करने वाला ‘मुक्ति-भागी’ होता है। आगे कोटितीर्थ में स्नान कर नीलकण्ठ रूप रुद्र के दर्शन और फिर जयादित्य को नमस्कार करने से रुद्रलोक की प्राप्ति कही गई है। जयादित्य की पूजा कूप-स्नान के बाद श्रेष्ठ जन करते हैं; उसकी कृपा से वंश की रक्षा का आश्वासन मिलता है। अंत में फलश्रुति है कि महीनगरक का सम्पूर्ण माहात्म्य सुनने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

स्तम्भतीर्थ-गुप्तक्षेत्र-कारणकथनम् (The Origin of the Hidden Sacred Field and the Rise of Stambha-tīrtha)
अर्जुन ने नारद से पूछा कि अत्यन्त प्रभावशाली होने पर भी एक तीर्थ-क्षेत्र को “गुप्तक्षेत्र” क्यों कहा जाता है। नारद एक प्राचीन प्रसंग सुनाते हैं—असंख्य तीर्थ-देवता ब्रह्मा की सभा में आकर आध्यात्मिक प्रधानता का निर्णय चाहते हैं। ब्रह्मा एक ही अर्घ्य सबसे श्रेष्ठ तीर्थ को देना चाहते हैं, पर ब्रह्मा और तीर्थगण भी सहजता से श्रेष्ठता तय नहीं कर पाते। तब “मही-सागर-संगम” नामक संयुक्त तीर्थ अपने को प्रधान बताता है और तीन कारण गिनाता है, जिनमें गुहा/स्कन्द द्वारा लिङ्ग-प्रतिष्ठा का सम्बन्ध तथा नारद की मान्यता भी है। धर्मदेव स्व-प्रशंसा की निन्दा करते हैं—सच्चे गुण भी सज्जनों को स्वयं नहीं कहने चाहिए—और फलस्वरूप उस स्थान के “अप्रसिद्ध” होने का विधान करते हैं; इसी स्तम्भ (अहंकार/हठ) से “स्तम्भतीर्थ” नाम प्रकट होता है। गुहा शाप की कठोरता पर प्रश्न करते हुए नीति स्वीकारते हैं और कहते हैं कि यह क्षेत्र कुछ काल गुप्त रहेगा, फिर स्तम्भतीर्थ के रूप में प्रसिद्ध होकर समस्त तीर्थ-फल देने वाला बनेगा। इसके बाद विशेषतः शनिवासर अमावस्या आदि के व्रत-पालन के फलों की तुलना आती है, जिन्हें अनेक महातीर्थ-यात्राओं के तुल्य बताया गया है। अंत में ब्रह्मा अर्घ्य प्रदान कर तीर्थ की महिमा स्वीकारते हैं और नारद कहते हैं कि इस कथा का श्रवण भी पापों का क्षय और शुद्धि करता है।

Ghaṭotkaca’s Mission and the Kāmākhya-Ordained Marriage Alliance (घटोत्कचप्रेषणम्—कामाख्यावाक्येन मौर्वीविवाहनिश्चयः)
अध्याय का आरम्भ शौनक के प्रश्न से होता है—पूर्व में कही गई अद्भुत पवित्रता और ‘सिद्धलिङ्ग’ से जुड़े व्यक्तियों व सिद्धियों का रहस्य क्या है, और कृपा से सफलता कैसे मिलती है? सूत (उग्रश्रवा) कहते हैं कि वे यह परम्परा द्वैपायन व्यास से सुनी हुई कथा के रूप में बताएँगे। फिर प्रसंग महाभारत-काल में आता है—पाण्डव इन्द्रप्रस्थ में बसकर सभा में विचार कर रहे होते हैं कि तभी घटोत्कच आता है। भाई और वासुदेव उसका सत्कार करते हैं; युधिष्ठिर उसके कुशल, राज्य-व्यवस्था और माता की स्थिति पूछते हैं। घटोत्कच बताता है कि वह शान्ति-व्यवस्था बनाए हुए है, माता की आज्ञा से पितृ-भक्ति करता है और कुल-मान की रक्षा चाहता है। इसके बाद युधिष्ठिर, घटोत्कच के लिए योग्य विवाह के विषय में श्रीकृष्ण से परामर्श करते हैं। कृष्ण प्राग्ज्योतिषपुर की एक अत्यन्त पराक्रमी कन्या का वर्णन करते हैं—दैत्य मुर (नरक से सम्बद्ध) की पुत्री। वे बताते हैं कि पूर्व युद्ध में देवी कामाख्या ने हस्तक्षेप कर उसे न मारने की आज्ञा दी, उसे युद्ध-वरदान दिए और यह भी कहा कि उसका विवाह घटोत्कच से ही नियत है। कन्या की शर्त है—जो उसे पराजित करेगा वही उसका पति होगा; अनेक वर इस प्रयास में मारे गए। सभा में विचार-विमर्श होता है—युधिष्ठिर जोखिम की चिन्ता करते हैं, भीम क्षत्रिय-धर्म और कठिन कर्म की आवश्यकता बताते हैं, अर्जुन दैवी वाणी का समर्थन करते हैं, और कृष्ण शीघ्र कार्य करने को कहते हैं। घटोत्कच विनयपूर्वक यह दायित्व स्वीकार कर पितृ-कुल की मर्यादा निभाने का संकल्प करता है; कृष्ण उसे आशीर्वाद व उपाय देकर विदा करते हैं, और वह आकाश-मार्ग से प्राग्ज्योतिष की ओर प्रस्थान करता है।

घटोत्कच–मौर्वी संवादः (Ghaṭotkaca and Maurvī: Contest of Power, Question, and Marriage Settlement)
इस अध्याय में सूत जी राजसी-वीर रस से युक्त प्रसंग सुनाते हैं। घटोत्कच प्राग्ज्योतिष के बाहर पहुँचकर बहुमंज़िला स्वर्णमय भवन को देखता है, जहाँ संगीत और सेवकों की चहल-पहल है। द्वार पर कर्णप्रावरणा नाम की द्वारपाल उसे सावधान करती है कि मुरा की पुत्री मौर्वी को पाने के लिए पहले अनेक वर मारे गए; वह उसे भोग-सुख और सेवा का प्रलोभन भी देती है, पर घटोत्कच उसे अपने उद्देश्य के विरुद्ध मानकर ठुकरा देता और अतिथि के रूप में विधिवत् सत्कार की माँग करता है। मौर्वी उसे भीतर बुलाकर एक तीखा वंश-सम्बन्धी प्रश्न रखती है—अधर्ममय गृह-स्थिति में ‘नातिन’ और ‘बेटी’ का सम्बन्ध कैसे उलझता है। उत्तर न मिलने पर वह भयानक प्राणियों की सेनाएँ छोड़ती है; घटोत्कच उन्हें सहज ही परास्त कर मौर्वी को दबोच लेता और दण्ड देने को उद्यत होता है। तब मौर्वी उसकी श्रेष्ठता स्वीकार कर समर्पण करती है। इसके बाद घटोत्कच कहता है कि छिपा या अनियमित संयोग उचित नहीं; वह मौर्वी के स्वजनों, विशेषतः भगदत्त से, विधिवत् अनुमति चाहता है और उसे शक्रप्रस्थ ले जाता है। वहाँ वासुदेव और पाण्डवों की स्वीकृति से शास्त्रोक्त रीति से विवाह सम्पन्न होता है, उत्सव मनते हैं और दम्पति अपने राज्य लौटते हैं। अंत में उनके पुत्र बर्बरीक का जन्म और शीघ्र परिपक्व होना बताया गया है तथा द्वारका में वासुदेव के पास जाने का संकेत देकर वंश, धर्म और आगे की कथा-धारा जोड़ी जाती है।

महाविद्यासाधने गाणेश्वरकल्पवर्णनम् | Mahāvidyā-Sādhana and the Gaṇeśvara Ritual Protocol
अध्याय 61 में द्वारका की सभा का प्रसंग आता है। घटोत्कच अपने पुत्र बर्बरीक के साथ द्वारका पहुँचता है; नगर-रक्षकों को वह पहले राक्षस-सा शत्रु प्रतीत होता है, पर शीघ्र ही वह भक्त और शरणागत जान लिया जाता है। सभा में बर्बरीक श्रीकृष्ण से पूछता है कि धर्म, तप, धन, त्याग, भोग और मोक्ष—इन अनेक दावों के बीच सच्चा ‘श्रेयस्’ क्या है। श्रीकृष्ण वर्णानुसार आचरण बतलाते हैं—ब्राह्मण के लिए स्वाध्याय, संयम और तप; क्षत्रिय के लिए बल का संवर्धन, दुष्टों का दमन और सज्जनों की रक्षा; वैश्य के लिए पशुपालन, कृषि और वाणिज्य का ज्ञान; शूद्र के लिए द्विजों की सेवा, शिल्प-कर्म तथा मूलभूत भक्ति-कर्तव्य। बर्बरीक क्षत्रिय-जन्य होने से श्रीकृष्ण उसे पहले देवी-आराधना द्वारा अतुल बल प्राप्त करने का उपदेश देते हैं। गुप्तक्षेत्र में दिग्देवियाँ और दुर्गा-रूपों की पूजा, अर्पण और स्तुति से देवियाँ प्रसन्न होकर बल, समृद्धि, यश, कुल-कल्याण, स्वर्ग और यहाँ तक कि मोक्ष भी देती हैं। श्रीकृष्ण उसे ‘सुहृदय’ नाम देकर वहाँ भेजते हैं; त्रिकाल-पूजा के बाद देवियाँ प्रकट होकर शक्ति प्रदान करती हैं और विजय-संबंध हेतु वहीं निवास करने को कहती हैं। फिर विजय नामक ब्राह्मण विद्या-सिद्धि की कामना से आता है; स्वप्नादेश द्वारा देवियाँ उसे सुहृदय की सहायता लेने का निर्देश देती हैं। इसके बाद रात्रि-विधि का क्रम बताया गया है—उपवास, देवालय-पूजन, मण्डल-निर्माण, रक्षार्थ कील/खूँटे की स्थापना, आयुध-संस्कार, तथा विघ्न-नाश और अभीष्ट-सिद्धि हेतु गणपति-मंत्र के साथ तिलक, पूजा और होम की विस्तृत प्रक्रिया; अंत में अध्याय-समाप्ति सूचक कोलोफन आता है।

Kṣetrapāla-sṛṣṭi, Kālīkā-prasāda, Vaṭayakṣiṇī-pūjā, and Aparājitā Mahāvidyā
शौनक सूत से पूछते हैं कि गणप/क्षेत्रपाल (पवित्र क्षेत्र के रक्षक-स्वामी) की उत्पत्ति कैसे हुई। सूत बताते हैं कि दारुक नामक प्रबल दैत्य से देवता पराजित होकर शिव और देवी की शरण में गए और बोले कि अर्धनारीश्वर-तत्त्व के बिना उसका वध संभव नहीं। तब पार्वती हर के कण्ठ की ‘तमस’ शक्ति से कालिका को प्रकट करती हैं, उसका नाम रखकर शत्रु-विनाश की आज्ञा देती हैं। कालिका के भयंकर नाद से दारुक और उसका दल नष्ट हो जाता है, पर जगत में उथल-पुथल फैलती है। शांति के लिए रुद्र श्मशान में रोते हुए बालक रूप में प्रकट होते हैं; कालिका उसे दूध पिलाती हैं और वह बालक मानो क्रोध-रूप को पीकर देवी को सौम्य कर देता है। देवताओं के भय शेष रहने पर बाल-महेश्वर उन्हें आश्वस्त करते हैं और अपने मुख से चौंसठ बाल-क्षेत्रपाल उत्पन्न कर स्वर्ग, पाताल और चौदह-भुवनात्मक भूलोक में उनके अधिकार-क्षेत्र बाँट देते हैं। आगे क्षेत्रपाल-पूजा का संक्षिप्त विधान आता है—नवाक्षरी मंत्र, दीप, तथा विशेष नैवेद्य (काले उड़द और चावल का मिश्रण); उपेक्षा करने पर कर्मफल निष्फल हो जाता है और दुष्ट शक्तियाँ फल हर लेती हैं। स्तुति में वन, जल, गुफा, चौराहा, पर्वत आदि स्थानों में स्थित रक्षकों के नाम-स्थान बताए गए हैं। फिर वटयक्षिणी का प्रसंग है—विधवा सुनंदा तप और नित्य-पूजा से देवी को प्रकट करती है; शिव नियम देते हैं कि जो मेरी पूजा करे पर वटयक्षिणी की उपासना न करे, उसका फल शून्य हो। वटयक्षिणी का सरल मंत्र-प्रार्थना स्त्री-पुरुष दोनों को सिद्धि देने वाली कही गई है। अंत में विजय ‘परम वैष्णवी’ अपराजिता महाविद्या की आराधना करता है; विस्तृत रक्षामंत्र से अग्नि-जल-वायु, चोर-पशु, शत्रु-कृत्य, रोग आदि भय से रक्षा, विजय और बाधा-निवारण का आश्वासन है—और कहा गया है कि नित्य जप से बिना बड़े विधान के भी विघ्न दूर होते हैं।

Barbarīka’s Night Vigil, Defeat of Obstacle-Makers, and the Nāga-Established Mahāliṅga (Routes to Major Kṣetras)
सूता बताते हैं कि रात्रि में विजय बल‑अतिबल मंत्रों से अग्निहोत्र करता है। रात के पहरों में विघ्न डालने वाले प्रकट होते हैं—भयानक राक्षसी महाजिह्वा मोक्ष के लिए अहिंसा और भविष्य में उपकार का व्रत लेती है; पर्वताकार रेपालेन्द्र/रेपाला पर बर्बरीक की प्रचंड शक्ति भारी पड़ती है; और शाकिनी‑नायिका दुहद्रुहा को वश में कर मार दिया जाता है। फिर एक तपस्वी‑वेषधारी यज्ञ को सूक्ष्म जीव‑हिंसा बताकर निंदा करता है; बर्बरीक शास्त्रसम्मत यज्ञ में इस आरोप को असत्य कहकर उसे खदेड़ देता है और वह दैत्य रूप में प्रकट होता है। पीछा करते हुए बहुप्रभा नगरी में दैत्य‑सेनाएँ पराजित होती हैं; वासुकि सहित नाग बर्बरीक को धन्यवाद देकर वर देते हैं कि विजय का कार्य निर्विघ्न पूर्ण हो। आगे कल्पवृक्ष के नीचे रत्नमय महालिंग दिखाई देता है, जिसकी पूजा नागकन्याएँ करती हैं। वे बताती हैं कि शेषनाग ने तप से इसकी स्थापना की और यहाँ से चार दिशाओं के मार्ग बताए—पूर्व में श्रीपर्वत, दक्षिण में शूर्पारक, पश्चिम में प्रभास, और उत्तर में एक गुप्त क्षेत्र जहाँ सिद्धलिंग है। विजय युद्ध‑भस्म का ताबीज़ देना चाहता है; बर्बरीक वैराग्य से मना करता है, पर देववाणी कौरवों तक पहुँचने पर अनिष्ट की चेतावनी देती है, इसलिए वह स्वीकार करता है। देवगण विजय को “सिद्धसेन” की उपाधि देकर व्रत‑समापन और धर्म‑व्यवस्था की स्थिरता का वर्णन करते हैं।

भीमेश्वरलिङ्गप्रतिष्ठा तथा तीर्थाचारोपदेशः (Bhimeshvara Liṅga स्थापना and Instruction on Tīrtha Conduct)
इस अध्याय में पाण्डवों की द्यूत-पराजय के बाद वनवास-तीर्थयात्रा के दौरान देवी-कुण्ड पर धर्म और आचार का विवाद वर्णित है। द्रौपदी सहित थके हुए पाण्डव चण्डिका के पवित्र स्थान पर पहुँचते हैं। प्यास से व्याकुल भीम कुण्ड में उतरकर पीने और स्नान करने लगते हैं, पर युधिष्ठिर उन्हें विधि-सम्मत आचरण की चेतावनी देते हैं। तभी सुहृदय नामक रक्षक-स्वरूप पुरुष भीम को डाँटता है कि यह जल देव-स्नान हेतु आरक्षित है; पाँव बाहर धोकर ही प्रवेश करना चाहिए, अन्यथा अभिषिक्त जल दूषित होता है और तीर्थ में प्रमाद का भारी पाप लगता है। भीम देह-धर्म और तीर्थ-स्नान की सामान्य आज्ञा का तर्क देकर प्रतिवाद करते हैं; बात युद्ध तक पहुँचती है। अद्भुत बलशाली बार्बरीक भीम को परास्त कर समुद्र में फेंकने को उद्यत होता है, तभी रुद्र की आज्ञा से वह रुकता है; रुद्र संबंध-रहस्य प्रकट कर बताते हैं कि यह दोष अज्ञानवश हुआ। बार्बरीक पश्चाताप में आत्मनाश चाहता है, पर देवी-सम्बद्ध देवियाँ अनजाने अपराध के शास्त्रीय विचार को समझाकर उसे रोकती हैं और कृष्ण के हाथों उसकी नियत, श्रेष्ठ मृत्यु की भविष्यवाणी करती हैं। अंत में मेल-मिलाप होता है, पाण्डव पुनः तीर्थ-स्नान करते हैं और भीम भीमेश्वर-लिङ्ग की प्रतिष्ठा करते हैं। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के व्रत का विधान बताया गया है, जिससे जन्मगत दोषों की शुद्धि और पाप-नाश होता है; भीमेश्वर-लिङ्ग को अन्य श्रेष्ठ लिङ्गों के तुल्य फलदायक और पापहर कहा गया है।

Devī-stuti, Bhīmasena’s Reversal, and the Prophetic Mapping of Kali-yuga Devī-Sthānas (Ekānaṃśā / Keleśvarī / Durgā / Vatseśvarī)
सूत कहते हैं—तीर्थ में सात रात ठहरकर युधिष्ठिर प्रातः स्नान-शौच करके देवियों और लिंगों की पूजा करते हैं, क्षेत्र की परिक्रमा करते हैं और प्रस्थान-काल का स्तोत्र पढ़ते हैं। फिर वे महाशक्ति को, श्रीकृष्ण की प्रिय बहन एकानंशा मानकर, सर्वव्यापी विश्वरूप देवी की शरण लेते हुए रक्षा की प्रार्थना करते हैं। भीम (वायुपुत्र) इसके विरोध में नैतिक चेतावनी के रूप में कहता है कि ‘प्रकृति’ (जो मोह देती है) में शरण लेना उचित नहीं; विद्वान को महादेव, वासुदेव, अर्जुन और भीम की ही स्तुति करनी चाहिए, और व्यर्थ वाणी आध्यात्मिक हानि करती है। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि देवी समस्त प्राणियों की माता हैं, ब्रह्मा-विष्णु-शिव द्वारा पूजित हैं; अतः उनका तिरस्कार न किया जाए। तभी भीम की दृष्टि चली जाती है—इसे देवी का अप्रसाद समझकर वह पूर्ण शरणागति करता है और विस्तृत स्तोत्र में ब्राह्मी, वैष्णवी, शांभवी आदि रूपों, दिशाओं की शक्तियों, ग्रह-संबंधों तथा लोक-पाताल में व्याप्ति का वर्णन कर नेत्र-दर्शन लौटाने की याचना करता है। देवी तेजस्वी रूप में प्रकट होकर भीम को सांत्वना देती हैं, पूज्य जनों की निंदा छोड़ने का उपदेश देती हैं और धर्म-स्थापन में विष्णु की सहायक तथा उद्धारिणी शक्ति के रूप में अपना रहस्य बताती हैं। फिर वे कलियुग के लिए तीर्थ-देवी-स्थानों का भविष्य-निर्देश देती हैं—लोहाणा, लोहाणापुर, महीसागर के निकट धर्मारण्य, अट्टालज, गयात्राड़; भावी भक्त केलो, वैलाक, वत्सराज; शुक्ल सप्तमी, शुक्ल नवमी आदि तिथियों के व्रत; तथा फल—मनोकामना-सिद्धि, संतान, स्वर्ग, मोक्ष, विघ्न-नाश, रोग-शमन और दृष्टि-लाभ। अंत में पांडव विस्मित होकर यात्रा जारी रखते हैं, बर्बरीक की स्थापना कर अन्य तीर्थों को प्रस्थान करते हैं।

बर्बरीक-शिरःपूजा, गुप्तक्षेत्र-माहात्म्य, कोटितीर्थ-फलश्रुति (Barbarīka’s Severed Head, Guptakṣetra Māhātmya, and Koṭitīrtha Phalaśruti)
अध्याय 66 में सूत के कथन से युद्ध-शिविर का संवाद आता है। तेरह वर्ष बाद पाण्डव और कौरव कुरुक्षेत्र में जुटते हैं; वीरों की गणना और युद्ध कितने दिनों में जीता जा सकता है—इस पर वाद-विवाद होता है। अर्जुन बुज़ुर्गों की दीर्घ युद्ध-प्रतिज्ञाओं पर प्रश्न उठाकर अपनी निर्णायक क्षमता बताता है, तभी भीम के पौत्र बर्बरीक (सूर्यवर्चा) प्रकट होकर कहता है कि वह एक मुहूर्त में युद्ध समाप्त कर सकता है। वह एक विशेष बाण से दोनों सेनाओं के मर्मस्थानों पर भस्म/रक्त-सदृश चिह्न लगाकर अपनी तकनीक दिखाता है और अपने धर्म-शपथ के कारण विपक्ष को शीघ्र नष्ट करने की बात कहता है; सभा विस्मित हो जाती है। तब श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का शिरच्छेद करते हैं। देवी और सहचरी देवियाँ आकर बताती हैं कि जगत्-भार-हरण की पूर्व-योजना के अनुसार युद्ध का नियत क्रम बनाए रखना आवश्यक था और ब्रह्मा के शाप से बर्बरीक का वध अवश्यंभावी था। बर्बरीक का सिर पुनर्जीवित होकर पूज्य बनता है; उसे पर्वत-शिखर पर बैठाकर युद्ध-दर्शन का वर मिलता है तथा भक्तों को दीर्घकालीन पूजा और आरोग्य-लाभ का आश्वासन दिया जाता है। आगे गुप्तक्षेत्र, कोटितीर्थ और महीनगरक की महिमा कही गई है—स्नान, श्राद्ध, दान तथा श्रवण-पाठ से पवित्रता, समृद्धि और मोक्ष (रुद्रलोक/विष्णुलोक) की प्राप्ति बताई गई है। बर्बरीक-स्तोत्र और फलश्रुति अध्याय के श्रवण-पाठ के पुण्य को निश्चित करती है।
The section emphasizes a southern coastal tīrtha-cluster whose sanctity is described as exceptionally merit-yielding, yet pedagogically guarded by danger, highlighting that spiritual benefit is coupled with ethical resolve and right intention.
Merit is associated with bathing and disciplined conduct at the five tīrthas, with narratives implying purification, restoration from curse-conditions, and alignment with higher lokas through devotional and ethical steadiness.
Key legends include the account of Arjuna (Phālguna) approaching the five tīrthas, the grāha episode leading to an apsaras’ restoration, and Nārada’s role in directing afflicted beings toward the pilgrim-hero for release.