Adhyaya 20
Mahesvara KhandaKaumarika KhandaAdhyaya 20

Adhyaya 20

नारद एक विराट युद्ध का वर्णन करते हैं, जिसमें अनेक दानव भयंकर पशुओं और रथों पर चढ़कर नारायण (विष्णु) पर टूट पड़ते हैं। निमि, मथन, शुम्भ, जम्भ, सेनापति ग्रसन और महिष आदि योद्धा नाम सहित आते हैं। पहले तीक्ष्ण बाणों की वर्षा होती है; फिर विष्णु धनुष से गदा पर आते हैं और परत-दर-परत अस्त्रों का प्रत्यस्त्रों से प्रतिकार करते हैं। ग्रसन छोड़े गए रौद्रास्त्र को ब्रह्मास्त्र से शांत कर देता है। तब विष्णु भय उत्पन्न करने वाला कालदण्डास्त्र चलाते हैं, जिससे दानव-सेना में भारी विनाश होता है, पर अंततः उसे भी प्रतिअस्त्रों से रोका जाता है। इसके बाद विष्णु सुदर्शन चक्र से ग्रसन का निर्णायक वध कर देते हैं। निकट युद्ध में कुछ असुर गरुड़ और विष्णु से लिपटकर उन्हें दबाने का प्रयास करते हैं; विष्णु झटककर उन्हें दूर करते हैं। मथन थोड़े ही समय में विष्णु की गदा से मारा जाता है। महिष उग्र आक्रमण करता है, पर ब्रह्मा की पूर्व घोषणा के अनुसार उसका वध स्त्री के हाथों होना नियत है—इस कारण विष्णु उसे तत्काल मृत्यु से मुक्त कर देते हैं। शुम्भ उपदेश पाकर पीछे हटता है; जम्भ गर्व से गरुड़ और विष्णु को भारी प्रहारों से क्षणिक रूप से अचेत कर देता है, पर विष्णु के संभलते ही भाग जाता है। अध्याय अस्त्र-तत्त्व, नियति-धर्म और सेनापति-वध से संतुलन-स्थापन को उजागर करता है।

Shlokas

Verse 1

नारद उवाच । तं दृष्ट्वा दानवाः सर्वे क्रुद्धाः स्वैःस्वैर्बलैर्वृताः । सरघा इव माक्षिकं रुरुधुः सर्वतस्ततः

नारद बोले—उसे देखकर सब दानव क्रोध से भर उठे और अपनी-अपनी सेनाओं से घिरे हुए, फिर चारों ओर से उसे घेरने लगे—जैसे मधुमक्खियों के झुंड मक्खी को घेर लेते हैं।

Verse 2

पर्वताभे गजे भीमे मदस्राविणि दुर्दमे । सितचित्रपताके तु प्रभिन्नकरटामुखे

पर्वत-सम विशाल, भयानक, मद-रस बहाने वाले और वश में न आने वाले हाथी पर, श्वेत चित्रित ध्वजा धारण किए, फटे कपोलों से धार बहाते हुए वह आगे बढ़ा।

Verse 3

स्वर्णवर्णांचिते यद्वन्नगे दावाग्निसंवृते । आरुह्यजौ निमिर्दैत्यो हरिं प्रत्युद्ययौ बली

स्वर्णाभ आभा से दीप्त, वनाच्छादित पर्वत के समान, जो दावाग्नि से घिरा हो—वैसे ही बलवान् दैत्य निमि (अपने वाहन पर) चढ़कर हरि के विरुद्ध धावा बोलने निकला।

Verse 4

तस्यासन्दानवा रौद्रा गजस्य परिरक्षिणः । सप्तविंशतिकोट्यश्च किरीटकवचोज्जवलाः

उस हाथी के रक्षक, उसके उग्र दानव-सेवक, सत्ताईस करोड़ थे—मुकुट और कवच से दमकते हुए।

Verse 5

अश्वमारुह्य शैलाभं हरिमाद्रवत् । पंचयोजनप्रग्रीवमुष्ट्रमास्थाय जंभकः

पर्वत-सम घोड़े पर चढ़कर (एक) हरि की ओर दौड़ा; और जंभक पाँच योजन लम्बी गर्दन वाले ऊँट पर आरूढ़ होकर (भी) आगे बढ़ा।

Verse 6

शुम्भो मेषं समारुह्याव्रजद्द्वादशयोजनम् । अपरे दानवेन्द्राश्च यत्ता नानास्त्रापाणयः

शुम्भ मेष पर चढ़कर बारह योजन तक बढ़ चला; और अन्य दानव-नरेश भी अनेक प्रकार के अस्त्र हाथों में लिए, सजग होकर, आगे आए।

Verse 7

आजग्मुः समरे क्रुद्धा विष्णुमक्लिष्टकारिणम् । परघेण निमिर्दैत्यो मथनो मुद्गरेण च

रण में क्रुद्ध होकर वे अक्लिष्टकर्मा विष्णु पर टूट पड़े। दैत्य निमि ने लोहे के गदा-प्रहार से और मथन ने मुद्गर से आघात किया।

Verse 8

शुम्भः शूलेन तीक्ष्णेन प्रासेन ग्रसनस्तथा । चक्रेण क्रथनः क्रुद्धो जंभः शक्त्या महारणे

शुम्भ ने तीक्ष्ण शूल से, और ग्रसन ने प्रास से प्रहार किया। क्रथन ने क्रोध में चक्र से, और महारण में जंभ ने शक्ति से आक्रमण किया।

Verse 9

जघ्नुर्नारायणं शेषा विशिखैर्मर्मभेदिभिः । तान्यस्त्राणि प्रयुक्तानि विविशुः पुरुषोत्तमम्

शेष योद्धाओं ने मर्मभेदी बाणों से नारायण को आहत किया। छोड़े गए वे अस्त्र पुरुषोत्तम के भीतर जा लगे।

Verse 10

उपदेशा गुरोर्यद्वत्सच्छिष्यं बहुधेरिताः । ततः क्रुद्धो हरिर्गृह्य धनुर्बाणांश्च पुष्कलान्

जैसे सत्शिष्य गुरु के उपदेश बार-बार ग्रहण करता है, वैसे ही अनेक प्रहार बरसाए गए। तब हरि क्रुद्ध होकर धनुष और बहुत से बाणों को उठा लाए।

Verse 11

ममर्द दैत्यसेनां तद्धर्ममर्थवचो यथा । निमिं विव्याध विंशत्या वाणैरनलवर्चसैः

उन्होंने दैत्य-सेना को वैसे ही मर्दित किया जैसे धर्मयुक्त अर्थपूर्ण वचन अधर्म को दबा देते हैं। और निमि को अग्नि-तेज वाले बीस बाणों से बेध दिया।

Verse 12

मथनं दशभिश्चैव शुम्भं पंचभिरेव च । शतेन महिषं क्रुद्धो विव्याधोरसि माधवः

क्रुद्ध माधव ने मथन को दस बाणों से, शुम्भ को पाँच बाणों से और महिष को सौ बाणों से वक्षस्थल में बेध दिया।

Verse 13

जंभं द्वादशभिस्तीक्ष्णैः सर्वांश्चैकैक शोऽष्टभिः । तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा दानवाः क्रोधमूर्छिताः

उसने जंभ को बारह तीक्ष्ण बाणों से और अन्य प्रत्येक को आठ-आठ बाणों से मारा; उसका लाघव देखकर दानव क्रोध से मूर्छित हो उठे।

Verse 14

चक्रुर्गाढतरं यत्नमावृण्वाना हरिं शरैः । चिच्छेदाथ धनुर्ज्यां च निमिर्भल्लेन दानवः

वे बाण-वृष्टि से हरि को आच्छादित कर और भी घोर प्रयत्न करने लगे; तब दानव निमि ने भल्ल से धनुष की ज्या काट दी।

Verse 15

हस्ताच्चापं च संरंभाच्चिच्छेद महिषासुरः । षीडयामासा गरुडं जंभो बाणायुतैस्त्रिभिः

उन्मत्त क्रोध में महिषासुर ने हरि के हाथ से धनुष काट डाला; और जंभ ने गरुड को तीन बाणायुतों (तीस हज़ार बाणों) से पीड़ित किया।

Verse 16

भुजावस्य च विव्याध शंभो बाणायुतेन वै । ततो विस्मितचित्तस्तु गदां जग्राह माधवः

शंभ ने दस हज़ार बाणों से उसके दोनों भुजाओं को बेध दिया; तब विस्मित-चित्त माधव ने गदा धारण की।

Verse 17

तां प्राहिणोत्स वेगेन मथनाय महाहवे । तामाप्राप्तां निमिर्बाणैर्मुशलाभैः सहस्रशः

उस महायुद्ध में उसने उसे वेगपूर्वक मथन पर फेंका; सामने आती हुई उस गदा को निमि ने लोहे के मुशल के समान हजारों बाणों से रोक दिया।

Verse 18

आहत्य पातयामास विनदन्कालमेघवत् । ततोंऽतरिक्षे हाहेति भूतानां जज्ञिरे कथाः

उसने उसे प्रहार कर गिरा दिया, और कालमेघ के समान गर्जना की; तब आकाश में भूतगणों के बीच ‘हाय! हाय!’ की पुकार उठी।

Verse 19

नैतदस्ति बलं व्यक्तं यत्राशीर्यत सा गदा । तां हरिः पतितां दृष्ट्वा अस्थाने प्रार्थनामिव

‘जहाँ वह गदा चूर-चूर हो गई, वहाँ कोई प्रत्यक्ष बल नहीं ठहरता।’ उसे गिरा हुआ देखकर हरि ने मानो उसे अनुचित स्थान में की गई प्रार्थना के समान समझा।

Verse 20

जग्राह मुद्गरं घोरं दिव्यरत्नपरिष्कृतम् । तं मुमोचातिवेगेन निमिमुद्दिश्य दानवम्

उसने दिव्य रत्नों से विभूषित भयंकर मुद्गर को उठा लिया और दानव निमि को लक्ष्य करके उसे अत्यन्त वेग से फेंक दिया।

Verse 21

तमायांतं वियत्येव त्रयो दैत्या ह्यवारयन् । गदया दंभदैत्यस्तु ग्रसनः पट्टिशेन तु

वह आकाश में बढ़ रहा था कि तीन दैत्यों ने उसे रोक लिया—दंभ दैत्य गदा लेकर, और ग्रसन पट्टिश (कुल्हाड़ी-से शस्त्र) लेकर।

Verse 22

शक्त्या च महिषो दैत्यो विनदंतो महाररवम् । निराकृतं तमालोक्य दुर्जनैः सुजनं यथा

दैत्य महिष ने भाले (शक्ति) के साथ महान् गर्जना करते हुए आक्रमण किया। परन्तु जब वह प्रतिहत हुआ, तो वह दृश्य ऐसा था मानो दुष्ट जन सज्जन को ठुकरा दें।

Verse 23

जग्राह शक्तिमुग्रोग्रां शतघंटामहास्वनाम् । जंभाय तां समुद्दिश्य प्राहिणोद्भीषणेरणे

उसने अत्यन्त उग्र, भयानक शक्ति पकड़ी, जो सौ घंटियों के समान महान् नाद करती थी। फिर जंभ की ओर लक्ष्य करके, उस भीषण रण में उसे फेंक दिया।

Verse 24

तामायान्तीमथालोक्य जंभोऽन्यस्य रथात्त्वरात् । आप्लुत्य लीलया गृह्णन्कामिनीं कामुको यथा

उसे अपनी ओर आते देखकर जंभ दूसरे रथ से शीघ्र कूद पड़ा। और उसे लीलापूर्वक पकड़ लिया—जैसे कामी पुरुष अपनी कामिनी को पकड़ ले।

Verse 25

तयैव गरुडं मूर्ध्नि जघ्ने स प्रहसन्बली । ततो भूयो रथं प्राप्य घनुर्गृह्यभ्ययोजयत्

उसी शक्ति से उस बलवान् ने हँसते हुए गरुड़ के मस्तक पर प्रहार किया। फिर पुनः रथ पर चढ़कर धनुष उठा लिया और बाण चलाने को उद्यत हुआ।

Verse 26

विचेताश्चाभवद्युद्धे गरुडः शक्तिपीडितः । ततः प्रहस्य तं विष्णुः साधुसाध्विति भारत

युद्ध में शक्ति से पीड़ित गरुड़ चेतनाहीन हो गया। तब विष्णु हँसकर उससे बोले—“साधु, साधु,” हे भारत।

Verse 27

करस्पर्शेन कृतवान्विमोहं विनतात्मजम् । समाश्वास्य च तं वाग्भिः शक्तिं दृष्ट्वा च निष्फलाम्

अपने कर-स्पर्श से उसने विनता-पुत्र का मोह दूर किया; वचनों से उसे ढाढ़स बँधाकर उसने देखा कि शक्ति निष्फल हो गई है।

Verse 28

कुभार्यस्य यथा पुंसः सर्वंस्याच्चिंतितं वृथा । दृठसारमहामौर्वीमन्यां संयोजयत्ततः

जैसे दुष्टा पत्नी वाले पुरुष की सारी योजनाएँ व्यर्थ हो जाती हैं, वैसे ही (प्रयत्न विफल देखकर) उसने फिर एक दूसरी दृढ़, सुदृढ़ महान् मौर्वी-डोरी बाँध दी।

Verse 29

कृत्वा च तलनिर्घोषं रौद्रमस्त्रं मुमोच सः । ततोऽस्त्रतेजसा सर्वमाकाशं नैव दृश्यते

ताली के समान भयंकर गर्जना करके उसने रौद्र अस्त्र छोड़ा; फिर उस अस्त्र के तेज से समूचा आकाश दिखाई न देता था।

Verse 30

भूमिर्दिशश्च विदिशो बामजालमया बुभुः । दृष्ट्वा तदस्त्रमाहात्म्यं सेनानीर्ग्रसनोऽसुरः

पृथ्वी, दिशाएँ और विदिशाएँ वामावर्त जाल-सदृश बंधन से भर गईं; उस अस्त्र का माहात्म्य देखकर असुर-सेनापति ग्रसन विस्मित और भयभीत हो उठा।

Verse 31

ब्राह्ममस्त्रं चकाराशु सर्वास्त्रविनिवारणम् । तेन तत्प्रशमं यातं रौद्रास्त्रं लोकभीषणम्

उसने शीघ्र ही ब्राह्म अस्त्र का प्रयोग किया, जो सब अस्त्रों का निरोधक है; उससे लोकों को भयभीत करने वाला रौद्र अस्त्र शांत हो गया।

Verse 32

अस्त्रे प्रतिहते तस्मिन्विष्णुर्दानवसूदनः । कालदंडास्त्रमकरोत्सर्वलोकभयंकरम्

जब वह अस्त्र रोका गया, तब दानवों का संहारक विष्णु ने सर्वलोक-भयकारी कालदण्ड-अस्त्र का प्रहार किया।

Verse 33

संधीयमानेस्त्रे तस्मिन्मारुतः परुषो ववौ । चकंपे च मही देवी भिन्नाश्चांबुधयोऽभवन्

उस अस्त्र के संधान होते ही प्रचण्ड पवन बहने लगी; देवी पृथ्वी काँप उठी और समुद्र भी फटकर विभक्त हो गए।

Verse 34

तदस्त्रमुग्रं दृष्ट्वा तु दानवा युद्धदुर्मदाः । चक्रुरस्त्राणि दिव्यानि नानारूपाणि संयुगे

उस उग्र अस्त्र को देखकर युद्धोन्मत्त दानवों ने रण में नाना रूपों वाले दिव्य अस्त्रों का निर्माण कर प्रहार किया।

Verse 35

नारायणांस्त्रं ग्रसनस्तु चक्रे त्वाष्ट्रं निमिश्चास्त्रवरं मुमोच । ऐषीकमस्त्रं च चकार जंभो युद्धस्य दण्डास्त्र निवारणाय

ग्रसन ने नारायणास्त्र का प्रयोग किया; निमि ने श्रेष्ठ त्वाष्ट्र-अस्त्र छोड़ा; और जंभ ने युद्ध में कालदण्ड-अस्त्र को रोकने हेतु ऐषीक-अस्त्र तैयार किया।

Verse 36

यावच्च संधानवशं प्रयांति नारायणादीनि निवारणाय । तावत्क्षणेनैव जघान कोटींदैत्येश्वराणां किल कालदंडः

नारायण आदि अस्त्र प्रतिकार हेतु संधान में ही लग रहे थे कि उसी क्षण, कहा जाता है, कालदण्ड ने दैत्येश्वरों की एक कोटि का संहार कर दिया।

Verse 37

अनंतरं शांतभयं तदस्त्रं दैत्यास्त्रयोगेन च कालदण्डम् । शांतं तदालोक्य हरिः स्वमस्त्रं कोपेन कालानलतुल्यमूर्तिः

तत्पश्चात् दैत्यास्त्रों के प्रयोग से वह अस्त्र और कालदण्ड भी शांत हो गए। उसे शांत देखकर, प्रलयाग्नि-सम क्रोधमूर्ति हरि ने अपना अस्त्र उठा लिया।

Verse 38

जग्राह चक्रं तपना युतप्रभमुग्रारमात्मानमिव द्वितीयम् । चिक्षेप सेनापतये ज्वलंतं चतुर्भूजः संयति संप्रगृह्य

चतुर्भुज प्रभु ने सूर्य-तेज से दीप्त, उग्र—मानो अपना दूसरा स्वरूप—चक्र को ग्रहण किया। रण में उसे दृढ़ पकड़कर उन्होंने ज्वलंत चक्र सेनापति पर फेंक दिया।

Verse 39

तदाव्रजच्चक्रमथो विलोक्य सर्वात्मना दैत्यवराः स्ववीर्यात् । नाशक्नुन्वारयितुं प्रचंडं दैवं यथा पूर्वमिवोपपन्नम्

उस चक्र को वेग से आता देखकर श्रेष्ठ दैत्य अपने ही पराक्रम पर पूर्ण भरोसा करके देखते रह गए; पर वे प्रचंड दैव-बल को, जैसे पहले, रोक न सके।

Verse 40

तदप्रतर्क्यं नवहेतितुल्यं चक्रं पपात ग्रसनस्य कण्ठे । तद्रक्तधारा रुणघोरनाभि जगाम भूयोपि करं मुरारेः

वह अप्रमेय, नव-तीक्ष्ण शस्त्र-सा चक्र ग्रसन के कंठ पर आ गिरा। उसके रक्त से धाराएँ बहाती, भयानक नाभिवाला सुदर्शन फिर मुरारि के हाथ में लौट आया।

Verse 41

चक्राहतः संयति दानवश्च पपात भूमौ प्रममार चापि । दैत्याश्च शेषा भृशशौकमापुः क्रोधं च केचित्पिपिषुर्भुजांश्च

रण में चक्र से आहत वह दानव भूमि पर गिर पड़ा और मर गया। शेष दैत्य अत्यंत शोक में डूब गए; और कुछ क्रोध से अपने ही भुजाओं को दाँतों से काटने लगे।

Verse 42

ततो विनिहते दैत्ये ग्रसने बलनायके । निर्मर्यादमयुध्यंत हरिणा सह दानवाः

तब बल के नायक दैत्य ग्रसन के मारे जाने पर दानव मर्यादा-रहित होकर श्रीहरि के साथ निरंकुश युद्ध करने लगे।

Verse 43

पट्टिशैर्मुशलैः प्रासैग्नि दाभिः कणपैरपि । तीक्ष्णाननैश्च नाराचैश्चक्रैः शक्तिभिरेव च

वे फरसे, मूसल, भाले, अग्निदण्ड, कणप तथा तीक्ष्णमुख नाराच, चक्र और शक्तियों से उसे चारों ओर से आक्रान्त करने लगे।

Verse 44

तदस्त्रजालं तैर्मुक्तं लब्धलक्षो जनार्दनः । एकैकं शतधा चक्रे बाणैरग्नि शिखोपमैः

उनके छोड़े हुए उस अस्त्र-जाल को देखकर, लक्ष्य साधकर जनार्दन ने अग्निशिखा-सदृश बाणों से एक-एक को सौ-सौ टुकड़ों में कर दिया।

Verse 45

जघान तेषां संक्रुद्धः कोटिकोटिं जनार्दनः । ततस्ते सहसा भूत्वा न्यपतन्केशवोपरि

क्रुद्ध होकर जनार्दन ने उनके करोड़ों-करोड़ों को मार गिराया। तब वे सब सहसा एकत्र होकर केशव पर टूट पड़े।

Verse 46

गरुडं जगृहुः केचित्पादयोः शतशोऽसुराः । ललंबिरे च पक्षाभ्यां मुखे चान्ये ललंबिरे

कुछ असुर—सैकड़ों की संख्या में—गरुड़ के पैरों को पकड़ने लगे। कुछ उसके पंखों से लटक गए और कुछ उसकी चोंच पर भी लटक गए।

Verse 47

केशवस्यापि धनुषि भुजयोः शीर्ष एव च । ललंबिरे महादैत्या निनदंतो मुहुर्मुहुः

महादैत्य केशव के धनुष, भुजाओं और यहाँ तक कि मस्तक पर भी लटक गए, और बार-बार गर्जना करने लगे।

Verse 48

तदद्भुतं महद्दृष्ट्वा सिद्धचारणवार्तिकाः । हाहेति मुमुचुर्नादसंबरे चास्तुवन्हरिम्

उस महान् अद्भुत दृश्य को देखकर सिद्ध, चारण और दिव्य वार्तिक ‘हा! हा!’ कहकर पुकार उठे; और कोलाहल के बीच हरि की स्तुति करने लगे।

Verse 49

ततो हरिर्विनिर्धूय पातयामास तान्भुवि । यथा प्रबुद्धः पुरुषो दोषान्संसारसंभवान्

तब हरि ने उन्हें झटककर पृथ्वी पर गिरा दिया—जैसे जाग्रत पुरुष संसारजन्य दोषों को त्याग देता है।

Verse 50

विकोशं च ततः नंदकं खड्गमुत्तमम् । चर्म चाप्यमलं विष्णुः पदातिस्तानधावत

तब विष्णु ने उत्तम नन्दक खड्ग को म्यान से खींचा; और निर्मल ढाल भी लेकर, उन पदाति योद्धाओं पर पैदल ही टूट पड़े।

Verse 51

ततो मुहूर्तमात्रेण पद्मानि दश केशवः । चकर्त्त मार्गे बहुभिर्विचरन्दैत्यसत्तमान्

फिर केवल एक मुहूर्त में केशव ने रणमार्ग में ‘पद्म’ नामक दस दलों को काट गिराया, और अनेक श्रेष्ठ दैत्यों को चीरता हुआ आगे बढ़ा।

Verse 52

ततो निमिप्रभृतयो विनद्यासुरसत्तमाः । अधावंत महेष्वासाः केशवं पादचारिणम्

तब निमि आदि असुरश्रेष्ठ, गर्जना करते हुए, महान धनुर्धर, पैदल युद्ध करते केशव पर टूट पड़े।

Verse 53

गरुत्मांश्चाभ्ययात्तूर्णमारुरोह च तं हरिः । उवाच च गरुत्मंतं तस्मिंश्च तुमुले रणे

गरुत्मान शीघ्र आ पहुँचा और हरि उस पर आरूढ़ हुए। उस घोर संग्राम में उन्होंने गरुड़ से कहा।

Verse 54

अश्रांतो यदि तार्क्ष्यासि मथनं प्रति तद्व्रज । श्रांतश्चेच्च मुहूर्तं त्वं रणादपसृतो भव

यदि तुम थके नहीं हो, हे तार्क्ष्य, तो मथन की ओर चलो; और यदि थक गए हो तो क्षणभर रण से हट जाओ।

Verse 55

तार्क्ष्य उवाच । न मे श्रमोऽस्ति लोकेश किंचित्संस्मरतश्च मे । यन्मे सुतान्वाहनत्वे कल्पयामास तारकः

तार्क्ष्य बोले—हे लोकेश, मुझे तनिक भी श्रम नहीं; विशेषतः जब मैं स्मरण करता हूँ कि तारक ने मेरे पुत्रों को वाहनों की दशा में कर दिया था।

Verse 56

इति ब्रवन्रणे दैत्यं मथनं प्रति सोऽगमत् । दैत्यस्तवभिमुखं दृष्ट्वा शंखचक्रगदाधरम्

ऐसा कहकर वह रण में दैत्य मथन की ओर गया। दैत्य ने तुम्हें सामने देखा—शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए।

Verse 57

जघान भिंडिपालेन शितधारेण वक्षसि । तं प्रहारमचिंत्यैव विष्णुस्तस्मिन्महाहवे

उसने तीक्ष्ण धार वाले भिन्दिपाल अस्त्र से विष्णु की छाती पर प्रहार किया, किंतु उस महायुद्ध में अचिंत्य शक्ति वाले विष्णु ने उस प्रहार की परवाह नहीं की।

Verse 58

जघान पंचभिर्बाणैर्गिरींद्रस्यापि भेदकैः । आकर्णकृष्टैर्दशभिः पुनर्विद्धः स्तनांतरे

उसने पर्वतों को भी भेदने वाले पाँच बाणों से प्रहार किया; और फिर कान तक खींचे गए दस बाणों से छाती के मध्य में पुनः विद्ध किया।

Verse 59

विचेतनो मुहूर्तात्स संस्तभ्य मथनः पुनः । गृहीत्वा परिघं मूर्ध्नि जनार्दनमताडयत्

क्षण भर के लिए अचेत होकर मथन पुनः संभला और परिघ (लोहे का गदा) लेकर जनार्दन के मस्तक पर प्रहार किया।

Verse 60

विष्णुस्तेन प्रहारेण किंचिदाघूर्णितोऽभवत् । ततः कोपविवृत्ताक्षो गदां जग्राह माधवः

उस प्रहार से विष्णु कुछ विचलित हो गए। तब क्रोध से विस्फारित नेत्रों वाले माधव ने अपनी गदा उठा ली।

Verse 61

तया संताडयामास मथनं हृदये दृढम् । स पपात तथा भूमौ चूर्णितांगो ममार च

उन्होंने उस गदा से मथन के हृदय पर जोर से प्रहार किया। वह भूमि पर गिर पड़ा और अंग-भंग होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।

Verse 62

तस्मिन्निपतिते भूमौ मथने मथिते भृशम् । अवसादं युयुर्दैत्याः सर्वे ते युद्धमण्डले

जब मथन धरती पर गिरकर अत्यन्त कुचला गया, तब रणभूमि में वे सब दैत्य निराशा में डूब गए।

Verse 63

ततस्तेषु विषण्णेषु दानवेष्वतिमानिषु । चुकोप रक्तनयनो महिषो दानवेश्वरः

फिर उन अत्यन्त अभिमानी दानवों के विषण्ण हो जाने पर, दानवेश्वर महिष—लाल नेत्रों वाला—क्रोध से भर उठा।

Verse 64

प्रत्युद्ययौ हरिं रौद्रः स्वबाहुबलमाश्रितः । रीक्ष्णधारेण शूलेन महिषो हरिमर्दयन्

भयंकर महिष अपने भुजबल का आश्रय लेकर हरि पर टूट पड़ा और तीक्ष्णधार त्रिशूल से हरि पर प्रहार करने लगा।

Verse 65

शक्त्या च गरुडं वीरो हृदयेऽभ्यहनद्दृढम् । ततो विवृत्य वदनं महामलगुहानिभम्

और उस वीर ने शक्ति से गरुड़ के हृदय में दृढ़ प्रहार किया; फिर विशाल, मलिन गुफा-सा मुख खोलकर।

Verse 66

ग्रस्तुमैच्छद्रणे दैत्यः सगरुत्मंतमच्युतम् । अथाच्युतोऽपि विज्ञाय दानवस्य चिकीर्षितम्

रण में वह दैत्य गरुड़ सहित अच्युत को निगल जाना चाहता था; तब अच्युत ने भी दानव की मंशा जान ली।

Verse 67

वदनं पूरयामास दिव्यैस्त्रैर्महाबलः । स तैर्बाणैरभिहतो महिषोऽचलसंनिभः

महाबली ने तीन दिव्य बाणों से अपना मुख भर लिया। उन बाणों से आहत होकर पर्वत-सम महिषासुर घायल हो गया।

Verse 68

परिवर्तितकायार्धः पपाताथ ममार च । महिषं पतितं दृष्ट्वा जीवयित्वा पुनर्हरिः

आधा शरीर उलटकर वह गिर पड़ा और मर गया। गिरे हुए महिष को देखकर हरि ने उसे फिर से जीवित कर दिया।

Verse 69

महिषं प्राह मत्तस्त्वं वधं नार्हसि दानव । योषिद्वध्यः पुरोक्तस्त्वं साक्षात्कमलयोनिना

हरि ने महिष से कहा—“हे दानव, मेरे हाथों से तू वध के योग्य नहीं। कमलयोनि ब्रह्मा ने स्वयं पहले कहा था कि तेरा वध स्त्री के द्वारा होगा।”

Verse 70

उत्तिष्ठ गच्छ मन्मुक्तो द्रुतमस्मान्महारणात् । इत्युक्तो हरिणा तस्माद्देशादपगतोऽसुरः

“उठ और जा—मेरे द्वारा मुक्त किया गया—इस महान रण से शीघ्र दूर हो जा।” ऐसा कहे जाने पर हरि के वचन से वह असुर उस स्थान से हट गया।

Verse 71

तस्मिन्पराङ्मुखे दैत्ये महिषे शुंभदानवः । संदष्टौष्ठपुटाटोपो भृकुटीकुटिलाननः

उस दैत्य महिष के पीठ फेरते ही शुंभ दानव क्रोध से होंठ दबाए, भृकुटि चढ़ाए, विकृत मुख किए, रोष से भड़क उठा।

Verse 72

निर्मध्य पाणिना पाणिं धनुरादाय भैरवम् । सज्जीकृत्य महाघोरान्मुमोच शतशः शरान्

उसने हाथ में हाथ कसकर भैरव नामक भयंकर धनुष उठा लिया; उसे चढ़ाकर सज्जित कर, अत्यन्त घोर बाणों की सैकड़ों वर्षा कर दी।

Verse 73

स चित्रयोधी दृढमुष्टिपातस्ततश्व विष्णुं च दैत्यः । बाणैर्ज्वलद्वह्निशिखानिकाशैः क्षिप्तैरसंख्यैः प्रतिघाहीनैः

वह दैत्य अद्भुत योद्धा था, जिसकी मुट्ठियों के प्रहार कठोर थे; फिर उसने विष्णु पर भी अग्नि-ज्वाला-से दहकते, असंख्य और निरन्तर प्रहार करने वाले बाण बरसाए।

Verse 74

विष्णुश्च दैत्येंद्रशरार्दितो भृशं भुशुंडिमादाय कृतांततुल्याम् । तया मुखं चास्य पिपेष संख्ये शुंभस्य जत्रुं च धराधराभम्

दैत्यराज के बाणों से अत्यन्त आहत विष्णु ने कृतान्त-तुल्य भुशुण्डी गदा उठा ली; युद्ध में उससे उसने उसका मुख चूर कर दिया और शुम्भ की पर्वत-सी जत्रु-हड्डियाँ भी तोड़ डालीं।

Verse 75

ततस्त्रिभिः शंभुभुजं द्विषष्ट्या सूतस्य शीर्षं दशक्षिश्च केतुम् । विष्णुर्विकृष्टैः श्रवणावसानं दैत्यस्य बाणैर्ज्वलनार्कवर्णैः

तब विष्णु ने प्रत्यंचा खींचकर, अग्नि और सूर्य-से दीप्त दैत्य-बाणों से—तीन बाणों से शम्भु की भुजा, बासठ से सारथी का सिर, और दस से ध्वजा-केतु काट गिराया।

Verse 76

स तैश्च विद्धो व्यथितो बभूव दैत्येश्वरो विस्रुतशोणिताक्तः । ततोऽस्य किंचिच्चलितस्य धैर्यादुवाच शंखांबुजसार्ङ्गपाणिः

उन बाणों से विद्ध होकर दैत्येश्वर व्यथित हुआ, बहते रक्त से लथपथ हो गया; तब उसका धैर्य कुछ डगमगाया देख, शंख-पद्म-शार्ङ्गधारी विष्णु ने उससे कहा।

Verse 77

योषित्सुवध्योऽसि रणं विभुंच शुंभाऽशुभ स्वल्पतरैरहोभिः । मत्तोर्हसि त्वं न वृथैव मूढ ततोऽपयातः स च शंभदानवः

हे अशुभ शुम्भ! तू स्त्री के हाथों वध योग्य है; और रण में तेरा पराक्रम कुछ ही दिनों में चूर हो जाएगा। तू मेरे समकक्ष नहीं; हे मूढ़, व्यर्थ प्रयत्न मत कर। ऐसा कहकर वह दानव शुम्भ पीछे हट गया।

Verse 78

जम्भोऽथ तद्विष्णुमुखान्निशम्य जगर्ज चोच्चैः कृतसिंहनादः । प्रोवाच वाक्यं च सलीलमाजौ महाट्टहासेन जगद्विकंप्य

विष्णु के मुख से वे वचन सुनकर जंभ ने सिंहनाद-सा ऊँचा गर्जन किया। फिर रणभूमि में वह क्रीडाभाव से बोला और महाहास्य से जगत को कंपा दिया।

Verse 79

किमेभिस्ते जलावास दैत्यैर्हीनपराक्रमैः । मामासादय युद्धेऽस्मिन्यदि ते पौरुषं क्वचित्

हे जलवासी! इन निर्बल पराक्रमी दैत्यों से तुझे क्या लाभ? यदि तुझमें कहीं भी पुरुषार्थ है, तो इस युद्ध में मेरे सामने आ।

Verse 80

यत्ते पूर्वं हता दैत्या हिरण्याक्षमुखाः किल । जंभस्तदाभवन्नैव पश्य मामद्य संस्थितम्

जिन दैत्यों को तूने पहले मारा था—हिरण्याक्ष आदि—वे जंभ नहीं थे। आज मुझे सामने खड़ा देख!

Verse 81

पश्य तालप्रती काशौ भुजावेतौ हरे मम । वक्षो वा वज्रकठिनं मयि प्रहर तत्सुखम्

हे हरि! मेरे ये भुजाएँ देख—तालवृक्षों के समान विशाल; और मेरा वक्ष वज्र-सा कठोर है। मुझ पर प्रहार कर—जैसा तुझे सुख हो!

Verse 82

इत्युक्तः केशवस्तेन सृक्किणी संलिहन्रुषा । मुमोच परिघंघोरं विरीणामपि दारणम्

उसके ऐसा कहने पर केशव क्रोध से होंठों के कोने चाटते हुए, अत्यन्त भयानक लोहे का परिघ फेंक बैठा, जो बलवान योद्धाओं को भी चीर देने में समर्थ था।

Verse 83

ततस्तस्याप्यनुपदं कालायसमयं दृढम् । मुमोच मुद्गरं विष्णुर्द्वितीयं पर्वतं यथा

फिर उसी क्षण विष्णु ने काले लोहे का दृढ़ दूसरा मुद्गर भी फेंका, मानो दूसरा पर्वत ही आ गिरा हो।

Verse 84

तदायुधद्वयं दृष्ट्वा जंभो न्यस्य रथे धनुः । आप्लुत्य परिघं गृह्य गरुडं तेन जघ्निवान्

वे दोनों आयुध देखकर जंभ ने रथ में धनुष रख दिया, उछलकर आगे बढ़ा, परिघ को पकड़कर उसी से गरुड़ पर प्रहार किया।

Verse 85

द्वितीयं मुद्गरं चानु गृहीत्वा विनदन्रणे । सर्वप्राणेन गोविंदं तेन मूर्ध्नि जघान सः

फिर दूसरे मुद्गर को भी उठा कर, रण में गर्जना करता हुआ, उसने समस्त बल से गोविंद के मस्तक पर प्रहार किया।

Verse 86

ताभ्यां चातिप्रहाराभ्यामुभौ गरुडकेशवौ । मोहाविष्टौ विचेतस्कौ मृतकल्पाविवासताम्

उन दोनों प्रचण्ड प्रहारों से गरुड़ और केशव—दोनों मोहग्रस्त होकर चेतनाहीन हो गए और मृतक के समान पड़े रहे।

Verse 87

तदद्भुतं महद्दृष्ट्वा जगर्जुर्दैत्यसत्तमाः । नैतान्हर्षमदोद्धूतानिदं सेहे जगत्तदा

उस महान् अद्भुत दृश्य को देखकर दैत्यश्रेष्ठ गरज उठे। हर्ष, मद और गर्व से उन्मत्त होकर वे अपने को रोक न सके; उस समय उनकी उछलती प्रसन्नता को मानो जगत् भी सह न सका।

Verse 88

सिंहनादैस्तलोन्नाहैर्धनुर्नादैश्च बाणजैः । जंभं ते हर्षयामासुर्वासांस्यादुधुवुश्च ते

सिंहनाद, ऊँचे घोष, धनुष की टंकार और बाणों की सनसनाहट से उन्होंने जंभ को हर्षित किया; और आनंद में अपने वस्त्र झटक-झटक कर लहराने लगे।

Verse 89

शंखांश्च पूरयामासुश्चिक्षिपुर्देवता भृशम्

देवताओं ने बड़े शब्द के साथ शंख फूँके और अत्यन्त बलपूर्वक अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रक्षेप किया।

Verse 90

संज्ञामवाप्याथ महारणे हरिः सवैनतेयः परिरभ्य जंभम् । पराङ्मुखः संयुगादप्रधृष्यात्पलायनं वेगपरश्चकार

तब उस महायुद्ध में चेतना पाकर हरि (विष्णु) गरुड़ सहित जंभ को पकड़कर—रण से विमुख होकर, वहाँ अजेय होने पर भी—अत्यन्त वेग से पलायन कर गए।