Adhyaya 18
Mahesvara KhandaKaumarika KhandaAdhyaya 18

Adhyaya 18

नारद जी एक दीर्घ युद्ध-वृत्तांत सुनाते हैं। धनाधिप कुबेर पहले जंभ से भिड़ते हैं; घने शस्त्र-वर्षा के बीच भी उनकी प्रसिद्ध गदा जंभ को चूर कर देती है। फिर कुजंभ शर-जाल और भारी अस्त्रों से आक्रमण बढ़ाकर कुछ समय के लिए कुबेर को दबा देता है और धन, रत्न तथा वाहनों को छीन लेने का प्रयास करता है। युद्ध फैलने पर निरृति प्रवेश कर दैत्य-सेना को खदेड़ते हैं। दैत्यों की तामसी माया से सब अंधकार में जड़ हो जाते हैं, पर सावित्र अस्त्र उस तम को दूर कर देता है। वरुण पाश से कुजंभ को बाँधकर प्रहार करते हैं, किंतु दैत्य-नायक महिष वरुण और निरृति को धमकाता है, जिससे वे इंद्र की शरण की ओर हटते हैं। चंद्र अपने शीत-अस्त्र से दैत्य-दल को स्तब्ध कर देता है; हताश दैत्यों को कालनेमि डाँटता है और मानवाकार माया तथा अग्नि-सदृश प्रसार से शीत-प्रभाव पलट देता है। अंत में दिवाकर (सूर्य) आते हैं, अरुण को कालनेमि की ओर हाँकने का आदेश देते हैं और शंबर व इंद्रजाल जैसी माया-युक्त मारक शक्तियाँ छोड़ते हैं; भ्रम से दैत्य देवों को दैत्य समझ बैठते हैं और फिर संहार मचता है। अध्याय का संदेश है—विवेक से रहित शक्ति अस्थिर होती है, और अस्त्र, माया तथा देव-रक्षा से जगत का संतुलन पुनः स्थापित होता है।

Shlokas

Verse 1

नारद उवाच । धनाधिपस्य जंभेन सायकैर्मर्मभेदिभिः । दिशोपरुद्धाः क्रुद्धेन सैन्यं चाभ्यर्दितं भृशम्

नारद बोले—क्रुद्ध जंभ के मर्मभेदी बाणों से सब दिशाएँ अवरुद्ध हो गईं और धनाधिप के सैन्य को उसने अत्यन्त पीड़ित किया।

Verse 2

तद्दृष्ट्वा कर्म दैत्यस्य धनाध्यक्षः प्रतापवान् । आकर्णाकृष्टचापस्तु जंभमाजौ महाबलम्

दैत्य के उस कर्म को देखकर प्रतापी धनाध्यक्ष ने धनुष को कान तक खींचा और रण में महाबली जंभ का सामना किया।

Verse 3

हृदि विव्याध बाणानां सहस्रेणाग्निवर्चसाम् । स प्रहस्य ततो वीरो बाणानामयुतत्रयम्

उसने अग्नि-सम तेजस्वी एक हजार बाणों से उसके हृदय को बेधा। तब वह वीर हँसकर तीस हजार बाण छोड़ने लगा।

Verse 4

नियुतं च तथा कोटिमर्बुदं चाक्षिपत्क्षणात् । तस्य तल्लाघ्रवं दृषट्वा क्रुद्धो गृह्य महागदाम्

क्षणभर में उसने नियुत, कोटि और अर्बुद की संख्या तक (अस्त्र-समूह) फेंक दिए। उसकी उस अद्भुत फुर्ती को देखकर वह क्रुद्ध हुआ और महागदा उठा ली।

Verse 5

धनाध्यक्षः प्रचिक्षेप स्वर्गेप्सुः स्वधनं यथा । मुक्तायां वै नादोऽभूत्प्रलये यथा

धनाध्यक्ष ने उसे वैसे ही फेंका जैसे स्वर्ग की कामना वाला पुरुष अपना धन दान कर देता है। उसके छूटते ही प्रलय-काल के समान महान् नाद हुआ।

Verse 6

भूतानां बहुधा रावा जज्ञिरे खे महाभयाः । वायुश्च सुमहाञ्जज्ञे खमायान्मेघसंकुलम्

आकाश में भूतगणों के अनेक भयानक नाद उठे। प्रचण्ड वायु चली और गगन मेघों से घिरकर घनघोर हो गया।

Verse 7

सा हि वैश्रवणस्यास्ते त्रैलोक्याभ्यर्चिता गदा । आयांतीं तां समालोक्य तडित्संघातदुर्द्दशाम्

वह गदा वैश्रवण (कुबेर) की थी, जो त्रिलोकी में पूजित थी। उसे वेग से आती, बिजली के समूह-सी भयावह देखकर (शत्रु चकित हुआ)।

Verse 8

दैत्यो गदाविघातार्थं शस्त्रवृष्टिं मुमोच ह । चक्राणि कुणपान्प्रासाञ्छतघ्नीः पट्टिशांस्तथा

गदा के प्रहार को रोकने हेतु दैत्य ने शस्त्रों की वर्षा कर दी—चक्र, गदा, भाले, शतघ्नी और कुल्हाड़े भी।

Verse 9

परिघान्मुशलान्वृक्षान्गिरींश्चातुलविक्रमः । कदर्थीकृत्य शस्त्राणि तानि सर्वाणि सा गदा

अतुल पराक्रम वाली उस गदा ने परिघ, मूसल, वृक्ष और पर्वत तक—उन सब शस्त्रों को चूर-चूर कर निष्फल कर दिया।

Verse 10

कल्पांतभास्करो यद्वन्न्यपतद्दैत्यवक्षसि । स तया गाढभिन्नः सन्सफेनरुधिरं वमन्

कल्पान्त के सूर्य-सा वह दैत्य के वक्ष पर आ गिरा। उससे गहराई से विदीर्ण होकर वह झाग मिला रक्त उगलने लगा।

Verse 11

निःपपात रथाज्जंभो वसुधां गतचेतनः । जंभं निपतितं दृष्ट्वा कुजंभो घोरनिश्चयः

जम्भ रथ से गिरकर पृथ्वी पर अचेत हो गया। जंभ को गिरा देख कुजंभ, घोर निश्चय वाला, कर्म करने को उद्यत हुआ।

Verse 12

धनाधिपस्य संक्रुद्धो नादेनापूरयन्दिशः । चक्रे बाणमयं जालं शकुंतस्येव पंजरम्

धनाधिप (कुबेर) पर क्रुद्ध होकर उसने अपने नाद से दिशाओं को भर दिया और पक्षी के पिंजरे-सा बाणों का जाल रच दिया।

Verse 13

विच्छिद्य बाणजालं च मायाजालमिवोत्कटम् । मुमोच बाणानपरांस्तस्य यक्षाधिपो बली

उस भयानक माया-जाल के समान बाण-जाल को काटकर, बलवान यक्षाधिप ने उसके विरुद्ध फिर बाणों की वर्षा छोड़ी।

Verse 14

चिच्छेद लीलया तांश्च दैत्यः क्रोधीव सद्वचः । निष्फलांस्तांस्ततो दृष्ट्वा बाणान्क्रुद्धो धनाधिपः

दैत्य ने उन बाणों को सहज ही काट डाला—जैसे क्रोधी पुरुष सदुपदेश को कठोरता से काट देता है। अपने बाण निष्फल देख धनाधिप क्रुद्ध हो उठा।

Verse 15

शक्तिं जग्राह दुर्धर्षां शतघंटामहास्वनाम् । प्रेषिता सा तदा शक्तिर्दारयामास तं हृति

तब उसने दुर्धर्ष, सौ घंटियों-सी महाध्वनि वाली शक्ति (भाला) उठाई। फेंकी गई वह शक्ति उसके हृदय को भेद गई।

Verse 16

यथाल्पबोधं पुरुषं दुःखं संसारसंभवम् । तथास्य हृदयं भित्त्वा जगाम धरणीतलम्

जैसे अल्पबुद्धि पुरुष को संसारजन्य दुःख आ घेरता है, वैसे ही उसका हृदय विदीर्ण होकर धरातल पर गिर पड़ा।

Verse 17

निमेषात्सोभिसंस्तम्भ्य दानवो दारुणाकृतिः । जग्राह पट्टिशं दैत्यो गिरीणामपि भेदनम्

क्षणमात्र में वह भयानकाकृति दानव स्वयं को सँभालकर पर्वतों को भी चीर देने वाले पट्टिश को उठा लेता है।

Verse 18

स तेन पट्टिसेनाजौ धनदस्य स्तनांतरम् । वाक्येन तीक्ष्णरूपेण मर्माक्षरविसर्पिणा

उसने उसी पट्टिश से रण में धनद (कुबेर) के स्तनों के बीच प्रहार किया—जैसे तीक्ष्ण वचन के अक्षर मर्मस्थलों में सरक जाते हैं।

Verse 19

निर्बिभेदाभिजातस्य हृदयं दुर्जनो यथा । तेन पट्टिश घातेन धनेशः ।परिमूर्छितः

उस पट्टिश-प्रहार से धनेश (कुबेर) मूर्छित हो गया—जैसे दुष्ट जन सज्जन के हृदय को बेध देता है।

Verse 20

निषसाद रथोपस्थे दुर्वाचा सुजनो यथा । तथागतं तु तं दृष्ट्वा धनेशं वै मृतं यथा

वह रथ के आसन पर ढह गया—जैसे कटुवचन से पीड़ित सज्जन। उसे ऐसा पड़ा देखकर उन्होंने धनेश को मानो मृत ही समझ लिया।

Verse 21

राक्षसो निरृतिर्देवो निशाचरबलानुगः । अभिदुद्राव वेगेन कुजंभं भीमविक्रमम्

राक्षसों का स्वामी निरृति, निशाचरों की सेना के साथ, भयंकर पराक्रमी कुजम्भ पर वेग से टूट पड़ा।

Verse 22

अथ दृष्ट्वातिदुर्धर्षं कुजंभो राक्षसेश्वरम् । नोदयामास दैत्यान्स राक्षसेशरथं प्रति

तब अत्यन्त दुर्धर्ष राक्षसेश्वर को देखकर कुजम्भ ने उस राक्षस-राज के रथ के विरुद्ध दैत्यों को आगे बढ़ाया।

Verse 23

स दृष्ट्वा नोदितां सेनां प्रबलास्त्रां सुभीषणाम् । रथादाप्लुत्य वेगेन निरृती राक्षसेश्वरम्

प्रेरित उस सेना को—जो प्रबल अस्त्रों से युक्त और अत्यन्त भीषण थी—देखकर राक्षसेश्वर निरृति वेग से रथ से कूद पड़ा।

Verse 24

खड्गेन तीक्ष्णधारेण चर्मपाणिरधावत । प्रविश्य दानवानीकं गजः पद्मसरो यथा

तीक्ष्णधार खड्ग और ढाल हाथ में लिए चर्मपाणि दौड़ा; वह दानव-सेना में ऐसे घुसा जैसे हाथी कमल-सरोवर में उतरता है।

Verse 25

लोडयामास बहुधा विनिष्कृत्य सहस्रशः । चिच्छेद कांश्चिच्छतशो बिभेदान्यान्वरासिना

उसने उन्हें अनेक प्रकार से उछाल-पछाड़ कर, सहस्रों को घसीट निकाला; कितनों को सैकड़ों की संख्या में काट डाला और अन्य को उत्तम खड्ग से बेध दिया।

Verse 26

संदष्टौष्ठमुखैः पृथ्वीं दैत्यानां सोऽभ्यपूरयत् । ततो निःशेषितप्रायां विलोक्य स्वां चमूं तदा

क्रोध से होंठ और मुख भींचे हुए दैत्यों से उसने पृथ्वी को भर दिया। फिर अपनी सेना को लगभग नष्ट हुई देखकर वह उसी क्षण उसे निहारने लगा।

Verse 27

मुक्त्वा धनपतिं दैत्यः कुजंभो निरृतिं ययौ । लब्धसंज्ञस्तु जंभोऽपि धनाध्यक्षपदानुगान्

धनपति को छोड़कर दैत्य कुजंभ निरृति की दिशा को चला गया। और जंभ भी होश में आकर धनाध्यक्ष के आदेशानुगामी सेवकों की ओर उन्मुख हुआ।

Verse 28

जीवग्राहं स जग्राह बद्धा पाशैः सहस्रधा । मूर्तिमंति च रत्ननि पद्मादींश्च निधींस्तथा

उसने जीवग्राहों को पकड़ लिया, जो सहस्र प्रकार से पाशों में बंधे थे। और मूर्तिमान रत्नों को भी, तथा पद्म आदि निधियों रूपी खजानों को भी उसने ले लिया।

Verse 29

वाहनानि च दिव्यानि विमानानि च सर्वशः । धनेशो लब्धसंज्ञस्तु तामवस्थां विलोक्य सः

दिव्य वाहन और सर्व प्रकार के विमान भी छीन लिए गए। तब धनेश (कुबेर) होश में आकर उस अवस्था को देखकर ठिठक गया।

Verse 30

निःश्वसन्दीर्घमुष्णं च रोषात्ताम्रविलोचनः । ध्यात्वास्त्रं गारुडं दिव्यं बाणं संधाय कार्मुके

वह दीर्घ और उष्ण निःश्वास छोड़ता हुआ, क्रोध से उसकी आँखें ताम्रवर्ण हो उठीं। उसने दिव्य गारुडास्त्र का ध्यान किया और धनुष पर बाण चढ़ाया।

Verse 31

मुमोच दानवानीके तं बाणं शत्रुदारणम् । प्रथमं कार्मुकं तस्य वह्निज्वालमदृश्यत

उसने दानव-सेना पर शत्रु-विनाशक वह बाण छोड़ा; उसके धनुष से पहले अग्नि की ज्वाला प्रकट हुई।

Verse 32

निश्चेरुर्विस्फुलिंगानां कोटयो धनुषस्तथा । ततो ज्वालाकुलं व्योम चक्रे चास्त्रं समंततः

धनुष से चिंगारियों के करोड़ों कण फूट पड़े; फिर उस अस्त्र ने चारों ओर आकाश को ज्वालाओं से भर दिया।

Verse 33

तदस्त्रं सहसा दृष्ट्वा जंभो भीमपराक्रमः । संवर्तं मुमुचे तेन प्रशांतं गारुडं तदा

उस अस्त्र को सहसा देखकर भयंकर पराक्रमी जंभ ने संवर्त अस्त्र छोड़ा; उससे तब गारुड़ अस्त्र शांत हो गया।

Verse 34

ततस्तं दानवो दृष्ट्वा कुबेरं रोषविह्वलः । अभिदुद्राव वेगेन पदातिर्धनदं नदन्

फिर कुबेर को देखकर क्रोध से व्याकुल वह दानव पैदल ही वेग से धनद (धन-स्वामी) पर गरजता हुआ दौड़ पड़ा।

Verse 35

अथाभिमुखमायांतं दैत्यं दृष्ट्वा धनाधिपः । बभूव संभ्रमाविष्टः पलायनपरायणः

दैत्य को सामने से आते देखकर धनाधिप कुबेर घबराहट से भर गया और पूरी तरह पलायन की ओर प्रवृत्त हो गया।

Verse 36

ततः पलायतस्तस्य मुकुटो रत्नमंडितः । पपात भूतले दीप्तो रविबिंबमिवांबरात्

तब भागते हुए उसके रत्नजटित मुकुट का तेजस्वी मुकुट धरती पर गिर पड़ा, मानो आकाश से सूर्य-मण्डल ही गिर आया हो।

Verse 37

यक्षणामभिजातानां भग्नं प्रववृते रणात् । मर्तुं संग्राम शिरसि युक्तं नो भूषणाय तत्

“कुलीन यक्षों के लिए युद्ध से टूटकर लौटना उचित नहीं। रण के अग्रभाग में मरना ही शोभता है—आभूषण नहीं, यही हमारा सच्चा मान है।”

Verse 38

इति व्यवस्य दुर्धर्षा नानाशस्त्रास्त्रपाणयः । युयुत्सवस्तथा यक्षा मुकुटं परिवार्य ते

ऐसा निश्चय करके वे अजेय यक्ष—नाना शस्त्र-अस्त्र धारण किए, युद्ध के लिए उत्सुक—गिरे हुए मुकुट को घेरकर खड़े हो गए।

Verse 39

अभिमान धना वीरा धनस्य पदानुगाः । तानमर्षाच्च संप्रेक्ष्य दानवश्चंडपौरुषः

वे वीर अभिमान-सम्पन्न, धनाधिप (कुबेर) के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाले सेवक थे। उन्हें देखकर चण्ड-पराक्रमी दानव असह्य क्रोध से जल उठा।

Verse 40

भुशुण्डीं भीषणाकारां गृहीत्वा शैलगौरवाम् । रक्षिणो मुकुटस्याथ निष्पिपेष निशाचरान्

वह पर्वत-भार जैसी, भयानक आकार वाली भुशुण्डी को पकड़कर मुकुट की रक्षा करने वाले निशाचरों को कुचलने लगा।

Verse 41

तान्प्रमथ्याथ नियुतं मुकुटं तं स्वके रथे । समारोप्यामररिपुर्जित्वा धनदमाहवे

उन्हें कुचलकर देवों के शत्रु ने वह अमूल्य मुकुट अपने रथ पर चढ़ाया और रण में धनद (कुबेर) को जीत लिया।

Verse 42

धनानि च निधीन्गृह्य स्वसैन्येन समावृतः । नादेन महता देवान्द्रावयामास सर्वशः

धन और निधियाँ लूटकर, अपनी सेना से घिरा हुआ, उसने महान गर्जना से देवताओं को सब दिशाओं में खदेड़ दिया।

Verse 43

धनदोऽपि धनं सर्वं गृहीतो मुक्तमूर्धजः । पदातिरेकः सन्त्रस्तः प्राप्यैवं दीनवत्स्थितः

धनद कुबेर भी अपना सारा धन गँवा बैठा; केश बिखरे, पैदल अकेला और भयभीत होकर वह दीनवत् खड़ा रह गया।

Verse 44

कुजंभेनाथ संसक्तो रजनीचरनंदनः । मायाममोघामाश्रित्य तामसीं राक्षसेश्वरः

कुजंभ के साथ युद्ध में उलझा हुआ, रजनीचर-कुल का पुत्र राक्षसों का स्वामी एक अचूक तामसी माया का आश्रय लेने लगा।

Verse 45

मोहयामास दैत्येन्द्रो जगत्कृत्वा तमोमयम् । ततो विफलनेत्राणि दानवानां बलानि च

दैत्येन्द्र ने जगत् को तमोमय कर सबको मोहित कर दिया; तब दानवों की सेनाएँ भी दृष्टि-शून्य-सी होकर निष्फल हो गईं।

Verse 46

न शेकुश्चलितुं तत्र पदादपि पदं तदा । ततो नानास्त्रवर्षेण दानवानां महाचमूः

उस समय वे वहाँ एक पग भी आगे न बढ़ सके। फिर नाना प्रकार के अस्त्रों की वर्षा से दानवों की महान सेना चारों ओर से पराभूत हो गई।

Verse 47

जघान निरृतिर्देवस्तमसा संवृता भृशम् । हन्यमानेषु दैत्येषु कुजंभे मूढचेतसि

घोर अंधकार से सब ढँक जाने पर देवशक्ति निरृति ने प्रचण्ड प्रहार किया। दैत्य मारे जा रहे थे, पर कुजंभ का चित्त मोहग्रस्त ही रहा।

Verse 48

महिषो दानवेन्द्रस्तु कल्पांतां भोदसन्निभः । अस्त्रं चकार सावित्रमुल्कासंघातमंडितम्

पर दानवों का स्वामी महिष, कल्पांत की अग्नि-सा भयानक, उल्काओं के समूह से विभूषित सावित्र अस्त्र रचने लगा।

Verse 49

विजृंभत्यथ सावित्रे परमास्त्रे प्रातपिनि । प्रणासमगमत्तीव्रं तमो घोरमनंतरम्

जब वह परम, तेजस्वी सावित्र अस्त्र प्रज्वलित हुआ, तभी वह तीव्र और घोर अंधकार तुरंत विनाश को प्राप्त हो गया।

Verse 50

ततोऽस्त्रविस्फुलिंगांकं तमः शुक्लं व्यजायत । प्रोत्फुल्लारुणपद्मौघं शरदीवामलं सरः

तब अस्त्र की चिंगारियों से चिह्नित वह अंधकार श्वेत हो गया—जैसे शरद् ऋतु का निर्मल सरोवर, जिसमें लाल कमल पूर्ण खिले हों।

Verse 51

ततस्तमसि संशांते दैत्येन्द्राः प्राप्तचक्षुषः । चक्रुः क्रुरेण तमसा देवानीकं महाद्भुतम्

फिर जब वह अंधकार शांत हुआ, दैत्य-राजाओं की दृष्टि लौट आई; और उन्होंने क्रूर तम से देव-सेना के सामने एक अद्भुत, मोहक दृश्य रच दिया।

Verse 52

अथादाय धनुर्घोरमिषुं चाशीविषोपमम् । कुजंभोऽधावत क्षिप्रं रक्षोदेवबलं प्रति

तब भयानक धनुष और विषधर-सर्प-सा बाण लेकर कुजम्भ शीघ्र ही राक्षसों और देवों की संयुक्त सेना की ओर दौड़ा।

Verse 53

राक्षसेन्द्रस्तथायांतं दृषट्वा तं स पदानुगः । विव्याध निशितैर्बाणैः कालाशनिसमस्वनैः

उसे इस प्रकार बढ़ते देख राक्षस-राज, उसके पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, काल-वज्र-सा नाद करने वाले तीक्ष्ण बाणों से उसे बेधने लगा।

Verse 54

नादानं न च सन्धानं न मोक्षो वास्य लक्ष्यते । चिच्छेदोग्रैः शरव्रातैस्ताञ्छरानतिलाघवात्

उसमें न धनुष-टंकार, न संधान, न ही बाण छोड़ने का विराम दिखता था; अपार वेग से वह भयानक शर-वृष्टि द्वारा उन बाणों को काट गिराता था।

Verse 55

ध्वजं शरेण तीक्ष्णेन निचकर्तामरद्विषः । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपाहरत्

तीक्ष्ण बाण से उसने देवद्वेषी का ध्वज काट गिराया; और भल्ल से उसके सारथि को रथ-आसन से उखाड़कर दूर कर दिया।

Verse 56

कालकल्पेन बाणेन तं च वक्षस्याताडयत् । स तु तेन प्रहारेण चकम्पे पीडितो भृशम्

काल के विधान-सा वह बाण लेकर उसने उसके वक्ष पर प्रहार किया। उस आघात से अत्यन्त पीड़ित होकर वह भयंकर रूप से काँप उठा।

Verse 57

दैत्येंद्रो राक्षसेन्द्रेण क्षितिकंपेनगो यथा । स सुहूर्तात्समाश्वास्य मत्वा तं दुर्जयं रणे

राक्षसेन्द्र के प्रहार से दैत्येन्द्र ऐसा डोल उठा जैसे भूकम्प से पर्वत। फिर क्षणभर में श्वास सँभालकर उसने उसे रण में दुर्जेय जान लिया।

Verse 58

पदातिरासाद्य रथं रक्षो वामकरेण च । केशेषु निरृतिं गृह्य जानुनाक्रम्य च स्थितः

तब वह राक्षस पैदल ही रथ के पास पहुँचा और बाएँ हाथ से निरृति को केशों से पकड़कर, घुटने से दबाकर उसके ऊपर खड़ा हो गया।

Verse 59

ततः खड्गेन च शिरश्छेत्तुमैच्छदमर्षणः । ततः कलकलो जज्ञे देवानां सुमहांस्तदा । कुजंभस्य वशं प्राप्तं दृष्ट्वा निरृतिमाहवे

तब क्रोधी ने खड्ग से उसका सिर काटना चाहा। उसी समय देवों में महान् कोलाहल मच गया, क्योंकि उन्होंने रण में निरृति को कुजम्भ के वश में पड़ा देखा।

Verse 60

एतस्मिन्नन्तरे देवो वरुणः पाशभृद्धृतः । पाशेन दानवेंद्रस्य बबन्धाशु भुजद्वयम्

उसी बीच पाशधारी देव वरुण प्रकट हुए और अपने पाश से दानवेन्द्र की दोनों भुजाओं को शीघ्र बाँध दिया।

Verse 61

ततो बद्धभुजं दैत्यं विफलीकृतपौरुषम् । ताडयामास गदया दयामुत्सृज्य पाशभृत्

तब पाशधारी ने दया त्यागकर, बाँहें बँधे और पराक्रम निष्फल हुए उस दैत्य को गदा से प्रहार किया।

Verse 62

स तु तेन प्रहारेण स्रोतोभिः क्षतजं स्रवन् । दधार कालमेघस्य रूपं विद्युल्लताभृतम्

उस प्रहार से वह धाराओं में रक्त बहाने लगा और बिजली-रेखाओं से युक्त काले मेघ के समान रूप धारण कर गया।

Verse 63

तदवस्थागतं दृष्ट्वा कुजंभं महिषासुरः । व्यावृत्तवदनारावो भोक्तुमैच्छत्सुरावुभौ

कुजंभ को उस दशा में देखकर महिषासुर मुख फेरकर गर्जना करता हुआ, उन दोनों देवों को निगल जाना चाहता था।

Verse 64

निरृति वरुणं चैव तीक्ष्णदंष्ट्रोत्कटाननः । तावभिप्रायमा लोक्य तस्य दैत्यस्य दूषितम्

तीक्ष्ण दाँतों और भयानक मुख वाला वह वीर, निरृति और वरुण—दोनों की ओर देखकर उनका अभिप्राय जान गया और उस दैत्य की दूषित दुष्ट योजना को भाँप लिया।

Verse 65

त्यक्त्वा रथावुभौ भीतौ पदाती प्रद्रुतौ द्रुतम् । जग्मतुर्महिषाद्भीतौ शरणं पाकशासनम्

महिष से भयभीत वे दोनों रथ छोड़कर पैदल ही शीघ्र भागे और पाकशासन इन्द्र की शरण में जा पहुँचे।

Verse 66

क्रुद्धोऽथ महिषो दैत्यो वरुणं समुपाद्रवत् । तमंतकमुखासन्नमालोक्य हिमदीधितिः

तब क्रुद्ध दैत्य महिष वरुण पर टूट पड़ा। उसे मानो मृत्यु-सम मुख के निकट आता देख, शीत-दीप्ति चन्द्रमा ने ध्यान किया।

Verse 67

चक्रे शस्त्रं विसृष्टं हि हिमसंघातमुल्बणम् । वायव्यं चास्त्र मतुलं चंद्रश्चक्रे द्वितीयकम्

उसने सचमुच हिम-समूह का भयंकर शस्त्र छोड़ दिया। और चन्द्रमा ने दूसरा, अतुलनीय अस्त्र—वायव्य (पवन) अस्त्र—तैयार किया।

Verse 68

वायुना तेन चंडंन संशुष्केण हिमेन च । महाहिमनिपातेन शस्त्रैश्चंद्रप्रणोदितैः

उस प्रचण्ड वायु से, सुखा देने वाले पाले से, महान हिमपात से, और चन्द्र द्वारा प्रेरित शस्त्रों से—

Verse 69

गात्राण्यसुरसैन्यानामदह्यंत समंततः । व्यथिता दानवाः सर्वे सीतच्छादितपौरुषाः

असुर-सेनाओं के अंग चारों ओर से जलने लगे। सब दानव पीड़ित हो उठे; शीत ने उनका पराक्रम ढक दिया।

Verse 70

न शेकुश्चलिंतुं तत्र नास्त्राण्यादातुमेव च । महिषो निष्प्रयत्नश्च शीतेनाकंपिताननः

वहाँ वे न चल सके, न अपने अस्त्र उठा सके। महिष भी निष्प्रयत्न हो गया, शीत से उसका मुख काँपने लगा।

Verse 71

अंसमालिंग्य पाणिभ्यामुपविष्टो ह्यधोमुखः । सर्वे ते निष्प्रतीकारा दैत्याश्चंद्रमसा जिताः

उसने दोनों हाथों से अपने कंधों को कसकर पकड़ लिया और मुख नीचे किए बैठ गया। वे सब दैत्य निरुपाय होकर चन्द्रमा द्वारा पराजित कर दिए गए।

Verse 72

रणेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा तस्थुस्ते जीवितार्थिनः । तत्राब्रवीत्कालनेमिर्दैत्यान्क्रोधविदीपितः

युद्ध की इच्छा को दूर फेंककर वे प्राणरक्षा की चाह में खड़े रह गए। तब क्रोध से दहकता हुआ कालनेमि दैत्यों से बोला।

Verse 73

भोभोः श्रृंगारिणः क्रूराः सर्वशस्त्रास्त्रपारगाः । एकैकोऽपि जगत्कृस्नं शक्तस्तुलयितुं भुजैः

“अरे! अरे! हे गर्वीले और क्रूरो, समस्त शस्त्र-अस्त्रों में पारंगत हो; तुममें से प्रत्येक अपने भुजबल से समस्त जगत् को तौलने में समर्थ है!”

Verse 74

एकैकोऽपि क्षमो ग्रस्तुं जगत्सर्वं चराचरम् । एकैकस्यापि पर्याप्ता न सर्वेऽपि दिवौकसः

प्रत्येक अकेला ही समस्त चराचर जगत् को निगलने में समर्थ है। एक-एक के सामने तो पर्याप्त कोई नहीं; सब देवता मिलकर भी एक का सामना करने में समर्थ नहीं।

Verse 75

किं त्रस्तनयनाश्चैव समरे परिनिर्जिताः । न युक्तमेतच्छूराणां विशेषाद्दैत्यजन्मनाम्

युद्ध में पराजित होकर तुम सब भयभीत नेत्रों से क्यों भाग रहे हो? यह वीरों के लिए—विशेषतः दैत्यकुल में जन्मे हुए के लिए—उचित नहीं है।

Verse 76

राज्ञश्च तारकस्यापि दर्शयिष्यथ किं मुखम् । विरतानां रणाच्चासौ क्रुद्धः प्राणान्हरिष्यति

राजा तारक को तुम कौन-सा मुख दिखाओगे? यदि तुम रणभूमि से हटोगे तो वह क्रोधित होकर तुम्हारे प्राण ही हर लेगा।

Verse 77

इति ते प्रोच्यमानापि नोचुः किंचिन्महासुराः । शीतेन नष्टश्रुतयो भ्रष्टवाक्याश्च ते तथा

इस प्रकार कहे जाने पर भी वे महाअसुर कुछ भी न बोले। शीत से पीड़ित होकर उनकी सुनने की शक्ति नष्ट हो गई और वाणी भी टूट गई।

Verse 78

मूकास्तथाभवन्दैत्या मृतकल्पा महारणे । तान्दृष्ट्वा नष्टचेतस्कान्दैत्याञ्छीतेन पीडितान्

उस महान रण में दैत्य मूक हो गए, मानो मृतक के समान। उन दैत्यों को—जिनकी चेतना नष्ट हो गई थी और जो शीत से पीड़ित थे—देखकर…

Verse 79

मत्वा कालक्षमं कार्यं कालनेमिर्महासुरः । आश्रित्य मानवीं मायां वितत्य च महावपुः

कार्य के लिए समय अनुकूल जानकर महाअसुर कालनेमि ने मानवी माया का आश्रय लिया और अपना विशाल रूप फैला लिया।

Verse 80

पूरयामास गगनं विदिश एव च । निर्ममे दानवेन्द्रोऽसौ शरीरेभास्करायुतम्

उसने आकाश और सब दिशाओं को भर दिया। उस दानव-इन्द्र ने दस हजार सूर्यों के तेज से दीप्त शरीर रचा।

Verse 81

दिशश्च विदिशश्चैव पूरयामास पावकैः । ततो ज्वालाकुलं सर्वं त्रैलोक्यमभवत्क्षणात्

उसने दिशाओं और विदिशाओं को अग्नि से भर दिया। तत्क्षण ही समस्त त्रैलोक्य ज्वालाओं से व्याप्त हो गया।

Verse 82

तेन ज्वालासमूहेन हिमां शुरगमद्द्रुतम् । ततः क्रमेण विभ्रष्टं शीतदुर्दिनमाबभौ

उस ज्वालासमूह से हिम शीघ्र ही दूर हो गया। फिर क्रमशः वह कठोर शीतकालीन दुर्दिन भी नष्ट होकर समाप्त हो गया।

Verse 83

तद्बलं दानवेंद्राणां मायया कालनेमिनः । तद्दृष्ट्वा दानवानीकं लब्धसंज्ञं दिवाकरः । उवाचारुणमत्यर्थं कोपरक्तांतलोचनः

कालनेमि की माया से दानवेन्द्रों का वह महान् बल उत्पन्न हुआ। दानव-सेना को पुनः चेतन होते देखकर, क्रोध से कोनों तक लाल नेत्रों वाले दिवाकर ने अरुण से तीव्र तेजस्वी वाणी में कहा।

Verse 84

दिवाकर उवाच । नयारुण रथं शीघ्रं कालनेमिरथो यतः

दिवाकर बोले— “हे अरुण! शीघ्र रथ को वहाँ ले चलो, जहाँ कालनेमि का रथ है।”

Verse 85

विमर्दे तत्र विषमे भविता भूतसंक्षयः । जित एषशशांकोऽथ वयं यद्बलमाश्रिताः

“उस भयानक संग्राम में प्राणियों का महान् संहार होगा। पर यह ‘शशांक-ध्वज’ भी जीता जाएगा, क्योंकि हम उस प्रभु-बल का आश्रय लिए हुए हैं।”

Verse 86

इत्युक्तश्चोदयामास रथं गरुडपूर्वजः । रथे स्थितोऽपि तैरश्वैः सितचामरधारिभिः

ऐसा कहे जाने पर गरुड़ के अग्रज ने रथ को वेग से हाँका। रथ पर स्थित होकर भी वह उन अश्वों तथा श्वेत चामर-धारियों से सुशोभित था।

Verse 87

जगद्दीपोऽथ भगवाञ्जग्राह विततं धनुः । शरौघो वै पांडुपुत्र क्षिप्रमासीद्विषद्युतिः

तब जगत् के दीपक भगवान् ने तना हुआ धनुष उठा लिया। हे पाण्डुपुत्र! विष-सी दीप्ति वाला बाणों का समूह शीघ्र ही प्रकट हो गया।

Verse 88

शंबरास्त्रेण संधाय बाणमेकं ससर्ज ह । द्वितीयं चेन्द्रजालेनायोजितं प्रमुमोच ह

उसने शंबरास्त्र से युक्त एक बाण संधान कर छोड़ा। फिर इन्द्रजाल से अभिमंत्रित दूसरा बाण भी उसने चला दिया।

Verse 89

शंबरास्त्रं क्षणाच्चक्रे तेषांरूपविपर्ययम् । देवानां दानवं रूपं दानवानां च दैविकम्

क्षण भर में शंबरास्त्र ने उनके रूप उलट दिए। देवताओं का रूप दानव-सा और दानवों का रूप देव-सा हो गया।

Verse 90

मत्वा सुरान्स्वकानेव जघ्ने घोरास्त्रलाघवात् । कालनेमी रुषाविष्टः कृतांत इव संक्षये

देवताओं को अपने ही पक्ष का समझकर उसने भयानक अस्त्रों की शीघ्रता से उन्हें मार गिराया। क्रोध से आविष्ट कालनेमि संहारकाल में यमराज-सा प्रचण्ड हो उठा।

Verse 91

कांश्चित्खड्गेन तीक्ष्णेन कांश्चिन्नाराचवृष्टिभिः । कांश्चिद्गदाभिर्घोराभिः कांश्चिद्धोरैः परश्वधैः

किसी को उसने तीक्ष्ण खड्ग से मारा, किसी को लोहे के बाणों की वर्षा से; किसी को भयानक गदाओं से, और किसी को डरावने परशुओं से।

Verse 92

शिरांसि केषाचिदपातयद्रथाद्भुजांस्तथा सारथींस्चोग्रवेगान् । कांश्चित्पिपेषाथरथस्य वेगात्कांश्चित्तथात्यद्भुतमुष्टिपातैः

उसने कुछ के सिर रथों से गिरा दिए, और कुछ के भुजाएँ तथा तीव्रगामी सारथी भी काट डाले। कुछ को अपने रथ के वेग से कुचल दिया, और कुछ को अद्भुत मुष्टि-प्रहारों से ढेर कर दिया।