Adhyaya 50
Mahesvara KhandaKaumarika KhandaAdhyaya 50

Adhyaya 50

यह अध्याय संवाद-रूप में एक तकनीकी धर्म-तत्त्व-विचार प्रस्तुत करता है। अतिथि शरीर के लक्षणों का उपदेश माँगते हैं; कमठ बताते हैं कि शरीर ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म प्रतिरूप है—पाताल से सत्यलोक तक के लोक-स्तर शरीर में मानो अंकित हैं। फिर सात धातुओं (त्वचा, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र), अस्थियों व नाड़ियों की संख्या, तथा प्रमुख अंग-प्रत्यंग और आन्तरिक अवयवों का वर्णन आता है। इसके बाद क्रियात्मक शरीर-विज्ञान बताया गया है—मुख्य नाड़ियाँ (सुषुम्ना, इड़ा, पिङ्गला), पाँच वायु (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) और उनके कर्म-संबंधी कार्य, पाचन-अग्नि के पाँच भेद (पाचक आदि) तथा कफ/सोम के विविध पक्ष (क्लेदक, बोधक, तर्पण, श्लेष्मक, आलम्बक आदि)। आहार रस बनकर क्रमशः रक्त आदि धातुओं में परिणत होता है और मल बारह मल-आश्रयों से बाहर निकलते हैं। फिर नीति-शिक्षा दी गई है कि शरीर को पुण्य-साधन के उपकरण की तरह संभालना चाहिए; कर्म का फल देश-काल और सामर्थ्य के अनुसार मिलता है। अंत में मृत्यु और परलोक-यात्रा का वर्णन है—जीव कर्मानुसार देह के छिद्रों से निकलकर अतिवाहिक रूप धारण करता है, यमलोक की ओर ले जाया जाता है, वैतरणी का प्रसंग आता है और प्रेत-लोक की अवस्थाएँ भोगनी पड़ती हैं। श्राद्ध, दान-उपहार, वार्षिक क्रिया और सपिण्डीकरण प्रेतत्व-निवारण में सहायक बताए गए हैं; निष्कर्ष यह कि मिश्र कर्मों से कर्म-प्रमाण के अनुसार स्वर्ग-नरक की मिश्र गति मिलती है।

Shlokas

Verse 1

अतिथिरुवाच । साध्वबालमते बाल कमठैतत्त्वयोच्यते । शरीरलक्षणं श्रोतुं पुनरिच्छामि तद्वद

अतिथि बोले—हे बालक कमठ! तत्त्वों का यह उपदेश सरल बुद्धि के लिए भी उपयुक्त है। मैं फिर से शरीर के लक्षण सुनना चाहता हूँ; वह मुझे कहो।

Verse 2

कमठ उवाच । यथैतद्वेद ब्रह्मांडं शरीरं च तथा शृणु । पादमूलं च पातालं प्रपदं च रसातलम्

कमठ बोले—जैसे यह शरीर ब्रह्माण्ड के समान है, वैसे सुनो। पैरों के तलवे का मूल पाताल है और पाँव का अग्रभाग रसातल है।

Verse 3

तलातलं तथा गुल्फौ जंघे चास्य महातलम् । जानुनी सुतलं चोरू वितलं चातलं कटिम्

टखने तलातल हैं और उसकी पिंडलियाँ महातल हैं। घुटने सुतल हैं, जाँघें वितल हैं और कटि अतल है।

Verse 4

नाभिं महीतलं प्राहुर्भुवर्लोकमथोदरम् । उरःस्थलं च स्वर्लोकं महर्ग्रीवा मुखं जनम्

नाभि को महीतल कहते हैं और उदर भुवर्लोक है। वक्षःस्थल स्वर्लोक है, ग्रीवा महर्लोक है और मुख जनलोक है।

Verse 5

नेत्रे तपः सत्यलोकं शीर्षदेशं वदंति च । तद्यथा सप्त द्वीपानि पृथिव्यां संस्थितानि च

नेत्रों को तपोलोक कहा गया है और मस्तक-शिखर को सत्यलोक। जैसे पृथ्वी पर सात द्वीप प्रतिष्ठित हैं, वैसे ही—

Verse 6

तथात्र धातवः सप्त नामतस्तान्निबोध मे । त्वगसृङ्मांस मेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः

उसी प्रकार यहाँ सात धातु हैं—मेरे मुख से उनके नाम सुनो: त्वचा, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र—ये धातु हैं।

Verse 7

अस्थ्नामत्र शतानि स्युस्त्रीणि षष्ट्यधिकानि च । त्रिंशच्छतसहस्राणि नाडीनां कथितानि च

यहाँ अस्थियों की संख्या तीन सौ साठ कही गई है; और नाड़ियों की संख्या तीन लाख बताई गई है।

Verse 8

षट्पंचाशत्सहस्राणि तथान्यानि नवैव तु । ता वहंति रसं देहे जलं नद्यो यथा भुवि

छप्पन हजार (नाड़ियाँ/मार्ग) और उनके अतिरिक्त नौ और हैं। वे देह में रस को वैसे ही वहन करती हैं जैसे पृथ्वी पर नदियाँ जल को।

Verse 9

सार्धाभिस्तिसृभिश्छन्नं समंताद्रोमकोटिभिः । शरीरं स्थूलसूक्ष्माभिर्दृश्यादृश्या हि ताः स्मृताः

साढ़े तीन करोड़ रोमों से शरीर चारों ओर से आच्छादित है। वे दो प्रकार की मानी गई हैं—स्थूल और सूक्ष्म, दृश्य और अदृश्य।

Verse 10

षडंगानि प्रधानानि कथ्यमानानि मे शृणु । द्वौ बाहू सक्थिनी द्वे च मूर्धा जठरमेव च

मेरे द्वारा कहे जा रहे छह प्रधान अंगों को सुनो—दो भुजाएँ, दो जाँघें, मस्तक और उदर।

Verse 11

अंत्राण्यत्र तथा त्रीणि सार्धव्यामत्रयाणि च । त्रिव्यामानि तथा स्त्रीणामाहुर्वेदविदो द्विजाः

यहाँ आँतें भी तीन कही गई हैं, जिनका मान साढ़े तीन व्याम है; और स्त्रियों के लिए वे तीन व्याम बताई गई हैं—ऐसा वेदज्ञ द्विज कहते हैं।

Verse 12

ऊर्ध्वनालमधोवक्त्रं हृदि पद्मं प्रकीर्त्यते । हृत्पद्मवामतः प्लीहो दक्षिणे स्यात्तथा यकृत्

हृदय में एक कमल कहा गया है—जिसकी नाल ऊपर की ओर और मुख नीचे की ओर है। हृदय-कमल के बाएँ प्लीहा और दाएँ यकृत् स्थित है।

Verse 13

मज्जातो मेदसश्चैव वसायाश्च तथा द्विज । मूत्रस्य चैव पित्तस्य श्लेष्मणः शकृतस्तथा

हे द्विज, (देह के द्रव्य) मज्जा, मेद और वसा; तथा मूत्र, पित्त, श्लेष्मा और मल भी कहे गए हैं।

Verse 14

रक्तस्य चरमस्यात्र गर्ता द्व्यंजलयः स्मृताः । गेयः प्रवर्तमानास्ते देहं संधारयंत्युत

यहाँ अंतिम रक्त के कुंड (आश्रय) दो अंजलि-परिमाण के माने गए हैं। वे प्रवाहित होकर देह को निश्चय ही धारण करते हैं।

Verse 15

सीवन्यश्च तथा सप्त पंच मूर्धानमास्थिताः । एका मेढ्रं गता चैका तथा जिह्वां गता द्विज

सात सीवनियाँ कही गई हैं; उनमें से पाँच सिर में स्थित हैं। एक मेढ्र (लिंग) तक जाती है और एक उसी प्रकार जिह्वा तक जाती है, हे द्विज।

Verse 16

नाड्यः सर्वाः प्रवर्तंते नाभिपद्मात्तथात्र च । यासां श्रेष्ठा शिरो याता सुषुम्नेडाऽथ पिंगला

यहाँ सब नाड़ियाँ नाभि-रूपी पद्म से उत्पन्न होकर प्रवाहित होती हैं। उनमें जो श्रेष्ठ होकर सिर तक पहुँचती हैं, वे सुषुम्ना, इड़ा और पिंगला हैं।

Verse 17

नासिकाद्वारमासाद्य संस्थिते देहवर्धने । वायुरग्निश्चंद्रमाश्च पंचधा पंचधात्र च

नासिका-द्वार तक पहुँचकर वे देह की वृद्धि और धारण के लिए स्थित रहती हैं। वहाँ प्राण-वायु, अग्नि और चन्द्र-तत्त्व भी पाँच-पाँच प्रकार से कार्य करते हैं।

Verse 18

प्राणापानसमानाश्च उदानो व्यान एव च । पंच भेदाः स्मृता वायोः कर्मार्ण्येषां वदंति च

प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान—ये वायु के पाँच भेद स्मरण किए गए हैं; और इनके-इनके कर्म भी बताए जाते हैं।

Verse 19

उच्छ्वासश्चैव निःश्वासो ह्यन्नपानप्रवेशनम् । आकंठाच्छीर्षसंस्थास्य प्राणकर्म प्रकीर्तितम्

उच्छ्वास-निःश्वास तथा अन्न-जल का प्रवेश—ये प्राण के कर्म कहे गए हैं; जिसका स्थान कंठ से लेकर शिर तक माना गया है।

Verse 20

त्यागो विण्मूत्रशुक्राणां गर्भविस्रवणं तथा । अपानकर्म निर्दिष्टं स्थानमस्य गुदोपरि

मल, मूत्र और शुक्र का त्याग तथा गर्भ से सम्बन्धित स्राव—यह अपान वायु का कर्म कहा गया है; इसका स्थान गुदा के ऊपर है।

Verse 21

समानो धारयत्यन्नं विवेचयति चाप्यथ । रसयंश्चैव चरति सर्वश्रोणिष्ववारितः

समान वायु अन्न को भीतर धारण करता है, फिर उसे पचा कर विभाजित करता है; और सब नाड़ियों में अवरोध रहित चलकर रस का संचार करता है।

Verse 22

वाक्प्रवृत्तिप्रदोद्गारे प्रयत्ने सर्वकर्मणाम् । आकंठसुरसंस्थानमुदानस्य प्रकीर्त्यते

वाणी की प्रवृत्ति, डकार, तथा समस्त कर्मों में प्रयत्न—इनका कारण उदान कहा गया है; इसका स्थान कण्ठ तक और ऊर्ध्व भाग (सुर-स्थान) बताया गया है।

Verse 23

व्यानो हृदि स्थितो नित्यं तथा देहचरोपि च । धातुवृद्धिप्रदः स्वेदलालोन्मेषनिमेषकृत्

व्यान वायु नित्य हृदय में स्थित रहता है और देह में सर्वत्र विचरता है; वह धातुओं की वृद्धि करता है तथा पसीना, लार, और नेत्रों का उन्मेष-निमेष कराता है।

Verse 24

पाचको रजकश्चैव साधकालोचकौ तथा । भ्राजकश्च तथा देहे पञ्चधा पावकः स्थितः

देह में पावक (अग्नि) पाँच रूपों में स्थित है—पाचक, रञ्जक, साधक, आलोकक और भ्राजक।

Verse 25

पाचकस्तु पचत्यन्नं नित्यं पक्वाशये स्थित । आमाशयस्थोऽपि रसं रंजकः कुरुते त्वसृक्

पाचक अग्नि, पक्वाशय में स्थित होकर, नित्य अन्न का पाचन करती है। और रञ्जक, आमाशय-प्रदेश में रहकर भी, रस को रक्त में परिवर्तित करता है।

Verse 26

साधको हृदिसंस्थश्च बुद्ध्याद्युत्साहकारकः । आलोचकश्च दृक्संस्थो रूपदर्शनशक्ति कृत

साधक, हृदय में स्थित होकर, बुद्धि आदि के लिए उत्साह उत्पन्न करता है। आलोचक, नेत्र में स्थित होकर, रूप-दर्शन की शक्ति प्रदान करता है।

Verse 27

त्वक्संस्थो भ्राजको देहं भ्राजयेन्निर्मलीकृतः । क्लेदको बोधकश्चैव तर्पणः श्लेष्मणस्तथा

त्वचा में स्थित भ्राजक, देह को निर्मल करके तेजस्वी बनाता है। इसी प्रकार क्लेदक, बोधक और तर्पण—ये भी श्लेष्म (कफ) के ही रूप कहे गए हैं।

Verse 28

आलंबकस्तथा देहे पंचधा सोम उच्यते । क्लेदकः क्लेदयत्यन्नं नित्यं पक्वाशये स्थितः

देह में आलम्बक आदि के द्वारा सोम पाँच प्रकार से कार्य करता है—ऐसा कहा गया है। क्लेदक, पक्वाशय में स्थित होकर, नित्य अन्न को भिगोकर कोमल करता रहता है।

Verse 29

बोधको रसनास्थश्च रसानामवबोधकः । शिरःस्थश्चक्षुरादीनां तर्पणात्तर्पणः स्मृतः

बोधक, रसना (जीभ) में स्थित होकर, रसों का यथार्थ बोध कराता है। तर्पण, शिर में स्थित होकर, तृप्ति-रूप पोषण से नेत्र आदि इन्द्रियों का पालन करता है।

Verse 30

सर्वसंधिगतश्चैव श्लेष्मणः श्लेष्मकृत्तथा । उरःस्थः सर्वगात्राणि स वै ह्यालंबकः स्थितः

जो समस्त संधियों में व्याप्त है और श्लेष्म (कफ) को भी उत्पन्न करता है, वह ‘आलम्बक’ उरःस्थ होकर शरीर के सभी अंगों को धारण व स्थिर करता है।

Verse 31

एवं वाय्वग्निसोमैश्च देहः संधारितस्त्वसौ । आकाशजानि स्रोतांसि तथा कोष्ठविविक्तता

इस प्रकार वायु, अग्नि और सोम से यह देह धारण की जाती है। आकाश से शरीर के स्रोतस (नाड़ियाँ/मार्ग) उत्पन्न होते हैं और उसी से कोष्ठों की आन्तरिक रिक्तता व भिन्नता भी होती है।

Verse 32

पार्थिवानीह जानीहि घ्राणकेशनखानि च । अस्थीनि धैर्यं गुरुता त्वङ्मांस हृदयं गुदम्

यहाँ पार्थिव तत्त्व के अंश जानो—घ्राण, केश और नख; अस्थियाँ, धैर्य और गुरुता; त्वचा और मांस; तथा हृदय और गुदा भी।

Verse 33

नाभिर्मेदो यकृन्मज्जा अंत्रमामाशयः शिरा । स्नायुः पक्वाशयश्चैव प्राहुर्वेदविदो द्विजाः

नाभि, मेद, यकृत्, मज्जा, आँत, आमाशय और शिराएँ; तथा स्नायु और पक्वाशय भी—ऐसा वेद के ज्ञाता द्विज कहते हैं।

Verse 34

नेत्रयोर्मडलं शुक्लं कफाद्भवति पैतृकम् । कृष्णं च मण्डलं वातात्तथा भवति मातृकम्

नेत्रों में शुक्ल मण्डल कफ से उत्पन्न होता है और उसे पितृज कहा गया है; तथा कृष्ण मण्डल वात से उत्पन्न होता है और वह मातृज कहा गया है।

Verse 35

पक्ष्ममण्डलमेकं तु द्वितीयं चर्ममण्डलम् । शुक्लं तृतीयं कथित चतुर्थं कृष्णमण्डलम्

एक पक्ष्म-मण्डल है, दूसरा चर्म-मण्डल कहा गया है। तीसरा श्वेत-मण्डल और चौथा कृष्ण-मण्डल कथित है।

Verse 36

दृङ्मण्डलं पंचमं तु नेत्रं स्यात्पंचमण्डलम् । अपरे नेत्रभागे द्वे उपांगोऽपांग एव च

‘दृङ्-मण्डल’ पाँचवाँ है; इस प्रकार नेत्र पाँच मण्डलों वाला कहा गया है। अन्य लोग नेत्र के दो अतिरिक्त भाग—उपाङ्ग और अपाङ्ग—भी बताते हैं।

Verse 37

उपांगो नेत्रपर्यंतो नासा मूलमपांगकः । वृषणौ च तथा प्रोक्तौ मेदोसृक्कफमांसकौ

उपाङ्ग नेत्र की परिधि तक होता है और अपाङ्ग नासामूल में स्थित है। तथा दोनों वृषण भी मेद, असृक्, कफ और मांस से युक्त कहे गए हैं।

Verse 38

असृङ्मांसमयी जिह्वा सर्वेषामेव देहिनाम् । हस्तयोरोष्ठयोर्मेढ्रे ग्रीवायां षट् च कूर्चकाः

समस्त देहधारियों की जिह्वा असृक् और मांसमयी है। और दोनों हाथों में, ओष्ठों में, मेढ्र में तथा ग्रीवा में—इस प्रकार छह कूर्चक स्थित हैं।

Verse 39

एवमत्र स्थिते जीवो देहेऽस्मिन्सप्तसप्तके । पंचविंशतिको व्याप्य देहं वासोऽस्य मूर्धनि

इस प्रकार यहाँ स्थित जीव इस देह में—सप्त-सप्तक के रूप में—निवास करता है। पञ्चविंशति-तत्त्वात्मक होकर वह देह में व्याप्त है, पर उसका आसन मूर्धा में है।

Verse 40

त्वगसृग्मांसमित्याहुस्त्रिकं मातृसमुद्भवम् । मेदोमज्जास्थिकं प्रोक्तं पितृजं षट्च कौशिकम्

त्वचा, रक्त और मांस—यह त्रय माता से उत्पन्न कहा गया है। मेद, मज्जा और अस्थि पिता से उत्पन्न बताए गए हैं; तथा षट् ‘कौशिक’ समूह भी उसी प्रकार वर्णित है।

Verse 41

एवं भूतमयं देहं पंचभूतसमुद्भवैः । अन्नैर्यथा वृद्धिमेति तदहं वर्णयामि ते

इस प्रकार पंचभूतों से बना यह देह, पंचमहाभूतों से उत्पन्न अन्न के द्वारा जैसे वृद्धि को प्राप्त होता है—वह मैं तुम्हें बताता हूँ।

Verse 42

तदन्नं पिण्डकवलैर्ग्रासैर्भुक्तं च देहिभिः । पूर्वं स्थूलाशये वायुः प्राणः प्रकुरुते द्विधा

वह अन्न देहधारियों द्वारा पिंडों और कौरों के रूप में खाया जाकर पहले स्थूल आमाशय में पहुँचता है। वहाँ प्राणवायु उस पर दो प्रकार से क्रिया करता है।

Verse 43

संप्रविश्यान्नमध्ये तु पृथगन्नपृथग्जलम् । अग्नेरूर्ध्वं जलं स्थाप्य तदन्नं तज्जलोपरि

अन्न के भीतर प्रवेश करके वह अन्न को जल से अलग करता है। पाचक अग्नि के ऊपर जल को रखकर, उस जल के ऊपर अन्न को स्थापित करता है।

Verse 44

जलस्याधः स्वयं प्राणः स्थित्वाग्निं धमते शनैः । वायुना धम्यमानोग्निरत्युष्णं कुरुते जलम्

जल के नीचे स्वयं प्राण स्थित होकर अग्नि को धीरे-धीरे फूँकता है। वायु से फूँकी हुई वह अग्नि जल को अत्यन्त उष्ण कर देती है।

Verse 45

तदन्नमुष्णतोयेन समंतात्पच्यते पुनः । द्विधा भवति तत्पक्वं पृथक्किट्टं पृथग्रसम्

वह अन्न उष्ण जल से चारों ओर से फिर भलीभाँति पकता है। पचने पर वह दो रूप हो जाता है—एक ओर किट्ट (मल) और दूसरी ओर रस (पोषक सार)।

Verse 46

मलैर्द्वादशभिः किट्टं भिन्नं देहाद्बहिर्व्रजेत् । कर्णाक्षिनासिकाजिह्वादताः शिश्नं गुदं नखाः

किट्ट-भाग बारह मल-रूप अशुद्धियों में विभक्त होकर देह से बाहर निकल जाता है—कान, आँखें, नाक, जीभ, दाँत, शिश्न, गुदा और नख आदि।

Verse 47

रोमकूपाणि चैव स्युर्द्वादशैते मलाश्रयाः । हृत्पद्मप्रतिबद्धाश्च सर्वा नाड्यः समंततः

रोमकूप भी इन्हीं में हैं—ये बारह मल के आश्रय हैं। हृदय-कमल से बँधी हुई समस्त नाड़ियाँ चारों ओर फैली रहती हैं।

Verse 48

तासां मुखेषु तं सूक्ष्मं व्यानः स्थापयते रसम् । रसेन तेन ता नाडीः समानः पूरयेत्पुनः

उन नाड़ियों के मुखों में व्यान प्राण उस सूक्ष्म रस को स्थापित करता है। फिर उसी रस से समान प्राण नाड़ियों को पुनः भर देता है।

Verse 49

ततः प्रयांति संपूर्णास्ताश्च देहं समंततः । ततः स नाडिमध्यस्थो रञ्जकेनोष्मणा रसः

तदनंतर वे नाड़ियाँ पूर्ण होकर देह में चारों ओर फैल जाती हैं। फिर नाड़ियों के मध्य स्थित रस पर रञ्जक उष्मा (रक्तवर्णक ताप) का प्रभाव पड़ता है।

Verse 50

पच्यते पच्यमानस्तु रुधिरत्वं भजेत्पुनः । ततस्त्वग्लोमकेशाश्च मांसं स्नायु शिरास्थि च

पचता हुआ रस फिर से रक्त-भाव को प्राप्त होता है। उसी से त्वचा, रोम और केश, तथा मांस, स्नायु, शिराएँ और अस्थियाँ उत्पन्न होती हैं।

Verse 51

नखा मज्जा खवैमल्यं शुक्रवृद्धिः क्रमाद्भवेत् । एवं द्वादशधान्नस्य परिणामः प्रकीर्त्यते

क्रम से नाखून, मज्जा, देह-गुहाओं की शुद्धि और शुक्र की वृद्धि होती है। इस प्रकार अन्न का बारह प्रकार का परिणाम कहा गया है।

Verse 52

एवमेतद्विनिष्पन्नं शरीरं पुण्यहेतवे । यथैव स्यंदनः शुभ्रो भारसंवाहनाय च

इस प्रकार पूर्ण रूप से बना हुआ यह शरीर पुण्य का कारण बनने के लिए है। जैसे स्वच्छ और उत्तम रथ भार ढोने के लिए होता है, वैसे ही देह भी प्रयोजन-सिद्धि के लिए है।

Verse 53

तैलाभ्यंगादिभिर्यत्नैर्बहुभिः पाल्यते न चेत् । किं कृत्यं साध्यते तेन यदि भारं वहेन्न हि

यदि रथ को तेल-मलिश आदि अनेक प्रयत्नों से सँभाला न जाए, तो वह भार ही न ढो सकेगा; फिर उससे कौन-सा कार्य सिद्ध होगा?

Verse 54

एवमेतेन देहेन किं कृत्यं भोजनोत्तमैः । वर्धितेन न चेत्पुण्यं कुरुते पशुवच्च तत्

इसी प्रकार उत्तम-उत्तम भोजन से इस देह को पुष्ट करने का क्या लाभ, यदि वह बढ़कर भी पुण्य न करे और पशु के समान ही जिए?

Verse 55

भवंति चात्र श्लोकाः । यस्मिन्काले च देशे च वयसा यादृशेन च । कृतं शुभाशुभं कर्म तत्तथा तेन भुज्यते

यहाँ यह श्लोक कहा गया है—जिस समय, जिस देश में और जिस आयु में जैसा शुभ या अशुभ कर्म किया जाता है, उसका फल भी उसी प्रकार से भोगा जाता है।

Verse 56

तस्मात्सदा शुभं कार्यमविच्छिन्नसुखार्थिभिः । विच्छिद्यंतेऽन्यथा भोगा ग्रीष्मे कुसरितो यथा

इसलिए जो अविच्छिन्न सुख चाहते हैं, उन्हें सदा शुभ कर्म करना चाहिए; अन्यथा भोग वैसे ही कट जाते हैं जैसे ग्रीष्म में छोटी नदियाँ सूख जाती हैं।

Verse 57

यस्मात्पापेन दुःखानि तीव्राणि सुबहून्यपि । तस्मात्पापं न कर्तव्यमात्मपीडाकरं हि तत्

क्योंकि पाप से अनेक और अत्यन्त तीव्र दुःख उत्पन्न होते हैं; इसलिए पाप नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह वास्तव में आत्म-पीड़ा देने वाला है।

Verse 58

एवं ते वर्णितः साधो प्रश्नोऽयं शक्तितो मया । यथा संजायते प्राणी यथा शृणु प्रलीयते

हे साधु, मैंने अपनी शक्ति भर इस प्रश्न का वर्णन कर दिया—प्राणी कैसे जन्म लेता है; अब सुनो कि वह कैसे प्रलीन होता है (मृत्यु को प्राप्त होता है)।

Verse 59

आयुष्ये कर्मणि क्षीणे संप्राप्ते मरणे नृणाम् । स्वकर्मवशगो देही कृष्यते यमकिंकरैः

जब मनुष्यों की आयु और जीवन-धारण करने वाला कर्म क्षीण हो जाता है और मृत्यु आ पहुँचती है, तब देही अपने ही कर्म के वश होकर यम के किंकरों द्वारा घसीटा जाता है।

Verse 60

पंचतन्मात्रसहितः समनोबुद्ध्यहंकृतिः । पुण्यपापमयैः पाशैर्बद्धो जीवस्त्यजे द्वपुः

पाँच तन्मात्राओं सहित, मन-बुद्धि और अहंकार से युक्त जीव पुण्य-पापरूप पाशों से बँधा हुआ देह का त्याग करता है।

Verse 61

शीर्ष्णश्च सप्तभिश्छिद्रैर्निर्गच्छेत्पुण्यकर्मणाम् । अधश्च पापिनां यांति योगिनां ब्रह्मरंध्रतः

पुण्यकर्म करने वाले सिर के सात छिद्रों से निकलते हैं; पापी अधोगति को जाते हैं; पर योगी ब्रह्मरन्ध्र से प्रस्थान करते हैं।

Verse 62

तत्क्षणात्सोऽथ गृह्णाति शारीरं चातिवाहिकम् । अंगुष्ठपर्वमात्रं तु स्वप्राणैरेव निर्मितम्

उसी क्षण वह ‘अतिवाहिक’ नामक शरीर धारण करता है—अंगूठे के पोर के बराबर—जो केवल अपने ही प्राणों से निर्मित होता है।

Verse 63

ततस्तस्मिन्स्थितं जीवं देहे यमभटास्तदा । बद्ध्वा नयंति मार्गेण याम्येनाति यथाबलम्

फिर उस शरीर में स्थित जीव को यम के भट बाँधकर, आवश्यकता अनुसार बल लगाते हुए, यममार्ग से ले जाते हैं।

Verse 64

तप्तांबरीषतुल्येन अयोगुडनिभेन च । प्रतप्तसिकतेनापि ताम्रपात्रनिभेन च

उस मार्ग में वह तप्त लोहे के पिंड के समान, लोहे की डली के समान, दहकती रेत के समान और तप्त ताम्रपात्र के समान पीड़ित होता है।

Verse 65

षडशीतिसहस्राणि योजनानां महीतलात् । कृष्यमाणो यमपुरीं नीयते पापकृद्भटैः

पृथ्वी-तल से छियासी हज़ार योजन तक घसीटा जाकर पापी को यमपुरी में यमदूतों द्वारा ले जाया जाता है।

Verse 66

क्वचिच्छीतं महादुर्गमन्धकारं क्वचिन्महत् । अग्निसंस्पर्शवदनैः काककाकोलजंबुकैः

कहीं तीव्र शीत है, कहीं अत्यन्त दुर्गम घोर अन्धकार; और अग्नि-स्पर्श-से मुख वाले कौए, काकोल और सियार उसे पीड़ित करते हैं।

Verse 68

क्वचिच्च भक्ष्यते घोरै राक्षसैः कृष्यतेऽस्यते । दह्यमानोतिघोरेण सैकतेन च नीयते

कहीं वह भयानक राक्षसों द्वारा खाया जाता है; कहीं घसीटा और मारा जाता है; और अत्यन्त दाहक बालू में जलता हुआ आगे हाँका जाता है।

Verse 69

मुहूतैर्दशभिर्याति तं मार्गमतिदुस्तरम् । तं कालं सुमहद्वेत्ति पुरुषो वर्षसंमितम्

दस मुहूर्तों में ही वह अत्यन्त दुस्तर मार्ग पार कराया जाता है; पर देहधारी उस समय को अत्यधिक—मानो वर्षों के समान—अनुभव करता है।

Verse 70

तार्यते च नदीं घोरां पूयशोणितवाहिनीम् । नदीं वैतरणीं नाम केशशैवलशाद्वलाम्

फिर उसे पूय और रक्त बहाने वाली भयानक नदी पार कराई जाती है—वैतरणी नाम की—जिसके तट केशों, शैवाल और चिकनी घास से भरे हैं।

Verse 71

ततो यमस्य पुरतः स्थाप्यते यमकिंकरैः । पापी महाभयं पश्येत्कालांतकमुखैर्वृतम्

तब यम के किंकर पापी को यमराज के सामने खड़ा कर देते हैं; वह महाभय को देखता है—मानो काल और मृत्यु के मुखों से घिरा हो।

Verse 72

पुण्यकर्मा सौम्यरूपं धर्मराजं तदा किल । मनुष्या एव गच्छंति यमलोकेन चापरे

पर पुण्यकर्म करने वाला उस समय सचमुच धर्मराज के सौम्य रूप के पास जाता है; और कुछ अन्य जीव भी यमलोक के मार्ग से—मानव आत्माओं के रूप में—गुज़रते हैं।

Verse 73

मरणानंतरं तेषां जंतूनां योनिपूरणम् । तथाहि प्रेता मनुजाः श्रूयंते नान्यजंतवः

मृत्यु के बाद उन जीवों के लिए नई योनि का पूरण (पुनर्जन्म) होता है; क्योंकि ऐसा सुना जाता है कि ‘प्रेत’ मनुष्य ही होते हैं, अन्य जीव नहीं।

Verse 74

धार्मिकः पूज्यते तत्र पापः पाशगलो भवेत् । धार्मिकश्च यथा याति तं मार्गं शृणु वच्मि ते

वहाँ धर्मात्मा का पूजन होता है, और पापी फाँस में जकड़ा जाता है। अब सुनो—धार्मिक उस मार्ग पर कैसे चलता है, मैं तुम्हें बताता हूँ।

Verse 75

आरामद्रुमदातारः फलपुष्पवता पथा । छायया च सुखं यांति तथा ये च्छत्रदा नराः

जो उपवन और वृक्ष दान करते हैं, वे फल-पुष्पों से समृद्ध पथ पर, छाया के सुख सहित चलते हैं; वैसे ही वे नर भी, जिन्होंने छत्र दान किया है।

Verse 76

उपानहप्रदा यानैर्वितृषाः पूर्तधर्मिणः । विमानैर्यानदा यांति तथा शय्यासनप्रदाः

जो जूते-चप्पल दान करते हैं, वे पूर्त-धर्म के साधक होकर वाहनों से जाते हैं और प्यास से रहित रहते हैं। जो वाहन दान करते हैं वे विमान-रथों से जाते हैं; तथा शय्या और आसन दान करने वाले भी उत्तम गति पाते हैं।

Verse 77

भक्ष्यभोज्यैस्तथा तृप्ता यांति भोजनदायिन । दीपप्रदाः प्रकाशेन गोप्रदास्तां नदीं सुखम्

भक्ष्य-भोज्य का दान करने वाले तृप्त होकर आगे बढ़ते हैं। दीप दान करने वाले प्रकाश को साथ लिए चलते हैं; और गोदान करने वाले उस नदी को सुख और सहजता से पार कर जाते हैं।

Verse 78

श्रीसूर्यं श्रीमहादेवं भक्ता ये पुरुषोत्तमम् । जन्मप्रभृति ते यांति पूज्यमाना यमानुगैः

जो भक्त श्रीसूर्य, श्रीमहादेव और पुरुषोत्तम में अनन्य भक्ति रखते हैं, वे जन्म से ही आगे बढ़ते हैं और यम के अनुचरों द्वारा भी पूजित होते हैं।

Verse 79

महीं गां कांचनं लोहं तिलान्कार्पासमेव च । लवणं सप्तधान्यं च दत्त्वा याति सुखं नरः

जो मनुष्य भूमि, गौ, स्वर्ण, लोहा, तिल, कपास, लवण और सप्त-धान्य का दान करता है, वह सुखमय गति को प्राप्त होता है।

Verse 80

तेषां तत्र गतानां च पापिनां पुण्यकर्मिणाम् । चित्रगुप्तः प्रेतपाय निरूपयति वै ततः

जो वहाँ पहुँचे हैं—पापी हों या पुण्यकर्मी—उन सबके विषय में चित्रगुप्त तब प्रेतलोक में उनकी आगे की गति का निश्चय करता है।

Verse 81

प्रेतलोके स वसति ततः संवत्सरं नरः । वत्सरेण च तेनास्य शरीरमभिजायते

वह नर प्रेतलोक में एक वर्ष तक निवास करता है; और उस वर्ष की पूर्णता पर उसके लिए एक देह बन जाती है।

Verse 82

सोदकुम्भमथान्नाद्यं बांधवैर्यत्प्रदीयते । दिनेदिने स तद्भुक्त्वा तेन वृद्धिं प्रयाति च

और जल-कलश तथा अन्नादि जो बंधुओं द्वारा अर्पित किए जाते हैं—उन्हें वह दिन-प्रतिदिन भोगकर प्रेत-भाव में वृद्धि पाता है।

Verse 83

पूर्वदत्तमथान्नाद्यं प्राप्नोति स्वयमेव च । स्वयं येन न दत्तं च तथा दाता न विद्यते

पूर्व में दिया गया अन्नादि भी वह अपने-आप प्राप्त कर लेता है; पर जिसने जीवन में कुछ भी दान नहीं किया, उसके लिए कोई दाता नहीं मिलता।

Verse 84

न चाप्युदकदातासौ क्षुत्तृड्भ्यामतिपीड्यते । बांधवैस्तूदकं दत्तं नदीभूत्वोपतिष्ठति

जो जल का दाता रहा है, वह भूख-प्यास से अत्यन्त पीड़ित नहीं होता; और बंधुओं द्वारा दिया गया जल उसके पास मानो नदी बनकर उपस्थित होता है।

Verse 85

मासिमासि च यच्छ्राद्धं षोडशश्राद्धपूर्वकम् । अत्र न क्रियते यस्य प्रेतत्वात्स न मुच्यते

यदि षोडश-श्राद्ध से आरम्भ होने वाला मासिक श्राद्ध यहाँ किसी के लिए न किया जाए, तो वह प्रेतत्व से मुक्त नहीं होता।

Verse 86

मानुषेण दिनेनैव प्रेतलोके दिनं स्मृतम् । तस्माद्दिनेदिने देयं प्रेतायान्नं च वत्सरम्

मनुष्य का एक दिन ही प्रेतलोक में एक दिन माना गया है। इसलिए दिन-प्रतिदिन पूरे एक वर्ष तक प्रेत के लिए अन्न-दान करना चाहिए।

Verse 87

तं च स्माशानिकानाम गणा याम्या भयावहाः । शीतवातातपोपेतं तत्र रक्षंति पापिनम्

वहाँ ‘श्मशानिक’ नामक यम-से भयावह गण रहते हैं। वे शीत, वायु और तीव्र ताप से पीड़ित पापी की वहाँ रखवाली करते हैं।

Verse 88

यथेह बन्धने कश्चिद्रक्ष्यते विषमैर्नरैः । प्रेतपिंडा न दीयंते षोडशश्राद्धपूर्वकाः

जैसे इस लोक में बंधन में पड़ा कोई व्यक्ति कठोर पुरुषों द्वारा पहरे में रखा जाता है, वैसे ही षोडश-श्राद्ध से आरम्भ होने वाले प्रेत-पिण्ड (यदि) न दिए जाएँ (तो वह प्रेत अवस्था में ही रहता है)।

Verse 89

यस्य तस्य न मोक्षोऽस्ति प्रेतत्वाद्वै युगैरपि । ततः सपिण्डीकरणे बांधवैः सुकृते नरः

जब तक वह प्रेतत्व में रहता है, तब तक युगों-युगों में भी उसका मोक्ष नहीं होता। फिर बान्धव जब पुण्यपूर्वक सपिण्डीकरण करते हैं, तब दिवंगत को यथोचित लाभ होता है।

Verse 90

पूर्णे संवत्सरे देहं संपूर्णं प्रतिपद्यते । पापात्मा घोररूपं तु धार्मिको दिव्यमुत्तमम्

एक वर्ष पूर्ण होने पर वह पूर्ण देह को प्राप्त होता है। पापात्मा भयंकर रूप धारण करता है और धर्मात्मा दिव्य तथा उत्तम रूप पाता है।

Verse 91

ततः स नरकं याति स्वर्गं वा स्वेन कर्मणा । रौरवाद्याश्च नरकाः पातालतलसंस्थिताः

तत्पश्चात् वह अपने कर्मों के अनुसार नरक या स्वर्ग को प्राप्त होता है। रौरव आदि नरक पाताल-तलों में स्थित हैं।

Verse 92

सुराद्याः सत्यपर्यंताः स्वर्लोकस्योर्ध्वमाश्रिताः । इतिहासपुराणेषु वेदस्मृतिषु यच्छुतम्

देवलोक आदि से लेकर सत्यलोक तक के लोक स्वर्गलोक के ऊपर स्थित हैं। यही इतिहास-पुराणों तथा वेद-स्मृतियों में सुना गया है।

Verse 93

पुण्यं तेन भवेत्स्वर्गो नरकस्तद्विपर्ययात् । तत्रापि कालवसति कर्मणामनुरूपतः

पुण्य से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और उसके विपरीत से नरक। वहाँ भी कर्मों के अनुरूप काल तक निवास होता है।

Verse 94

अर्वाक्सपिंडीकरणं यस्य वर्षाच्च वा कृतम् । प्रेतत्वमपि तस्यापि प्रोक्तं संवत्सरं धुवम्

जिसका सपींडीकरण वर्ष पूरा होने से पहले ही कर दिया गया हो, उसके लिए भी प्रेतत्व निश्चित रूप से एक वर्ष तक कहा गया है।

Verse 95

यैरिष्टं च त्रिभिर्मेधैरर्चितं वा सुरत्रयम् । प्रेतलोकं न ते यांति तथा ये समरे हताः

जिन्होंने तीन यज्ञ किए हों या देवत्रयी की पूजा की हो, वे प्रेतलोक को नहीं जाते; और जो रण में मारे गए हों, वे भी नहीं जाते।

Verse 96

शुद्धेन पुण्येन दिवं च शुद्धां पापेन शुद्धेन तथा तमोंधम् । मिश्रेण स्वर्गं नरकं च याति देहस्तथैवास्य भवेच्च तादृक्

शुद्ध पुण्य से मनुष्य शुद्ध स्वर्ग को प्राप्त होता है; शुद्ध पाप से अन्धकारमय तम में गिरता है। मिश्र कर्मों से वह स्वर्ग और नरक दोनों को भोगता है, और उसका देह-भाव भी वैसा ही मिश्र हो जाता है।

Verse 97

प्रश्नत्रयं चेति तव प्रणीतमुत्पत्तिमृत्यू परलोकवासः । यथा गुरुर्मे समुदाजहार किं भूय इच्छत्युत तद्वदामि

तुमने तीन प्रश्न रखे हैं—जन्म, मृत्यु और परलोक-निवास। जैसे मेरे गुरु ने मुझे समझाया था, वैसे ही मैं तुम्हें बताता हूँ; और क्या अधिक सुनना चाहते हो?

Verse 617

मक्षिकादंशमशकैर्भक्ष्यते सर्पवृश्चिकैः । भक्ष्यमाणोऽपि तैर्जंतुः क्रंदते म्रियते न हि

वह मक्खियों, डाँसों, मच्छरों तथा सर्पों और बिच्छुओं द्वारा खाया जाता है। उनके द्वारा भक्ष्य होते हुए भी वह जीव कराहता-चिल्लाता है, पर मरता नहीं।