Rudra Samhita59 Adhyayas2941 Shlokas

Yuddha Khanda

Yuddhakhanda

Adhyayas in Yuddha Khanda

Adhyaya 1

त्रिपुरवर्णनम् (Tripura-varṇanam) — “Description of Tripura”

अध्याय 1 में त्रिपुरवध-उपाख्यान का आरम्भ होता है। गणेश तथा गौरी-शंकर को नमस्कार कर संवाद के रूप में कथा-श्रवण की याचना की जाती है। नारद ‘परमानन्ददायक’ वृत्तान्त पूछते हैं—रुद्ररूप शंकर ने विचरते दुष्टों का संहार कैसे किया और देव-शत्रुओं के तीनों पुरों को एक ही बाण से एक साथ कैसे भस्म किया। ब्रह्मा व्यास→सनत्कुमार→ब्रह्मा→नारद की पुराण-परम्परा बताकर कथा की प्रामाणिकता स्थापित करते हैं। सनत्कुमार कारण-प्रस्ताव रखते हैं—स्कन्द द्वारा तारकासुर के वध के बाद उसके तीन पुत्र उत्पन्न हुए: तारकाक्ष, विद्युनमाली और कमलाक्ष। वे संयमी, शक्तिशाली, सत्यवादी, दृढ़चित्त महावीर हैं, पर देवद्रोही हैं; इसी से आगे शिव के हस्तक्षेप की भूमिका बनती है।

77 verses

Adhyaya 2

देवस्तुतिः (Devastuti) — Hymn/Praise of the Devas

इस अध्याय में व्यास ब्रह्मा से पूछते हैं कि देवों की पीड़ा के बाद उनका कल्याण कैसे हुआ। ब्रह्मा शिव के कमल-चरणों का स्मरण कर सनत्कुमार के कथन के रूप में वृत्तांत सुनाते हैं। त्रिपुरनाथ के तेज और मायानामक मायावी शिल्पी (तारकासुर-वंश से संबद्ध) के दमन से देव अत्यन्त व्याकुल होकर ब्रह्मा की शरण में आते हैं। प्रणाम कर वे अपना दुःख निवेदित करते हैं और शत्रु-विनाश का उपाय माँगते हैं। ब्रह्मा उन्हें धैर्य बँधाते हुए दैत्य-दानवों का भेद बताते हैं और कहते हैं कि वास्तविक समाधान शर्व (शिव) ही करेंगे। साथ ही वे धर्म-नियम बताते हैं कि ब्रह्मा से सम्बद्ध होकर पोषित दैत्य का वध ब्रह्मा द्वारा उचित नहीं, पर शिव की सत्ता इन सीमाओं से परे होकर निर्णायक हस्तक्षेप करेगी। अध्याय का संकेत है कि देवस्तुति ही शिव की कृपा और त्रिपुर-वध की भूमिका बनेगी।

63 verses

Adhyaya 3

भूतत्रिपुरधर्मवर्णनम् (Description of the Dharma/Conduct of the Bhūta-Tripura) — Chapter 3

इस अध्याय में त्रिपुरवधोपाख्यान के भीतर यह विचार होता है कि त्रिपुर के शासकों और निवासियों का वध किया जाए या नहीं। शिव कहते हैं कि इस समय त्रिपुराध्यक्ष पुण्यवान है; जहाँ पुण्य प्रभावी हो वहाँ बिना कारण बुद्धिमान वध नहीं करते। वे देवताओं की पीड़ा स्वीकारते हुए भी तारक के पुत्रों तथा तीनों पुरों के निवासियों की अद्भुत शक्ति और उनके वध की कठिनता बताते हैं। फिर वे नीति की ओर मुड़कर मित्रद्रोह को महापाप कहते हैं, हितैषियों के द्रोह से भारी दोष होता है, और कृतघ्नता का प्रायश्चित्त नहीं होता—यह स्पष्ट करते हैं। दैत्य उनके भक्त हैं, इसलिए उनके वध की माँग करना भी धर्मसंगत नहीं—ऐसा संकेत देकर शिव देवों को आदेश देते हैं कि ये कारण विष्णु को निवेदित करें। सनत्कुमार के अनुसार इन्द्रादि देव पहले ब्रह्मा के पास जाते हैं और फिर शीघ्र वैकुण्ठ पहुँचते हैं, जहाँ आगे का परामर्श होगा। इस प्रकार अध्याय त्रिपुरवध को केवल युद्ध नहीं, बल्कि पुण्य, भक्ति, मैत्री और लोक-हित के संतुलन वाला धर्म-विचार बनाता है।

54 verses

Adhyaya 4

त्रिपुरदीक्षाविधानम् — Tripura Dīkṣā: Prescriptive Procedure (Chapter on the Ordinance of Initiation)

सनत्कुमार–पाराशर्य संवाद में यह अध्याय त्रिपुर-प्रसंग से जुड़ी धर्मोन्मुख गतिविधि को रोकने/परखने हेतु एक दिव्य उपाय बताता है। सनत्कुमार कहते हैं कि विष्णु (अच्युत) अपने ही अंश से माया-निर्मित एक पुरुष उत्पन्न करते हैं, जिसका कार्य धर्म-विघ्न करना है। वह मुंडित सिर, फीके वस्त्र, पात्र और पोटली सहित, काँपती वाणी में बार-बार “धर्म” कहता हुआ कपट-धर्म का संकेत देता है। वह विष्णु को प्रणाम कर पूछता है—किसकी पूजा करूँ, क्या कर्म करूँ, कौन-से नाम धारण करूँ और कहाँ निवास करूँ। विष्णु उसकी उत्पत्ति और नियुक्ति स्पष्ट कर उसे पूज्य माने जाने का वचन देते हैं, उसका नाम ‘अरिहन्’ रखते हैं, अन्य नामों को अशुभ बताते हैं और आगे उसके उचित स्थान/आवास का विधान कहने की प्रतिज्ञा करते हैं। अध्याय माया, प्रत्यायोजित अधिकार और धर्म की नकली रूपों से होने वाली असुरक्षा का कारण-निरूपण भी करता है।

64 verses

Adhyaya 5

त्रिपुरमोहनम् (Tripuramohana — “The Delusion/Enchanting of Tripura”)

अध्याय 5 में व्यास पूछते हैं कि मायावी तपस्वी द्वारा दीक्षा देकर मोहित किए गए दैत्य-राज के साथ आगे क्या हुआ। सनत्कुमार दीक्षोत्तर संवाद बताते हैं—शिष्यों से घिरे, नारद आदि के साथ आए तपस्वी अरिहन् दैत्य-शासक को ‘वेदान्त-सार’ नाम से परम रहस्य का उपदेश देता है। वह कहता है कि संसार अनादि है; कर्ता–कर्म का अंतिम द्वैत नहीं, यह स्वयं ही प्रकट और लीन होता है। ब्रह्मा से लेकर तृण तक, देह-बन्धन तक, केवल आत्मा ही एक स्वामी है—दूसरा कोई नियन्ता नहीं। देवों से कीटों तक सभी देह नश्वर हैं और काल में नष्ट होते हैं। भोजन, निद्रा, भय और मैथुन-प्रवृत्ति सब देहधारियों में समान है; उपवास के बाद तृप्ति भी सबमें एक-सी है। त्रिपुर प्रसंग में यह ‘अद्वैत’ जैसा उपदेश वास्तव में माया बनकर दैत्यों का आत्मविश्वास डगमगाता है और शिव की व्यापक योजना की भूमिका तैयार करता है।

62 verses

Adhyaya 6

शिवस्तुतिवर्णनम् (Śiva-stuti-varṇanam) — “Description of Hymns in Praise of Śiva”

इस अध्याय में व्यास सनत्कुमार से पूछते हैं कि त्रिपुर के दैत्य-नायकों के मोहग्रस्त होकर शिव-पूजा छोड़ देने पर समाज-धर्म व्यवस्था (ग्रंथानुसार स्त्री-धर्म आदि) कैसे दुराचार में गिर गई। सनत्कुमार बताते हैं कि हरि (विष्णु) ‘सफल-से’ होकर देवताओं के साथ कैलास जाकर उमापति शिव को सब वृत्तांत निवेदित करते हैं। शिव के निकट ब्रह्मा गहन समाधि में दिखते हैं; विष्णु मन से सर्वज्ञ ब्रह्मा का स्मरण कर शंकर की स्पष्ट स्तुति करते हैं—महेश्वर, परमात्मा, रुद्र, नारायण और ब्रह्म के रूप में शिव की एकता का गान। फिर विष्णु दण्डवत प्रणाम करके जल में खड़े होकर दक्षिणामूर्ति-संबद्ध रुद्र-मंत्र का जप करते और शम्भु/परमेश्वर का ध्यान करते हैं; देवता भी महेश्वर में चित्त स्थिर करते हैं। अध्याय कथा-लिटर्जिकल मोड़ बनकर बताता है कि स्तुति, जप और ध्यान से ही दिव्य अनुग्रह तथा आगे का समाधान संभव होता है।

55 verses

Adhyaya 7

देवस्तुतिवर्णनम् (Deva-stuti-varṇana) — “Description of the Gods’ Hymn/Praise”

अध्याय 7 में सनत्कुमार कथा कहते हैं। शरण्य और भक्तवत्सल भगवान शिव देवताओं की विनती स्वीकार करते हैं। तभी देवी अपने पुत्रों सहित आती हैं; विष्णु आदि देवगण तुरंत दण्डवत् प्रणाम कर मंगल-जयघोष करते हैं, पर उनके आगमन का कारण क्षणभर मौन रखते हैं। विस्मय से भरी देवी शिव से कहकर सूर्य-सम तेजस्वी, क्रीड़ालोल षण्मुख स्कन्द को, उत्तम आभूषणों से विभूषित, दिखाती हैं। शिव आनंदित होकर स्कन्द के मुखामृत का पान करते हुए तृप्त नहीं होते, उसे आलिंगन कर स्नेह से सूँघते हैं; इस वात्सल्य में वे अपने तेज से दग्ध दैत्यों को भी नहीं स्मरण करते। अध्याय में एक ओर देवस्तुति और शरणागति, दूसरी ओर शिव की पारिवारिक लीला और रसास्वाद—दोनों का सुंदर संगम है; अंत में इसे ‘देवस्तुतिवर्णनम्’ कहा गया है।

44 verses

Adhyaya 8

रुद्ररथ-निर्माणवर्णनम् / Description of Rudra’s Divine Chariot Construction

अध्याय 8 संवाद-रूप में है। व्यास जी सनत्कुमार से पूछते हैं कि शिव के प्रयोजन हेतु विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया ‘देवमय’ रुद्र-रथ कैसा है। सनत्कुमार शिव के चरण-कमलों का स्मरण कर रथ को ‘सर्वलोकमय’, सुवर्णमय और सर्वसम्मत बताते हैं। उसके दाएँ-बाएँ भाग सूर्य और सोम से संबद्ध हैं; चक्र में सोलह कलाएँ/अरियाँ हैं और नक्षत्र-ऋक्ष उसके आभूषण हैं। बारह आदित्य अरियों पर, छह ऋतुएँ नेमि-नाभि के रूप में, तथा अन्तरिक्ष आदि लोक रथ के अंग बनते हैं। उदय-अस्त पर्वत, मन्दर और महामेरु आधार बनकर उसकी स्थिरता दिखाते हैं। इस प्रकार शिव के धर्मकार्य हेतु समस्त ब्रह्माण्ड एक दिव्य वाहन में संगठित बताया गया है।

29 verses

Adhyaya 9

दिव्यरथारोहणम् — Śiva’s Ascent on the Divine Chariot (Pre-battle Portents)

अध्याय 9 में युद्ध से पूर्व शिव के महादिव्य रथ पर आरूढ़ होने का दिव्य प्रसंग है। सनत्कुमार बताते हैं कि ब्रह्मा ने निगम/वेदस्वरूप अश्वों वाले रथ को सजाकर शूलिन शिव को विधिवत् अर्पित किया। सर्वदेवमय शिव ऋषियों और देवगणों की स्तुति के बीच, ब्रह्मा-विष्णु और लोकपालों की उपस्थिति में रथ पर चढ़े; वेदज अश्वों ने प्रणाम किया, पृथ्वी डोल उठी, पर्वत कांपे और शेषनाग भार से व्याकुल हुआ। धरणीधर से संबद्ध एक वहक वृषेन्द्र-रूप धारण कर क्षणभर रथ को संभालता है, पर शिव के तेज से वह सहारा भी डगमगा जाता है। तब सारथि लगाम थामकर अश्वों को उठाता-स्थिर करता है और रथ की गति को संतुलित करता है। यह अध्याय युद्ध-पूर्व सीमा-क्षण में देव-क्रम, ब्रह्माण्डीय अपशकुन/संकेत और वेद-प्रतीकात्मक रथ-हय के माध्यम से शिव के अपरिमित तेज का प्रतिपादन करता है।

44 verses

Adhyaya 10

त्रिपुरदाहवर्णनम् | Tripura-dāha-varṇanam (Description of the Burning of Tripura)

इस अध्याय में सनत्कुमार त्रिपुरदाह की पूर्वभूमि बताते हैं। शम्भु/महेश्वर रथ पर आरूढ़ होकर पूर्ण शस्त्र-सज्जा के साथ अद्वितीय बाण तैयार करते हैं और स्थिर युद्ध-मुद्रा धारण कर दीर्घकाल तक तपस्या-सदृश एकाग्रता दिखाते हैं। लक्ष्य-साधन की सूक्ष्मता के प्रसंग में अँगूठे से सम्बद्ध एक गणनायक का उल्लेख आता है। तभी आकाशवाणी होती है कि आक्रमण से पहले विनायक (गणेश) की पूजा आवश्यक है, अन्यथा त्रिपुर-विनाश नहीं होगा। शिव विनायक की पूजा कर भद्रकाली को बुलाते हैं; विनायक के प्रसन्न होने पर त्रिपुर के दर्शन/स्थिति का क्रम आगे बढ़ता है और यह सिद्धान्त कहा जाता है कि जब सर्वपूज्य परब्रह्म महेश्वर स्वयं कर्ता हों, तब सफलता ‘अन्य’ की कृपा से नहीं, विधि और संकल्प से होती है।

43 verses

Adhyaya 11

त्रिपुरदाहानन्तरं देवभयः ब्रह्मस्तुतिश्च — Fear of the Gods after Tripura’s Burning and Brahmā’s Praise

अध्याय 11 में व्यास पूछते हैं कि त्रिपुर के पूर्ण दहन के बाद माया और त्रिपुर के अधिपति कहाँ गए; वे शम्भुकथा के आधार पर पूरा वृत्तान्त जानना चाहते हैं। सूत कहते हैं कि सनत्कुमार शिवचरण-स्मरण करके कथा आरम्भ करते हैं और शिव के कर्मों को पाप-नाशक तथा लीला-स्वरूप बताते हैं। इसके बाद देवगण रुद्र के प्रचण्ड तेज से विस्मित और वाणीहीन हो जाते हैं; शिव का रूप सर्वदिशाओं में दहकता, करोड़ों सूर्यों के समान और प्रलयाग्नि-तुल्य वर्णित है, जिससे देव, ऋषि और ब्रह्मा तक भयभीत हो उठते हैं। सब विनीत होकर श्रद्धा से खड़े रहते हैं और ब्रह्मा भीतर से संयत होते हुए भी भय के साथ देवों सहित स्तुति करते हैं—शिव के परम रूप के साक्षात्कार के बाद स्तुति ही उचित प्रत्युत्तर है।

41 verses

Adhyaya 12

मयस्य शिवस्तुतिः — Maya’s Hymn to Śiva (and Śiva’s Gracious Response)

अध्याय 12 में सनत्कुमार बताते हैं कि प्रसन्न शिव को देखकर मय दानव—जो पहले शिव की करुणा से ‘अदग्ध’ रहा था—आनन्दपूर्वक उनके पास आया और बार-बार दण्डवत् प्रणाम किया। फिर उठकर उसने विस्तृत स्तुति की—शिव को देवदेव/महादेव, भक्तवत्सल, कल्पवृक्ष-सदृश दाता, निष्पक्ष, ज्योतिर्मय, विश्वरूप, शुद्ध व पावन, रूपवान् तथा रूपातीत, और जगत के कर्ता-भर्ता-संहर्ता कहा। वह अपनी स्तुति की अपूर्णता स्वीकार कर ‘स्तुतिप्रिय परेश्वर’ से शरणागत होकर रक्षा की प्रार्थना करता है। सनत्कुमार कहते हैं कि शिव स्तुति सुनकर प्रसन्न हुए और मय से आदरपूर्वक बोले—आगे उपदेश/वरदान का संकेत।

41 verses

Adhyaya 13

कैलासमार्गे शङ्करस्य परीक्षा — Śiva Tests the Approachers on the Kailāsa Path

अध्याय 13 में कथा परम्परा से आती है—व्यास शिव के निष्कलंक यश और कर्म का विस्तार पूछते हैं, सूत सनत्कुमार का उत्तर सुनाते हैं। फिर जीव और इन्द्र (शक्र/पुरन्दर) तीव्र भक्ति से कैलास पर शिव-दर्शन हेतु जाते हैं। उनके आगमन को जानकर शिव उनके ज्ञान और अंतःभाव की परीक्षा करने का निश्चय करते हैं और मार्ग के मध्य में दिगम्बर, जटाधारी, तपस्वी-तेजस्वी तथा अद्भुत-भयावह रूप में मार्ग रोककर खड़े हो जाते हैं। शिव को न पहचानकर अधिकार-गर्व में इन्द्र उनसे पूछता है—तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, और शम्भु घर पर हैं या कहीं गए हैं। इस प्रसंग से पहचान-अपहचान, पद-गर्व का खतरा और विनय-विवेक से ही ईश्वर-दर्शन की मर्यादा प्रतिपादित होती है।

51 verses

Adhyaya 14

शिवतेजसः समुद्रे बालरूपप्रादुर्भावः (Śiva’s Tejas Manifesting as a Child in the Ocean)

अध्याय 14 में व्यास–सनत्कुमार संवाद आगे बढ़ता है। व्यास पूछते हैं कि भालनेत्र/त्रिनेत्र से उत्पन्न स्वयम्भू शिवतेज को खारे समुद्र में डालने का क्या परिणाम हुआ। सनत्कुमार बताते हैं कि सिंधु–गंगा के समुद्र-संगम पर वह तेज तुरंत बालरूप में प्रकट हो गया। उस बालक के भयानक रुदन से पृथ्वी कांप उठी, स्वर्गलोक मानो बधिर होकर स्तब्ध हो गए, और लोकपालों सहित समस्त प्राणी भयाक्रांत हो उठे। देवता और ऋषि इस अपूर्व संकेत को संभाल न सके, इसलिए वे पितामह, लोकगुरु, परमेष्ठी ब्रह्मा की शरण में जाकर प्रणाम व स्तुति करते हुए कारण, उपाय और समाधान पूछते हैं।

40 verses

Adhyaya 15

राहोः शिरच्छेदन-कारणकथनम् / The Account of Rāhu’s Beheading (Cause and Background)

अध्याय 15 जलन्धर की राजसभा में आरम्भ होता है। समुद्रज असुरराज जलन्धर रानी सहित असुरों के बीच बैठा है, तभी तेजस्वी भृगुवंशी शुक्राचार्य पधारते हैं और उनका विधिवत् सम्मान होता है। वर-बल से निश्चिन्त जलन्धर सभा में छिन्न-शिर राहु को देखकर तुरंत पूछता है कि उसका शिरच्छेदन किसने किया और पूरा वृत्तान्त क्या है। शुक्राचार्य शिव के चरणकमलों का मन से स्मरण कर इतिहासनुमा क्रम से पूर्वकथा कहते हैं—विरोचनपुत्र बलि तथा हिरण्यकशिपु-वंश की चर्चा से आरम्भ करके—और देवासुर प्रसंगों में माया, पुण्य और प्रतिफल की कारण-परम्परा के द्वारा राहु की दशा स्पष्ट करते हैं। यह अध्याय राजसभा की जिज्ञासा को गुरु-उपदेश में बदलते हुए आगे के संघर्ष का संकेत देता है।

66 verses

Adhyaya 16

देवाः वैकुण्ठगमनम् तथा विष्णोः अवतारस्तुतिः | Devas Go to Vaikuṇṭha and Praise Viṣṇu’s Avatāras

अध्याय 16 में दैत्यों के आक्रमण से भयभीत होकर देवता प्रजापति के नेतृत्व में वैकुण्ठ जाते हैं। वहाँ वे भगवान विष्णु (हृषीकेश) की स्तुति करते हैं और उनके मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन, परशुराम, राम और कृष्ण अवतारों के दिव्य कार्यों का स्मरण करते हुए रक्षा की प्रार्थना करते हैं।

44 verses

Adhyaya 17

अध्याय १७ — देवपलायनं, विष्णोः प्रतियुद्धं, जलंधरक्रोधः (Devas’ Rout, Viṣṇu’s Counterattack, and Jalandhara’s Wrath)

इस अध्याय में सनत्कुमार रणभूमि का उलटफेर बताते हैं। शक्तिशाली दैत्य शूल, परशु, पट्टिश आदि अस्त्रों से देवताओं को घायल कर देते हैं; भयभीत देव युद्ध छोड़कर भाग खड़े होते हैं। यह देखकर हृषीकेश विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर शीघ्र आते हैं और दैत्यों से प्रतियुद्ध करते हैं। शंख, खड्ग, गदा और शार्ङ्ग धनुष धारण कर वे क्रोधयुक्त अनुशासन से युद्ध करते हैं; शार्ङ्ग की टंकार त्रिलोकी में गूँजती है। उनके बाण अनेक दितिजों के शिर काट देते हैं और सुदर्शन भक्तों की रक्षा-चिह्न की भाँति उनके हाथ में दहकता है। गरुड़ के पंखों की प्रचण्ड वायु से दैत्यसेना आँधी में बादलों की तरह बिखर जाती है। अपनी सेना को पीड़ित देखकर देवगणों को भय देने वाला जलंधर क्रोध से उबल पड़ता है; तभी एक वीर हरि के साथ युद्ध करने को आगे बढ़ता है और आगे के निर्णायक संघर्ष की भूमिका बनती है।

49 verses

Adhyaya 18

देवशरणागति-नारदप्रेषणम् | The Devas Take Refuge in Śiva; Nārada Is Sent

इस अध्याय में सनत्कुमार देवताओं की उस पीड़ा का वर्णन करते हैं जो महान असुर (जलन्धर से सम्बद्ध) के अत्याचार से उत्पन्न हुई। देवगण अपने स्थान से हटाए जाकर दुःखी होते हैं और सब मिलकर शिव की शरणागति करते हुए महेश्वर को वरदाता और भक्त-रक्षक कहकर स्तुति करते हैं। सर्वकामद और भक्तवत्सल शिव देवकार्य हेतु नारद को बुलाकर भेजते हैं। शिवभक्त ज्ञानी नारद इन्द्र आदि देवों के पास पहुँचते हैं; वे उन्हें आसन, नमस्कार और आदर देते हैं। तब देवता जलन्धर द्वारा बलपूर्वक निष्कासित होने का अपना दुःख निवेदित करते हैं, जिससे आगे की दैवी योजना का क्रम स्थापित होता है।

51 verses

Adhyaya 19

जालन्धरस्य दूतप्रेषणम् — Jalandhara Sends an Envoy to Kailāsa (The Provocation of Śiva)

नारद के जाने के बाद जालंधर शिव के स्वरूप को जानकर विचलित हो जाता है। वह सिंहिकेय नामक दूत को कैलाश भेजता है। दूत शिव को एक भस्मधारी योगी कहकर उनका अपमान करता है और जालंधर की ओर से उनकी पत्नी (पार्वती) की मांग करता है, यह तर्क देते हुए कि एक तपस्वी को ऐसी सुंदरी की क्या आवश्यकता।

50 verses

Adhyaya 20

राहोर्विमोचनानन्तरं जलन्धरस्य सैन्योद्योगः — Rahu’s Aftermath and Jalandhara’s Mobilization

इस अध्याय में सूत के कथन के माध्यम से व्यास, सनत्कुमार से पूछते हैं कि रहस्यमय “पुरुष” द्वारा मुक्त किए जाने के बाद राहु कहाँ गया। सनत्कुमार बताते हैं कि जहाँ उसका विमोचन हुआ, वही स्थान लोक में “वर्वर” नाम से प्रसिद्ध हो गया। राहु फिर गर्व और धैर्य पाकर जलन्धर की नगरी की ओर लौटता है और ईश (शिव) की समस्त लीला-क्रम का समाचार देता है। यह सुनकर सिन्धु-पुत्र, दैत्य-श्रेष्ठ जलन्धर क्रोध से भर उठता है और संयम त्यागकर असुर-सेना के महासंग्रह का आदेश देता है; वह कालनेमि आदि, शुम्भ-निशुम्भ तथा कालक/कालकेय, मौर्य, धूम्र आदि अनेक कुलों और नायकों को नाम लेकर युद्ध हेतु बुलाता है।

62 verses

Adhyaya 21

द्वन्द्वयुद्धवर्णनम् / Description of the Duel-Combats

इस अध्याय में सनत्कुमार बताते हैं कि शिव के प्रमुख गणनायकों—नन्दीश्वर, भृङ्गि/इभमुख और षण्मुख (कार्त्तिकेय)—को देखकर दानव क्रोधित हो उठते हैं और सुव्यवस्थित द्वन्द्वयुद्ध में कूद पड़ते हैं। निशुम्भ कार्त्तिकेय को लक्ष्य कर पाँच बाणों से उनके मयूरवाहन के हृदय में प्रहार करता है, जिससे वह मूर्छित होकर गिर पड़ता है। कार्त्तिकेय प्रत्याघात में निशुम्भ के रथ और घोड़ों को बेधते हैं तथा तीक्ष्ण बाण से उसे घायल कर रणगर्जना करते हैं; पर निशुम्भ भी वार कर देता है और जब कार्त्तिकेय शक्ति उठाने लगते हैं, तब वह अपनी शक्ति से उन्हें शीघ्र गिरा देता है। उधर नन्दीश्वर और कालनेमि का द्वन्द्व चलता है—नन्दी कालनेमि पर प्रहार कर उसके रथ के घोड़े, ध्वज, रथ और सारथि तक को काट देते हैं; क्रुद्ध कालनेमि तीक्ष्ण बाणों से नन्दी का धनुष छिन्न कर देता है। अध्याय युद्धनीति की तीव्रता, युद्धसाधनों के निष्क्रिय होने के संकेत और घावों के बीच वीर-धैर्य को उभारते हुए आगे होने वाले उलटफेर और धर्म-व्यवस्था की पुनर्स्थापना की भूमिका बनाता है।

55 verses

Adhyaya 22

रुद्रस्य रणप्रवेशः तथा दैत्यगणानां बाणवृष्टिः (Rudra Enters the Battlefield; the Daityas’ Arrow-Storm)

अध्याय 22 में सनत्कुमार बताते हैं कि वृषभ पर आरूढ़ रुद्र रौद्र रूप में, मानो क्रीड़ा करते हुए मुस्कराते, रणभूमि में प्रवेश करते हैं। उन्हें देखकर पहले पराजित गणों में फिर साहस जागता है; वे गर्जना कर दैत्यों पर घनी बाण-वृष्टि करते हुए युद्ध में लौट आते हैं। शंकर के दर्शन से दैत्य भयभीत होकर पापों की तरह भागने लगते हैं। यह देखकर जालंधर चण्डीश पर धावा बोलता है और हजारों बाण छोड़ता है। निशुम्भ-शुम्भ आदि दैत्यराज क्रोध में शिव की ओर बढ़ते हैं और ‘बाण-अंधकार’ से गणों को ढककर अंग-भंग करते हुए शैव सेना को दबाते हैं। तब शिव उस बाण-जाल को काटकर अपने शस्त्रों से आकाश भर देते हैं; प्रचण्ड प्रत्याक्रमण से दैत्य पीड़ित होकर धरती पर गिर पड़ते हैं। इस प्रकार रुद्र की सर्वोच्चता और दैत्य-बल की नश्वरता प्रकट होती है।

52 verses

Adhyaya 23

वृन्दायाः दुष्स्वप्न-दर्शनं तथा पातिव्रत्य-भङ्गोपक्रमः / Vṛndā’s Ominous Dreams and the Prelude to the Breach of Chastity

अध्याय 23 संवाद-रूप में है। व्यास, सनत्कुमार से पूछते हैं कि जालन्धर के प्रसंग में हरि (विष्णु) ने क्या किया और धर्म का परित्याग कैसे हुआ। सनत्कुमार बताते हैं कि विष्णु जालन्धर की ओर जाकर वृन्दा के पातिव्रत्य-बल को तोड़ने की योजना आरम्भ करते हैं, क्योंकि वही दैत्य की शक्ति और अभेद्यता का आधार है। फिर वृन्दा पर माया-जनित दुष्स्वप्न आते हैं—पति अशुभ, विकृत रूपों में दिखता है (नग्न, तेल से लिप्त, अन्धकार से जुड़ा, दक्षिण दिशा की ओर जाता हुआ) और नगर समुद्र में डूबता प्रतीत होता है। जागने पर वह सूर्य को मन्द/दोषयुक्त देखती है, भय और शोक से भर जाती है, और ऊँचे स्थानों या उद्यान में सखियों के साथ भी शान्ति नहीं पाती। यह अध्याय कारण-श्रृंखला स्थापित करता है—दैवी माया मन को डगमगाती है, अपशकुन धर्म-भंग का संकेत देते हैं, और आगे होने वाले पातिव्रत्य-भंग की भूमिका बनती है।

50 verses

Adhyaya 24

जलंधरयुद्धे मायाप्रयोगः — Jalandhara’s Māyā in the Battle with Śiva

अध्याय 24 में जलंधर–शिव युद्ध आगे बढ़ता है। व्यास सनत्कुमार से पूछते हैं कि आगे क्या हुआ और दैत्य का वध कैसे होगा। युद्ध पुनः आरम्भ होने पर गिरिजा अदृश्य हो जाती हैं; वृषध्वज त्र्यम्बक इसे मायाजनित तिरोभाव समझकर, सर्वशक्तिमान होते हुए भी लीला हेतु ‘लौकिकी गति’ अपनाते हैं और क्रोध-विस्मय प्रकट करते हैं। जलंधर बाणों की वर्षा करता है, पर शिव सहज ही उन्हें काटकर रुद्र की अपराजेयता दिखाते हैं। तब जलंधर माया रचकर गौरी को रथ पर बंधी, रोती हुई, शुम्भ-निशुम्भ आदि दैत्य-पुरुषों से घिरी हुई दिखाता है, ताकि शिव का धैर्य डगमगाए। शिव क्षणभर मौन, मुख झुकाए, अंग शिथिल और अपनी शक्ति को भूलते से प्रतीत होते हैं—यह माया की परीक्षा और नाटकीयता है। फिर जलंधर सिर, वक्ष और उदर पर अनेक बाण मारता है, जिससे आगे की कथा का क्रम बनता है।

57 verses

Adhyaya 25

देवस्तुतिः — Hymn of Praise by the Devas (Devastuti)

अध्याय 25 में सनत्कुमार बताते हैं कि ब्रह्मा तथा एकत्रित देव-ऋषि श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके देवदेवेश शिव की विधिवत् स्तुति करते हैं। स्तोत्र में शिव का शरणागतवत्सल स्वभाव और भक्तों के दुःख का निरन्तर नाश प्रमुख है। देवगण शिव के अद्भुत परस्पर-विरोधी स्वरूप का वर्णन करते हैं—लीला में आश्चर्य, भक्ति से सुलभ, पर अशुद्ध जनों के लिए दुर्लभ; वेद भी जिन्हें पूर्णतः नहीं जान पाते, फिर भी श्रेष्ठ जन उनके गूढ़ महिमा का गान करते हैं। शिव की कृपा साधारण अपेक्षाओं को पलट देती है; वे सर्वव्यापक, अविकार और सच्ची भक्ति पर प्रकट होने वाले हैं। यदुपति-कलावती तथा राजा मित्रसह-मदयन्ती जैसे भक्त भक्ति से परम सिद्धि और कैवल्य प्राप्त करते हैं। यह अध्याय कथा में निहित सिद्धान्तात्मक स्तोत्र है, जो भक्ति→प्राकट्य→मोक्ष का मार्ग दिखाता है।

37 verses

Adhyaya 26

विष्णुचेष्टितवर्णनम् / Account of Viṣṇu’s Stratagem and Its Aftermath

अध्याय 26 में युद्धोत्तर संवाद चलता है। व्यास, सनत्कुमार से वैष्णव प्रसंग का स्पष्ट वर्णन पूछते हैं—विष्णु ने वृन्दा को मोहित करने के बाद क्या किया और कहाँ गए। देवताओं के मौन होने पर शरणागतवत्सल शम्भु उन्हें आश्वस्त करते हैं कि उन्होंने देवहित के लिए जलन्धर का वध किया है और पूछते हैं कि क्या सबका कल्याण हुआ; वे कहते हैं कि उनके कर्म केवल लीला हैं, स्वरूप में कोई विकार नहीं। तब देव रुद्र की स्तुति कर विष्णु की चेष्टा बताते हैं—विष्णु के प्रयास से वृन्दा छलित होकर अग्नि में प्रविष्ट हुई और परम गति को प्राप्त हुई; पर उसकी सौन्दर्य-मोह से विष्णु स्वयं भी शिवमाया से विमूढ़ होकर उसकी चिता-भस्म धारण किए भटकते रहे। यह प्रसंग दिव्य कर्तृत्व और मोह की अधीनता का भेद दिखाकर शिव की मायाधिपति सत्ता तथा धर्म-व्यवस्था में छल के नैतिक परिणाम को रेखांकित करता है।

60 verses

Adhyaya 27

शङ्खचूडवधकथनम् / The Account of Śaṅkhacūḍa’s Slaying

अध्याय 27 में सनत्कुमार व्यास से कहते हैं कि यह कथा केवल श्रवण से ही दृढ़ शिव-भक्ति को बढ़ाती और पापों का नाश करती है। देवताओं को पीड़ित करने वाला दैत्यवीर शंखचूड़ प्रस्तुत होता है और संकेत मिलता है कि रणभूमि में शिव के त्रिशूल से उसका वध होगा। फिर पुराण-परंपरा के अनुसार वंश-परिचय आता है—मरीचि-पुत्र कश्यप धर्मात्मा प्रजापति हैं; दक्ष अपनी तेरह कन्याएँ उन्हें देता है, जिनसे विशाल सृष्टि का विस्तार होता है। कश्यप की पत्नियों में दनु प्रमुख कही गई है; उसके वंश में विप्रचित्ति और उसके पुत्र दम्भ का वर्णन है, जो धर्मनिष्ठ, संयमी और विष्णु-भक्त है—यही आगे शंखचूड़ और देव-व्यवस्था के संघर्ष की भूमिका बनती है।

36 verses

Adhyaya 28

शङ्खचूडकृततपः—ब्रह्मवरकवचप्राप्तिः / Śaṅkhacūḍa’s Austerity—Brahmā’s Boon and the Bestowal of the Kavaca

सनत्कुमार बताते हैं कि जैगीषव्य के उपदेश से शङ्खचूड़ ने पुष्कर में कठोर, नियमबद्ध तप किया। गुरु से ब्रह्मविद्या पाकर उसने संयमित इन्द्रियों और एकाग्र मन से जप किया। ब्रह्मलोक के आचार्य ब्रह्मा प्रकट होकर दानव-नायक से वर माँगने को कहते हैं। शङ्खचूड़ प्रणाम कर स्तुति करता है और देवताओं के विरुद्ध अवध्यता माँगता है; ब्रह्मा प्रसन्न होकर वर दे देते हैं। साथ ही वे सर्वमङ्गल और विजयदायक दिव्य रक्षाकवच—मन्त्ररूप श्रीकृष्णकवच—भी प्रदान करते हैं। फिर ब्रह्मा उसे तुलसी सहित बदरी जाने और धर्मध्वज की पुत्री तुलसी से वहाँ विवाह करने की आज्ञा देते हैं। ब्रह्मा अंतर्धान हो जाते हैं; तपसिद्ध शङ्खचूड़ कवच धारण कर शीघ्र बदरिकाश्रम की ओर प्रस्थान करता है, जिससे आगे के संघर्ष और उसके नैतिक परिणामों की भूमिका बनती है।

41 verses

Adhyaya 29

शङ्खचूडकस्य राज्याभिषेकः तथा शक्रपुरीं प्रति प्रस्थानम् | Śaṅkhacūḍa’s Coronation and March toward Indra’s City

इस अध्याय में सनत्कुमार कहते हैं कि शङ्खचूड़ घर लौटकर विवाह करता है और दानव उसके तप व वर-प्राप्ति को स्मरण कर हर्षित होते हैं। देवगण अपने गुरु सहित आकर उसकी प्रभा और अधिकार का आदरपूर्वक स्तवन करते हैं। शङ्खचूड़ भी आगत कुलगुरु को साष्टाङ्ग प्रणाम करता है। असुरकुल-आचार्य शुक्र देव–दानव वैर, असुरों की पूर्व पराजय, देवों की विजय तथा परिणामों में ‘जीव-साहाय्य’ (देहधारियों की सहायक भूमिका) का वर्णन करते हैं। प्रसन्न असुर उत्सव मनाकर उपहार देते हैं। सर्वसम्मति से गुरु शङ्खचूड़ का दानवों व सहायक असुरों के अधिपति रूप में राज्याभिषेक करते हैं। अभिषेक के बाद वह राजसिंहासन-सा दीप्त होकर दैत्य, दानव और राक्षसों की विशाल सेना जुटाकर रथ पर चढ़ शक्रपुरी (इन्द्र की नगरी) को जीतने हेतु प्रस्थान करता है।

58 verses

Adhyaya 30

शिवलोकप्रवेशः (Entry into Śivaloka through successive gateways)

अध्याय 30 में शिवलोक तक पहुँचने की क्रमिक, मर्यादित प्रक्रिया का वर्णन है। सनत्कुमार बताते हैं कि आगन्तुक देव (वृत्तान्त में ब्रह्मा/रामेश्वर) महादिव्य शिवलोक में पहुँचता है, जो निराधार और अभौतिक कहा गया है। विष्णु हर्षपूर्वक रत्नजटित, तेजस्वी लोक को देखकर प्रथम द्वार पर आते हैं, जहाँ गणों की उपस्थिति है। वहाँ द्वारपाल रत्नसिंहासनों पर विराजमान, श्वेत वस्त्रधारी, मणिभूषित, पंचमुख-त्रिनेत्र, त्रिशूलादि आयुधधारी, भस्म-रुद्राक्ष से अलंकृत बताए गए हैं। प्रणाम कर विष्णु अपना प्रयोजन—भगवान शिव के दर्शन—निवेदित करते हैं; आज्ञा मिलने पर भीतर प्रवेश करते हैं। यही विधि अनेक द्वारों (पंद्रह का स्पष्ट उल्लेख) तक दोहराई जाती है। अंत में महाद्वार पर नन्दी के दर्शन होते हैं; स्तुति और नमस्कार के बाद नन्दी अनुमति देते हैं और विष्णु आनंद से अंतःप्रांगण में प्रवेश करते हैं। अध्याय यह सिखाता है कि शिव-सान्निध्य हेतु भक्ति, स्तुति और विधिवत अनुमति आवश्यक है।

40 verses

Adhyaya 31

शिवस्य आश्वासनं हरि-ब्रह्मणोः तथा शङ्खचूडवृत्तान्तकथनम् / Śiva’s Reassurance to Hari and Brahmā; Account of Śaṅkhacūḍa’s Origin

अध्याय 31 में सनत्कुमार बताते हैं कि हरि (विष्णु) और विधि (ब्रह्मा) की व्याकुल वाणी सुनकर शम्भु (शिव) मुस्कराते हुए, मेघ-गर्जन जैसी गंभीर वाणी में उन्हें आश्वस्त करते हैं—“भय छोड़ो; शंखचूड़ से उत्पन्न यह प्रसंग अंततः शुभ ही होगा।” शिव कहते हैं कि वे शंखचूड़ का पूरा सत्य-वृत्तांत जानते हैं और उसे पूर्वकाल के कृष्ण-भक्त गोप सुदामा से जोड़ते हैं। शिव की आज्ञा से हृषीकेश कृष्ण-रूप धारण कर रम्य गोलोक में निवास करते हैं; वहाँ “मैं स्वतंत्र हूँ” ऐसी भ्रांति से अनेक क्रीड़ाएँ होती हैं। इस तीव्र मोह को देखकर शिव अपनी माया से सम्यक्-बुद्धि हर लेते हैं और शाप का विधान कराते हैं, जिससे आगे चलकर शंखचूड़-विरोध का कर्म-कारण बनता है। लीला पूर्ण होने पर शिव माया समेट लेते हैं; सबको ज्ञान लौट आता है, वे विनय से शिव के पास आकर लज्जा सहित सब स्वीकारते और रक्षा माँगते हैं। शिव प्रसन्न होकर फिर निर्भय रहने की आज्ञा देते हैं और बताते हैं कि सब कुछ उनके विधान के अधीन है—यह अध्याय भय, मोह और विरोधी के दैवी उद्गम का तात्त्विक कारण समझाता है।

55 verses

Adhyaya 32

शिवदूतस्य शङ्खचूडकुलप्रवेशः — The Śiva-Envoy’s Entry into Śaṅkhacūḍa’s City

इस अध्याय में सनत्कुमार बताते हैं कि देवताओं की इच्छा और काल की गहनता के अनुसार महेश्वर ने शंखचूड़ के वध का निश्चय किया। शिव ने पुष्पदन्त नामक अपने दूत को शीघ्र शंखचूड़ के पास भेजा। प्रभु की आज्ञा से दूत उस असुर-नगरी में पहुँचा, जिसका वैभव इन्द्रपुरी से भी बढ़कर और कुबेर के धाम से भी अधिक बताया गया है। नगर में प्रवेश कर उसने बारह द्वारों वाले, द्वारपालों से रक्षित राजप्रासाद को देखा; निर्भय होकर अपना प्रयोजन कहने पर उसे भीतर जाने दिया गया, जहाँ उसने विशाल और अलंकृत अंतःभाग देखा। फिर उसने रत्नासन पर विराजमान शंखचूड़ को दानव-नायकों से घिरा और विशाल सशस्त्र सेनाओं से सेवित पाया। विस्मित होकर पुष्पदन्त ने ‘राजा’ को प्रणामपूर्वक संबोधित किया, स्वयं को शिवदूत बताया और शंकर का संदेश प्रस्तुत किया, जिससे आगे दूतसंवाद और युद्ध की भूमिका बनती है।

35 verses

Adhyaya 33

शिवस्य सैन्यप्रयाणम् तथा गणपतिनामावलिः (Śiva’s Mobilization for War and the Catalogue of Gaṇa Commanders)

इस अध्याय में उपदेश-श्रवण के बाद तुरंत युद्ध-प्रस्थान का वर्णन है। सनत्कुमार कहते हैं कि उकसाने वाले वचन सुनकर गिरिश रुद्र संयमित क्रोध में वीरभद्र, नन्दी, क्षेत्रपाल और अष्टभैरवों को आदेश देते हैं कि सभी गण शस्त्र धारण कर युद्ध के लिए तैयार हों। वे स्कन्द और गणेश—दोनों कुमारों को अपने अधीन प्रस्थान करने को कहते हैं, भद्रकाली को अपने दल सहित अग्रसर होने का निर्देश देते हैं और स्वयं शंखचूड़ के विनाश हेतु शीघ्र प्रस्थान की घोषणा करते हैं। फिर महेशान का सेना सहित निकलना और वीर-गणों का उत्साहपूर्वक अनुसरण वर्णित है। अंत में वीरभद्र, नन्दी, महाकाल, विशालाक्ष, बाण, पिंगलाक्ष, विकम्पन, विरूप, विकृति, मणिभद्र आदि गणनायकों की नामावली तथा कोटि-गण आदि संख्या सहित उनकी सैन्य-व्यवस्था का औपचारिक विवरण आता है।

48 verses

Adhyaya 34

शिवदूतगमनानन्तरं शङ्खचूडस्य तुलसीसम्भाषणं युद्धप्रस्थान-तत्परता च / After Śiva’s Messenger Departs: Śaṅkhacūḍa’s Counsel with Tulasī and Readiness for War

इस अध्याय में व्यास, सनत्कुमार से पूछते हैं कि शिवदूत के चले जाने के बाद दैत्यराज शंखचूड़ ने क्या किया। सनत्कुमार बताते हैं कि शंखचूड़ अंतःपुर में जाकर तुलसी को शिव का संदेश सुनाता है, युद्ध के लिए जाने का निश्चय करता है और उससे दृढ़ ‘शासन’ माँगता है। शिव की आज्ञा की गंभीरता के बावजूद दोनों दांपत्य-सुख, क्रीड़ा और कलाओं में लीन रहते हैं—यह शंकर के अधिकार के प्रति अनादर को दिखाता है। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर वह प्रातःकर्म, नित्यकर्म करता है और बहुत दान देता है, मानो धर्मपालन का बाह्य रूप दिखाता हो। फिर वह पुत्र को राज्य पर बैठाकर धन-कोष और शासन-व्यवस्था सौंपता है तथा तुलसी को भी उसके संरक्षण में देता है। रोती हुई तुलसी उसे रोकती है, पर वह उसे सांत्वना और आश्वासन देता है। अंत में वह वीर सेनापति को बुलाकर सम्मानित करता है, आदेश देता है और सन्नद्ध होकर युद्ध-व्यवस्था में लग जाता है; इस प्रकार गृह से रणभूमि की ओर संक्रमण दिखाया गया है।

25 verses

Adhyaya 35

शङ्खचूडदूतागमनम् — The Arrival of Śaṅkhacūḍa’s Envoy (and Praise of Śiva)

अध्याय 35 में सनत्कुमार युद्ध-प्रसंग के बीच एक कूटनीतिक घटना सुनाते हैं। शंखचूड़ से जुड़े दैत्य-पक्ष का एक अत्यन्त विद्वान दूत शंकर के पास भेजा जाता है। दूत वटवृक्ष के मूल में विराजमान शिव को देखता है—करोड़ों सूर्यों-सी दीप्ति, योगासन, संयत दृष्टि और मुद्रा सहित। फिर शिव के अनेक विशेषणों द्वारा स्तुति होती है: वे शान्त, त्रिनेत्र, व्याघ्रचर्मधारी, आयुधधारी, भक्तों के मृत्यु-भय के नाशक, तप के फलदाता, समस्त समृद्धियों के कर्ता, विश्वनाथ/विश्वबीज/विश्वरूप तथा नरक-सागर से पार कराने वाले परम कारण हैं। दूत उतरकर श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता है; शिव के वाम में भद्रकाली और सामने स्कन्द की उपस्थिति में उसे शुभ आशीर्वाद मिलता है। इसके बाद वह प्रणामोत्तर विधिपूर्वक औपचारिक निवेदन आरम्भ करता है, जो आगे की वार्ता/चेतावनी/मांग का आधार बनता है।

50 verses

Adhyaya 36

शिवदूतेन युद्धनिश्चयः तथा देवदानवयुद्धारम्भः (Śiva’s Envoy and the Commencement of the Deva–Dānava War)

अध्याय 36 में सनत्कुमार बताते हैं कि शिवदूत शंखचूड़ को शिव का संदेश विस्तार और दृढ़ निश्चय के साथ सुनाता है। उसे सुनकर शक्तिशाली दानवराज शंखचूड़ स्वेच्छा से युद्ध स्वीकार करता है, मंत्रियों सहित वाहन पर चढ़कर शंकर के विरुद्ध सेना को आदेश देता है। उधर शिव भी देवताओं सहित अपनी सेना तुरंत जुटाते हैं और स्वयं लीलापूर्वक युद्ध के लिए प्रस्तुत होते हैं। तत्क्षण युद्ध आरम्भ होता है—वाद्य-निनाद, कोलाहल और वीरघोष चारों ओर फैलते हैं। फिर धर्मानुसार देव-दानवों के युग्म-युद्ध वर्णित हैं: इन्द्र–वृषपर्वा, सूर्य–विप्रचित्ति, विष्णु–दम्भ, काल–कालासुर, अग्नि–गोकर्ण, कुबेर–कालकेय, विश्वकर्मा–माया, मृत्यु–भयंकर, यम–संहार, वरुण–कालम्बिका, वायु–चंचल, बुध–घटपृष्ठ, शनैश्चर–रक्ताक्ष आदि।

36 verses

Adhyaya 37

देवपराजयः — शङ्करशरणागमनं स्कन्दकालीयुद्धं च | Devas’ Defeat, Refuge in Śaṅkara, and the Battle of Skanda and Kālī

अध्याय 37 में सनत्कुमार दानवों द्वारा देवताओं की पराजय का वर्णन करते हैं। शस्त्रों से घायल और भयभीत देव भागते हैं, फिर पलटकर परम शरण विश्वेश्वर शंकर के पास जाकर रक्षा की गुहार लगाते हैं। शिव उनकी दीन पुकार सुनकर विरोधी शक्तियों पर क्रोध करते हुए भी करुण दृष्टि से देवों को अभय देते हैं और अपने गणों का बल-तेज बढ़ा देते हैं। शिव की आज्ञा से हरात्मज, तारकान्तक स्कन्द निर्भय होकर रण में उतरते हैं और दानव-सेनाओं का भारी संहार करते हैं। साथ ही काली का भीषण रूप—रक्तपान, शिरच्छेद आदि—युद्ध की त्रास को और तीव्र कर देता है। इस प्रकार पराजय से शरणागति, फिर दिव्य सामर्थ्य और निर्णायक प्रत्याक्रमण द्वारा शिव को विजय व संरक्षण का मूल कारण बताया गया है।

45 verses

Adhyaya 38

अध्याय ३८ — काली-शंखचूड-युद्धे अस्त्रप्रयोगः (Kālī and Śaṅkhacūḍa: Mantra-Weapons and Surrender in Battle)

इस अध्याय में सनत्कुमार रणभूमि में शक्ति की अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। देवी काली युद्धक्षेत्र में प्रवेश कर सिंहनाद करती हैं, जिससे दानव मूर्छित हो जाते हैं और गण तथा देव-सेनाएँ हर्ष से कोलाहल करती हैं। उग्रदंष्ट्रा, उग्रदण्डा, कोटवी आदि उग्र रूप देवी के साथ अट्टहास करते, रण में नृत्य करते और मधु/मध्वीक पान करते हैं, जिससे उनकी विश्व-कंपक शक्ति प्रकट होती है। शंखचूड़ काली से भिड़ता है; देवी प्रलयाग्नि-सम तेज फेंकती हैं, जिसे वह विष्णु-चिह्नित उपाय से रोकता है। तब देवी नारायणास्त्र चलाती हैं; उसके विस्तार से शंखचूड़ दण्डवत् प्रणाम कर बार-बार स्तुति करता है, और शरणागति से अस्त्र लौट जाता है—यह दिखाता है कि विनय से महाविनाशक बल शांत होता है। फिर देवी मंत्रपूर्वक ब्रह्मास्त्र छोड़ती हैं, और दानवराज प्रत्यब्रह्मास्त्र से उत्तर देता है; युद्ध दिव्य, शास्त्रोक्त और मंत्र-नियमित शक्तियों के आदान-प्रदान तथा नम्रता-नीति के अधीन दिखाया गया है।

38 verses

Adhyaya 39

शिवशङ्खचूडयुद्धवर्णनम् / Description of the Battle between Śiva and Śaṅkhacūḍa

अध्याय में व्यास पूछते हैं कि काली के वचन सुनकर शिव ने क्या किया और क्या कहा। सनत्कुमार बताते हैं कि परमेश्वर शंकर मुस्कराकर काली को आश्वस्त करते हैं और व्योमवाणी सुनकर अपने गणों सहित स्वयं रणभूमि की ओर प्रस्थान करते हैं। वे वृषभ (नंदी) पर आरूढ़ होकर वीरभद्र, भैरव और क्षेत्रपाल आदि रक्षक-गणों के साथ आते हैं और शत्रु के लिए मृत्यु-तुल्य तेजस्वी वीररूप धारण करते हैं। शिव को देखकर शंखचूड़ विमान से उतरकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है, फिर योगबल से पुनः ऊपर चढ़कर धनुष संभाल युद्ध के लिए तत्पर हो जाता है। सौ वर्षों तक घोर संग्राम चलता है, बाणों की वर्षा होती रहती है। शंखचूड़ के भयानक अस्त्रों को शिव सहज ही काट देते हैं और रुद्र दुष्टों के दंडदाता तथा सज्जनों के शरण बनकर शत्रु पर शस्त्र-वर्षा करते हैं।

44 verses

Adhyaya 40

शङ्खचूडस्य मायायुद्धं तथा माहेश्वरास्त्रप्रभावः | Śaṅkhacūḍa’s Māyā-Warfare and the Power of the Māheśvara Astra

इस अध्याय में युद्ध का प्रसंग बाह्य संग्राम से शक्ति-तत्त्व की ओर मुड़ता है। अपनी सेना का विनाश देखकर दानवाधिप शङ्खचूड़ क्रोधित होकर शिव को प्रत्यक्ष युद्ध के लिए ललकारता है और रणभूमि में अडिग रहने की घोषणा करता है। वह शङ्कर की ओर बढ़कर दिव्यास्त्रों की बौछार और वर्षा-सी शरवृष्टि करता है। फिर वह अनेक प्रकार की माया—गुप्त, भय उत्पन्न करने वाली और देवताओं के लिए भी कठिन—प्रकट करता है। शिव उन मायिक प्रपञ्चों को देखकर लीलापूर्वक सर्वमाया-विनाशक, परम तेजस्वी माहेश्वरास्त्र छोड़ते हैं। शिव-तेज से दानव की माया तत्काल नष्ट हो जाती है और पहले प्रभावशाली दिव्यास्त्र भी निस्तेज हो जाते हैं। शिव शूल लेकर निर्णायक प्रहार को बढ़ते हैं, तभी अशरीरी वाणी संयम का निवेदन करती है—शिव क्षण में जगत् का भी संहार कर सकते हैं; एक दानव-वध सामर्थ्य का नहीं, नियत काल और धर्म-व्यवस्था का विषय है। अध्याय में यह स्थापित होता है कि माया और अस्त्र सापेक्ष हैं, पर शिव की प्रभुता परम और निरपेक्ष है।

43 verses

Adhyaya 41

तुलसी-शङ्खचूडोपाख्यानम् — Viṣṇu’s Disguise and the Tulasī Episode (Prelude to Śaṅkhacūḍa’s Fall)

इस अध्याय में व्यास पूछते हैं कि नारायण तुलसी के गर्भ में वीर्याधान कैसे करते हैं। सनत्कुमार बताते हैं कि शिव की आज्ञा और देवताओं के प्रयोजन से विष्णु माया द्वारा शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के निवास पर पहुँचते हैं। द्वार पर आगमन, दुंदुभि-नाद, जयघोष और तुलसी का हर्षपूर्ण स्वागत वर्णित है—वह झरोखे से देखती है, मंगलाचार करती है, ब्राह्मणों को धन देती है, स्वयं को सजाती है और पति-रूप में आए हुए के चरण धोकर प्रणाम करती है। यह दिव्य वेश-धारण युद्ध-परिस्थिति में शंखचूड़ की रक्षा-शक्ति को ढीला करने और संघर्ष के दैवी समाधान को आगे बढ़ाने का धर्मोपाय है, जिसमें भक्ति, छल और विधि की अनिवार्यता का नैतिक तनाव भी उभरता है।

64 verses

Adhyaya 42

अन्धक-प्रश्नः — Inquiry into Andhaka (Genealogy and Nature)

अध्याय 42 में नारद शंखचूड़-वध का श्रवण करके तृप्त होते हैं और महादेव के ब्राह्मण्य-धर्म, भक्तों को आनंद देने वाली माया-लीला की स्तुति करते हैं। ब्रह्मा स्मरण कराते हैं कि जलंधर-वध के बाद व्यास ने ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार से यही तत्त्व पूछा था—शिव की अद्भुत महिमा, शरणागत-रक्षक स्वरूप और अनेक लीलाओं वाले भक्तवत्सल प्रभु का रहस्य। सनत्कुमार व्यास को शुभ चरित सुनाने का निमंत्रण देते हैं कि कैसे पूर्व महान संघर्ष के बाद बार-बार आराधना करके अंधक ने शिवगणों में गणपत्य पद प्राप्त किया। तब व्यास औपचारिक रूप से पूछते हैं—अंधक कौन है, किस वंश का है, उसका स्वभाव कैसा है और वह किसका पुत्र है; स्कंद से बहुत जानकर भी वे सनत्कुमार की कृपा से पूर्ण, रहस्ययुक्त विवरण चाहते हैं।

49 verses

Adhyaya 43

हिरण्यकशिपोः क्रोधः तथा देवप्रजाकदनम् — Hiraṇyakaśipu’s Wrath and the Affliction of Devas and Beings

अध्याय 43 प्रश्नोत्तर रूप में है। व्यास जी सनत्कुमार से पूछते हैं कि वराह रूप में हरि द्वारा देवद्रोही असुर (हिरण्याक्ष) के वध के बाद क्या हुआ। सनत्कुमार बताते हैं कि उसका बड़ा भाई हिरण्यकशिपु शोक और क्रोध से भरकर मृतक के लिए करोदक आदि औदक-क्रियाएँ करता है और फिर प्रतिशोध का निश्चय करता है। वह पराक्रमी, हिंसा-प्रिय असुरों को आदेश देता है कि वे देवताओं और प्रजा को कष्ट दें। दुष्टबुद्धि असुरों से जगत व्याकुल हो उठता है; देवता स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर गुप्त रूप से रहने लगते हैं। यह अध्याय आगे के संघर्ष—हिरण्यकशिपु के अत्याचार और देवताओं के उच्च सत्ता (ब्रह्मा आदि) की शरण लेने—की भूमिका बनाता है।

41 verses

Adhyaya 44

हिरण्यनेत्रस्य तपः — Hiraṇyanetra’s Austerity and the Boon

सनत्कुमार बताते हैं कि हिरण्याक्ष का पुत्र हिरण्यनेत्र अपने मद्यप, हँसी‑ठिठोली करने वाले भाइयों द्वारा सभा में उपहासित और राजनीति में किनारे कर दिया जाता है। वे कहते हैं कि वह राजयोग्य नहीं, राज्य बाँटकर या अपने वश में रखेंगे। भीतर से आहत होकर वह उन्हें मधुर वचनों से शांत करता है और रात में एकांत वन को चला जाता है। वहाँ वह अत्यन्त घोर तप करता है—एक पाँव पर खड़ा रहना, उपवास, कठोर व्रत, और अग्नि में आत्मसमर्पण‑सदृश होम; दीर्घ काल में शरीर स्नायु‑अस्थि मात्र रह जाता है। त्रिदेवगण/देवता भय और विस्मय से ब्रह्मा (धाता, पितामह) की स्तुति कर शरण लेते हैं। ब्रह्मा आकर तप रोकते हैं और दुर्लभ वर देने को कहते हैं। हिरण्यनेत्र दण्डवत होकर अपने राज्य की पुनः प्रतिष्ठा तथा प्रह्लाद आदि सहित जिन लोगों ने उसका राज्य छीना, उनकी अधीनता की याचना करता है; इससे वरजन्य सत्ता‑परिवर्तन और तप‑पुण्य बनाम राजमहत्त्वाकांक्षा का नैतिक तनाव प्रकट होता है।

71 verses

Adhyaya 45

अन्धकादिदैत्ययुद्धे वीरकविजयः — Vīraka’s Victory over Andhaka’s Forces

अध्याय 45 में सनत्कुमार अन्धक-युद्ध का वर्णन करते हैं। काम के बाणों से मोहित, मदांध और चित्त-विक्षुब्ध अन्धक विशाल दैत्यसेना लेकर निकलता है; मार्ग को पतंगे के अग्नि की ओर दौड़ने जैसा प्राणघातक और बाधाओं से भरा बताया गया है। रणभूमि में पत्थर, वृक्ष, बिजली, जल, अग्नि, सर्प, शस्त्र और भूत-भय जैसे घोर उपद्रवों के बीच भी शिवगण वीरक अजेय रहता है और आगन्तुक की पहचान पूछता है। फिर संक्षिप्त पर निर्णायक संग्राम होता है—दैत्य पराजित होकर भूख-प्यास से व्याकुल लौटता है; उसकी उत्तम तलवार टूटते ही वह भाग खड़ा होता है। इसके बाद प्रह्लाद-पक्ष, विरोचन, बलि, बाण, सहस्रबाहु, शम्बर, वृत्र आदि दैत्य-नायक युद्ध में उतरते हैं, पर वीरक उन्हें परास्त कर कईयों को चीर देता है; सिद्धगण जयघोष करते हैं। रक्त-पंक और मांसभक्षी पक्षियों की भीषण छवियों के साथ संदेश यह है कि काम-मोहित अहंकारी शक्ति शिव के गणबल और धर्म-नियति के सामने टिक नहीं पाती।

54 verses

Adhyaya 46

गिलासुर-आक्रमणम् तथा शिवसैन्य-समाह्वानम् — The Assault of Gila and Śiva’s Mobilization

अध्याय 46 में सनत्कुमार बताते हैं कि दैत्यराज ‘गिल’ अपनी सेना सहित गदा लेकर वेग से बढ़ता है और महेश्वर के पवित्र दुर्ग-गुहामुख पर हिंसक आक्रमण कर उसे भेदने लगता है। दैत्य बिजली-सी चमकते शस्त्रों से द्वारों और उपवन-पथों को तोड़ते, वृक्ष-लताओं, जल और दिव्य सौंदर्य-व्यवस्था को नष्ट कर मर्यादा-हीन उत्पात मचाते हैं। तब शूलपाणि कपर्दी पिनाकी हर अपने गण-बल को स्मरण कर समाह्वान करते हैं; क्षणभर में देवगण (अग्रणी विष्णु), भूत-गण, गण, प्रेत-पिशाच आदि रथ, गज, अश्व, वृषभ आदि वाहनों सहित उपस्थित होते हैं। वे श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर वीरक को सेनापति मानते हैं और महेश्वर की आज्ञा से युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं। आगे का संग्राम युगांत-सा व्यापक और सीमा-रहित बताया गया है, जहाँ अपवित्रता के विरुद्ध पुनः धर्म-स्थापन का भाव प्रबल है।

42 verses

Adhyaya 47

शुक्रस्य जठरस्थत्वं तथा मृत्युशमनी-विद्या (Śukra in Śiva’s belly and the death-subduing vidyā)

अध्याय 47 में व्यास आश्चर्य से पूछते हैं कि दैत्यों के आचार्य भृगुनन्दन शुक्र को त्रिपुरारि शिव ने “निगल” लिया—यह कैसे हुआ? महायोगी पिनाकी के उदर में रहते हुए शुक्र के साथ क्या हुआ, प्रलय-सदृश जठराग्नि ने उसे क्यों नहीं जलाया, और वह शिव के उदर-गृह से किस उपाय से बाहर आया—इनका विस्तार से वर्णन माँगा जाता है। फिर शुक्र की शिव-उपासना की अवधि, विधि और फल, विशेषकर परम मृत्यु-शमनी विद्या/मंत्र की प्राप्ति, पूछी जाती है। साथ ही अन्धक को गणपत्य पद कैसे मिला और इस प्रसंग में शूल का प्राकट्य कैसे हुआ—यह सब शिव-लीला के रूप में समझाया जाता है। ब्रह्मा बताते हैं कि व्यास की जिज्ञासा सुनकर सनत्कुमार शंकर–अन्धक युद्ध और व्यूह-रचना के संदर्भ में प्रमाणिक उपदेश देते हैं। अध्याय का सार यह है कि दिव्य “भक्षण” विनाश नहीं, भक्ति और मंत्र-ज्ञान रक्षक साधन हैं, और युद्ध-कथा शैव ब्रह्माण्ड-दृष्टि में पुनः स्थापित होती है।

53 verses

Adhyaya 48

शुक्रनिग्रहः — The Seizure/Neutralization of Śukra (Kāvya) and the Daityas’ Despondency

इस अध्याय में व्यास जी सनत्कुमार से पूछते हैं कि रुद्र द्वारा काव्य/शुक्राचार्य के निग्रह (मानो निगल लेने) के बाद दैत्यों की क्या दशा हुई। सनत्कुमार अनेक उपमाओं से उनका मनोबल-भंग बताते हैं—हाथों के बिना हाथी, सींगों के बिना बैल, सिर के बिना सभा, अध्ययन के बिना ब्राह्मण और शक्ति के बिना यज्ञकर्म जैसे; क्योंकि शुक्र ही उनके भाग्य का मुख्य आधार था। नन्दी द्वारा शुक्र के हरण से युद्धोन्मुख दैत्य निराश हो गए। उनकी शिथिलता देखकर अन्धक उन्हें संबोधित करता है और इसे नन्दी की छल-नीति मानकर कहता है कि भृगुवंशी गुरु के हटते ही उनका साहस, पराक्रम, गति, कीर्ति, सत्त्व, तेज और सामर्थ्य एकाएक क्षीण हो गया। यह प्रसंग युद्ध में दैत्यों की रणनीतिक दुर्बलता और गुरु तथा दैवी अनुमति पर उनकी निर्भरता को स्थापित करता है।

47 verses

Adhyaya 49

शुक्रोत्पत्तिः तथा महेश्वरदर्शनम् (Śukra’s Emergence and the Vision of Maheśvara)

अध्याय 49 में सनत्कुमार शिव का विस्तृत स्तोत्र-मंत्र सुनाते हैं, जिसमें उनके ऐश्वर्य, कालस्वरूप, तप, उग्र रूपों और सर्वव्यापकता का वर्णन है। इस मंत्र के प्रभाव से शुक्र उदर-आवरण से प्रकट होकर लिंग-मार्ग से बाहर आते हैं—यह चमत्कारिक जन्म और शिवाधीन प्रतीकात्मक पुनर्जन्म का संकेत है। फिर गौरी उन्हें पुत्र-प्राप्ति के हेतु अपने साथ ले जाती हैं और विश्वेश्वर उन्हें अजर-अमर, तेजस्वी, ‘द्वितीय शंकर’ के समान रूप प्रदान करते हैं। पृथ्वी पर तीन हजार वर्ष रहने के बाद शुक्र महेश्वर से पुनः जन्म लेकर मुनि और वेद-ज्ञान के भंडार बनते हैं। आगे शुक्र परमेश्वर का दर्शन करते हैं और निकट ही दैत्य अंधक को घोर तप में शूल पर सूखा हुआ देखते हैं—अंधक-प्रसंग की भूमिका। विरूपाक्ष, नीलकंठ, पिनाकी, कपर्दी, त्रिपुरघ्न, भैरव आदि नामों से शिव के बहुविध, भय और कल्याण दोनों देने वाले स्वरूप तथा त्रिलोकेश्वरता का चित्रण होता है।

43 verses

Adhyaya 50

मृत्युञ्जय-विद्या-प्रादुर्भावः (The Manifestation/Transmission of the Mṛtyuñjaya Vidyā)

इस अध्याय में गुरु-शिष्य परम्परा के अनुसार सनत्कुमार व्यास को शिव के ‘मृत्युञ्जय’ स्वरूप से सम्बद्ध मृत्यु-शमन करने वाली परम विद्या का उद्गम और प्रभाव बताते हैं। भृगुवंशीय काव्य ऋषि वाराणसी जाकर विश्वेश्वर का ध्यान करते हुए दीर्घ तप करते हैं, जिससे विद्या का प्रादुर्भाव होता है। आगे शिवलिंग की स्थापना, शुभ कूप का निर्माण, निश्चित मात्रा में पंचामृत से बार-बार अभिषेक, सुगन्धित स्नान-लेपन तथा पुष्प-समर्पण की विस्तृत विधि आती है; वनस्पतियों का वर्णन शुद्धि, सुगन्ध और भक्ति-समृद्धि का संकेत देता है। ‘मृतसंजीवनी’ नामक यह शुद्ध विद्या महातप से उत्पन्न तपोबल है, जो शिवभक्ति में प्रतिष्ठित होकर मृत्यु से रक्षा करती और प्राणशक्ति का पुनर्स्थापन करती है।

51 verses

Adhyaya 51

गाणपत्यदानकथा (Bāṇāsura Receives Gaṇapatya; Genealogical Prelude)

अध्याय 51 संवाद-परंपरा से आरम्भ होता है। व्यास, सनत्कुमार से शशिमौलि शिव का चरित सुनाने का अनुरोध करते हैं—विशेषतः यह कि शिव ने स्नेहवश बाणासुर को ‘गाणपत्य’ (गण-सम्बन्ध/गणाधिकार) कैसे प्रदान किया। सनत्कुमार इसे शिव-लीला तथा पुण्यदायक इतिहासनुमा कथा कहकर वर्णन का संकल्प करते हैं। फिर अध्याय पुराणीय वंश-प्रस्तावना की ओर मुड़ता है—ब्रह्मा के मानसपुत्र मरीचि, उनके पुत्र कश्यप, जो सृष्टि-विस्तार के प्रमुख कर्ता बताए गए हैं। कश्यप के दक्षकन्याओं से विवाहों का उल्लेख है; उनमें दिति ज्येष्ठा और दैत्यों की जननी कही गई हैं। दिति से दो महाबली पुत्र उत्पन्न हुए—ज्येष्ठ हिरण्यकशिपु और कनिष्ठ हिरण्याक्ष। यह वंश-रचना आगे के असुर-वंशों और बाण के प्रादुर्भाव की पृष्ठभूमि बनाती है तथा यह प्रश्न उठाती है कि असुर होकर भी कोई शिव की कृपा और गण-स्थिति कैसे पा सकता है।

62 verses

Adhyaya 52

बाणासुरस्य शङ्करस्तुतिः तथा युद्धयाचनम् | Bāṇāsura’s Praise of Śiva and Petition for Battle

इस अध्याय में सनत्कुमार शिव की परम सत्ता और भक्तवत्सलता प्रकट करने वाला एक प्रसंग सुनाते हैं। असुर बाण ताण्डव करके पार्वतीप्रिय शंकर को प्रसन्न करता है। प्रसन्न देव को देखकर वह कंधे झुकाकर, हाथ जोड़कर देवदेव महादेव, समस्त देवों के शिरोमणि की स्तुति करता है। वह कहता है कि वर से मिले हजार भुजाएँ योग्य प्रतिद्वन्द्वी के बिना बोझ बन गई हैं; यम, अग्नि, वरुण, कुबेर, इन्द्र आदि को जीतने का गर्व दिखाते हुए वह ‘युद्ध का आगमन’ माँगता है, जहाँ शत्रु-शस्त्रों से उसकी भुजाएँ टूटें और घायल हों। इस प्रकार भक्ति और शिव-कृपा के साथ असुरी अहंकार व हिंसा-लालसा का विरोध उभरता है और शिव द्वारा संघर्ष की सुधारक व्यवस्था की भूमिका बनती है।

63 verses

Adhyaya 53

बाणासुरस्य क्रोधाज्ञा तथा अन्तःपुरयुद्धारम्भः (Bāṇāsura’s Wrathful Command and the Onset of Battle at the Inner Palace)

बाणासुर क्रोधित होकर अन्तःपुर में दिव्य लीला करने वाले युवक को देखता है। वह उसे अपने कुल के लिए कलंक मानकर उसे मारने और बंदी बनाने का आदेश देता है। दस हजार सैनिक भेजे जाते हैं। यादव वीर एक परिघ लेकर यमराज की तरह युद्ध करते हैं और शत्रुओं का संहार करते हैं।

54 verses

Adhyaya 54

अनिरुद्धापहरणानन्तरं कृष्णस्य शोणितपुरगमनम् तथा रुद्रकृष्णयुद्धारम्भः | After Aniruddha’s Abduction: Kṛṣṇa Marches to Śoṇitapura and the Rudra–Kṛṣṇa Battle Begins

अध्याय 54 में व्यास जी सनत्कुमार से पूछते हैं कि कुम्भाण्ड की पुत्री द्वारा अनिरुद्ध के अपहरण के बाद श्रीकृष्ण ने क्या किया। सनत्कुमार बताते हैं कि स्त्रियों का विलाप गूँज उठा, कृष्ण शोकाकुल हुए और अनिरुद्ध के न दिखने से समय दुःख में बीतने लगा। नारद अनिरुद्ध की कैद और स्थिति का समाचार लाते हैं, जिससे वृष्णियों की व्याकुलता बढ़ जाती है। पूरा वृत्तांत जानकर कृष्ण युद्ध का निश्चय करते हैं, गरुड़ (तार्क्ष्य) को बुलाकर शीघ्र शोणितपुर की ओर प्रस्थान करते हैं। प्रद्युम्न, युयुधान (सात्यकि), साम्ब, सारण तथा राम-कृष्ण के अन्य सहायक साथ चलते हैं। बारह अक्षौहिणी सेना से वे चारों दिशाओं से बाण की नगरी को घेरकर उद्यान, प्राचीर, अट्टालिकाएँ और द्वार तोड़ते हैं। आक्रमण देखकर बाण समान बल लेकर क्रोध से निकल पड़ता है। बाण की रक्षा हेतु रुद्र (शिव) पुत्र और प्रमथों सहित नन्दी पर आरूढ़ होकर आते हैं और रुद्र-नेतृत्व में बाण-पक्ष तथा कृष्ण-पक्ष के बीच भयानक, अद्भुत युद्ध आरम्भ हो जाता है।

63 verses

Adhyaya 55

अध्याय ५५ — बाणस्य पुनर्युद्धप्रवृत्तिः (Bāṇa’s Renewed Engagement in Battle)

अध्याय 55 में बाण–कृष्ण युद्ध की कथा आगे बढ़ती है। कृष्ण द्वारा प्रत्यस्त्र से पूर्व संकट शांत होने पर सूत, व्यास के प्रश्न और सनत्कुमार के उत्तर के माध्यम से प्रमाणिक परंपरा दिखाते हैं। व्यास पूछते हैं कि सेना रुक जाने पर बाण ने क्या किया। सनत्कुमार इसे कृष्ण और शंकर की अद्भुत लीला बताते हैं। रुद्र पुत्र और गणों सहित क्षणभर विश्राम में हों, तब बलि-पुत्र दैत्यराज बाण अपनी सेना घटती देखकर क्रोधित होकर पुनः युद्ध को उद्यत होता है और अनेक शस्त्रों से प्रचंड पराक्रम दिखाता है। उधर श्रीकृष्ण निर्भय गर्जना कर बाण को तुच्छ मानते हैं और शार्ङ्ग धनुष का ऐसा नाद करते हैं कि स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का आकाश गूँज से भर जाता है। इस प्रकार युद्ध का उत्कर्ष, नाद-शक्ति और दैत्यबल के सामने दैवी सामर्थ्य की प्रतिष्ठा स्थापित होती है।

48 verses

Adhyaya 56

बाणस्य शोकः शिवस्मरणं च — Bāṇa’s Grief and the Turn to Śiva-Remembrance

अध्याय 56 में नारद, सनत्कुमार से पूछते हैं कि कृष्ण के अनिरुद्ध और उसकी पत्नी सहित द्वारका चले जाने के बाद बाण ने क्या किया। सनत्कुमार बाण के गहरे दुःख और अपने ही अविवेक पर पश्चात्ताप का वर्णन करते हैं। तभी शिवगणों के नायक नंदीश्वर शोकाकुल असुर-भक्त बाण को उपदेश देते हैं—अत्यधिक ग्लानि छोड़ो, घटित को शिवेच्छा मानो, शिव-स्मरण बढ़ाओ और नियमित महोत्सव/उत्सव-पूजा का आचरण करो। इस वचन से बाण संयत होता है, शीघ्र शिवधाम जाकर प्रणाम करता है, दीनता से रोता है और स्तोत्र, साष्टांग प्रणाम तथा विधिपूर्वक अंग-चेष्टाओं से भक्ति प्रकट करता है। अंत में वह औपचारिक मुद्राओं सहित प्रमुख तांडव नृत्य करता है। कथा शोक से साधना की ओर मुड़ती है और शिव की करुणा, स्मरण, पूजा व शरणागति की रूपांतरकारी शक्ति को उजागर करती है।

35 verses

Adhyaya 57

गजासुरतपः–देवलोकक्षोभः (Gajāsura’s Austerities and the Disturbance of the Worlds)

सनत्कुमार व्यास को गजासुर-वध की भूमिका सुनाते हैं। देवी द्वारा महिषासुर के वध से देवता सुखी होते हैं, पर महिषासुर का वीर पुत्र गजासुर पिता की मृत्यु स्मरण कर प्रतिशोध हेतु घोर तप का संकल्प करता है। वह हिमालय की घाटी में वन जाकर बाहु उठाकर, दृष्टि स्थिर कर, विधाता ब्रह्मा को लक्ष्य करके अजेयता का वर माँगता है। वह वर में शर्त रखता है कि वह नर-नारी से, विशेषतः कामवश लोगों से, अवध्य रहे—वर-छिद्र का संकेत। उसके तप से शिर से अग्नितेज निकलता है; नदियाँ-सागर मथित होते हैं, ग्रह-नक्षत्र डगमगाते, दिशाएँ दहकतीं और पृथ्वी काँपती है। देवता स्वर्ग छोड़ ब्रह्मलोक जाकर संकट निवेदित करते हैं; इसी से आगे शिव की कृपा से असुर-भय के निवारण की भूमिका बनती है।

72 verses

Adhyaya 58

दुन्दुभिनिर्ह्रादनिर्णयः / Dundubhinirhrāda’s Stratagem: Targeting the Brāhmaṇas

सनत्कुमार व्यास को प्रह्लाद के संबंधी असुर दुन्दुभिनिर्ह्राद की कथा सुनाते हैं। विष्णु द्वारा हिरण्याक्ष के वध के बाद दिति शोक से व्याकुल होती है; दुन्दुभिनिर्ह्राद उसे ढाढ़स बँधाकर मायावी दैत्यराज के रूप में देवों को जीतने का उपाय सोचता है। वह विचार करता है कि देवों का बल स्वयंसिद्ध नहीं, यज्ञ-क्रियाओं से पोषित है; यज्ञ वेदों से, और वेद ब्राह्मणों पर आश्रित हैं। इसलिए वह ब्राह्मणों को देव-व्यवस्था का मूल आधार मानकर बार-बार ब्राह्मण-वध का प्रयास करता है, ताकि वेद-परंपरा और यज्ञ-शक्ति टूट जाए। अध्याय ब्राह्मण→वेद→यज्ञ→देवबल की कारण-श्रृंखला बताता है और पवित्र रक्षकों पर हिंसा की घोर निंदा करता है।

51 verses

Adhyaya 59

विदलोत्पलदैत्ययोरुत्पत्तिः देवपराजयः ब्रह्मोपदेशः नारदप्रेषणम् (Vidalotpala Daityas, Defeat of the Devas, Brahmā’s Counsel, and Nārada’s Mission)

अध्याय 59 में सनत्कुमार व्यास को बताते हैं कि वरदान से अवध्य बने दैत्य विदला और उत्पल युद्ध-गर्व में त्रिलोकी को तृणवत् समझकर देवताओं को पराजित कर देते हैं। उपाय हेतु देव ब्रह्मा की शरण जाते हैं; ब्रह्मा समझाते हैं कि इन दैत्यों का वध केवल देवी (शिवा) के द्वारा नियत है, इसलिए शिव के साथ शक्ति का स्मरण करते हुए धैर्य रखें। उपदेश पाकर देव अपने धाम लौटकर आश्वस्त होते हैं। फिर शिव-प्रेरित नारद दैत्यों के लोक में जाकर ऐसी वाणी बोलते हैं कि वे माया से मोहित होकर देवी को हरण करने का संकल्प कर बैठते हैं—यही उनके पतन का कारण बनता है। अंत में ‘समाप्तोऽयं युद्धखण्डः…’ जैसा कोलोफोन कुछ पाठों में खण्ड-समापन और पाठ-परतों का संकेत देता है।

43 verses