Adhyaya 7
Rudra SamhitaYuddha KhandaAdhyaya 744 Verses

देवस्तुतिवर्णनम् (Deva-stuti-varṇana) — “Description of the Gods’ Hymn/Praise”

अध्याय 7 में सनत्कुमार कथा कहते हैं। शरण्य और भक्तवत्सल भगवान शिव देवताओं की विनती स्वीकार करते हैं। तभी देवी अपने पुत्रों सहित आती हैं; विष्णु आदि देवगण तुरंत दण्डवत् प्रणाम कर मंगल-जयघोष करते हैं, पर उनके आगमन का कारण क्षणभर मौन रखते हैं। विस्मय से भरी देवी शिव से कहकर सूर्य-सम तेजस्वी, क्रीड़ालोल षण्मुख स्कन्द को, उत्तम आभूषणों से विभूषित, दिखाती हैं। शिव आनंदित होकर स्कन्द के मुखामृत का पान करते हुए तृप्त नहीं होते, उसे आलिंगन कर स्नेह से सूँघते हैं; इस वात्सल्य में वे अपने तेज से दग्ध दैत्यों को भी नहीं स्मरण करते। अध्याय में एक ओर देवस्तुति और शरणागति, दूसरी ओर शिव की पारिवारिक लीला और रसास्वाद—दोनों का सुंदर संगम है; अंत में इसे ‘देवस्तुतिवर्णनम्’ कहा गया है।

Shlokas

Verse 1

सनत्कुमार उवाच । एतच्छुत्वा तु सर्वेषां देवादीनां वचो हरः । अंगीचकार सुप्रीत्या शरण्यो भक्तवत्सलः

सनत्कुमार ने कहा—देवताओं आदि के ये वचन सुनकर, शरण देने वाले और भक्तवत्सल हर ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।

Verse 2

एतस्मिन्नंतरे देवी पुत्राभ्यां संयुता शिवा । आजगाम मुने तत्र यत्र देवान्वितो हरः

इसी बीच, हे मुने, देवी शिवा अपने दोनों पुत्रों सहित वहाँ आईं, जहाँ देवताओं से घिरे हुए हर (भगवान् शिव) विराजमान थे।

Verse 3

अथागतां शिवां दृष्ट्वा सर्वे विष्ण्वादयो द्रुतम् । प्रणेमुरतिनम्रास्ते विस्मिता गतसंभ्रमाः

तब शिवा को आया हुआ देखकर, विष्णु आदि सभी ने शीघ्र ही दण्डवत् प्रणाम किया; वे अत्यन्त नम्र थे, विस्मित थे, और उनका सारा संभ्रम शांत हो गया।

Verse 4

प्रोचुर्जयेति सद्वाक्यं मुने सर्वे सुलक्षणम् । तूष्णीमासन्नजानंतस्तदागमनकारणम्

हे मुनि! सबने शुभ वचन कहे—“जय! जय!”—पर उसके आगमन का कारण न जानकर वे फिर मौन हो गए।

Verse 5

अथ सर्वैः स्तुता देवैर्देव्यद्भुतकुतूहला । उवाच स्वामिनं प्रीत्या नानालीलाविशारदम्

तब सब देवताओं द्वारा स्तुत देवी, अद्भुत कुतूहल से भरकर, प्रेमपूर्वक अपने स्वामी—नाना लीलाओं में निपुण—से बोली।

Verse 6

देव्युवाच । क्रीडमानं विभो पश्य षण्मुखं रविसंनिभम् । पुत्रं पुत्रवतां श्रेष्ठ भूषितं भूषणैर्वरैः

देवी बोली—हे विभो! खेलते हुए इस षण्मुख को देखिए, जो सूर्य के समान तेजस्वी है; यह श्रेष्ठ पुत्र, पुत्रवानों में उत्तम, उत्तम आभूषणों से विभूषित है।

Verse 7

इति श्रीशिवमहापुराणे द्वितीयायां रुद्रसंहितायां पञ्चमे युद्धखंडे देवस्तुतिवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण की द्वितीय रुद्रसंहिता के पञ्चम युद्धखण्ड में ‘देवस्तुतिवर्णन’ नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 8

न सस्मारागतान्दैत्यान्निजतेजोनिपीडितान् । स्कंदमालिंग्य चाघ्राय मुगोदाति महेश्वरः

अपने ही प्रचण्ड तेज से अभिभूत महेश्वर को आते हुए दैत्यों का भी स्मरण न रहा। स्कन्द को आलिंगन कर उसके मस्तक का स्नेह से घ्राण करके वे मौन हो गए।

Verse 9

जगदम्बाथ तत्रैव संमंत्र्य प्रभुणा च सा । स्थित्वा किञ्चित्समुत्तस्थौ नानालीलाविशारदा

तब जगदम्बा वहीं अपने प्रभु से परामर्श करके कुछ क्षण ठहरीं; और अनेक लीलाओं में निपुण वह देवी फिर उठ खड़ी हुईं।

Verse 10

ततस्सनंदी सह षण्मुखेन तया च सार्द्धं गिरिराजपुत्र्या । विवेश शम्भुर्भवनं सुलीलः सुरैस्समस्तैरभिवंद्यमानः

तत्पश्चात् शम्भु, नन्दी तथा षण्मुख और गिरिराजकन्या (पार्वती) के साथ, सहज लीलाभाव से अपने भवन में प्रविष्ट हुए; और समस्त देवगण उन्हें प्रणाम कर रहे थे।

Verse 11

द्वारस्य पार्श्वतः तस्थुर्देवदेवस्य धीमतः । तेऽथ देवा महाव्यग्रा विमनस्का मुनेऽखिलः

वे उस बुद्धिमान देवों के देव के द्वार के पार्श्व में खड़े रहे। तब, हे मुनि, वे सब देवता अत्यन्त व्याकुल और मन से उदास हो गए।

Verse 12

किं कर्तव्यं क्व गंतव्यं कः स्यादस्मत्सुखप्रदः । किं तु किंत्विति संजातं हा हताः स्मेति वादिनम्

“क्या करना चाहिए? कहाँ जाना चाहिए? कौन हमारा कल्याण और सुख देने वाला होगा?”—ऐसा कहकर वे भ्रमित होकर बार-बार ‘पर क्या? क्या ही?’ दोहराते रहे और विलाप करते हुए बोले, “हाय, हम तो मारे गए!”

Verse 13

अन्योन्यं प्रेक्ष्य शक्राद्या बभूवुश्चातिविह्वलाः । प्रोचुर्विकलवाक्यं ते धिक्कुर्वन्तो निजं विधिम्

एक-दूसरे को देखकर इन्द्र आदि देव अत्यन्त व्याकुल हो गए। वे टूटे-फूटे शब्दों में बोले और अपनी ही नीति तथा किए हुए उपाय की निन्दा करने लगे।

Verse 14

पापा वयमिहेत्यन्ये ह्यभाग्याश्चेति चापरे । ते भाग्यवंतो दैत्येन्द्रा इति चान्येऽब्रुवन् सुराः

कुछ देव बोले—“हम यहाँ पापी हैं”; और कुछ बोले—“हम तो निश्चय ही अभागे हैं।” फिर अन्य देव कहने लगे—“वास्तव में भाग्यवान तो वे दैत्य-राज ही हैं।”

Verse 15

तस्मिन्नेवांतरे तेषां श्रुत्वा शब्दाननेकशः । कुंभोदरो महातेजा दंडेनाताडयत्सुरान्

उसी बीच उनके अनेक प्रकार के कोलाहल को सुनकर महातेजस्वी कुम्भोदर ने दण्ड से देवों को प्रहार किया।

Verse 16

दुद्रुवुस्ते भयाविष्टा देवा हाहेति वादिनः । अपतन्मुनयश्चान्ये विह्वलत्वं बभूव ह

वे देवता भय से व्याकुल होकर “हाय! हाय!” पुकारते हुए भाग खड़े हुए। अन्य मुनि भी गिर पड़े और अत्यन्त विह्वल हो गए।

Verse 17

इन्द्रस्तु विकलोतीव जानुभ्यामवनीं गतः । अन्ये देवर्षयोतीव विकलाः पतिता भुवि

इन्द्र मानो अपंग और अत्यन्त दुर्बल होकर घुटनों के बल पृथ्वी पर गिर पड़ा। अन्य देव और देवर्षि भी बहुत क्षीण होकर भूमि पर गिर गए।

Verse 18

सर्वे मिलित्वा मुनयस्सुराश्च सममाकुलाः । संगता विधिहर्योस्तु समीपं मित्रचेतसोः

तब सब मुनि और देवता एकत्र होकर, समान रूप से व्याकुल, परस्पर मैत्री-चित्त वाले ब्रह्मा और विष्णु के समीप पहुँचे।

Verse 19

अहो विधिबलं चैतन्मुनयः कश्यपादयः । वदंति स्म तदा सर्वे हरि लोकभयापदम्

“अहो! यह तो विधि (भाग्य) का प्रबल बल है।” तब कश्यप आदि सब मुनि, लोकों के भय-संकट में आश्रय बने हरि से एक साथ बोले।

Verse 20

अभाग्यान्न समाप्तं तु कार्यमित्यपरे द्विजाः । कस्माद्विघ्नमिदं जातमित्यन्ये ह्यति विस्मिताः

कुछ द्विज बोले—“दुर्भाग्य से कार्य पूर्ण नहीं हुआ।” अन्य अत्यन्त विस्मित होकर पूछने लगे—“यह विघ्न कहाँ से उत्पन्न हुआ?”

Verse 21

इत्येवं वचनं श्रुत्वा कश्यपाद्युदितं मुने । आश्वासयन्मुनीन्देवान् हरिर्वाक्यमुपाददे

हे मुने, कश्यप आदि के कहे हुए ऐसे वचन सुनकर, मुनियों और देवताओं को आश्वस्त करते हुए हरि (विष्णु) ने तब वचन आरम्भ किया।

Verse 22

विष्णुरुवाच । हे देवा मुनयस्सर्वे मद्वचः शृणुतादरात् । किमर्थं दुःखमापन्ना दुखं तु त्यजताखिलम्

विष्णु बोले—हे देवो और समस्त मुनियो, मेरे वचन आदरपूर्वक सुनो। तुम किस कारण शोक में पड़े हो? इस समस्त दुःख को त्याग दो।

Verse 23

महदाराधनं देवा न सुसाध्यं विचार्य्यताम् । महदाराधने पूर्वं भवेद्दुःखमिति श्रुतम् । विज्ञाय दृढतां देवाः प्रसन्नो भवति ध्रुवम्

हे देवो, विचार करो—महान् आराधना सहज नहीं होती। परम्परा में सुना है कि ऐसी महा-आराधना के पहले दुःख आता है। पर जब प्रभु दृढ़ता जान लेते हैं, तब वे निश्चय ही प्रसन्न होते हैं।

Verse 24

शिवस्सर्वगणायक्षस्सहसा परमेश्वरः । विचार्यतां हृदा सर्वैः कथं वश्यो भवेदिति

सर्व गणों और यक्षों से घिरे परमेश्वर शिव सहसा आ पहुँचे हैं। तुम सब अपने-अपने हृदय में विचार करो—किस उपाय से वे वश में किए जा सकते हैं?

Verse 25

प्रणवं पूर्वमुच्चार्य्य नमः पश्चादुदाहरेत् । शिवायेति ततः पश्चाच्छुभद्वयमतः परम्

पहले प्रणव ‘ॐ’ का उच्चारण करो, फिर ‘नमः’ कहो। उसके बाद ‘शिवाय’ बोलो, और अंत में दो शुभ अक्षर जोड़ो—यही पूर्ण मंत्र है।

Verse 26

कुरुद्वयं ततः प्रोक्तं शिवाय च ततः पुनः । नमश्च प्रणवश्चैव मंत्रमेवं सदा बुधाः

तत्पश्चात ‘कु-रु’ ये दो अक्षर बोले जाते हैं, फिर ‘शिवाय’। ‘नमः’ और प्रणव ‘ॐ’ सहित—बुद्धिमान सदा मंत्र को इसी रूप में बताते हैं।

Verse 27

अवर्तध्वं पुनर्यूयं यदि शंभुकृते तदा । कोटिमेकं तथा जप्त्वा शिवः कार्यं करिष्यति

यदि यह शम्भु के कार्य हेतु है, तो तुम फिर लौट आओ। तब एक कोटि जप करके शिव स्वयं कार्य सिद्ध करेंगे।

Verse 28

इत्युक्ते च तदा तेन हरिणा प्रभविष्णुना । तथा देवाः पुनश्चक्रुर्हरस्याराधनं मुने

तब प्रभु विष्णु हरि के ऐसा कहने पर, हे मुनि, देवताओं ने फिर से हरा (शिव) की आराधना वैसी ही आरम्भ की।

Verse 29

संजजाप हरिश्चापि सविधिश्शिवमानसः । देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं मुनीनां च विशेषतः

तब हरि (विष्णु) ने भी विधि-पूर्वक, मन को शिव में लीन कर, देवताओं के कार्य-सिद्धि हेतु और विशेषतः मुनियों के कल्याण हेतु जप किया।

Verse 30

मुहुः शिवेति भाषंतो देवा धैर्यसमन्विताः । कोटिसंख्यं तदा कृत्वा स्थितास्ते मुनिसत्तम

हे मुनिश्रेष्ठ, देवता धैर्य से युक्त होकर बार-बार “शिव! शिव!” कहते रहे; फिर करोड़ों की संख्या में समूह बनाकर वे दृढ़तापूर्वक खड़े रहे।

Verse 31

एतस्मिन्नंतरे साक्षाच्छिवः प्रादुरभूत्स्वयम् । यथोक्तेन स्वरूपेण वचनं चेदमब्रवीत्

उसी समय साक्षात् शिव स्वयं प्रकट हुए। पूर्वोक्त स्वरूप में प्रादुर्भूत होकर उन्होंने ये वचन कहे।

Verse 32

श्रीशिव उवाच । हे हरे हे विधे देवा मुनयश्च शुभव्रताः । प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूत जयेनानेन चेप्सितम्

श्रीशिव बोले— “हे हरे, हे विधाता, हे देवगण और शुभव्रत मुनियों! मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो; इस विजय के साथ अभीष्ट फल भी प्राप्त करो।”

Verse 33

देवा ऊचुः । यदि प्रसन्नो देवेश जगदीश्वर शंकर । सुरान् विज्ञाय विकलान् हन्यंतां त्रिपुराणि च

देवों ने कहा—हे देवेश, जगदीश्वर शंकर! यदि आप प्रसन्न हों, तो हमें असहाय और पीड़ित जानकर त्रिपुर के तीनों पुरों का भी विनाश कीजिए।

Verse 34

रक्षास्मान्परमेशान दीनबंधो कृपाकर । त्वयैव रक्षिता देवास्सदापद्भ्यो मुहुर्मुहुः

हे परमेशान, हे दीनबन्धु, हे कृपाकर! हमारी रक्षा कीजिए; क्योंकि बार-बार आप ही ने देवों को सदा आपत्तियों और संकटों से बचाया है।

Verse 35

सनत्कुमार उवाच । इत्युक्तं वचनं तेषां श्रुत्वा सहरिवेधसाम् । विहस्यांतस्तदा ब्रह्मन्महेशः पुनरब्रवीत्

सनत्कुमार ने कहा—हरि और वेधस् (ब्रह्मा) सहित उन सबके वचन सुनकर, महेश ने मन ही मन मुस्कराकर, हे ब्राह्मण, फिर से वचन कहा।

Verse 36

महेश उवाच । हे हरे हे विधे देवा मुनयश्चाखिला वचः । मदीयं शृणुतादृत्य नष्टं मत्वा पुरत्रयम्

महेश ने कहा— हे हरि, हे विधाता (ब्रह्मा), हे देवगण और समस्त मुनियों! मेरे वचन को आदरपूर्वक सुनो, त्रिपुर को नष्ट मानकर।

Verse 37

रथं च सारथिं दिव्यं कार्मुकं शरमुत्तमम् । पूर्वमंगीकृतं सर्वमुपपादयताचिरम्

उसने बिना विलंब रथ और दिव्य सारथि, धनुष और श्रेष्ठ बाण—जो कुछ पहले से स्वीकार किया गया था—सब तुरंत उपलब्ध करा दिया।

Verse 38

हे विष्णो हे विधे त्वं हि त्रिलोकाधिपतिर्ध्रुवम् । सर्वसम्राट्प्रकारं मे कर्तुमर्हसि यत्नतः

हे विष्णो, हे विधे (ब्रह्मा)! तुम निश्चय ही त्रिलोक के ध्रुव अधिपति हो; इसलिए यत्नपूर्वक मेरे लिए सार्वभौम सम्राट्-भाव की समस्त व्यवस्था करो।

Verse 39

नष्टं पुरत्रयं मत्वा देवसाहाय्यमित्युत । करिष्यथः प्रयत्नेनाधिकृतौ सर्गपालने

त्रिपुर को नष्ट मानकर तुम देवताओं की सहायता अवश्य करोगे; क्योंकि सृष्टि-पालन के कार्य में तुम नियुक्त हो, और यत्नपूर्वक शासन-रक्षा करनी है।

Verse 40

अयं मंत्रो महापुण्यो मत्प्रीतिजनकश्शुभः । भुक्तिमुक्तिप्रदस्सर्वकामदश्शैवकावह

यह मंत्र महापुण्य, शुभ और मेरी प्रसन्नता जगाने वाला है। यह भोग और मोक्ष देता, सब कामनाएँ पूर्ण करता और शैव-मार्ग में प्रवृत्त कराता है।

Verse 41

धन्यो यशस्य आयुष्यः स्वर्गकामार्थिनां नृणाम् । अपवर्गो ह्यकामानां मुक्तानां भुक्तिमुक्तिदः

यह स्वर्ग और सांसारिक सिद्धि चाहने वाले मनुष्यों के लिए धन्य, यशदायक और आयुवर्धक है। और जो निष्काम हैं, उनके लिए यही अपवर्ग का मार्ग है; तथा मुक्त जनों को भी—पाशच्छेदक पति-शिव की कृपा से—यथोचित भोग और परम मुक्ति प्रदान करता है।

Verse 42

य इमं कीर्तयेन्मंत्रं शुचिर्भूत्वा सदा नरः । शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि सर्वान्कामानवाप्नुयात्

जो मनुष्य शुद्ध होकर सदा इस मंत्र का कीर्तन करता है—या इसे सुनता है, अथवा दूसरों को सुनवाता है—वह समस्त कामनाओं की सिद्धि प्राप्त करता है।

Verse 43

सनत्कुमार उवाच । इति श्रुत्वा वचस्तस्य शिवस्य परमात्मनः । सर्वे देवा मुदं प्रापुर्हरिर्ब्रह्माधिकं तथा

सनत्कुमार ने कहा—परमात्मा शिव के ये वचन सुनकर, सभी देवता अत्यन्त आनंदित हुए; और वैसे ही हरि तथा ब्रह्मा भी।

Verse 44

सर्वदेवमयं दिव्यं रथं परमशोभनम् । रचयामास विश्वार्थे विश्वकर्मा तदाज्ञया

उस आज्ञा से विश्वकर्मा ने जगत् के कल्याण हेतु सर्वदेवमय, दिव्य और परम शोभायमान रथ का निर्माण किया।

Frequently Asked Questions

The devas’ acclamation and reverential praise of Śiva coincides with Devī’s arrival with her sons, centering on Skanda (Ṣaṇmukha) as Śiva embraces him and becomes absorbed in familial līlā.

It encodes divine rasa (aesthetic relish) and anugraha (grace): Śiva’s supreme power is shown as intimacy and bliss, implying that cosmic authority is grounded in beatific fullness rather than need-driven action.

Śiva is emphasized as śaraṇya (refuge-giver) and bhaktavatsala (devotee-loving); Skanda appears as Ṣaṇmukha, radiant and ornamented; Devī appears as Jagadambā, orchestrating the scene through affectionate address and presence.