Parvatikhanda
हिमाचलविवाहवर्णनम् — Description of Himācala’s (context for) Marriage / The Himālaya-Marriage Narrative (Chapter Opening)
इस अध्याय में नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि दक्ष के यज्ञ में देह त्यागने के बाद सती किस प्रकार फिर से गिरिसुता और जगदम्बिका बनकर प्रकट हुईं। ब्रह्मा इसे शिव-कथा का पावन प्रसंग बताकर उत्तर देते हैं और हिमाचल पर हर के साथ सती की दिव्य क्रीड़ा का वर्णन करते हैं। हिमाचल की प्रिया मेना देवी के भावी मातृत्व को पहचानती है। दक्षयज्ञ के अपमान के बाद मेना शिवलोक में भक्तिभाव से देवी की आराधना करती है। सती मन में मेना की पुत्री रूप में जन्म लेने का संकल्प कर देह त्यागती हैं, पर संकल्प की निरन्तरता बनी रहती है। उचित समय पर देवताओं द्वारा स्तुत होकर सती मेना की पुत्री रूप में जन्म लेती हैं, जिससे आगे पार्वती के तप और शिव को पति रूप में पुनः प्राप्त करने की भूमिका बनती है।
पूर्वगतिवर्णनम् (Pūrvagati-varṇana) — “Description of the Prior Course / Earlier Lineage Account”
इस अध्याय में संशय-भंजन हेतु नारद ब्रह्मा से मेना की उत्पत्ति और किसी संबंधित शाप का विवरण पूछते हैं। ब्रह्मा पूर्व सृष्टि-वंशपरंपरा में दक्ष, उनकी संतति तथा कश्यप आदि ऋषियों से हुए वैवाहिक संबंधों का प्रसंग रखकर कथा बताते हैं। उसी क्रम में स्वधा पितरों को दी गई, और स्वधा से मनसोत्पन्न, लोक-परंपरा में अयोनिज मानी जाने वाली तीन कन्याएँ उत्पन्न हुईं—ज्येष्ठा मेना, मध्यमा धन्या और कनिष्ठा कलावती। इनके शुभ नामों के श्रवण-कीर्तन को विघ्नहर और महा-मंगलदायक कहा गया है। आगे उन्हें जगत-वंद्या, लोक-माता, योगिनियाँ तथा त्रिलोकों में विचरने वाली परम-ज्ञान की निधि बताकर वंश-वर्णन को भक्ति और तत्त्व के स्तर पर उन्नत किया गया है।
देवस्तुतिः (Deva-stuti) — “Hymn of the Devas / Divine Praise”
अध्याय 3 नारद–ब्रह्मा संवाद के रूप में है। मेना के शुभ वृत्तांत और विवाह-व्यवस्था के बाद नारद पूछते हैं कि जगदम्बिका पार्वती का जन्म कैसे हुआ और कठोर तप से उन्होंने हर/शिव को पति रूप में कैसे पाया। ब्रह्मा शंकर की मंगलमय कीर्ति-श्रवण की महिमा बताते हैं—ब्रह्महत्या जैसे घोर पापों का भी शोधन और इच्छाओं की पूर्ति। फिर कथा गृहस्थ-परिवेश में आती है: मेना के विवाह के बाद गिरिराज/हिमाचल घर लौटते हैं, तीनों लोकों में उत्सव होता है। हिमाचल द्विजों और कुटुम्बियों का सत्कार करते हैं; वे आशीर्वाद देकर अपने-अपने धाम लौट जाते हैं। इस प्रकार हिमालय-गृह को धर्म और मंगल का केंद्र बनाकर पार्वती के प्राकट्य तथा आगे होने वाली देव-स्तुति की भूमिका रची जाती है।
देवसान्त्वनम् (Devasāntvana) — “Consolation/Reassurance of the Gods”
इस अध्याय में देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा/जगदम्बा का दिव्य प्राकट्य होता है। ब्रह्मा उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं—रत्नजटित दिव्य रथ पर विराजमान, अपने तेज से आवृत, असंख्य सूर्यों से भी अधिक दीप्तिमान। उन्हें महामाया, सदाशिव-विलासिनी, त्रिगुणा होते हुए भी निर्गुणा, नित्या तथा शिवलोक-निवासिनी कहा गया है, जिससे उनकी व्यापकता और परात्परता दोनों सिद्ध होती हैं। विष्णु आदि देव उनकी कृपा से दर्शन पाकर परम आनन्द अनुभव करते हैं, बार-बार दण्डवत् प्रणाम करते हैं और शिवा, शर्वाणी, कल्याणी, जगदम्बा, महेश्वरी, चण्डी, सर्वार्ति-नाशिनी आदि नामों से पुनः स्तुति करते हैं। यह प्रसंग देवी को रक्षक और दुःखहरिणी के रूप में स्थापित करता है।
मेनावरलाभवर्णनम् — Description of Menā’s Attainment of Boons (and the worship leading to Umā’s advent)
अध्याय 5 नारद–ब्रह्मा संवाद में है। नारद पूछते हैं कि देवी दुर्गा के तिरोभाव के बाद देवता अपने-अपने धाम लौटे तो हिमालय और मेना ने किस प्रकार तप और भक्ति से कन्या-लाभ किया। ब्रह्मा शंकर का स्मरण कर बतलाते हैं कि दोनों ने शिव-शिवा का निरंतर ध्यान, दृढ़ भक्ति से पूजा, देवी का सत्कार और ब्राह्मणों को दान आदि करके देवी को प्रसन्न किया। मेना का दीर्घकालीन व्रत चैत्र से आरम्भ होकर अनेक वर्षों तक चलता है—अष्टमी को उपवास और नवमी को नैवेद्य-समर्पण। मोदक, बलि/पिष्ट-प्रसाद, पायस, सुगंध, पुष्प आदि उपचारों सहित गंगा तट पर मिट्टी की उमा-मूर्ति बनाकर विविध अर्पणों से पूजा का वर्णन है। इस प्रकार तपस्या से देवी तुष्ट होकर वर देती हैं और संतान/उमा का आगमन सुनिश्चित होता है; मेना की व्रत-पूजा प्रभावी भक्ति का आदर्श बनती है।
पार्वतीजन्मवर्णनम् / Description of Pārvatī’s Birth
इस अध्याय में देवी के हिमालय-गृह में अवतरण का कारण और विधान बताया गया है। ब्रह्मा कहते हैं कि हिमवान और मेना संतान-प्राप्ति तथा देवकार्य की सिद्धि हेतु भक्तिपूर्वक भवाम्बिका का स्मरण करते हैं। तब पूर्व में देह त्याग चुकी चण्डिका पुनः देह धारण करने का संकल्प करती है और अपने पूर्व वचन को सत्य करने तथा शुभ फल देने के लिए मेना के हृदय में पूर्णांश से प्रवेश करती है। मेना का गर्भ तेजस्वी और अद्भुत होता है; वह तेजोमण्डल से घिरी रहती है और दौहृद-लक्षण जैसे शुभ संकेत प्रकट होते हैं। गर्भाधान और जन्म को साधारण जैविक घटना नहीं, बल्कि पवित्र अवतरण माना गया है—समय आने पर शिवांश की स्थापना होती है और देवी की कृपा गर्भ-पूर्ति का निकट कारण बनती है। इस प्रकार भक्ति, सत्य-वचन और लोक-हित की आवश्यकता से पार्वती-जन्म की भूमिका बनती है।
पार्वतीबाल्यलीलावर्णनम् — Description of Pārvatī’s Childhood/Birth Festivities
अध्याय 7 में हिमालय और मेना के घर पार्वती के जन्म के तत्काल प्रसंग और उसके सामाजिक‑वैदिक उत्सव का वर्णन है। ब्रह्मा मेना के लौकिक मातृभाव से उत्पन्न रोदन का उल्लेख करते हैं और रात्रि के वातावरण में विशेष प्रकाश व शुभ संकेत दिखाए गए हैं। नवजात के रुदन को सुनकर घर की स्त्रियाँ स्नेह से दौड़ पड़ती हैं; सेवक राजा को बताते हैं कि यह जन्म अत्यन्त शुभ, हर्षदायक और देवकार्य सिद्ध करने वाला है। हिमालय पुरोहित व विद्वान ब्राह्मणों के साथ आकर नीलकमल‑दल के समान वर्ण वाली तेजस्विनी कन्या को देखकर आनन्दित होता है। फिर नगर में वाद्य, मंगलगीत, नृत्य और जनसमूह का उत्सव होता है; राजा जातकर्म कर द्विजों को दान देता है। इस प्रकार पार्वती का अवतरण गृह-घटना भी है और दैवी संकेत भी।
नारद–हिमालयसंवादवर्णनम् (Nārada and Himālaya: Discourse on Pārvatī’s Signs and Destiny)
इस अध्याय में ब्रह्मा द्वारा वर्णित संवाद के अनुसार शिव की प्रेरणा से शिवज्ञानी नारद हिमालय के भवन आते हैं। हिमालय विधिपूर्वक उनका सत्कार कर अपनी पुत्री पार्वती को उनके चरणों में अर्पित करते हैं और ‘जातक’ की भाँति उसके गुण-दोष तथा होने वाले पति की पहचान और भाग्य के विषय में निर्णय माँगते हैं। नारद उसके लक्षणों, विशेषकर हस्त-लक्षण, का परीक्षण कर शुभ भविष्यवाणी करते हैं—वह वर्धमान चन्द्रमा-सी, ‘आद्य कला’ और ‘सर्वलक्षणशालिनी’ है, माता-पिता के लिए यश व आनंद का कारण और पति के लिए सुखदायिनी होगी। यह अध्याय पार्वती की असाधारणता को सार्वजनिक रूप से स्थापित कर उनके नियत शिव-विवाह को दैवी और धर्मसम्मत नियति के रूप में प्रस्तुत करता है।
स्वप्नवर्णनपूर्वकं संक्षेपशिवचरितवर्णनम् / Dream-Portents and a Concise Account of Śiva’s Career
अध्याय 9 संवाद-रूप में है। ब्रह्मा से पहले सुनी शैव-कथा के बाद नारद पूछते हैं कि आगे क्या हुआ। ब्रह्मा बताते हैं कि मेना हिमालय के पास जाकर आदर से निवेदन करती है कि गिरिजा का विवाह लोक-रीति के अनुसार सुंदर, कुलीन, शुभ-लक्षण वाले वर से हो, जिससे बेटी सुखी रहे। इसमें मातृ-स्नेह और ‘नारी-स्वभाव’ को कथा-उपकरण बनाया गया है। हिमालय उसे समझाते हैं कि मुनि-वचन कभी असत्य नहीं होता, इसलिए संदेह छोड़ो। स्वप्न/शकुन-वर्णन को प्रमाण बनाकर अंत में शिव-चरित का संक्षिप्त परिचय दिया जाता है, जिससे स्पष्ट हो कि नियत शिव–पार्वती-विवाह साधारण मानदंडों से परे है।
सतीविरहानन्तरं शम्भोश्चरितम् / Śiva’s Conduct After Satī’s Separation
अध्याय 10 प्रश्न–उत्तर रूप में है। नारद ब्रह्मा (विधि) से पूछते हैं कि सती के देहत्याग के बाद भगवान शम्भु ने विरह को कैसे सहा, फिर क्या किया, कब और क्यों तप हेतु हिमवत्-प्रदेश की ओर गए, और पार्वती के द्वारा शिव-प्राप्ति की परिस्थितियाँ कैसे बनीं। ब्रह्मा शुभ, पावन और भक्ति-वर्धक कथा सुनाते हैं—शिव सती-स्मरण से शोकाकुल होकर दिगम्बर-व्रत धारण करते हैं, गृहस्थ-भाव त्यागकर लोक-लोकान्तर में विचरते हैं, बीच-बीच में दर्शन देते हैं और अंततः पर्वत-प्रदेश में लौट आते हैं। यह अध्याय दैवी शोक को योग-वैराग्य के रूप में दिखाकर पार्वती के तप, कामक्षय और पुनर्मिलन की भूमिका बाँधता है।
शिवस्य तपोऽनुष्ठानम् — Śiva’s Austerity and Meditation at Himavat (Gaṅgā-Region)
अध्याय 11 में ब्रह्मा हिमालय की पुत्री—जगत् द्वारा पूजित शक्ति—के पिता के घर आठ वर्ष की आयु में शीघ्र परिपक्व होने का वर्णन करते हैं। सती-वियोग से व्याकुल शिव उसके जन्म का समाचार पाकर अंतःकरण में प्रसन्न होते हैं, मानो पुनर्मिलन की दिव्य योजना फिर जाग उठी हो। मन को स्थिर करने और तप करने हेतु शम्भु लौकिक-सी गति धारण कर नन्दी, भृंगी आदि शांत गणों के साथ गङ्गावतरण-सम्बद्ध परम पावन हिमवत्-प्रदेश में जाते हैं, जो संचित पापों का नाश करने वाला कहा गया है। वहाँ शिव तप आरम्भ कर आत्मा में एकाग्र ध्यान में प्रविष्ट होते हैं; गण भी उसी योग-नियम का पालन करते हैं और अन्य मौन द्वारपाल बनकर व्यवस्था निभाते हैं। अध्याय का तात्त्विक केन्द्र आत्मचैतन्य का वर्णन है—ज्ञानज, नित्य, प्रकाशमय, निरोग, सर्वव्यापी, आनन्दस्वरूप, अद्वैत और निराधार—जिससे शिव का तप अद्वैत-शैव तत्त्व का आचरण बन जाता है। अंत में शिव के आगमन का समाचार सुनकर हिमवान औषधियों से युक्त शंकर-शैल की ओर आते हैं, जिससे आगे का संवाद और पार्वती की नियति का क्रम आरम्भ होता है।
काली-परिचयः / Himagiri Presents Kālī (Pārvatī) to Śiva
इस अध्याय में ब्रह्मा प्रसंग का वर्णन करते हैं। हिमगिरि शुभ पुष्प-फल आदि लेकर त्रिलोकीनाथ शिव के पास जाते हैं, प्रणाम कर अपनी पुत्री को यहाँ ‘काली’ कहकर प्रस्तुत करते हैं और उसके शिव-पूजन तथा सेवा की तीव्र इच्छा निवेदित करते हैं। वे शंकर से अनुमति और अनुग्रह माँगते हैं कि वह सखियों सहित निरंतर उनकी सेवा कर सके। तब शिव युवावस्था की देहरी पर खड़ी उस कन्या को देखते हैं; रूप-वर्णन में उसके कमल-सा वर्ण, चंद्र-सा मुख, विशाल नेत्र, सुकोमल अंग और अद्भुत आकर्षण बताया गया है, जो ध्यानस्थ मनों को भी दर्शन से विचलित कर दे। इस प्रकार अध्याय भक्ति-सेवा को देवी के सौंदर्य और शक्ति-तत्त्व के प्रकाशन से जोड़कर पार्वती-कथा की आगे की भूमिका रचता है।
प्रकृतितत्त्व-विचारः / Inquiry into Prakṛti (Nature/Śakti) and Śiva’s Transcendence
अध्याय 13 में भवानी (पार्वती) पहले गिरिराज (हिमालय) से योगी तपस्वी द्वारा कही गई बातों का स्पष्टीकरण चाहती हैं और फिर प्रकृति/शक्ति का सटीक स्वरूप पूछती हैं। यहाँ तप को परम साधन बताया गया है और प्रकृति को वह सूक्ष्म शक्ति कहा गया है जिसके द्वारा सृष्टि, पालन और प्रलय होते हैं। पार्वती का प्रश्न तीखा है—यदि शिव पूज्य हैं और लिंग-रूप में प्रतिष्ठित हैं, तो उन्हें प्रकृति के बिना कैसे समझें, और उस प्रकृति का तात्त्विक स्थान क्या है? ब्रह्मा कथावाचक बनकर मुस्कान व प्रसन्नता सहित वक्ताओं का परिवर्तन बताते हैं। महेश्वर उत्तर देते हैं कि वे तत्त्वतः प्रकृति से परे हैं; सद्जनों को प्रकृति में अनासक्ति, निर्विकारता और लोकाचार से दूरी का उपदेश देते हैं। आगे काली चुनौती देती हैं—यदि प्रकृति नहीं मानी जाए तो शिव उसके परे कैसे कहे जाएँ? इससे आगे के श्लोकों में सिद्धान्त-निर्णय की भूमिका बनती है।
तारकासुर-पूर्ववृत्त-प्रश्नः (Questions on Tārakāsura and Śivā’s tapas) / “Inquiry into Tārakāsura’s origin and Śivā–Śiva narrative”
इस अध्याय में नारद ब्रह्मा से पूछते हैं—तारकासुर कौन था और उसने देवताओं को कैसे सताया, शंकर ने कामदेव (स्मर) को भस्म कैसे किया, तथा आदिशक्ति होकर भी शिवा ने कठोर तप करके शम्भु को पति कैसे पाया। ब्रह्मा वंश-परंपरा से प्रसंग जोड़ते हैं—मरीचि से कश्यप, कश्यप की पत्नियाँ, विशेषतः दिति; उनसे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का जन्म। विष्णु के नरसिंह और वराह अवतारों द्वारा उनके वध से देवताओं को सुरक्षा मिलती है, पर यह कथा आगे आने वाले असुर-उत्पात (तारक) की भूमिका बनती है और दिखाती है कि उत्पत्ति→उत्पीड़न→दैवी प्रत्युत्तर की कड़ी में शक्ति के तप और शिव-शिवा की धर्म-स्थापना आवश्यक है।
वराङ्ग्याः सुतजन्म-उत्पातवर्णनम् | Birth of Varāṅgī’s Son and the Description of Portents (Utpātas)
अध्याय 15 में ब्रह्मा वर्णन करते हैं कि वराङ्गी गर्भ धारण कर पूर्णकाल पर एक महाकाय, प्रचण्ड तेजस्वी पुत्र को जन्म देती है, जिसकी आभा मानो दसों दिशाओं को प्रकाशित कर देती है (1–2)। उसी क्षण जगत में भय और अव्यवस्था सूचक दुःखद उत्पात प्रकट होते हैं (3)। इन अशुभ लक्षणों को स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष—तीनों लोक-क्षेत्रों में ‘अनर्थ-सूचक’ बताकर वर्गीकृत किया गया है (4)। उल्कापात, भयानक गर्जन वाले वज्र, शोकदायक धूमकेतु (5), भूकम्प, पर्वतों का काँपना, दिशाओं का दहकना, नदियों तथा विशेषतः समुद्रों का मथना (6), धूलि-ध्वज उठाने वाली प्रचण्ड आँधियाँ और महान वृक्षों का उखड़ना (7), बार-बार सूर्य-परिवेष/वलय जो महाभय और क्षेम-हानि के संकेत हैं (8), पर्वत-गुहाओं के रथ-गर्जना सदृश विस्फोट (9), तथा गाँवों में सियार, उल्लू आदि के अशुभ क्रन्दन और विकृत हाहाकार, साथ ही मुखों से अग्नि निकलने जैसी भयानक छवियाँ (10) वर्णित हैं। इस प्रकार यह अद्भुत जन्म प्रकृति के विक्षोभों द्वारा उसकी गम्भीरता और लोक-व्यवस्था पर संभावित प्रभाव के रूप में भी संकेतित होता है।
तारकपीडितदेवशरणागतिḥ — The Devas Seek Refuge from Tāraka
अध्याय 16 में ब्रह्मा एक संकट का वर्णन करते हैं—वरदान से बलवान होकर असुर तारक देवों (निर्जरों) को अत्यन्त पीड़ित कर रहा है। देवगण प्रजापति/लोकेश की शरण में जाकर हृदय से स्तुति (अमरानुति) करते हैं; प्रसन्न होकर ब्रह्मा उनसे आने का कारण पूछते हैं। विनीत और व्याकुल देव बताते हैं कि तारक ने उन्हें उनके-उनके पदों से बलपूर्वक हटा दिया है और दिन-रात सताता है; भागने पर भी वह सर्वत्र सामने आ जाता है। अग्नि, यम, वरुण, निरृति, वायु आदि दिक्पालों सहित अनेक देवपद उसके अधीन हो गए हैं, जिससे लोक-धर्म और जगत-प्रशासन में विघ्न पड़ गया है। यह अध्याय स्तुति से आरम्भ होकर निवेदन और पीड़ा-वर्णन के माध्यम से शिव-केंद्रित समाधान तथा (पार्वतीखण्ड में) शक्ति की अनिवार्यता की भूमिका बाँधता है।
काम-शक्र-संवादः / Dialogue of Kāma and Śakra (Indra)
इस अध्याय में ब्रह्मा बताते हैं कि अधर्मी और अत्यन्त बलवान तारकासुर के अत्याचार से देवता दबकर पीछे हट जाते हैं। तब शक्र (इन्द्र) युद्ध के साधन छोड़कर एक भिन्न उपाय—काम (स्मर/मनमथ)—का स्मरण करते हैं। स्मरण होते ही काम वसन्त आदि परिकरों तथा रति सहित, विजय-गर्व से युक्त, तुरंत उपस्थित होकर प्रणाम करता और इन्द्र का प्रयोजन पूछता है। इन्द्र उसकी स्तुति कर यह कार्य अपना ही नहीं, काम का भी कार्य बताकर उसे अन्य सहायकों से श्रेष्ठ मानते हैं। वे कहते हैं कि विजय के दो साधन हैं—वज्र और काम; वज्र कभी निष्फल हो सकता है, पर काम की शक्ति अचूक है। ‘जो लोक-कल्याण करे वही सबसे प्रिय’ इस नीति से इन्द्र काम को परम मित्र मानकर आवश्यक कार्य सिद्ध करने की प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार आगे की दिव्य योजना का आधार बनता है, जहाँ धर्मार्थ हेतु काम को असुर-बल के विरुद्ध ब्रह्माण्डीय उपाय बनाया जाता है।
वसन्त-प्रभावः तथा काम-उद्दीपन-वर्णनम् | Spring’s Influence and the Arousal of Kāma
अध्याय 18 में ब्रह्मा बताते हैं कि शिव की माया के मोह से काम (स्मर) एक विशेष स्थान पर आ पहुँचा। इसके बाद वसंत का विस्तृत वर्णन आता है—वसंत-धर्म सब दिशाओं में फैलकर महादेव के तपःस्थल (उदाहरण में ‘औषधिप्रस्थ’) तक पहुँचता है और प्रकृति को असाधारण रूप से पुष्पित व इंद्रिय-उत्तेजक बना देता है। आम्र-और अशोक-वन, कैरव पुष्प, भौंरे, कोयल की कूक, चाँदनी और मंद पवन—ये सब ‘काम-उद्दीपन’ कारण बनकर प्राणियों में इच्छा जगाते हैं। कहा गया है कि कम सावधान लोग भी तब काम-बन्धन में पड़ जाते हैं, जब विश्व-परिस्थितियाँ अनुकूल हों। यह प्रकृति-चित्रण केवल अलंकार नहीं, बल्कि गुणों के क्षोभ और भाव-संक्रमण की व्याख्या है, जो आगे शिव की तप-शान्ति के विरुद्ध काम की योजना तथा काम और धर्म के नैतिक तनाव की भूमिका रचता है।
कामप्रहारः — The Subduing of Kāma (Desire) / Kāma’s Assault and Its Futility
इस अध्याय में नारद के प्रश्न पर ब्रह्मा आगे की कथा कहते हैं। शिव के परम तप में मन की शान्ति में क्षोभ उत्पन्न होता है तो शिव कारण पूछते हुए स्वयं विचार करते हैं कि पर-स्त्री की ओर आकर्षण धर्म-विरोधी है और श्रुति-सीमा का उल्लंघन है। फिर वे दिशाओं को देखते हैं और बाईं ओर धनुष ताने, गर्व और मोह से भरे कामदेव को पाते हैं। काम ‘अमोघ’ अस्त्र छोड़ता है, पर परमात्मा शंकर के स्पर्श से वह ‘मोग’ हो जाता है और उसका बल शांत पड़ जाता है; शिव का क्रोध प्रकट होता है। अध्याय सिखाता है कि काम परमेेश्वर को बाँध नहीं सकता और मन में उठी हल्की विक्षुब्धता भी धर्म व योग-विवेक से जाँचकर ईश्वरीय सामर्थ्य से शांत की जाती है।
तृतीयनेत्राग्निनिवृत्तिः / Quelling the Fire of the Third Eye (Vāḍava Fire Placed in the Ocean)
इस अध्याय में नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि शिव के तृतीय नेत्र से निकली प्रचण्ड अग्नि-शक्ति का क्या हुआ और इसका तात्पर्य क्या है। ब्रह्मा बताते हैं कि शिव द्वारा कामदेव के भस्म होते ही तीनों लोकों में भय फैल गया; देवता और ऋषि शरण लेने ब्रह्मा के पास आए। ब्रह्मा शिव का स्मरण कर, उनके अनुग्रह से प्राप्त सामर्थ्य द्वारा उस लोक-विनाशक अग्नि को शांत व स्थिर करते हैं और वाडव/वडवा अग्नि-रूप उस तेज को लोकहित के लिए समुद्र में स्थापित कर देते हैं। सागर (सिन्धु) पुरुषरूप धारण कर ब्रह्मा का आदरपूर्वक स्वागत करता है। शिक्षा यह है कि विनाशकारी तप-तेज भी विधिपूर्वक उचित स्थान पर स्थापित होकर नियंत्रित हो जाए तो जगत की रक्षा करता है।
कामदाहोत्तरवृत्तान्तः / Aftermath of Kāma’s Burning (Pārvatī’s Fear and Himavān’s Consolation)
इस अध्याय में नारद और ब्रह्मा के प्रश्न–उत्तर के रूप में कामदाह के बाद की कथा आती है। नारद पूछते हैं कि शिव के तृतीय नेत्र की अग्नि से स्मर (कामदेव) भस्म होकर समुद्र में प्रविष्ट हुआ, तब उसके बाद पार्वती ने क्या किया, सखियों सहित कहाँ गईं और आगे क्या हुआ। ब्रह्मा बताते हैं कि काम के दग्ध होते ही आकाश में एक अत्यन्त अद्भुत, विशाल नाद गूँज उठा, जो शिव के तेजस्वी, अतिमानवी कृत्य का तत्काल ब्रह्माण्डीय संकेत था। उस दृश्य और नाद से पार्वती भयभीत व व्याकुल हो उठीं और सखियों के साथ शीघ्र अपने गृह लौट आईं। वही नाद पर्वतराज हिमवान को भी चकित करता है; वे पुत्री का स्मरण कर व्यथित होकर उसे खोजने निकलते हैं। शम्भु के वियोग (या दूरी की अनुभूति) से रोती, विह्वल पार्वती को देखकर हिमवान उन्हें सांत्वना देते हैं, आँसू पोंछते हैं, ‘भय मत करो’ कहते हैं, गोद में बैठाकर महल में ले जाते हैं और उनकी घबराहट शांत करते हैं। आगे का प्रसंग कामदाहोत्तर भाव-प्रतिक्रिया, परिवार की मध्यस्थता और धर्ममर्यादा में पार्वती के संकल्प के स्थिर होने का संकेत देता है, जो अंततः शिव-संयोग की ओर ले जाता है।
गिरिजाया तपोऽनुज्ञा (Permission for Girijā’s Austerities)
इस अध्याय में पार्वती के तप का संकल्प सामाजिक और पारिवारिक अनुमति के साथ स्थापित होता है। देवमुनि के चले जाने पर पार्वती हर्षित होकर हर-प्राप्ति हेतु तप में मन लगाती हैं। उनकी सखियाँ जया-विजया मध्यस्थ बनकर पहले हिमवान के पास जाती हैं, विनयपूर्वक पार्वती की इच्छा बताती हैं और कहती हैं कि तप द्वारा शिव-साधना ही कुल के भाग्य की सिद्धि है। हिमवान प्रसन्न होकर अनुमति देते हैं, साथ ही मेना की सहमति को आवश्यक बताते हैं और इसे वंश के लिए निश्चय ही मंगलकारी कहते हैं। फिर सखियाँ माता के पास जाकर अनुमति प्राप्त करने का प्रयत्न करती हैं। इस प्रकार वन-तप धर्मसम्मत, उद्देश्यपूर्ण साधना के रूप में प्रतिष्ठित होता है और आगे की तैयारी व वनगमन की भूमिका बनती है।
पार्वत्याः तपः—हिमालयादिभिः उपदेशः / Pārvatī’s Austerity and Counsel from Himālaya and Others
इस अध्याय में ब्रह्मा पार्वती के शिव-प्राप्ति हेतु दीर्घ तप का वर्णन करते हैं। शिव का प्रत्यक्ष दर्शन न होने पर भी पार्वती सखियों सहित परमार्थ-निश्चय से तप को और कठोर करती हैं। तब हिमालय परिवार सहित आकर उन्हें रोकता है—अति तप से शरीर क्षीण होगा, रुद्र दिखाई नहीं देते, वे विरक्त हैं; घर लौट आओ। वह कामदहन का स्मरण कराकर शिव की दुर्लभता बताता है और चन्द्रमा की तरह आकाश में अगोचर होने का दृष्टान्त देता है। फिर मेना तथा सह्याद्रि, मेरु, मन्दर, मैनाक, क्रौञ्च आदि पर्वतराज भी विविध तर्कों से गिरिजा को विरत करने का प्रयास करते हैं। अध्याय का केंद्र लौकिक सलाह और अडिग आध्यात्मिक संकल्प का संघर्ष है, जो आगे दैवी प्रत्युत्तर की भूमिका बनाता है।
देवस्तुतिः—नन्दिकेश्वरविज्ञप्तिः—शम्भोः समाधेः उत्थानम् (Devas’ Hymn, Nandikeśvara’s Petition, and Śiva’s Rising from Samādhi)
इस अध्याय में देवगण रुद्र/शिव की एकाग्र स्तुति करते हैं—त्रिनेत्र और मदनान्तक आदि नामों से—उन्हें जगत्पिता, परम शरण और दुःखहर्ता बताते हैं। फिर करुणामय नन्दिकेश्वर देवताओं की पीड़ा निवेदित करते हैं कि वे असुरों से पराजित होकर अपमानित हुए हैं, अतः दीनबन्धु और भक्तवत्सल शम्भु उनकी रक्षा करें। शम्भु गहन ध्यान-समाधि में स्थित थे; वे धीरे-धीरे नेत्र खोलकर उपस्थित देवों से उनके आगमन का कारण पूछते हैं। अध्याय स्तुति, अधिकृत मध्यस्थ की प्रार्थना और भगवान की कृपालु प्रतिक्रिया की क्रमबद्ध लीला दिखाता है।
गिरिजातपः-परीक्षा तथा सप्तर्षि-आह्वानम् (Girijā’s Austerity-Test and the Summoning of the Seven Sages)
इस अध्याय में नारद पूछते हैं कि ब्रह्मा-विष्णु आदि देवताओं और ऋषियों के लौट जाने के बाद शम्भु ने वर देने हेतु क्या किया, किस प्रकार और कितने समय में। ब्रह्मा बताते हैं कि देवगण अपने-अपने धाम चले गए, तब भव ने गिरिजा के तप की परीक्षा के लिए समाधि धारण की; शिव का स्वरूप स्वात्मनिष्ठ, परात्पर, निरविघ्न होते हुए भी ईश्वर, वृषभध्वज, हर रूप में प्रकट बताया गया है। फिर गिरिजा के अत्यन्त कठोर तप का वर्णन आता है, जिसे देखकर रुद्र भी विस्मित होते हैं; समाधिस्थ होकर भी शिव ‘भक्ताधीन’ हैं। वे मन से वसिष्ठ आदि सप्तर्षियों का आह्वान करते हैं; स्मरण मात्र से वे उपस्थित होकर महेशान की भावपूर्ण स्तुति करते और स्मरण किए जाने पर कृतज्ञता प्रकट करते हैं। आगे तप-परीक्षा, ऋषियों की विधि-धर्मगत मध्यस्थता तथा वर-प्रदान की प्रक्रिया और शर्तें संकेतित हैं।
पार्वत्याः तपः-परीक्षा (Śiva Tests Pārvatī’s Austerity)
इस अध्याय में ऋषियों के चले जाने के बाद देवी पार्वती के तप की औपचारिक परीक्षा आरम्भ होती है। शंकर स्वयं उनके तपोबल और संकल्प की दृढ़ता जाँचने हेतु छद्म धारण कर तेजस्वी वृद्ध ब्राह्मण/जटिल तपस्वी का रूप लेते हैं, दण्ड और छत्र सहित, जिनके तेज से वन प्रकाशित हो उठता है। वे उस स्थान पर आते हैं जहाँ पार्वती वेदी पर शुद्ध होकर बैठी हैं, सखियों से घिरी, चन्द्रकला-सी शांत और दीप्तिमती। पार्वती अतिथि का पूर्ण सत्कार कर अर्घ्यादि देकर आदरपूर्वक परिचय पूछती हैं। छद्मवेशी शिव स्वयं को लोकहितकारी भ्रमणशील तपस्वी बताकर पार्वती से उनके कुल और इतने कठोर तप का प्रयोजन पूछते हैं, ताकि अधिकारपूर्ण वाणी से चुनौती देकर उनके उद्देश्य, विवेक और भक्ति की अचलता की परीक्षा हो सके।
सत्यप्रतिज्ञा-तपःसंवादः (Pārvatī’s Vow of Truth and the Dialogue on Her Tapas)
अध्याय 27 में पार्वती एक द्विज/जटिल तपस्वी से कहती हैं कि वह अपना पूरा वृत्तांत बिना किसी विचलन के सत्यपूर्वक सुनाएँगी। वह मन, वाणी और कर्म—तीनों स्तरों पर सत्य का आग्रह करती हैं और शंकर-प्राप्ति की कठिनता जानते हुए भी अपना दृढ़ संकल्प प्रकट करती हैं। ब्रह्मा के कथन-प्रसंग में, पार्वती की बात सुनकर वह ब्राह्मण जिज्ञासा करता है कि देवी घोर तप से क्या सिद्ध करना चाहती हैं और पहले जाने का संकेत देता है; तब पार्वती उसे रुककर हितकर वचन कहने का अनुरोध करती हैं। द्विज सहमत होकर कहता है कि यदि वह भक्ति से सुनने को तैयार हैं तो वह तत्त्व का उद्घाटन करेगा। यह अध्याय पार्वती की सत्यनिष्ठा, तपोनिष्ठा और संकल्प को स्थापित कर आगे के उपदेश—आकांक्षा के स्वरूप और मार्गदर्शित शिक्षा से समझ (वयुन) के उदय—की ओर सेतु बनता है।
पार्वतीवाक्यं—शिवस्य परब्रह्मत्व-निरूपणम् (Pārvatī’s Discourse: Establishing Śiva as Parabrahman)
अध्याय 28 में पार्वती एक विचित्र वेशधारी आगन्तुक के सामने दृढ़ता से कहती हैं कि अब वे स्थिति को भली-भाँति समझ चुकी हैं और विरोधी वचनों या कुतर्क से भ्रमित नहीं होंगी। फिर वे संक्षेप में सिद्धान्त स्थापित करती हैं—शिव मूलतः निर्गुण परब्रह्म हैं, पर कार्य-कारण की उपाधि से सगुण रूप में प्रकट होते हैं; इसलिए जन्म, आयु, सीमा आदि मानवीय श्रेणियाँ उन पर लागू नहीं होतीं। पार्वती सदाशिव को समस्त विद्याओं का नित्य आधार बताकर ‘शिव को सीखने की आवश्यकता’ की कल्पना को असंगत ठहराती हैं। वेद शिव के ही ‘निःश्वास’ के समान सृष्टि के आरम्भ में प्रकट हुए—ऐसा कहकर वेद-प्रामाण्य को पुष्ट करती हैं और आद्य सत्ता को काल-मान से नापने का निषेध करती हैं। अंत में वे कहती हैं कि जो शंकर को शक्ति-स्वामी मानकर भक्ति से पूजते हैं, उन्हें स्थायी सामर्थ्य—अक्सर त्रिशक्ति के रूप में—प्राप्त होता है; भक्ति केवल बौद्धिक सहमति नहीं, दिव्य शक्ति में सहभागिता है।
पार्वतीप्रार्थना—हिमवत्पार्श्वे भिक्षुरूपेण याचनम् | Pārvatī’s Request: Śiva to Seek Her in Beggar-Form at Himālaya’s Court
अध्याय 29 में नारद–ब्रह्मा संवाद आगे बढ़ता है। नारद के पूछने पर ब्रह्मा बताते हैं कि पार्वती के वचनों के बाद क्या हुआ। हर प्रसन्न होकर पार्वती की स्नेहपूर्ण आज्ञा स्वीकार करते हैं। पार्वती उन्हें अपना स्वामी मानकर दक्ष-यज्ञ के विध्वंस का प्रसंग और तारकासुर से पीड़ित देवताओं की व्यथा स्मरण कराती हैं। वे करुणा से उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना करती हैं, पर धर्म और लोक-रीति के अनुसार सार्वजनिक विधि चाहती हैं—पिता के घर जाने की अनुमति मांगती हैं और कहती हैं कि आप हिमवत के पास भिक्षु-वेष में आकर लीला से विधिवत मेरा हाथ मांगें। अध्याय धर्मसम्मति, यश और तपस्वी-स्वरूप का गृहस्थ-विवाह से समन्वय दिखाकर दिव्य विवाह की सार्वजनिक मान्यता की भूमिका बनाता है।
पार्वत्याः पितृगृहगमनं तथा मङ्गलस्वागतम् | Pārvatī’s Return to Her Father’s House and the Auspicious Welcome
अध्याय 30 नारद–ब्रह्मा संवाद में है। हरि के अपने धाम चले जाने के बाद नारद पूछते हैं कि ‘सर्व-मङ्गला’ पार्वती ने आगे क्या किया और कहाँ गईं। ब्रह्मा बताते हैं कि पार्वती ने गीत-नृत्य से (मेना सहित) सभा को मोहित कर, सखियों के साथ अपना उद्देश्य सिद्ध कर महादेव का स्मरण करते हुए पिता के घर प्रस्थान किया। उनके आगमन का समाचार सुनकर मेना और हिमाचल आनंदित होकर दिव्य वाहन से स्वागत हेतु निकले; पुरोहित, नगरवासी, मित्र और बंधु एकत्र हुए। मैनाक आदि भाई जयघोष करते हुए आगे बढ़े। राजमार्ग सजाया गया, मङ्गल-घट स्थापित हुआ, चंदन, अगरु, कस्तूरी, फल-शाखाओं आदि सुगंधित व मूल्यवान द्रव्यों से स्वागत की व्यवस्था हुई; ब्राह्मण, मुनि, स्त्रियाँ और नर्तकियाँ भी सम्मिलित हुईं। इस प्रकार पार्वती के गृह्य और दैवी लोक के बीच गमन को सार्वजनिक, विधिपूर्वक मङ्गलस्वागत के रूप में दिखाया गया है।
देवगुरुप्रेषणम् (Himālaya Mission of the Gods’ Preceptor / The Gods Send Their Guru)
अध्याय 31 में ब्रह्मा नारद से कहते हैं कि इन्द्र आदि देवों ने हिमालय और उसकी पुत्री पार्वती की शिव के प्रति अव्यभिचारिणी परा भक्ति को पहचान लिया। देव विचार करते हैं कि यदि हिमालय एकनिष्ठ भाव से कन्या को त्रिशूलधारी शिव को दे दे, तो उसे तुरंत दिव्य पद, शिवलोक की प्राप्ति और अंततः मोक्ष मिलेगा; और ‘रत्नगर्भा’ पृथ्वी के लिए हिमालय का जाना मानो अनन्त रत्नों के आधार के हटने जैसा बताया गया है। वे निश्चय करते हैं कि हिमालय स्थावरभाव छोड़कर दिव्य रूप धारण करेगा, कन्या को पिनाकधारी को अर्पित करेगा, महादेव के साथ सारूप्य, वर-भोग और अंत में मुक्ति पाएगा। फिर देव अपने गुरु के पास जाकर विनयपूर्वक निवेदन करते हैं कि वे हिमालय के निवास पर जाकर उनका प्रयोजन सिद्ध करें। योजना वाणी-आधारित और प्रतिकूल है—गुरु शिव की निन्दा करें, ताकि उलटे प्रभाव से हिमालय शीघ्र विवाह स्वीकार कर ले, क्योंकि दुर्गा शिव के अतिरिक्त किसी को वर नहीं मानती।
मेना-हिमालयसंवादः (Menā’s Counsel to Himālaya; Response to Slander of Śiva)
इस अध्याय में एक वैष्णव ब्राह्मण शम्भु (शिव) की निन्दा करता है। उसे सुनकर मेना अत्यन्त व्याकुल होकर हिमालय से कहती है कि शैव महर्षियों से पूछकर प्रमाण सहित सत्य जानो; पर निन्दा के आधार पर वह रुद्र को कन्या देने से भी इंकार करती है। उसका वचन व्रत-सा कठोर हो जाता है—वह विषपान, जल में कूदना, प्राणत्याग या वनगमन तक की धमकी देती है और रोती हुई भूमि पर गिर पड़ती है। उधर विरह से पीड़ित शम्भु सात ऋषियों का स्मरण करते हैं; वे कल्पवृक्ष-सम शीघ्र आ जाते हैं और अरुन्धती भी सिद्धि-स्वरूपा-सी उपस्थित होती है। उन तेजस्वी ऋषियों को देखकर हर जप रोककर सभा-परामर्श की ओर बढ़ते हैं; निन्दा से उपजा संकट, ऋषि-प्रमाण, गृहधर्म और परम सत्य का द्वन्द्व तथा देव-ऋषि-मध्यस्थता यहाँ प्रकट होती है।
शिवशिवयोर्जगत्पितृमातृत्व-प्रतिपादनं तथा मेनायाः विमोहः (Śiva–Śivā as Cosmic Father and Mother; Menā’s Delusion and the Sages’ Intervention)
अध्याय 33 में ऋषि हिमालय से कहते हैं कि वे अपनी पुत्री का दान शंकर को करें, क्योंकि शिव जगत्पिता और शिवा जगन्माता हैं; इसलिए यह विवाह केवल सामाजिक नहीं, तत्त्वगत है। वे कहते हैं कि इससे हिमालय का जन्म सार्थक होगा और संबंध-तर्क से वह जगद्गुरु के भी ‘गुरु’ समान पूज्य हो जाएगा। ब्रह्मा हिमालय का उत्तर सुनाते हैं—पहले उसने गिरिश की इच्छा के अनुसार स्वीकृति दे दी थी, पर एक वैष्णव-झुकाव वाले ब्राह्मण ने शिव के विषय में विपरीत बातें कहकर बुद्धि में उलटफेर कर दिया। इससे मेना ज्ञानभ्रष्ट हो गई; भिक्षु-योगी रूप में आए रुद्र को वर मानने से इंकार कर कोपागार में चली गई और उपदेश के बाद भी हठ पर अड़ी रही। हिमालय भी भ्रम में पड़कर ‘भिक्षुक-रूप’ महेश को कन्या देने में संकोच करता है और ऋषियों के बीच मौन हो जाता है। तब सप्तर्षि शिव की माया की स्तुति करते हुए अरुंधती को—जो विवेक और पतिव्रता धर्म में प्रसिद्ध है—मेनाऔर पार्वती के पास शीघ्र भेजते हैं, ताकि सही समझ लौटे और नियत विवाह संपन्न हो।
अनरण्य-वंशवर्णनम् तथा पिप्पलादस्य कामोत्पत्तिः (Genealogy of King Anaraṇya and Pippalāda’s arousal of desire)
वसिष्ठ मनु से चली राजवंश-परंपरा का वर्णन करते हुए राजा अनरण्य का परिचय देते हैं, जो सप्तद्वीपों के अधिपति और शम्भु के आदर्श भक्त हैं। वे भृगु को पुरोहित बनाकर अनेक यज्ञ करते हैं, पर इन्द्रपद का प्रस्ताव भी स्वीकार नहीं करते—इससे वैराग्य और शिव-भक्ति की महिमा प्रकट होती है। आगे राजा के अनेक पुत्र, एक अत्यन्त प्रिय कन्या (सुन्दरी/पद्मा) और अनेक सौभाग्यशालिनी रानियों का उल्लेख आता है। कन्या के यौवन में पहुँचने पर एक पत्र/संदेश भेजा जाता है। फिर कथा पिप्पलाद ऋषि पर आती है; आश्रम लौटते समय वे स्त्रियों के साथ रति-क्रीड़ा में लीन, कामशास्त्र-निपुण गन्धर्व को देखते हैं। उस दृश्य से तपस्वी के मन में भी काम जाग उठता है और विवाह/गृहस्थ-जीवन (दार-संग्रह) का विचार होने लगता है। अध्याय इन्द्रिय-दर्शन से तप में आने वाले विचलन और आगे होने वाले समाधान की भूमिका बाँधता है।
अनरण्यसुता–पिप्पलादचरितम् / The Episode of Anaraṇya’s Daughter and Sage Pippalāda
यह अध्याय संवादों की परम्परा में आगे बढ़ता है। नारद ब्रह्मा से अनरण्य-कथा के बाद, विवाह में दी गई पुत्री के प्रसंग का परिणाम पूछते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि गिरिवर/शैलेश ने वसिष्ठ से आदरपूर्वक पूछा—पिप्पलाद को पति रूप में पाकर अनरण्य की पुत्री ने आगे क्या किया। वसिष्ठ पिप्पलाद को वृद्ध, संयमी, विरक्त तपस्वी बताते हैं, जो वन-आश्रम में उसके साथ संतोष से रहते हैं; पत्नी भी लक्ष्मी की भाँति नारायण की सेवा जैसे, कर्म-मन-वचन से पूर्ण भक्ति से पति की सेवा करती है। फिर धर्म देवता माया से मार्ग में सुसज्जित वृषभ-रूप धारण कर प्रकट होते हैं, ताकि स्वर्णदी नदी में स्नान को जाती पत्नी के अंतर्भाव की परीक्षा लें; आगे के श्लोक इसी धर्म-परीक्षा और उसके निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं।
हिमालयस्य निर्णयः — शिवाय पार्वत्याः प्रदाने (Himālaya’s Resolution to Give Pārvatī to Śiva)
अध्याय 36 में वसिष्ठ के उपदेश के बाद हिमालय के राज्य में विचार-सभा होती है। ब्रह्मा बताते हैं कि हिमालय आश्चर्य से मेरु, सह्य, गंधमादन, मंदर, मैनाक, विंध्य आदि पर्वतराजों को बुलाकर पूछता है कि वसिष्ठ-वचन के अनुसार अब क्या करना चाहिए। पर्वतगण दृढ़ता से कहते हैं—अब संकोच व्यर्थ है; यह निर्णय उच्च उद्देश्य से निश्चित है। पार्वती देवकार्य के लिए प्रकट हुई हैं, अतः उन्हें शिव को ही अर्पित करना चाहिए, जो शिव-इच्छा के वहनकर्ता अवतारतुल्य हैं। यह निर्णय केवल पारिवारिक नहीं, धर्म और जगत्-व्यवस्था से प्रेरित है। यह सुनकर हिमालय अत्यन्त प्रसन्न होता है और गिरिजा के हृदय में भी अंतःआनन्द जागता है। फिर अरुंधती अनेक युक्तियों और इतिहासनिदर्शनों से मेना का संशय दूर करती हैं। मेना स्पष्ट बुद्धि होकर अरुंधती व अतिथियों का सत्कार करती है और शिव को पार्वती देने का निश्चय स्वीकार कर अगले वैवाहिक कर्मों हेतु गृह को तैयार करती है।
निमन्त्रण-पत्रिका-प्रेषणम् (Dispatch of the Invitation Letter) / Himālaya Sends the Wedding Invitation to Śiva
इस अध्याय में नारद ब्रह्मा से पूछते हैं कि सप्तर्षियों के चले जाने के बाद हिमवान् ने क्या किया। ब्रह्मा बताते हैं कि प्रसन्न और उदार हृदय हिमवान् ने मेरु आदि पर्वत-बन्धुओं को बुलाकर परामर्श किया। गुरु-आदेश और स्नेह से उन्होंने अपने पुरोहित गर्ग से शिव के लिए लग्न-पत्रिका/निमन्त्रण-पत्र लिखवाया। फिर शुभ सामग्री और उपहारों सहित दूतों को कैलास भेजा गया। दूत शिव के समीप पहुँचकर तिलक, नमस्कार और विधिवत् सत्कार के साथ पत्रिका अर्पित करते हैं; भगवान् शिव उन्हें विशेष सम्मान देते हैं। दूतों की सफलता से हिमालय आनंदित होता है और अनेक प्रदेशों में सम्बन्धियों व शुभचिन्तकों को निमन्त्रित कर दिव्य विवाह की तैयारी का विस्तार करता है। अध्याय में सत्कार-नीति, शुभ लग्न और निमन्त्रण-व्यवस्था का धर्मसम्मत क्रम दिखाया गया है।
हिमवतः सुमङ्गलोत्सव-नगररचना (Himavān’s Auspicious Festival Preparations and City Adornment)
अध्याय 38 में शैलेश्वर हिमवान् अपनी पुत्री के लिए अपने नगर में अत्यन्त शुभ महोत्सव की तैयारी करता है। मुख्य द्वार पर नन्दी की रक्षा-व्यवस्था होती है और उसके समान एक कृतिम प्रतिरूप भी स्थापित किया जाता है; दोनों स्फटिक-सा उज्ज्वल होकर द्वार की पवित्र शोभा बढ़ाते हैं। मार्गों का छिड़काव कर शुद्धि की जाती है, प्रत्येक द्वार को रमभा आदि सज्जा और मङ्गल-द्रव्यों से अलंकृत किया जाता है। प्रांगण में रमभा-स्तम्भ, वस्त्र-सूत्रबन्ध, नवपल्लव, मालती-मालाएँ और चमकते तोरण लगाए जाते हैं तथा चारों दिशाओं में मङ्गल-वस्तुएँ रखी जाती हैं। फिर हिमवान् विश्वकर्मा को बुलाकर विशाल मण्डप और सुन्दर वेदिकाएँ बनवाता है, जहाँ कृतिम स्थावर रचनाएँ जङ्गम-सी और जङ्गम वस्तुएँ स्थावर-सी प्रतीत होकर अद्भुतता उत्पन्न करती हैं। यह अध्याय शुद्ध मार्ग, सुरक्षित द्वार, दिशानुसार मङ्गल-स्थापन और केन्द्र-मण्डप सहित विधिवत् कर्मस्थल का मानचित्र प्रस्तुत करता है, जो गर्ग के मार्गदर्शन में प्रास्ताव-योग्य बनता है।
मङ्गलपत्रिकाग्रहणम् — Reception of the Auspicious Marriage Invitation
अध्याय 39 नारद–ब्रह्मा संवाद में है। नारद पूछते हैं कि मङ्गलपत्रिका (विवाह-निमंत्रण/स्वीकृति-पत्र) मिलने पर शशिमौलि शंकर ने क्या किया। ब्रह्मा बताते हैं—शिव आनंद से पत्रिका ग्रहण करते हैं, प्रसन्न होकर हँसते हैं और दूतों का सत्कार करते हैं, जिससे दिव्य होते हुए भी लौकिक मर्यादा का आदर्श दिखता है। वे पत्रिका को विधिवत पढ़वाकर नियमानुसार स्वीकार करते हैं और विवाह-स्वीकार को सार्वजनिक रूप से प्रकट करते हैं। दूतों से कहते हैं कि उनका कार्य सफल हुआ; वे विवाह में अवश्य उपस्थित रहें, क्योंकि उन्होंने विवाह स्वीकार कर लिया है। दूत प्रणाम व प्रदक्षिणा कर हर्षित होकर लौटते हैं और अपनी सफलता का घोष करते हैं। आरंभ में इस कथा-श्रवण को मङ्गलकारी व पाप-नाशक कहा गया है; शिव की लीला लोक-व्यवहार के साथ परात्परता का समन्वय करती है। आगे के श्लोक विवाह-तैयारियों की ओर बढ़ते हुए मङ्गल-शक्ति और शिव की कृपालु प्रभुता को उजागर करते हैं।
गणसमागमः (Śiva Summons the Gaṇas for the Great Festival)
इस अध्याय में ब्रह्मा शिव के महोत्सव हेतु गणों के समाह्वान का वर्णन करते हैं। शिव नन्दी और समस्त गणों को बुलाकर हिमाचलपुर की ओर चलने की आज्ञा देते हैं, स्वयं के साथ चलने को कहते हैं और कुछ गणों को पीछे व्यवस्था हेतु नियुक्त करते हैं। फिर शङ्खकर्ण, केकराक्ष, विकृत, विशाख, पारिजात, सर्वान्तक, विकृतानन, कपालाख्य, सन्दारक, कन्दुक, कुण्डक, विष्टम्भ, पिप्पल, सन्नादक आदि गणनायकों के नाम तथा उनकी कोटि, दशकोटि, सहस्रकोटि, कोटिकोटि जैसी विशाल सेनाएँ गिनाई जाती हैं। इस गणना और आदेश-प्रसंग से शिव की प्रभुता, गणों की सुव्यवस्था और महोत्सव का नादमय, यज्ञवत् वातावरण भक्ति-रूप में प्रकट होता है।
हिमालयगृहे नारदस्य आगमनम् तथा विश्वकर्मनिर्मितवैभववर्णनम् — Nārada’s Arrival at Himālaya’s Palace and the Description of Viśvakarman’s Marvels
इस अध्याय में ब्रह्मा शिव–पार्वती विवाह-प्रसंग से जुड़ी दूत-व्यवस्था का वर्णन करते हैं। शङ्करी की सम्मति लेकर हरि (विष्णु) पहले नारद को हिमालय के निवास पर भेजते हैं। नारद परमेश्वर को प्रणाम कर हिमाचल के गृह पहुँचते हैं। वहाँ विश्वकर्मा द्वारा रचित अद्भुत कृत्रिम वैभव दिखाई देता है—रत्नजटित मण्डप, स्वर्ण-कलशों से शोभित शिखर, दिव्य अलंकरण, सहस्र स्तम्भों का आधार और विलक्षण वेदिका। इस दृश्य से अभिभूत होकर नारद ‘पर्वतराज’ हिमवान से पूछते हैं कि क्या विष्णु-प्रमुख देव, ऋषि, सिद्ध आदि आ पहुँचे हैं और क्या वृषभारूढ़, गणों से घिरे महादेव विवाह हेतु आए हैं। हिमवान यथार्थ उत्तर देते हैं और आगे के पद्यों में विवाह-तैयारी, आगमन और मर्यादा का क्रम चलता है।
ईश्वरागमनं हिमवदादि-समागमश्च / The Arrival of Īśvara and the Assembly of Himālaya, Devas, and Mountains
इस अध्याय 42 में ईश्वर (शिव) का हिमालय के निकट आगमन और उसके बाद होने वाला भव्य समागम वर्णित है। ब्रह्मा कहते हैं कि शिव के आने का समाचार सुनकर हिमालय हर्षित हुआ, उसने पर्वतों और ब्राह्मणों को भेजकर दर्शन की व्यवस्था की और स्वयं भी भक्तिभाव से शीघ्र आगे बढ़ा। देवगण और पर्वत-समूह विशाल, सुव्यवस्थित, सेना-सदृश पंक्तियों में एकत्र हुए; सबमें परस्पर विस्मय और आनंद छा गया, मानो पूर्व-पश्चिम समुद्रों का मिलन हो। ईश्वर के सामने आते ही हिमालय ने वंदना का नेतृत्व किया और सभी पर्वतों व ब्राह्मणों ने सदाशिव को प्रणाम किया। फिर वृषभ पर विराजमान, शांत मुख, अलंकारों से विभूषित, दिव्य तेज से दीप्त, सूक्ष्म वस्त्रधारी, रत्न-मुकुटधारी, मंद स्मित और निर्मल प्रभा वाले शिव का सघन रूप-वर्णन आता है, जिससे दर्शन-प्रधान भक्ति, विनय और विश्व-समरसता का भाव स्थापित होता है।
मेना-शिवदर्शन-प्रस्थानम् | Menā’s Quest to Behold Śiva (Departure for Śiva’s Darśana)
अध्याय 43 में मेना यह निश्चय प्रकट करती है कि वह गिरिजा के स्वामी भगवान शिव का प्रत्यक्ष दर्शन करके जानना चाहती है कि किस शिव-स्वरूप के लिए इतना परम तप किया गया। ब्रह्मा कहते हैं कि अज्ञान और सीमित दृष्टि से प्रेरित होकर वह मुनि के साथ तुरंत चन्द्रशाला की ओर शिव-दर्शन हेतु चल पड़ती है। मेना के भीतर के अहंकार-गर्व को जानकर शिव अद्भुत लीला आरम्भ करते हैं और विष्णु से कहते हैं; ब्रह्मा भी तेजस्वी रूप में आकर स्तुत्य होते हैं। शिव विष्णु और ब्रह्मा को अलग-अलग गिरिद्वार की ओर जाने की आज्ञा देते हैं और स्वयं बाद में आने को कहते हैं। यह सुनकर विष्णु देवताओं को बुलाते हैं और सब उत्साह से प्रस्थान की तैयारी करते हैं। मेना को शिरोगृह/ऊपरी कक्ष में ऐसा दृश्य दिखाया जाता है जो हृदय में भ्रम और भाव-विक्षोभ उत्पन्न करे—मानो शिक्षा देने के लिए। समय आने पर मेना एक अत्यन्त शुभ, दीप्तिमान सेना-परिवार देखती है और उसकी ‘साधारण’ भव्यता से प्रसन्न हो जाती है। आगे सुन्दर गन्धर्व उत्तम वस्त्राभूषणों से सजे चलते हैं; फिर विविध वाहन, वाद्य, ध्वज और अप्सराओं के समूह—ऐसा दिव्य वैभव आगे की कथा में बाह्य मूल्यांकन की परीक्षा लेकर शिव के परात्पर स्वरूप को प्रकट करने की भूमिका बनता है।
मेनायाः क्रोध-विलापः — Menā’s Lament and Reproach (to the Sage)
अध्याय 44 में ब्रह्मा बताते हैं कि हिमवान की पत्नी और पार्वती की माता मेना कुछ क्षण संयत होकर फिर अत्यन्त व्याकुल हो उठती है। वह विलाप करती हुई ऋषि से तीखे शब्दों में शिकायत करती है कि शिव से पार्वती के विवाह के विषय में जो आश्वासन मिले थे, उनका फल उलटा निकला और आगे की घटनाएँ उसे छल-सी प्रतीत होती हैं। वह पार्वती के कठोर तप को ‘दुःखद फल’ देने वाला बताकर कुल-मान, घर की स्थिरता और अपने आश्रय की अनिश्चितता पर शोक करती है तथा उपदेश देने वाले मुनि पर विश्वासघात का आरोप-सा लगाती है। क्रोध में वह बेटी के निर्णय पर कटु रूपक देती है—सोना छोड़कर काँच लेना, चन्दन छोड़कर कीचड़ चुनना, हंस को जाने देकर कौआ पकड़ना—अर्थात मूल्य का उलट और त्रासद चयन। आगे का प्रसंग मातृ-शोक और सामाजिक भय को शिव–पार्वती के दिव्य प्रयोजन के सामने रखकर समाधान की भूमिका बनाता है।
शिवरूपदर्शनम् (Menā’s Vision of Śiva’s Divine Form)
अध्याय 45 में ब्रह्मा के वृत्तांत और नारद के प्रत्यक्ष वचन के माध्यम से प्रसंग चलता है। विष्णु के कहने पर देवकार्य की सिद्धि हेतु नारद शम्भु के पास जाकर नानाविध स्तोत्रों से उनकी स्तुति करते हैं। नारद के वचनों से प्रसन्न होकर शिव करुणामय, परम और दिव्य रूप का दर्शन कराते हैं। उस अनुपम दर्शन से हर्षित नारद मेना के पास लौटकर उसे शिव के अतुल रूप को देखने के लिए प्रेरित करते हैं। मेना आश्चर्य से भरकर स्वयं शिव की प्रभा और सौन्दर्य का साक्षात् दर्शन करती है—असंख्य सूर्यों के समान तेज, पूर्ण अंग, अद्भुत वस्त्र, अनेक आभूषण, शांत मुस्कान, उज्ज्वल वर्ण और मस्तक पर चन्द्रकला। इस प्रकार अध्याय में देवकार्य से लेकर स्तुति, कृपापूर्ण प्राकट्य, मेना तक दर्शन का संप्रेषण और मंगलमय रूप-वर्णन का क्रम बताया गया है।
महेश्वरागमनं तथा नीराजन-सत्कारवर्णनम् / The Arrival of Maheśvara and the Rite of Welcome (Nīrājana)
अध्याय 46 में हिमाचल के भवन में महेश्वर के शुभ आगमन का वर्णन है। शिव अपने गणों, देवों और मुनियों के साथ हर्षोल्लासपूर्ण, सार्वजनिक शोभायात्रा में आते हैं। गृहस्वामिनी मेना सत्कार की तैयारी हेतु भीतर जाती है। फिर सती/पार्वती ऋषियों और स्त्रियों के समूह के साथ नीराजन के लिए दीप-पात्र लेकर द्वार पर पहुँचती है। मेना शंकर को एकमुख, त्रिनेत्र, मंदहास, तेजोमय, रत्न-मुकुट व आभूषणों से विभूषित, हार-वस्त्र-चंदन-अगरु-कस्तूरी-कुंकुम से सुशोभित देखकर दर्शन और सत्कार के इस पावन मिलन का अनुभव करती है।
दुर्गोपवीत-रचना तथा शिवामलङ्कारोत्सवः | The Making of the Durgopavīta and Pārvatī’s Auspicious Adornment Festival
अध्याय 47 में पार्वती (शिवा) के शुभ संस्कार और उत्सव की विधि का वर्णन है। ब्रह्मा बताते हैं कि पर्वतराज हिमालय हर्षपूर्वक वेद-मंत्रों और शिव-मंत्रों सहित दुर्गोपवीत का निर्माण करवाते हैं, जिससे वैदिक आचार और शैव विधि का सुंदर संगम होता है। हिमालय के आग्रह पर विष्णु आदि देवता और ऋषिगण अंतःपुर में साक्षी बनकर उपस्थित होते हैं; श्रुति और भाव-आचार के अनुसार शुद्धि-आचरण संपन्न होता है। फिर पार्वती को शिव-प्रदत्त माने गए आभूषणों से अलंकृत किया जाता है; स्नान, सखियों व ब्राह्मण स्त्रियों द्वारा नीराजन, और नवीन, अप्रयुक्त वस्त्रों तथा कंचुकी, हार, स्वर्ण-कंगन आदि से सज्जा होती है। बाह्य वैभव के बीच भी पार्वती अंतर्मन से शिव का ध्यान करती रहती हैं। आगे दान, गीत-वाद्य और सामूहिक आनंद से उत्सव का विस्तार होकर सर्वत्र मंगल होता है।
गोत्र-प्रवर-प्रश्नः तथा तिथ्यादि-कीर्तनं (Gotra–Pravara Inquiry and Proclamation of Auspicious Time)
अध्याय 48 में विवाह-प्रसंग का विधिवत् क्रम आता है। गर्गाचार्य की प्रेरणा से हिमवान और मेना कन्यादान हेतु तैयार होते हैं; मेना आभूषणों से सजी, स्वर्ण-कलश लिए प्रकट होती है। हिमवान अपने पुरोहितों सहित वर का पाद्यादि सत्कार कर वस्त्र, चंदन और आभरणों से सम्मान करता है। फिर वह पंचांग-विद्या में निपुण ब्राह्मणों से तिथि आदि शुभ-लक्षणों की घोषणा कराने का अनुरोध करता है और वे हर्ष से बताते हैं। इसके बाद शम्भु की अंतःप्रेरणा से हिमाचल शिव से गोत्र, प्रवर, वंश, नाम, वेद और शाखा पूछता है; पर सर्वातीत शिव मौन हो जाते हैं, जिससे देव-ऋषि आदि विस्मित हो उठते हैं। तब शिव की प्रेरणा से वीणा-वादक ब्रह्मविद् नारद आगे आकर शिव की अगोत्र, अप्रवर, परात्पर स्थिति का रहस्य प्रकट करते हुए विवाह-विधि की मर्यादा भी बनाए रखते हैं।
अध्याय ४९ — विवाहानुष्ठाने ब्रह्मणः काममोहः (Brahmā’s Enchantment by Desire during the Wedding Rites)
शिव–पार्वती के विवाह-अनुष्ठान में ब्रह्मा विधि-कर्मों का वर्णन करते हैं। उनके आदेश से पुरोहित अग्नि स्थापित करते हैं; शिव ऋग्–यजुः–साम मंत्रों से होम करते हैं और मैनाक (काली का भ्राता) परंपरानुसार लाजाञ्जलि अर्पित करता है। फिर शिव और काली/पार्वती नियम तथा लोकाचार के अनुसार अग्नि की प्रदक्षिणा करते हैं। उसी समय शिव की माया से मोहित ब्रह्मा देवी के चरण/नख में चंद्रकला-सी अद्भुत शोभा देखकर काम से व्याकुल हो जाते हैं; बार-बार देखते हुए उनका संयम टूटता है और वीर्य भूमि पर गिर पड़ता है। लज्जित होकर वे उसे पैरों से रगड़कर ढँकने का प्रयास करते हैं। यह जानकर महादेव अत्यंत क्रुद्ध होकर ब्रह्मा को दंड देना चाहते हैं, जिससे समस्त प्राणियों में भय और हाहाकार फैल जाता है। अध्याय वैदिक विवाह-रीति के बीच काम, माया और शिव के अनुशासन-स्वरूप की गंभीरता दिखाता है।
वैवाहिकानुष्ठानसमापनं दानप्रशंसा च / Completion of Wedding Rites and Praise of Gifts (Dāna)
इस अध्याय में शिव–पार्वती के विवाह के बाद के कर्मकाण्ड का क्रम चलता है। ब्रह्मा नारद से कहते हैं कि शिव की आज्ञा से ऋषि-समाज के साथ शिरोऽभिषेक, मङ्गल-दर्शन, हृदयालम्बन तथा स्वस्तिपाठ महोत्सव सहित सम्पन्न हुए। द्विज आचार्यों के निर्देश पर शिव ने शिवा के मस्तक पर सिन्दूर लगाया; पार्वती दिव्य तेज से दमक उठीं और गिरिजा कहलायीं। पुरोहितों के कहने से दोनों को एक ही आसन पर बैठाया गया, जिससे दाम्पत्य-एकता और सार्वजनिक मङ्गल प्रकट हुआ। फिर अपने स्थान पर जाकर हर्षपूर्वक संस्रव-प्राशन का समापन-कर्म किया। विवाह-यज्ञ पूर्ण होने पर शिव ने लोक-कल्याण हेतु ब्रह्मा को पूर्णपात्र दिया और आचार्य व ब्राह्मणों को गोदान सहित सुवर्ण, रत्न आदि अनेक शुभ दान प्रदान किए। अंत में देवों और समस्त प्राणियों में जयध्वनि के साथ सार्वभौम आनन्द छा गया, मानो कर्म का जगत्-समर्थन हो गया।
कामभस्म-प्रार्थना: रत्याः शङ्करं प्रति विनयः / Rati’s Supplication to Śaṅkara regarding Kāma’s Ashes
अध्याय 51 शिव–पार्वती के विवाहोत्सव की शुभ पृष्ठभूमि में याचना और अनुग्रह का प्रसंग है। ब्रह्मा इसे अनुकूल समय बताकर रति को आगे बढ़ाते हैं। रति शंकर के सामने विधिवत् विलाप और तात्त्विक तर्क रखती है—(1) अपने धर्म और जीवन-यात्रा का आधार, (2) सर्वत्र उत्सव के बीच उसके अकेले शोक की असंगति, (3) त्रिलोकी में शिव की अद्वितीय सर्वशक्ति। वह भस्म हो चुके पति कामदेव के पुनर्स्थापन की स्पष्ट प्रार्थना करती है। कथा में करुणा, दया और शिव के स्ववचन-सत्य का पालन प्रमुख है, जिससे दयामय समाधान की अपेक्षा बनती है। अंत में रति काम-भस्म शंकर के समक्ष रखकर रोती है; यही भस्म आगे होने वाले पुनर्जीवन और काम के धर्मसम्मत पुनर्संयोजन का संकेत बनती है।
भोजन-आह्वान-प्रकरणम् — The Episode of Invitation and the Divine Feast
अध्याय 52 में श्रेष्ठ पर्वत हिमवान् महाभोज के लिए सुंदर भोजन-प्रांगण तैयार कराते हैं। वे शुद्धि, लेपन आदि करवाकर सुगंध और विविध मंगल वस्तुओं से सजावट करते हैं और देवताओं तथा अन्य दिव्य जनों को “अपने-अपने अधिपतियों सहित” आमंत्रित करते हैं। निमंत्रण सुनकर भगवान् (यहाँ अच्युत-रूप से निर्दिष्ट) देवों व सेवकों के साथ प्रसन्न होकर पधारते हैं। हिमवान् यथाविधि स्वागत कर उन्हें भवन में उचित आसनों पर बैठाते हैं और अनेक प्रकार के व्यंजन परोसते हैं। फिर विधिपूर्वक भोजन-घोषणा/अनुज्ञा होती है; तब सब देव पंक्तियों में बैठकर हर्षोल्लास से संवाद करते हुए भोजन करते हैं और सदाशिव को सर्वोच्च मान देते हैं। नन्दी, भृंगी, वीरभद्र आदि शिवगण तथा इन्द्र सहित लोकपालों की सहभागिता से आतिथ्य, मर्यादा और क्रम-प्रधानता द्वारा दैवी व्यवस्था प्रकट होती है।
गिरिराजस्य शिवनिमन्त्रणम् / The Mountain-King Invites Śiva (Hospitality to Śiva and the Devas)
इस अध्याय में विष्णु आदि देवता और ऋषि अपने-अपने नित्यकर्म पूर्ण करके गिरि की ओर प्रस्थान करते हैं। उधर गिरिराज (हिमालय) स्नान से शुद्ध होकर इष्टदेव की पूजा करता है, नगरवासियों व स्वजनों को साथ लेकर आनंदपूर्वक देवसमूह के स्वागत हेतु अपने निवास-स्थान पर जाता है। वह शम्भु/महेशान का विधिवत् सत्कार कर प्रार्थना करता है कि देवताओं सहित भगवान कुछ दिन उसके घर ठहरें। वह शिव-दर्शन की पावन और परिवर्तनकारी महिमा का गान कर अपने गृह को धन्य मानता है। देवता और ऋषि भी गिरिराज के पुण्य, यश और सद्गुणों की प्रशंसा करते हैं कि त्रिलोकी में उसके समान कोई नहीं, क्योंकि परब्रह्म महेशान भक्तों पर करुणा करके स्वयं उसके द्वार आए हैं। वे उसके रमणीय धाम, किए गए अनेक सत्कार और अद्भुत अन्न-भोग की सराहना करते हैं तथा संकेत देते हैं कि जहाँ देवी शिवाम्बिका का सान्निध्य हो वहाँ अभाव नहीं रहता, सब अर्पण पूर्ण और प्रचुर हो जाते हैं। इस प्रकार अतिथि-सत्कार को अनुष्ठानमय भक्ति बताकर शिव-शक्ति की उपस्थिति से गृह को पवित्र तीर्थ-स्थल के समान प्रतिष्ठित किया गया है।
पार्वत्याः यात्रासंस्कारः तथा पातिव्रत्योपदेशः / Preparations for Girijā’s Auspicious Journey and the Teaching on Pātivratya
अध्याय 54 में ब्रह्मा बताते हैं कि सप्तर्षि हिमगिरि से कहते हैं—अपनी पुत्री देवी गिरिजा के लिए उचित यात्रा/यात्रा-संस्कार की व्यवस्था करो। विरह की तीव्रता से हिमगिरि कुछ समय उदास होकर फिर धैर्य धारण कर सहमत हो जाते हैं। वे मेना को संदेश भेजते हैं; मेना हर्ष और शोक के मिश्र भाव से श्रुति और कुलाचार के अनुसार उत्सव व विधियाँ करती हैं और गिरिजा को उत्तम वस्त्र, आभूषण तथा राजोचित अलंकारों से सजाती हैं। तभी एक साध्वी द्विजपत्नी गिरिजा को पातिव्रत्य के परम व्रत का उपदेश देती है—धर्मवर्धक वचन प्रेम से सुनो, पातिव्रता स्त्री पूज्य है और पापसमूह का नाश करती है। जो स्त्री पति को परमेश्वर मानकर प्रेमपूर्वक सेवा करती है, वह लोक में समृद्धि पाती है और अंत में पति सहित शिवपद को प्राप्त होती है; इस प्रकार संस्कार और धर्मोपदेश से आगामी दिव्य-विवाह की भूमिका बनती है।
प्रस्थान-विरह-विलापः (Departure and Lament in Separation)
इस अध्याय में ब्रह्मा बताते हैं कि एक ब्राह्मणी देवी को एक विशेष व्रत का उपदेश देती है और मेना से कहकर देवी की यात्रा/प्रस्थान की व्यवस्था कराती है। सब लोग सहमति देते हैं, पर विरह होते ही अत्यन्त स्नेह से रोना, बार-बार आलिंगन और करुण विलाप होने लगता है। पार्वती का स्वयं का विलाप विशेष रूप से वर्णित है। शोक फैल जाता है—शैलपुत्री/शिवा और अन्य देवपत्नी मूर्छित होती हैं, सभी स्त्रियाँ रोती हैं, और योगीश्वर शिव भी दूर जाते हुए अश्रु बहाते बताए गए हैं। हिमालय अपने पुत्रों, मंत्रियों और श्रेष्ठ द्विजों सहित शीघ्र आता है, पार्वती को हृदय से लगाकर ‘कहाँ जा रही हो’ कहकर बार-बार पूछता और मोह-शोक से गिर पड़ता है। तब करुणामय, ज्ञानी पुरोहित अध्यात्म-विद्या से सबको समझाकर धैर्य देता है। पार्वती माता-पिता और गुरु को भक्ति से प्रणाम करती है, फिर भी महामाया होकर लोकाचार के अनुसार बार-बार रोती हुई दिखाई जाती है।