
Arbudha Khanda
This section is centered on Arbuda (commonly identified in Purāṇic sacred geography with the Arbuda mountain region, associated with the Aravalli range and the Mount Abu area). The landscape is treated as a tīrtha-field where mountains, cavities, rivers invoked through mantra, and hermitage zones become loci of purification narratives. The text frames Arbuda as notable for sin-removal (pāpa-praṇāśana) and as being described as relatively untouched by Kali-era defects through the theological agency attributed to Vasiṣṭha’s presence and austerity.
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Arbuda-Māhātmya Prastāvanā: Vasiṣṭha, Nandinī, and the Sanctification of Arbuda
प्रथम अध्याय में सूत शिव के प्रति मंगलाचरण करते हैं—वे सूक्ष्म, ज्ञान से ग्राह्य, शुद्ध और विश्वरूप हैं। सोम‑सूर्य वंशावलियाँ, मन्वंतर और सृष्टि‑भेद की कथाएँ सुनकर ऋषि ‘उत्तम तीर्थ‑माहात्म्य’ तथा पृथ्वी पर सबसे श्रेष्ठ पवित्र स्थलों के विषय में पूछते हैं। सूत कहते हैं कि तीर्थ असंख्य हैं; परंपरा में उनकी विशाल गणना मिलती है, और क्षेत्र‑नदी‑पर्वत‑सरिताएँ ऋषियों के तप से परम माहात्म्य को प्राप्त होती हैं। इसी संदर्भ में अर्बुद पर्वत को विशेष रूप से पाप‑नाशक बताया गया है—वसिष्ठ के तेज से वह कलि‑दोष से अछूता है; केवल दर्शन से भी पवित्र करता है और सामान्य स्नान‑दान आदि कर्मों से बढ़कर फल देता है। ऋषि उसके प्रमाण, स्थान, वसिष्ठ‑माहात्म्य से उसकी कीर्ति का कारण और वहाँ के प्रधान तीर्थ पूछते हैं। सूत आगे सुनाई हुई शुद्धिकथा आरंभ करते हैं—ब्रह्मवंश के देवरषि वसिष्ठ नियमित आहार और ऋतु‑अनुशासन सहित कठोर तप करते हैं। उनकी प्रसिद्ध कामधेनु‑सदृश गौ नंदिनी चरते‑चरते गहरे अंधेरे गर्त में गिर जाती है; नित्य होम में उसके उपयोग के कारण वसिष्ठ चिंतित होकर खोजते हैं, गर्त पाते हैं और उसका करुण रुदन सुनते हैं। नंदिनी की प्रार्थना पर वे त्रिलोकी‑पावनी सरस्वती का ध्यान करते हैं; सरस्वती प्रकट होकर गर्त को निर्मल जल से भर देती हैं और नंदिनी बाहर निकल आती है। गर्त की अपार गहराई देखकर वसिष्ठ उसे पर्वत लाकर भरने का उपाय सोचते हैं, हिमवान के पास जाकर उपयुक्त पर्वत‑खंड माँगते हैं; हिमवान उनका सत्कार कर गर्त का माप पूछते हैं, वसिष्ठ माप बताते हैं, और हिमवान यह जानने को उत्सुक होते हैं कि इतना विशाल विवर बना कैसे—यहीं से आगे की कथा का सूत्र पड़ता है।

Uttanka’s Guru-sevā, the Recovery of the Kuṇḍalas, and the Takṣaka Episode (उत्तंक-गुरुसेवा-कुण्डल-प्राप्ति-तक्षक-प्रसङ्गः)
वसिष्ठ एक प्राचीन प्रसंग सुनाते हैं—महर्षि गौतम के अनेक शिष्य थे, पर उत्तंक नामक एक शिष्य अत्यन्त निष्ठावान था और समय बीतने पर भी गुरु-सेवा में लगा रहा। गुरु के भेजने पर वह एक ऐसा संकेत देखता है जिससे गृहधर्म की उपेक्षा और वंश-परम्परा की चिंता उत्पन्न होती है। यह बात गौतम को बताने पर वे उसे पत्नी सहित गृह्यकर्म करने की आज्ञा देते हैं और आगे कोई दक्षिणा लेने से भी मना कर देते हैं। पर उत्तंक मूर्त गुरु-दक्षिणा देना चाहता था। वह गुरु-पत्नी अहल्या के पास जाता है। अहल्या उसे आदेश देती हैं कि वह राजा सौदास से रानी मदयन्ती के रत्नजटित कुण्डल निश्चित समय-सीमा में ले आए। सौदास उसे खाने की धमकी देता है, फिर भी मांगने की अनुमति देता है; मदयन्ती राज-मुद्रा को प्रमाण मानकर कुण्डल देती हैं और चेतावनी देती हैं कि तक्षक नाग उन्हें छीनना चाहता है। लौटते समय उत्तंक राजा के ब्राह्मणों को प्रसन्न/अप्रसन्न करने के फल संबंधी गूढ़ वचन सुनता है और राजा अपने पूर्व शाप तथा उसके निवृत्त होने का कारण बताता है। मार्ग में तक्षक कुण्डल चुरा लेता है। उत्तंक पीछा करते हुए पाताल-लोक तक पहुँचता है; इन्द्र की सहायता और दिव्य अश्व/अग्नि-प्रतीक के द्वारा वह धुआँ-आग उत्पन्न करता है, जिससे नाग विवश होकर कुण्डल लौटा देते हैं। उत्तंक समय पर अहल्या को कुण्डल सौंपकर उनके शाप से बच जाता है। अध्याय के अंत में कहा गया है कि तक्षक और उत्तंक के कारण एक ‘विवर’ (छिद्र/खुलाव) उत्पन्न हुआ; और गो-रक्षा हेतु गड्ढा भरने जैसी व्यवहारिक आज्ञा के साथ यह कथा भूमि-स्मृति और कर्तव्य से जुड़ जाती है।

अर्बुदेन विवरप्रपूरणं तथा नागतीर्थमाहात्म्यम् (Arbuda Fills the Chasm and the Glory of Nāga Tīrtha)
सूता जी कहते हैं—हिमालय वसिष्ठ से पूछते हैं कि भयंकर विवर (गहरी खाई) को कैसे भरा जाए। इन्द्र द्वारा प्राचीन काल में पर्वतों के पंख काट दिए जाने से वे उड़ नहीं सकते, इसलिए व्यावहारिक उपाय चाहिए। वसिष्ठ हिमालय के पुत्र नन्दिवर्धन और उसके निकट मित्र, शीघ्र ऊपर उठने में समर्थ शक्तिशाली नाग अर्बुद का प्रस्ताव करते हैं। नन्दिवर्धन पहले मना करता है—प्रदेश कठोर है और समाजिक दृष्टि से असुरक्षित भी; तब वसिष्ठ आश्वासन देते हैं कि उनके पावन सान्निध्य से वहाँ नदियाँ, तीर्थ, देवता, शुभ वनस्पति और जीव-जन्तु प्रतिष्ठित होंगे तथा महेश्वर का भी आगमन होगा। अर्बुद यह शर्त रखता है कि स्थान उसके नाम से प्रसिद्ध हो; फिर वह आदेशानुसार विवर को भर देता/मुक्त कर देता है और वसिष्ठ प्रसन्न होते हैं। वरदान में अर्बुद मांगता है कि शिखर पर निर्मल झरना/स्रोत ‘नागतीर्थ’ के नाम से विख्यात हो, वहाँ स्नान से उच्च लोक-प्राप्ति हो; स्त्रियों को सन्तान-लाभ का फल भी कहा गया है। साथ ही नाभस मास की शुक्ल पंचमी का पूजन, माघ-स्नान, तिल-दान और पंचमी-श्राद्ध की विधि बताई गई है। वसिष्ठ सब स्वीकार कर आश्रम स्थापित करते हैं, तप से गोमती धारा प्रकट करते हैं और फलश्रुति कहते हैं—भारी पापी भी वहाँ स्नान से उत्तम गति पाते हैं; वसिष्ठ-मुख-दर्शन पुनर्जन्म से मुक्ति का कारण है, और अरुन्धती विशेष वन्दनीय हैं।

Acaleśvara-liṅga Prādurbhāva and Vasiṣṭha’s Śiva-stotra (अचलेश्वरलिङ्गप्रादुर्भावः वसिष्ठशिवस्तोत्रम्)
सूत कहते हैं कि भगवान वसिष्ठ ने अर्बुदाचल पर आश्रम स्थापित करके शम्भु के सान्निध्य हेतु कठोर तप किया। उन्होंने क्रमशः फलाहार, पर्णाहार, जलाहार और वायु-आहार का व्रत अपनाया तथा दीर्घकाल तक ऋतु-नियम निभाए—ग्रीष्म में पंचाग्नि, शीत में जल में निमज्जन, और वर्षा में खुले आकाश के नीचे निवास। इस तप से प्रसन्न होकर महादेव ने पर्वत को विदीर्ण किया और वसिष्ठ के सामने एक दिव्य लिङ्ग प्रकट हुआ। वसिष्ठ ने सुव्यवस्थित शिव-स्तोत्र से शिव की शुद्धता, सर्वव्यापकता, त्रिविध स्वरूप-प्रतिभा, अष्टमूर्ति और ज्ञानस्वभाव का स्तवन किया। आकाशवाणी ने वर माँगने को कहा; वसिष्ठ ने पूर्व-व्रत के आधार पर उसी लिङ्ग में भगवान का नित्य सान्निध्य माँगा। शिव ने निरंतर सान्निध्य प्रदान किया और कहा कि इस स्तोत्र का पाठ—विशेषतः नियत तिथि-व्रत में—तीर्थ-फल के समान पुण्य देता है। कथा में मन्दाकिनी नदी को देवकार्य हेतु भेजी हुई पवित्र धारा बताया गया और उत्तर दिशा में एक कुण्ड का माहात्म्य कहा गया, जहाँ स्नान और लिङ्ग-दर्शन से जरा-मरण से परे परम पद मिलता है। यह लिङ्ग ‘अचलेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुआ और प्रलय तक अचल रहने की घोषणा हुई; तत्पश्चात ऋषि और देवताओं ने उस क्षेत्र में अन्य तीर्थ और निवास-स्थल स्थापित किए।

Nāga-tīrtha Māhātmya (Glory of Nāga-tīrtha at Arbuda)
यह अध्याय संवाद-रूप में है। ऋषि अर्बुद पर्वत की महिमा विस्तार से पूछते हैं; सूत पूर्व प्रसंग सुनाते हैं कि राजा ययाति ने मुनि पुलस्त्य से अर्बुद, वहाँ के तीर्थ-क्रम और फलों के विषय में प्रश्न किया। पुलस्त्य अर्बुद को धर्म-समृद्ध महान क्षेत्र बताकर संक्षेप में वर्णन आरम्भ करते हैं और पहले ‘नाग-तीर्थ’ की महिमा कहते हैं—यह अभीष्ट फल देने वाला है, विशेषतः स्त्रियों को संतान और सौभाग्य प्रदान करता है। फिर गौतमी नाम की पतिव्रता ब्राह्मण-विधवा, जो तीर्थयात्रा में रत थी, अर्बुद आकर नाग-तीर्थ में स्नान करती है। एक स्त्री को पुत्र सहित देखकर उसके मन में पुत्र-इच्छा जागती है; जल से निकलते ही वह बिना संग के गर्भवती हो जाती है। लज्जा से वह आत्महत्या का विचार करती है, तभी आकाशवाणी उसे रोककर बताती है कि यह तीर्थ-प्रभाव है—जल में किया गया संकल्प पूर्ण होता है। गौतमी वहीं रहती है और शुभ-लक्षणों वाले पुत्र को जन्म देती है। अंत में फलश्रुति है—वहाँ किया गया श्राद्ध वंश-परंपरा की रक्षा करता है; निष्काम स्नान और श्राद्ध से स्थायी लोक प्राप्त होते हैं। स्त्रियाँ पुष्प-फल अर्पित करें तो संतान और सौभाग्य पाती हैं; नियमपूर्वक तीर्थ-यात्रा करने की प्रशंसा की गई है।

Vasiṣṭhāśrama–Kuṇḍa Māhātmya (वसिष्ठाश्रम-कुण्ड-माहात्म्य) — Ritual Merits of Darśana, Snāna, Śrāddha, Dīpa-dāna, and Upavāsa
पुलस्त्य राजा से कहते हैं कि तपोनिधि वसिष्ठ के आश्रम में जाओ; उनके केवल दर्शन से ही मनोकामना पूर्ण होती है। वहाँ जल से भरा एक कुण्ड है जो पाप का नाश करता है; कहा गया है कि गोमती नदी को वसिष्ठ ने तपोबल से वहाँ प्रकट कराया। उस जल में स्नान करने से मनुष्य पापकर्मों से मुक्त होता है। फिर श्राद्ध-विषय आता है—ऋषिधान्य से किया गया श्राद्ध दोनों पक्षों में सभी पितरों का उद्धार करता है। नारद-गीत की गाथा द्वारा बताया गया है कि अन्य प्रसिद्ध श्राद्ध-स्थल और यज्ञ भी वसिष्ठाश्रम में किए श्राद्ध के समान नहीं हैं। अरुंधती को विशेष पूजनीय और इच्छित फल देने वाली कहा गया है। वसिष्ठ के सामने दीपदान करने से ऐश्वर्य और तेज मिलता है। एक रात का उपवास सप्तर्षि-लोक, तीन रात का उपवास महर्लोक, और एक मास का उपवास मोक्ष तथा संसार-बन्धन से मुक्ति देता है। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को ऋषि का तर्पण ब्रह्मलोक देता है; आठ सौ गायत्री-जप से जन्म-मरण के पापों से तत्काल छुटकारा मिलता है; वामदेव-पूजन से अग्निष्टोम यज्ञ के समान फल होता है। अंत में शुद्धि और श्रद्धा से वसिष्ठ-दर्शन तथा वामदेव-पूजन का पूर्ण प्रयत्न करने की प्रेरणा दी गई है।

अचलेश्वरप्रदक्षिणामाहात्म्य (Acaleśvara Pradakṣiṇā-Māhātmya) — Chapter 7
पुलस्त्य अचलेश्वर-तीर्थ की यात्रा-विधि बताते हैं और कहते हैं कि श्रद्धा सहित दर्शन करने मात्र से भी साधक को आध्यात्मिक सिद्धि मिलती है। वे कर्मों के फल गिनाते हैं—कृष्ण चतुर्दशी (तथा आश्विन और फाल्गुन में) किया गया श्राद्ध परम गति देता है; दक्षिणाभिमुख होकर पुष्प, पत्र और फल से पूजन करने पर अश्वमेध-यज्ञ के समान फल मिलता है; पंचामृत-तर्पण से शिवलोक की प्राप्ति और देव-सामीप्य होता है; तथा प्रदक्षिणा का प्रत्येक चरण पापों का नाश करता है। फिर पुलस्त्य नारद से स्वर्ग में सुनी एक अद्भुत कथा कहते हैं—एक अभक्त तोता अपने घोंसले के चारों ओर स्वभाववश बार-बार घूमता रहा; मृत्यु के बाद वह जन्म-स्मृति सहित राजा वेणु बना। प्रदक्षिणा के कारण-बल को समझकर वेणु अचलेश्वर में प्रायः केवल प्रदक्षिणा में ही लग गया। नारद आदि ऋषि उसके सामान्य अर्पण-उपचारों की उपेक्षा पर प्रश्न करते हैं; वेणु पूर्वजन्म का कारण बताकर तीर्थ की कृपा पर अपना भरोसा प्रकट करता है। ऋषि इस उपदेश की पुष्टि करते हैं, स्वयं भी प्रदक्षिणा अपनाते हैं, और वेणु अंततः शम्भु की अनुकम्पा से दुर्लभ, स्थायी पद को प्राप्त होता है।

भद्रकर्णह्रद-त्रिनेत्रलिङ्गमाहात्म्यम् (The Māhātmya of Bhadrakarṇa Lake and the Trinetra Liṅga)
पुलस्त्य ऋषि राजा से प्रभास-खण्ड में स्थित भद्रकर्ण महाह्रद का माहात्म्य कहते हैं। इस पवित्र सरोवर में अनेक शिलाएँ ‘त्रिनेत्र’ के समान प्रतीत होती हैं। इसके पश्चिम में भगवान शिव का लिङ्ग है, जिसके दर्शन से भक्त ‘त्रिनेत्र-सदृश’ होकर शिव-दृष्टि के भाव से युक्त माना जाता है। कथा के अनुसार शिवप्रिय गण भद्रकर्ण ने इस लिङ्ग की स्थापना की और सरोवर का निर्माण किया। आगे दानवों के साथ युद्ध में गण-सेना पराजित होने लगी; तब नामुचि नामक बलवान दानव शिव के सम्मुख आक्रमण करने आया। भद्रकर्ण ने उसका सामना कर उसे निर्णायक रूप से मार गिराया। गिरा हुआ दानव अन्धकार में चला गया, पर शिव को पहचानकर सत्य में स्थित हुआ, जिससे शिव प्रसन्न हुए। शिव ने भद्रकर्ण को वर दिया कि वह लिङ्ग और सरोवर में सदा सान्निध्य पाएगा, और विशेषतः माघ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को यह प्रभाव अत्यन्त बढ़ जाएगा। अन्त में विधान है कि जो भद्रकर्ण सरोवर में स्नान कर त्रिनेत्रलिङ्ग की पूजा करता है, वह शिव के शाश्वत धाम को प्राप्त होता है; अतः भक्तों को वहाँ निरन्तर प्रयत्नपूर्वक स्नान-पूजन करना चाहिए।

केदारतीर्थमाहात्म्यं तथा शिवरात्रिजागरकथनम् (Kedāra Tīrtha Māhātmya and the Śivarātri Night-Vigil Narrative)
पुलस्त्य केदार को त्रिलोकी-विख्यात, पापहरण करने वाला तीर्थ बताते हैं, जहाँ मन्दाकिनी का सरस्वती से पावन सम्बन्ध माना गया है। फिर एक “प्राचीन इतिहास” आता है—अजपाल नामक राजा प्रजापालक, अत्यधिक कर न लेने वाला और अपराध-रहित (काँटों से रहित) राज्य चलाने वाला था। तीर्थयात्रा के प्रसंग में वसिष्ठ के आगमन पर वह उनसे अपने वैभव, प्रजासुख और पतिव्रता पत्नी के पुण्य-कारण को पूछता है। वसिष्ठ पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं—अजपाल और उसकी पत्नी शूद्र-योनि में थे, दुर्भिक्ष से पीड़ित होकर भटकते हुए कमलों से भरे जल-स्थान पर पहुँचे; स्नान-पान करके उन्होंने मन से पितरों और देवताओं का तर्पण किया। भोजन हेतु वे कमल बेचने निकले, पर अभाव के कारण कोई खरीदने को तैयार न हुआ। दिन ढलने पर केदार के शिवालय के पास वेद-पुराण का पाठ सुना और नागवती नामक वेश्या को शिवरात्रि-जागरण करते देखा। व्रत का माहात्म्य जानकर दम्पती ने कमल शिव को अर्पित कर दिए, पूजा की, भूख के कारण उपवास हो गया, रात्रि-जागरण और पुराण-श्रवण एकाग्र मन से किया। मृत्यु के बाद (पत्नी के स्वदाह का वर्णन सहित) वे राजकुल में पुनर्जन्म लेते हैं; अजपाल का आदर्श राज्य केदार की कृपा से माना गया है। अध्याय के अंत में शिवरात्रि का काल बताया गया है—माघ और फाल्गुन के बीच कृष्ण चतुर्दशी। केदार में यात्रा, जागरण और पूजन के विधान तथा फलश्रुति दी गई है—श्रवण से पाप-नाश, दर्शन-स्नान और केदार-कुण्ड का जल पीने से मोक्षाभिमुख फल, तथा पितरों तक को लाभ।

Yuga-māna and Kali-yuga Refuge of Tīrthas at Arbuda; Maṅkaṇaka–Maheśvara Discourse (युगमान-वर्णनम्, अर्बुदे तीर्थ-निवासः, मंकणक-महेश्वर-संवादः)
इस अध्याय में राजा ययाति पुलस्त्य से पूछते हैं कि अर्बुद-प्रदेश में केदार तथा गंगा और सरस्वती जैसी महान नदियों का सान्निध्य कैसे है—यह ‘कौतुक’ (अद्भुत पवित्र रहस्य) क्या है। पुलस्त्य उत्तर को देव-ऋषियों की ब्रह्मसभा के प्रसंग से जोड़ते हैं, जहाँ इन्द्र युगों के मान और उनके धर्म-लक्षणों का क्रमबद्ध वर्णन चाहते हैं। ब्रह्मा कृत, त्रेता, द्वापर और कलि की अवधि बताते हैं और समझाते हैं कि धर्म चार पादों से घटकर कलि में एक पाद रह जाता है; आचार, यज्ञ और सामाजिक मर्यादाएँ भी कलि में क्षीण होती जाती हैं। तब तीर्थ स्वयं व्यक्त होकर पूछते हैं कि कलियुग में उनकी शक्ति कैसे टिकेगी। ब्रह्मा अर्बुद पर्वत को ऐसा स्थान बताते हैं जहाँ कलि का प्रभाव नहीं चलता, और तीर्थों को वहीं निवास करने का आदेश देते हैं ताकि उनकी प्रभावशीलता बनी रहे। आगे मङ्कणक तपस्वी की कथा आती है—वह देह में उत्पन्न एक चिह्न को सिद्धि मानकर नाचता है और जगत-व्यवस्था में विक्षोभ कर देता है; तब शिव प्रकट होकर अंगूठे से भस्म उत्पन्न कर अपनी श्रेष्ठ शक्ति दिखाते हैं और उसे वर देते हैं। शिव सरस्वती-स्नान, गंगा–सरस्वती संगम पर श्राद्ध, तथा यथाशक्ति सुवर्ण-दान के मोक्षोन्मुख और पाप-नाशक फल बताते हैं; इस प्रकार अध्याय समय-चक्र, धर्म-पतन, तीर्थ-भूगोल और कर्म-उपदेश के माध्यम से अर्बुद की चिर-तीर्थता स्थापित करता है।

Koṭīśvara-liṅga-prādurbhāvaḥ (Origin and Merit of Koṭīśvara)
पुलस्त्य ऋषि राजा को कोटीश्वर के प्रादुर्भाव और महिमा का वर्णन करते हैं। दक्षिण दिशा के अनेक मुनि अर्बुद पर्वत पर आते हैं और अचलेश्वर के दर्शन में पहले होने की स्पर्धा करते हैं; तब यह नीति-वचन कहा जाता है कि जो ब्राह्मण देर से आए और भक्ति-श्रद्धा से रहित हो, वह अधोगति को प्राप्त होता है। यह सुनकर मुनि संयमी, व्रतपरायण और वेदविद्या में निपुण शांत तपस्वी बन जाते हैं। उनकी भक्ति देखकर करुणामय शिव एक ही समय में ‘कोटि’ आत्म-लिंगों के रूप में प्रकट होते हैं, ताकि प्रत्येक मुनि उसी क्षण अलग-अलग दर्शन कर सके। मुनि वैदिक स्तुतियों से शिव की प्रशंसा करते हैं; शिव वर मांगने को कहते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि सामूहिक, एकसाथ हुए दर्शन का फल सर्वोत्तम हो और कोटि लिंगों के पुण्य को धारण करने वाला एक ही लिंग प्रकट हो। पर्वत फटकर एक लिंग प्रकट होता है; आकाशवाणी उसे ‘कोटीश्वर’ नाम देती है और माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पूजन का विधान बताती है। कहा जाता है कि यहाँ पूजन से कोटिगुण फल मिलता है और यहाँ किया गया श्राद्ध—विशेषकर दक्षिण देश के व्यक्ति द्वारा—गया-श्राद्ध के समान फलदायक है। मुनि गंध, धूप और लेपन से पूजन कर शिवकृपा से सिद्धि प्राप्त करते हैं।

रूपतीर्थमाहात्म्य (Glory of Rūpatīrtha)
पुलस्त्य श्रोता को रूपतीर्थ का महात्म्य बताते हैं—यह परम स्नान-स्थल पापों का नाश करता है और सौंदर्य व शुभ रूप प्रदान करता है। स्थानीय कथा में एक आभीरि (ग्वालिन) स्त्री, जो पहले विकृत देह वाली थी, माघ शुक्ल तृतीया को पर्वत-प्रपात में गिरती है और तीर्थ-प्रभाव से दिव्य सौंदर्य तथा शुभ लक्षणों से युक्त होकर बाहर निकलती है। क्रीड़ा हेतु आए इन्द्र उससे मोहित होकर संवाद करते हैं; वह तिथि बताकर वर माँगती है कि उस दिन श्रद्धा से यहाँ स्नान करने वाला स्त्री-पुरुष सभी देवताओं को प्रसन्न करेगा और दुर्लभ रूप-लावण्य पाएगा। इन्द्र वर देते हैं और उसे दिव्य लोक ले जाते हैं; वह आगे चलकर ‘वपु’ नाम की अप्सरा कहलाती है। इसके बाद अध्याय आसपास के सूक्ष्म तीर्थों का वर्णन करता है—पूर्व में एक सुंदर गुहा जहाँ पाताल की कन्याएँ स्नान करती हैं; वैनायक-पीठ जिसका जल सिद्धि और रक्षा देता है; तिलक-वृक्ष जिसके पुष्प-फल से अभीष्ट सिद्धि कही गई है; तथा पत्थरों और जल के रूप-परिवर्तनकारी गुण। फलश्रुति में वंध्यत्व, रोग, ग्रह-दोष, अशुभ प्रभाव और हानिकारक बाधाओं के निवारण का उल्लेख है। ययाति कारण पूछते हैं; पुलस्त्य बताते हैं कि अदिति के तप, इन्द्र के राज्य-संकट में प्रपात में शिशु विष्णु (त्रिविक्रम) के गुप्त पालन, और अदिति द्वारा तिलक-वृक्ष के पोषण से इस तीर्थ की विशेष पवित्रता बढ़ी। अंत में श्रद्धापूर्वक स्नान का आग्रह करते हुए इसे इस लोक और परलोक में कामना-पूर्ति करने वाला बताया गया है।

हृषीकेश-तीर्थे अम्बरीषोपाख्यानम् | The Ambarīṣa Narrative at Hṛṣīkeśa Tīrtha
पुलस्त्य ऋषि राज-श्रोता को ईशान दिशा में स्थित त्रिलोकरूप से प्रसिद्ध, पाप-नाशक हृषीकेश तीर्थ का निर्देश देते हैं, जो अम्बरीष से जुड़ा माना गया है। कृतयुग में राजा अम्बरीष ने क्रमशः कठोर तप किया—नियत आहार, पत्तों का सेवन, केवल जल पर निर्वाह और प्राण-नियमन—जिससे भगवान विष्णु प्रसन्न हुए। सबसे पहले इन्द्र प्रकट होकर वर देने और अपना प्रभुत्व जताने लगते हैं, पर अम्बरीष सांसारिक वरों को अस्वीकार करते हुए कहते हैं कि इन्द्र मोक्ष नहीं दे सकते। इन्द्र के क्रोध और हिंसा-धमकी से जगत में विक्षोभ होता है; अम्बरीष समाधि में स्थित हो जाते हैं। तब विष्णु प्रकट होकर (गरुड़ की महिमा सहित) वर देते हैं और संसार-क्षय हेतु ज्ञानयोग तथा कलियुग के लिए उपयुक्त क्रियायोग का उपदेश करते हैं। अम्बरीष अपने आश्रम में भगवान की नित्य उपस्थिति के लिए प्रतिमा-स्थापन की प्रार्थना करते हैं; मंदिर की स्थापना होती है और कलियुग में भी विष्णु की सतत सन्निधि घोषित होती है। फलश्रुति में हृषीकेश-दर्शन और चातुर्मास्य-व्रत को अनेक दान, यज्ञ और तप से श्रेष्ठ बताया गया है; कार्तिक शुक्ल एकादशी को पुष्पार्पण, अभिषेक, झाड़ू/मार्जन, दीप-प्रज्वलन, पंचामृत-पूजा जैसे छोटे कर्म भी मुक्ति-उन्मुख और पुण्यवर्धक कहे गए हैं।

Siddheśvara-liṅga Māhātmya (Glory of the Siddheśvara Liṅga)
पुलस्त्य ऋषि राजश्रोता को सिद्धेश्वर नामक परम शिवलिंग की महिमा सुनाते हैं, जिसे प्राचीन काल में एक सिद्ध पुरुष ने स्थापित किया था। विश्वावसु नामक सिद्ध क्रोध, अहंकार और इन्द्रियों पर विजय पाकर भक्तिभाव से कठोर तप करता है; वृषभध्वज शिव प्रसन्न होकर उसे प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। शिव वर मांगने को कहते हैं। विश्वावसु प्रार्थना करता है कि जो भी इस लिंग का मन से भी स्मरण-चिन्तन करे, वह शिवकृपा से अपने अभीष्ट फल प्राप्त करे। शिव ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्धान हो जाते हैं और अनेक लोग सिद्धेश्वर के पास जाकर सिद्धि प्राप्त करते हैं। इस प्रभाव से इच्छित फल सहज मिलने लगे तो यज्ञ-दान जैसे धर्मकर्म घटने लगते हैं, जिससे देवता चिंतित होते हैं। इन्द्र वज्र से आच्छादन कर सिद्धि-प्राप्ति रोकना चाहता है, पर सिद्धेश के सान्निध्य से फिर भी सिद्धि होती है और पाप क्षीण होते हैं। सोमवार को शुक्ल या कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पड़े तो उस दिन स्पर्श करने वाला ‘सिद्ध’ कहलाता है। अध्याय अंत में तीर्थयात्रा, श्रद्धा-पूजन और निरंतर प्रभाव का स्मरण कराते हुए सद्गति की प्राप्ति बताता है।

Śukreśvara-Pratiṣṭhā and the Life-Restoring Vidyā (शुक्रेश्वरप्रतिष्ठा तथा संजीवनीविद्या)
पुलस्त्य मुनि राजा से कहते हैं कि भृगुवंशी शुक्राचार्य ने देवताओं के हाथों दैत्यों की पराजय देखकर उनके पुनः बलवर्धन का उपाय सोचा और शंकर की उपासना से सिद्धि पाने का निश्चय किया। वे अर्बुद पर्वत पर गए, एक गुहा-सदृश द्वार पाकर कठोर तप करने लगे; शिवलिंग की प्रतिष्ठा कर धूप, गंध और लेपन आदि से निरंतर पूजा करते रहे। हजार वर्ष पूर्ण होने पर भगवान शिव प्रकट हुए, शुक्र की भक्ति की प्रशंसा की और वर माँगने को कहा। शुक्र ने ऐसी विद्या माँगी जिससे मृत प्राणी भी जीवित हो सकें; शिव ने संजीवनी विद्या प्रदान की और फिर एक और वर देने को कहा। तब शुक्र ने विधान स्थापित किया कि कार्तिक शुक्ल अष्टमी को जो श्रद्धा से उस लिंग का स्पर्श कर पूजा करेगा, वह मृत्यु के सूक्ष्म भय से भी मुक्त होगा और इस लोक तथा परलोक में इच्छित फल पाएगा। शिव के अंतर्धान होने पर शुक्र ने उसी विद्या से युद्ध में मारे गए अनेक दैत्यों को पुनर्जीवित किया। कथा के अंत में बताया गया है कि उस स्थान के सामने एक शुद्ध, पाप-नाशक महाकुंड है; वहाँ स्नान से पाप नष्ट होते हैं, वहाँ श्राद्ध करने से पितर तृप्त होते हैं, और साधारण तर्पण भी फलदायी है—इसलिए वहाँ स्नान का यत्न अवश्य करना चाहिए।

मणिकर्णिका-तीर्थ-माहात्म्य (Maṇikarṇikā Tīrtha Māhātmya)
पुलस्त्य ऋषि राजश्रोता को उपदेश देते हैं कि वह सर्वप्रसिद्ध, पाप-नाशक मणिकर्णिका तीर्थ में जाए। पर्वत की गुहा-सी जगह में वालखिल्य मुनियों ने एक सुंदर कुण्ड बनाया है। वहीं सूर्यग्रहण के मध्याह्न में प्यास से पीड़ित किरात स्त्री मणिकर्णिका—जो रूप से काली और भयानक कही गई है—जल में उतरती है और तीर्थ-प्रभाव से मुनियों के सामने देवताओं को भी दुर्लभ, दिव्य-सुंदरी रूप में प्रकट होती है। उसका पति रोते हुए बच्चे के कारण व्याकुल होकर उसे खोजता हुआ आता है। मुनियों के कहने पर वह बच्चे सहित स्नान करने जल में उतरता है; पर ग्रहण-मोक्ष होते ही वह फिर विकृत हो जाता है, शोक से उसी जल-स्थल में प्राण त्याग देता है। पतिव्रता मणिकर्णिका चिता में प्रवेश का संकल्प करती है; मुनि पूछते हैं कि दिव्य रूप पाने पर भी वह पापी/विकृत पति का साथ क्यों दे रही है। वह पतिव्रता-धर्म का सिद्धान्त कहती है—स्त्री के लिए पति ही तीनों लोकों में एकमात्र आश्रय है, चाहे वह सुंदर हो या कुरूप, धनी हो या निर्धन; और वह बच्चे को मुनियों के संरक्षण में सौंप देती है। करुणावश मुनि पति को पुनर्जीवित कर शुभ लक्षणों से युक्त योग्य रूप प्रदान करते हैं। दिव्य विमान आता है और दम्पति पुत्र सहित स्वर्ग को जाते हैं। वर पाकर मणिकर्णिका चाहती है कि वहाँ का महालिङ्ग उसके नाम से प्रसिद्ध हो; मुनि तीर्थ की कीर्ति ‘मणिकर्णिका’ के रूप में स्थिर करते हैं। अंत में फलश्रुति है—सूर्यग्रहण में स्नान-दान का फल कुरुक्षेत्र के समान है; एकाग्र होकर स्नान करने से इच्छित सिद्धि मिलती है; इसलिए यत्न से स्नान, सामर्थ्य अनुसार दान और देव-ऋषि-पितरों का तर्पण करना चाहिए।

पंगुतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Pangu-tīrtha Māhātmya: The Glory of Pangu Tirtha)
इस अध्याय में पुलस्त्य मुनि पङ्गु-तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जिसे सर्व-पातक-नाशक और अत्यन्त पावन कहा गया है। च्यवन-वंश में जन्मा पङ्गु नामक ब्राह्मण चलने में असमर्थ था; घर के लोग अपने-अपने कामों में लगकर उसे उपेक्षित छोड़ देते, जिससे वह दुःखी हो उठता। वह अरबुदाचल पहुँचकर एक सरोवर के निकट कठोर तप करता है, शिवलिङ्ग की स्थापना करके गन्ध, पुष्प, नैवेद्य आदि से नियमपूर्वक श्रद्धा-भक्ति से पूजन करता है। आगे वह वायु-आहार, जप और होम के द्वारा दीर्घकाल तक तपस्या करता रहता है। तप से प्रसन्न होकर महादेव साक्षात् प्रकट होकर वर देते हैं। पङ्गु प्रार्थना करता है कि यह तीर्थ उसके नाम से प्रसिद्ध हो, यहीं शिव-कृपा से उसकी लंगड़ाहट दूर हो, और शिव पार्वती सहित यहाँ निरन्तर विराजमान रहें। ईश्वर वर प्रदान कर चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को विशेष रूप से अपनी उपस्थिति का आश्वासन देते हैं। फल यह है कि स्नान मात्र से पङ्गु को दिव्य देह मिलती है, और उस तिथि को स्नान करने वाले यात्री लंगड़ापन से मुक्त होकर शुभ, परिवर्तित स्वरूप प्राप्त करते हैं।

यमतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Yama-tīrtha
पुलस्त्य राजाओं से कहते हैं कि वे यम-तीर्थ जाएँ। यह तीर्थ अनुपम है—नरक-स्थित प्राणियों को भी मुक्त करता है और समस्त पापों का नाश करता है। उदाहरण के रूप में चित्रांगद नामक राजा का प्रसंग आता है। वह अत्यन्त लोभी, हिंसक, देवों और ब्राह्मणों पर अत्याचार करने वाला, चोरी और परस्त्रीगमन में लिप्त, सत्य-शौच से रहित तथा कपट और ईर्ष्या से प्रेरित था। वह अर्बुद पर्वत पर शिकार करते हुए प्यास से व्याकुल होकर एक जलाशय में उतरा; वहाँ ग्राह (मगर) ने उसे पकड़ लिया और उसकी मृत्यु हो गई। यमदूत उसे घोर नरकों में डालते हैं, पर यम-तीर्थ में मृत्यु-संबंध के कारण उन नरकों के जीवों को भी अनपेक्षित शांति मिलने लगती है। दूत यह अद्भुत बात धर्मराज को बताते हैं। यमराज समझाते हैं कि पृथ्वी पर अर्बुदाचल के पास उनका प्रिय तीर्थ है, जहाँ उन्होंने तप किया था; उस सर्वपापहारी तीर्थ में जो मरते हैं, उन्हें शीघ्र छोड़ देना चाहिए। यम की आज्ञा से राजा मुक्त होकर अप्सराओं के साथ स्वर्ग को प्राप्त होता है। अंत में फलश्रुति है—जो भक्तिपूर्वक वहाँ स्नान करता है, वह जरा-मरण से रहित परम पद पाता है। विशेषतः चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को पूर्ण प्रयत्न से स्नान और वहीं विधिपूर्वक श्राद्ध करने से पितरों को दीर्घकाल तक स्वर्गवास मिलता है।

वाराहतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (The Glory of Varāha Tīrtha)
पुलस्त्य ऋषि राजा को हरि-प्रिय, पाप-नाशक वाराहतीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं। वाराहावतार की कथा में भगवान विष्णु पृथ्वी को उठाकर आश्वस्त करते हैं; फिर पृथ्वी देवी वराह-रूप में उसी तीर्थ पर निवास करने का वर मांगती हैं। भगवान समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु आर्बुद पर्वत पर उसी रूप में रहने की स्वीकृति देते हैं। देव के सम्मुख स्थित पवित्र सरोवर में माघ मास, शुक्ल पक्ष, एकादशी को श्रद्धा-भक्ति से स्नान का विशेष विधान बताया गया है, जो ब्रह्महत्या जैसे महापापों से भी मुक्ति देने वाला कहा गया है। साथ ही वहाँ श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से पितरों को दीर्घकाल तक तृप्ति प्राप्त होती है। अंत में दान-धर्म, विशेषतः गोदान, अत्यन्त प्रशंसित बताया गया है, जिससे दीर्घ स्वर्गवास मिलता है। स्नान, व्रत, तर्पण, पिण्डदान और दान—इन सबके संयुक्त आचरण से अपने पितरों सहित विष्णु-सालोक्य की प्राप्ति कही गई है।

चन्द्रक्षय-शाप-निवारणं तथा प्रभासतীर्थमाहात्म्यम् | Candra’s Curse, Remediation, and the Māhātmya of Prabhāsa Tīrtha
पुलस्त्य ऋषि इस प्रसंग में चन्द्र के घटने-बढ़ने का कारण और प्रभास-तीर्थ की पवित्रता बताते हैं। दक्ष की सत्ताईस कन्याएँ—अश्विनी आदि नक्षत्र-स्वरूप—चन्द्र से ब्याही जाती हैं, पर चन्द्र रोहिणी के प्रति पक्षपात करके अन्य पत्नियों की उपेक्षा करता है। कन्याएँ पिता से शिकायत करती हैं; दक्ष चन्द्र को सबके प्रति समान रहने की सीख देता है। चन्द्र वचन देकर भी फिर वही करता है, तब क्रुद्ध दक्ष उसे यक्ष्मा से क्षय होने का शाप दे देता है। क्षीण होता चन्द्र शिव-भक्ति में शरण लेता है। वह अर्बुद में क्रोध-संयम सहित तप करता, जप-होम करता हुआ शिव को प्रसन्न करता है। शिव दर्शन देकर कहते हैं कि दक्ष का शाप पूरी तरह मिट नहीं सकता, पर नियमबद्ध हो सकता है—चन्द्र को सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करना होगा; इसी से कृष्ण पक्ष में क्षय और शुक्ल पक्ष में वृद्धि होगी। फिर चन्द्र तीर्थ-फल पूछता है: प्रभास में सोमव्रत/सोमवार स्नान, विशेषकर सोमयोग में, उच्च गति देता है; यहाँ श्राद्ध और पिण्डदान से पितरों को गायाश्राद्ध के समान पुण्य मिलता है। शिव इस स्थान को ‘प्रभास-तीर्थ’ नाम से प्रतिष्ठित करते हैं और चन्द्र पुनः दक्ष-कन्याओं के प्रति समभाव से रहने लगता है।

पिण्डोदकतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Piṇḍodaka Tīrtha)
पुलस्त्य ऋषि पिण्डोदक तीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं। पिण्डोदक नामक एक ब्राह्मण मंदबुद्धि था; गुरु के उपदेश के बाद भी वह अध्ययन पूरा न कर सका। अपमान और ग्लानि से भरकर उसमें तीव्र वैराग्य जागा और वह पर्वत की गुफा में जा बैठा; उसे लगा कि उसके भीतर वाणी और विद्या का उदय नहीं होता, इसलिए वह मृत्यु चाहता है। एकांत में देवी सरस्वती प्रकट होकर उसके दुःख का कारण पूछती हैं। वह गुरु से तिरस्कृत होने की पीड़ा और अपनी असमर्थता बताता है। देवी स्वयं को उस शुभ पर्वत पर निवास करने वाली बताकर वर देने का वचन देती हैं और समय-विशेष बताती हैं—त्रयोदशी की संध्या/रात्रि-प्रारंभ (निशामुख)। पिण्डोदक सर्वज्ञता और यह भी मांगता है कि तीर्थ उसके नाम से प्रसिद्ध हो। देवी दोनों वर देती हैं और कहती हैं कि उस समय वहाँ स्नान करने से मंदबुद्धि व्यक्ति भी सर्वज्ञता प्राप्त करेगा; वे वहाँ सदा उपस्थित रहेंगी। फिर देवी अंतर्धान हो जाती हैं; पिण्डोदक सर्वज्ञ होकर घर लौटता है, लोगों को विस्मित करता है और इस प्रकार तीर्थ की महिमा सर्वत्र प्रसिद्ध हो जाती है।

Śrīmātā-Āvirbhāva, Deva-Stuti, and the Pādukā-Pratiṣṭhā at Arbudācala (श्रीमाता-आविर्भावः, देवस्तुतिः, पादुकाप्रतिष्ठा)
पुलस्त्य ययाति को श्रीमाता का माहात्म्य सुनाते हैं। श्रीमाता परम शक्ति हैं—सर्वव्यापी, साक्षात् अरबुदाचल पर निवास करने वाली, और लोक-परलोक दोनों के पुरुषार्थ देने वाली। इसी समय दैत्यराज कलिंग (आगे चलकर बाष्कलि नाम से भी कहा गया) तीनों लोकों पर अधिकार कर देवताओं को उनके स्थान से हटा देता है और यज्ञभाग छीन लेता है। देवता अरबुद पर्वत पर जाकर कठोर तप करते हैं—विविध व्रत, उपवास, पंचाग्नि साधना, जप-होम और ध्यान द्वारा—और देवी से धर्म-स्थापन की प्रार्थना करते हैं। दीर्घ काल के बाद देवी क्रमशः अनेक रूपों में प्रकट होकर अंत में कन्या-रूप में दर्शन देती हैं। देवगण स्तुति करके उन्हें विश्व-कार्य की अधिष्ठात्री, गुणस्वरूपा तथा लक्ष्मी, पार्वती, सावित्री, गायत्री आदि के रूपों से युक्त बताते हैं। देवी वर देती हैं, पर यह भी कहती हैं कि देव और असुर दोनों उनकी ही सृष्टि हैं; इसलिए वे मर्यादित उपाय अपनाती हैं—दूत भेजकर दैत्य को स्वर्ग छोड़ने की आज्ञा देती हैं। दैत्य का अहंकार बढ़कर देवी के प्रति अनुचित प्रस्ताव तक पहुँचता है; तब देवी अपने तेज से भयंकर सेना उत्पन्न कर उसकी सेनाओं का संहार कर देती हैं। पूर्व वरदान से दैत्य को अचल/अमर कहा गया था, इसलिए देवी उसे पूर्णतः न मारकर अपनी पादुकाएँ स्थापित करके उसे बाँध देती हैं और रक्षक-व्यवस्था की प्रतिष्ठा करती हैं। वे अरबुद में विशेषतः चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को सन्निधि का वचन देती हैं, जहाँ दर्शन और पादुका-पूजन से असाधारण पुण्य, मोक्षोपयोगी फल और पुनः बंधन से मुक्ति मिलती है। अंत में फलश्रुति है कि इस आख्यान का श्रद्धापूर्वक पाठ या स्तुति महापापों का नाश करती है और ज्ञानमय भक्ति को बढ़ाती है।

शुक्लतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Śukla Tīrtha)
पुलस्त्य ऋषि राजा को शुक्लतीर्थ की अनुपम महिमा सुनाते हैं। शमिलाक्ष नाम का एक रजक नील में रंगे वस्त्र बिगड़ जाने से भयभीत हो जाता है और परिवार सहित भागने का विचार करता है। उसकी दुखी बेटी एक दाश-कन्या (मछुआरा-समुदाय की लड़की) से मन की बात कहती है। वह उपाय बताती है कि अर्बुद में एक निर्झर है, जिसके जल में डाली हुई वस्तुएँ शुक्ल (सफेद) हो जाती हैं; मछुआरे और उसके भाई इस जल के प्रभाव को जानते हैं। रजक वहाँ जाकर वस्त्र धोता है; वे तुरंत उज्ज्वल श्वेत और चमकीले हो जाते हैं, और भय का कारण मिट जाता है। वह यह घटना राजा को बताता है। राजा भी अन्य रंगे कपड़े जल में डालकर वही परिवर्तन देखता है और विधिपूर्वक स्नान-आदि करता है। इसके बाद राजा राज्य त्यागकर उसी तीर्थ में तप करता है और तीर्थ-प्रभाव से श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त करता है। फलश्रुति में कहा है कि एकादशी को वहाँ श्राद्ध करने से कुल का उद्धार और स्वर्ग-प्राप्ति होती है, तथा वहाँ स्नान करने से तत्काल पाप-नाश होकर निष्पापता प्राप्त होती है।

कात्यायनीमाहात्म्यवर्णनम् (Kātyāyanī Māhātmya—Account of the Goddess’s Glory at Arbuda)
पुलस्त्य राजा को प्रभासखण्ड में अर्बुद पर्वत की उस पवित्र यात्रा का वर्णन करते हैं, जो एक गुहा तक ले जाती है जहाँ शुम्भ का संहार करने वाली देवी कात्यायनी साक्षात् विराजती हैं। शुम्भ नामक महाबली दैत्य को शंकर के वर से यह अभेद्यता मिली थी कि वह स्त्री के अतिरिक्त किसी से भी मारा न जा सके; इसी बल से उसने देवताओं को पराजित कर जगत पर अधिकार कर लिया। तब देवता अर्बुद पर जाकर तप करते हैं और देवी के प्रत्यक्ष रूप की आराधना कर शुम्भ-वध द्वारा धर्म-व्यवस्था की पुनर्स्थापना की प्रार्थना करते हैं। शुम्भ यह जानकर कि देवी स्त्री हैं, उनका तिरस्कार करता है और उन्हें पकड़ लाने को दैत्यों को भेजता है; देवी मात्र दृष्टि से उन्हें भस्म कर देती हैं। क्रोध में शुम्भ स्वयं तलवार लेकर आता है, पर वह भी उसी प्रकार दग्ध हो जाता है; शेष दैत्य पाताल में भाग जाते हैं। देवता देवी की स्तुति कर वर माँगते हैं; देवी कहती हैं कि वे अर्बुद पर ही निवास करेंगी, जिससे वह स्थान सदा देव-सुलभ बना रहे। यह शंका उठती है कि बिना यज्ञ-दान के भी स्वर्ग सुलभ न हो जाए; तब नियम बताया जाता है कि शुक्लाष्टमी को देवता वहाँ देवी के दर्शन करेंगे। फल यह है कि जो शुक्लाष्टमी को शांत चित्त से देवी के दर्शन करता है, वह कठिन से कठिन अभीष्ट भी प्राप्त कर लेता है।

पिंडारकतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Piṇḍāraka Tīrtha)
पुलस्त्य पिंडारक तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जो पापों का नाश करने वाला माना गया है। मंकी नामक एक सरल स्वभाव ब्राह्मण, जो आरंभ में ब्राह्मणोचित कर्मों में निपुण नहीं था, एक सुंदर पर्वत पर भैंस की रखवाली करते हुए धन कमाता है। बड़ी कठिनाई से वह एक छोटी जोड़ी बैल खरीदता है, पर अचानक ऊँट से जुड़ी घटना में बैलों की गर्दनें उलझ जाती हैं और वे नष्ट हो जाते हैं। इस उलटफेर से मंकी के भीतर वैराग्य जागता है; वह ग्राम-जीवन छोड़कर वन में चला जाता है और अर्बुद पर्वत के एक निर्झर (झरने) पर पहुँचता है। वहाँ वह त्रिकाल स्नान और निरंतर गायत्री-जप का कठोर अभ्यास करता है, जिससे शुद्ध होकर दिव्य-दर्शन प्राप्त करता है। उसी समय शंकर (शिव) गौरी सहित पर्वत पर विहार करते हुए वहाँ आते हैं और तपस्वी उन्हें देख लेता है। मंकी श्रद्धापूर्वक प्रणाम कर वर माँगता है—सांसारिक लाभ नहीं, बल्कि शिव के गण के रूप में स्थान और यह कि तीर्थ उसके नाम से ‘पिंडारक’ कहलाए। शिव वर देते हैं कि मृत्यु के बाद वह गण बनेगा, स्थान पिंडारक नाम से प्रसिद्ध होगा, और महाष्टमी के दिन शिव की विशेष उपस्थिति रहेगी। अष्टमी को स्नान करने वाले शिव के नित्य धाम को प्राप्त होते हैं। अध्याय मंत्र सहित स्नान-विधि और दान की महिमा बताता है—विशेषकर अष्टमी को भैंस-दान से इस लोक और परलोक में इच्छित फल मिलता है।

कनखलतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Kanakhala Tīrtha)
पुलस्त्य ऋषि राजा से पाप-नाशक पर्वत पर स्थित कनखल तीर्थ की महिमा कहते हैं। पहले सुमति नामक राजा सूर्यग्रहण के समय अरबुद गया और ब्राह्मणों को देने हेतु शुद्ध स्वर्ण ले गया। असावधानी से वह स्वर्ण जल में गिर गया; बहुत खोजने पर भी न मिला, तो वह पश्चात्ताप करता हुआ घर लौट आया और फिर दूसरे ग्रहण में स्नान के लिए उसी स्थान पर आया। वहाँ उसे एक अशरीरी वाणी सुनाई दी—इस तीर्थ में न इस लोक में हानि है, न परलोक में; गिरा हुआ स्वर्ण कोटि-गुणा होकर प्रकट होता है। पहले की भूल का पश्चात्ताप आगे होने वाले श्राद्ध और दान में “संख्या/परिमाण” के रूप में फल देता है। वाणी के कहने पर उसने खोज की और अत्यन्त उज्ज्वल, बहुत अधिक स्वर्ण पा लिया। तीर्थ-प्रभाव जानकर उसने ब्राह्मणों को बड़ा दान किया और उसे पितृदेवताओं के लिए समर्पित किया। उस दान के प्रभाव से वह धनद नामक यक्ष बना, जो अनेक प्रकार की संपदा देने वाला कहा गया है। अंत में विधान है—इस तीर्थ में सूर्यग्रहण पर किया गया श्राद्ध कल्प-पर्यन्त पितरों को तृप्त करता है; स्नान ऋषि, देव और महान नागों को प्रसन्न कर तत्काल पाप-नाश करता है। इसलिए यथाशक्ति स्नान, दान और श्राद्ध करना चाहिए।

चक्रतीर्थप्रभाववर्णनम् | Description of the Efficacy of Cakra Tīrtha
पुलस्त्य राजश्रोता से कहते हैं कि वह परम पवित्र चक्रतीर्थ में जाए। इस तीर्थ की पवित्रता का कारण एक प्राचीन कथा से बताया गया है—पूर्वकाल में प्रभुविष्णु ने दानवों का संहार करके वहीं अपना चक्र छोड़ा था। इसके बाद भगवान ने स्वच्छ झरने/निर्झर में स्नान कर जल को शुद्ध किया; उसी दिव्य स्पर्श से इस तीर्थ की विशेष मेध्यता मानी गई है। फिर विधि बताई गई है—हरि के शयन और बोधन के अवसरों पर जो यहाँ श्राद्ध करता है, उसके पितर कल्प-पर्यन्त तृप्त रहते हैं। अंत में यह भी कहा गया है कि यह प्रभासखण्ड के अंतर्गत अर्बुदखण्ड का सत्ताईसवाँ अध्याय है।

मानुष्यतीर्थप्रभाववर्णनम् | The Glory and Efficacy of Mānuṣya-Tīrtha
पुलस्त्य ऋषि राजा को “मानुष्य-ह्रद/मानुष्य-तीर्थ” नामक अत्यन्त पुण्यदायक जल-तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। वहाँ स्नान करने से मनुष्य-भाव स्थिर रहता है; भारी पापों से दबा व्यक्ति भी पशु-योनि में नहीं गिरता—यह इस अध्याय का मुख्य प्रतिपादन है। कथा में दिखाया गया है कि शिकारीयों से घिरा हिरनों का झुंड उस जल में प्रवेश करता है और तुरंत मनुष्य बन जाता है; उन्हें अपने पूर्वजन्म की स्मृति भी रहती है। हथियारों सहित आए शिकारी उनसे हिरनों का मार्ग पूछते हैं; वे नव-मानुष बताते हैं कि यह परिवर्तन केवल तीर्थ-प्रभाव से हुआ। तब शिकारी हथियार त्यागकर स्नान करते हैं और “सिद्धि” प्राप्त करते हैं। तीर्थ की पाप-हर शक्ति देखकर शक्र (इन्द्र) उसे धूल से भरकर निष्प्रभावी करना चाहता है, पर परम्परा के अनुसार उसका प्रभाव बना रहता है। बुधाष्टमी को वहाँ स्नान करने वाले पशुता से बचते हैं और श्राद्ध-दान द्वारा पितृमेध का पूर्ण फल प्राप्त करते हैं।

Kapilā-tīrtha Māhātmya (कपिलातीर्थमाहात्म्यम्) — The Ethics of Satya and Pilgrimage Merit
पुलस्त्य मुनि कपिला-तीर्थ की महिमा और वहाँ पहुँचने का अनुशंसित क्रम बताते हैं। कहा गया है कि वहाँ स्नान करने से संचित दोष नष्ट होते हैं। सुप्रभा नामक राजा शिकार के उन्माद में एक हिरणी को, जो अपने दूध पीते शावक को पाल रही थी, मार देता है। मरती हुई हिरणी उसे क्षात्र-धर्म के विरुद्ध कर्म बताकर शाप देती है कि वह पर्वत-ढाल पर भयंकर बाघ बनेगा, और कपिला नाम की दुधारू गाय के दर्शन से ही मुक्त होगा। शाप से राजा बाघ बन जाता है और आगे चलकर झुंड से बिछुड़ी कपिला से उसका सामना होता है। कपिला अपने बछड़े के पास जाने की अनुमति माँगती है और लौट आने का वचन देती है। वह असत्य होने पर भारी पाप-फल की स्वयं पर शपथें लेकर अपने सत्य को दृढ़ करती है। बाघ उसके सत्य से द्रवित होकर उसे जाने देता है। कपिला बछड़े को दूध पिलाकर उसे सावधानी और लोभ-त्याग की शिक्षा देती है, अपने समुदाय से विदा लेकर, वचनानुसार लौट आती है। सत्य को हजार अश्वमेधों से भी श्रेष्ठ कहा गया है; बाघ उसे छोड़ देता है और उसी क्षण राजा को मानव-रूप वापस मिल जाता है। कपिला के जल माँगने पर राजा बाण से भूमि को भेदता है और शुद्ध, शीतल जल-स्रोत प्रकट होता है। धर्म प्रकट होकर वर देता है और तीर्थ का नाम तथा फल बताता है—विशेषतः चतुर्दशी को स्नान, श्राद्ध और दान करने से गुणित, अक्षय पुण्य मिलता है; छोटे जीव भी उस जल-स्पर्श से लाभ पाते हैं। अंत में दिव्य विमान आते हैं और कपिला, उसका समुदाय तथा राजा दिव्य अवस्था को प्राप्त होते हैं। कथा का उपसंहार इस उपदेश से होता है कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार वहाँ स्नान, श्राद्ध और दान अवश्य करें।

अग्नितीर्थमाहात्म्य (Agni-tīrtha Māhātmya: The Glory of Agni Tirtha)
पुलस्त्य ययाति को अग्नि-तीर्थ की यात्रा का उपदेश देते हैं—यह परम पावन स्थान है जहाँ कभी अग्नि ‘लुप्त’ हो गए थे और बाद में देवताओं ने उन्हें पुनः प्राप्त किया। बारह वर्षों के दीर्घ अकाल से दुर्भिक्ष फैलता है और समाज-व्यवस्था टूटने लगती है। भूख से दुर्बल विश्वामित्र एक चाण्डाल बस्ती में पहुँचकर मरे हुए कुत्ते का मांस पकाते हैं और उसे अग्नि में आहुति देते हैं; इसे ‘अभक्ष्य-भक्षण’ रूप दूषित कर्म कहा गया है। अशुद्ध आहुतियों से बाधित होकर और वर्षा-रोक का कारण इन्द्र के शासन-दोष को मानकर अग्नि मर्त्यलोक से हट जाते हैं। परिणामतः अग्निष्टोम आदि यज्ञ-क्रियाएँ रुक जाती हैं और लोक-स्थिरता डगमगा जाती है। देवता अग्नि की खोज करते हैं; एक शुक (तोता) उनके गमन का संकेत देता है। अग्नि पहले शमी/अश्वत्थ वृक्ष में, फिर अर्बुद पर्वत के जलाशय में छिपकर अदृश्य रहते हैं। एक दर्दुर (मेंढक) निर्झर में उनकी स्थिति बता देता है, तब अग्नि उसे ‘विजिह्वत्व’ (जीभ-दोष) का शाप देते हैं। देवता अग्नि की स्तुति करते हैं—वे देवताओं के मुख, यज्ञ के प्राण और जगत् के आधार हैं। अग्नि अपनी पीड़ा बताते हैं कि उन्हें अपवित्र आहुतियों में बाध्य किया गया। इन्द्र देवापि-प्रतीप-शान्तनु से जुड़ी राज-नीति/धर्म की कथा कहकर वर्षा रोकने का कारण स्पष्ट करते हैं और मेघों को वर्षा का आदेश देते हैं। वर्षा लौटने पर अग्नि प्रसन्न होकर वहीं रहने को मानते हैं और उस जलाशय को ‘अग्नि-तीर्थ’ नाम से प्रसिद्ध करने की प्रार्थना करते हैं। फलश्रुति में कहा है—विधिपूर्वक स्नान से अग्नि-लोक की प्राप्ति, तिल-दान से अग्निष्टोम का फल, तथा इस माहात्म्य के पाठ-श्रवण से दिन-रात के संचित पापों का नाश होता है।

रक्तानुबन्धतीर्थ-माहात्म्य (Māhātmya of the Raktānubandha Tīrtha)
पुलस्त्य ऋषि रक्तानुबन्ध तीर्थ की प्रायश्चित्त-गाथा कहते हैं। युद्ध से लौटे राजा इन्द्रसेन ने पत्नी सुनन्दा की पतिव्रता-निष्ठा परखने हेतु छल से दूत भेजकर अपने मरण का झूठा समाचार कहलवाया। पतिप्राणा सुनन्दा ने यह सुनते ही प्राण त्याग दिए। तब राजा पर स्त्री-वध का कर्मदोष प्रकट हुआ—दूसरी छाया, शरीर में भारीपन, तेज का क्षय और दुर्गन्ध जैसे अशौच-लक्षण उत्पन्न हो गए। शुद्धि के लिए राजा ने अन्त्येष्टि-क्रियाएँ कीं और काशी, कपालमोचन आदि अनेक तीर्थों की दीर्घ यात्रा की, पर दोष न मिटा। बहुत भटकने के बाद वह अरवुद (आबू) पर्वत पहुँचा और रक्तानुबन्ध तीर्थ में स्नान करते ही दूसरी छाया लुप्त हो गई तथा शुभ लक्षण लौट आए। पर तीर्थ-सीमा से बाहर जाते ही दोष फिर उभर आया; तुरंत लौटकर स्नान करने पर पुनः शुद्धि हुई—इससे तीर्थ की सीमाबद्ध प्रभावशीलता सिद्ध हुई। तीर्थ की परम महिमा जानकर राजा ने दान किए, चिता बनवाई और वैराग्य से अग्नि में प्रवेश कर शिवलोक को प्राप्त हुआ। फलश्रुति में कहा गया है कि वहाँ किया गया श्राद्ध और अर्पण अत्यन्त फलदायी है; सूर्य-संक्रान्ति पर स्नान ब्रह्महत्या तक का नाश करता है; और ग्रहणकाल में विशेषतः गोदान आदि से सात पीढ़ियों का उद्धार होता है।

Mahāvināyaka-prādurbhāvaḥ and Mahāvināyakī-śānti (महाविनायकप्रादुर्भावः / महाविनायकीशान्तिः)
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि राजा ययाति को महाविनायक के दर्शन का विधान बताते हैं। कहा गया है कि महाविनायक के दर्शन से तत्काल ‘निर्विघ्नता’ प्राप्त होती है। ययाति के प्रश्न पर पुलस्त्य उत्पत्ति-कथा सुनाते हैं—पार्वती ने देह-लेप से एक बालक का रूप बनाया, पर सामग्री के अभाव से वह आरम्भ में शिरोहीन रहा। तब स्कन्द को सिर लाने की आज्ञा हुई; संयोगवश एक अत्यन्त शक्तिशाली गज-शीर्ष प्राप्त हुआ और वही स्थापित किया गया। गौरी ने अपनी शक्ति से उसमें प्राण संचार कर शिव को अर्पित किया। शिव ने गजमुख को ही उसके ‘महत्त्व’ का आधार घोषित कर उसे ‘महाविनायक’ नाम दिया, गणों का अधिपति बनाया और आदेश दिया कि प्रत्येक कार्य के आरम्भ में उसका प्रथम स्मरण हो, जिससे कोई कर्म नष्ट न हो और विघ्न न आए। फिर उसके चिह्न-उपकरण बताए गए—स्कन्द ने क्रीड़ा-शस्त्र रूप में प्रिय कुठार दिया, गौरी ने मोदकों का पात्र दिया, और एक मूषक प्रकट होकर उसका वाहन बना। इसके बाद फलश्रुति आती है—माघ शुक्ल चतुर्थी को उपवास सहित दर्शन करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है; समीप के निर्मल जल-कुण्ड में स्नान और पूजन से संतति का कल्याण होता है; ‘गणानां त्वे’ मंत्र के साथ तीन बार प्रदक्षिणा करने से अनिष्ट दूर होता है। अन्त में ययाति महाविनायकी-शान्ति का विधान पूछते हैं। पुलस्त्य बताते हैं कि दोषरहित दिन और बलवान चन्द्र-स्थिति में वेदी-मण्डप बनाकर अष्टदल कमल-मण्डल रचा जाए, लोकपालों और मातृकाओं का आवाहन हो, जलपूर्ण कलश स्थापित कर अर्घ्य-उपहार दिए जाएँ, ग्रह-होम सहित होम किया जाए, ‘गणानां त्वे’ मंत्र का बहुसंख्य जप हो, और श्रीसूक्त आदि वैदिक पाठों के साथ यजमान का स्नान कराकर समापन किया जाए। इससे विघ्न, उपद्रव और अशुभ निमित्त शांत होते हैं; चतुर्थी को इसका पाठ-श्रवण निरन्तर निर्विघ्नता देता है और एकाग्र उपासना से गणनाथ की कृपा द्वारा अभीष्ट सिद्धि होती है।

पार्थेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Pārtheśvara)
पुलस्त्य पार्थेश्वर-तीर्थ की यात्रा का वर्णन करते हैं, जिसे पाप-नाशक कहा गया है; इसके दर्शन मात्र से अनेक प्रकार के अपराधों से मुक्ति बताई गई है (श्लो. 1)। वहीं देवल की प्रिया, पतिव्रता पार्था का परिचय मिलता है, जो उस स्थान पर तप करती है (श्लो. 2)। पूर्वजन्म में वह एक निःसंतान ऋषि की पत्नी थी; गहरे वैराग्य से युक्त होकर वह अर्बुद पर्वत पर गई और दीर्घकाल तक वायु-आहार, उपवास तथा मन की समता के साथ कठोर तप करती रही (श्लो. 3–4)। हजार वर्ष पूर्ण होने पर पृथ्वी फटकर एक शिवलिंग प्रकट हुआ और आकाशवाणी ने उसे परम पावन लिंग बताकर, उसकी भक्ति से प्रकट होने की बात कही तथा पूजन का आदेश दिया (श्लो. 5–6)। वाणी यह भी कहती है कि निर्दिष्ट संकल्प से किया गया पूजन इच्छित फल देता है और यह लिंग ‘पार्थेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध होगा (श्लो. 7–8)। पार्था ने विस्मयपूर्वक पूजन किया और वंश-धारक सौ पुत्रों की प्राप्ति का प्रसंग जुड़ता है; तीर्थ की कीर्ति फैलती है और शुद्ध गुफा-जलस्रोत का उल्लेख आता है (श्लो. 9–10)। वहाँ स्नान और भक्तिपूर्वक लिंग-दर्शन से संतान-संबंधी सांसारिक दुःख दूर होता है; शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उपवास सहित रात्रि-जागरण करने से पुत्र-लाभ बताया गया है (श्लो. 11–12)। साथ ही वहाँ किया गया पिण्ड-निर्वापण पितरों को अनुग्रह से पुत्रत्व-सदृश लाभ प्रदान करता है (श्लो. 13)।

कृष्णतीर्थ-प्रादुर्भावः (Origin and Significance of Kṛṣṇa-tīrtha)
पुलस्त्य ऋषि ययाति को कृष्णतीर्थ जाने की आज्ञा देते हैं—यह तीर्थ सदा श्रीकृष्ण/विष्णु को अत्यन्त प्रिय है और वहाँ निरन्तर दिव्य सन्निधि मानी जाती है। ययाति उसके प्रादुर्भाव का कारण पूछते हैं। पुलस्त्य प्रलय-काल का वर्णन करते हैं, जब दीर्घ समय बाद ब्रह्मा जागते हैं और गोविन्द से मिलते हैं। प्रधानता के विवाद से दोनों में दीर्घ युद्ध छिड़ता है; तभी एक तेजोमय, अनन्त लिङ्ग प्रकट होता है और अशरीरी वाणी आदेश देती है कि एक ऊपर और एक नीचे जाकर उसका अन्त खोजे—जो अन्त पा ले वही परम है। विष्णु नीचे जाते हैं, कालाग्निरुद्र-रूप का दर्शन करते हैं और उसकी ज्वाला से दग्ध होकर ‘कृष्णत्व’ (श्यामता) को प्राप्त होते हैं; फिर लौटकर वेद-मन्त्रों से लिङ्ग की स्तुति-पूजा करते हैं। ब्रह्मा ऊपर जाकर अन्त नहीं पाते, पर केतकी-पुष्प को झूठी साक्षी बनाकर लौटते हैं; महादेव ब्रह्मा के पूज्यत्व पर शाप देते हैं और केतकी के पूजन-प्रयोग को वर्जित करते हैं, तथा विष्णु की सत्यनिष्ठा की प्रशंसा करते हैं। विष्णु सृष्टि-कार्य हेतु लिङ्ग को लघु करने की प्रार्थना करते हैं; महादेव शुद्ध स्थान में प्रतिष्ठा का निर्देश देते हैं। विष्णु अर्बुद-पर्वत पर निर्मल स्रोत के निकट लिङ्ग की स्थापना करते हैं और वही स्थान ‘कृष्णतीर्थ’ कहलाता है। फलश्रुति में कहा है कि वहाँ स्नान और लिङ्ग-दर्शन से समस्त तीर्थों का फल, दान का फल, एकादशी-जागरण व श्राद्ध का फल मिलता है; घोर पाप नष्ट होते हैं और केवल दर्शन मात्र से भी कृष्णतीर्थ शुद्धि देता है।

Māmūhradā Tīrtha-Māhātmya and Mudgaleśvara: Dialogue on Svarga’s Limits and the Choice of Mokṣa
पुलस्त्य ऋषि राजा ययाति को पर्वतीय प्रदेश में स्थित पापनाशक तीर्थ ‘मामूहरदा’ जाने का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि वहाँ श्रद्धापूर्वक स्नान करने से घोर पाप भी नष्ट होते हैं और मुनि मुद्गल द्वारा प्रतिष्ठित ‘मुद्गलेश्वर’ लिंग के दर्शन से दुर्लभ आध्यात्मिक उत्कर्ष मिलता है—विशेषकर फाल्गुन मास में निर्दिष्ट तिथि-क्षणों पर। वहाँ दिशा-नियम का ध्यान रखकर किया गया श्राद्ध पितरों को प्रलय तक तृप्त करता है; निवारा धान्य तथा शाक-मूल आदि से सरल अर्पण और दान-क्रियाएँ भी प्रशंसित हैं। ययाति नामकरण और मुद्गल-आश्रम की कथा पूछते हैं। पुलस्त्य बताते हैं कि एक देवदूत मुद्गल को स्वर्ग ले जाने आया; मुद्गल ने स्वर्ग के गुण-दोष पूछे और जाना कि स्वर्ग भोग-लोक है, वहाँ नया पुण्य नहीं बनता और पुण्य क्षय होने पर पतन का भय बना रहता है। इसलिए मुद्गल ने स्वर्ग त्यागकर तीव्र तप और शिव-भक्ति का व्रत लिया। इन्द्र ने पहले दूत द्वारा दबाव डलवाया, फिर स्वयं आए; पर मुद्गल के तपोबल से वे स्तब्ध हो गए और इन्द्र को वर देना पड़ा। मुद्गल ने मोक्ष और तीर्थ की ‘मामूहरदा’ नाम से कीर्ति माँगी। इन्द्र ने वर दिया कि यह तीर्थ प्रधान होगा, फाल्गुन पूर्णिमा का स्नान परम सिद्धि देगा, पिण्डदान का फल गया के समान होगा और दान का फल अपरिमेय होगा। अंत में मुद्गल शुद्ध ध्यान से अक्षय मुक्ति को प्राप्त होते हैं; नारद की गाथा निष्कर्ष देती है कि मामूहरदा में स्नान और मुद्गलेश्वर के दर्शन से लोक-कल्याण तथा अंतिम मोक्ष दोनों मिलते हैं।

Chandikā-Āśrama-Prādurbhāva and Mahīṣāsura-Vadha (चण्डिकाश्रमप्रादुर्भावः महिषासुरवधश्च)
अध्याय का आरम्भ ययाति के प्रश्न से होता है—अर्बुद पर्वत पर चण्डिका का आश्रम कैसे प्रकट हुआ, कब हुआ, और उसके दर्शन से मनुष्यों को क्या लाभ मिलता है। पुलस्त्य एक ‘पाप-प्रणाशिनी’ कथा सुनाते हैं: पूर्व देवयुग में दैत्य महीष, ब्रह्मा के वर से (केवल ‘स्त्री’ द्वारा वध्य) बलवान होकर देवों को दबा देता है, यज्ञ-भाग का वितरण रोकता है और लोक-व्यवस्था चलाने वालों से बिना यज्ञ-प्रतिदान के सेवा कराता है। देवगण बृहस्पति के पास जाते हैं; वे उन्हें अर्बुद ले जाकर परमशक्ति चण्डिका की मंत्र, न्यास, पूजन-आहुति और कठोर तपस्या से आराधना करने को कहते हैं। महीनों के तप से संचित तेज को मण्डल में एकत्र कर एक तेजोमयी कन्या प्रकट होती है—वही चण्डिका। देव उसे दिव्य आयुध देते हैं और महामाया, विश्वव्यापिनी, रक्षिका, उग्ररूपा आदि नामों से स्तुति करते हैं; चण्डिका उचित समय पर महीष-वध का व्रत लेती हैं। फिर नारद चण्डिका को देखकर उसकी अनुपम शोभा महीष को बताते हैं; इससे महीष में काम जागता है और वह दूत भेजकर उसे पाने का प्रयास करता है। चण्डिका प्रस्ताव ठुकराकर कहती हैं कि यह उसके विनाश की भूमिका है। युद्ध में महीष की सेनाएँ और अपशकुन वर्णित हैं; चण्डिका अनेक अस्त्रों को निष्फल करती हैं, ब्रह्मास्त्र का भी प्रतिकार करती हैं, महीष के रूप-परिवर्तनों को जीतकर अंत में महिष-रूप का शिरच्छेद करती हैं और निकलते हुए वीर-रूप को भी मार गिराती हैं। देव प्रसन्न होकर इन्द्र का राज्य पुनः स्थापित करते हैं। चण्डिका अर्बुद पर एक स्थायी, प्रसिद्ध आश्रम की याचना करती हैं जहाँ वे निवास करें; वहाँ उनके दर्शन से साधक उच्च आध्यात्मिक अवस्था और ब्रह्म-ज्ञान की ओर उन्मुखता पाते हैं। इसके बाद विस्तृत फलश्रुति आती है—वहाँ स्नान, पिण्डदान, श्राद्ध, ब्राह्मण-दान, एक/तीन रात्रि का उपवास, चातुर्मास्य-निवास, विशेषतः आश्विन मास की कृष्ण चतुर्दशी, गायाश्राद्ध-तुल्य फल, भय-नाश, आरोग्य, धन, संतान, राज्य-प्राप्ति और मोक्ष तक देने वाले बताए गए हैं। अंत में कहा है कि लोग अन्य कर्म छोड़कर देवी की ओर अधिक झुकने लगे, इसलिए इन्द्र ने काम-क्रोध आदि रूपी विक्षेपों को मर्यादा हेतु प्रवर्तित किया। अर्बुद-दर्शन को स्वयंसिद्ध पावन कहा गया है, और इस अध्याय-लेख को घर में रखने या श्रद्धा से पाठ करने पर भी महान पुण्य बताया गया है।

नागह्रदतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Nāgahṛda Tīrtha
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि उपदेश देते हैं कि पाप-नाशक तीर्थ ‘नागह्रद’ जाना चाहिए। फिर उसकी उत्पत्ति-कथा आती है—कद्रू के शाप से पीड़ित और राजा परीक्षित के सर्पयज्ञ की अग्नि से विनाश का भय लिए नागगण शेषनाग के पास परामर्श हेतु जाते हैं। शेष उन्हें अर्बुद पर्वत पर संयमित तप करने और कामरूपिणी देवी चण्डिका की निरन्तर आराधना करने को कहते हैं; वे बताते हैं कि देवी का स्मरण विपत्तियों का नाश करता है। नागगण एक गुहा-मार्ग से पर्वत में प्रवेश कर होम, जप, उपवास और कठोर व्रतों द्वारा तप करते हैं। देवी प्रसन्न होकर वर देती हैं कि यज्ञ की समाप्ति तक वे निर्भय होकर उनके समीप रहेंगे, फिर अपने लोक को लौट सकेंगे। साथ ही देवी कहती हैं कि नागों द्वारा गुहा के विदारण से यह स्थान पृथ्वी पर ‘नागह्रद तीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध होगा। आगे विधान है—श्रावण मास की कृष्ण पक्ष पंचमी को श्रद्धा से स्नान करने पर सर्पभय दूर होता है, और वहाँ किया गया श्राद्ध पितरों का कल्याण करता है। अंत में श्रावण कृष्ण-पंचमी को देवी की निरन्तर उपस्थिति का पुनः प्रतिपादन कर, वहाँ स्नान और श्राद्ध को लोक-परलोक हितकारी बताया गया है।

Śiva-kuṇḍa and Śiva-Gaṅgā: The Concealed Presence of Jāhnavī at Arbuda (शिवकुण्ड-शिवगङ्गामाहात्म्यम्)
इस अध्याय में पुलस्त्य और राजा ययाति के बीच प्रश्नोत्तर रूप में तीर्थ-माहात्म्य का वर्णन है। अर्बुद पर्वत पर शिवलिङ्ग से सम्बद्ध एक कुंड बताया गया है, जहाँ जाह्नवी (गंगा) ‘गुप्त’ रूप से निवास करती हैं। वहाँ स्नान करने से समस्त तीर्थों का फल मिलता है और जीवनभर संचित पापों का नाश होता है। कथा का कारण यह है कि देवताओं द्वारा प्रसन्न किए जाने पर शिव अर्बुद में प्रतिष्ठित होते हैं और पार्वती के सामने गोपनीयता रखते हुए गंगा का सान्निध्य चाहते हैं। नन्दी और भृंगी के नेतृत्व में गण एक निर्मल जल वाला उत्तम कुंड बनाते हैं; शिव व्रत-व्याज से उसमें प्रवेश कर मन से गंगा का आवाहन करते हैं और गंगा तत्काल प्रकट हो जाती हैं। नारद शिव के असामान्य भाव को देखकर ध्यान से रहस्य जानकर कह देते हैं; क्रोधित पार्वती वहाँ आती हैं। पूर्वसूचित गंगा विनयपूर्वक पार्वती को शांत करती हैं, भागीरथ-प्रसंग में अपने पूर्व सम्बन्ध (अवतरण के समय धारण) का स्मरण कराती हैं, और चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को शिव के साथ क्रीड़ा हेतु एक दिन का वर माँगती हैं; स्थान का नाम ‘शिवकुंड/शिवगंगा’ रखती हैं। अंत में चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को श्रद्धा-एकाग्रता से स्नान, अमंगल-नाश, तथा ब्राह्मण को वृष-दान करने का विधान है, जिसका फल स्वर्ग-प्राप्ति बताया गया है।

Acalēśvara-liṅga-patana, Deva-stuti, and Saktū-dāna Māhātmya (अचलेश्वरलिङ्गपतन-देवस्तुति-सक्तुदानमाहात्म्य)
इस अध्याय में राजा ययाति पुलस्त्य से पूछते हैं कि महादेव द्वारा स्थापित लिङ्ग कैसे खिसक गया और उस स्थान के दर्शन से क्या पुण्य मिलता है। पुलस्त्य कारण-कथा सुनाते हैं—सती के देहत्याग और दक्ष के अपमान के बाद शोकाकुल, भ्रमित शिव वालखिल्य ऋषियों के आश्रम पहुँचे। उनकी दिव्य छवि से ऋषियों की पत्नियाँ आकृष्ट होकर निकट गईं; ऋषि शिव को पहचान न सके और शाप दे बैठे कि उनका लिङ्ग ‘पतन’ को प्राप्त हो। तभी पृथ्वी-कम्प, समुद्र-क्षोभ आदि से जगत् में अस्थिरता के लक्षण प्रकट हुए। देवगण ब्रह्मा के पास गए; ब्रह्मा ने कारण जानकर उन्हें अर्बुद में ले जाकर शिव की ओर उन्मुख किया। देवों ने वेद-शैली की स्तुति से शिव को प्रसन्न किया और व्यवस्था-स्थापन की प्रार्थना की। शिव ने कहा कि गिरा हुआ लिङ्ग अचल है; उपाय केवल यह है कि क्रम से ब्रह्मा, फिर विष्णु, इन्द्र, अन्य देवों और अंत में वालखिल्य ऋषियों द्वारा शतरुद्रीय मंत्रों से पूजा हो—तभी अपशकुन शांत होंगे। वर माँगा गया कि लिङ्ग का स्पर्श भी मल-अपवित्रता हर ले; तब इन्द्र ने वज्र से उसे ढँककर सामान्य मनुष्यों से अदृश्य कर दिया, पर उसकी पावन निकटता बनी रही। अंत में विधि बताई गई—फाल्गुन मास की अंतिम चतुर्दशी को ताज़ा जौ (यव) का दान और ब्राह्मण-भोजन अत्यन्त फलदायी है, अनेक अन्य कर्मों से भी श्रेष्ठ। उदाहरण में एक रोगी पुरुष का वहाँ सत्तू-संबंध से अनायास शुभ पुनर्जन्म होता है; समझ आने पर वह प्रतिवर्ष उपवास, रात्रि-जागरण और उदार सत्तू-दान के साथ व्रत करता है। फलश्रुति में श्रद्धापूर्वक सुनने वालों के दिन-रात संचित दोषों से मुक्ति कही गई है।

कामेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Kāmeśvara Māhātmya—Narrative of the Glory of Kāmeśvara)
इस अध्याय में पुलस्त्य और राजा ययाति का संवाद है। ययाति पूछते हैं कि मनोभव काम के भय से शिव अनेक पवित्र तीर्थों में क्यों विचरते रहे और कामेश्वर का निवास-प्रसंग क्या है। पुलस्त्य बताते हैं कि काम धनुष-बाण सजाए बार-बार शिव का पीछा करता रहा; शिव भी अनेक प्रसिद्ध तीर्थों से होकर दीर्घकाल तक गमन करते हुए अंततः अर्बुद पर्वत की ओर लौटे। अर्बुद में शिव ने काम का प्रत्यक्ष सामना किया। शिव के तृतीय नेत्र से प्रचंड अग्नि प्रकट हुई और काम धनुष-बाण सहित भस्म हो गया। इसके बाद रति का करुण विलाप और आत्मदाह का प्रयास आता है, जिसे आकाशवाणी रोककर तप करने की आज्ञा देती है। रति ने हजार वर्ष व्रत, दान, जप, होम और उपवास से शिव की आराधना की; तब शिव ने वर देकर काम को पुनः देह सहित प्रकट किया और अपने अनुमोदन से उसे उसके कार्य में प्रवृत्त किया। अंत में ययाति शिव की महिमा जानकर अर्बुद में शिव की स्थापना करते हैं; कहा गया है कि इस देव के दर्शन से सात जन्मों तक अनिष्ट का नाश होता है—यही इस क्षेत्र की फलश्रुति है।

Mārkaṇḍeya’s Longevity Boon and the Ritual Merits of Arbuda Āśrama (मार्कण्डेयदीर्घायुष्प्रसङ्गः)
पुलस्त्य राजा को मृकण्डु के पुत्र का प्रसंग सुनाते हैं। बालक शुभ लक्षणों से युक्त था, पर एक विद्वान अतिथि ने कहा कि वह छह मास के भीतर मर जाएगा। तब पिता ने शीघ्र उसका उपनयन कराया और उसे संयमित श्रद्धा सिखाई—हर आयु के ब्राह्मणों को नमस्कार करने की शिक्षा दी। तीर्थयात्रा में सप्तर्षि आए; बालक ने विनयपूर्वक उनका अभिवादन किया। ऋषियों ने दीर्घायु का आशीर्वाद दिया, पर अङ्गिरा ने सूक्ष्म दृष्टि से पाँचवें दिन की मृत्यु-छाया देखी और अपने वचन की सत्यता बचाने हेतु उपाय बताया। ऋषि बालक को ब्रह्मलोक ले गए; ब्रह्मा ने पूछताछ कर उसे कल्प-पर्यन्त दीर्घायु का वर दिया। घर लौटकर बालक ने वर बताया और अर्बुद पर्वत पर सुंदर आश्रम बनाकर ब्रह्मा की उपासना का संकल्प किया। अंत में फलश्रुति है—श्रावण पूर्णिमा को वहाँ पितृ-तर्पण करने से पितृमेध-सदृश पूर्ण फल मिलता है; ऋषि-योग से श्रेष्ठ ब्राह्मणों का तर्पण ब्रह्मलोक में दीर्घ निवास देता है; और श्रद्धापूर्वक वहाँ स्नान करने से वंश में अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।

उद्दालकेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Narration of the Māhātmya of Uddālakeśvara)
इस अध्याय में पुलस्त्य मुनि नृपश्रेष्ठ को संक्षेप में उपदेश देते हैं। वे उसे जगत् में विख्यात, परम पाप-नाशक उस लिंग के दर्शन हेतु जाने को कहते हैं, जिसे महर्षि उद्दालक ने प्रतिष्ठित किया है और जो उद्दालकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ लिंग का स्पर्श और दर्शन भी पुण्यदायक बताया गया है, पर विशेष रूप से उसका पूजन अत्यन्त फलप्रद है। जो भक्तिभाव से वहाँ शंकर की आराधना करता है, वह सब रोगों से मुक्त होता है, गृहस्थ-धर्म को प्राप्त/स्थिर कर पाता है, समस्त पापों से छूटकर शिवलोक में सम्मान पाता है। यह प्रभासखण्ड (अर्बुदखण्ड) का 42वाँ अध्याय है।

Siddheśvara-Māhātmya (सिद्धेश्वरमहिमवर्णनम्) — The Glory of Siddheśvara
पुलस्त्य ऋषि राजा से कहते हैं कि वह सिद्धों द्वारा प्रतिष्ठित पवित्र लिंग ‘सिद्धलिंग’ के दर्शन हेतु जाए, जो ‘सत्सिद्धि’ देने वाला माना गया है। इस तीर्थ में पूजन-दर्शन से समस्त पातकों का नाश बताया गया है। वहीं निकट एक अत्यन्त निर्मल जल वाला कुण्ड वर्णित है। उसमें स्नान करने से ब्रह्महत्या जैसे महापातक-विशेष से भी मुक्ति होने की बात कही गई है। फिर इस स्थान की महिमा को व्यापक करते हुए कहा गया है कि स्नान करते समय मन में जो भी कामना की जाए, वह सिद्ध होती है, और जीवन के अंत में साधक परम पद को प्राप्त करता है। अंत में कोलोफन में स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड, अर्बुदखण्ड-उपविभाग तथा ‘सिद्धेश्वर-माहात्म्य’ अध्याय-शीर्षक का उल्लेख कर इसे ग्रंथ-संरचना में स्थापित किया गया है।

गजतीर्थप्रभाववर्णनम् | Description of the Power and Merit of Gajatīrtha
इस अध्याय ‘गजतीर्थ-प्रभाव-वर्णन’ में पुलस्त्य ऋषि राजा को ‘अनुत्तर’ तीर्थ गजतीर्थ की यात्रा का उपदेश देते हैं। वे पूर्ववृत्त बताते हैं कि प्राचीन काल में दिग्गज—संयमी और शुद्ध आचरण वाले—यहीं तपस्या करते थे; ऐरावत आदि लोकधारक गजों सहित उनके आचरण से इस तीर्थ की महिमा प्रमाणित हुई। अध्याय का केंद्र विधिपूर्वक स्नान है। जो भक्त श्रद्धा से गजतीर्थ में सम्यक् स्नान करता है, उसे गजदान के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। इस प्रकार यह अध्याय तीर्थ-भूगोल, आदर्श तपस्या और पुण्य-समता के सिद्धान्त को जोड़कर तीर्थधर्म का संक्षिप्त मार्ग दिखाता है।

श्रीदेवखातोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (Devakhāta Tīrtha: Origin and Māhātmya)
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि देवखाता तीर्थ का उपदेश देते हैं। इसे परम पुण्यदायक, स्वयंसिद्ध कीर्ति वाला और विद्वज्जनों (विबुधों) द्वारा मान्य तीर्थ कहा गया है। आगे देवखाता में श्राद्ध करने की विशेष विधि बताई गई है—विशेषतः अमावस्या को, और साथ ही जब सूर्य कन्या राशि में हो तब वहाँ किया गया श्राद्ध अत्यन्त फलदायी माना गया है। इससे कर्ता को उत्तम परलोक-गति प्राप्त होती है और पितरों का भी उद्धार होता है, यहाँ तक कि जो पितर कठिन/दुर्गति में पड़े हों उन्हें भी कल्याण मिलता है। अंत में कोलोफ़न द्वारा इसे स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड (अर्बुदखण्ड) में ‘देवखातोत्पत्ति-माहात्म्य’ विषयक अध्याय के रूप में स्थापित किया गया है।

व्यासतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Description of the Glory of Vyāsa-tīrtha)
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि उपदेशात्मक शैली में श्रोता को एक निश्चित पुण्य-स्थान की ओर ले जाते हैं—“तब व्यासेश्वर जाना चाहिए”। व्यास द्वारा प्रतिष्ठित व्यासतीर्थ और व्यासेश्वर-धाम का माहात्म्य बताते हुए कहा गया है कि वहाँ का दर्शन साधक के भीतर ज्ञान का रूपान्तरण करता है; दर्शन से मेधा (बुद्धि-प्रखरता), मति (विवेक) और शुचिता (पवित्रता) प्राप्त होती है। अध्याय के अंत में कोलोफोन द्वारा ग्रंथ-परिचय दिया गया है—यह स्कन्दमहापुराण के 81,000 श्लोकों वाले संहिता-परिसर में, प्रभास खण्ड के सातवें भाग तथा अर्बुद खण्ड के तृतीय विभाग में स्थित है, और “व्यासतीर्थमाहात्म्यवर्णनम्” नाम से छियालिसवाँ अध्याय कहा गया है; इससे पाठ, उद्धरण और संकलन के लिए प्रमाणिक अनुक्रम सुनिश्चित होता है।

गौतमाश्रमतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् | Gautamāśrama Tīrtha Māhātmya (Glory of Gautama’s Hermitage-Site)
पुलस्त्य राजा को प्रसिद्ध गौतम-आश्रम जाने की आज्ञा देते हैं, जहाँ धर्मपरायण मुनि गौतम ने पूर्वकाल में कठोर तप किया था। उन्होंने भक्तिभाव से महादेव की आराधना की, जिसके फलस्वरूप पृथ्वी को भेदकर एक महान लिंग प्रकट हुआ—यह उस स्थान पर शिव-सन्निधि का विशेष चिन्ह माना गया। तब आकाशवाणी हुई कि इस लिंग की पूजा करो और वर माँगो। गौतम ने वर माँगा कि आश्रम में भगवान की नित्य निकटता बनी रहे और जो भी सच्ची भक्ति से वहाँ शिव का दर्शन करे, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त हो। विशेष विधान यह बताया गया कि माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को दर्शन करने वाला परम गति को प्राप्त करता है। अध्याय में पास के पवित्र कुंड का भी वर्णन है—उसमें स्नान से वंश का उद्धार होता है। वहाँ किया गया श्राद्ध, विशेषकर इन्दुसंक्षय (चन्द्र-क्षय/ग्रहण-संयोग) के समय, गया-श्राद्ध के समान फल देता है; और तिल-दान से तिलों की संख्या के अनुसार दीर्घ स्वर्गवास मिलता है। साथ ही गोदावरी के सिंहस्थ-स्नान आदि प्रसिद्ध तीर्थ-स्नानों के फलों का उल्लेख कर इस तीर्थ को व्यापक पुण्य-परंपरा और पंचांग-नियमों से जोड़ा गया है।

कुलसंतारणतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् | Kulasantāraṇa Tīrtha: Māhātmya and the Ethics of Ancestral Uplift
पुलस्त्य मुनि ‘कुलसंतारण’ नामक तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जिसे अनुपम कहा गया है—जहाँ विधिपूर्वक स्नान करने से पूरे कुल का उद्धार होता है। कथा में पूर्वकाल के राजा अप्रस्तुत का वर्णन है, जो हिंसक शासन, लोभपूर्ण अधर्म और दान-ज्ञान-नियमों की उपेक्षा के लिए प्रसिद्ध था। वृद्धावस्था में उसे स्वप्न में पीड़ित पितृ दिखाई देते हैं और कहते हैं कि वे स्वयं धर्मपरायण थे, फिर भी उसके पापों के कारण नरक में पड़े हैं; इसलिए उसे शुभ पूजा और प्रायश्चित्त कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। राजा यह बात रानी इन्दुमती से कहता है। रानी सिद्धान्त बताती है कि अच्छा पुत्र पितरों का उद्धार करता है और दुष्ट पुत्र उन्हें कष्ट देता है; अतः धर्मज्ञ ब्राह्मणों से परामर्श करना चाहिए। ब्राह्मण दीक्षा, शारीरिक शुद्धि, तीर्थयात्रा, स्नान और दान का क्रम बताते हैं और उसके बाद ही यज्ञादि कर्मों की योग्यता कहते हैं। राजा यात्रा कर अर्बुद के पवित्र जल में श्रद्धापूर्वक स्नान करता है; तब पितृ घोर नरक से मुक्त होकर दिव्य विमानों में प्रकट होते हैं, इस स्थान को ‘कुलसंतारण’ नाम देते हैं और तीर्थ-प्रभाव से राजा को सशरीर स्वर्गारोहण का निमंत्रण देते हैं। अंत में पुलस्त्य राकासोम और व्यतीपात आदि शुभ संयोगों में स्नान-फल की वृद्धि भी बताते हैं।

रामतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Rāmatīrtha Māhātmya: The Glory of Rama’s Tīrtha)
पुलस्त्य ऋषि रामतीर्थ की यात्रा का वर्णन करते हैं—यह ऋषियों से सेवित पवित्र तीर्थ है, जहाँ स्नान करने से पापों का क्षय होता है। फिर कथा पीछे लौटती है: भृगुवंशी योद्धा-तपस्वी भार्गव राम (परशुराम) शत्रुओं के क्षय की कामना से तीन सौ वर्षों तक कठोर तप करते हैं। तप से प्रसन्न महादेव प्रकट होकर वर देते हैं और परम पाशुपत अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका प्रभाव स्मरण मात्र से भी “शत्रुनाश” कर देता है। शंकर यह भी कहते हैं कि उनकी कृपा से वही सरोवर तीनों लोकों में “रामतीर्थ” के नाम से प्रसिद्ध होगा। इसके बाद विधि बताई जाती है: कार्तिक पूर्णिमा को, जब कृत्तिका-योग हो, इस तीर्थ में एकाग्र होकर श्राद्ध करने से पितरों को पूर्ण फल मिलता है; साथ ही शत्रु-क्षय और दीर्घ स्वर्गवास भी प्राप्त होता है। अंत में महादेव अंतर्धान हो जाते हैं; जमदग्नि-वध के शोक में परशुराम “सात-सात” करके तीन बार तर्पण करते हैं और क्षत्रियों से संघर्ष का शपथ-संदर्भ आता है—अतः विशेषकर क्षत्रियों को प्रयत्नपूर्वक यहाँ श्राद्ध करने की प्रेरणा दी गई है।

कोटितीर्थप्रभाववर्णनम् | Kotitīrtha: Description of Power and Merit
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि राजा को कोटितीर्थ का माहात्म्य और तत्त्वार्थ समझाते हैं। कोटितीर्थ को ‘सर्व-पातक-नाशन’ पवित्र तीर्थ कहा गया है। ‘कोटि’ (करोड़) जैसी तीर्थ-शक्ति कुछ विशेष स्थानों में क्यों संचित होती है—इसका सिद्धान्त बताया गया है: असंख्य तीर्थों में से एक ‘कोटि’ अंश अर्बुद पर्वत पर निवास करता है; पुष्कर और कुरुक्षेत्र से भी ऐसी संहतियाँ जुड़ी हैं; और वाराणसी में ‘अर्ध-कोटि’ तीर्थ-बल देवताओं द्वारा प्रशंसित व संरक्षित है। कलियुग में लोगों के ‘म्लेच्छ-भाव’ में पड़ जाने और संसर्ग से ‘तीर्थ-विप्लव’ होने की बात कही गई है; इसलिए तीर्थ-शक्तियाँ शीघ्र ही इन्हीं रक्षित स्थानों में स्थिर रहती हैं। फिर साधना-निर्देश मिलता है—पूर्ण प्रयत्न से स्नान करें, विशेषकर भाद्रपद (नभस्य) मास की कृष्ण-पक्ष त्रयोदशी को। अंत में फल-निर्णय है कि वहाँ किया गया स्नान, जप और होम सब ‘कोटि-गुण’ होकर फल देता है।

चन्द्रोद्भेदतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Māhātmya of the Chandrodbheda Tīrtha)
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि राजा को चन्द्रोद्भेद तीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं। चन्द्र से सम्बद्ध यह अनुपम पाप-नाशक तीर्थ बताया गया है। अमृत-प्रसंग से राहु का देवताओं से वैर हुआ; विष्णु ने उसका सिर काट दिया, पर अमृत-पान से वह अमर रहा और ग्रहण के समय विशेषतः चन्द्र को भय व पीड़ा देता रहा। राहु के भय से रक्षा चाहकर चन्द्र अरवुद (आर्बुद) पर्वत पर गए, शिखर को भेदकर गहरी गुफा बनाई और उसमें कठोर तप किया। प्रसन्न महेश्वर प्रकट होकर वर देते हैं। चन्द्र ग्रहण-काल में राहु के ‘ग्रहण’ से मुक्ति माँगते हैं। शिव राहु की शक्ति स्वीकारते हुए भी उपाय बताते हैं—ग्रहण के समय इस तीर्थ में स्नान और दान करने से लोगों का कल्याण होता है, पुण्य अक्षय बनता है और चन्द्र की पीड़ा भी विधिपूर्वक शांत होती है। शिखर-भेदन के कारण इसका नाम ‘चन्द्रोद्भेद’ पड़ा। ग्रहण में यहाँ स्नान करने से पुनर्जन्म से मुक्ति, और सोमवारे स्नान व दर्शन से चन्द्रलोक-निवास का फल कहा गया है। अंत में शिव अंतर्धान होते हैं और चन्द्र आनंदपूर्वक अपने स्थान को लौट जाते हैं।

Īśānīśikhara Māhātmya (Glory of the Īśānī Peak)
पुलस्त्य ऋषि राजा ययाति से ईशानीशिखर नामक महान् शिखर की अद्भुत पवित्रता कहते हैं। वे बताते हैं कि उसके केवल दर्शन से पाप नष्ट होते हैं और सात जन्मों तक शुभता प्राप्त होती है। ययाति के पूछने पर वे वहाँ देवी के तप का समय और कारण भी दिव्य प्रसंग के रूप में सुनाते हैं। देवताओं को भय होता है कि यदि शिव की शक्ति देवी के क्षेत्र में गिर पड़ी तो सृष्टि-व्यवस्था बिगड़ जाएगी; इसलिए वे गुप्त रूप से वायु को भेजकर संयम का निवेदन कराते हैं। शिव लज्जावश पीछे हटते हैं; देवी दुःखी होकर शाप देती हैं—देवता संतानहीन होंगे और वायु देहहीन होगा। क्रोध में देवी अर्बुद पर्वत की ओर चली जाती हैं। इन्द्र सहित देवता प्रसन्नता की याचना करते हैं। शिव आकर बताते हैं कि यह कार्य लोक-कल्याण हेतु था और चौथे दिन देवी को उनके अपने शरीर से पुत्र मिलेगा। देवी अपने अंग-मल से चतुर्भुज विनायक बनाती हैं; शिव उसमें प्राण प्रतिष्ठित करते हैं और वह सर्वपूज्य, प्रथम-पूज्य गणनायक बनता है। फिर देवता घोषित करते हैं कि इस शिखर की सेवा और दर्शन से पाप नष्ट होते हैं; वहाँ के तीर्थ में स्नान अमर पद देता है और माघ शुक्ल तृतीया का व्रत सात जन्मों तक सुख देता है। अध्याय का उपसंहार इसे प्रभास खण्ड के अंतर्गत अर्बुद खण्ड का 52वाँ अध्याय बताता है।

ब्रह्मपदोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of the Origin and Power of Brahmā’s Padam (Sacred Mark)
पुलस्त्य मुनि त्रिलोकी में प्रसिद्ध ‘ब्रह्मपद’ नामक तीर्थ का प्रसंग कहते हैं। अर्बुद पर्वत पर अचलेश्वर-यात्रा के अवसर में देवता और शुद्ध ऋषि एकत्र होते हैं। नियम, होम, व्रत, स्नान, उपवास, कठिन जप और विधि-विधान से थके हुए ऋषि ब्रह्मा से प्रार्थना करते हैं कि संसार-सागर से पार कराने वाला सरल उपदेश और स्वर्ग-प्राप्ति का स्पष्ट उपाय बताइए। ब्रह्मा करुणा से कहते हैं कि उनका अपना शुभ ‘पद’ पाप-नाशक स्थान है; वहाँ केवल स्पर्श और श्रद्धापूर्वक अभिमुख होना भी उत्तम गति देने वाला है, भले ही स्नान, दान, व्रत, होम और जप का पूरा साधन न हो। एक ही अनिवार्य शर्त है—अडिग श्रद्धा। कार्तिक पूर्णिमा को जल, फल, सुगंध, माला और अनुलेपन से पूजन करके, यथाशक्ति मधुर भोजन से ब्राह्मणों को तृप्त करने पर दुर्लभ ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। अंत में युगानुसार पद के रंग और आकार का वर्णन है—कृत में असंख्य श्वेत, त्रेता में लाल, द्वापर में कपिश, और कलि में सूक्ष्म कृष्ण—जिससे इस तीर्थ का काल-धर्मार्थ संकेत प्रकट होता है।

त्रिपुष्करमाहात्म्यवर्णनम् | Tripuṣkara Māhātmya (Glorification of Tripuṣkara)
इस अध्याय में पुलस्त्य बताते हैं कि त्रिपुष्कर किस प्रकार पर्वत अर्बुद पर प्रतिष्ठित हुआ। पद्मयोनि ब्रह्मा संध्या-पूजन हेतु पुष्कर की ओर जाते हैं, क्योंकि उनका व्रत है कि मनुष्य-लोक में रहने तक वे त्रिपुष्कर में संध्या की वंदना करेंगे। उसी समय वसिष्ठ का यज्ञ-सत्र चल रहा होता है; कर्मकाल आ जाने पर वसिष्ठ कहते हैं कि ब्रह्मा के बिना यज्ञ की पूर्णता नहीं हो सकती। अतः वे ब्रह्मा से प्रार्थना करते हैं कि त्रिपुष्कर को यज्ञ-स्थल पर लाकर वहीं संध्या-पूजन करें और यज्ञ के अध्यक्ष देवता बनकर उसे पूर्ण कराएँ। विचार करके ब्रह्मा ज्येष्ठ–मध्य–कनिष्ठ रूप वाले तीनों पुष्कर-तीर्थों को अर्बुद के परम पुण्य जलाशय में ले आते हैं; तभी से त्रिपुष्कर का अर्बुद में निवास माना गया है। आगे फलश्रुति में कहा है कि जो कार्त्तिक पूर्णिमा को शांतचित्त होकर स्नान और दान करता है, वह चिरस्थायी लोकों को प्राप्त करता है। उत्तर दिशा में सावित्री-कुण्ड नामक उत्तम उपस्थान भी है, जहाँ स्नान-दान से शुभ फल सिद्ध होता है।

रुद्रह्रद-माहात्म्यवर्णनम् | Rudrahrada Māhātmya (Glory of the Lake of Rudra)
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि राजपुरुष को शुभ रुद्रह्रद तीर्थ में जाने और वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करने का उपदेश देते हैं। कहा गया है कि जो व्यक्ति भक्ति से इस सरोवर में स्नान करता है, वह पवित्र होकर शिवगणों के सान्निध्य/संग और ‘गणाधीशत्व’ जैसी उच्च अवस्था को प्राप्त करता है। फिर तीर्थ की उत्पत्ति-कथा आती है—अंधक दैत्य के वध के बाद वृषभध्वज भगवान शिव अपने गणों सहित वहाँ स्नान करते हैं और उसी स्थान पर सरोवर की स्थापना करते हैं; इसलिए यह ‘रुद्रह्रद’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। आगे नियम बताया गया है कि चतुर्दशी तिथि को किया गया स्नान समस्त तीर्थों के संगम के तुल्य पुण्य देता है। अंत में इसे प्रभास खंड के अंतर्गत अर्बुद खंड का 55वाँ अध्याय बताकर समापन किया गया है।

गुहेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Guhēśvara Māhātmya (Account of the Glory of Guhēśvara)
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि एक राजश्रवणकर्ता को गुहेश्वर नामक परम पवित्र तीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं। यह शिवलिङ्ग एक गुहा के भीतर स्थित है और पूर्वकाल में सिद्धों द्वारा पूजित रहा है—इसी से इसकी महिमा और प्रामाणिकता प्रतिपादित होती है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो मनुष्य किसी विशेष कामना को मन में रखकर वहाँ जाकर पूजन करता है, उसे वही अभीष्ट फल प्राप्त होता है; और जो निष्काम भाव से, केवल भक्ति और शुद्धता के साथ आराधना करता है, वह मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। यह स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड (अर्बुदखण्ड) का 56वाँ अध्याय है।

अवियुक्तक्षेत्रमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of the Aviyukta (Non-Separation) Kṣetra
पुलस्त्य ऋषि राजा को अवियुक्तवन का माहात्म्य बताते हैं। इस वन का विशेष फल यह है कि जो इसे देखता या इसमें निवास करता है, वह अपने प्रिय जनों और प्रिय वस्तुओं से वियोग में नहीं रहता। इस बात का आधार एक कारण-कथा से स्थापित किया गया है। नहुष द्वारा इन्द्र का राज्य छीन लिए जाने पर शची अत्यन्त दुःखी होकर इस वन में प्रवेश करती है। वन के स्वाभाविक प्रभाव से पहले वियुक्त शतक्रतु इन्द्र पुनः लौट आते हैं और शची से मिलन होता है; इसी से इस क्षेत्र की ‘अवियुक्त’ कीर्ति प्रसिद्ध हुई। तब शची वन को वर देती है कि जो स्त्री या पुरुष प्रिय सम्बन्धियों से बिछुड़ा हो और वहाँ एक रात्रि निवास करे, उसे पुनः संग और साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त होगा। अध्याय में यह भी कहा गया है कि वहाँ फलदान/फलार्पण का बड़ा पुण्य है, जिसे विद्वान ब्राह्मण प्रशंसा करते हैं। विशेषकर संतान की कामना करने वाली स्त्रियों के लिए वन्ध्यत्व-निवारण और ‘पुत्र-फल’ की प्राप्ति बताई गई है। यह प्रभासखण्ड के अर्बुदखण्ड का 57वाँ अध्याय है।

उमामाहेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of the Umā–Maheśvara Tīrtha)
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि राजाओं को उपदेश देते हुए प्रभास-खण्ड के “उमा–महेश्वर” तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह तीर्थ परम पुण्यदायक और श्रेष्ठ कहा गया है। इसकी स्थापना धुन्धुमार नामक भक्त द्वारा हुई—जिससे यह भाव प्रकट होता है कि भक्ति की शक्ति से ही भू-प्रदेश भी पावन बनता है। विधि सरल है: यात्री को उमा–महेश्वर के स्थान पर जाकर दिव्य दम्पति शिव-पार्वती की श्रद्धा-भक्ति से पूजा करनी चाहिए। फलश्रुति में कहा गया है कि ऐसा उपासक सात जन्मों तक दुर्भाग्य से बचा रहता है और निरन्तर शुभता प्राप्त करता है।

महौजसतीर्थप्रभाववर्णनम् | The Efficacy of Mahaujasa Tīrtha
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि महौजस तीर्थ की महिमा कथा-रूप में कहते हैं। यह तीर्थ पातक-नाशक है और यहाँ स्नान करने से तेज और शुभ-श्री की पुनः प्राप्ति होती है। ब्रह्महत्या के दुष्फल से पीड़ित इन्द्र (शक्र) श्री और तेज से रहित हो जाते हैं, दुर्गन्ध से युक्त होकर देवताओं द्वारा तिरस्कृत भी होते हैं। तब वे बृहस्पति के पास जाते हैं; बृहस्पति बताते हैं कि पृथ्वी पर तीर्थ-यात्रा ही तेज की पुनर्प्राप्ति का उपाय है, तीर्थ के बिना तेज-वृद्धि नहीं होती। अनेक तीर्थों में भ्रमण के बाद इन्द्र अर्बुद में पहुँचते हैं। वहाँ एक जलाशय देखकर स्नान करते ही उन्हें महा-ओज प्राप्त होता है; दुर्गन्ध दूर हो जाती है और देवता उन्हें फिर स्वीकार कर लेते हैं। इन्द्र फलश्रुति बताते हैं कि आश्विन शुक्ल पक्ष के अंत में, शक्र-उदय के समय जो यहाँ स्नान करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है और जन्म-जन्म में श्री-सम्पन्न रहता है। इस प्रकार पाप, प्रायश्चित्त, तीर्थ और काल-विशेष का उपदेश एक साथ दिया गया है।

जंबूतीर्थप्रभाववर्णनम् (Description of the Power and Merit of Jambū Tīrtha)
पुलस्त्य ऋषि श्रोता को अनुपम जंबूतीर्थ जाने की विधि बताते हैं और कहते हैं कि वहाँ विधिपूर्वक स्नान करने से इच्छित फल प्राप्त होते हैं। फिर पूर्वकथा आती है—सूर्यवंशी राजा निमि वृद्धावस्था में अर्बुद पर्वत पर जाकर एकाग्रचित्त से प्रायोपवेशन (नियमित उपवास द्वारा देहत्याग) का संकल्प करते हैं। अनेक मुनि वहाँ पहुँचकर राजर्षियों, देवर्षियों और पुराण-परंपरा से जुड़े धर्मोपदेश करते हैं। अंत में लोमश ऋषि विस्तृत तीर्थ-माहात्म्य का पाठ करते हैं। उसे सुनकर निमि को खेद होता है कि उन्होंने पहले व्यापक तीर्थ-स्नान नहीं किए; वे सभी तीर्थों का फल पाने का उपाय पूछते हैं। करुणावश लोमश मंत्रबल से जंबूद्वीप के तीर्थों को उसी स्थान पर बुलाने का वचन देते हैं और एकत्रित पवित्र जल में स्नान करने की आज्ञा देते हैं। ध्यान करते ही तीर्थ तत्काल प्रकट होते हैं और प्रमाणस्वरूप जंबू वृक्ष भी उत्पन्न होता है। निमि ‘सर्वतीर्थ’ सरोवर में स्नान कर उसी क्षण देह सहित स्वर्ग को प्राप्त होते हैं; इसलिए वह स्थान जंबूतीर्थ कहलाता है। साथ ही कहा गया है कि सूर्य के कन्या राशि में होने पर वहाँ श्राद्ध करने से गया-शीर्ष के समान पुण्य मिलता है।

गंगाधरतीर्थमाहात्म्य (Glory of Gaṅgādhara Tīrtha)
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि एक राजश्रवणकर्ता को गंगाधर नामक अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह तीर्थ ‘सुपुण्य’ और ‘विमल जल’ से युक्त कहा गया है, जिसकी पवित्रता शिव-तत्त्व के दिव्य प्राकट्य से जुड़ी है। कथनानुसार हरि/शिव अचलेश्वर रूप धारण कर आकाश से उतरती गंगा को धारण करते हैं; इसी कृपा और धारण-लीला से वह स्थान परम पावन बनता है। आगे विधि बताई गई है कि अष्टमी तिथि को समाहित चित्त से वहाँ स्नान करने पर ऐसा परम पद मिलता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ माना गया है।

कटेश्वर-गंगेश्वर-माहात्म्यवर्णनम् (Glory of Kāṭeśvara and Gaṅgeśvara)
पुलस्त्य प्रभास-खण्ड में तीर्थ-यात्रा का क्रम बताते हैं और श्रोता को दो लिंगों के दर्शन का विधान करते हैं—गौरी (उमा) द्वारा निर्मित काटेश्वर-लिंग और नदी-देवी गंगा द्वारा निर्मित गंगेश्वर-लिंग। सौभाग्य के विषय में उमा और गंगा के पूर्व विवाद से कथा आरम्भ होती है; गंगा लिंग-स्थल की खोज में निकलती हैं, और उमा एक सुंदर पर्वत-रचना को लिंग-सदृश, ‘काटक’ (वलय) जैसी आकृति वाला देखकर पूर्ण श्रद्धा से पूजन करती हैं। उनकी भक्ति से महादेव प्रसन्न होकर दर्शन देते हैं और वर प्रदान करते हैं। गौरी उस स्थान का नाम ‘काटेश्वर’ रखकर फलश्रुति कहती हैं—सौत के कारण पीड़ित या विरह से दुखी स्त्रियों को केवल दर्शन मात्र से ज्वर/क्लेश का शमन, कल्याण और गृह-सौभाग्य की पुनः स्थापना होती है। फिर गंगा भी पूजन कर वर पाती हैं और गंगेश्वर की स्थापना करती हैं; दोनों लिंगों के दर्शन का विशेष महत्त्व बताया गया है, विशेषतः ‘सपत्नी-दोष’ से मुक्ति तथा सुख और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए। अध्याय अर्बुद-क्षेत्र की पवित्र भू-परिधि में इन फलों को स्थायी भक्ति-प्रेरणा के रूप में स्थापित करते हुए समाप्त होता है।

Arbuda-khaṇḍa-māhātmya-phalaśruti-varṇanam (Glory of Arbuda: Fruits of Hearing and Pilgrimage)
पुलस्त्य अर्बुद पर्वत की महिमा का संक्षिप्त उपसंहार करते हैं। वे कहते हैं कि वहाँ असंख्य तीर्थ और ऋषियों द्वारा स्थापित पवित्र धाम हैं, इसलिए उसकी पूरी गणना तो सदियों के वर्णन से भी पूरी नहीं हो सकती। अर्बुद में पवित्रता सर्वत्र व्याप्त है—वहाँ कोई तीर्थ, सिद्धि, वृक्ष, नदी या देव-सान्निध्य ऐसा नहीं जो अनुपस्थित हो। “सुंदर अर्बुद पर्वत” के निवासी पुण्य-सम्पन्न बताए गए हैं। जो व्यक्ति चारों ओर से अर्बुद का दर्शन नहीं करता, उसके जीवन, धन और तप का व्यावहारिक फल मानो अधूरा रह जाता है—ऐसा दृढ़ मूल्यांकन किया गया है। इसके बाद उद्धार-शक्ति का विस्तार मनुष्यों से आगे कीट, पशु, पक्षी तथा चार प्रकार के जन्म वाले समस्त प्राणियों तक किया जाता है। अर्बुद पर मृत्यु—निष्काम हो या सकाम—शिव-सायुज्य देती है, जहाँ जरा और मृत्यु नहीं रहती। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से प्रतिदिन इस पुराण-कथा का श्रवण करने पर तीर्थ-यात्रा का फल मिलता है; इसलिए इस लोक और परलोक में सिद्धि हेतु यात्रा अवश्य करनी चाहिए।
Arbuda is portrayed as exceptionally purificatory—capable of removing sin even through mere sight (darśana)—and as sanctified through Vasiṣṭha’s ascetic power and presence.
Merits are framed in terms of pāpa-kṣaya (sin-diminution), tīrtha-snāna/dāna efficacy, and the heightened salvific value of approaching the mountain and its associated sacred sites with disciplined conduct.
A Vasiṣṭha-centered narrative provides the anchor: an episode involving the rescue of the wish-fulfilling cow Nandinī and the ritual-theological creation or transformation of a landscape feature through invoked sacred waters and mountain agency.